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मुक्ति - एक अनोखी मृत्यु! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शुरुआत में आपने एक बात कही थी कि हम सब की जो शुरुआत है वो एक बिंदु मात्र से हुई है और वैसा ही कुछ वैज्ञानिक भी कहते हैं कि शुरुआत बिग-बैंग से हुई थी। तो क्या अध्यात्म में जो आंतरिक जगत की बात है और ये जो मैटर (पदार्थ) की बात है, वो कहीं-न-कहीं जुड़ी हुई हैं इस सन्दर्भ में?

आचार्य प्रशांत: नहीं। विज्ञान जिस बिग-बैंग की बात करता है वो पूरे तरीके से एक भौतिक घटना है। विज्ञान के अनुसार जहाँ से ये सारा पदार्थ आया वो स्वयं भी पदार्थ ही है। वो किसी अन्य डायमेंशन , आयाम में थोड़े ही है। बिग-बैंग ये थोड़े ही कहता है कि किसी अन्य डायमेंशन से अवतरित हुआ था उस क्षण में पदार्थ। विज्ञान शुरुआत ही वहाँ से करता है जहाँ पदार्थ है और फिर कोई घटना घटती है, कोई प्रक्रिया होती है और एक बहुत बड़ा विस्फोट है जिससे फिर धीरे-धीरे करके जैसा हम ब्रह्मांड को जानते हैं उसका निर्माण होता है।

जबकि अध्यात्म जिस बिंदु की बात कर रहा है वो बिंदु भौतिक नहीं है। अध्यात्म जब कह रहा है कि 'बिंदु से ही सारा संसार आया है', तो वो बिंदु भौतिक नहीं है। विज्ञान जब कह रहा है कि, 'बिंदु से संसार आया है' तो वो बिंदु भौतिक है। इसीलिए विज्ञान बिलकुल मूक हो जाता है जब पूछा जाता है कि, " बिग-बैंग से पहले क्या था?" मूक इसलिए होना पड़ता है क्योंकि समय की शुरुआत ही बिग-बैंग से है। जब समय की शुरुआत ही बिग-बैंग से है तो ये प्रश्न ही विचित्र पड़ जाता है कि बिग-बैंग से पहले क्या था।

बिग-बैंग से पहले जो था वो समय के पार का था, और जो समय के पार का है वो भौतिक नहीं हो सकता। तो अब विज्ञान जवाब क्या दे? समय की शुरुआत ही कहाँ से हो रही है? बिग-बैंग से न। वहीं से घड़ी का काँटा सरकना शुरू होता है। और अब आप पूछ लें किसी वैज्ञानिक से कि 'उससे पहले की भी तो बात बताओ? उससे पहले क्या था? या वही मूल सत्य है?' वो चुप हो जाएगा। कहेगा, "उससे पहले की बात ही नहीं पूछी जा सकती, उससे पहले कुछ था ही नहीं तो क्या बताएँ?"

लेकिन ये जो चीज़ है 'कुछ ना होना', ये विज्ञान के क्षेत्र से बाहर की है। विज्ञान का क्षेत्र है मात्र वो जहाँ कुछ है। 'है' माने क्या हो सकता है? विज्ञान। विज्ञान तो आँखों से ही देखेगा, मन से ही सोचेगा तो वो किसकी उपस्थिति का संज्ञान ले सकता है? पदार्थ, मटेरियल की। जहाँ तक मटेरियल है वहाँ तक विज्ञान है। पर मटेरियल शुरू होने से पहले क्या था? विज्ञान वहाँ एकदम चुप हो जाएगा। ये चीज़ ही पाठ्यक्रम से बाहर की है।

हाँ, पदार्थ के कैसे भी रूप हों, उनका अनुसंधान विज्ञान ज़रूर करेगा; करना चाहिए। यही तो विज्ञान का काम है कि पदार्थ के अलग-अलग रूप हों प्रकार हों, उनकी खोज करो। पर उस जगह, उस अवस्था के बारे में क्या बोले विज्ञान जहाँ पदार्थ ही नहीं है। फिर बात किसकी करे और कैसे करे?

विज्ञान के पास वो भाषा भी तो नहीं है न, जो अभिव्यक्त कर सके रिक्तता को या पूर्णता को। आधी-अधूरी जितनी चीज़ें हैं उन सब की बात विज्ञान कर सकता है। समय की ही नहीं शुरुआत हुई बिग-बैंग के साथ, स्पेस की शुरुआत भी बिग-बैंग के साथ हुई है। और पदार्थ जैसे-जैसे बढ़ता गया है आकार में वैसे-वैसे विस्तार लेता गया है, स्पेस भी बढ़ता गया है। तो माने बिग-बैंग से पहले स्पेस भी नहीं था।। * स्पेस * भी नहीं था तो बिग-बैंग कहाँ हुआ? फँस गए न बच्चू!

बिग-बैंग से पहले ना टाइम है, ना स्पेस है, तो फिर बिग-बैंग कहाँ हुआ? हम तो कल्पना ऐसे करते हैं कि जैसे खुला आकाश है उसमें कहीं पर बिग-बैंग हुआ। अरे, आकाश कहाँ से आ गया? आकाश का तो निर्माण ही बिग-बैंग से हुआ है। बिग-बैंग कहाँ हुआ? स्पेस तो था नहीं। जानते हो इसका जवाब क्या है? इसका जवाब ये है कि आज तुम्हारी जैसी चेतना है उसका इस्तेमाल करके तुम बिग-बैंग की बात कर रहे हो। जबकि हुआ क्या था ये तो उस समय की चेतना ही बता सकती है न।

तुम वास्तव में जब कहते हो कुछ हुआ तो तुम अपने अनुभव की बात करते हो। जब तुम कहते हो फलानी चीज़ हुई, आज हुई, कल हुई, परसों हुई तो तुम किसकी बात कर रहे हो? होना क्या है? किसी भी चीज़ की हस्ती, अस्तित्व या घटना क्या चीज़ है? उस घटना का अनुभव। क्या कोई घटना है अगर उसका अनुभव ही ना किया जा सकता हो? अगर कोई घटना ऐसी है जिसका अनुभव किया ही नहीं जा सकता तो क्या वो घटना घटी भी कभी? कोई तो होना चाहिए न उसका अनुभव करने वाला। तो घटना उस घटना को अनुभव करने वाली चेतना से अलग नहीं होती; दोनों एक होते हैं।

अब जिस चीज़ को विज्ञान नहीं समझ रहा है वो ये है कि तुम आज की चेतना का इस्तेमाल करके तब की घटना की बात करना चाहते हो। तुम आज की चेतना का इस्तेमाल करके पंद्रह-सौ ईसवी की घटना की बात कर सकते हो, तुम अकबर की और अशोक की बात कर सकते हो। क्यों कर सकते हो? क्योंकि तब में और आज में चेतना बहुत ज़्यादा बदली नहीं है। तो ठीक है, आज बैठकर के तुम पाँच सौ साल पहले की बात कर सकते हो, इतना ठीक है। पर यहाँ बैठकर तुम बिग-बैंग की बात करो, ये बात ही ग़लत है। बिग-बैंग की बात करने के लिए तुम्हारे पास फिर वो चेतना भी होनी चाहिए जो बिग-बैंग का अनुभव कर रही थी। तब बात कर सकते हो। वो चेतना तो है नहीं, तो फिर बात कैसी?

भई, आज तुम्हारे जो नियम हैं विज्ञान के, हमें ऐसा लगता है विज्ञान के नियम जो आज हैं वही तब भी रहे होंगे, आज से खरबों वर्ष पूर्व। नहीं, ऐसा नहीं है। विज्ञान के नियम भी बदल गए हैं। विज्ञान माने प्रकृति के जो नियम हैं वो तक बदल गए हैं। ये कोई अमर और शाश्वत नियम नहीं हैं, ये भी समय के साथ बदलता है। आप कहेंगे "अजीब बात है, समय के साथ बदलते हैं?" हाँ, एक क्वांटम मैकेनिक्स के या क्लासिकल मैकेनिक्स के जो नियम हैं, क्या ये समय के साथ बदलेंगे? हाँ, बिलकुल बदलेंगे। दो-सौ, चार-सौ, दस-बीस हज़ार साल में नहीं बदलेंगे पर जब तुम समय की पूरी रेखा को पकड़ोगे, पूरे विस्तार को या पूरे चक्र को पकड़ोगे तो वहाँ तुम पाओगे कि ये नियम भी बदलते हैं।

तो तुम अब आज के नियम का उपयोग करके एक ऐसी घटना का विश्लेषण करना चाह रहे हो जब वो नियम उपयुक्त ही नहीं हो सकते थे, ऐप्लिकेबल ही नहीं थे। भई, उस समय पर भी क्या वो नियम चलते थे फ़िज़िक्स (भौतिकी) के जो आज चलते हैं? उस समय ना वो चेतना थी जो आज है, ना भौतिकी उन नियमों पर आधारित थी जिन पर आज आधारित है, तो उस समय पर जो हो रहा था वो कुछ चीज़ दूसरी थी।

प्र: आचार्य जी, कई बार आपने सत्रों में बताया है कि हमारा जो मस्तिष्क है, भौतिक शरीर है वो चेतना से किसी तरह से तो जुड़ा हुआ है ही, जैसे हमारे सिर पर इम्पैक्ट (प्रभाव) पड़ जाए तो चेतना तो डिस्टॉर्ट (बिगड़ना) होती ही है। तो जब हम कह रहे हैं बिग-बैंग के समय, जैसे वो अलग-अलग आयामों की ही बात है, मगर कहीं-न-कहीं आयाम जुड़े तो हुए ही हैं।

आचार्य: आज भी जुड़े हुए हैं।

प्र: तो फिर क्या ये नियम भी किसी तरीके से जुड़े नहीं हैं?

आचार्य: हाँ, बिलकुल।

देखो, किसी भी घटना को उस घटना के दृष्टा से या अनुभोक्ता से अलग करके नहीं देखा जा सकता। तुम अभी जैसे हो ठीक इस पल में, इस पल में ऐसा होने के कारण तुम बिग-बैंग का विचार या कल्पना कर रहे हो। तो तुम्हारी जो चेतना है इस पल की, वही बिग-बैंग का निर्धारण कर रही है। तुम अभी जैसे हो तुम्हारा बिग-बैंग अभी वैसा है।

एक मात्र जो सत्य है वह तो चेतना ही है न। पीछे क्या हुआ वो चेतना की ही कल्पना है। समय में, अतीत में क्या हुआ वो चेतना की ही कल्पना है और चेतना है स्थिर; चेतना स्थिर है। पीछे देख रही है, आगे देख रही है, अपने चारों ओर, अपने इर्दगिर्द उसे जितना विस्तार बनाना है वो बना लेती है।

अतीत वास्तव में अतीत नहीं है। तुम अतीत की ओर ये सोच कर देखते हो कि शुरुआत का पता चल जाएगा। बिग-बैंग की ओर देखने का उद्देश्य यही रहता है न, पता तो चले सारी शुरुआत कहाँ से हुई, है न? सारी शुरुआत बिग-बैंग से नहीं हुई है, सारी शुरुआत अभी से हुई है। तुम जब बात कर रहे हो बिग-बैंग की तो तुम ऐसा मान रहे हो कि गंगा बह रही है, मुझे गंगोत्री तक पहुँचना है। शुरुआत कहाँ से हुई, है न? नहीं, यहाँ खेल वैसा नहीं है, दूसरे तरह का है।

तुम यहाँ बैठ करके अतीत की किसी घटना की बात कर रहे हो। शुरुआत यहाँ से है और यहाँ बैठ कर तुम अतीत की भी बात कर सकते हो, भविष्य की भी बात कर सकते हो, तो शुरुआत यहाँ से है। बिग-बैंग ने तुमको जन्म नहीं दिया, जब तुम बिग-बैंग की जिज्ञासा करते हो तो तब तुम बिग-बैंग को जन्म दे देते हो। तुम यहाँ बैठे-बैठे पूरे ब्रह्मांड के जन्मदाता हो। तुम अतीत से नहीं आ रहे हो, वर्तमान से अतीत का जन्म हो रहा है। तुम भविष्य की ओर नहीं जा रहे हो, तुम अपनी जगह हो, भविष्य तुमसे जन्म लेगा।

तुम्हारी कल्पना ये है कि समय की एक धारा है जिसमें तुम बहते हुए चले आ रहे हो। नहीं, ऐसा नहीं है। वैसी कल्पना सिर्फ़ तभी तक ठीक है जब तक तुम गहरे देहभाव में हो। गहरे देहभाव में होने से व्यक्ति अपनी आयु गिनने लग जाता है। जब व्यक्ति अपनी आयु गिनने लग जाता है तो ये विचार आता है कि 'समय की धारा में मैं बह रहा हूँ। देखो, दो पर था, चार पर था, आठ पर था, बीस पर पहुँचा, साठ पर पहुँचा, अस्सी पर पहुँचा, मर गया।'

जब देहभाव गहरा होता है न तो व्यक्ति अपने-आपको समय में स्थिर नहीं देख पाता। वो फिर अपने-आपको समय में बहता हुआ देखता है क्योंकि उसका अनुभव ही ऐसा है, क्योंकि देह अपना रूप-रंग बदलती रहती है। जब देह रूप-रंग बदलती है तो उसको यही विश्वास हो जाता है कि 'मैं इस धारा में बह रहा हूँ।' यथार्थ दूसरा है। यथार्थ ये है कि तुम एक ही जगह पर हो। तुम एक ही जगह पर हो, तुम बह नहीं रहे हो। अतीत-भविष्य दोनों तुम्हारा विस्तार हैं, कल्पना हैं, सपना हैं।

'अतीत मेरा सपना है इसका मतलब क्या पंद्रहवीं शताब्दी में जो कुछ हुआ वो मेरा सपना था?' हाँ, क्योंकि अगर मूल बात ये है कि तुम-ही-तुम हो, कि पंद्रहवीं शताब्दी की बात करने वाले भी तुम हो, कि तुम ना होओ तो मैं कैसे हो सकता हूँ या ये सामने बैठा श्रोता कैसे हो सकता है, तो निश्चित रूप से पता तो यही चलता है न कि अगर शुद्ध दृष्टि से देखें, साफ़ मन से विचारें तो पता चलेगा कि ये पंद्रहवीं शताब्दी हो, चाहे पहली शताब्दी हो, चाहे बिग-बैंग हो, ये सब 'मेरे ही प्रक्षेपण मात्र हैं।'

"लेकिन, आचार्य जी, आप भी तो हैं। मैं-ही-मैं कहाँ हूँ? आप भी तो हैं।"

तुम्हें कैसे पता कि मैं हूँ? तुम ही तो कह रहे हो मैं हूँ।

"नहीं, आचार्य जी, मैं नहीं कह रहा, ये अमन, ये राकेश, ये सब भी कह रहे हैं कि आप हैं।"

तुम्हें कैसे पता कि वो हैं? आखिरकार तो इस पूरे जगत की उपस्थिति की आश्वस्ति देने वाला तुम्हारे अलावा कोई दूसरा है ही नहीं न।

तुम कहो भी कि, "मैं दस और लोगों की गवाही लेकर भी आ सकता हूँ कि दस और लोग हैं, कि, आचार्य जी, मैं अकेला नहीं हूँ, और भी लोग हैं।"

मैं कहूँगा, "कैसे पता?"

तुम कहोगे कि, "मैंने देखा।"

मैं कहूँगा कि, "यही तो मैं कह रहा हूँ कि तुमने देखा तो और लोग हैं।"

तुम कहोगे, "मैंने ही नहीं देखा, औरों ने भी देखा।"

मैं कहूँगा कि "औरों को किसने देखा?"

"वो तो मैंने देखा।"

तो अंततः तुम्हारे अलावा और कोई है, ये सिद्ध करने वाला कि दूसरे हैं तुम्हारे अलावा और कोई है ही नहीं। जब तुम्हारे अलावा और कोई नहीं है तो ये अकबर-अशोक भी कौन थे? ये तुम ही थे, बेटा। ये तुम ही थे। पर जीव-भाव में फँस करके तुम्हें ये लगने लगा है कि तुम अलग, वो अलग, तुम्हारी एक देह, उनकी दूसरी देह। वो कब हुए? वो कभी नहीं हुए। वो तुम यहॉं बैठे-बैठे विचार रहे हो। ठीक बिग-बैंग की तरह हैं वो भी। हुए थोड़े ही थे, तुम्हारा विस्तार हैं।

तुम्हें क्या लग रहा है वास्तव में कोई हुआ था? "नहीं, पर हमें तो पता है हुआ था, प्रमाण भी मिलते हैं। हमने उनका तख़्त देखा है, हमने उनकी बनाई इमारतें देखी हैं।"

किसने देखा है?

"हमने।" ख़त्म हो गई बात।

"नहीं, देखा हमने है, बनाई तो किसी और ने थी।"

जिन्होंने बनाई थी उनको किसने देखा है?

"हमने देखा है।"

अब ये बात गले से नीचे उतरेगी नहीं कि अकबर भी मैं हूँ, अशोक भी मैं हूँ और बिग-बैंग भी मैं ही हूँ। तुम ही हो।

प्र२: पदार्थ के तल पर तो अकबर की कोई देह तो रही होगी, उसके तो चित्र भी हैं, सबकुछ है। मैं ही उसको देख रहा हूँ लेकिन अगर मेरी देह है तो दैहिक तौर पर तो...

आचार्य: जब तक तुम अपने-आप को 'अमन' मान रहे हो तब तक अकबर और अशोक तुमसे निःसंदेह अलग हैं। तुम्हारे मानने पर है।

प्र२: क्या माने बैठे हैं?

आचार्य: तुम अमन मानोगे तो उधर अकबर भी है, क्योंकि अगर तुम अमन हो तो तुम तो अभी पैदा ही पच्चीस साल पहले हुए हो, तो फिर तुम कहाँ से बिग-बैंग हो गए? जो पच्चीस साल पहले ही आया है वो बिग-बैंग कैसे हो जाएगा?

कोई और सत्य नहीं है उसके अलावा जो ठीक अभी यहाँ पर है। ठीक अभी और यहाँ पर। ज़रा भी आगे-पीछे नहीं, दाएँ-बाएँ नहीं। सुई की नोंक जितना भी अगर तुम विचलित हुए तो झूठ में प्रवेश कर गए। बिलकुल अभी यहीं पर आ जाओ, जो ये बिंदु है, ये। और बिलकुल अभी यहीं पर आ जाओ। सच्चाई ये है, बाकी सब जो तुम अकबर-अशोक कर रहे हो वो कहानियाँ हैं। और वो कहानियाँ भी किसके लिए हैं? वो जो विचलित हो गया उसके लिए हैं। और जितना तुम्हारा विचलन होगा, जिस दिशा में विचलन होगा, जिस रूप का विचलन होगा, उसी तरह से तुम्हारी कहानियाँ होंगी।

ठीक अभी बिलकुल यहीं पर आ जाओ। वो है जिसके बारे में बात निर्विवाद है, वहाँ कोई बहस नहीं, वो तो है। बाकी सब तो मनोरंजन। ये भी जो ऐसे मेरी ओर देख रहे हो न, ये भी देहभाव ही है तुम्हारा। सारी उलझन ही इसलिए है क्योंकि महेश हो। मुक्ति का अर्थ ही यही होता है कि महेश नहीं है फिर भी चेतना है। महेश को चाहिए महेश-मुक्त चेतना। और जो महेश-मुक्त चेतना होती है उसी को सत्य कहते हैं।

महेश जब आया तो अपने साथ क्या ले कर आया? एक जन्मतिथि और दूसरा वज़न। कोई भी आदमी ये दो तो लेकर चलता है न। उससे पूछोगे 'जन्मतिथि बताइए' बता देगा तुरंत, फलानी तारीख को पैदा हुए, माने वो अपने साथ क्या लेकर आ गया? समय। और कोई भी आदमी अपने साथ वज़न तो लेकर चलेगा, कोई तो ये नहीं बोलेगा कि 'मेरा तो वज़न है ही नहीं', तो अपने साथ क्या लेकर के आ गया? स्थान। जहाँ वज़न है वहाँ क्या होगा? स्थान।

तो अब तुमने पैदा कर दिया न समय। समय जब पैदा कर दोगे तो फिर उसमें गोते मारोगे। कहोगे कितना पीछे तक जाता है और आगे क्या होगा, ये सब चालू हो जाता है। पीछे तक जब जाएगा तो इतिहास की रचना करोगे। क्या हुआ था, कैसे हुआ था; आगे तक जब जाता है तो भविष्य की कल्पना करोगे, क्या होगा, क्या नहीं होगा। चेतना में महेश जुड़ा नहीं कि चेतना में समय और स्थान जुड़ गए। चेतना से महेश हटा नहीं कि बस वर्तमान बचा। अब कोई अकबर-अशोक-बीरबल नहीं, कोई बिग-बैंग नहीं।

बंधन क्या है?

समय और स्थान से आबद्ध होना ही बंधन है। समय और स्थान को महत्व देकर स्वयं को उनके संदर्भ में परिभाषित करना ही बंधन है।

'मैं कौन हूँ?'

जिसका जन्म फलाने समय, फलाने स्थान पर हुआ। देखते नहीं हो जन्मतिथि के साथ-साथ अकसर जन्म स्थान भी लिखा जाता है, साथ-ही-साथ लिख देते हैं। वो शुरुआत होती है तुम्हारे सपने की। पैदा होना माने अब तुम सपने के एक किरदार हो गए। पैदा होते ही पूरी दुनिया अब तुम्हारे लिए हो गई। पैदा होने से पहले तुम कहाँ थे! वहाँ बिग-बैंग नहीं था। वहाँ अकबर-अशोक-बीरबल नहीं थे।

कैसे आ गए तुम? एक नर की एक मादा की दो कोशिकाएँ मिलीं। वो इतनी बात तो नहीं कर सकती जितनी तुम कर रहे हो। तुम कहाँ से आ गए? सपना लेने से पहले तुम कौन थे? ये तो सपने का ही हिस्सा है कि 'मैं नर-मादा कोशिकाओं के संयोग का परिणाम हूँ'। इस सपने से पहले तुम कौन थे? और जहाँ तुम थे वहाँ कोई बिग-बैंग था क्या तब? या बिग-बैंग जैसी कोई चीज़ तुम्हारे लिए अर्थपूर्ण भी जन्म के बाद ही हुई?

जिसका अभी जन्म ही नहीं हुआ, पूछो उससे ' बिग-बैंग के बारे में बताओ', वो क्या बोलेगा? माने माँ के गर्भ से बच्चे का ही नहीं बिग-बैंग का भी जन्म होता है। जब तक बच्चा नहीं था, तुम किससे पूछते बिग-बैंग के बारे में? जो पैदा नहीं हुआ उससे बात करो बिग-बैंग की। अगर ठीक से मर पाए तो मरने के बाद तुम कौन होओगे? और मरने के बाद जो तुम होओगे, उससे पूछा जाए बिग-बैंग , तो वो क्या जवाब देगा? तुम मरे नहीं कि तुम्हारे साथ मर गया *बिग-बैंग*।

अब सवाल ये है कि सिर्फ़ देह से मरोगे जैसे देह से जन्म लिया था सिर्फ़, या ज़रा बेहतर और पूरा मरोगे? ज़्यादातर लोग मरते भी वैसे ही हैं जैसे जन्म लिया होता है। जन्म किससे लिया? देह से। मरे भी किससे? देह से। अध्यात्म कहता है 'देह से जन्म लेने का काम, देह से मरने का काम, ये तो अपने-आप ही हो जाता है; प्रकृतिगत है, पशुओं में भी हो जाता है। क्या कोई ऐसा मरना हो सकता है जिसमें देह तो बची रहे पर बिग-बैंग मर जाए? उसे मुक्ति कहते हैं।'

देह जन्मी किसका जन्म हुआ? बिग-बैंग का। देह मरी, देह के साथ कौन मर गया? बिग-बैंग * । मुक्ति क्या है? देह मरे उससे पहले * बिग-बैंग को मार दो, ये मुक्ति है, कि देह तो बची है बिग-बैंग मर गया। कबीर साहब बोलेंगे, 'एक अजूबा देखिया,' ऐसा कर डाला कि देह थी बिना बिग-बैंग के। तो मुक्ति क्या है? वो बिग-बैंग से भी बड़ी है, वो बैंग-बैंग है। विज्ञान बस बिग-बैंग तक जाता है, अध्यात्म बैंग-बैंग तक जाता है।

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