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माँसाहार का समर्थन - मूर्खता या बेईमानी? (भाग-1) || (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता १: मेरा ऐसा तर्क है कि माँसाहार शाकाहार दोनों ही प्रकृति के संतुलन हेतु आवश्यक हैं। आप कल्पना करें कि यदि पूरी मानव जाति शाकाहारी हो गई तो पानी में मछलियाँ कितनी ज़्यादा हो जाएँगी? और गाँव शहर में सूअर, बकरे-बकरी कितने ज़्यादा हो जाएँगे? कल्पना करना मुश्किल है।

प्रश्नकर्ता २: प्रकृति के चक्र का यह हिस्सा है कि हम जानवरों को मारें और आप कहते हैं कि क्लाइमेट चेंज का मुख्य कारण माँसाहार है लेकिन क्लाइमेट चेंज का मुख्य कारण हानिकारक गैसें हैं ना कि माँसाहार। आप यह कल्पना कर सकते हैं कि पृथ्वी कैसी नज़र आएगी अगर सभी शाकाहारी हो जाएँ? मंगल ग्रह की तरह पृथ्वी हो जाएगी, कोई पेड़ पौधा नहीं बचेगा, ऑक्सीजन नहीं बचेगी इसलिए माँसाहारी होना अत्यावश्यक है। आपको तर्कयुक्त और विज्ञानसम्मत बातें करनी चाहिए जैसे कि ज़ाकिर नायक करते हैं।

आचार्य प्रशांत: पृथ्वी पर जो ज़मीन का क्षेत्र है उसमें से करीब आधे पर खेती होती है। यह जिस भाग पर खेती होती है हम उसके बारे में दो चार चीज़ें समझते हैं, जो कि बहुत रोचक है।

बहुत ध्यान से सुनिएगा। यह सोच कर इधर-उधर मत हो जाइएगा कि यह तो भूगोल पढ़ाने लग गए, विज्ञान पढ़ाने लग गए, नहीं। ध्यान देंगे तो आपकी पूरी रुचि आगे तक इसमें बनी रहेगी।

जानते हो धरती के जिस भाग पर खेती होती है, उसका कितना हिस्सा इंसानों के खाने के लिए अन्न उपजाने में उपयोग होता है? अपने सवाल को आसान बनाए देता हूँ — मान लो धरती पर कुल सौ वर्ग मीटर क्षेत्र है, हंड्रेड स्क्वायर मीटर एरिया है जिस पर खेती होती है, तो उस एरिया का कितना हिस्सा आदमियों के खाने के लिए अन्न पैदा करने के लिए इस्तेमाल होता है बताओ? अन्न या और दूसरी चीज़ें — साग, सब्जियाँ, फल सब, बताओ कितना?

तुम हैरान रह जाओगे। सिर्फ तेईस प्रतिशत। अब झटका लगेगा, कहोगे, अगर इतने बड़े क्षेत्र में खेती हो रही है, सौ वर्ग मीटर में तो उसका सिर्फ तेईस प्रतिशत दाल-चावल, ज्वार-बाजरा, सब्जियाँ-फल वगैरह उगाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। तो बाकी यह जो सतहत्तर स्क्वायर मीटर है इसका इस्तेमाल किस लिए हो रहा है?

मेरे साथ चलते रहो, सोचते भी रहो। दिमाग लगाओ, बताओ खेती हो रही है एक बड़े क्षेत्र में और आपको पता चलता है कि इस क्षेत्र में से बस जो तेईस प्रतिशत क्षेत्र है उसमें आदमियों के लिए खाना उपजाया जा रहा है, तो बाकी सतहत्तर प्रतिशत में जो पैदा किया जा रहा है वह किसके लिए है? वह किसके लिए है? वह जानवरों के लिए है। कौन से जानवर? जिनको तुम मार कर खाते हो।

कुल ज़मीन, जिस पर आदमी अन्न की पैदावार कर रहा है उसका सतहत्तर प्रतिशत माँसाहार के लिए कटने वाले जानवरों को भोजन देने के लिए इस्तेमाल होता है। मतलब यह है कि इंसान इतने ज़्यादा जानवर काट कर खा रहा है कि तीन-चौथाई से ज़्यादा खेती सिर्फ और सिर्फ उन जानवरों को अन्न देने के लिए होती है।

भई आपको भैंस काटकर खानी है, आपको बकरा काट कर खाना है, आपको मुर्गे काटने हैं, आपको भेड़ काटने हैं, आपको गाय काटने हैं, आपको सूअर काटने हैं, दुनिया भर के जानवर आपको काट-काट कर खाने हैं, और आपको लगता है कि, "मैंने तो जानवर खाया है।" नहीं साहब, आपने जानवर नहीं खाया है। वह जो जानवर है उसको आप खा सकें इसके लिए पहले उस जानवर ने ना जाने कितना अन्न खाया है, यह बात आपको समझ में नहीं आती।

लोग कहते हैं, "देखो मैं घास-पात नहीं खा रहा, मैं अगर घास-पात खाऊँगा तो पेड़ कटेंगे, मैं तो इसीलिए जानवर को खा लेता हूँ।" और उस जानवर ने क्या खाया है? वह जानवर अपने-आप ही बड़ा हो गया?

और अगर आप एक किलो अन्न खाते हैं तो आप बस एक किलो अन्न खाते हैं। आपने दाल-चावल-गेहूँ कुछ खा लिया, अपने पसंद का, और कितना खाया आपने? एक किलो। अब एक किलो खाया, तो एक ही किलो खाया। लेकिन अगर आपने एक किलो माँस खाया तो जानते हो उसके लिए तुमने कितना अन्न खाया? एक किलो माँस खाने के लिए तुम दस से बीस किलो अन्न पहले उस जानवर को खिलाते हो। जब जानवर दस से बीस किलो दाना खाता है तब उसका एक किलो माँस तैयार होता है।

तो जानवर को खाने वाले कृपया यह ना सोचें कि वह पेड़ों को बचा रहे हैं। अगर तुमने दाल-चावल खाया होता एक किलो तो एक ही किलो खाया लेकिन अगर तुमने एक किलो माँस खा लिया तो वह एक किलो माँस अपने शरीर में पैदा करने के लिए उस जानवर ने पहले दस से बीस किलो दाना खाया था। उसको इतना खिलाया गया था तब जाकर के उसका माँस पैदा हुआ था।

और माँस ही नहीं उस जानवर को बड़ा करने के लिए उस पर पानी की भी बहुत खपत हुई थी। और दुनिया में इस वक्त पानी की भी बहुत कमी है। तो आपके सामने माँस आता है तो आप सोचते हो यह सिर्फ माँस है। वह सिर्फ माँस नहीं है। बहुत ज़्यादा संसाधन लगे हैं तब जाकर वह एक किलो माँस तैयार हुआ है। और उतने संसाधनों में न जाने कितने गरीबों का पेट भर जाता।

इससे अब हम बात थोड़ा आगे बढ़ा लेते हैं। जानते हो यह जो सतहत्तर प्रतिशत एरिया इस्तेमाल हो रहा है, जानवरों को, माँस के लिए, खिलाने के लिए उससे आपकी कैलोरी की कुल आपूर्ति कितनी होती है? अट्ठारह प्रतिशत बस। जानते हो उससे आपके प्रोटीन की कुल आपूर्ति कितनी होती है? सैंतीस प्रतिशत बस। उलझ तो नहीं रहे हो आँकड़ों में? मैं बहुत ज़्यादा प्रतिशत वगैरह तो नहीं उछाल रहा हूँ?

देखो यह मेज है (अपने सामने रखी मेज की ओर इशारा करते हुए)। समझ लो इस पर तीन चौथाई से भी ज़्यादा क्षेत्र में क्या उगाया जा रहा है? भैंसों के लिए, बकरों के लिए, सूअरों के लिए, और पश्चिम में गाय बहुत काटकर खाई जाती हैं, उनके लिए दाना उगाया जा रहा है, कि इस दाने से उन जानवरों को खिलाएँगे ताकि फिर ला करके हम उनको काटें, ताकि माँसाहारी लोग मजे से स्वाद ले सकें माँस का।

और जितने दुनिया के शाकाहारी हैं वह जो बाकी एक चौथाई से कम माल है उसमें अपना काम चला ले रहे हैं। बल्कि उससे शाकाहारीयों का ही नहीं उससे माँसाहारियों का भी काम चल रहा है क्योंकि माँसाहारी सिर्फ माँस थोड़े ही खाते हैं, माँस के साथ-साथ तंदूरी भी तो चल रहा है, रोटी।

यह जो लेकिन सतहत्तर प्रतिशत क्षेत्र है इससे पूरी दुनिया को जो प्रोटीन मिल रहा है उसकी सिर्फ सैंतीस प्रतिशत सप्लाई हो रही है। हम कहते हैं न बार-बार कि माँस खाओ प्रोटीन के लिए, नहीं साहब। इतना सारा क्षेत्र लग रहा है कृषि योग्य भूमि का माँस उपजाने के लिए और उससे प्रोटीन कुल कितना मिल रहा है? सैंतीस प्रतिशत, माने तिरसठ प्रतिशत प्रोटीन आ कहाँ से रहा है? वो दालों से और चावलों से ही आ रहा है जबकि उनको तुमने ज़मीन बहुत कम दी है।

उनको तुमने इतनी कम ज़मीन दी है फिर भी सिर्फ तिरसठ प्रतिशत दुनिया के प्रोटीन की आपूर्ति वही कर रहे हैं और प्रोटीन-तो-प्रोटीन दुनिया के बयासी प्रतिशत कैलोरी की, ऊर्जा की, जिससे तुम काम करते हो, उसकी आपूर्ति हो रही है वह जो दाल-चावल तुम खाते हो उससे।

और बड़े स्वाद के साथ और बड़ी ऊँची-ऊँची मेडिकल बातों के साथ, कि, "देखिए साहब माँस खाएँगे तो एनर्जी (ऊर्जा) आएगी और प्रोटीन आएगा, कैलोरी आएगा, यह जो तुम माँस खाते हो इससे तुम्हें प्रोटीन भी बहुत कम मिल रहा है और तुम्हें कैलोरी भी बहुत कम मिल रही है। कम-से-कम जितना क्षेत्र ये खा रहा है, अपने को उपजाने के लिए, उसकी तुलना में तो बहुत ही कम मिल रही है।

कृषि का जितना क्षेत्र की खपत हो जा रही है जानवरों के लिए चारा वगैरह उपजाने में और जानवरों के लिए अन्न उपजाने में उसकी तुलना में, उन जानवरों के माँस से जो प्रोटीन और ऊर्जा मिल रही है वह बहुत कम है। तो यह जो हमारे दिमाग में भ्रांति है, मिथ है कि "मैंने तो बकरा खाया, माने मैंने बकरा खाया। मैंने कम-से-कम पेड़-पौधों को तो नुकसान नहीं पहुँचाया" नहीं, आप बेवकूफी की बात कर रहे हैं। जिसने बकरा खाया उसने बकरे की तो जान ली ही ली और साथ-ही-साथ उसने अनावश्यक रूप से उन सब पेड़-पौधों की भी जान ले ली जिन्हें बकरे को खिलाया गया था, ताकि आप बकरे को खा सकें।

शाकाहारियों पर अक्सर यह इल्ज़ाम लगता है कि, "देखो तुम भी पेड़-पौधा खा रहे हो, उसमें भी तो जान है।" चलो वह इल्ज़ाम मान लो सही भी है। तो माँसाहारी यह तो बताएँ कि तुम तो बकरा खा रहे हो, तो तुमने तो बकरे को भी मारा और बकरे ने जो क्विटलों पत्ते खाए, उन पत्तों की, उन पौधों की भी हत्या का इल्ज़ाम तुम पर है क्योंकि बकरे को तो वह सब कृत्रिम रूप से खिलाए गए ताकि तुम बकरे को खा सको। यह बात समझ में आ रही है?

बहुत ज़्यादा लोग इस बात से परिचित ही नहीं है कि माँसाहार इस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है। कि इस पृथ्वी को तमाम तरीकों से जो समस्याएँ लीले ले रही हैं उनका मूल कारण माँसाहार है।

हम कहते हैं न, कि, "अरे अरे जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं!" अक्सर तुमने इस तरह की बातें सुनी होंगी कि प्रतिदिन चालीस फुटबॉल मैदानों के बराबर जंगल काट दिए जाते हैं। उनमें से अधिकांशतः तो ब्राजील में अमेजन के जंगल हैं, वही काटे जा रहे हैं। तुमने कभी सोचा है कि इतने जंगल काटने क्यों पड़ रहे हैं? कभी विचार किया है?

ब्राजील का ही उदाहरण ले लो। बताओ क्यों काटने पड़ रहे हैं? वह जंगल इसलिए काटने पड़ रहे हैं ताकि उन जंगलों को काट कर उस जगह पर खेती की जा सके। खेती क्यों की जा रही है? वह खेती इसलिए नहीं की जा रही है कि वहाँ जो खेती की जाएगी उससे जो अन्न पैदा होगा वह शाकाहारियों के पास जाएगा। इस भ्रम में मत रहिएगा।

वहाँ खेती की जाएगी इसलिए ताकि वहाँ से जो अन्न-दाना निकले वह गायों-भैंसों को खिलाया जाए, फिर उनको आप काट करके उनका माँस खा सकें। वहाँ एनिमल फॉर्म चलते हैं। ब्राजील माँस का बहुत बड़ा निर्यातक है, *एक्सपोर्टर*। तो जंगल इसलिए काटे जा रहे हैं ताकि माँसाहारियों को माँस मिलता रहे।

माँसाहारियों के सर पर इल्ज़ाम है, पाप है दुनिया भर के जंगल कटवाने का। आप एक तरफ तो चिकन चबाते हो, मटन चबाते हो, दूसरी ओर आप कहें कि "नहीं नहीं, मुझे दुनिया के जंगल की और पर्यावरण की बहुत फिक्र है।" तो आप पाखंडी हैं। आप हिपोक्रेट हैं क्योंकि दुनिया के जंगलों के कटने का सबसे बड़ा कारण ही माँसाहार है।

और यह तो कहिएगा ही नहीं कि, "मुझे पता नहीं था।" दुनिया भर की व्यर्थ बातें आपको पता होती हैं और पृथ्वी के सामने जो सबसे बड़ी समस्या है, वह आपको नहीं पता थी। पता ही नहीं है या पता करना चाहते ही नहीं थे? पता इसलिए नहीं करना चाहते थे क्योंकि ज़बान के स्वाद पर या धार्मिक आस्थाओं पर चोट लगती है।

इसी तरीके से हम कहते हैं कि अरे पशुओं की, पक्षियों की, पेड़-पौधों की इतनी प्रजातियाँ रोज़ विलुप्त हो रही हैं। जानते हो रोज़ाना पच्चीस से डेढ़-सौ प्रजातियाँ हैं जानवरों की और कीट-पतंगों की, पौधों की जो हमेशा के लिए खत्म हो जा रही हैं। वो लौट कर नहीं आएँगे अब। वह क्यों खत्म हो रही हैं? वह इसलिए खत्म हो रही हैं क्योंकि उनके घर हमने काट डाले।

जब तुम एक जंगल काटते हो तो उसमें बस पेड़ ही नहीं काटते हो, तुम न जाने कितनी प्रजातियों का हैबिटेट काट देते हो, जहाँ पर वह बसा करती थी, जो उनका घर था। माँस का स्वाद लेने के लिए तुमने न जाने कितनी प्रजातियाँ खत्म कर दी। ऐसे नहीं खत्म कर दी कि तुमने उनको खा लिया, नहीं, खाया तो तुमने बकरे को लेकिन उस बकरे के लिए अन्न उपजाने के लिए तुमने जंगल काट डाले, ताकि वहाँ खेती कर सको।

और जंगल तुमने काटे, न जाने कितनी अनाम-अनजान प्रजातियाँ विलुप्त हो गई। बल्कि प्रजातियाँ इस समय पृथ्वी पर बढ़ती ही कौन सी जा रही हैं? मुर्गे बढ़ते जा रहे हैं, बकरे बढ़ते जा रहे हैं, इसलिए नहीं कि उन्हें बढ़ने का शौक है, इसलिए क्योंकि तुम उन्हें कृत्रिम रूप से बढ़ा रहे हो।

यह बहुत मूर्खतापूर्ण तर्क है पंडित जी जो आपने कहा कि "अगर हमने खाया नहीं तो तालाबों में मछलियाँ कितनी हो जाएँगी और जंगलों में सूअर और भैंसे कितने हो जाएँगे।" आप को क्या लग रहा है, यह सब प्राकृतिक रूप से पैदा होते हैं?

आप जो माँस खाते हो वह नब्बे-पिचानवे प्रतिशत कृत्रिम रूप से पैदा किया जाता है, आपकी हवस मिटाने के लिए। यह ऐसा थोड़े ही है कि मुर्गे जंगलों में घूम रहे थे और आपके लिए जा करके उनको कसाई लोग और रेस्तराँ वाले पकड़ कर ला रहे हैं। यह जंगलों से नहीं आ रहे हैं, इन्हें ज़बरदस्ती पैदा किया जा रहा है। और इन्हें ज़बरदस्ती पैदा किया जा रहा है, खिलाया जा रहा है जंगल काट-काट कर।

तो माँसाहार से जो दो-तीन चीज़ें हैं सबसे खतरनाक वह तो समझ में आ ही गई होंगी। अभी उसमें और भी जोड़ूँगा: पहली चीज़, जंगल काट रहे हैं इसकी वजह से; दूसरी चीज़, प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं इसकी वजह से; तीसरी चीज़, जितने तुम इसको संसाधन दे रहे हो, जितनी जगह दे रहे हो, एनिमल एग्रीकल्चर को उसके अनुपात में माँस से ना कैलोरी मिल रही है, ना प्रोटीन मिल रहा है।

अब आओ चौथी चीज़ पर। क्लाइमेट चेंज या ग्लोबल वार्मिंग इसका नाम तो सभी ने सुना ही होगा। जानते हो ग्लोबल वार्मिंग की बड़ी-से-बड़ी वजह क्या है? माँसाहार। प्रश्नकर्ता ने बड़े भोलेपन से - जाने भोलापन है या बात को छुपाने की मंशा है। कई बार जब कुछ पूर्वाग्रह हमारे मन में बहुत गहरे बैठे होते हैं तो उनको कायम रखने के लिए हम तथ्यों को भी तोड़ने-मरोड़ने लग जाते हैं।

खैर जो भी कर रहे हैं यह बात समझिए। इतना तो तुमने कह दिया कि, "आचार्य जी, शायद आपको पता नहीं कि क्लाइमेट चेंज माँस खाने से नहीं गैसों से होता है।" अरे वो गैसें क्या आसमान से टपकती हैं? वह गैस कहाँ से आ रही हैं? जिन गैसों से क्लाइमेट चेंज हो रहा है, ग्रीनहाउस गैसेस जिन्हें बोलते हैं, सर्वोपरि उनमें कौन हैं? मिथेन है, फिर कार्बन डाइऑक्साइड है, उसके बाद वॉटर वेपर है, और तमाम अन्य गैसेस है। पर सबसे ज़्यादा जो उत्तरदाई है गैस, ग्रीन हाउस इफेक्ट के लिए पृथ्वी पर, वह इस वक्त कार्बन डाइऑक्साइड है। वह कहाँ से आ रही है वह तुम्हें पता है? वो एनिमल एग्रीकल्चर से आ रही है। मिथेन पैदा होती है उससे और कार्बन-डाइऑक्साइड।

यह जितने तुम जानवर बड़े-बड़े पैदा कर रहे हो, काट कर खाने के लिए, इन्हीं जानवरों के शरीर से मीथेन और कार्बन-डाइऑक्साइड उत्सर्जन होते हैं। तो क्लाइमेट चेंज की बड़ी-से-बड़ी ज़िम्मेदारी माँस खाने वाले लोगों के ऊपर है। वह जो तुम्हारी प्लेट पर माँस रखा हुआ है वही ज़िम्मेदार है क्लाइमेट चेंज का। तुम इधर-उधर की क्या बात कर रहे हो कि "अरे नहीं, कार का नया मॉडल ले लेंगे, तो उसमें से कार्बन-डाइऑक्साइड कम निकलेगा, अरे नहीं चलो थोड़ा सा एक बल्ब कम जलाते हैं तो ग्लोबल वार्मिंग कम होगी।" बेवकूफी की बातें हैं।

जो सबसे बड़ी बात है वह मुद्दा तो तुम छुपा रहे हो। यह जो माँस खा रहे हो तुम इसी से क्लाइमेट चेंज हो रहा है दुनिया भर का। कुछ अनुमान कहते हैं कि यह सबसे बड़ा कारण है क्लाइमेट चेंज का। कुछ कहते हैं, यह पहला नहीं नंबर दो का कारण है। पर इस बात पर तो सब वैज्ञानिक और सब सर्वेक्षण और सब रिसर्च सहमत है कि या तो माँसाहार क्लाइमेट चेंज का सबसे बड़ा कारण है नहीं तो दूसरे नंबर का कारण है। कुछ समझ में आ रही है बात?

अब तुम कह रहे हो कि जिन सज्जन का तुमने नाम लिया है, ज़ाकिर नायक, आप इनकी तरह तर्कसंगत और विज्ञान सम्मत होकर बोला करो। भाई मैंने इनको ज़्यादा सुना नहीं है पर तुम इनके चेले लगते हो। तो अगर यही लॉजिक और साइंस सीखा है तुमने अपने उस्ताद से, तो तुम्हारे उस्ताद ना तर्कसंगत हैं, ना विज्ञान सम्मत हैं।

अपने पूर्वाग्रहों के पक्ष में बेवकूफी भरे तर्क दे देने से पूर्वाग्रह सत्य नहीं बन जाते। किसी मंच पर खड़े हो गए और धाराप्रवाह कुछ बातें बोलने शुरू कर दी, उन बातों के बोल भर देने से वह बातें तार्किक नहीं हो जातीं और वैज्ञानिक भी नहीं हो जाती। थोड़ा पढ़ा करो।

जिस तरीके से तुमने सवाल लिखकर भेजा है कि, "आचार्य जी माँसाहार खाने से थोड़े ही होता है क्लाइमेट चेंज , वह तो गैसों से होता है", उससे लग रहा है कि पढ़ने-लिखने में तुम्हारी विशेष रूचि है नहीं। पढ़ा करो और यूट्यूब पर इस तरह का भद्दा प्रचार करने वाले उस्तादों से ज़रा बच कर रहा करो। देख लिया करो कि उनकी रूचि सत्य में है या अपनी धारणाओं, मान्यताओं और पूर्वाग्रहों का प्रचार प्रसार करने में।

सच के प्रति प्रेम एक बात होती है और आपकी जो मान्यता है या जो आईडियोलॉजी है उसके पक्ष में आप नए-नए तरीके के ज़ोरदार तर्क गढ़ें, वो बिलकुल दूसरी बात होती है। तो किसको सुन रहे हो तुम, इस बात को लेकर के सतर्क रहा करो।

और पहले प्रश्नकर्ता का तो कहना ही क्या। कि अगर हमने मछलियाँ नहीं मारी तो समुद्र में मछलियाँ इतनी हो जाएँगी कि पानी से कूद-कूद कर बीच पर पढ़ी होंगी बिलकुल। क्या बुद्धि चलाई है! (व्यंग्य करते हुए) तो जिन जगहों पर अभी आदमी के पवित्र कदम नहीं पड़े हैं उन जगहों पर तो मछलियों को बड़ी तकलीफ हो जाती होगी? उनके घर में रहने की जगह ही कम पड़ जाती होगी?

जानते हो तुम इतनी मछलियाँ खाते हो कि सिर्फ उनकी वजह से वही मछलियाँ विलुप्त नहीं हो रही जिनको तुम खाते हो, न जाने कितनी ऐसी प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं जो बेचारी जालों में इसलिए फँस जाती हैं—अब तो मैकेनाइज्ड फिशिंग होती है न, ऐसा तो है नहीं कि मछुआरे जाकर के जाल फेंक रहे हैं। अब तो बड़े-बड़े जहाज़ चलते हैं और वो बड़े मैकेनाइज्ड तरीके से विशाल जाल डाला करते हैं जिसमें टनो मछलियाँ फँस कर आती हैं।

सिर्फ मछलियाँ नहीं फँस कर आती, उनके साथ न जाने कितनी ऐसी प्रजातियाँ फँस जाती हैं उन जालों में जिनको तुम खाते भी नहीं। और वह भी विलुप्त हुई जा रही हैं। न जाने कितने तरह के कछुए और पता नहीं क्या-क्या, वह सब खत्म हो रहे हैं।

थोड़ा पढ़ा करो न, तुम्हें लग रहा है कि तुम खाओगे नहीं तो दुनिया भर में मुर्गे-ही-मुर्गे हो जाएँगे। ऐसी बातें करते भी मैंने दो-चार लोगों को सुना है कि, "अरे यह जो मुर्गे है न यह दुनिया पर छा जाएँगे, इन्हीं का शासन हो जाएगा, संसद में यहीं बैठा करेंगे, यूनाइटेड नेशन सेक्रेटरी जनरल कौन है? मुर्गा राज। इस तरह की नौबत आ जाएगी।"

आदमी को बुद्धि मिली है न, इस्तेमाल करने के लिए ही मिली है। फ्रीजर में रखने के लिए थोड़े ही! किस तरीके के तर्क दिया करते हो? और मैं आज थोड़ी तल्खी के साथ इसलिए बोल रहा हूँ क्योंकि इस मुद्दे पर पहले मैं कम-से-कम दर्जन बार बोल चुका हूँ। उसके बाद भी तुम लोगों को बात समझ में नहीं आ रही है।

धरती विनाश की कगार पर खड़ी है, तुम्हारी ज़बान के स्वाद के कारण और तुम्हारी धार्मिक मान्यताओं के कारण लेकिन तुमको समझ में नहीं आ रही बात। तुम सब कुछ बर्बाद करके ही मानोगे।

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