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क्या त्यागा था बुद्ध ने? दुनिया ऐसी क्यों? || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता मन में एक विचार भी आता है कि ये पलायनवाद तो नहीं होगा। जैसे एक बार मैं ओशो को सुन रहा था तो उन्होंने भी कहा था कि बुद्ध ने कुछ छोड़ा तो वो राजा थे इसलिए छोड़ा। उन्होंने भोगा था, फिर छोड़ा। तुमने कुछ भी अर्जित नहीं किया है संसार में तो तुम छोड़ोगे क्या। छोड़ने के लिए भी तो कुछ होना चाहिए।

आचार्य प्रशांत: ग़लत और बहुत व्यर्थ का तर्क है यह, जिसने भी दिया हो, फ़र्क नहीं पड़ता। बुद्ध ने संपदा नहीं छोड़ी थी, बुद्ध ने दुख छोड़ा था। जिसको जहाँ दुख होगा वो उसको छोड़ेगा। संपदा में भी दुख हो सकता है, ज्ञान में भी दुख हो सकता है, सत्ता में दुख हो सकता है, ताक़त में दुख हो सकता है। और जैसे अमीरी में दुख हो सकता है वैसे ग़रीबी में भी दुख हो सकता है।

तो ऐसा नहीं है कि कोई भी दुनिया में ऐसा है जो अर्जित करे न बैठा हो, अर्जित तो सभी ने कर रखा है। वृत्ति का काम ही है अर्जन। किसी की वृत्ति अर्जित करती है धन और किसी की वृत्ति अर्जित करती है निर्धनता। और तुम जो कुछ अर्जित करोगे तुम उसी में दुख पाओगे। तो ऐसा नहीं है कि बुद्ध ने अर्जित करा था और दुख पाया, तुमने तो अभी कुछ अर्जित ही नहीं करा है। कौन कहता है तुमने कुछ अर्जित नहीं करा? तुम अभी एक बात कर रहे हो न, तुमने अर्जित कर तो रखी है। ये धारणा है तो, ये धारणा तुमने अर्जित कर रखी है ।

बल्कि बुद्ध ने नहीं कुछ अर्जित किया था, उनको तो जो मिली थी वो पैतृक संपदा थी, उन्होंने क्या अर्जित करा था? बुद्ध ने तो जीवन में एक ढे़ला नहीं कमाया था। क्या अर्जित करा था उन्होंने? पर बुद्ध को भी कुछ मिला हुआ था न, क्या? राज वैभव मिला हुआ था, महल मिला हुआ था, ठाठ मिले हुए थे। कमाया नहीं था, पर मिला हुआ था। वैसे ही तुम्हारे पास भी बहुत कुछ है जो तुमने अर्जित नहीं करा है, पर तुम्हें मिला हुआ है, जैसे कि ये धारणा जिस पर आधारित तुमने प्रश्न पूछ लिया।

तो हम सभी के पास कुछ-न-कुछ है ज़रूर, वो हमारा नहीं है, वो बाहर से आया है। हम सभी के पास कुछ-न-कुछ है ज़रूर जो हमारा नहीं है, आया बाहर से ही है, पर हमने उसे अपना मान लिया है। और हम उससे दुख पाते हैं। चूँकि हम उससे दुख पाते हैं इसीलिए उसका त्याग आवश्यक हो जाता है। त्याग किसका करोगे? जो तुम्हारे लिए आनंद रूप हो उसका तो त्याग करोगे नहीं। त्याग उसी का तो करोगे न जो दुख देता हो। कुछ था बुद्ध के जीवन में जो उन्हें दुख देता था, बुद्ध उसे छोड़कर आगे बढ़ गये, ये कौनसा पलायन है भाई? इसको कोई पलायन क्यों कहे?

मैं इस कुर्सी पर बैठा था, ये मुझे तकलीफ़ दे रही थी, मैं खड़ा हो गया था, अभी आप लोगों के सामने ही। तो बोल दो कि आचार्य जी तो पलायनवादी हैं, कुर्सी से पलायन कर गये। क्यों न करूँ पलायन? जहाँ मुझे तकलीफ़ है, वहाँ रहने के लिए क्या विवशता है, कि है विवशता कोई? तो ये बेकार का तर्क है कि जहाँ हो वहीं रहो। क्यों रहो? यह इतनी बड़ी दुनिया किसलिए है? ये इतनी बड़ी दुनिया किसलिए है अगर तुमको एक छोटे से बिल में ही घुस कर रहना है तो?

पर ये बात मन को सुहाती है, जो कर रहे हो करते रहो, दुकान में ही बैठे-बैठे आध्यात्मिक हो जाओ। आदमी को बड़ा अच्छा लगता है, चलो दुकान बची। बाक़ी सब संत-महात्मा तो बता गये हैं कि त्याग करना पड़ेगा। अब कोई आये और बता दे कि नहीं, कुछ छोड़ना नहीं पड़ेगा, जो कर रहे हो वही करते रहो। फ्राइड चिकन (भुना/तला हुआ मुर्गा) का धंधा चला रहे, चलाते रहो, उसके साथ ही अध्यात्म भी हो जाएगा। तो आदमी को बड़ा सुकून मिलता है, कहता है ये मिले असली गुरुवर, उन्होंने कहा फ्राइड चिकन का धंधा भी चलता रहेगा और मुक्ति भी मिल जाएगी। दोनों हाथों में लड्डू और सिर कड़ाही में, मज़ा ही आ गया बिलकुल।

तुम्हारी दुकान चले-न-चले, गुरुदेव की पूरी चल रही है। जहाँ उन्होंने शिक्षा बाँटी कि जो कर रहे हो करते रहो और साथ में ध्यान कर लो थोड़ा सा तो मुक्ति भी पा जाओगे, कि बस पूछो मत।

और मैंने फ्राइड चिकन का उदाहरण लिया है, यह मत सोचना कि सिर्फ़ कसाई के काम में ही बर्बरता है, अधिकांश व्यवसाय कसाई के ही व्यवसाय हैं। बस फ्राइड चिकन के धंधे में हत्या साफ़ दिखाई पड़ती है, बाक़ी धंधों में हत्या दिखाई नहीं पड़ती। पर धंधे तो नब्बे प्रतिशत ऐसे ही हैं जो हिंसा पर आधारित हैं, किसी के शोषण पर आधारित हैं।

तो ये कहना कि जो दुकान चला रहे हो चलाते रहो और साथ ही थोड़ा भजन-कीर्तन कर लो, थोड़ा ध्यान कर लो, फ़लानी विधि लगा लो तो मुक्ति पा जाओगे, यह बात न सिर्फ़ झूठ से भरी हुई है बल्कि कुटिलता से भरी हुई है। नहीं, ऐसा नहीं हो सकता कि तुम्हारी ज़िंदगी जैसी है, वैसी बनी भी रहे और साथ-ही-साथ तुम्हें मुक्ति भी मिल जाए। बिलकुल झूठ बात है।

प्र: आचार्य जी, इतने वर्षों से गुरु भी हैं, उपनिषद् भी है, सत्य भी है और सत्य बलवान भी कहा जाता है। तो उसके बावजूद ऐसा क्यों होता है कि नब्बे प्रतिशत जो व्यापार हैं वो बर्बरता पूर्ण हैं और चल रहे हैं। तो उसका एग्जिस्टेंस (मौजूदगी) इतना स्ट्रोंग (बलशाली) कैसे है?

आचार्य: क्योंकि सत्य बलवान ही नहीं है, उसका बल असीमित है। तुम्हारे धंधे सत्य के लिए हानिप्रद थोड़े ही है, कि सत्य उनको रुकवाने आएगा, लेना एक न देना दो। सत्य को, परमात्मा को तुम्हारे धंधों से क्या लेना-देना, तुम्हारे धंधे आज हैं कल नहीं। तुम्हारा जो सबसे घटिया धंधा हो उसकी भी सत्य के आगे क्या औकात! तो सत्य कहता है चलने दो। सत्य को खरोंच भी नहीं आती तुम्हारे बेवकूफ़ियों से। हाँ, तुम्हारे इन धंधों से तुम्हारी ज़िंदगी ज़रूर नर्क हो जाती है। तो ये धंधे इसलिए नहीं बंद करो कि इसके कारण परमात्मा को तकलीफ़ हो रही है। परमात्मा को कोई तकलीफ़ नहीं होगी, तुम्हारा पूरा ब्रह्माण्ड भी अभी विलीन हो जाए तो। ये धंधे इसलिए बंद करो क्योंकि ये तुम्हारे लिए तकलीफ़ का कारण हैं।

तुमने कितना बड़ा समझ लिया अपनी ताक़त को कि कह रहे हो कि जब परमात्मा इतना बलवान है तो ये काले धंधे चल क्यों रहे हैं। परमात्मा इतना बलवान है इसीलिए ये काले धंधे चल रहे हैं। वो कहता है चला लो, मेरी बला से, मेरा क्या जाता है! ये तुम्हारे बेवकूफ़ी के खेल हैं, मेरा क्या बिगड़ेगा इनसे।

बिगड़ेगा भी तो किसका? तुम्हारा अपना बिगड़ेगा। तो बंद करो अगर अपना भला चाहते हो तो। तुम क्या सोच रहे हो कि तुम ऊपर वाले पर एहसान कर रहे हो, अगर सही ज़िंदगी जी रहे हो तो। तुम सही ज़िंदगी जियो, तुम ग़लत ज़िंदगी जियो, सत्य को रंच मात्र अंतर नहीं पड़ता। तुम हो कौन? तुम हो कौन? सही ज़िंदगी इसलिए जियो ताकि तुम्हें तुम्हारे दुखों से मुक्ति मिल सके।

प्र: आचार्य जी, मैं जानना ये चाह रहा था कि जो मनुष्य का विवेक है, सत्य भी उसके सामने मौजूद है और असत्य भी मौजूद है, तो असत्य कैसे हावी हो जाता है?

आचार्य: असत्य हावी नहीं होता, असत्य को तुम चुनते हो।

प्र: क्यों?

आचार्य: तुम जानो, तुमने चुना। यही तो बात है कि तुमने चुन भी लिया और फिर पूछ रहे हो क्यों चुनते हैं। इसका मतलब कैसे चुना था?

श्रोता बेहोशी में।

आचार्य: बेहोशी में। मिल गया उत्तर! कौन चुनता है? तुम चुनते हो और चुनने के बाद तुम पूछ क्या रहे हो, ‘आचार्य जी हमने क्यों चुना?’ इसका मतलब तुमने कैसे चुना? बेहोशी में चुना होगा, तभी तो मुझसे पूछ रहे हो। तो इसलिए ग़लत चुनाव होता है। जो सवाल अभी पूछ रहे हो, वो चुनते वक़्त नहीं पूछते। सुनते नहीं हो मियाँ-बीवी की जब कलह होती है तो देवी जी चिल्लाएँगी, 'अरे! हाय मेरी मति मारी गयी थी जो मैंने तुमसे शादी की।' वो तो मारी ही गयी थी। हम ऐसे ही चुनते हैं, दुर्मति के अधीन होकर चुनते हैं। अधीन होकर भी कहना सटीक नहीं होगा, हम दुर्मति को चुनते हैं और फिर दुर्मति के आधार पर अपने बाक़ी चुनाव करते हैं।

प्रयोग करके देखो, तुममें यह ताक़त होती है। बहके जा रहे हो, बहके जा रहे हो, प्रयोग करके देखो, तुम चाहो तो रुक सकते हो। फिसलते-फिसलते भी रुक सकते हो, अपने कदम तुम वापस खींच सकते हो। पर तुम ये फ़ैसला करते हो कि तुम्हें बहकते ही जाना है। तुम पर चाहे नशा चढ़ रहा हो, चाहे वासना चढ़ रही हो, चाहे क्रोध चढ़ रहा हो, तुम देखो कि तुम बहकते जा रहे हो, फिसलते जा रहे हो पर चाहो तो तत्काल रुक सकते हो। पर तुम ये फ़ैसला करते हो कि नहीं रुकना, मज़े ले लें। चूँकि यह तुम्हारा फ़ैसला है इसलिए तुम्हें इसकी सज़ा मिलती है। यह अगर तुम्हारा फ़ैसला नहीं होता तो तुम्हें इसकी सज़ा भी नहीं मिलती।

कर्मफल के सिद्धांत के विषय में यह बात सब अच्छी तरह समझ लें। तुम्हें सजा सिर्फ़ उन कर्मों की मिलेगी जिनका तुमने चुनाव करा है। जिनका तुमने चुनाव नहीं करा है, श्रीकृष्ण साफ़ बताते हैं कि वो अकर्म है, तुम्हें उनकी सज़ा नहीं मिलेगी।

तुम सॉंस ले रहे हो और सॉंस लेने में हवा के साथ कई सूक्ष्म जीव तुम्हारी नाक में प्रवेश कर जाएँ, बहुत छोटे-छोटे सूक्ष्मतम जीव और भीतर जाकर बेचारे मर जाएँ तो तुम्हें इसकी कोई सज़ा नहीं मिलेगी, ये हिंसा नहीं कहलाएगी। क्योंकि यह करने का तुमने चुनाव नहीं करा था। ये तो बस हो गया। इसी तरह तुम भोजन करो और भोजन करने के कारण तुम्हारी आँतों की कुछ बैक्टीरिया मर जाएँ तो ये हिंसा नहीं है।

हाथी चल रहा है और हाथी के चलने के कारण ज़मीन पर छोटी-छोटी चींटियाँ या कोई और जंतु थे वो कुचल कर मर गये, ये हिंसा नहीं कहलाएगी, क्योंकि हाथी ने मारने का चुनाव नहीं करा था। अब तो कोई तरीक़ा ही नहीं था कि हाथी इस हत्या को रोक सके। तो इसलिए उसको कोई सज़ा नहीं मिलेगी।

सज़ा सिर्फ़ तब मिलती है जब तुम्हारे पास ये अधिकार था, ये अख़्तियार था कि तुम हिंसा को रोक पाओ, फिर भी तुमने रोका नहीं, तब सज़ा मिलती है।

वो हिंसा जो यूँही हो गयी वो अकर्म है, वो तुमने किया नहीं। तुम सो रहे थे, तुम्हारे ऊपर मच्छर बैठा, तुमने करवट ली और मच्छर दबकर के मर गया, इसकी तुम्हें कोई सज़ा नहीं मिलेगी। लेकिन अगर तुम कहो कि मुझे आज मुर्गा खाना है और जाओ बाज़ार से मुर्गा ख़रीद कर लाओ तो ये जघन्य पाप है और तुम्हें इसकी सज़ा मिलती है, ज़रूर मिलती है।

जानते हो, तुम पलक भी झपक रहे हो तो कुछ नन्हें-नन्हें जीव हैं जो मर रहे हैं। पलक झपकना भी कुछ नन्हें जीवों की मृत्यु का कारण बन रहा है, पर उसकी कोई सज़ा नहीं मिलती। सज़ा सिर्फ़ अपने चुनाव की मिलती है। जहाँ तुम चुन सकते ही नहीं वहाँ सज़ा नहीं मिलेगी। अगर तुम्हें दुख मिल रहा है तो एक बात पक्की समझ लेना, तुमने कहीं-न-कहीं कोई ग़लत चुनाव किया है। चुनाव, फ्री विल, अधिकार, अख़्तियार ये सब शब्द एक साथ चलते हैं, इसी में चेतना भी जोड़ लो। पुरस्कार और दंड इनसे सम्बन्धित होते हैं।

प्र: अभी आश्रम आकर के सच को समर्पित हो जाने का मन तो करता है पर लगता है कि अभी अपने में ख़ामियाँ बहुत हैं, तो आश्रम का पुनीत-पावन ऊँचा काम मैं कैसे कर पाऊँगा। तो इससे अच्छा ये है कि जो काम मैं कर रहा हूँ, वही करता रहूँ।

आचार्य: तो सारी खामियाँ जब मिटा लोगे तो आश्रम आओगे ही काहे को? 'नहीं डॉक्टर साहब आज नहीं आ सकता आपको दिखाने।' क्यों? 'आज बुखार बहुत है, दो-चार दिन में बुखार उतर जाए, तबीयत बिलकुल मस्त हो जाए, फुटबॉल खेलने लगें, फिर आएँगे आपके पास।'

काहे को आओगे? आश्रम आकर सत्य की कोई सेवा नहीं करते तुम, वास्तव में अपनी सेवा करते हो। सत्य के घुटने में थोड़े ही दर्द है कि तुम पाँव मिंजोगे उसके, कि सेवा कर रहे हैं। सेवा उसकी की जाती है न जो रोगी होता है। आत्मा तो निरामय होती है, उसको क्या सेवा चाहिए।

तो वास्तव में जब तुम स्वयंसेवक बनते हो, आश्रम में आकर सेवा करते हो या सत्य की किसी विराट योजना में सहभागी होते हो तो तुम सेवा सत्य की नहीं, अपनी ही कर रहे होते हो। तभी तो उसे कहा जाता है स्वयंसेवक। अब समझ में आया?

अंग्रेज़ी तो बेकार भाषा है उसमें कुछ पता नहीं चलता, वालेंटियर। देशी भाषा राज़ खोल देती है, स्वयंसेवा है ये, अपनी सेवा कर रहे हो। अपनी सेवा तभी तो करोगे न जब तुम्हें कोई तकलीफ़ है। तकलीफ़ अभी है, तो करो अभी सेवा।

'आचार्य जी हर बार तकलीफ़ खड़ी कर देते हैं। बताइए ये कोई तरीक़ा है। सीधे कह रहे हैं सेवा के लिए आ जाओ, न दान बताते हैं, न दक्षिणा। अरे कोई ऑफर लेटर होगा, कहीं कोई हस्ताक्षर किये जाएँगे। दुनिया को क्या बताएँगे, पोजिशन (पद) क्या है लड़के की, पैकेज (तनख्वाह) कितना है। सीधे बोल देते हैं आओ और सेवा करो। समझते ही नहीं, संसार में कितनी जटिलताएँ हैं। आचार्य जी बिलकुल भोंदू ही रह गये, दुनिया के तौर-तरीक़ों का इन्हें कुछ पता ही नहीं। फूफी पूछेगी तो सीटीसी क्या बताएँगे।'

बेटा तुम्हें पता नहीं है, यहाँ राम रतन धन है। पर वो सीटीसी चाहने वालों को नहीं मिलता।

प्र: नहीं, मेरा तबियत ख़राब होता रहता है तो मुझे लगता है कहीं ऐसे न हो कि मैं वहाँ गया हूँ काम करने और तबीयत ख़राब करके बैठा हुआ हूँ।

आचार्य: तबीयत ख़राब होना कोई बड़ी बात है ही नहीं। जिनके नहीं भी ख़राब होती थी उनकी यहाँ आकर हो जाती है। तो उसमें कुछ नहीं है।

प्रयोग‌ ही ऐसे करते हैं। जितने भी लोग आवेदन देते हैं कि आना है सेवा करने। आजकल बहुत आ रहे हैं आवेदन। अभी यहाँ आने से पहले मैं वही देख रहा था। सैकड़ों की तादाद में कि हम भी आकर सेवा करना चाहते हैं, हम भी आना चाहते हैं और मिशन से जुड़ना चाहते हैं।

तो कुछ नहीं, न आगा पूछते हैं न पीछा, हम कहते हैं आ जाओ। और हफ़्ते में जिसकी तबियत न ख़राब हो वो रुक जाए। बाक़ी सबकी ख़राब होनी पक्की है। तो तबियत का तो ऐसा है। अभी इसी महीने, पिछले ही महीने, दो भागे हैं। तबियत बता कर भागे थे, लौट कर नहीं आये हैं। और तुम्हारी ख़राब हो-न-हो, घर वालों की ज़रूर ख़राब होगी, रोज़ फोन आएँगे। तबियत बहुत ख़राब है पप्पा की, आ ही जाओ।

सब मज़े ले रहे हैं, सब हँस रहे उस बिचारे (प्रश्नकर्ता) को हँसी भी नहीं आ रही है, हवाइयाँ उड़ रही हैं (आचार्य जी हँसते हुए)। (सभी लोग हँसते हैं)

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