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मौत के डर से सहमा हुआ है हर ख्याल || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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चिंता तो हरी नाम की, और न चिंता दास, जो कुछ चितवें राम बिन, सोइ काल को पास।।

~ संत कबीर

प्रश्नकर्ता: चिंता जो होती है वह प्रेसेंट (वर्तमान) में होकर होती है पर होता या तो पास्ट (भूतकाल) के लिए या फ्यूचर (भविष्य) के लिए।

आचार्य प्रशांत: ठीक है। चिंता नाउ (वर्तमान) में होकर होती है। टू बी लिटिल टेक्निकली करेक्ट (तकनीकी तौर पर थोड़ा सही किया जाए तो), चिंता नाउ में होकर होती है। व्हेन द नाउ इज़ सीन जस्ट एज फंक्शन (जब वर्तमान कार्य के रूप में दिखती है)। वी आर राइट नाउ (हम वर्तमान है)। अंडरस्टैंड दिस वेरी प्रिसाइसली (इसे अच्छे से समझिए)। दिस राइट नाउ कैन बी अंडरस्टुड इन टू इंटायरली डिफरेंट वेज़ (यह जो वर्तमान है इसे दो भिन्न रूप से पूरी तरह से समझा जा सकता है)। वन वे आफ लुकिंग एट राइट नाउ इज़ टू से ‘राइट नाउ आई एम द सन ऑफ माय फादर एंड द फादर ऑफ माय सन्स’ (अभी देखने का एक तरीका यह कहना है कि अभी मैं अपने पिता का पुत्र और अपने पुत्रों का पिता हूँ)। सो दिस राइट नाउ इज़ जस्ट द फंक्शन ऑफ (तो यह 'अभी' का कार्य है कि..)। सो दिस इस राइट नाउ, दिस इज़ फ्यूचर, दिस इज़ पास्ट (तो यह वर्तमान है, यह भविष्य है और यह भूत है)। अनदर वे ऑफ लुकिंग एट दिस राइट नाउ इज़ — राइट नाउ आई एम द एमिनेंस ऑफ द सोर्स (यह इस 'अभी' को देखने का एक और तरीका है, ठीक अभी मैं स्रोत की श्रेष्ठता हूँ)। एंड देन दिस इज़ एन इंटायरली डिफरेंट डाइमेंशन (और फिर यह एक पूरी तरह से अलग आयाम है)। दिस इज वन डाइमेंशन व्हेयर राइट नाउ इज ए फंक्शन ऑफ दिस एंड दिस। दिस पॉइंट इज़ बीइंग डिस्क्राइब्ड एज़ ए फंक्शन ऑफ़ दिस (यह एक आयाम है जब अभी इसी का कार्य है और इस बिंदु को इसी के कार्य के रूप में वर्णित किया जा रहा है)। द अदर वे ऑफ़ लुकिंग एट दिस पॉइंट इज़ (इस बिंदु को देखने का दूसरा तरीका है)।

यह ऐसी सी बात है कि आप एक चौराहे पर पहुँचे हुए हो। आप यह भी कह सकते हो कि मैं इस चौराहे पर यहाँ और यहाँ से चलकर आया। या आप यह भी कह सकते हो कि मैं इस बिंदु पर, यह चौराह है, क्रॉसिंग है — मैं इस बिंदु पर यहाँ से चलकर आया हूँ। और यह आप कैसे परिभाषित कर रहे हो। राइट नाउ कि आपकी क्या परिभाषा है इसपर आपकी पूरी जिंदगी आश्रित है।

अगर आपने यह कहा कि आप इस राह चलकर के यहाँ पर हो, तो यही वह है जिसको यह भी बोल रहे थे चौरासी का फ़ेरा चलते रहो फिर सीधा, इसका कोई अंत नहीं है। समय अनंत है। और अगर आप यह कहो कि मैं यहाँ पहुँचा हूँ, यहाँ से निकल करके, इस राह चलकर के — एक स्रोत है उसे उद्भूत हुआ हूँ और अभी यहाँ स्थित हूँ। तो फिर बात बिलकुल दूसरी है, फिर बात बिलकुल दूसरी है। याद रखना बात एक ही बिंदु की हो रही है — इसी की, जो यह कह रहा है वह भी गलत नहीं कह रहा है। और जो इसकी बात कर रहा है, वह भी गलत बात नहीं कर रहा है। लेकिन परिणाम बहुत अलग-अलग होने हैं। बहुत अलग-अलग होने हैं।

जो इसकी बात करता रहेगा, इसको कभी नहीं पाएगा। यह दूरी कायम रहेगी, बढ़ती ही जाएगी। इसका कोई अंत नहीं है। यहाँ अंत संभव है। इसका कभी कोई अंत नहीं है। इसका अंत संभव है। ठीक वैसे जैसे चाहतों का कोई अंत नहीं है, लेकिन चाहतों का विसर्जन संभव है। चाहतों को पूरा करने बैठे तो कोई अंत नहीं है लेकिन उनका विसर्जन संभव है।

"जो कुछ चितवें राम बिन, सोइ काल को पास"

क्या कह रहे हैं कबीर? हरि नाम की चिंता है। यह जो, इसके मुख्य शब्दों को पकड़ लेंगे। हरिनाम, चिंता, दास, काल। हरी नाम की चिंता है, दास हूँ। क्या प्रयोजन है इससे? हरि नाम क्या है? हमने कहा था चार प्रकार के शब्द होते हैं।

प्र: द वर्ड दट टेक्स मी बैक (वह शब्द जो मुझे वापस ले जाता है)।

आचार्य: ठीक? नाम माने वह शब्द जो सोर्स (स्त्रोत) में ले जाएँ।

प्र: नाम माने स्त्रोत।

आचार्य: अंततः नाम माने स्त्रोत ही है। ठीक कह रही हो। अंततः नाम माने स्त्रोत ही है। पर हमारे लिए उचित है कि नाम माने वह शब्द, वह किसी विशेष व्यक्ति, वस्तु या देवता का नाम नहीं है, कि फ़लाने का नाम, हरि नाम ठीक है, हरि नाम के अच्छी बात है — कोई भी शब्द जो आपको मौन में ले जाए, वह हरि नाम है। यह है हरि नाम।

हरी नाम माने यह नहीं कि बैठकर ‘हरे रामा, हरे कृष्णा, हरे रामा, हरे कृष्णा’ कर रहे है। जो ही शब्द, वो कुछ नदी की आवाज भी हो सकती है। हम क्रौंच पक्षी की बात कर रहे थे। हम अच्छे से जानते हैं कि हमारा एक प्रमुख ग्रंथ ऐसे ही उद्भूत हुआ था। वह हरे राम था फिर। क्रौंच रूदन हरि नाम बन गया — कि एक व्यक्ति है, वह पक्षी की तड़प को सुन रहा है। क्रौंच रो रहा था। उसके जोड़े को किसी ने मार दिया था और वह उसके लिए हरि नाम हो गया। वहां से काव्य की पूरी धारा फूट पड़ी, आध्यात्मिक काव्य की।

जो ही आपको मौन में स्थापित कर दे वो हरी नाम है, वही शब्द है। वही है जिसे सिख कहते हैं, शबद कीर्तन। तो जब कह रहे है चिंता तो हरी नाम की। हरि नाम क्या कर रहा है? स्रोत में ले आ रहा है। तो कह रहे है चिंता तो हरी नाम की। तो आपको किसकी चिंता है?

प्र: स्त्रोत की।

आचार्य: स्त्रोत की। तो एक ही लक्ष्य है। क्या?

प्र: स्त्रोत।

आचार्य: द ओनली गुड गोल (एकमात्र अच्छा लक्ष्य), एक ही चिंता है। चिंता है। चिंता तुम भी करते हो, चिंता हम भी करते हैं। लक्ष्य तुम्हारा भी है, लक्ष्य हमारा भी है। पर तुम्हारी हमारी चिंता में भेद है। क्या भेद है?

तुम्हें जाना है बाहर — दूर, दूर, दूर। तुम भटको अनंत मरुस्थल में। हमें जाना है कि एक शब्द शीतल करें — तो हमें तो शीतलता की तरफ़ जाना है। तुम भटको बीयाबान में, हम तो शीतलता की तरफ़ जा रहे हैं।

प्र: चिंता दोनों की एक है, पर डाइरैक्शन औपोसिट (दिशा विपरीत है) है।

आचार्य: डीरेक्षन ही सबकुछ है। चिंता सेम (एक) कैसे है? चिंता दोनों में है, चिंता दोनों में है — इस अर्थ में कि दोनों का मन गति तो कर ही रहा है। पर एक गति होती है धर्म की और एक गति होती है अधर्म की।

एक शब्द होता है जो शीतल करता है, एक शब्द होता है जो जला देता है — गति दोनों तरफ़ है। गति है। एक गति है जो आपको आपके घर वापस ले जा रही है और एक गति है जो आपको आपके घर से और दूर ले जा रही है।

‘चिंता तो हरि नाम की, और न चिंता दास।‘ — नहीं, और कोई चिंता नहीं है। दास को मालिक के अलावा और कोई चिंता हो भी क्या सकती है जब जान लिया मैंने कि मैं और कुछ हूँ ही नहीं, उसके हुक़्म का प्यादा हूँ।

प्र: चिंता है क्यों?

आचार्य: चिंता बिलकुल यही है कि मैं जैसा हूँ, समझ में आ रहा है कि वृत्तियाँ बैठी हुई हैं। प्याला ख़ाली भी करता हूँ तो उस प्याले में कुछ और खींच लेने की वृत्ती बहुत बची है अभी। तो यही चिंता है — काम बाक़ी है। और कोई चिंता नहीं।

प्र: चिंता भी काल ही है।

आचार्य: चिंता भी काल ही है, बिलकुल।

चिंता, चिंतन अर्थात मन की गति; मन का हिलना-डुलना; मन में विचारों का उठना; मन में तरंगों का उठना। अपने चारों तरफ़ देखते हो और पाते हो कष्ट है, दुविधा है।

‘हाड़ जलै ज्यूँ लाकड़ी, केस जलै ज्यूँ घास, सब जग जलता देखकर भए कबीर उदास’

तो यह चिंता ही हैं, निश्चित चिंता है, पर यह बड़ी शुभ चिंता है। आप चिंता करिए, खूब करिए पर देखिए कि वो चिंता आपको किधर को ले जा रही हैं; आप किस विषय में चिंतन कर रहे हो; आपकी विचारणा की दिशा क्या है।

‘और न चिंता दास‘ — हम और नहीं चिंता करते। चिंताओं में जो चिंता है, हमनें वो पाल ली है। लक्ष्यों में जो परम लक्ष्य हो सकता है, हमनें वो पकड़ लिया है। उसको पाने के बाद, बाकी सारे लक्ष्य तो मज़े में मिल जाने हैं। जिसे अरबों का मिल गया, अब उसके लिए दो-चार-दस रुपए की एहमियत नहीं रहनी है। परम लक्ष्य को पा लिया।

भाई, आप गणित में प्लेस वैल्यू करते थे न? तो दस अंकों का आंकड़ा रखा है आपके सामने। उसमें से किसपर आप ध्यान केन्द्रित करना चाहोगे? जिसकी प्लेस वैल्यू क्या है? सबसे ज़्यादा; आख़िरी; दसवाँ। जिसने दसवें को पा लिया, वो फ़िक्र नहीं करेगा कि पहला, दूसरा, छट्टा क्या है। वो कहेगा, “वो बदलते भी रहें तो फ़र्क किसे पड़ना है!” इतने बड़े आंकड़ें में पीछे की संख्याएँ बदलती भी रहे तो चिंता किसको है! — ‘और न चिंता दास।’

एक चिंता है — कि वो जो प्रथम है, या जो दसवाँ है, एक ही बात है, वह कैसा है; वह न ख़ो जाये। अगर वह ख़ो गया और छोटे-मोटे की चिंता कर ली, तो उसी स्थिति को कहते हैं, ‘ पेनी वाइज़ पाउंड फूलिश।’ जो पाने योग्य था वो तो पाया नहीं और कूड़ा-कचरा इकट्ठा करते रह गये — थोड़ा पैसा इकट्ठा कर लिया, थोड़ी इज़्ज़त कमा ली। और यह सब कमाने के फ़ेर में अरबों का घाटा कर लिया। कुछ सौ-दो सौ, दस लाख़ कमाया और अरबों-ख़रबों का घाटा कर बैठें, इतनी तो तुम्हारी होशियारी है। जो पाने योग्य था वही नहीं पाया।

‘चिंता तो हरि नाम की और न चिंता दास।‘

अपनेआप को देखो और एक ही चिंता करो — हम किस गली जा रहे हैं? दिशा क्या है हमारी, यही चिंता हो सकती है। इसी चिंता को करो — किस दिशा जा रहा है यह जीवन? अंतर्गमन हो रहा है या ज़्यादा ज़्यादा बहीर्मुखी होता जा रहा हूँ?

काल को ही देखना है तो यही देखो कि आज से दो साल पहले और आज में क्या अंतर आया है। आँखें भीतर को गयी है या आँखें और ज़्यादा लालची हो गयी है और बाहर-बाहर-बाहर ही तलाशती रहती हैं! — यही चिंता करो।

गति क्या है? गति समझते हो? मूवमेंट (गति) किधर को है? किस दिशा जा रहे हो? कर लो तुलना। अच्छी होगी ये तुलना।

आज से दो साल पहले का मैं, आज से पाँच वर्ष पहले का मैं, किधर को जा रहा हूँ? और पाओ कि संसार तुम्हें और खींच रहा है, आसक्त हुए जाते हो, तो सावधान हो जाओ। और पाओ कि पहले जो बातें मोहित कर लेती थी, बाँध लेती थी, अब उनका ज़ोर कम हो रहा है, तो समझो कि ठीक है, लक्षण शुभ है।

‘जो कुछ चितवें राम बिन, सोई काल के पास।’

पहली पंक्ति में दूसरी समाई ही हुई थी। ‘जगत चबैना काल का’ — याद है?

‘झूठें सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद, जगत चबैना काल का, कुछ मुँह में कुछ गोद।‘

तुम क्या झूठे सुख में सुख मनाते हो? कि तरक़्क़ी हो गयी; कि विदेश घूम आए; कुछ पैसे कमा लिए। झूठे सुख को सुख कहे — कि आज होली है, दिवाली है, शादी की वर्षगाँठ है।

‘जगत चबैना काल का।‘ तुम काल के लिए पॉप्कॉर्न हो, चबैना। कुछ उसकी मुँह में हैं, कुछ उसकी गोद में हैं जिसे उठाकर मुँह में डालेगा। क्या खुश हो रहे हो? तुम काल के हाथ में हो। थोड़ी देर में अपने मुँह में डाल लेगा। जीवन मिला है तो उसको पा लो जो मर नहीं सकता। और तुम लगातार मरे-मरे में ही जी रहे हो। हमारी एक-एक धड़कन मरे-मरे में है। हमारी एक-एक गतिविधि मृत्यु के भय की छाँव में है। यही कह रहे हैं कबीर। संसार को जो पाने निकला है, उसकी शुरुआत भी भय में हुई है। क्योंकि तुम संसार को पाने कब निकलते हो? जब तुम्हें भीतर से गहरा अपूर्णता का भाव होता है तब तुम कहते हो —इज़्ज़त कमा लूँ, पैसा कमा लूँ, प्रेमी कमा लूँ, पति कमा लूँ; मुझमें कुछ अधूरापन है, उसे पूरा करना है। मेरे भीतर इनफ़ीरीओरिटी (हीनता) की एक ग्रंथ बैठी हुई है और हटाये हट नहीं रही है। डिग्रियाँ हासिल कर ली, पैसा पा लिया, घर खड़ा कर लिया, गाड़ी खड़ी कर ली, लेकिन फिर भी कुछ है, काँटा सा गड़ा हुआ, वह निकल ही नहीं रहा। लगता है कि अभी और लेकर के आओ। हीनता का गहरा भाव जकड़ करके हमें बैठा हुआ है — हम हीन है, हम हीन है, हम हीन है। हमसे शूद्र, तुच्छ कुछ और नहीं हो सकता।

तो, जो संसार को पाने निकला है, उसने शुरुआत ही भय में करी है और उसका अंत भी भय में होगा। वही कह रहे हैं — सोई काल के पास।

जो केंद्र की यात्रा करता है, उसकी शुरुआत श्रद्धा में होती है, अंत आनंद में होता है। चुनाव तुम्हें करना है — तुम्हें ऐसा जीवन जीना है जिसकी शुरुआत भय में और अंत हताशा में हो, तड़प में, फ़्र्स्ट्रेशन में हो या ऐसा जीवन जीना है जिसमें पहला कदम ही श्रद्धा में उठाया गया है और अंततः प्राप्ति आनंद की है और यात्रा भी मौज की है।

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