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नवरात्रि विशेष: न्याय और माया।। आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। नवरात्रि आ रही है तो कन्याओं को पुस्तक देने की सोची। तो उसमें अमर चित्र कथा में पढ़ रहा था, उसमें अंगुलिमाल का एक प्रसंग आता है। उसमें दिखाते हैं कि उसने काफ़ी लोगों की हत्या कर दी। लेकिन बुद्ध के सम्पर्क में आने के बाद बुद्ध ने उसकी चेतना को ही रूपांतरित कर दिया और एक प्रकार से उसे नया जन्म दे दिया।

अगर हम लॉ (नियम) के हिसाब से देखें तो शायद उसे लटका देना चाहिए था या मार देना था। तो एक यह द्वंद्व दिखता है; बुद्ध के न्याय में और एक लॉ जो हमारा समाज है उसके न्याय में। तो इस संदर्भ में थोड़ी स्पष्टता चाहिए थी।

अचार्य प्रशांत: समाज की दृष्टि सूक्ष्म तो होती नहीं। तो समाज क्या करता है कि पाप पर प्रहार करता है और पापी को वैसा ही छोड़ देता है जैसा वह था। उसको लगता है कि देह ने अपराध किया न, तो देह को उठाकर के बंद कर दो या देह को सज़ा दे दो। पहले कोड़ों वग़ैरह से मारते थे देह को। वास्तविक पापी कौन है यह समाज को समझ में नहीं आता। समाज को तो कोई आत्मज्ञान है नहीं। तो समाज कुछ इस तरह से व्यवहार करता है कि जैसे इस हाथ ने किसी की हत्या कर दी तो हाथ का दोष हो। और जिसका दोष है वह बचा रह जाता है। तो हमारे सुधार-गृह नहीं होते वास्तव में, हमारे बंदी-गृह होते हैं। हम बंदी बना लेते हैं, सुधार हम कोई कर नहीं पाते। यह अंतर होता है समाज में और बुद्ध में।

बुद्ध को बंदी बनाने में कोई रुचि नहीं है। कह रहे हैं, देह को बंदी बनाने में क्या मिलेगा, हाथ को हथकड़ी पहना कर क्या मिलेगा। बुद्ध पापी को ही मार देते हैं। जैसे लेज़र से सर्जरी की गयी हो कि शरीर पर तो लगभग कोई असर पड़ा ही नहीं और बड़ी महीन लेज़र थी, वह भीतर तक घुस गयी और भीतर जहाँ पर फोड़ा था या गाँठ थी उसको छेद दिया लेज़र ने।

और समाज ऐसा है कि तुम उसके सामने जाओ और बोलो कि पेट में दर्द हो रहा है तो पूरा पेट ही फाड़ दे। पूरा पेट फाड़ दिया, पता कुछ नहीं है कि दर्द क्यों हो रहा है, किस वजह से हो रहा है। कुछ पता नहीं, पर पेट फाड़ दिया पूरा। और पेट फाड़कर कहा कि कुछ तो करा हमने। तो यह अंतर होता है।

जिसको हम सुधार कहते हैं वह वास्तव में पापी का अंत होता है। पापी ही सुधर गया तो पापी बचा कहाँ? तो असली चीज़ तो यही है। इसीलिए तो 'कोहम' इतना महत्वपूर्ण प्रश्न है। पता तो हो करने वाला कौन है। करने वाला कोई और है, सलाह किसी और को दे रहे हो। एक तरह का तुम्हें संतोष भर मिल जाएगा कि मैंने बदला ले लिया। समझ रहे हो? समाज न्याय नहीं करता; समाज बदला लेता है। वह जो हमारी पूरी न्याय व्यवस्था है वह वास्तव में क्या है? बदला व्यवस्था। किसने ग़लती की उसको मारो, बदला लो। अब बदला लेने से तो कोई बात बन तो नही जाएगी।

(बाहर से वाहनों के हॉर्न की कर्कश आवाज़ आती है, उस पर आगे बोलते हैं।)

अब क्या करूँ मैं, हॉर्न तोड़ दूँ? यह समाज का न्याय है, 'हॉर्न तोड़ दो।' वह दूसरा लगवा लेगा, फिर बजाएगा, कहीं और जाकर बजाएगा। दोष उसका है न जिसको पता ही नहीं कि जो कुछ मिला है जीवन में उसका उपयोग कैसे करना है।

वह जो पापी है, अध्यात्म उसकी बात करना चाहता है, 'असली दोषी है कौन?' जो कर्ता है वही दोषी है। उसी का नाम अहंकार भी है, उसी को माया बोल लो, सबकुछ वही करता है। और उसका मूल दोष यह है कि उसे अपना नहीं पता होता। वह कर्ता तो है, ज्ञाता नहीं है। वह कर्ता तो है, जानता नहीं है। यही जीवन में मूल दोष होता है। पाप इसी का नाम है – कर गए, पता नहीं किया किसने। जब नहीं पता किया किसने, तो क्या हो गया इसका कुछ ठिकाना नहीं।

आप कुछ कह देते हैं, आपको पता है वह आपने कहा या किसी और ने कहा? आप कुछ कर जाते हैं, आपको कैसे पता वह आपने करा या किसी और ने कराया? बताइए। आपको कैसे पता? ये मान लीजिए एक टीवी की स्क्रीन (चित्रपट) हो, सबके हाथ में इसका रिमोट है। अलग-अलग रिमोट है, सबके हाथ में है। इसमें कोई चित्र आ रहा है या कोई गाना बज रहा है। कैसे पता किसने बजा दिया?

हम भी ऐसे ही चित्रपट भर हैं। हमारी स्क्रीन चार सौ अलग-अलग ताक़तों के हाथ में है। क्या पता किसने रिमोट में कौनसा बटन दबा दिया, हम बज उठे, हम गाना गाने लग गये। बाहर कोई था जिसने गाने वाला बटन दबा दिया। हमें ख़ुद ही नहीं पता किसने बटन दबाया कि हम गाना गा उठे।

आप अनायास कोई गीत गुनगुनाने लगते हैं। देखा है कई बार, यूँही कोई गीत गुनगुनाने लगते हैं। आपको क्या लगता है जो हुआ वह अनायास हुआ? यूँही हुआ, अकस्मात? ना, किसी ने बटन दबाया है। आपको पता ही नहीं किसने बटन दबाया है। वहाँ तो स्पष्ट हो जाता है कि कोई आपका रिमोट लेकर घूम रहा है। जीवन में बाक़ी सब भी जो आप करते हैं, उसका बटन भी कोई-न-कोई दबा रहा है। इस मामले में यह स्क्रीन हमसे बेहतर है। इसे कम-से-कम यह गुमान नहीं होता कि यह आत्म चालित है, कि इसका इसके कर्मों पर कोई नियंत्रण है। स्क्रीन को ऐसा कभी नहीं लगेगा क्योंकि स्क्रीन जड़ है।

हमारा दुर्भाग्य यह है कि हम पूरी तरह जड़ नहीं हैं, हम थोड़े-बहुत चेतन हैं। तो हमें यह ग़लत-फ़हमी हो जाती है कि हम जो कर रहे हैं वो हम कर रहे हैं। जबकि हम जो कर रहे हैं वो कोई और करवा रहा है हमसे। और भगवान नहीं करवा रहा, संसार करवा रहा है। यह नहीं है कि वही करता हूँ न मैं जो ईश्वर चाहता है। आप ईश्वर के चाहने से नहीं चल रहे हैं, आप दुनिया के चाहने से चल रहे हैं। यही मूल पाप है। यही मूल पाप है, यह पता भी न होना कि मैं किसके आधिपत्य में हूँ; जो मैं कर रहा हूँ वह करवा कौन रहा है; जो मैं बना बैठा हूँ, मुझे बना किसने दिया। यह मूल पाप है।

बुद्धों का काम है पापी को ख़त्म कर देना। बड़े ख़तरनाक होते हैं, बड़ा ज़बरदस्त उनका प्रतिशोध होता है। हमारे सब न्यायालय वग़ैरा तो ऊपर-ऊपर से प्रतिकार करते हैं। और बुद्ध सीधे सज़ा-ए-मौत देते हैं। इससे कम कोई दंड उनको स्वीकार ही नहीं है। कहते हैं, कोई पापी आया है? सज़ा-ए-मौत; कोई पापी आया है? मृत्युदंड। मृत्युदंड से नीचे कोई दंड चलेगा ही नहीं। हम सबको वह मृत्युदंड चाहिए जो मिला अंगुलिमाल को। समझ रहे हो? इस तरह की तुलना में मत पड़ा करो कि समाज कैसे करता है और बुद्ध कैसे करते हैं। यह कोई तुलना है! किसको किससे तुम तुलना कर रहे हो?

प्र२: आचार्य जी, मैं छत्तीसगढ़ से हूँ और वहाँ नवरात्रि के समय में देखा गया है कि बहुत सारे देवी-देवता चढ़ते हैं लोगों को; तो इस पर आपका क्या तर्क है?

आचार्य: वह तो हमेशा ही चढ़े रहते हैं, उसमें क्या है, कोई उसी दिन थोड़े ही चढ़ते हैं। उसमें तो कोई ताज्जुब की बात ही नहीं। और मैं कह भी नहीं रहा कि ऐसा नहीं होता, बिलकुल होता है। अभी यहाँ सब बैठे हैं शांत क्योंकि एक तरह के प्रभाव क्षेत्र में हैं, तो पता नहीं चल रहा। थोड़ा सा माहौल बदल दो, फिर देखो सबके कैसे देवी-देवता नाचते हैं। वह हमेशा चढ़े रहते हैं। वह बचपन से चढ़े हुए हैं। उनको चढ़ाकर ही हम पैदा होते हैं। उनको चढ़ाये-चढ़ाये ही हम चिता पर चढ़ते हैं। समझ गये न इशारा?

"जो मन से ना उतरे, माया कहिए सोए।" वह हमेशा चढ़ी रहती है।

प्र२: मैंने कल फेसबुक में देखा। बहुत सारे धर्मगुरु जो पर्चा लिखते हैं, किसी का भविष्य बता देते हैं। तो ऐसा क्या कोई सिद्धि उनको प्राप्त है या कुछ? आपका तर्क जानना चाहता था। जैसे कभी किसी आदमी से नहीं मिले होते हैं वह, फिर भी उनका नाम बता देते हैं, उनका भविष्य बता देते हैं।

आचार्य: मान लो बता देते हैं, तो? उससे क्या? दिक्क़त यही है न कि हमारा जो पूरा आध्यात्मिक साहित्य है, तथाकथित आध्यात्मिक साहित्य, उसमें इस तरह की बातें भी आ जाती हैं, कितने प्रकार की सिद्धियाँ होती हैं। एक सिद्धि होती है कि तुम दूसरों का विचार पढ़ सकते हो। एक होती है कि तुम अपना आकार बढ़ा सकते हो। एक होती है कि तुम छोटे हो सकते हो। अब चूँकि इस तरह की बातें किताबों में ही लिखी हुई हैं, तो लोगों को मौका मिल जाता है यह कहने का कि ऐसा तो होता ही होगा।

तभी मैं कहता हूँ न सब किताबें पढ़ने लायक़ हैं लेकिन वेदान्त सबसे ऊपर है, क्योंकि उसमें ये सब नहीं चलता, सिद्धि वग़ैरह। अणिमा-लघिमा ये सब वहाँ नहीं चलता। फिर लोग कहते हैं कि हम सबकुछ ही क्यों न पढ़ लें, सबकुछ ही क्यों न पढ़ लें। अब मर्ज़ी है तुम्हारी। ये सब पढ़ लो इससे कुछ मिलता हो तो। ऐसी सिद्धियाँ हैं, कोई पानी पर चलने की सिद्धि है, कोई अदृश्य हो जाने की सिद्धि है। कर लो, यही कर लो तुम।

प्र३: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, जब हम देखते हैं कि हज़ार-बारह सौ वर्ष में भारत ने आक्रमण बहुत देखे हैं। क्योंकि सत्य से शक्ति जुदा हो गयी थी। पर जब भारत आज़ाद हुआ तो उसके बाद भी हम विदेशी बैसाखियों पर ही आगे बढ़ते चले गये। तो मेरा ऐसा मानना है कि जैसे भारत में, लोकतांत्रिक देश में, अलग-अलग मंत्रालय हैं, तो एक अध्यात्म पर भी मंत्रालय होना चाहिए, जहाँ हर धर्म के या हर संप्रदाय के धर्मगुरु हों जो भारत को और अच्छे स्थान पर लेकर जा सकें।

आचार्य: उसको बनाएगा कौन?

प्र३: एक अच्छा नेता बनाएगा या अच्छा गुरु बनाएगा।

आचार्य: अच्छा नेता कौन बनाएगा?

प्र३: हम लोग ही बनाएँगे।

आचार्य: बनाओ।

(श्रोतागण हँसते हैं)

बहुत अच्छी बात है कि बिल्ली के गले में घंटी बाँध दिया जाए, पर कौनसा चूहा बाँधेगा? सब चूहे चाहते हैं कि बिल्ली के गले में घंटा बँधा हो, पता चल जाए कि आ रही है। छोटी सी समस्या है कि समझ में नहीं आ रहा कि वह कौनसा चूहा होगा जो यह काम करेगा। नेता कर देगा! नेताओं को वोट तुम देते हो। ये सब जो नमूने खड़े कर रखे हैं नेताओं के नाम पर, तुमने खड़े करे हैं। फिर कहते हो कि वो सब नेता अध्यात्म का मंत्रालय बना दें; कैसे बना देंगे? उन्हें अध्यात्म का 'अ' पता है? आधा 'अ' पता है? उन्हें पता होता तो वो नेता नहीं होते। तुम्हें पता होता तो भी वो नेता नहीं होते।

तो ये सारी बातें सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं कि रामराज्य आ जाए, अध्यात्म का मंत्रालय बन जाए, यह हो जाए, वह हो जाए। जानते हो, बड़ी-से-बड़ी भारत में जो हिंसाएँ हैं और दुर्दशाएँ हैं, वो सीधे-सीधे सरकार करवाती है। आप यहाँ कल बात कर रहे थे कि पशुओं पर कितनी बर्बरता होती है। माँस के उद्योग को सबसे बड़ी सहायता स्वयं सरकार देती है। यह मुर्गी पालन, यह मछली पालन कौन करवा रहा है? और कितने झूठे नाम 'मुर्गी पालन'! जैसे मुर्गी पालने के लिए सरकार सहायता देती है! यह मुर्गी पालन है या मुर्गी हत्या विभाग है? मत्स्य पालन, मछली पालो। यह पाला जा रहा है? ये सारे काम सरकार करवाती है।

सरकार पिंक रिवॉल्यूशन (गुलाबी क्रांति) चलवा रही है, हमारी ही सरकार। पिंक रिवॉल्यूशन समझते हो क्या होता है? कि माँस का निर्यात बढ़ना चाहिए। भारत माँस के निर्यात में नम्बर एक मुल्क होना चाहिए, यह हमारी सरकार करवा रही है। जैसे तुम हो, वैसी तुम्हारी सरकार है, महा हिंसक सरकार। तुम बदलोगे तभी कुछ होगा।

ये जो स्लॉटर हाउसेस (बूचड़खाने) होते हैं, इनकी काफ़ी सारी मशीनरी सब्सिडाइज्ड (आर्थिक सहायता प्राप्त) होती है। हमारे-तुम्हारे टैक्स (कर) के पैसे से स्लॉटर हाउस की मशीनरी आयात होती है। कई बार उसको सब्सिडी दी जाती है ताकि ज़्यादा एफिशिएंसी (क्षमता) के साथ जानवरों को काटा जा सके, यह हमारी सरकार करवा रही है। और यह सब छुपा-छुपा रहता है।

प्र४: सर, मेरे तीन प्रश्न है। पहला प्रश्न इस श्लोक में है:

ताप क्रियाग्नि तपतानाम, अशांत प्राणीनाम भूमि; गुरुरेव परा गंगा तस्मै श्री गुरुवे नमः।।

तो यहाँ पर तीन ताप बताये हैं। जैसा मैं समझ पा रहा हूँ, वह आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक ताप बताये हैं। इसमें जो आधिदैविक और आधिभौतिक है वह समझ में नहीं आ रहे, स्पष्टता नहीं हो रही।

आचार्य: सांसारिक कारणों से जो दुख मिलता है, उसको कहते हैं आधिभौतिक और आधिदैविक। जिस दुख में सांसारिक कारण स्पष्ट है उसको आधिभौतिक कह देते हैं। जिस दुख में सांसारिक कारण है तो, पर तुम्हें स्पष्ट नहीं हो पा रहा, उसको कह देते हो आधिदैविक। लगभग सारे दुख इन्हीं दो कोटियों में आ जाते हैं। इसके बाद एक आख़िरी दुख बचता है जो होता है – होने का दुख। 'मैं हूँ,' यही बात दुख की है, अस्तित्वगत दुख। उसको कहते हैं आध्यात्मिक ताप या आध्यात्मिक दुख।

प्र४: और दूसरा प्रश्न यह है, आचार्य जी, जैसे ब्रह्मवेत्ता जो महापुरुष होते हैं तो उनके बारे में बता रहे हैं, तो उसमें यह कहा कि "बाल्यभावेन यो भांति ब्रह्मज्ञानिस उच्चत्ते।" मतलब बालक की तरह जो शोभता है वह ब्रह्मज्ञानी कहलाता है। तो बालक की तरह शोभने से क्या मतलब?

आचार्य: सांसारिक प्रभावों से मुक्त होता है। बालक का लक्षण यही होता है कि उस पर अभी संसार की, ऊँच-नीच की छाप नहीं पड़ी होती। जिन चीज़ों को तुम सभ्यता, संस्कृति इत्यादि कहते हो उनसे मुक्त होता है, तो ब्रह्मवेत्ता भी वैसा ही हो जाता है। उसको बालक ही नहीं कहा गया है; उसको दो और चीज़ों से भी अलंकृत किया गया है। एक उसको कहते हैं 'पागल' और एक उसको कहते हैं 'पशु'।

बालक, पागल और पशु इन तीनों में समानता यह होती है कि तीनों समाज के तरीक़ों से नहीं चलते, मानवीय समाज के तरीक़ों से नहीं चलते। तो जो ब्रह्मज्ञानी होता है वह इन तीनों जैसा इसी अर्थ में होता है कि समाज के तौर-तरीक़ों पर नहीं चलता। लेकिन फिर भी हम न यह कह सकते हैं कि वह बालक है, न यह कह सकते हैं कि पागल, न कह सकते हैं कि पशु है। बस ऐसा प्रतीत होता है हमें।

प्र: काफ़ी समय से आपको सुनते आ रहे हैं और ऐसा लगता है कि जन्मों से सुनते हैं आपको। वेदान्त की गहराई को देखते हैं तो ऐसा लगता है कि काफ़ी दूर हैं और कभी-कभी लगता है काफ़ी नज़दीक हैं। इन विडंबना में होते-होते मैंने काफ़ी प्रयत्न किये कि कहाँ जाऊँ, कैसे ढूँढूँ, सत्य को कैसे जानूँ? किसी ने बता दिया कि भाई, साधना करते रहो, साधना से ध्यान करते रहो, ध्यान से आपका कुछ प्रकल्प हो जाएगा, ऐसा-ऐसा ट्राई करो; मैंने ऐसा भी किया। साधना में गया, दो-दो घंटे, चार- चार घंटे। साधना में भी रुका और फिर आपका दर्शन हो गया, आपके पास आ गया। मगर उस साधना में जैसे आपने जान लिया अपनेआप को, ऐसा हम कैसे जान सके, वह चीज़ मालूम नहीं पड़ती। कृपया बताइए।

आचार्य: हमने उसे बहुत बड़ी चीज़ बना लिया है इसलिए हम उसमें असफल हो जाते हैं। मैं आत्मज्ञान की बात कर रहा हूँ, स्वयं को जानने की। अब आत्मज्ञान को बहुत बड़ी और बहुत दूर की चीज़ मत बनाइए न। मैंने कैसे जान लिया स्वयं को? आज सुबह यहाँ आने से पहले मैंने सैंडविच खाया था, ठीक? मेरे लिए सैंडविच अच्छा नहीं है, मुझे नहीं खाना चाहिए, पर जल्दी में था, यहाँ आना था, खा लिया एक सैंडविच।

जब बीच में ब्रेक हुआ था, मैं यहाँ से ऊपर गया। तो इन लोगों ने मेरे सामने लाकर फिर यहाँ का सैंडविच रख दिया। बना है सैंडविच, मेरे सामने भी लाकर रख दिया। मैं भलीभाँति जानता हूँ कि सैंडविच मेरे लिए अच्छा नहीं है और सुबह एक खा भी लिया है। मैं तब भी उसको देख रहा था। देखने का मतलब समझते हैं न? थोड़ी देर में हमला हो जाता है। बस यही है आत्मज्ञान।

ऐसे होता है। यही साधना भी है। अपनेआप से बेईमानी कम करो। पता तो है ही कैसे हो। सैंडविच साधना! आप इसको इतनी लंबी-चौड़ी चीज़ बना लेंगे, फ़लाने मंत्र का जाप करना है, ये करना है, वो करना। मैं कह रहा हूँ, चलते-फिरते किया करिए। धूप में चल रहे हैं, कैसा प्रतीत हो रहा है? एक छोटी सी चीज़ है। अभी यहाँ बैठे हैं, मन कैसा है? जैसे ही बाहर निकलते हैं, एकदम पकड़ लिया करिए न देखो, मन कैसा बदल गया।

आपके सामने स्क्रीन है, इसमें दृश्य बदलते होंगे। ग़ौर करिएगा कि दृश्य बदलते हैं तो आपके भीतर क्या हो जाता है। बस यही है। और वह होता तो है ही, अनुभव हो रहा है न? बस, उस अनुभव को लेकर झूठ नहीं बोलना है ख़ुद से। जो हुआ है उसको मान लो। मानने में दिक्क़त यह आती है कि हमें शिक्षा ही नहीं दी गयी है तथ्य को मानने की।

हम इज़्ज़तदार लोग हैं न! हम कैसे मान लें कि हमारे सामने, उदाहरण के लिए, हम पुरुष हैं, हमारे सामने एक महिला का चेहरा आया तो भीतर एक तरंग उठी; कैसे मान लें? जबकि वह उठी थी। उठी थी, अनुभव भी हुआ था। मान लो न कि हुआ है। मान लिया तो आत्मज्ञान हो गया। यही आत्मज्ञान है। हाँ, अभी हुआ था कुछ। मान लो, आगे बढ़ो। मान लो, आगे बढ़ो।

आपका कोई दोष थोड़े ही है कुछ हुआ है तो। हम पैदा ही ऐसे हुए हैं। यह हाथ ऐसा है, मैं क्या करूँ? हमने माँगा था हमारे पाँच उँगलियाँ हों? अब पाँच उँगलियाँ हैं अगर तो हमारा काम है मान लेना कि पाँच उँगलियाँ हैं, बस। और अगर पाँच उँगलियाँ हैं, छः नहीं हैं तो इसमें आपका कोई दोष नहीं है। लेकिन अगर आपने अपनेआप को समझा लिया कि अच्छे लोग वो होते हैं जिनकी छः उँगलियाँ होती हैं तो आपको आत्मज्ञान कभी नहीं होगा। क्योंकि आपकी हैं पाँच। आप उनको देखेंगे और मानेंगे ही नहीं कि मेरे पाँच हैं, क्योंकि मान लिया है कि पाँच हैं तो मैं अच्छा आदमी नहीं।

तो ये जो हमें झूठा ज्ञान, सामाजिक संस्कार और नैतिक शिक्षा मिलती है बचपन से, बस इसी के कारण आत्मज्ञान नहीं होता। इसके आगे बस थोड़ी सी बात और बचती है। थोड़ी सी बात यह होती है कि एक बार जान लो कि कैसे हो, तो साथ ही यह पूछ लो ऐसे ही रहना भी है क्या। और मैं तो थोड़ा ज़्यादा ज़ोर देकर बोल रहा हूँ जैसे ख़ुद को ही बेइज़्ज़त करना हो जान-बूझकर। इतनी ज़ोर से नहीं पूछा जाता। वह प्रश्न भी सूक्ष्म होता है। बहुत सूक्ष्म क्योंकि इतनी ज़ोर से पूछेंगे तो फिर वह एक नाटक खड़ा हो जाएगा। और नाटक में ज्ञान नहीं होता। ज्ञान बहुत सूक्ष्म चीज़ होती है। अच्छा, हमें पता है कि यह जो सैंडविच की और आपकी निगाह गयी, इसका आशय क्या है। ऐसे ही नहीं देखा है आपने उधर। बस, बस, कुल इतना।

इसी को हम कहते हैं: आत्म अवलोकन, सेल्फ ऑब्जर्वेशन। कोई इसमें गूढ़ या गुप्त बात नहीं। वास्तव में यह चीज़ इतनी सरल है कि इसकी सरलता के कारण ही हम इसको पकड़ नहीं पाते। हमारी अपेक्षा होती है कि कहीं कुछ टेढ़ा-टपरा, जटिल कुछ होगा। वह है नहीं। आप यहाँ बैठे हैं, पीछे से कोई आवाज़ आ गयी। कभी चिड़ियों की आवाज़ आ सकती है, अभी किसी वाहन की, कभी किसी व्यक्ति की आवाज़ आ सकती है। देखिए कि मन कैसे काँप जाता है। और बहुत लंबा-चौड़ा नहीं है यह काम देखना। बस उसी क्षण में, ज़रा सा पता चल गया। यही तो किताब है। सबकुछ जो हो रहा है यही तो हो रहा है। यहीं (मस्तिष्क की ओर इशारा करते हैं) लिखा हुआ है। हर बीतती घटना उस किताब को पढ़ने का एक अवसर होती है। इतना ही करना है।

प्र: सैंडविच वाला जो एग्जांपल (उदाहरण) दिया था तो उसमें मतलब आत्मज्ञानी होने के बाद ब्रह्मवेत्ता के चित्त में विषयों के प्रति स्फूर्णा जो होती है वो उठती है?

आचार्य: मैंने कब कह दिया मैं आत्मज्ञानी हूँ? नहीं, मैं हूँ ही नहीं। तो मेरा उदाहरण उस पर लागू नहीं होता। यह आरोप मुझ पर कभी मत लगाया करो। ब्रह्म ज्ञानी, आत्मज्ञानी, ये सब कुछ नहीं।

प्र: अष्टावक्र जी के बारे में भी कई बार...

आचार्य: अष्टावक्र जी ने सैंडविच का कभी उदाहरण दिया ही नहीं।

प्र: मतलब, ऐसा होता है?

आचार्य: तुम्हारी क्या रुचि है? क्या जानना चाहते हो? कि ऐसा जब हो जाऊँगा तो भी मुझमें सैंडविच के प्रति लालसा रहेगी कि नहीं? जहाँ पर हो वहाँ की बात करो न। वैसे हो जाओगे, फिर क्या होगा, छोड़ो।

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