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नाम बदल-बदल कर कहाँ पहुँचना चाहते हो? || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आपने जो बात बतायी जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति में, तो अमृतबिन्दु उपनिषद् में तीसरे पेज पर ग्यारहवाँ श्लोक है, वहाँ पर बताया गया है कि ये तीनों अवस्था में आत्मा को एक ही जानो। पर मेरे अनुभव में जाग्रत अवस्था में कोई और होता हूँ, स्वप्न में — पता नहीं कुछ — कोई और होता हूँ और गहरी नींद में तो होता ही नहीं। तो फिर आत्मा को कैसे जानें कि तीनों में एक है?

आचार्य प्रशांत: जिसको तुम अलग-अलग देख रहे हो तीनों अवस्थाओं में वो आत्मा थोड़े ही है। आत्मा को कौन देख सकता है? तीनों अवस्थाओं में कौन बदल जाता है? वही जो बदल सकता है, अहम्।

ये तीन अवस्थाएँ चेतना की हैं न! चेतना की प्यास का नाम है आत्मा। चेतना के आधार का नाम है आत्मा। लेकिन चेतना के केन्द्र का नाम है अहम्। वो केन्द्र झूठा है तभी तो चेतना प्यासी है। हमारी चेतना के केन्द्र पर कौन बैठा है? तभी तो चेतना प्यासी है न! तभी तो हर आदमी तड़प रहा है आन्तरिक रूप से।

यही अहम् जगते समय कुछ और होता है, सोते समय कुछ और होता है और सुषुप्ति में कुछ और हो जाता है। और जगते समय भी वो अहम् किसी एक अवस्था में नहीं रहता। तुम जाग्रत हो अभी, अभी तुम श्रोता बनकर बैठे हो, जिज्ञासु बनकर बैठे हो, शिष्य बनकर बैठे हो। थोड़ी देर पहले तुम खाना खा रहे थे न? तब तुम क्या थे? तब तुम भोग कर रहे थे, भोक्ता थे, अहम् दूसरा था तब। अभी तुम वो नहीं हो जो तुम आधे घंटे पहले थे। उससे आधे घंटे पहले जो तुम थे वो तुम अभी नहीं हो।

ये तो मैं आधे-आधे घंटे का अन्तराल ले रहा हूँ। जिन्होंने जाना है उन्होंने कहा है कि अहम् तो पल-पल बदल रहा है; आधा घंटा तो बहुत दूर की बात है। तो जाग्रत अवस्था में भी अहम् लगातार बदल रहा है। अहम् लगातार बदल रहा है माने क्या? अहम् का विषय लगातार बदल रहा है। अहम् बेचारा तो खोखला होता है, उसकी अपनी तो कोई सत्ता ही नहीं होती है। उसको तो जानने वालों ने कहा है, ‘झूठ है, मिथ्या है।’

तो अहम् क्या करता है? जिस विषय के साथ होता है उसी विषय को अपनी पहचान बना लेता है। भोजन के साथ है तो क्या बन गया? भोक्ता। गुरू के साथ है तो क्या बन गया? ख़ुद तो वो कुछ होता ही नहीं, उसकी अपनी कोई अचल पहचान नहीं होती। तो वो जिस स्थिति में होता है वो उसी स्थिति से अपनी पहचान उधार ले लेता है। यही उसकी तड़प है कि मैं हूँ कौन। भाई, मैं भी कुछ हूँ कि नहीं हूँ? मैं तो पल-पल बदल रहा हूँ।

इसी तरह सोते समय भी तुम कोई एक इकाई थोड़े ही होते हो। सो रहे हो, अभी तुम्हारे पीछे कुत्ते दौड़ रहे हैं; तुम एक हो। सोते-सोते तुम अचानक कुत्तों के पीछे दौड़ने लगे; तुम दूसरे हो जाते हो। और कुत्तों के पीछे दौड़ते-दौड़ते हाथी मिल गया; तुम तीसरे हो जाते हो। रूपया-पैसा, सोना मिल गया; तुम चौथे हो जाते हो।

दौड़ रहे हो, कोई स्त्री-पुरुष मिल गया तो तुम कुछ और हो जाओगे। और चोट लग गयी दौड़ते-दौड़ते फिर कुछ और हो जाओगे। कभी सपने में तुम चूहा बन जाते हो। बन जाते हो कि नहीं? क्या भरोसा सपने का? तो सपनें में भी तो हज़ार पहचाने होती हैं?

यह आत्मा थोड़े ही है। तो उपनिषद् कह रहा है कि ये जो तुम्हारी हज़ार पहचानें हैं, इनको मिथ्या जानो। इन सब पहचानों को जो प्रकाशित कर रही है, उसका नाम आत्मा। इन सब पहचानों के आधार में जो बैठी है, उसका नाम आत्मा। ये सब पहचानें जिस तक पहुँचने के लिए व्याकुल हैं, उसका नाम आत्मा है।

अपनेआप में ये पहचानें निराधार हैं फिर भी ‘आत्मा’ इनका आधार है। अगर सिर्फ़ इन पहचानों को देखो तो इसमें से एक-एक पहचान निराधार है, लेकिन अगर गहराई से देखोगे तो इन सब पहचानों के आधार में, बुनियाद में आत्मा है। वो न हो तो ये पहचानें कहाँ से आएँगी? उसी से ये सब पहचानें पैदा होती हैं और उसी को ये सब पहचानें तलाशती हैं। ये बात समझ लेना ग़ौर से।

हम जिससे पैदा हुए हैं, उसी को तलाश रहे हैं और वही हमें मिलता नहीं। वो हमें मिलता क्यों नहीं? क्योंकि हम जिससे पैदा हुए हैं उससे अलग हो गये हैं, हम कुछ और हो गये हैं। हम अपनेआप को पैदा बोलने लगे हैं। जो अपनेआप को पैदा मान लेगा वो फँसेगा। “बुल्लेशाह दी जात का पुछनी, न पैदा न पैद” तो वो इसीलिए बोलते हैं। तुम पैदा हो गये न! पैदा होने का मतलब ही है वियोग। तुम बिछुड़ गये, अलग हो गये, दूर आ गये।

बात आ रही है समझ में

जो पैदा हुआ, जो अपनेआप को जन्मा मानेगा वो दो तरह से परेशान रहेगा, पहली बात तो जिससे जन्मे उससे बिछुड़ गये, दूसरी बात मौत का खौफ़ सताएगा। जो पैदा हुआ है वो लगातार मरने के डर में रहेगा। एक तो यह खौफ़ कि मर न जाऊँ और दूसरा यह दुख कि आ कहाँ से गया।

आदमी की हालत देखो, उसको दोनों तरह की तड़प है। एक तड़प यह कि आ क्यों गये। और दूसरी यह कि अब आ गये हैं तो कहीं मर न जाएँ। उससे पूछो तू चाहता क्या है भाई? एक तकलीफ़ तो तेरी यह है कि कभी सिर पकड़ता है, बोलता है, ‘पैदा ही न होते तो ठीक था, ये सब हो क्या रहा है? क्यों हो रहा है?’

बच्चा पैदा होते ही काँय-काँय रोएगा — ‘अरे! आ क्यों गया, आ क्यों गया, आ क्यों गया!' लेकिन उसको बोलो, ‘अब बहुत तकलीफ़ है आ गये हो तो, कहो तो रवाना कर दें, वापस भेज दें?' तो कहेगा, ‘खुद जियो, औरों को भी जीने दो’।

अब आदमी फँसा हुआ है। पैदा होने की तकलीफ़ ज़्यादा है या पैदा रहने की तकलीफ़ ज़्यादा है, बता दो?

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