Acharya Prashant is dedicated to building a brighter future for you
Articles
माँस ज़रूर खाओ: 10 मस्त तर्क || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
72 min
40 reads

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। आपका एक वीडियो था, वो अभी हाल ही में आया था और उसको कई सारे साथियों ने देखा। और मैं उस वीडियो के कमेंट्स को पढ़ रहा था तो मैंने वहाँ पर देखा कि कई सारी जिज्ञासाएँ थीं, लोगों के सवाल थे, जो मुझे वहाँ मिले और उन्होंने मुझे भी प्रेरित किया कि मैं थोड़ा और रिसर्च करूँ और उन्होंने जो प्रश्न पूछे थे मैं उनके बारे में पढूँ। तो आज मैंने कुछ ऐसे ही सवाल जो उस वीडियो के कमेंट्स में थे और कुछ डेटा जो मैंने खुद रिसर्च की उसको पढ़कर, वो आपके सामने रखना चाहूँगा। और जो बातें हैं मैं चाहूँगा कि उसके ऊपर आप थोड़ा बात करें और लोगों को हमें....।

आचार्य प्रशांत: बहुत बढ़िया। तो आप आज डेटा वगैरा लेकर आये हैं काफ़ी।

प्र: जी, जी। मैं देख रहा था, सबसे पहला जो एक तर्क मुझे सबसे अधिक बार दिखता है वो ये दिखता है लोग कहते हैं कि सर जो पेड़ हैं उनमें भी तो जान है। तो हम जब कहते हैं शाकाहार करते हैं तो उनको भी तो दर्द होता होगा। तो इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

आचार्य: देखो, दो तीन बातें हैं। पहली बात तो ये है कि पेड़-पौधों वगैरा के पास रिएक्ट (प्रतिक्रिया) करने की क्षमता तो होती है और यही बात पिछली शताब्दी में वैज्ञानिकों द्वारा सिद्ध भी करी गई थी। लेकिन पेन फील (दर्द का अनुभव) करने के लिए एक आपको स्नायु तंत्र चाहिए, सेंट्रल नर्वस सिस्टम चाहिए। वो पेड़-पौधों के पास नहीं होता। हम इस बात से इंकार नहीं कर रहे हैं कि सब जीव जिनमें पेड़-पौधे भी हैं, सब कौंशियस (चेतन) होते हैं। हाँ, एक पौधा भी निश्चित रूप से कौंशियस होता है, ये यहाँ पौधा रखा हुआ है और मैं इसको नुकसान नहीं पहुँचाना चाहूँगा। इसमें भी चेतना है।

पर ये हम समझेंगे कि दर्द अनुभव कर पाने की इसके पास फैकल्टी (क्षमता) ही नहीं है तो इसको दर्द नहीं अनुभव होता, यह पहली बात है। और उसमें हमनें यह माना है कि ये कोंशियस होता है और अगर आप उसकी भी जान ले रहे हो तो वो भी एक तल की हिंसा निश्चित रूप से है। कोई अगर पेड़ को काट रहा है तो वो भी हिंसा होती है और हमें यह बात माननी पड़ेगी। मैं सहमत हूँ इस बात से हम इंकार नहीं कर रहे।

लेकिन चेतना के स्तर अलग-अलग होते हैं न। कोंशियसनेस के लेवल्स (स्तर) होते हैं. ठीक है? उसमें बाइनरी (दो अंकों की संख्यात्मक प्रणाली) नहीं होता कि ज़ीरो (शून्य) है या वन (एक) है कि कोई कोंशियस है या अनकोंशियस (अचेतन) है। नहीं, ऐसा नहीं होता।

फुली कोंशियस और फुली अनकोंशियस के बीच में पूरी एक लीनियर स्केल होती है कोन्टिन्यूअस। है न? तो सब जितने भी प्राणी हैं, बीइंग्स हैं, वो अलग-अलग लेवल की कोंशियसनेस के होते हैं; अलग-अलग स्तर की उनकी चेतना होती है। जिसकी चेतना जितने ऊँचे स्तर की है वो उतने ही ज़्यादा मूल्य का, सम्मान का प्राणी हो जाता है और उतनी ही उसकी ज़िम्मेदारी भी बढ़ जाती है। जो जितनी ऊँची चेतना का है, जो जितना देख सकता है, जान सकता है, समझ सकता है, उसकी क़ीमत उतनी ही ज़्यादा होती है। लेकिन साथ-ही-साथ उसकी ज़िम्मेदारी भी उतनी ही ज़्यादा होती है।

तो हम बहुत अच्छे से जानते हैं कि चेतना के तलों की जब बात आएगी तो उसमें जो फुली अनकांशियस है, उसको हम बोल देते हैं रेत हो गई, पत्थर हो गया, है न, जितना भी ये मटेरियल वर्ल्ड है, वो हो गया, वो हो गया आपका फुली अनकोंशियस। फुली कांशियस हम कह देते हैं कोई बहुत ऊँची चेतना का व्यक्ति होता है जिसको हम कह देते हैं कि ही इज ऑलमोस्ट फुली कांश्यस। उसको फिर हम लिबरेटेड बोल देते हैं या एनलाइटेंड बोल देते हैं जो भी हमें मन करता है। और उनके बीच में ये सब अलग-अलग लेवल्स की कोंशियसनेस भी होते हैं। तो सबसे कम कांशयसनेस पेड़-पौधों में होती है; उनसे ज़्यादा जानवरों में होती है; उनसे ज़्यादा इंसानों में होती है।

तो जो इसमें सिद्धांत है, प्रिंसिपल है, वो है प्रिजर्वेशन ऑफ कोंशियसनेस का। कोई नहीं कहेगा कि पत्थर था एक और पत्थर के आपने दो हिस्से कर दिए तो हिंसा कर दी क्योंकि पत्थर में कोंशियसनेस नहीं है। जब कोंशियसनेस नहीं है तो पत्थर को तोड़ देने में कोई हिंसा भी नहीं हो गयी।

लेकिन आप एक इनसान के दो टुकड़े कर दें, जैसे आपने पत्थर के दो टुकड़े करे थे, तो वो हिंसा कहलाती है क्योंकि आपने कोंशियसनेस को काट दिया। आपने कोंशियस बीइंग को नष्ट कर दिया; तो वो हिंसा कहलाती है। तो हिंसा की, वायलेंस (हिंसा) की, परिभाषा ही यही है। कोंशियसनेस को नीचे गिराना ही हिंसा है। कुछ ऐसा करना जिसमें आपकी चेतना नीचे गिरती हो, जैसे लालच में आपकी चेतना नीचे गिरती है, क्रोध में आपकी चेतना नीचे गिरती है, वासना में आपकी चेतना नीचे गिरती है, ईर्ष्या में गिरती है। तो ये सब चीज़ें हिंसा होती हैं, जो कुछ भी आपकी चेतना को नीचे गिराए हिंसा है और अब दूसरे के साथ कुछ ऐसा कर दें जो उसकी चेतना को नीचे गिरा दे तो वो भी हिंसा है। तो अगर आप किसी दूसरे को लालच दें तो ये हिंसा है क्योंकि इससे उसकी कोंशियसनेस गिरी है नीचे। और अगर आप किसी दूसरे को मार दें, तो ये और बड़ी हिंसा है क्योंकि अब उसकी कोंशियसनेस शून्य हो गयी, वो ख़त्म ही हो गया।

लेकिन आप एक पत्थर को काट दें तो वो हिंसा नहीं कहलाती क्योकि उसकी चेतना एकदम शून्य बराबर है। तो इसी सिद्धांत के आधार पर एक पौधे को अगर आपने मार दिया तो वो हिंसा है, पर वो छोटी हिंसा है। आपने एक जानवर को मार दिया तो वो हिंसा है, पर बड़ी हिंसा है तुलनात्मक रूप से, रेलेटिवली। और अगर आपने इंसान को मार दिया तो बहुत बड़ी हिंसा है। और इंसानों में भी अगर आपने किसी बहुत अच्छे इंसान को मार दिया जो ज़िंदगी में बहुत अच्छे काम करने निकला था तो वो और बड़ी हिंसा होती है। बात समझ में आ रही है?

इसीलिए क़ानून भी इंसान को मारने की एक सज़ा देता है; जानवर को मारने की दूसरी सज़ा देता है और पेड़-पौधों को मारने की कम सज़ा देता है। तो ये हमें सोचना पड़ेगा न कि कानून भी ऐसा क्यों बना है। क्योंकि कानून भी प्रिंसिपल ऑफ़ कोंशियसनेस पर चल रहा है कि हिंसा है कोंशियसनेस को मारना और सज़ा मिलती है हिंसा की। तो माने सज़ा मिलती है कोंशियसनेस को गिराने की।

तो ये कहना कि पेड़-पौधों में भी जान है और जानवर में भी जान है, तो दोनों को मारना एक ही बात है, ये बहुत बेकार कुतर्क है। ये वैसा ही कुतर्क है कि एक आदमी है, जैसा हमनें कहा था न कि वो गुटखा खाता है, वो भी ग़लत बात है और एक आदमी है जो क़ातिल है और हम कहते हैं कि दोनों ही अपराध तो करते ही हैं न।

एक आदमी ने गुटखा खाकर कहीं थूक दिया और लाल-लाल निशान पड़ गया दीवार पर; और एक आदमी ने उसी दीवार से सटाकर किसी का कत्ल कर दिया और खून का लाल-लाल निशान पड़ गया दीवार पर; और हम कहें, इन दोनों ने एक ही अपराध तो करा है। नहीं, एक ही अपराध नहीं कर रहा है। किसी ने गुटखा खाकर के थूक दिया वो भी है एक अपराध ही और कोई कत्ल कर रहा है वो भी अपराध है लेकिन इन दोनों की तुलना नहीं कर सकते। एक बहुत, एक छोटी सी चीज़ है और एक अपेक्षतया बहुत बड़ी चीज़ है। तो इसी तरीक़े से जो जानवरों को आप मारते हैं वो बड़ी हिंसा है और आप इंसान को मारते हैं तो और बड़ी हिंसा है। इनकी तुलना में पौधे को अगर आपने मारा तो वो छोटी हिंसा है। अब उससे भी आगे आओ, पौधे को मारना आपकी मजबूरी है। हिंसा सिर्फ़ वही मानी जाती है जहाँ पर आपके पास विकल्प था, ऑप्शन था हिंसा न करने का, फिर भी आपने हिंसा करी। जहाँ आपके पास विकल्प ही न हो, उसे हिंसा नहीं कहते।

अब जबसे आप पौधे को मारने की बात कर रहे हो तो मर तो छोटे-छोटे जीव-जन्तु तब भी जाते हैं जब आप साँस लेते हो। आप जब साँस लेते हैं तो हवा में तमाम छोटे जीवाणु-कीटाणु हैं, वो आपके भीतर गए और वो ये जो आपका ट्रैक होता है, एयर ट्रैक, ब्रीथिंग ट्रैक उसमें वो फँस जाते हैं और वहाँ उनकी मौत हो जाती है। लेकिन इसे हम हिंसा नहीं बोलेंगे क्योंकि ये जो हुआ है, इसमें हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं था न। हम क्या करते? हमनें जानबूझकर तो किया नहीं। इंसान बने हैं तो साँस लेंगे और साँस लेंगे तो किसी की मौत हो जाएगी।

अभी आप हम यहाँ बैठे हुए हैं ऐसे; आप पीछे जिस गद्दे पर टिके हुए हो, उसमें भी छोटे-छोटे जीवाणु रहे होंगे। आप उनपर टिके हुए है, उनमें से कुछ की मौत हो गई, उसको हिंसा नहीं माना जाता। या उसको आपको हिंसा मानना भी है तो बहुत छोटे स्तर की हिंसा है। छोटे स्तर की हिंसा का बहाना बनाकर बड़े स्तर की हिंसा को जस्टिफाई नहीं करना चाहिए।

कोई गुटका-बीड़ी खाता है, उसका बहाना बनाकर, आप कत्ल और बलात्कार शुरू कर दें, ये तो कोई तुक, कोई तर्क हुआ ही नहीं। बेकार की बात हो गई बिलकुल।

प्र: मैंने देखा, कई लोगों को ये तर्क लगाते हुए भी कि ग़लती से हमसे मच्छर भी तो मर जाते हैं न, तो फिर अगर हम कोई जानवर....।

आचार्य: ग़लती से आपसे जो हो गया वो कोई पाप नहीं होता है। आप सो रहे थे, आपके ऊपर एक मच्छर आकर बैठ गया, आपने करवट ले ली और मच्छर दबकर मर गया; ये कहीं से हिंसा नहीं है। इसमें आपने कुछ नहीं करा है ऐसा जिसकी वजह से आपको दोषी ठहराया जाए। और ये भी समझिएगा कि ये यहाँ पर हम पेड़-पौधों को अनाप-शनाप मारने की वकालत नहीं कर रहे हैं। जहाँ तक़ हो सके पेड़-पौधों को भी नहीं मारा जाना चाहिए।

मैं तो यहाँ तक कहता हूँ जैसे अभी हम फसलें उगाते हैं, मानवता जब और ज़्यादा चैतन्य हो जाएगी, कोंशियस हो जाएगी तो खेतों की जगह बाग हुआ करेंगे, ओर्चर्ड्स। और हम अपना ज़्यादा से ज़्यादा आहार फलों से और सब्जियों से लेने की कोशिश करेंगे। वो भी सब्जियाँ ऐसी, जिसमें आपको पेड़ को या पौधे को मारना नहीं पड़ता है। उदाहरण के लिए चना हो गया, बैंगन हो गया या लौकी हो गई। इसमें आप मारते तो हो नहीं और आपको भोजन तो आपका मिल ही जाता है और तमाम तरह के फल होते हैं। पर वो बहुत आगे की बात है, बहुत दूर की बात है। अभी तो ऐसा सोचना भी बहुत यूटोपियन (काल्पनिक) लगता है कि ऐसा भी होगा क्या? तो जैसे-जैसे आपकी चेतना का स्तर बढ़ेगा, वैसे-वैसे आप पेड़-पौधों के प्रति भी और कम्पैशनेट और करुण होते जाएँगे। बिलकुल मैं उस बात से सहमत हूँ।

कोई आदमी है जो अपने लालच के लिए पेड़ काटता है, वो निश्चित रूप से हिंसा तो कर ही रहा है पर अगर वो अपने लालच के लिए भैंस या बकरा काट रहा है तो भैंस या बकरा काटना ज़्यादा बड़ी हिंसा है। हम पूरे तरीक़े से अहिंसक न हो सकते हों तो कम से कम अपनी हिंसा का स्तर तो कम करें। इतना तो करना पड़ेगा न!

इसके अलावा ये भी समझिए कि जो वेजिटेरियन या वीगन डाइट होती है, उसमें भी कोई ज़रूरी नहीं होता है कि पेड़-पौधे मारे ही जाएँ। पहली बात तो बहुत से फल और सब्जियाँ ऐसे होते हैं जिसके लिए आपको पेड़ या पौधे को मारने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। वो आपको फल दे देता है या सब्ज़ी दे देता है और पेड़ अपनी जगह खड़ा हुआ है शान से, मर नहीं गया। आपने उससे आहार भी ले लिया और पेड़ भी बचा हुआ है। तो कोई हिंसा नहीं हुई उसमें, बल्कि जो पेड़ है वो चाहता है कि आप उसके फल का सेवन करें। क्योंकि जब आप उसका फल लेते हो तो आपके माध्यम से उसका बीज दूर-दूर तक फैल जाता है और इससे पेड़ की सहायता होती है, पेड़ यही तो चाहता था। फल लगा ही इसलिए था कि कोई आकर के उस फल को ले और जब आपने फल को लिया तो उसका बीज फैल गया।

तो जब आप पेड़ से फल लेते हो तो हिंसा करना तो दूर की बात है, आपने पेड़ की सहायता कर दी है। इसी तरीक़े से बहुत सारी फसलें ऐसी होती हैं जिनकी आयु या अवधि ही पौधे की एक वर्ष की ही होती है। एक सीजन (मौसम) की ही होती है तो आप उसमे से अगर अन्न, ग्रेन नहीं भी लेंगे तो वो ऐसा नहीं है कि वो जो पौधा है वो आगे चल जाएगा और बड़ा वृक्ष बन जाएगा। उसको समाप्त हो ही जाना है क्योंकि उसकी कुल उतनी आयु है।

मैं कोई वकालत नहीं कर रहा हूँ कि आप हँसिया लेकर के फ़सल काटें और मैं कह रहा हूँ कि उसमे कोई हिंसा नहीं है। उसमें भी हिंसा है पर कम हिंसा है। मैं ये बोलने की कोशिश कर रहा हूँ। तो ये तर्क की पेड़-पौधों में भी जान होती है, यह तर्क एकदम बिना किसी क़ीमत का तर्क है, बिलकुल अज्ञान का तर्क है। जिस व्यक्ति में थोड़ी सी भी बुद्धि होगी वो ऐसा तर्क करेगा ही नहीं।

ये वही बात हुई कि कोई कहे कि भैंस क्यों काट दी तो व्यक्ति बोले क्योंकि तुमनें अमरूद खाया था। तुम अमरुद खा रहे हो और मैं भैंस खा रहा हूँ, एक ही तो बात है। ये कहाँ का तर्क है भई? और अगर भैंस और अमरूद बराबर हैं तो आदमी और भैंस एक बराबर हैं। मैं फिर बुद्धि की बात नहीं कर रहा कि आदमी और भैंस बुद्धि में एक बराबर हैं क्योंकि इस तरह का तर्क दिया जा रहा है तो आदमी और भैंस भी बुद्धि में एक ही बराबर हैं। पर जिस सिद्धांत से आप ये कहोगे कि भैंस बराबर अमरूद, फिर उसी सिद्धांत से आदमी बराबर भैंस कि भई, सबमें जान है। तो फिर आप ये कहोगे कि अगर कोई अमरूद खाता है तो हम भैंस काट देंगे, तो एक अगला व्यक्ति आकर यह भी कह सकता है कि तुम भैंस काटोगे तो मैं इंसान काट दूँगा। वही सिद्धांत आगे बढ़ जाएगा। तो ये बेकार का सिद्धांत है, इसकी हमें बात नहीं करनी चाहिए।

प्र: जी। जैसे आपने अभी कृषि की बात करी तो मैं देखता हूँ कि एक तर्क यहाँ पर भी आता है कि एक तो बात हुई कि किसी ने किसी पेड़ को काटा। एक चीज़ यह भी हुई कि जब फसलें उगाई जाती हैं तो उन फसलों की पैदावार को बढ़ाने के लिए उसमें बहुत तरह कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है, उसके अलावा छोटे-छोटे जानवर होते हैं, रोडेंट्स जो होते हैं जैसे आपके चूहे वगैरा, गिलहरी, इनको भी मारा जाता है। तो लोग कहते हैं कि देखो अगर मैं मांसाहार करता हूँ, तो मैं तो सिर्फ़ एक जानवर को मार रहा हूँ, पर तुम जो फसलें उगाते हो, तुम न जाने कितने सारे जानवरों को मारते हो अपनी फसलों को बनाने के लिए।

आचार्य: मैं इस तर्क से बिलकुल सहमत हूँ और यह बात बिलकुल ठीक है कि जिसको हम खेती कहते हैं उसमें ख़ुद ही बहुत सारी हिंसा समाहित है। मैं एकदम मानता हूँ। इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि अगर आप अपनी आबादी बढ़ा रहे हो तो अपनेआप में बहुत बड़ी हिंसा है। आबादी को बढ़ाना ही अपनेआप में वाइलेंस है। क्योंकि आप आबादी बढ़ाओगे तो खेती तो करनी पड़ेगी न? और खेती करने में ही आप पहली बात जंगल काटते हो तो जंगल में जो जीव थे उनको आपने बर्बाद कर दिया। और फिर आप साल-दर-साल कीटनाशकों का भी प्रयोग करोगे और मिट्टी में जितने दूसरे तरह के जीव-जंतु हैं, आप उनको मारोगे; तमाम तरह के बैक्टीरिया को मारोगे; कीटों को मारोगे और चूहे वगैरह को मारोगे। तो उनको तो आपको मारना पड़ेगा, उसमें हिंसा निश्चित रूप से है।

लेकिन फिर समझो, जो शाकाहारी है वो मिट्टी से अन्न उगाता है और खाता है। मैं शाकाहारी हूँ, मैंने मिट्टी से एक किलो अन्न उगाया और खा लिया। और उस एक किलो अन्न को उगाने में मान लो मैंने दस जीव मार दिए मिट्टी के, बिलकुल ऐसा होगा; केंचुएँ मार दिए, चूहे मार दिए, साँप मार दिए, कुछ ऐसे बेचारे पक्षी भी मार दिए जो आये और बैठे और पेस्टीसाइड (कीटनाशक) खाकर मर गए। वो भी होता है। मैंने ये सब कर दिया। मैं शाकाहारी आदमी हूँ। मैंने अपने लिए एक किलो अन्न उगाया और उस एक किलो अन्न को उगाने में मैंने दस जीव मार दिए।

आप मांसाहारी आदमी हो, आपको अब चाहिए अपने लिए एक किलो मांस, भूलना नहीं, मैंने कितने जीव मारे थे?

प्र: दस।

आचार्य: दस। और आप मांसाहारी हो, आपको चाहिए एक किलो मांस। वो एक किलो मांस कितने किलो अन्न से बनेगा?

प्र: शायद कुछ पंद्रह-बीस किलो अन्न से।

आचार्य: ठीक है? बीस किलो अन्न से बना। क्योंकि आप जो बकरे का एक किलो मांस खाओगे उसके लिए पहले आप बकरे को बीस किलो अन्न खिलाओगे। ये नियम है, ये मैं कोई तुक्का नहीं लगा रहा हूँ। ये एनिमल, एग्रीकल्चर का नियम होता है सीधे, सीधे।

अब एक किलो मटन के लिए आपने उसको बीस किलो अन्न खिलाया। बीस किलो अन्न उगाने में आपने कितने जीव मार दिए? एक किलो अन्न मैंने खाया था, मैं शाकाहारी हूँ, तो एक किलो अन्न में?

प्र: दस जीव मरे।

आचार्य: एक किलो अन्न में, दस जीव मरे थे और आपने एक किलो मांस खाया; एक किलो मांस के लिए बीस किलो अन्न चाहिए। तो आपने कितने जीव मार दिए?

प्र: दो सौ।

आचार्य: आपने दो सौ जीव मार दिया।

प्र: और एक वो जिसको मारा है।

आचार्य: और वो जो, जो बकरा मारा, वो तो आपने अलग ही मारा। उस बकरे के साथ आपने दो सौ और जीव मार दिए। दो सौ एक। तो ये दस बनाम दो सौ एक हो गया।

तो कोई ये कहे कि मैंने तो बकरा खाया लेकिन आपने तो अन्न खाया खेत से और अन्न उगाने में भी आपने हिंसा करी। भाई अन्न उगाने में निश्चित रूप से हिंसा है और मैं तो कह ही रहा हूँ कि इतने सारे लोग जब बढ़ जाओगे, आबादी बढ़ा लोगे तो उस आबादी का पेट पालने के लिए बड़ी हिंसा करनी पड़ती है। खेती अपनेआप में बड़ा हिंसक काम है, मैं तो कह ही रहा हूँ।

लेकिन एक तो बीमारी ये कि आपने आबादी बढ़ाई और खेती करी और उस खेती में हिंसा हो रही। और दूसरा ये कि एक तो आबादी बढ़ाई और आबादी को भी चाहिए मांस। कहते हैं — ‘एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा’। पहले तो आबादी बढ़ा ली और वो जो लोग है आबादी के, वो कह रहे हमें मांस खिलाओ, हमें मांस खिलाओ।

वो जो मांस को बनाने में बीस गुना ज़्यादा अन्न चाहिए होता है जोकि इस पूरी, जो अभी हमनें बात करी, उसके केंद्र में सिद्धांत ये है कि एक किलो मांस के लिए न जाने कितने सैकड़ों लीटर पानी चाहिए होता है; बीस-चालीस किलो अन्न चाहिए होता है; एनर्जी चाहिए होती है; लैन्ड चाहिए होता है; केमिकल्स चाहिए होते हैं।

जो मांस है उसको पैदा करना अपनेआप में बड़ा महंगा सौदा होता है। सिर्फ़ पैसा ही नहीं लगता, उसमे नेचर के सारे रिसोर्सेज लग जाते हैं। लेकिन जो मांसाहारी लोग होते हैं वो कभी इस बात की जाँच-पड़ताल नहीं करते कि वो जो एक किलो मांस है उनके सामने, उसको रखने में कितने सारे रिसोर्सेज खप गए और बेतुके तर्क़ करते हैं कि साहब आपने चावल खाया और चावल उगाने में भी तो केंचुए मरे थे न। चावल उगाने में तो केंचुआ मरा था लेकिन आप जो बकरा खा रहे हो, उसको पैदा करने में तो एक किलो की जगह बीस किलो अन्न लगा और उसके पीछे न जाने कितने जीव मरे। ये लोग, इन सीधी बातों को, सीधे गणित को समझते ही नहीं है। प्र: जी। इसके आगे मैं देखता हूँ कि एक बड़ा साधारण सी बात लगती है कि सर हम मांस खाते तो हमारे शरीर इसको पचा लेता है तो फिर दिक्क़त ही क्या है?

आचार्य: दिक्क़त ये है कि आप जानवर नहीं हो। आप हर वो चीज़ थोड़ी खा लोगे जो आपका शरीर पचा लेता है। आपका शरीर तो चोरी का माल भी पचा लेगा न? या ऐसा होगा कि आप जाकर के चोरी का खाना खा रहे तो शरीर ने नहीं पचाया? तो फिर सज़ा क्यों मिलती है? आप कह रहे हो सही और ग़लत का क्राइटेरिया यह है कि जिस चीज़ को आपके शरीर ने पचा लिया वो ग़लत कैसे हो सकती है?

प्र: हाँ।

आचार्य: आप यही तो कह रहे हो कि मैंने अभी-अभी मटन खाया और मेरे शरीर ने मटन पचा लिया। तो मटन खाना ग़लत कैसे हो सकता है? आपका शरीर तो चोरी की दाल, चोरी का चावल भी पचा लेगा। क्या वो गलत नहीं है? एक जानवर के लिए ठीक है कि वो कुछ भी ऐसा खा ले जो वो पचा ले। जानवर को कोई सज़ा नहीं मिलती कुछ भी खाने की। जानवर के लिए शर्त या नियम बस एक है कि भाई अगर तू पचा सकता है, तो तू स्वतंत्र है खा ले।

एक नियम है — पचा सकता है कि नहीं? अगर पचा सकता है तो खा ले। ठीक है न? जानवर पर सिर्फ़ यह लागू होता है। इंसान पर नहीं लागू होता क्योंकि इंसान और जानवर में एक मूलभूत अंतर है। हम चेतना के जीव हैं, जानवर सिर्फ़ एक शरीर है। हम शरीर से आगे बढ़कर चेतना हैं, कांसियसनेस हैं। तो जानवर जो काम कर सकता है और उसे कोई बुरा नहीं बोलेगा वो काम करने में, वो काम इंसान नहीं कर सकता।

इंसान के ऊपर ज़्यादा बड़ी शर्तें हैं। जानवर तो सड़क पर लेटा है; आप गाड़ी चला रहे होते हो, बीच में आकर सड़क पर कोई गधा बैठ जाता है। आप उस गधे को ताने मारते हो? आप उस गधे के लिए पुलिस बुलाते हो? आप अपनी गाड़ी बगल से निकाल लेते हो। वो गधा है सड़क पर आकर बैठ गया। लेकिन कोई इंसान अगर सड़क पर आकर बैठ जाए और यही तर्क करे कि गधे भी तो सड़क पर बैठे रहते हैं तो मैं क्यों नहीं बैठ सकता, तो वो व्यक्ति फिर गधे से भी ज़्यादा बड़ा गधा है। तो ये मांसाहार के पक्ष में तर्क दिए जाते हैं, ये गधों से बढ़कर गधेपन के तर्क हैं।

प्र: जैसे लोग कहते हैं कि देखो हमारे दाँतों को देखो, हमारी आँतों को देखो।

आचार्य: हाँ कहते हैं, “हमारे दाँत देखो, हमारी आँत देखो, हमारे पास भी तो ये इधर वाले दाँत हैं, कैनाइन्स हैं, जिससे मांस फाड़ा जाता है। हम भी और हमारी आँतें हैं, वो मांस पचा लेती हैं तो हम काहे नहीं खायेंगे?” यह गधों के तर्क हैं। गधों का तर्क किस तरीके से? मैं कोई गाली-गलौज नहीं कर रहा हूँ; गधा माने चेतनाहीन पशु। मैं उसके प्रतीक के तौर पर गधा कह रहा हूँ।

आप ये समझ ही नहीं रहे कि कुछ काम आप नहीं कर सकते क्योंकि आप चैतन्य मनुष्य हो और आपके पास बोध की क्षमता और ज़िम्मेदारी है।

जानवर वो सब कुछ खा सकता है जो वो पचा लेगा। आप वो सब कुछ नहीं खा सकते जो आप पचाओगे। आपको देखकर खाना होगा कि आप जो खा रहे हो उसमें दूसरे पर असर क्या पड़ रहा है?

आप एक बहुत बीमार आदमी हो, आप खाना खाने बैठे हो; एक बंदर आता है, आपका खाना उठा ले जाता है। क्या बंदर को आप ये कहोगे कि भगवान तुझे श्राप देगा। ऐसे बोलोगे?

प्र: नहीं।

आचार्य: “गॉड विल कर्स यू” (भगवान आपको सज़ा देगा)। आप ऐसा बोलोगे क्या बंदर को? आप बहुत बीमार थे और आप खाना लेकर बैठे थे और ग़रीब भी थे। आप बीमार हो, ग़रीब हो, आप खाना लेकर बैठे, बंदर आपका खाना लेकर चला गया। आप ये नहीं बोलोगे कि बंदर तूने अपराध किया है, तुझे पाप लगेगा। आप ऐसा नहीं बोलोगे। लेकिन कोई इंसान आकर के किसी बीमार और ग़रीब का खाना छीने तो आप कहोगे न तूने ग़लत किया?

प्र: जी।

आचार्य: शेर किसी हिरण को मारकर खा सकता है। शेर ने कुछ ग़लत नहीं कर दिया। लेकिन इंसान अगर हिरण को मारकर खा रहा है, तो इंसान ने बहुत ग़लत कर दिया।

जो नियम जानवरों का है, वो नियम इंसान पर नहीं लग सकता। और अगर कोई इन जानवरों के नियम इंसानों पर भी लगाएगा तो उस इंसान को सज़ा यह मिलेगी कि वो जानवर बन जाएगा। समझ में आ रही है बात? बंदर ने चोरी करके खा लिया, बंदर को कोई सज़ा नहीं है। शेर ने हिरण मारकर के खा लिया, शेर को भी कोई सज़ा नहीं है। लेकिन इंसान चोरी करके खाएगा तो सज़ा है। इंसान हिरण को मारेगा तो सज़ा है क्योंकि इंसान सब जानवरों से अलग है इसलिए इंसान पर नियम भी अलग लगते हैं।

और अगर आप गधे का और बंदर का और शेर का उदाहरण लेना चाहते हो भाई, तो फिर मैं कहता हूँ कि तुम गधे, बंदर और शेर जैसा ही जीवन भी क्यों नहीं व्यतीत करते? वो तो पूरी तरह प्राकृतिक जीवन जीते हैं, आपने ईट-पत्थर का घर क्यों बनाया है? आप मोबाइल क्यों इस्तेमाल करते हो? शेर तो मोबाइल नहीं इस्तेमाल करता। शेर को तो जो शेरनी मिल गई उसके साथ चल देता है। आज एक शेरनी के साथ है, कल दूसरी शेरनी के साथ है। आप क्यों कहते हो कि मेरी पत्नी मात्र मेरी पत्नी है, मेरे पड़ोसी की पत्नी नहीं है? शेर तो ब्याह नहीं करता, शेर दाँत भी नहीं माँजता। आप ये सब क्यों करते हैं? शेर के पास भाषा भी नहीं है; शेर के पास विचार भी नहीं है और बंदर के पास कोई धर्म नहीं है। और गधे के ऊपर कोई कर्तव्य नहीं है।

तो अगर आप इन जानवरों की ही दलीलें देना चाहते हो और लोग आते हैं कहते हैं, अरे! देखो बब्बर शेर को देखो, वो तो मारके खाता है तो हम भी बब्बर शेर हैं, हम भी मारके खाएँगे। तो तुम्हें अगर बब्बर शेर का ही उदाहरण देना है तो जाओ न जंगल में, जंगल में बब्बर शेर की तरह ही रहो या बस एक बात में ही तुम्हें बब्बर शेर की बराबरी करनी है कि वो मांस खाता है तो मैं भी खाऊँगा।

बब्बर शेर, मैंने कहा था एक बार, लोगों को बड़ा मजा आया, मैंने कहा, "बब्बर शेर तो चड्डी भी नहीं पहनता। तुम काहे ये पूरा चडढीबाजी और जो भी पहनते हो, पूरा ऊपर से लेकर नीचे तक़ काहे को घूम रहे? तुम भी नंगे हो जाओ बब्बर शेर की तरह।" और बब्बर शेर क़ा उदाहरण काहे दे रहे हो? गधे का दो न।

प्राकृतिक तौर पर तो सिर्फ बब्बर शेर ही नहीं जीता है; गधा भी पूरा प्राकृतिक है। तो बोलो, “मैं गधा हूँ।” और जैसे गधा, जो मन में आता है चरता है, मैं भी चरूंगा। ये बेकार के तर्क हैं। इंसान सब जीवों में सबसे बड़ा है; आकार में नहीं बड़ा है, बोध में बड़ा है इसीलिए सबसे ज़्यादा उसके ऊपर ज़िम्मेदारी है। ये सब पशु-पक्षी, ये हमारे बच्चे हैं, हम इनके गार्जियन है। हम इनके गार्जियन (अभिभावक) हैं।

इस पूरी पृथ्वी के ट्रस्टी हैं हम। ट्रस्टी समझते हैं? जिसको ज़िम्मेदारी दी गई है। जिस पर विश्वास करके, यक़ीन किया गया है कि अब ये सबकी देखभाल करेगा क्योंकि ये बड़ा है सबक। अगर पृथ्वी पूरा एक घर है — “वसुधैव कुटुम्बकम, तो मनुष्य उस घर का बड़ा है। घर का बड़ा समझते हो? जो घर में सबसे वरिष्ठ होता है।; द सीनियर ऑफ़ द फैमिली।

तो पूरी पृथ्वी अगर एक कुटुम्ब है, तो मनुष्य उस कुटुम्ब का सबसे बड़ा है, घर का बड़ा है। जो घर का बड़ा होता है, वो घर के छोटों को मारके खाएगा क्या? या घर के छोटों की रक्षा करने की उसकी ज़िम्मेदारी है?

तो हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इन पेड़-पौधों की रक्षा करें। ये सब छोटे जीव हैं। चाहे बड़े जीव हैं, हाथी हो, कोई बड़ा जीव हो। ये सब हमसे छोटे हैं। किसमे छोटे हैं?

प्र: कोंशियसनेस में।

आचार्य: चेतना में छोटे हैं। तो ये हमारे बच्चे हैं, छोटे बच्चे हैं हमारे; हमें इनकी देखभाल करनी है, हमें इन्हें मारकर नहीं खाना है। और हमारी ज़िम्मेदारी अलग है, इनकी जिम्मेदारी अलग है।

वो आपने सुना है न — ‘क्षमा बड़न को चाहिए और छोटन को उत्पात।‘ जो नियम बड़ों पर लगता है, वो छोटों पर नहीं लगता। छोटा अगर उपद्रव भी कर रहा है तो उसको क्षमा है। लेकिन जो बड़ा है, वो उपद्रव नहीं कर सकता। बड़े का काम है छोटे के उपद्रव को क्षमा कर देना।

तो मनुष्य के ऊपर जो नियम लगता है वो जानवरों पर नहीं लगता। जानवर जो करे सो करे; हमारा काम है कि हम अपनी गरिमा में जिएँ; अपने बोध, अपनी जिम्मेदारी में जिएँ। हम किसी छोटे का अगर शोषण करें तो ये कितनी गंदी और कितनी ज़लील बात है न?

आप एक जानवर को इसलिए तो मार कर खा लेते हैं न क्योंकि छोटा है आपसे। वो ताक़त में, चेतना में आपसे छोटा है, आप बुद्धि लगाकर उसे पकड़ लेते हो।

आप अपने बल का प्रयोग करके उसको काट देते हो, ये बड़ों को शोभा नहीं देता। ताक़त की पहचान यह होती है कि वो कभी छोटों पर न चलाई जाए। ताक़त की पहचान यह होती है कि वो छोटों की रक्षा करने के काम आये। जो अपनी ताक़त का इस्तेमाल छोटों को मारने के लिए, सताने के लिए करें, वो आदमी ताक़तवर नहीं है; वो कमज़ोर, कायर, बुज़दिल है। असली ताक़तवर की पहचान ये है कि कभी वो कमज़ोर पर, अपने से छोटे पर, हाथ नहीं उठाएगा, उसका शोषण नहीं करेगा।

प्र: जी, आपने जैसे एक बात कही थी कि अगर बंदर चुराकर खा लेता है तो उसे कोई पाप नहीं लगता है, उसे कुछ ग़लत नहीं होता। पर इंसान यदि ऐसा करे तो वो बात ग़लत है। जैसे ये सही-ग़लत की आप बात करते हैं तो सुनने में ऐसा लगता है जैसे एक जो सामाजिक हमारे ऊपर सही-ग़लत का एक जो पैमाना डाल रखा है, आप उसकी बात कर रहे हैं या फिर कोई और सही ग़लत की बात ?

आचार्य: मैं धर्म की बात कर रहा हूँ। और मैं जब धर्म कह रहा हूँ तो मैं किसी पंथ विशेष की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं किसी रिलिजन , किसी समुदाय, किसी सेक्ट, पंथ या मज़हब की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं धर्म मात्र की बात कर रहा हूँ। रिलिजिओसिटी इटसेल्फ , द वेरी एसेंस ऑफ रिलीजियसनेस। मैं विशुद्ध अध्यात्म की बात कर रहा हूँ, जब मैं सही ग़लत कह रहा हूँ तो मैं किसी सामाजिक नियम, कायदे-क़ानून से नहीं कह रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ कि यह आपका दिल है। आप इन्सान पैदा हुए हो और आपके पास चेतना है। उसके नाते आपका एक कर्तव्य बनता है; हिंदू होने के नाते भी नहीं, मुस्लिम होने के नाते भी नहीं, इंसान होने के नाते। इंसान होने के नाते।

आपने जो बात कही, गार्जियनशिप वाली, ट्रस्टीशिप वाली, उसी से जुड़ा हुआ मैंने देखा है कि कई-कई धार्मिक ग्रंथ हैं जो ऐसा कहते हैं कि जैसे भगवान ने बकरे के लिए घास बनाई, वैसे ही इंसान के लिए बकरे को बनाया।

आचार्य: नहीं-नहीं, ये अगर कहा भी जा रहा है तो इसका सही अर्थ समझना पड़ेगा। कहा जा रहा है कि ऊपर वाले ने बकरे के लिए घास बनाई है और वैसे ही इंसान के लिए बकरा बनाया है।

इंसान के लिए बकरा बनाया है इस अर्थ में, कि इंसान उस बकरे की रक्षा करे। ऐसे नहीं कि इंसान उस बकरे का भक्षण करे। रक्षण करना है उसका, भक्षण नहीं करना है।

तो यह भी कहना कि इंसान ने वो बकरा मेरे लिए बनाया है, तुम्हारे-मेरे खाने के लिए बनाया है। तुम सिर्फ़ एक बहुत बड़ा पेट हो क्या? मैं तुमसे कोई बोलूँ कि ये चीज़ तुम्हारे लिए है तो तुम तुरंत उसको खाना शुरू कर दोगे? तुम अगर ये बोलोगे कि इंसान ने बकरा; कि भगवान ने, ऊपर वाले ने, गॉड ने, ख़ुदा ने, बकरा बनाया है इंसान के लिए। तो उसने बोल दिया अच्छा ठीक है ऊपर वाले ने बकरा इंसान के लिए बनाया है।

तो जब भी तुम्हें बोला जाता है कोई चीज़ तुम्हारे लिए है, तुम उसे खाना शुरू कर देते हो? तुम्हारे सामने कुछ भी रखा जाएगा; मैं तुम्हारे लिए जूते लेकर आऊँ एक जोड़ी और मैं कहूँ कि मैं तुम्हारे लिए जूते लेकर आया हूँ, तो तुम जूता खाना शुरू कर दोगे क्या? मैं तुम्हारे लिए मोबाइल लेकर आया हूँ; मैं कहूँ कि तुम्हारे लिए मोबाइल लेकर आया हूँ तो तुम मोबाइल चबाना शुरू कर दोगे? अरे! तुम समझो तो कि वो किस अर्थ में तुम्हारे लिए है?

पूरी प्रकृति निश्चित रूप से मनुष्य के लिए है। किस अर्थ में? चबाने के अर्थ में नहीं। किस अर्थ में पूरी प्रकृति — बकरा हो, पेड़ हो, नदी हो, पहाड़ हो, पूरी प्रकृति मनुष्य के लिए है। पर किस अर्थ में है? भोग के अर्थ में नहीं है; कनसम्पशन के अर्थ में नहीं। इस अर्थ में है कि मनुष्य बॉनडेज (बंधन) में है; बंधन में है। और प्रकृति से सही सम्बन्ध रखकर के ही उसे अपनी बॉनडेज से लिबरेशन (मुक्ति) मिल सकता है।

ये सब कुछ मेरे लिए है, ताक़ी मैं इसको देखूँ, समझूँ, इसका अवलोकन करूँ, इसको ओब्जर्व करूँ और इसके ऑब्जर्वेशन और अंडरस्टैंडिंग के माध्यम से मुझे लिबरेशन मिले। इस अर्थ में पूरी प्रकृति इस पुरुष के लिए है। पुरुष माने कांशियसनेस , चेतना। ये पूरी प्रकृति है इस पुरुष के लिए है ताक़ी इस प्रकृति के माध्यम से पुरुष को मुक्ति मिल सके। प्रकृति माध्यम बनती है इस पुरुष की मुक्ति का। पुरुष माने मेल नहीं, पुरुष माने कांशियसनेस। तो प्रकृति माध्यम बनती है चेतना की मुक्ति का। इस अर्थ में प्रकृति मेरे लिए है।

प्रकृति मेरे चबाने के लिए थोड़े ही है। कोई बोले कि ये पहाड़ तुम्हारे लिए हैं तो मैंने जाकर पहाड़ काट दिए। जो ही चीज़ मेरे लिए है, उसे काट दूँगा? ये कौन सा मन है? ये किस तरीक़े की सोच है कि अगर कुछ मेरे लिए है तो मैं उसे खा जाऊँगा? पागलपने की बात है।

ऐसे तो मैं आपको लाकर के दूँ — बेटा ये लो, ये मैं आपके लिए नया दोस्त लाया हूँ।

अच्छा, दोस्त मेरे लिए है! लाओ मैं दोस्त को ही चबा जाऊँगा।

अरे! सबकुछ आपके लिए है दोस्त की तरह। चबाने के लिए नहीं है आप। चबाने का काम जानवरों का है। इंसान भी चबाता है, लेकिन इंसान के लिए चबाना बहुत छोटी चीज़ है। इंसान के लिए ज़्यादा बड़ी चीज़ क्या है? सोच, बोध, करुणा, कम्पैशन — वो इंसान के लिए बड़ी चीज़ है; पेट बाद में आता है। कोई इंसान हाईयर आइडियल्स (ऊँचे आदर्शो) के लिए जान नहीं देता।

आपने कभी सुना है कि जानवर ने ऊँचे आदर्शों के लिए प्राण दे दिए हैं। ऐसा कभी सुना है? ऐसा नहीं होता क्योंकि जानवर के लिए उसका पेट ही सब कुछ होता है। उसको जहाँ पेट भर रहा होगा, वो उधर चला जाता है। इन्सान ऐसा होता है जो इतने दिन भूखा रहेगा लेकिन ऊँचे आदर्श के लिए दृढ़ रहेगा, डटा रहेगा। और ऐसे उदाहरण हमें हर धर्म में मिलते हैं। कौन सा ऐसा धर्म है जिसमे ये उदाहरण नहीं है कि लोगो ने भूखे रहकर सच्चाई की लड़ाई न लड़ी हो?

चाहे कोई भी आप बात कर लीजिये। अभी हम बक़रीद के संदर्भ में बात कर रहे हैं तो मुझे इस्लाम से क़र्बला की याद आती है। भूखे रहकर लड़ा जा रहा है, क्यों? क्योंकि पेट छोटी चीज़ है। पेट से बहुत ऊपर कुछ और होता है। और उसकी ख़ातिर हम पेट को दर-किनार कर सकते हैं। यही वह सिद्धांत है जो हमें याद रखना है।

प्र: जी। इसमें मैं एक चीज़ और देखता हूँ। जैसे आपने अभी बात कही थी कि इंसान सबसे बड़ा है क्योंकि इंसान की चेतना बाक़ी सबसे, बाक़ी सभी जीवों से बड़ी है। मैं देखता हूँ लोग इसमें दूसरा तर्क लगाते हैं। लोग बात करते हैं, फूड चेन की कि देखो जंगल का नियम तो यही है कि छोटे जानवर को बड़ा जानवर खाता है।

आचार्य: जंगल का नियम इंसान पर नहीं लागू होता भाई। आप जंगल से कब के बाहर आ गए। आप अगर अभी जंगली ही होते तो आपको धर्म क्यों मिलता? जंगल में किसी जानवर के पास धर्म होता है क्या?

प्र: नहीं।

आचार्य: तो जो लोग अपने धार्मिक पूर्वाग्रहों, अपने रिलीजियस बाएसेस और बीलीफ़्स की रक्षा के लिए कहते हैं कि जंगल में तो फूड चेन चलती है, मैं उनसे कह रहा हूँ, जंगल में रिलीजन नहीं चलता। तो तुम रिलीजन का नाम क्यों ले रहे हो फिर? अगर तुम्हें जंगल की ही दुहाई और दलील देनी है तो रिलीजन को फिर एक तरफ़ रखो न। जंगल में किसके पास रिलीजन होता है? शेर के पास, बंदर के पास, किसके पास होता है?

रिलीजन का मतलब ये है कि अब तुम्हारे लिए जंगल से बड़ा कुछ और हो गया है। जंगल से जिसके लिए कुछ और बड़ा हो गया, वो व्यक्ति अब धार्मिक हो गया। धर्म का काम ही है आपको जंगल से बाहर खींचकर लाना। तो जंगल के नियमों की दुहाई मत दिया करो। फूड चेन और यह सब। यह बात कीड़े-मकौड़ों पर लागू होती है, इंसान पर नहीं लागू होती। इंसान को देखना होगा कि वो किस तरीके से ज़्यादा से ज़्यादा जीवों की रक्षा कर सके। वी आर द गार्जियंस , हम बाप है। ये पूरी पृथ्वी हमारी ट्रस्टीशिप में है। हमें सब की रक्षा करनी है। हम यहाँ पर बुद्धि और बल लेकर इसलिए नहीं आये हैं कि यहाँ सबका नाश कर देंगे। वो बड़ा ग़लत तरीका है इस पृथ्वी को देखने का कि मैं सबसे ज्यादा बुद्धि वाला और होशियार हूँ, तो इसीलिए मैं सबको पकड़ कर खा जाऊँगा; सबका एक्सप्लोएटेशन करूँगा; यह कितना गंदा तरीक़ा है पृथ्वी को देखने का। आप बाप हो सबके, आपके सब बच्चे हैं छोटे-छोटे। आपको इनकी परवरिश करनी है और उनकी परवरिश करने में ही आपका अपना भी कल्याण है।

प्रकृति से सही सम्बन्ध रखने में ही चेतना का भी कल्याण है।

प्र: जी। मुझे इस चीज़ से एक चीज़ याद आ रही है कि लोग पुरुषार्थ की बहुत बात करते हैं। लोग अपने सपनों को पूरा करने की बहुत बात करते हैं। पर इस तरह से कभी पुरुषार्थ को नहीं देखा जाता कि आप गार्जियनशिप में हो।

आचार्य: पुरुषार्थ का मतलब ही यही होता है कि आप एक वाइडर रेस्पोंसिबिलिटी (व्यापक ज़िम्मेदारी) स्वीकार करो। अपने लिए तो हर कीट-पतंगा जी रहा है भाई। अपने लिए, माने अपने पेट के लिए; अपनी प्रजाति को आगे बढ़ाने के लिए; अपने लिए कोई नर या मादा खोजने के लिए। तो सब, ये सब जी रहे हैं। इंसान वो है जो अपने से आगे का भी कोई दायित्व स्वीकार कर पाए, उसको इंसान बोलते हैं। सिर्फ़ अपने लिए जी रहा है, वो काहे का इंसान?

प्र: जी। अब जो मेरे सामने कुछ तर्क आये थे वो थोड़े जो थे साइंस की तरफ बढ़ रहे थे। तो उसमें सबसे पहली बात यह आती है कि सर देखिये अगर हम लोग मांसाहार नहीं करेंगे तो बी-ट्वेल्व हमें कहाँ से मिलेगा? जो विटामिन बी-ट्वेल्व होता है।

आचार्य: कहाँ से ढूँढकर लाते हैं ये तर्क? अच्छा! तो तुम बी-ट्वेल्व के लिए मांसाहार करते हो भाई? बी-ट्वेल्व का तर्क दे रहे हैं अभी। तो आप बी-ट्वेल्व के लिए मांसाहार करते हो। मांस खरीदने कहाँ जाते हो? दुकान में। तो दुकान में जाकर मांस खरीदते हो ताक़ी बी-ट्वेल्व मिले तो तुम दुकान में जाकर सीधे बी-ट्वेल्व ही क्यों नहीं खरीद लेते? भाई, अगर बी-ट्वेल्व ही चाहिए तो बी-ट्वेल्व के लिए मांस क्यों खरीद रहे हो? दुकान ही तो जा रहे हो न मांस खरीदने? जैसे दुकान में मांस खरीदते हो, वैसे ही बगल की दुकान से बी-ट्वेल्व खरीद लो। ऑर्गेनिकली मैनुफेक्चर्ड बी-ट्वेल्व मिलता है बाजार में।

प्र: मिलता है, प्लांट बेस्ड होता है।

आचार्य: प्लांट बेस्ड , एकदम शुद्ध, शाकाहारी, वीगन बी-ट्वेल्व मिलता है बाज़ार में, बहुत सस्ता मिलता है। मांस की अपेक्षा बहुत सस्ता है। तुम पाँच सौ रूपए का मांस खरीदोगे, उसमें तुम्हें इतना सा बी-ट्वेल्व मिलेगा। तुम पचास रूपए का बी-ट्वेल्व ही खरीद लो, इतना सारा। बहुत सारा बी ट्वेल्व मिल जाएगा। उसके लिए मांस खाने की क्या ज़रूरत है? ले तो दोनो ही चीजें तुम दुकान से रहे हो। आउटपुट तो दोनो ही किसी फैक्ट्री का है। मांस भी किसी ऑर्गेनाइज्ड कॉर्पोरेट स्लॉटर हाउस से ही आ रहा है। और जो बी-ट्वेल्व की तुम्हें बोतल मिलेगी, गोलियाँ, वो भी किसी फैक्ट्री से आ रही हैं। जब फैक्ट्री का ही आउटपुट खरीदना है तो सीधे बी-ट्वेल्व खरीद लो न। मांस काहे को खरीद रहे हो जी?

प्र: रादर (इसकी अपेकषा), मैं इसके विषय में ख़ुद भी थोड़ा पढ़ रहा था। मुझे एक चीज़ समझ में आई थी कि बी-ट्वेल्व जो होता है वो ऐसा तो है नहीं, कोई जानवर अपने शरीर के अन्दर बना रहा है। मिलता सभी को पेड़-पौधों से है।

आचार्य: मांस में नहीं होता बी-ट्वेल्व। मिट्टी में होता है बी-ट्वेल्व। मिट्टी में और जानवर जब घास वगैरह खाते हैं, घास; तो घास में मिटटी होती है जड़ में, तो घास के साथ मिट्टी भी उनके पेट में चली जाती है। और उसी मिट्टी में बी-ट्वेल्व है। तो वो फिर उनके शरीर में आ जाता है। तो आप सोचने लग जाते हो कि बी-ट्वेल्व तो मांस में होता है। मांस में नहीं मिट्टी में होता है। और इंसान को भी पहले बी-ट्वेल्व की अतिरिक्त ज़रूरत नहीं पड़ती थी क्योंकि हम भी सीधे-सीधे पेड़ से लगा फल खा लिया; ज़मीन से उखाड़कर कर हमनें सब्जियाँ, कंदमूल, ये सब खा लिए। तो बी-ट्वेल्व हमें भी सीधे मिल जाता था। लेकिन अब हम बहुत ज़्यादा सफ़ाई वाले लोग हो गए हैं। तो हम तब तक रगड़ते हैं अपने फलों को और सब्जियों को जब तक धूल का, मिटटी का आखिरी कण भी साफ़ न हो जाए। तो अब हमें बी-ट्वेल्व नहीं मिल पा रहा है। बी-ट्वेल्व अच्छे से समझ लें लोग, मांस में नहीं मिट्टी में है। और जाकर के बिलकुल वीगन बी-ट्वेल्व आता है और काफ़ी सस्ता आता है। मांस की जगह सीधे बी-ट्वेल्व ही खरीद लो भाई। बच्चे से लेकर के बूढ़े तक़, सब घर में कुछ-न-कुछ सप्लीमेंट्स (अनुपूरक) ले ही रहे होते हैं। अच्छी चीज़ होती हैं। कोई विटामिन-डी ले रहा है; कोई कैल्शियम ले रहा है; बी-ट्वेल्व भी ले लो, क्या दिक्क़त है?

मांस दुकान पर खरीदो, उससे अच्छा बी-ट्वेल्व ही दुकान पर खरीद लो।

प्र: जी। अब इसके बाद जो अगली चीज़ आती है वो यह आती है कि आचार्य जी, अगर सभी लोग आपकी बात सुनकर शाकाहारी हो गए तो पृथ्वी पर तो सारे-के-सारे जो पेड़ नष्ट हो जाएँगे, कुछ बचेगा ही नहीं। तो ये जो पृथ्वी है, यह आठ-सौ करोड़ और कहते हैं जितने हज़ार करोड़ इंसान जो पूरे होने वाले हैं, ऐसे शाकाहारी लोगों को केसे संभालेगी?

आचार्य: इसकी बात मैं न जाने कितनी बार पहले कर चुका हूँ। लेकिन फिर भी मैं धैर्य रखते हुए फिर से दोहराऊँगा। एक मांसाहारी आदमी को ज़िंदा रखने के लिए पचास गुना ज़्यादा पेड़ चाहिए। एक मांसाहारी आदमी को ज़िंदा रखने के लिए पचास गुना ज़्यादा पेड़ चाहिए होते हैं। अगर एक शाकाहारी आदमी के लिए एक पेड़ लगता है; लगता है माने कटता है, इस्तेमाल होता है, तो एक मांसाहारी आदमी के लिए पचास पेड़ कटते हैं क्योंकि मांस आता है अन्न से, ग्रेन से या घास से। और वो घास कहाँ से आएगी? किसी खेत से आएगी न। वो खेत कहाँ से आएगा? उस खेत के लिए जंगल काटना पड़ता है।

खेत जमीन मांगता है न? खेत, जमीन होगी तो ही तो खेती होगी। घास हो, चाहे अन्न हो, जो भी हो, उसके लिए जंगल कटता है। तो यह कहना कि सब शाकाहारी हो गए तो पेड़ कट जाएँगे, जंगल कट जायेंगे, पागलपन की बात है।

जंगल तो कट रहे हैं मांसाहारियों की वज़ह से और मांसाहारियों को ये बात पता भी नहीं है। कि तुम जब मांसाहार करते हो तो तुमने कितने पेड़ कटवा दिए। जंगल के जंगल साफ़ हुए हैं मांसाहार की वज़ह से।

पृथ्वी पर जितना अन्न उगाया जाता है, उसमें से सत्तर-अस्सी प्रतिशत जानवरों को खिलाया जाता है ताक़ी बाद में आप उन जानवरों का मांस खा सको। माने पृथ्वी के जितने क्षेत्र में, एरिया में खेती हो रही है, उसके सत्तर-प्रतिशत मांसाहारियों के लिए खेती हो रही है। वो अन्न इंसान कभी नहीं खाता। वो अन्न जानवर खाता है ताक़ी आप उस जानवर का मांस खा सको। यह बात लोग बहुत चौकाने वाली लगेगी। लोग जानते ही नहीं है क्योंकि हम कभी ध्यान ही नहीं देते कि हमारी प्लेट पर जो मांस रखा हुआ है वो मांस कितना ज़्यादा महंगा है; वो प्रकृति और पर्यावरण की हत्या करके आ रहा है बिलकुल। और उसमे जो छुपी हुई कोस्ट्स हैं, हमें पता ही नहीं होती। और अभी मैं हेल्थ कास्ट वगैरा की तो बात ही नहीं कर रहा। इंवायरमेंटल कॉस्ट की बात करनी शुरू की है और आगे जाएगी, अभी दूर तक़।

प्र: जी, मेरे पास कुछ डेटा है जो मैंने ख़ुद रिसर्च करी हुई है इसमें, आपके सामने रखना चाहूँगा। ये कहा जाता है कि जो एक मीट इटर है उसकी जो डाइट है उसके लिए सेवेंटीन टाइम्स ज्यादा लैंड चाहिए; सत्रह गुना उसके लिए ज़मीन चाहिए; चौदह गुना उसके लिए पानी चाहिए।

आचार्य: ये भाई, ये सब बातें न, जब ये वीडियो पब्लिश करना तो स्क्रीन पर बड़ा-बड़ा लिख देना ये सबकुछ ताक़ी लोगों के दिमाग़ पर डेटा छप जाएँ। क्या फिर से बोलिए। सत्रह गुना ज़्यादा लैंड चाहिए?

प्र: एक मांसाहारी को।

आचार्य: एक मांसाहारी को ज़िंदा रखने के लिए सत्रह गुना ज़्यादा ज़मीन चाहिए, एक शाकाहारी की अपेक्षा। इतना ज़्यादा मेहनत लगती है और इतना खर्चा होता है और इतना मुश्किल और महंगा काम है एक मांसाहारी आदमी को ज़िंदा रखना; सत्रह गुना ज़्यादा ज़मीन चाहिए।

प्र: चौदह गुना ज़्यादा पानी चाहिए।

आचार्य: चौदह गुना ज़्यादा पानी चाहिए क्योंकि मांस बनाने में पानी बहुत लगता है। मैं पकाने की बात नहीं कर रहा हूँ। आप एक बकरा या भैंसा बड़ा कर रहे हो काटने के लिए; सोचो तो, पाँच सौ किलो का जानवर बड़ा करने में कितना पानी लगाओगे, तब वो जानवर खड़ा हुआ। फिर आप उस जानवर को काटोगे और फिर उसका आप मांस खा लोगे और आपको पता भी नहीं लगेगा कि कितना खर्चा हुआ है उसको खाकर इतने दिनों में?

प्र: और जो फ़सल उसने खाई है उसको उगाने में भी तो पानी लगा होगा?

आचार्य: उस फ़सल को उगाने में पानी लगा होगा।

प्र: जी। और दस गुना ज़्यादा एनर्जी चाहिए होती है।

आचार्य: ज़्यादा एनर्जी चाहिए होती है और हमारा जो विश्व है उसमें एनर्जी की भी कमी है; उसमें पानी की भी कमी है; उसमे लैन्ड की भी कमी है; उसमे फोरेस्ट की भी कमी है; उसमें क्लिन एयर (शुद्ध वायु) की भी कमी है। हर वो चीज़ जिसकी दुनिया में कमी है, वही वो चीज़ है जो ज़्यादा से ज़्यादा खपती है, एक मांसाहारी आदमी को मांस खिलाने में।

प्र: और मैं इसमें एक चीज़ जोड़ना चाहूँगा कि जो भी मैंने डेटा अभी बताया है, यह अमेरिकन जनरल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रीशन , वहाँ से आ रहा है।

आचार्य: ये आप स्क्रीन पर लिख दीजिएगा। नहीं तो लोग कहेंगे कि डेटा यूँही हवा से उठा लाए हैं।

प्र: जी, जी। इसके आगे एक हावर्ड के प्रोफेसर हैं मेडिसिन के, डॉक्टर वाल्ट विलेट। तो उनका कहना है कि जो दुनिया में हम हंगर की प्रॉब्लम (भूख कि समस्या) की बात करते हैं, वो सॉल्व (हल) की जा सकती है फोर्टी मिलियन टन्स ऑफ फूड से।

आचार्य: माने हम, एक मिनट, लोगों के लिए बता दूँ। माने दुनिया में जो भूखे लोग हैं, सबका पेट भरा जा सकता है बस अगर चालीस मिलियन टन खाद्यान्न, फूड और अतिरिक्त हमें मिल जाए।

प्र: मिल जाए।

आचार्य: दुनिया की सारी भूख शांत की जा सकती है बस अतिरिक्त चालीस मिलियन टन खाद्यान्न से।

प्र: लेकिन फिर भी इस वक्त हम सात सौ साठ मिलियन टन जो अनाज है, वो जानवर को खिलाते हैं।

आचार्य: तो सात सौ साठ मिलियन टन अनाज हम जानवर को खिला रहे है और दुनिया की सारी भूख शांत की जा सकती थी सिर्फ चालीस मिलियन टन अनाज से। तो सोचो कि एक मांसाहारी आदमी कितने लोगों को भूखा रखने का गुनहगार है। सात सौ साठ मिलियन टन अनाज हम उन जानवरों को खिला रहे हैं जिनका मांस फिर मांसाहारी लोग खाएँगे और दुनिया की सारी भूख, छोटे-छोटे बच्चे भूखे हैं या कुपोषण के शिकार हैं, मैलन्यूट्रीशन। उन सबको पर्याप्त भोजन और पोषण दिया जा सकता था सिर्फ़ चालीस मिलियन टन खाद्यान्न, फूड से, ग्रेन से। लेकिन उसके लगभग बीस गुना, हम जानवरों को खिला रहे हैं, सात सौ साठ मिलियन टन। ये बात आप सब लोग अपने बिलकुल मन में छप जाने दीजिए।

प्र: साथ में ये बात तो सभी लोग जानते हैं कि जो मांसाहार होता है, उसके शरीर पर भी बहुत सारे एडवर्स इफेक्ट्स होते हैं; हार्ट डिसीजेज हैं, डायबिटीज है, बहुत सारी चीजें हैं जो उससे क्लोजलि रिलेटेड (बारीकी से संबंधित) है। तो उसी के विषय में एक डेटा है कि यदि दुनिया वीगन डाइट की तरफ़ बढ़े, शुद्ध शाकाहार की ओर बढ़े, तो हम पाएँगे कि एट प्वाइंट वन मिलियन डेथ्स पर इयर और कम होंगी। एट प्वाइंट वन मिलियन का मतलब हो गया अस्सी लाख, इक्यास्सी लाख मौतों की हम बात कर रहे हैं, जो हर साल और कम होंगे।

आगे वो कह रहे हैं कि जो पैसा हम लोग खर्च करते हैं हेल्थ केयर पर या अनपेड केयर पर या जो बीमारी की वज़ह से लोग काम नहीं कर पाते, उसमें सात सौ से एक हज़ार बिलियन डॉलर पर ईयर का हम बचत कर सकते हैं।

आचार्य: एक-एक करके डेटा बताइए नहीं तो वो मिस (गुम) हो जाएगा। सबसे पहले तो यह कि इक्यास्सी लाख लोग प्रतिवर्ष?

प्र: कम मरेंगे।

आचार्य: कम मरेंगे। प्रतिवर्ष इतनी जानें बचाई जा सकती है सिर्फ़ मांसाहार छोड़कर कर।

प्र: जी आचार्य: मांसाहार इक्यासी लाख मौतों का या मैं कहूँ हत्याओं का गुनहगार है। इक्यासी लाख मौतें हो रही हैं सिर्फ़ इसलिए क्योंकि हमें मांस खाना है और ये सिर्फ़ डायरेक्ट डेथ्स हैं। इसमें भी हमनें यह नहीं गिना है कि मांसाहार की वज़ह से जिन लोगों को खाने को अन्न भी नहीं मिला, वो कितने मरे। ये सिर्फ़ डायरेक्ट डेथ्स हैं। उनको भी जोड़ दोगे तो करोड़ो लोग और जुड़ जाएँगे जो मर रहे हैं, सिर्फ़ मांसाहार की वजह से।

और अगली बात क्या बोली?

प्र: अगली बात यह कि जो हम लोग पैसा बचा सकते हैं एक तरह से कि जो हमें हेल्थ केयर में हमें खर्च करना पड़ता है और जो अनपेड केयर होती है या जो हम लोग वर्किंग डेज़ का जो लॉस होता है, बीमारी की वजह से, उसमें सात सौ से एक हज़ार बिलियन डॉलर पर इयर (हर साल) बचाए जा सकते हैं यदि लोग...।

आचार्य: एक हज़ार बिलियन डॉलर प्रति वर्ष खर्च होता है सिर्फ मांसाहारियों को स्वास्थ्य सेवाएँ देने में। जिसमें जो मेडिकल कॉस्ट है वो आती है और अनपेड केयर आती है। अनपेड केयर ये होती है कि आप बीमार हो और घर में आपका बेटा या आपका पति या पत्नी आपकी सेवा-सुश्रुषा में लगा हुआ है।

एक हज़ार बिलियन डॉलर कितना होता है, इसके लिए आप ये समझ लो कि भारत की कुल अर्थव्यवस्था ही अभी तीन हज़ार बिलियन डॉलर की है। तीन हज़ार बिलियन डॉलर की हमारी अर्थव्यवस्था है और दुनिया की अर्थव्यवस्था में एक हज़ार बिलियन डॉलर। सोचिए कितना बड़ा ये एक आंकड़ा है। इतना बचाया जा सकता है, अगर सिर्फ़ हम अपनी मांस की हवस को क़ाबू में कर लें।

ग़रीबी सोचिए कितनी कम होगी। हम ग़रीबी का रोना रोते हैं। एक बात आप अच्छे से पकड़िएगा — दुनिया की ग़रीबी के बड़े-से-बड़े कारणों में मांसाहार है। दुनिया की ग़रीबी के बड़े-से-बड़े कारणों में मांसाहार है।

प्र: किस तरह से?

आचार्य: इन्वायरमेंटल डैमेज, मेडिकल डैमेज, सब-ऑप्टिमल यूटिलाइजेशन ऑफ रिसोर्सेज, डायरेक्ट इकॉनामिक डैमेज। (पर्यावरणीय क्षति, चिकित्सा क्षति, आर्थिक क्षति को प्रत्यक्ष करने के लिए संसाधनों का इष्टतम से कम उपयोग)।

इनको सबको मिला दो तो आप पाओगे कि दुनिया के जीडीपी का एक काफ़ी बड़ा हिस्सा सिर्फ़ जा रहा है मांसाहार की सर्विसिंग में। आप खोजोगे तो उसके आंकड़े भी आपको मिल जाएँगे। उदाहरण के लिए मांसाहार से क्लाइमेट चेंज (पर्यावरण बदलाव) होता है। क्लाइमेट चेंज का सबसे बड़ा या नंबर दो का सबसे बड़ा कारण मांसाहार है। ये भी बात लोगों को नहीं पता होती है। और क्लाइमेट चेंज से हम जानते हैं कितने हज़ार बिलियन डॉलर का विश्व की अर्थ व्यवस्था को नुकसान होता है।

तो गरीबी फैल रही है उससे कि नहीं फैल रही है? मांसाहार ग़रीबी का बहुत बड़ा कारण है। और उस पर तुर्रा ये की लोग कहते हैं साहब मांसाहार तो इकोनॉमी को बूस्ट (बढ़ोत्तरी) देता है न! लोग कहते हैं कि मांसाहार इकोनॉमिक एक्टिविटी है; इससे लोगों के घर चलते हैं।

साहब, घर नहीं चलते, ग़रीबी फैल रही है। मांसाहार बंद कराइए, अगर आपको ग़रीबी हटानी है तो। और ये बात मैं कोई काल्पनिक तौर पर नहीं बोल रहा हूँ; थोड़ी रिसर्च कर लीजिये तो आपको यह बात समझ में आएगी। मांसाहार ग़रीबी का बहुत बड़ा कारण है। आपको इतना तो दिखता है कि आपने मांस का कंजम्प्शन (भोग) या एक्सपोर्ट (निर्यात) कर दिया तो उससे आपको कितने का मुनाफ़ा होगा? उदाहरण के लिए जो भारतीय मांस उद्योग है वो लगभग पचास बिलियन डॉलर का है?

प्र: जी।

आचार्य: वो लगभग पचास बिलियन डॉलर का है। उसमें आप मान लो अगर दस प्रतिशत मार्जिन है तो उसमें पाँच बिलियन डॉलर का आपको लाभ हो गया, उसकी तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था, पिछले ही साल सिर्फ़ जो क्लाइमेट चेंज रिलेटेड इवेंट्स थे, उनके कारण लगभग डेढ़ सौ बिलियन डॉलर का घाटा सही थी। अब कर लो तुलना। क्लाइमेट चेंज में तीस से चालीस प्रतिशत योगदान मांसाहार का होता है। मांसाहार और डेरी माने, एनिमल फार्मिंग का। मांसाहार और डेयरी, ये मिलकर क्लाइमेट चेंज के लगभग एक तिहाई के लिए उत्तरदायी होते हैं; वन बाई थ्री इसी से आता है। बाक़ी अन्य कारणों से आता है — ट्रांसपोर्टेशन और फॉसिल।

तो अगर क्लाइमेट चेंज की वज़ह से भारतीय अर्थव्यवस्था ने डेढ़ सौ बिलियन डॉलर का घाटा सहा है तो उसमें से मांसाहार की वज़ह से कितना हुआ? एक तिहाई, पचास बिलियन डॉलर। पचास बिलियन डॉलर का हमनें घाटा सहा है मांसाहार की वज़ह से। और मांसाहार से हमें कुल इकॉनामिक लाभ भी कितना हुआ है? पाँच बिलियन डॉलर।

तो जो लोग ये तर्क दिया करते हैं कि मांसाहार से तो अर्थव्यवस्था में पैसा आता है न, वो पागल हैं। अगर मांसाहार से अर्थव्यवस्था में एक रुपया आता है तो दस रुपए का नुकसान होता है। और ये अभी हमनें सिर्फ़ क्लाइमेट चेंज रिलेटेड लॉस की बात करी है। अभी हमनें मेडिकल लॉसेस की बात नहीं करी है। आपको अगर मांसाहार की कुल कॉस्ट नापनी है तो आपको इन्वायरमेंटल कॉस्ट नापनी पड़ेगी, आपको हेल्थ कॉस्ट नापनी पड़ेगी और इकोनोमी में जो सब-ऑप्टिमल डिस्ट्रीब्यूशन यूटिलाइजेशन ऑफ रिसोर्सेज हो रहा है, आपको उसकी कॉस्ट नापनी पड़ेगी। तब आपको पता चलेगा कि मांसाहार से अर्थव्यवस्था को कितना भारी नुक़सान होता है। भारत को ग़रीब बनाये रखने में मांसाहार का रोल बढ़ता ही जा रहा है। ये जो हम एक्सपोर्ट करते हैं न, हम सोचते हैं कि एक्सपोर्ट करने से हमें रेवेन्यू मिल रही है, लगातार हम मांस एक्सपोर्ट कर रहे हैं एक्सपोर्ट कर रहे हैं, अब तो सरकार चाहती है कि हम ज़िंदा जानवरों को एक्सपोर्ट करें।

और हम पिंक रिवोल्यूशन माने मांस और ब्लू रिवोल्यूशन माने मछली, हम ये सब करते ही जा रहे हैं। और अपनी छोटी बुद्धि से हमको लग रहा है कि ये सब करके हमें मुनाफ़ा मिल रहा है। आपको मुनाफ़ा नहीं मिल रहा है। एक रुपया जो आप कमाते हो मांस के माध्यम से, चाहे कंजम्शन , चाहे एक्सपोर्ट , उसके एवज में आप दस रुपए गँवाते हो। लेकिन ये सीधा-साधा अर्थशास्त्र न हमारे लोगों को समझ में आ रहा है, न हमारी सरकारों को स्पष्ट हो रहा है। गरीबी हटानी है तो मांसाहार हटाना पड़ेगा। मांसाहार बड़े से बड़ा कारण है।

प्र: मैं इसी में एक चीज़ देख रहा था जैसे आपने भी बात करी क्लाइमेट चेंज की वज़ह से जो इकॉनमिक लॉस हो रहा है, मैंने इसके बारे में भी थोड़ा डेटा निकाला था तो एक न्यूयॉर्क टाइम्स का ही आर्टिकल था जहाँ यह बात की गई थी कि अभी दो हज़ार इक्कीस से ही यह शुरू हो चुका है कि जो ग्लोबल क्लाइमेट चेंज है उसका इम्पैक्ट (असर) जो है ग्लोबल इकॉनोमी में पड़ना शुरू हो गया है जो कि ग्यारह से चौदह प्रतिशत है और कहा जा रहा है...।

आचार्य: ग्यारह से चौदह प्रतिशत किस चीज़ का?

प्र: जो पूरा जीडीपी है, टोटल जीडीपी।

आचार्य: दुनिया के जीडीपी का ग्यारह से चौदह प्रतिशत कम होना शुरू हो चुका है सिर्फ़ क्लाइमेट चेंज के कारण। यह बात भी ज़रा यहाँ पर अंकित हो जाने दीजिये, छपने दीजिये।

ग्लोबल इकोनॉमी का ग्यारह से चौदह प्रतिशत। तो भारत की अगर आप मोटा-मोटा मान लो तीन-साढ़े तीन ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी मानो आप तो आपने कितना लूज करना शुरू कर दिया है? कम से कम तीन सौ बिलियन डॉलर। तीन सौ बिलियन डॉलर क्लाइमेट चेंज से नुकसान होना प्रतिवर्ष शुरू हो चुका है।

ग़रीबी समझिए और क्लाइमेट चेंज का शायद सबसे बड़ा कारण मांसाहार है। ये बात भी अच्छे से दिमाग में लाइए। आप क्लाइमेट एक्टिविज्म की बात करते हैं, आप ग्लोबल वार्मिंग, ग्लोबल वार्मिंग चिल्लाते हैं। आप वेदर क्लाइमेट पैटर्न चेंज हो रहे हैं, ये सब बातें आप करते हैं; तेज गर्मी-जाड़ा हो गए; अरे! बिन मौसम बरसात हो गई, ये सब हो गया; ये हीट वेव अचानक कहाँ से आ गई; इतनी ठंड कैसे, ये सब आप कहते हो हो रहा है; उसका बहुत बड़ा कारण मांसाहार है।

ये बात मीडिया आपके सामने नहीं ला रहा है। ये बात एजुकेशन में भी हमें बताई नहीं जा रही। सब बातें छुपाई जा रही हैं। क्यों छुपाई जा रही हैं? क्योंकि सरकारों का भी स्वार्थ है और ऑर्गेनाइज्ड जो स्लाटर हाउसेस है, मीट इंडस्ट्री है, प्रोसेस्ड फूड इंडस्ट्री है और डेरी इंडस्ट्री है — इन सब का बहुत बड़ा स्वार्थ है आपसे सच्चाई छुपाने में। ये आपको बता नहीं रहे हैं कि भारत की और विश्व की दुर्दशा में और ग़रीबी में हर तरीक़े की ये जो पूरा एनिमल प्रोडक्ट कंजम्शन है, चाहे वो दूध हो, चाहे वो मांस हो, चाहे वो फर इत्यादि हो, कितना बड़ा।

प्र: जी। जैसे आपने अभी डेटा एक तरह से न बताने वाली बात करी तो मुझे एक चीज़ याद आ रही है। अभी मैं कुछ समय पहले ही पढ़ रहा था कि जो क्लाइमेट चेंज से रिलेटेड रिसर्च पेपर्स होते हैं, उसमें एशिया पैसिफिक का कॉन्ट्रिब्यूशन मात्र दो प्रति प्रतिशत है। तो आप यह पाएंगे कि जो मेजर डेटा हमें मिलता है वो बाहर की एजेंसी से मिलता है कि किस तरह से क्लाइमेट चेंज इफेक्ट कर रहा है भारत से...।

आचार्य: रिसर्च पेपर का दो प्रतिशत बोला कोई ये न सोचे कि एशिया पेसिफिक का क्लाइमेट चेंज में कांट्रिब्यूशन दो पर्सेंट है। वो ये कह रहे हैं कि अगर सौ रिसर्च पेपर छपते हैं तो ये जो पूरा एशिया प्रशांत क्षेत्र है माने जिसमें एशिया के देश आ गए और ये ऑस्ट्रेलिया वगैरा सब आ गए। इसमें से सिर्फ़ दो रिसर्च पेपर छपते हैं, माने इन जगहों पर रिसर्च ही नहीं करी जा रही है।

क्लाइमेट चेंज हमें बर्बाद करे दे रहा है और क्लाइमेट चेंज का बड़े से बड़ा कारण मांसाहार है। ये बात भी हमको अमेरिका और यूरोप वाले बता रहे हैं। भारत जैसे देशों में इस बात पर रिसर्च ही नहीं हो रही है। न तो प्राइवेट यूनिवर्सिटीज में हो रही है और न ही सरकारी संस्थानों में हो रही है, जैसे सरकार का अपना कोई इसमें स्वार्थ हो कि ये डेटा छुपाओ। बल्कि सरकारें, एक के बाद एक, भारत में सरकारें आ रही हैं, वो लगातार ऐसी नीतियाँ बना रही हैं कि भारत पूरे विश्व का कसाईखाना बन जाएँ — इंडिया एज द स्लॉटर हाउस ऑफ द वर्ल्ड।

सरकारें, पूरी दुनिया से कह रही हैं बताओ तुमको कौन सा मांस खाना है, हम भारत में काटकर के आगे आपको एक्सपोर्ट करेंगे। कैसे हो सकता है कि भारत जहाँ पर हिंदुइज्म, सिखिज्म, जैनिज्म, बुद्धिज्म है, जो यहाँ पर सबसे जो बड़े धर्म हैं वो लगातार अहिंसा की बात करते हैं, करुणा की बात करते हैं, वो दुनिया का सबसे बड़ा बीफ एक्सपोर्टर बन गया। ये कैसे हो सकता है?

ये कुछ नहीं है, यह पैसे की हवस है और परिणामों के प्रति अज्ञान है। हम नहीं जानते कि पैसे की हवस हमें कितनी महँगी पड़ रही है। इससे हमारी चेतना तो गिर ही रही है, पैसा भी मिल नही रहा है, उल्टे हम और ग़रीब हो रहे हैं।

प्र: जी। अभी कुछ पिछले दिनों से यह बात बड़ी न्यूज में आ गई है कि जो सब्जियों के दाम हैं वो कितने बढ़ गए हैं, देखो। पर कोई भी और बात इशारा ही नहीं कर रहा है कि सब्ज़ियों के दाम बढ़े हैं ये जितने भी एक्स्ट्रीम वेदर इवेंट्स आते हैं, बारिश ज़्यादा हो गई, कभी धूप ज्यादा पड़ गई, फसल ख़राब हो गई।

आचार्य: ये जो एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स आ रहे है, मैं लोगों को समझाने के लिए बोलता हूँ — उदाहरण के लिए गेहूँ की फसल है या अभी गर्मियों में बहुत ज़ोर से बारिश हो गई है; आम ख़राब हो गया; आम महँगा आ रहा है। आम आदमी ख़ैर आम से इतना नहीं प्रभावित होता। आम आदमी को अब ज़्यादा फ़र्क पड़ता है टमाटर, प्याज, आलू से और गेहूँ, चावल, इनसे ज़्यादा फ़र्क पड़ता है। इन सबके दाम बढ़ते क्यों हैं? इन सबके दाम बढ़ते हैं क्लाइमेट चेंज से। बिना मौसम बारिश हो गई है, बारिश हुई ही नहीं या एक्स्ट्रीम हीट हो गई या जहाँ पाला नहीं पड़ना था, वहाँ पाला पड़ गया है। इससे फसलें तबाह होती हैं। और ये जो एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स होते हैं ये क्यों होते हैं? क्लाइमेट चेंज से तो क्लाइमेट चेंज किससे होता है? क्लाइमेट चेंज एक तो होता ही है जो आप फोसिल फ्यूल्स का उत्सर्जन करते हो, जिसमें आपका ट्रांसपोर्टेशन शामिल है, इलेक्ट्रिसिटी जनरेशन , पुल, फायर, पावर प्लांट शामिल हैं। उन सबके बाद या उन सबके पैरलल उन्हीं सबके बराबर जो क्लाइमेट चेंज होता है वो होता है एनिमल फार्मिंग से। जो हम जानवरों को बड़ा करते हैं, दूध-दही, लस्सी के लिए या मांस के लिए, वहाँ से आता है।

तो वो जो मांसाहारी है, उसकी जो मांस की लत है उसकी वज़ह से सब्जियों के दाम बढ़ रहे हैं। पर जिस बेचारी गृहणी के किचन पर सबसे ज़्यादा चोट पड़ रही है, क्योंकि सब्जियों के दाम बढ़ गए, फलों के दाम बढ़ गए, ग्रेन्स, अन्न के दाम बढ़ गए, वो ये कभी समझ ही नहीं पाती है कि वो स्वयं तो शाकाहारी है, लेकिन उसकी रसोई में खाने को इसलिए नहीं है क्योंकि पडोसी को मांस खाना है।

ये जो मांसाहारी आदमी है ये अपने लिए तो अभिशाप है ही, यह पूरे समाज के ऊपर एक बोझ होता है। और ये बात मैं स्परिचुअल एंगल से नहीं इकॉनोमिक एंगल से बोल रहा हूँ, ये समझिएगा।

प्र: जी। इसी में जो मैं अभी बात कर रहे थे कि किस तरह से जो ग्लोबल जीडीपी है वो अभी से कम होना शुरू हो गया है। उसका आगे का प्रोजेक्शन यह है कि दो हज़ार पचास तक़ जो ग्लोबल जीडीपी है, वो एनुअली तेइस ट्रिलियन डॉलर से घट जाएगा।

आचार्य: तेइस ट्रिलियन डॉलर का नुकसान ग्लोबल जीडीपी को। ठीक है? समझो। भारत की आबादी दुनिया की आबादी की लगभग सोलह प्रतिशत है अभी, एक बटा छः। दुनिया की आठ सौ करोड़ है, भारत की एक सौ चालीस करोड़ है। मोटा-मोटा एक बटा छः का है तो सोलह प्रतिशत अभी है। सोलह प्रतिशत भारत की आबादी है दुनिया की और दुनिया के कुल जीडीपी का चार-पाँच प्रतिशत जीडीपी अभी भारत का है। दो हज़ार पचास तक़ मान लो कि दुनिया का आठ-दस प्रतिशत जीडीपी भारत से आएगा। दो हज़ार पचास तक़ आठ-दस प्रतिशत जीडीपी भारत से आएगा और तेइस ट्रिलियन डॉलर का नुक़सान हो रहा है ग्लोबल जीडीपी को। तो भारत की जीडीपी को कितना नुक़सान होगा? आठ-दस प्रतिशत दुनिया की जीडीपी भारत से आ रहा है; तेइस ट्रिलियन डॉलर दुनिया की जीडीपी का नुक़सान है। तो भारत का भी करीब दो ट्रिलियन डॉलर का तो नुकसान हो गया है; दो ट्रिलियन डॉलर का।

दो ट्रिलियन डॉलर समझते हो कितना होता है? भारत के वर्तमान जीडीपी का साठ-सत्तर प्रतिशत। हम इतनी करारी इकॉनमिक चोट झेलने वाले हैं क्लाइमेट चेंज की वज़ह से और क्लाइमेट चेंज और मांसाहार आपस में बिलकुल जुडी हुई बातें हैं, भूलना नहीं।

मांसाहार से ज़्यादा अगर मैं रिस्पांसिबल मानता हूँ क्लाइमेट चेंज को तो एक ही चीज़ है, पॉपुलेशन (आबादी)। क्योंकि क्लाइमेट चेंज आता है कंजम्शन से और कंजम्शन करने के लिए कंज्यूमर चाहिए। और कंज्यूमर आता है जब इंसान बच्चा पैदा करता है। समझ में आ रही यह बात? हम इतने बड़े ज्वालामुखी के मुँह पर खड़े हुए हैं, हमें नहीं बात समझ में आ रही है।

जब कोई कहता है जानवरों को मत मारो तो हमको लगता है — अरे! ये तो बस यूँही कोई मोरल सी, नैतिक सी, बात कर रहे हैं। वो मोरल और नैतिक बात ही नहीं है, वो उससे आगे बढ़कर के एक आर्थिक, इकॉनोमिक बात भी है। कम से कम जो उसके पीछे का इकॉनमिक आर्गूमेंट है, मेरे भाई, वो तो समझो।

प्र: जी। इसी चीज़ पर मैंने एक चीज़ और पढ़ी है। कई लोगों का कहना ये भी होता है कि जो एक क्लाइमेट चेंज की हम बात कर रहे, जो हम कैटेस्ट्राफ (तबाही) की बात कर रहे हैं, यह कोई पहली बार तो हो नही रहा है। पृथ्वी पर यही केटेस्ट्राफ तो बहुत बार हुआ है। अब एक बार फिर हो रहा है।

आचार्य: अरे भाई! पहले जब भी हुआ है इंसान के कारण नहीं हुआ है। इस बार वो कहलाता है एजीडब्ल्यू, एंथ्रोपोजैनिक ग्लोबल वार्मिंग सिर्फ़ जीडब्लू नहीं होता, एजीडब्लू होता है। एंथ्रोपोजैनिक माने? इंसान के कारण होने वाली। पहले पाँच मास एक्सटिंक्शन (सामूहिक विनाश) हो चुके हैं। उन पाँच मांस एक्सटिंक्शन में से तीन उसी कारण से हुए थे जिस कारण से ये जो छठा मास एक्सटिंक्शन है, ये चल रहा है। वो क्या कारण है? पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों की अधिकता है। उस अधिकता के कारण पहले पाँच बार पृथ्वी से जीवन पूरा नष्ट हो चुका है, पूरा का पूरा। पहले पाँच बार ऐसा हो चुका है।

इस बार अलग बात यह है कि इस बार वो प्रकृति के कारण नहीं हो रहा है; प्राकृतिक संयोगिक कारणों से नहीं हो रहा है; इस बार इंसान के कारण हो रहा है। इस बार जो वातावरण में कार्बन एक्स्ट्रा , अतिरिक्त हुआ है वो इंसान ने किया है। और दूसरी बात, पहले जब पाँच बार हुआ था तब इंसान था ही नहीं। इसलिए वो जो पाँच बार था वो अलग था क्योंकि तब इंसान था ही नहीं।

इस बार जो कहते हैं न कि अरे! पहले भी तो पाँच बार हो चुका है, छठी बार हो जाएगा तो क्या हो जाएगा? छठी बार में बेटा अंतर ये है कि इस बार घर भी तुम्हारा है और सर भी तुम्हारा है। तुम कह रहे हो कि पहले भी तो घर गिरते रहे हैं न। आचार्य जी, पहले भी तो घर गिरते रहे हैं, एक बार और घर गिर जायेगा तो कौन सा कहर टूट पड़ेगा? इस बार अंतर यह है कि इस बार घर भी तुम्हारा है और सर भी तुम्हारा है। और ये बात तुम्हें समझ में नहीं आ रही है या अपने जबान के स्वार्थ के कारण तुम समझना नहीं चाह रहे हो। यहाँ से(ऊपर कि ओर दिखाते हुए) छत टूटकर तुम्हारे सर पर गिरने वाली है, घर भी तुम्हारा, सर भी तुम्हारा और तुम मुझसे तर्क ये कर रहे हो कि पहले भी तो पाँच बार एक्सटिंक्शन हो गया इस बार होगा तो क्या होगा?

प्र: कहीं न कहीं वो कहना ये चाह रहे होते हैं कि इंसान की गतिविधि की वज़ह से नहीं हो रहा है, वो तो बस प्रकृति की, अपनी एक चक्कर है।

आचार्य: यह बात निर्विवाद रूप से सिद्ध हो चुकी है कि इस बार जो हो रहा है वो ह्यूमन एक्टिविटी के कारण हो रहा है, एंथ्रोपोजैनिक।

प्र: जी। इसी चीज़ पर मैंने काफ़ी, काफ़ी लोगों को ये देखा है कि वो अपने जीवन से उदाहरण देते हैं। लोग कहते हैं कि देखिये जो मेरे दादाजी थे, उनको मैंने देखा था। वो तो मांस भी खाते थे। पिच्चानवे साल की उम्र तक़ जिए भी और बढ़िया उनका जीवन था। तो क्या दिक्क़त है मांसाहार में?

आचार्य: पढ़े-लिखे आदमी की पहचान यह होती है कि वो कॉन्क्लूजन कभी सेंपल साइज इज ईक्वल टू वन से नहीं ड्रा करता। एक आदमी को देखकर के कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता; निष्कर्ष निकाला जाता है एक बड़ा सैंपल लेकर के। आप पूरी पॉपुलेशन नहीं ले सकते तो सैंपल तो बड़ा लीजिए न?

भई, आज़ादी के समय भारत में जो औसत आयु थी किसी व्यक्ति की, वो तीस साल भी नहीं थी। भारत का आम आदमी तीस साल भी नहीं जी रहा था आज़ादी के समय। लेकिन उस समय भी किसी के दादाजी रहे होंगे जो सौ साल के रहे होंगे। तो वो अपने दादाजी को लेकर के क्या ये बोलेगा कि उन्नीस सौ चालीस के दशक में भारतीय लोग सौ-सौ साल जिया करते थे। भाई, तुम्हारे दादाजी जी गए होंगे, थोड़ा सेम्पल बड़ा करो तो पता चलेगा कि औसत आदमी तीस साल भी नहीं जी रहा था। प्र: जी। आचार्य: उस समय भारत में साक्षरता दर, जब भारत आज़ाद हुआ था दस प्रतिशत भी नहीं थे। हाँ, अब किसी के दादाजी हो सकता है पीएचडी रहे हैं उस वक्त भी। तो अपने दादाजी को देखकर बोलेगा कि भारत आज़ाद हुआ था तो भारत में सब पीएचडी थे। भाई, थोड़ा बड़ा सैम्पल लो। ये बेकार के तर्क होते है कि मेरे दादाजी ने तो ज़िंदगी भर सिर्फ़ मुर्गा चबाया और उसके बाद भी दादाजी हष्टपुष्ट थे और सौ साल जिए दादाजी। अगर सचमुच ही इतने बढ़िया व्यक्ति होते तो उनके पोता जी इस तरह के कुतर्क कैसे कर रहे होते? दादाजी ने अपने पोता जी को कुछ सिखाया होता न?

अब एक थोड़ा अलग तरह का तर्क। कई लोग हैं जो मैं देख रहा था, कमेंट्स में लिख रहे थे कि सर मैं हूँ एथीस्ट और मुझे धर्म वगैरा से कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता। और मुझे ये बात समझ नहीं आती कि मेरी प्लेट में क्या रखा है? उससे किसी और को दिक्क़त क्यों होती है?

आचार्य: तुम एथीस्ट हो; तुम्हें धर्म से फ़र्क नहीं पड़ता; तुम्हारी प्लेट में क्या रखा है, उससे किसी को क्या दिक्कत है? जैसे प्लेट तुम्हारी है और प्लेट में जो रखा वो तुम्हारा है, वैसे ही मान लो गाड़ी तुम्हारी है। तुम कहो, ‘मेरी गाड़ी है, वो मैंने सड़क के बीच में आगे खड़ी कर दी।‘ वही जैसे गधा सड़क के बीच में बैठा करता है, वैसे ही मैंने सड़क के बीच में ले आकर अपनी गाडी खडी कर दी; मेरी गाड़ी है, किसी को क्या फ़र्क पड़ता है? मेरी गाड़ी है, मैंने सड़क के बीच में खड़ी कर दी, किसी को क्या फ़र्क पड़ता है? भाई, तुम अपनी गाड़ी कहाँ खड़ी कर रहे हो यह सिर्फ़ तुम्हारा निजी मामला नहीं है न। उससे और लोगों पर असर पड़ रहा है।

मैंने अपने घर में बिलकुल गंदा एग्जॉस्ट फेंकने वाला डीजल जेनरेटर लगवा लिया है।

वो जो आज से चालीस साल पहले की टेक्नोलॉजी वाला जो भारत में अभी भी चला करता है, मैंने अपने घर में वो डीजल जनरेटर रखवा लिया। अब वो आवाज़ करता है बिलकुल ख़तरनाक। जो शादियों में देखे हैं जनरेटर, भड़-भड़-भड़-भड़ और वो एकदम काला धुँआ मारता है और मैंने अपने घर में लगवा लिया है। मेरी बाउंड्री के भीतर, मैंने जेनरेटर लगवा लिया है। फिर मैं कह रहा, “हूँ मेरा घर है, मेरा जनरेटर है। किसी को क्या फ़र्क पड़ता है?” भाई साहब, वो जो आपने लगवाया है न, उसका असर मेरे पर पड़ रहा है, पड़ रहा है; तुम जो वो हवा गंदी कर रहे हो, वो हवा मेरे लिए भी गंदी हो रही है; तुम जो आवाज पैदा कर रहे हो, वो आवाज़ मेरे कानों में भी जा रही है।

इसी तरीक़े से तुम अगर मांस खा रहे हो तो तुम्हारा पर्सनल चॉइस नहीं है। तुम नहीं कह सकते यह मेरा निजी मामला है, व्यक्तिगत मामला है, इट्स ए मैटर ऑफ माई पर्सनल लिबर्टी एंड चोइस कि वाट्स देयर ऑन माई प्लेट। सॉरी, इनवैलिड आर्ग्यूमेंट, वेरी इनवैलिड आर्गूमेंट। आप क्या खा रहे हो वो आपका निजी मसला नहीं है। आप जो खा रहे हो उससे पूरे समाज पर, पूरी मानवता पर, डायरेक्ट, डायरेक्ट, टेंजिबल (मूर्त) असर पड़ता है। तो यू आर रेस्पोंसिबल टुवर्ड्स एंटायर कम्यूनिटी, सोसाइटी आलसो द फ्यूचर ऑफ मैनकाइंड।

तो आप रेस्पोंसिबल होकर सोचिए कि आपने अपनी प्लेट में क्या रखा हुआ है खाने के लिए। आप जो रख रहे हो वहाँ पर, उसकी क्लाइमेट कॉस्ट है। उसकी इकॉनमिक कॉस्ट है। उसकी हर तरीक़े से हानिप्रद प्रभाव है समाज के ऊपर। नोट योर पर्सनल मैटर।

प्र: जी। इसी बात से एक चीज़ याद आ रही है कि एक समय तक फ्लाइट के अन्दर सिगरेट पीना भी अलाउड होता था। पर इस बात को देखा गया कि पैसिव स्मोकिंग का आपके आस-पास कोई धुम्रपान कर रहा है तो उस स्मोक का आपके लंग्स पर भी फ़र्क पड़ता है। तो एक क़ानून बनाना पड़ा कि अब आप पब्लिक प्लेस में स्मोक नहीं कर सकते।

आचार्य: बिलकुल।

प्र: अब एक और तर्क है, कहूँ कुतर्क है कि कहते हैं कि आचार्य जी देखिये, आप दूध के बारे में भी बताते हैं, किस तरह से उसका दुष्प्रभाव होता है? तो लोग जो है उसकी जगह पर वीगन मिल्क प्रमोट करते हैं। और उसमें से एक होता है सोया मिल्क। अब ये जो सोया मिल्क है यह भी तो सोये से आ रहा है। जब ये सोये से है तो इसके लिए भी फिर जंगल कटेंगे। सोयाबीन उगाया जायेगा तो बात तो फिर वहीं आ गई।

आचार्य: ये तर्क बहुत पढ़े-लिखे लोग भी दे रहे होते हैं। कहते हैं कि वीगन मिल्क मान लो सोय से आता है, नारियल से आता है, आलमंड से आता है। तो उसके लिए सोय भी तो उगाना पड़ेगा न? तो जैसे आप कहते हो की मांसाहारियों के लिए जंगल कटता है, वैसे ही वीगन लोगों के लिए भी जंगल कटेगा। इन लोगो की जानकारी के लिए छोटा सा तथ्य कि दुनिया भर में जितना सोय उगाया जाता है, उसमें से कितना? पिच्चानवे प्रतिशत?

प्र: पिच्चानवे प्रतिशत।

आचार्य: पिच्चानवे प्रतिशत जानवरों को खिलाया जाता है मांसाहार के लिए। वीगन आदमी तो सोय का इतना सा हिस्सा इस्तेमाल करता है। लेकिन आप जो भैंसा खाते हो और सुअर, बीफ, पोर्क, चिकन, मटन, वहाँ पर लगता है सोय, मोटी तादाद में।

देखिए, जब पिछली बात हो रही थी तो हमनें एक आँकड़ा दिया था कि अगर ये पूरी दुनिया ही शुद्ध शाकाहारी हो जाए, वीगन हो जाए, उसे मैं शुद्ध शाकाहार बोलता हूँ। क्योंकि जो आम शाकाहारी आदमी है वो दूध भी ले रहा है और दूध तो न पेड़ से आता है, न पौधे से आता है, तो दूध शाकाहार कहाँ से हो गया?

तो वो शाकाहार नहीं है। शुद्ध शाकाहार तो तभी है जब आप किसी भी प्रकार के पशु उत्पाद का इस्तेमाल बंद कर दें। जिसमें दूध, दही, लस्सी सब भी हटे। तो अगर पूरी दुनिया शुद्ध शाकाहारी हो जाए तो आज खेती के लिए जितनी ज़मीन लग रही है उससे बस एक चौथाई ज़मीन में काम चल जाएगा। आज खेती के लिए जितनी ज़मीन लगती है उससे सिर्फ़ एक चौथाई ज़मीन और एक चौथाई संसाधन में पूरी दुनिया पेट भरकर मज़े से खाएगी, पौष्टिक खाना खाएगी, अगर पूरी दुनिया वीगन हो जाए तो।

अभी, जो भी उगाया जाता है वो आपके लिए नहीं, मांस के लिए उगाया जाता है। ये अच्छे से समझिएगा।

प्र: साथ ही में जब मैं इसके बारे में थोड़ी रिसर्च कर रहा था तो मुझे कुछ बड़े अच्छे से ग्राफ मिले जो मैं चाहूँगा कि टीम उनको जो स्क्रीन पर भी दिखाएँ।

किस तरह से जो डेरी मिल्क होता है, जो हमें दूध मिलता है गाय-भैंस से और उसके अलावा जो सोया मिल्क होता है, ओट मिल्क होता है, आलमंड मिल्क होता है, इनका ज़मीन पर क्या फ़र्क पड़ता है? इनसे जो उत्सर्जन होता है उससे क्या फ़र्क पड़ता है? और उनसे पानी कितना ज़्यादा यूज (इस्तेमाल) होता है, उसका एक कम्पैरिजन है जो मैं चाहूँगा कि स्क्रीन पर दिखाया जाए। मेरे पास जो कुतर्कों की पूरी लिस्ट थी वो शायद ख़त्म हो चुकी है। पर मैं चाहूँगा कि फिर भी आख़िरी में आप क्या कहना चाहेंगे लोगों से?

आचार्य: सबसे बड़ा कुतर्क तो बदनीयती होती है। सबसे बड़ा कुतर्क तो इंसान के भीतर का शैतान है। हमनें आज जितनी बात कर ली है, कुछ नहीं तो तीन-चार दर्जन वार्ताएँ होंगी जो मैं कर चुका हूँ। आप लोगों से कर चुका हूँ, और जगहों पर जाकर चुका हूँ, जो सब एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट हैं उनसे कर चुका हूँ, वीगन ग्रुप से उनसे कर चुका हूँ।

प्र: आपकी दो किताबें हैं इसके ऊपर।

आचार्य: दो किताबें पूरी-पूरी छाप चुके हैं हम इसी मुद्दे पर। उसके बाद भी हम जितनी बातें कह रहे हैं, कोई इन सारी बातों को ख़ारिज कर सकता है; आख़िरी तर्क का नाम होता है बदनीयती। और मैं कितना भी समझा लूँ, बदनीयति का कोई इलाज़ नहीं होता। बदनीयती का तो इलाज़ सिर्फ़ आध्यात्मिक जागरण होता है। जब तक़ यहाँ(दिल की ओर इशारा) करुणा नहीं आएगी, तब तक़ आप मांसाहार छोड़ोगे नहीं।

तो मैं इन सारे तर्कों के बावजूद समझता हूँ कि मांस तो उसी का छूटता है जो थोड़ा ख़ुद को समझने लगता है; जिसके भीतर थोड़ी नमी आती है, थोड़ी आर्द्रता आती है। जो भीतर से थोड़ा कोमल हो जाता है, वही होता है फिर जो जगत के प्रति एक मैत्री का भाव रख पाता है; थोड़ी करुणा रख पाता है।

तो बस वही बात है। अल्टीमेटली द सॉल्यूशन लाइज ऑन स्प्रिचुअल अवेयरनेस।

जो व्यक्ति आध्यात्मिक नहीं है, जो सिर्फ़ मोरैलिटी या एथिक्स के कारण रेशनल एथिक्स के कारण कह रहा है कि मैं शाकाहारी होऊँगा, उसका शाकाहार आमतौर पर बहुत दूर तक़ जाता नहीं है। कोई स्थिति दूसरी पलटेगी और वो शाकाहार अपना छोड़ देता है।

वास्तव में तो शाकाहारी वही हो पाता है जो कहता है कि कुछ भी हो जाएँ, मुझे किसी दूसरे को नहीं सताना तो नहीं सताना। मैं भूखा मरना पसंद करूँगा बजाय इसके कि मैं अपना पेट किसी के मांस से, किसी की आह से भरूँ।

तो आख़िरी तर्क बस वो होता है — भली नीयत कि आप कह दो कि भूखा मरना बेहतर है पर ये मेरे सामने खड़ा हुआ है, नन्हा जीव है, इसको मारके तो नहीं खाऊँगा। मरता हूँ, मैं मर जाऊँ, उसको नहीं मारूँगा। बस ये आख़िरी बात है।

प्र: जी। धन्यवाद आचार्य जी।

Have you benefited from Acharya Prashant's teachings?
Only through your contribution will this mission move forward.
Donate to spread the light
View All Articles