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मार्क्स, पेरियार, भगतसिंह की नास्तिकता || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्न: आपने कहा कि आज के जितने भी लिबरल चिंतक इत्यादि हैं, वे कोई भी पराभौतिक हस्ती को पूर्णतया नकार देते हैं, और कहते हैं - "जो भी है वह यहीं आँखों के सामने है।" भगत सिंह ने भी कहा, "दुनिया में ईश्वर नाम की कोई चीज़ नहीं है," पेरियार ने भी ऐसा ही कहा, मार्क्स ने भी इसी तरफ़ इशारा किया। तो क्या आप आज के चिंतकों को और भगत सिंह, पेरियार और मार्क्स को एक ही तल पर रखकर तुलना कर रहे हैं?

आचार्य प्रशांत: अगर कुछ नहीं है 'पराभौतिक', तो जो है वह सिर्फ़ 'भौतिक' है, ठीक? फिर तो मूल्य किसी चीज़ का है तो सिर्फ़ भौतिकता का है। भौतिकता माने पार्थिवता, माने शारीरिकता, ठीक? अगर पराभौतिकता कुछ नहीं है तो एक ही चीज़ कीमती बची ना, क्या? ये शरीर। और अगर सिर्फ़ शरीर ही क़ीमती है, तो भगत सिंह ने शरीर का त्याग करना क्यों स्वीकार किया?

समझ में नहीं आ रहा क्या?

जब भगत सिंह कहते थे कि वह नास्तिक हैं, तो वो वास्तव में परंपरागत धर्म, सड़े-गले धर्म, संस्थागत धर्म को नकार रहे थे। नहीं तो एक ऊँचे आदर्श के लिए शरीर की आहुति दे देने से बड़ा धार्मिक काम क्या होगा। अगर कोई नौजवान सच्चे अर्थों में धार्मिक हुआ है, तो वह तो भगत सिंह हैं!

मुझे बताओ, तुम अपना प्राणोत्सर्ग कर रहे हो, तुमने तो पूरी भौतिकता ही खो दी ना अपनी। अगर जान चली गई, तो ज़रा-भी भौतिकता बची? तो कुछ तो होगा ना जो भौतिकता से ऊँचा होगा, जिसके लिए तुम अपनी भौतिकता न्यौछावर कर रहे हो? माने तुम मान रहे हो ना कि इस भौतिक शरीर से कुछ ऊँचा होता है। भगत सिंह ने उस ऊँचे लक्ष्य को नाम दिया था - 'आज़ादी'।

फ़र्क़ नहीं पड़ता तुम क्या नाम दे रहे हो, इतना मानना काफ़ी है कि तुम्हारी शारीरिक सत्ता से ज़्यादा क़ीमत किसी और चीज़ की है। भगत सिंह का जीवन ही इस बात का प्रमाण है।

बाईस-तेईस साल में वह कह रहे हैं: "नहीं चाहिए बाकी पूरी ज़िंदगी।" अभी वह साठ-सत्तर साल और जीते। बोले, "नहीं जीना है! शरीर की हैसियत क्या है?” यह तो संतों वाली बात हो गई ना बिल्कुल! "नहीं जीना! शरीर की हैसियत क्या है? आज़ादी बड़ी चीज़ है, आज़ादी चाहिए।" अगर वो, दोहरा रहा हूँ - अगर वो शारीरिकता मात्र में विश्वास रखते, तो जान देने को क्यों राज़ी हो जाते? शरीर गँवाने को क्यों राज़ी हो जाते, अगर शरीर ही अंतिम सत्य होता उनका? बोलो।

आ रही है बात समझ में?

लेकिन फिर भी मार्क्स हों, पेरियार हों, भगत सिंह हों, कई अन्य विचारक हों, इन सब लोगों ने धर्म को ना सिर्फ़ नकारा, बल्कि धर्म को अपशब्द भी कहे। मैं उनसे सहानुभूति रखता हूँ। उन्होंने जिस धर्म को नकारा, वह था ही इस लायक कि उसे लात मार दी जाए। जो उन्होंने करा, मैं भी वही करना चाहूँगा। पर भूलिए नहीं कि वो किस धर्म को नकार रहे थे।

मार्क्स उस धर्म को नकार रहे थे जिसके बारे में कहते थे कि - "यह नशा है, अफ़ीम है।"

जो धर्म नशा बन जाए, अफ़ीम बन जाए, उसको तो त्याग ही देना चाहिए।

अभी थोड़ी देर पहले हम लोग क्या बात कर रहे थे कि - धर्म के नाम पर क्या-क्या चल रहा है। अगर वो सब जो धर्म के नाम पर चल रहा है, वो धर्म है, तो मैं भी कह रहा हूँ: "लात मारो धर्म को!” पर धर्म उसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ है और मूल्यवान है, उसका सम्मान करना सीखिए।

समझ में आ रही है बात?

अंग्रेज़ी में एक मुहावरा है: "डोंट थ्रो द बेबी आउट विद बाथ वाटर।" सिर्फ़ इसलिए कि धर्म में कुछ कुरीतियाँ आ गईं हैं, सिर्फ़ इसलिए कि धर्म का पूरा क्षेत्र बेवक़ूफ़ और बेईमान लोगों ने गंदा कर दिया है, तुम क्या धर्म को ही उठाकर बाहर फेंक दोगे? और धर्म को उठा कर बाहर फेंक दिया तुमने तो जिओगे कैसे? बिना प्रेम के, बिना करुणा के, बिना बोध के, बिना सरलता के जी कैसे लोगे? और प्रेम, बोध, करुणा, सरलता तुम्हें विज्ञान तो सिखा नहीं देगा। तो धर्म तो ज़रूरी है ना?

धर्म गंदा हो गया हो तो प्रार्थना है मेरी, उसको साफ़ करें। ये थोड़े ही है कि हीरा गंदा हो गया है, उस पर बहुत तहें जम गई हैं कचरे की, मिट्टी की, तो तुमने उठाकर के हीरा ही बाहर फेंक दिया। दुश्मनी कचरे से रखो ना, हीरे से नहीं। ये परम मूर्खता हो गई।

एक तो मूर्ख लोग वो थे जिन्होंने हीरे को गंदा होने दिया और एक मूर्ख ये हैं जिन्होंने गंदगी के साथ-साथ हीरा ही बाहर फेंक मारा। ये मत करो! पहली वाली ग़लती से ज़्यादा बड़ी ग़लती ये हो जाएगी। जिन्होंने हीरे को मलिन किया, गंदा किया, वो एक तल के गुनाहगार हैं, और तुम उस गंदगी के चलते हीरा ही उठाकर फेंक दो, तुम उनसे ज़्यादा बड़े गुनाहगार हो जाओगे। ये मत होने दो। सफ़ाई करो! सफ़ाई!

आदमी को, धर्म को हमेशा सफ़ाई की ज़रूरत पड़ती रही है। रिफॉर्म्स आवश्यक रहे हैं। क्रांतियाँ और सुधार हमें चाहिए होते हैं। बुद्ध और महावीर क्या कर रहे थे? वैदिक धर्म का पुनरुद्धार ही तो कर रहे थे, जगा ही तो रहे थे। हाँ, कालांतर में वो जो शाखाएँ थीं वैदिक धर्म की, वो अलग पंथ, अलग परम्पराएँ हीं बन गईं, वो अलग चीज़ है, वरना वो तो सुधार ही कर रहे थे ना? उन्होंने कहा, "उपनिषदों की जो वाणी है, वो लालची, लोभी कुछ पंडितों ने बड़ी खराब कर दी। अब वो वेदों का हवाला देकर के अपने न्यस्त स्वार्थों की पूर्ति कर रहे हैं, ब्राह्मण लोग।" तो उन्होंने कहा, "नहीं, देखो सुधार करना पड़ेगा।" जो लोग गड़बड़ कर रहे थे, बुद्ध-महावीर उनके ख़िलाफ़ थे ना, उपनिषदों के ख़िलाफ़ थोड़े ही थे! बुद्ध की जो बात है, वो उपनिषदों के विरुद्ध है क्या? शत प्रतिशत मेल खाती है, शब्दों का अंतर है बस।

इसी तरह से और आगे आ जाओ। आचार्य शंकर क्या कर रहे थे? बुद्ध अपने पीछे जो पंथ छोड़कर गए, हज़ार साल बीतते-बीतते मलिन हो गया। तो जैसे बुद्ध को सफ़ाई करनी पड़ी थी वैदिक धर्म की, वैसे ही फिर आचार्य शंकर को आकर सफ़ाई करनी पड़ी बौद्ध धर्म की।

जो भी बात एक समय पर नई, ताजी और जीवनदायी होती है, प्राणों से ओत-प्रोत होती है, वो कालांतर में गंदी हो जाती है, क्योंकि सत्य कोई बात तो होता नहीं। सत्य को तुम बात बनाओगे, समय उसको धूमिल कर देगा।

थोड़ा और आगे बढ़ो। उसके बाद बारहवीं शताब्दी से सोलहवीं शताब्दी तक जो पूरा भक्ति कार्यक्रम चला, वो और क्या था? अधिकाँश संत जो भक्ति मार्ग से जुड़े हुए हैं, जो अग्रणी रहे उसमें, वो सब तथाकथित पिछड़े वर्ग और निचली जातियों से थे। वो भी एक सुधार कार्यक्रम था। और सुधार कार्यक्रम का सबसे बड़ा उदाहरण, सबसे निकट का भी है; वो है - सिख पंथ। जब पाया गया गंदगी-ही-गंदगी चारों ओर फैली हुई है, तो नानक साहब से शुरू होकर के एक पूरी श्रृंखला आई गुरुओं की, जिन्होंने कहा कि - "जो कुछ भी साफ़ है, सुंदर है, उसको ले आओ। उसको संकलित करेंगे, धर्म का एक इनसाइक्लोपीडिया बनाएँगे, उन सबको रखेंगे जो बहुत बढ़िया वाली हैं। वो जिस भी दिशा से मिल रही हैं, रखो! रखो! उनको रख लो और बाकी सब कुछ नहीं रखेंगे।" वो जो ज़बरदस्त धार्मिक कोष बनाया गया, उसका नाम है: आदि ग्रंथ, या गुरु ग्रंथ साहिब।

तो ये सब चीज़ें समय-समय पर चाहिए होती हैं। बात समझ रहे हैं? सुधार, सफ़ाई। ये थोड़े ही चाहिए होता है कि तुम धर्म को ही उठाकर बाहर फेंक दो। आज इस तरह की हवा बह रही है कि - "नहीं, नहीं, नहीं! सफ़ाई नहीं करेंगे, धर्म को ही उठाकर फेंक देंगे।" सफ़ाई चाहिए, भाई! सफ़ाई करो! और सफ़ाई का हम सब के लिए जो सबसे सुलभ तरीका है वो ये है कि कम-से-कम अपनी निज़ी ज़िन्दगी में धर्म के जो विकृत रूप और अर्थ हैं उनको प्रवेश ना करने दें। और अगर प्रवेश कर गए हों तो उनको उठा कर के बाहर फेंक दें। आ रही है बात समझ में?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आपने बताया भगत सिंह के बारे में कि वो नास्तिक थे। लेकिन जैसे ही हम इतिहास में चलते हैं, जितने भी नास्तिक हुए हैं, उनके सारे काम धार्मिकता की दिशा में बड़े सकारात्मक थे। तो नास्तिकता की परिभाषा क्या हो सकती है?

आचार्य प्रशांत: कौन-सी नास्तिकता—असली नास्तिकता, या वो नास्तिकता जो भगत सिंह की है? ये दो अलग-अलग नास्तिकता हैं।

प्रश्नकर्ता: भगत सिंह की नास्तिकता।

आचार्य प्रशांत: भगत सिंह की नास्तिकता है कि - "मैं नहीं मानूँगा उन सब बातों को जो धर्म के नाम पर प्रचारित हैं," ये नास्तिकता है। भगत सिंह कह रहे हैं - "ना-अस्ति!” किस चीज़ को कह रहे हैं, "नहीं है"? वो किस चीज़ को कह रहे हैं, "नहीं है"? वो कह रहे हैं, "ये जितना जो आडम्बर खड़ा किया गया है धर्म और भगवान के नाम पर, वो सच्चा नहीं है—ना-अस्ति! मैं उसके प्रति अस्वीकार रखता हूँ।" ये उनकी नास्तिकता है। ये सच्ची नास्तिकता है। आज से सात-आठ साल पहले मैंने बोला था, उस पर कोटेशन भी बना दिया, पोस्टर भी चल रहे हैं कि -

धर्म वास्तव में सच्ची नास्तिकता का विज्ञान है।

तुम धार्मिक हो पाओ, इसके लिए आवश्यक है कि पहले तुम नास्तिक होना सीखो। क्योंकि अगर तुम नास्तिक नहीं हो, तो तुम सस्ते आस्तिक हो। सस्ता आस्तिक कौन होता है? कि तुमको बता दिया गया है कि भगवान जी हैं- "हाँ भगवान जी हैं, बोलो, 'जय'।" "जय, हो गया”, ये तुम्हारी सस्ती आस्तिकता है। और ये जो सस्ती आस्तिकता है, इसी ने धर्म का बंटाधार कर रखा है, अध्यात्म का बेड़ागर्क कर रखा है।

पहले नकली धर्म को नकारना सीखो, पहले नकली धर्म के प्रति नास्तिक होना सीखो।

जब नकली धर्म के प्रति नास्तिक हो जाओगे, तो फिर सच्चे अर्थों में धार्मिक हो जाओगे।

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