Acharya Prashant is dedicated to building a brighter future for you
Articles
नए साल को कैसे मनाएं? || आचार्य प्रशांत (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
8 min
63 reads

प्रश्न: नए साल को कैसे मनाना चाहिए या छोड़ ही देना चाहिए, क्या रखना चाहिए? क्या नया धारण करना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: आँखे बाहर-बाहर देख ही रही हैं कि क्या चल रहा है । दुनिया है दुनिया उत्सव मना रही है, ये तथ्य है और ये आपको साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है । आप अपेक्षा तो नहीं कर सकते इस बात की ? आप ये कह ही नहीं सकते कि बाहर कुछ हो ही नहीं रहा है । आप ये तो नहीं कह सकते कि, जैसे बाकी का दिन है वैसे आज का दिन है । तो सबसे पहले इमानदारी से स्वीकार करना पड़ेगा कि आज का दिन अलग है, क्यों अलग है? क्योंकि आज सबकुछ अलग है । आप सड़क पर जाइए तो सड़क अलग है, लोग अलग हैं, लोगों के मन अलग हैं, उनकी उम्मीदें अलग हैं, टीवी रेडियो खोलिए तो कार्यक्रम अलग हैं, सबकुछ अलग है, और तो और कैलेण्डर भी अलग है, ठीक ।

ये नहीं कहा जा रहा है, कि, अरे! नहीं सबकुछ तो वैसा ही है, अगर सबकुछ वैसा ही है तो कल से २०१४, २०१५ कैसे हो जाएगा, तो सबकुछ तो वैसा नहीं है, कुछ तो बदला है । दूसरी ओर उससे कहीं गहरी बात ये भी है, कि कुछ नहीं बदला है, जो नहीं बदला है वो दो तलों का है दोनों को समझिएगा । आदमी के मन कि चाल है, कि वो असली मुद्दों को दबा के छोटे-छोटे मुद्दों में किसी तरह कि मुक्ति खोज ले, वो नहीं बदली है । सुख ढूँढने की आदमी की अभीप्सा नहीं बदली है । आलसी मन कि परंपरा पर चलने कि वृत्ति नहीं बदली है । धारणाएँ नहीं बदली हैं । ये नहीं बदला है और इनसे भी गहरी बात जो न बदली है, न बदल सकती है, वो ये है कि ‘सत्य’ नहीं बदला है, ‘आत्मा’ नहीं बदली है ।

जो जगा हुआ व्यक्ति होता है वो इन सभी बातों को एक साथ ध्यान में रखता है, एक-एक करके नहीं, अलग-अलग बिन्दुओं, अलग-अलग जगहों, अलग-अलग समयों पर नहीं, एक साथ ध्यान में रखता है । वो ये भी जानता है कि दुनिया के लिए आज का दिन ख़ास है । वो ये भी जानता है की दुनिया के लिए ख़ास इसलिए है क्योंकि दुनिया का मन बदल नहीं रहा और वो ये भी जानता है कि जो मन बदल नहीं रहा वो बदला जा सकता है क्योंकि वास्तव में जो अपरिवर्तनीय है वो ‘सत्य’ है, तीनों बातें समझ में आ रही हैं । एक बात मैंने उसकी करी जो बदलता दिख रहा है, दो बातें मैंने उनकी करी जहाँ बदलाव नहीं है । क्या बदलता दिख रहा है? आज के दिन दुनिया का रंग-ढंग बदलता दिख रहा है । क्या है जो नहीं बदल रहा है ? दुनिया का गहरा ढर्रा है, वृत्ति है, वो नहीं बदल रही है, और क्या है जो कभी बदलेगा ही नहीं ? वो ‘सत्य’ है ।

आप यहाँ आये, बैठे, मैनें आप से कहा चलिए ठीक है, आज सवाल जरा लिख लीजिये दूसरे किस्म के । दोहा श्लोक जरा पीछे छोड़िये कुछ और कर लीजिये । इस बात का सम्बन्ध निश्चित रूप से इससे था कि आज तारीख क्या है ? तो मैंने उस बात को उपेक्षित नहीं कर दिया, मैंने उस बात का संज्ञान लिया, महत्व दिया की आज तारीख अलग है और हम सब तारीखों में रहने वाले जीव हैं । तो तारीख अलग है तो थोड़ा कुछ अलग करूँगा । ये पहली बात, हुई कि बदला है इसका स्वीकार, इसका संज्ञान लेना । दूसरी बात, मुझे ये भी दिख रहा है कि ये जो हमारे भीतर मनोरंजन की और उत्सव मनाने कि ख्वाहिश रहती है वो रहती इसीलिए है कि हम सब भीतर से बड़े सूने और उदास है ।

मनोरंजन से उदासी ख़त्म नहीं होती, सिर्फ कुछ समय के लिए छुपती है और जो चीज कुछ समय के लिए छुपती है वो कुछ समय बाद और ज़्यादा बल लेकर के प्रकट होती है ।

तो इस बात को जानते हुए आपके बदले हुए सवालों पर भी मैंने चर्चा आपके मन की ही करी जो हमेंशा करता हूँ । उससे अलग कोई चर्चा नहीं करी । कभी दोहे पर बोलता था, आज दोहे पर नहीं बोल रहा पर बात वही कह रहा हूँ । कहनें के लिए मेंरे पास दूसरी बात होती ही नहीं है, और तीसरी बात जो अपरिवर्तनीय है, वो क्या? वो तो बस है ।

उसी से ‘आप हैं,’ उसी से ‘ये शब्द हैं,’ उसी से ‘मैं हूँ,’ उसी से ‘आपका सुनना यह है;’ यही संसार में जीने की कला है ।

फालतू स्वांग नहीं करना है की दुनिया में जो हो रहा है, उससे, हमें अंतर नहीं पड़ता । अंतर तो पड़ता ही है । आज रात में अगर निकलोगे ११-११:३० बजे तो जाम में फंस जाओगे, अंतर नहीं पड़ेगा ? तुम्हें इस बात को स्वीकार करना ही पड़ेगा कि आज का दिन दुनिया के लिए विशेष है । आज जाओ किसी रेस्तरां में खाना खाने के लिए तो बिना बुकिंग के घुसने को नहीं पाओगे तो ये झूठ क्यूँ बोलें, कि आज का दिन किसी भी और दिन कि तरह है, ये झूठ बोलने से कोई फायदा ? तो मानना पड़ेगा कि आज का दिन कुछ है, दुनिया का कुछ खास दिन है । पर वो दिन क्यूँ खास है ये हमें समझना पड़ेगा, वो बात को समझ की है, वो मानसिक तल की है, उसी को मैंने कहा की —

दुनिया ख़ास दिन इसलिए मनाती है, ताकी उसकी बीमारियाँ कायम रह सकें ।

आपको ये दिलासा बनीं रहती है, कि, एक खास दिन आ रहा है, आप उसकी उम्मीद में जिए रहते हैं, आप उसकी उम्मीद में सब बर्दाश्त किये जाते हैं । आप कहे जाते हो, ‘आने वाला है खास दिन’ । एक दूसरा उदाहरण लीजिये, आप सब के पास इस वक्त हमारी ओर से सन्देश आ रहे होंगे अभी, कि पोस्टर बनाये हैं हमनें, पिन्त्रेस्ट में जाकर रख दिए हैं, और आपसे कहा जा रहा है आप भी इनको बांटे।

हम बिलकुल इस बात को तवज्जो दे रहे हैं कि दुनिया आज एक दूसरे को बधाइयाँ देना चाहती है और वो बधाइयाँ देने के लिए कुछ रंगीन, उजले, आकर्षक किस्म के पोस्टर खोज रही है । तो हमने तीन-चार रोज़ पहले से ही योजना बद्ध तरीके से ही, प्लानिंग के साथ, भूलियेगा नहीं, वहाँ योजना है; इनको इकठ्ठा करना शुरू किया और मेरे ख्याल से २००-१५० हो गये होंगे और फिर आप तक संदेश पहुँचाया कि और इधर-उधर की फालतू संदेशों की जगह वहाँ से आकर उठाओ । इसमें देखिये तीन बातें हो रही हैं, पहला, हम जानते हैं कि ये दिन खास है तो, आपके लिए हमनें कुछ सामग्री तैयार कर दी । रोज तो नहीं तैयार करते । आज के लिए ही तैयार करी है । दूसरी बात, वो सामग्री ऐसी है कि, जिसके पास जायेगी उसके मन को शुद्धि करेगी । भेज हम उसे किस बहाने से रहे हैं, कि नया साल है पर वो काम क्या करेगी की ‘मन से समय का, जो पूरा आतंक है, वही हटा देगी’ ।

अगर कोई इसमें गहरे प्रवेश करे तो, वो तो बात है ही और ये तीसरी बात, ये सब करने की प्रेरणा और बल हमें कौन दे रहा है, वो जो समय के साथ कभी बदलता नहीं । तो हम इस बात का संज्ञान ले रहे हैं कि समय बदल रहा है । बदलते समय में हम वो कर रहे हैं जो हमें करना चाहिए, और वो उचित कर्म कर पाने की समझ और बल हमें वो दे रहा है जो समय के साथ कभी बदलता नहीं । बस यही है तरीका जीने का, ऐसे जियो । फिर बात सिर्फ नव वर्ष के पर्व कि नहीं रहेगी फिर जो भी परिस्थिति आयेगी उसमें तुम जानोगे कि अब उचित कर्म क्या है? इस वक़्त मुझे क्या करना चाहिए?

तुम अंधे नहीं होगे उस पल के प्रति, की मैं तो सन्यासी हूँ, मुझे नहीं पता कि क्या हो रहा है । अरे! हमारे सामने हो रहा है, हमारा दायित्व है । हमें पता होना चाहिए कि अभी हमारे क्या कर्तव्य है, हम वो करेंगे ।

जब कर्तव्य आपकी अपनीं समझ से निकलता है, तो उसका नाम ‘धर्म’ हो जाता है ।

समझियेगा बात को, और

जब ‘कर्तव्य’ सिर्फ़ नैतिकता के उद्देश्यों से आता है, तो वो ‘कोरा-कर्तव्य’ कहलाता है । ‘कर्तव्य’ जब ‘आत्मा’ से प्रस्फुटित होता है तो उसी का नाम ‘धर्म’ होता है ।

तो पता होना चाहिए कि आपका ‘कर्तव्य’ क्या है, फिर चाहे वो नए साल का जश्न हो, चाहे कोई भी और मौका ।

Have you benefited from Acharya Prashant's teachings?
Only through your contribution will this mission move forward.
Donate to spread the light
View All Articles