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कुमाता कौन और सुमाता कौन?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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जद्यपि जनमु कुमातु तें, मैं सठु सदा सदोस।

आपण जानि न त्यागहहिं, मोहि रघुबीर भरोस।।

~ संत तुलसीदास

आचार्य प्रशांत: कोई-कोई ही नहीं होता जिसका जन्म कुमाता से होता है। अगर आप इस श्लोक को सिर्फ प्रकरण के संदर्भ में देखेंगे तो आपको ऐसा लगेगा जैसे कि किसी पात्र-विशेष ने किसी संदर्भ-विशेष में यह बातें बोल दी हैं। नहीं, ऐसा नहीं है। इनकी प्रासंगिकता व्यापक है। जो कहा जा रहा है वो हम सब पर लागू होता है।

क्या कहा जा रहा है? “यद्यपि मेरा जन्म कुमाता से हुआ है और मैं सदा शठ हूँ और दोषपूर्ण हूँ, फिर भी मुझे रघुबीर का भरोसा है कि वे अपना जान के मुझे त्यागेंगे नहीं।” देह का जन्म जो तुम्हें दे, वो माता तो है लेकिन पूर्ण माता नहीं है अभी। चूँकि तुलसी कह रहे हैं – कुमाता, तो इसीलिए उसके साथ दूसरा शब्द भी रखना ज़रूरी है – सुमाता। जो तुम्हें पूरा जन्म दे दे, मात्र वही सुमाता है।

‘कु’ जब किसी शब्द के पहले लग जाता है तो उसका अर्थ होता है कि कहीं कुछ गड़बड़ हो गयी, कुछ चूक गया। और एक ही गड़बड़ हो सकती है, एक ही दोष हो सकता है कि आप पूर्णता से चूक जाओ। तो जब आपको जन्म मिले और पूर्ण जन्म न हो, तो उसको कुजन्म ही बोलेंगे। आपको यदि जन्म तो मिला लेकिन पूरा नहीं, तो अभी यह ‘कुजन्म’ ही है, क्योंकि जो अधूरा है, वही तो दोष का और कष्ट का कारण है न।

दुनिया भर की कलह, पीड़ा और आती कहाँ से है? अधूरेपन से। अहंकार किसका नाम है? अधूरेपन का। तो अगर अधूरा ही जन्म हुआ, तो बड़ी गड़बड़ हो गयी न! आ गया दुःख, आ गयी पीड़ा, उठ गया अहंकार। हमें जो जन्म साधारणतया मिलता है, वह अधूरा जन्म होता है। चूँकि अधूरा है इसीलिए उचित है उसको कहना कि वो अभी ‘कुजन्म’ है। और कुजन्म अगर तुम्हें मिल रहा है, तो कुजन्म जिससे मिला, वो कुमाता ही तो हुई।

कुमाता की परिभाषा ये: जो जन्म तो दे दे पर पूरा जन्म न दे पाए।

और यदि कुमाता से पैदा हुए हो तो पक्का है कि तुम कौन हुए? कपूत। अधूरा जन्म किससे मिला? कुमाता से। और अधूरा जन्म किसको मिला? कपूत को।

अधूरा क्यों? समझेंगे। अधूरा इसलिए क्योंकि सीमित हो और सीमित रहने से राज़ी नहीं हो। अस्तित्व नहीं आ करके कह रहा है कि तुम अधूरे पैदा हुए हो, तुम ख़ुद कह रहे हो कि तुम अधूरे हो। तुम अगर ये न कह रहे होते कि तुम अधूरे हो, तो पैदा होते ही रोते क्यों? और पैदा होते ही तुम्हारी आँखें बाहर की ओर क्यों देखतीं? और तुम्हारे हाथ दूसरों की ओर क्यों बढ़ते? कुछ पाने के लिए ही तो।

देखो कि पैदा होते ही तुम्हारी परिभाषा किसी चीज़ से, किसी और से संयुक्त होकर ही की जा सकती है। पैदा हुए हो तो किसी की बाँह में हो, तो अब कौन है? तुम और किसी की बाँह। पैदा हुए हो तो मान लो ज़मीन पर लेटे हो, तो कौन है? तुम और ज़मीन। पैदा हुए हो तो कोई आकर के तुम्हें भोजन-पोषण दे रहा है, तो कौन है? तुम और भोजन, और तुम और तुम्हारा पोषणकर्ता, मान लो माँ। तो पूरे तो कभी नहीं हो न, तुम्हें हमेशा किसी और की ज़रूरत है। कोई और न हो तो तुम हो ही नहीं सकते। तुम कल्पना भी नहीं कर पाओगे कि तुम खाली आकाश में हो, बस अकेले। तुम्हारी परिभाषा ही कहीं और से निकल कर आ रही है, इसलिए हुए तुम अधूरे।

तो हमारा जो जन्म होता है, वो अधूरा जन्म होता है क्योंकि हम में जो सब कुछ है, वो सीमित है। सीमित भर होता तो भी चल जाता, पर हमारा दिल चिल्लाकर कहता है कि सीमित रहना हमें मंजूर नहीं, हमें कुछ और चाहिए, तो हम निरंतर किसी और से जुड़ते रहते हैं। कपड़ों से जुड़ गए। बच्चा पैदा होता नहीं है कि तुम उसे कपड़े पहनाते हो कि नहीं पहनाते हो? तो अब कौन हो गया? बच्चा और कपड़ा। क्योंकि बच्चा अधूरा रहने से राज़ी नहीं था; सीमित रहने से राज़ी नहीं था। और कपड़ा तुम उसे कुछ भी पहना दो, क्या वह उससे भी राज़ी है? तुम उसे कुछ भी दे दो, क्या वह उससे पूरा हो गया? क्या वहीं थम गया? बात बन गयी? रोना रुक गया सदा के लिए? चाह मिट गयी? तो ये अधूरे का जन्म हुआ है, ये अधूरेपन का जन्म हुआ है, ये अपूर्णता का जन्म हुआ है—जो पैदा होते ही हाथ-पाँव चलाती है और चिल्लाती है, “मुझे दो, मुझे चाहिए”।

बच्चा नहीं पैदा होता, माँगें पैदा होती हैं। माँगें पैदा होती हैं, इच्छाएँ पैदा होती हैं, और इच्छा का अर्थ ही है अधूरापन, अपूर्णता। तो ‘अपूर्ण’ पैदा हुआ है, इतनी बात स्पष्ट है? जो पैदा हुआ है, वह अपूर्ण है। चूँकि अपूर्ण है, इसीलिए उसको कहा जा रहा है कि यह जन्म नहीं है, कुजन्म है, क्योंकि अपूर्णता का जन्म है। और अपूर्णता के साथ ‘कु’ इसलिए जोड़ा गया क्योंकि जहाँ अपूर्णता है, वहाँ दु:ख है—अपूर्णता माने दुःख, अपूर्णता माने अहंकार, अपूर्णता माने क्लेश, अपूर्णता माने महत्वाकांक्षा।

तो इसलिए फिर जीवन का उद्देश्य शरीर के जन्म लेते ही निर्धारित हो जाता है। शरीर का जन्म हुआ माने अपूर्णता का जन्म हुआ। तो फिर जीवन का उद्देश्य क्या हो गया? कि अब दूसरा जन्म ले लो। पहले को समाहित होने दो और दूसरा जन्म हो, जो पूर्णता में हो। जीसस का वचन है न कि, “जब तक तुम ख़त्म ही नहीं हो जाते, विगलित ही नहीं हो जाते, तुम मुझे नहीं पा पाओगे। मेरे पिता के राज्य में, प्रभु के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाओगे।” अधूरापन जाएगा नहीं तो पूरापन प्रकट कैसे होगा? जानते ही हैं द्विज की अवधारणा, वह जिसने दो जन्म लिए हों: एक माँ के गर्भ से, दूसरा परमात्मा के गर्भ से।

तो प्रत्येक माता, प्रत्येक जैविक माता, प्रत्येक शारीरिक माता अपनी यात्रा की शुरुआत तो कुमाता हो करके ही करती हैं, ठीक वैसे जैसे हर बच्चा अपनी शुरुआत कुजन्म से ही करता है, अधूरेपन से ही करता है। लेकिन वह कुमाता रह ही आए, यह आवश्यक नहीं है। मातृत्व उदित तो हो, फलीभूत भी होना चाहिए। फलीभूत तब हुआ जब माता कुमाता से सुमाता बन जाए। यह काम बहुत कम माओं के साथ होता है। शरीर का जन्म तो हर माँ दे देती है, पर शरीर के आगे जो है, माँ बच्चे का उससे परिचय नहीं करा पाती। और कोई बच्चा, कोई प्राणी अगर शरीर-भाव में ही पूरा जन्म बिता गया, तो कुजन्म ही बिताया उसने। और फिर वह कोसता है अपने-आपको कि, “मैं पैदा ही क्यों हुआ?” और अगर कोई बच्चा अपने-आपको कोस रहा है, किसी भी उम्र का हो, साठ का है तो भी बच्चा ही है, अपने-आपको कोस रहा है कि मैं पैदा ही क्यों हुआ, तो उसकी माता क्या हुई? कुमाता ही तो हुई। सुमाता वो जो बच्चे का जन्म साकार कर दे। तो बच्चा पैदा हो रहा है, बच्चे की एक यात्रा है। और बच्चे का जन्म होते ही माँ का जन्म होता है। उस बच्चे के समानांतर माँ की यात्रा भी शुरू हो जाती है।

बच्चे को जाना है अपूर्णता से पूर्णता तक, माँ को भी जाना है अपूर्णता से पूर्णता तक। माँ को भी बनना है कुमाता से सुमाता। माँ अगर बस बच्चे को जन्म दे करके रह गयी, उसके शरीर का पालन-पोषण कर दिया, कि, “तू खाना खा ले, तू नहा ले, तू तेल लगा ले, तू कपड़े पहन ले,” तो यह माता कुमाता है।

असली माता वो जो बच्चे के लिए परमात्मा हो जाए, गुरु हो जाए। शरीर भर का ही पालन-पोषण न करे, उसके मन को ऐसा रस दे कि उसका मन तृप्त होकर के विश्राम पा जाए।

माँएं लोरी गा करके, थपकी दे-देकर के बच्चे को सुलाना तो जानती हैं, पर यह नींद कौन-सी है? यह नींद ऐसी ही है कि मस्तिष्क सो गया, मस्तिष्क माने शरीर। मन को सुला दे, ऐसी माँ नहीं मिलती।

मस्तिष्क सो गया, यह नींद है। मन सो गया, यह समाधि है। सुमाता वो जो मन को सुला दे, जो बच्चे को समाधि तक ही पहुँचा दे। ऐसी लोरी सुनाए कि मन हर कलह से, हर विग्रह से, हर विकार से, हर विचार से मुक्त हो जाए। वह लोरी गानी माँओं को आती नहीं, वह लोरी तो गुरु ही गा पाता है। माँ भी वह गुरु हो सकती है, पर फिर तब जब वह अपनी यात्रा पूरी करे। सुमाता होना माने गुरु होना।

माँएं सोचती हैं कि बच्चे का जन्म हो गया, अब यात्रा बच्चे की है। वे कहती हैं कि, “बच्चे बड़े हो रहे हैं”। मैं पूछता हूँ, तुम कब बड़े होओगे? और बच्चे बड़े हो कैसे रहे हैं अगर तुम बड़े नहीं हो रहे? जिस दिन तुमने जन्म दिया, उस दिन तुम्हारा भी तो जन्म हुआ। क्या बच्चे के जन्म से पहले तुम माँ कहलाती थीं? तो माँ का जन्म किस दिन हुआ? जिस दिन बच्चे का जन्म हुआ। अब बताओ, बच्चा तो हो रहा है बड़ा, तुम हो रही हो बड़ी? अधिकांश माँओं की विडंबना यह होती है कि उनके बच्चे बड़े हो जाते हैं, माँएं उतनी ही रह जाती हैं जितना जन्म देते समय थीं। माँ बड़ी हुई ही नहीं, बच्चे बड़े हो गए। माँ छोटी रह गयी, कुमाता ही रह गयी, सुमाता हो ही नहीं पाई। गाने सुनाती रह गयी, लोरियाँ सुनाती रह गयी, नाद कभी नहीं सुना पाई। गान सुनाया, मौन नहीं सुनाया। और फिर माँएं अचरज करती हैं, “हमारे बच्चे ऐसे क्यों निकल गए?” और कैसे निकलते? तुम्हारे बच्चे हैं!

और यदि आप पाती हैं कि कुछ बच्चे सन्मार्ग पर निकल जाते हैं, खिल जाते हैं, तो वो बहुधा इस कारण नहीं है कि माता सुमाता थीं, वह इस कारण है क्योंकि (ऊपर की ओर इशारा करते हुए) वह अनहोनी को भी होनी कर देता है। जो होना नहीं चाहिए था, वह भी उसने कर दिया। जैसा घर था, जैसा परिवार था, जैसे माँ-बाप थे, जैसी शिक्षा थी, और जैसा माहौल था, उस माहौल में तो बच्चे को वैसा ही निकल जाना चाहिए था जैसे दूसरे बच्चे होते हैं, पर बच्चा फिर भी खिल के निकल गया। यह तुम्हारी करतूत नहीं है, यह तुम्हारी करतूतों के बावजूद है। तुमने तो पूरी कोशिश कर ली कि वही हो जो परंपरा में हमेशा से होता रहा है, पर फिर भी रेगिस्तान में कभी-कभी फूल खिल जाते हैं, रात के अंधेरे के पीछे से भी सूरज निकल आता है।

बच्चे को माँ तब जन्म दे पाएगी जब वह स्वयं कुछ और हो जाएगी। इसी को मैं कहता हूँ कि माँ पहले स्वयं को तो जन्म दे।

तो कह रहे हैं तुलसी कि, “यद्यपि मैं कुमाता से जनित हूँ और तमाम तरह के दोष मुझमें हैं, फिर भी भरोसा है मुझे रघुबीर पर कि वे मुझे अपना ही लेंगे”। इसी की अभी मैं चर्चा कर रहा था: या तो माता स्वयं सुमाता बन जाए, नहीं तो फिर रघुबीर को बनना पड़ता है माता। या तो तुम बन जाओ साकार गुरु अपने बच्चे के लिए, नहीं तो निराकार फिर बच्चे का गुरु हो जाता है, उसको सीधे वहाँ से संदेश मिलते हैं।

जिस दिन तुम माँ बनी थीं, उस दिन परमात्मा ने बड़ा भरोसा रखा था तुम पर, उसने कहा था कि, “तुम्हें यह नवजात दे रहा हूँ, मैं तुम्हें अपना उत्तराधिकारी बना रहा हूँ, मैं तुम्हें अब वह किरदार निभाने को कह रहा हूँ जो मेरा है”। माँ कौन है? माँ का किरदार किसका है? उसी का तो है, ऊपर वाले का। तो जब कोई स्त्री माँ बनती है, उस वक्त परमात्मा उसे अपने अधिकार दे देता है, अपना किरदार दे देता है कि तुम वह करो जो मुझे करना होता है। मैं सारे जगत को जन्म देता हूँ और सारे जगत का पोषण करता हूँ, वही काम अब तुम करो। तो परमात्मा ने तो बड़ा भरोसा रखकर तुम्हें एक नवजात दिया। वह नवजात तुम्हारा नहीं है, वह परमात्मा का है। परमात्मा ने तुम पर भरोसा रखकर तुम्हें नवजात दिया है, तुम्हें संरक्षक बनाया है। तुम कस्टोडियन (अभिरक्षक) हो, तुम ट्रस्टी (अमानतदार) हो, संरक्षक मात्र हो। तुम्हारा नहीं है वो, है किसी और का, तुम माध्यम हो।

कोई अपनी अमानत तुम्हें सौप रहा है। वह जो बच्चा है, वह चीज़ उसकी है, उसने तुम्हें सौंपी है कि इसका ख़्याल रखना। और तुम अहंकारवश कहने लग जाओ कि, “यह तो मेरा बच्चा है और इसको मैं अपने तरीकों से पालूँगी। यह तो मेरा है: मम: ममता, मेरा है।” तो यह अमानत में ख़यानत हुई कि नहीं हुई? और फिर जब तुम अपने बच्चे को अपने तरीके से पालते हो तो बच्चे को यही कहना पड़ता है, क्या? “जनमु कुमातु तें, मैं सठु सदा सदोस" – "मैं दुष्ट हूँ और मुझमें लाख दोष हैं"। जब तुम बच्चे को अपना बच्चा मानकर पालती हो तो बच्चे को फिर यही कहना पड़ता है। अगर बच्चे में ईमानदारी है तो उसे यह कहना ही पड़ेगा।

लेकिन बच्चा वास्तव में जिसका था, जीव वास्तव में जहाँ से आया है, उसने जीव को त्याग तो दिया नहीं है न। माँ भले ही यह सोचती रहे कि यह मेरा है, पर वो वास्तव में किसका है? (ऊपर की ओर इशारा करते हुए) उसका है। और उसने उसको त्याग तो दिया नहीं है। चूँकि नहीं त्याग दिया है इसीलिए जीव फिर फरियाद करता है, जीव कहता है, “रघुबीर, जिस माता को तुमने सौंपा था मुझे, वो माता तो अपने कर्तव्य में विफल रही। अब मुझे भरोसा तुम्हारा है, जो काम मेरी माँ न कर पाई, वो तुम करो। क्योंकि बच्चा वास्तव में किसका हूँ? माँ का बाद में हूँ, पहले किसका हूँ? पहले तो तुम्हारा हूँ न। माँ असफल रह गयी, माँ गुरु न बन पाई, माँ सुमाता न बन पाई, तो अब तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, तुमसे फरियाद कर रहा हूँ। तुम वो करो जो वास्तव में इस शरीरधारी जीव को, माँ को करना चाहिए था।” और वो करता है।

भक्त जब भी यह प्रार्थना करेगा, “आपण जानि न त्यागहहिं, मोहि रघुबीर भरोस”। भक्त जब भी यह कहेगा, “रघुबीर, तुम्हारा भरोसा है। तुम्हारा हूँ, त्यागना नहीं मुझे। माँ विफल रही, पर तुम कुमाता थोड़े ही हो। तुम विफल नहीं रहोगे, यह जानता हूँ। तुम तार लो मुझको।” जीव तर जाता है।

अभिभावकों से जब भी मिलता हूँ, हमेशा कहता हूँ कि तुम समझ ही नहीं रहे हो कि तुम्हारे साथ क्या चल रहा है। तुम सोच रहे हो कि तुम कुछ हो, तुम्हारा कोई स्थान है, कोई अधिकार है। और तुम्हारे सामने एक बच्चा है और तुम सोचते हो कि तुम्हारा उस पर कुछ हक है। और तुम सोचते हो कि हमें बच्चे को बड़ा करना है। तुम्हें समझ में ही नहीं आ रहा है कि बात क्या है। तुम्हें बच्चे को नहीं बड़ा करना, तुम्हें बड़ा होना है। तुम और बच्चा, दोनों एक ही स्थान पर खड़े हो। बल्कि बच्चा तुमसे आगे है क्योंकि अभी निर्दोष है, सरल है। तुम बच्चे से ज़रा पीछे ही हो। बच्चे को सुजन्म लेना है और तुम्हें सुमाता-सुपिता बनना है।

तुम समझ ही नहीं रहे हो कि यह तुम्हारी वृद्धि का, तुम्हारी वयस्कता का, तुम्हारे जीवन की सार्थकता का प्रश्न है। तुम यह सोच रहे हो कि तुम तो हो किसी मुकाम पर और अभी सवाल और ज़िम्मेदारी बच्चे की ज़िंदगी पर है। सवाल, प्रश्नचिन्ह तुम्हारी जिंदगी पर है पहले, बच्चा तो एक दिन प्रार्थना करेगा और तर जाएगा। बच्चा कहेगा कि, “मालिक, तूने जिस माँ के भरोसे मुझे पैदा किया था, वो माँ तो विफल रही है, वो माँ तो कुमाता है, तू तार दे मुझको”। और मालिक तार देगा उसको। बच्चा तो निकल जाएगा, उसको तो एक शॉर्टकट उपलब्ध है। वो कहेगा, “तूने जिन्हें हमारा संरक्षक बनाया था, वे अपना उत्तरदायित्व निभाने में असफल रहे। तो तू संरक्षकों के भरोसे मुझे मत छोड़, तू सीधे ही मेरा पोषण कर।” और वो सीधे ही पोषण दे देगा। क्योंकि हर बच्चा सर्वप्रथम बच्चा किसका है? परमात्मा का; न अपनी माँ का, न अपने बाप का। सर्वप्रथम वह परमात्मा का बच्चा है, अपने माँ-बाप का बाद में है। तो वह सीधे-सीधे अपने मूल पिता से प्रार्थना करेगा, और उसकी प्रार्थना सुनी जाएगी। बच्चे का तो कल्याण हो जाएगा, बच्चा तर जाएगा, माँ-बाप का क्या होगा? वो समझ ही नहीं पा रहे हैं कि खेल क्या चल रहा है।

माँ-बाप आते हैं बड़ी व्यग्र शक्लें लेकर के, और आतुर स्वर में पूछते हैं, “बच्चे का क्या करें?” मैं उनकी शक्लें देखता हूँ और सोचता हूँ, “तुम्हारा क्या करें?” तुम्हें समझ में ही नहीं आ रहा है कि प्रश्नचिन्ह कहाँ लगा हुआ है। स्वयं तो वो यूँ आते हैं जैसे कि वो न जाने कितने परिपक्व हों, कितने वयस्क हों! वो आएंगे और कहेंगे, “देखिए, हम लोग तो समझते हैं, पर ये बच्चे!” तुम समझते हो? (व्यंग्य करते हुए) तुम अगर समझते हो तो यह बच्चा नहीं घोड़ा है। मज़ाक़ लग रहा है? शुरू किसने किया? अगर तुम समझदार हो तो यह बच्चा घोड़ा है।

कोई माँ-बाप नहीं देखा मैंने, या कभी-कभार ही देखा, जो आए और विनम्रता से झुके और कहे, हमें बताइए कि, “माँ-बाप होना माने क्या?” और फिर अच्छा लगेगा तुम्हें जब बच्चा यह फरियाद करेगा – “जद्यपि जनमु कुमातु तें, मैं सठु सदा सदोस”। कि, "हे राम! जन्म मेरा कुमाता से हुआ है तो मुझमें सौ तरह के दोष तो होंगे ही, पर तुम तार लो मुझको"। उस दिन कहाँ जाएगा सारा अहंकार? उस दिन सुनवाई होगी तुम्हारी और सवाल पूछे जाएंगे। और राम पूछेंगे कि, “तुम्हें यह अमानत दी थी, यह बच्चा, यह शिकायत क्यों कर रहा है, बताओ?” और मैं तुमसे कह रहा हूँ, दुनिया में जहाँ कहीं जो भी कोई रो रहा है, चाहे बच्चा, चाहे बड़ा, वह वास्तव में राम से शिकायत यही कर रहा है कि, “ऐसी माँ से पैदा क्यों किया कि आज मुझे रोना पड़ रहा है?” दुनिया में जहाँ कहीं भी जो कोई भी आँसू बहा रहा है, वह वास्तव में शिकायत यही कर रहा है परमात्मा से – “मुझे ऐसा जन्म क्यों दिया जिसमें मुझे रोना पड़ रहा है?” यह बात माँओं को, बापों को समझ में ही नहीं आती।

हम कहते हैं कि दुनिया बिल्कुल रसातल में जा रही है, व्यभिचारी भरे हुए हैं, बलात्कारी भरे हुए हैं, हत्यारे भरे हुए हैं, आबादी बढ़ रही है, वैश्विक तापमान बढ़ता ही जा रहा है, पर्यावरण नाश में जा रहा है, जीव लुप्त हो रहे हैं, नदियाँ गन्दी हो रही हैं, युद्ध पर युद्ध है, भाई भाई का नहीं है। और ये जितने लोग लड़ रहे हैं और यह सब कुछ कर रहे हैं, वो सब कभी बच्चे ही थे न? और किसी माँ के ही बच्चे थे? मैं उन माँओं से पूछ रहा हूँ, तुम्हारे बच्चे ऐसे कैसे हो गए? वो कहेंगी, “नहीं, हम तो ठीक थे”। माँओं का जो पसंदीदा जवाब है वो बताए देता हूँ, “हम तो बिल्कुल ठीक हैं, हमारे बच्चे को ज़माने ने खराब कर दिया”। अच्छा ठीक है, ज़माने ने ख़राब कर दिया, आपकी बात मान ली। तो मैं ज़माने वालों से पूछ रहा हूँ कि तुम भी तो कभी बच्चे थे, तुम इतने खराब कैसे हो गए? घूम-फिर कर जो ख़राब कर रहे हैं, वो भी तो कभी बच्चे थे, उन्हें किसने खराब कर दिया? वो कहेंगे, “किसी और ने”। मैं उसके पास जाऊँगा और कहूँगा, तुम भी तो कभी बच्चे थे, तुम्हें किसने ख़राब कर दिया? वो कहेगा, “किसी और ने”। मैं उसके पास जाऊँगा, मैं कहूँगा, तुम्हें किसने ख़राब किया? तो वो कहेगा, “किसी और ने”। अंततः जब सब चूक जाएंगे दूसरे की ओर उंगलियाँ दिखा-दिखाकर, तो मैं कहूँगा, अब कोई बचा है जिस पर दोषारोपण कर सको? जब कोई नहीं बचेगा तब तो माँ को जवाब देना पड़ेगा न कि अब बताओ!

हर कोई यही कह रहा है कि मुझे किसी और ने खराब किया है। हर कोई जो खराब है और हर कोई जो किसी को खराब कर रहा है, वह कभी-न-कभी बच्चा था। तुम यह मान क्यों नहीं लेते हो कि तुम्हारी परवरिश में ही दोष है? और फिर तुम्हारी परवरिश में इसलिए दोष है क्योंकि तुम में दोष है, क्योंकि तुम राम के नहीं हो, क्योंकि तुम में धर्म नहीं है। और जब तुम में धर्म नहीं है तो तुम बच्चे को धर्म कैसे दे पाओगे? तुम निर्मल नहीं हो, तुम बच्चे को निर्मल कैसे रख पाओगे? और तुम दोष ज़माने पर देते हो, तुम कहते हो, “मीडिया ने सब चौपट कर रखा है। यह टी.वी. न जाने कैसा ज़हर खोल रहा है घर में।” अच्छा, टी.वी. में जो लोग उपद्रव मचा रहे हैं, वो सब चालीस-चालीस साल के पैदा हुए थे? वे भी तो कभी बच्चे थे। उन्हें किसने सिखाया उपद्रव? मान ही क्यों नहीं लेते कि इस सब की शुरुआत घरों से ही हो रही है? हमारे घर ही जहरीले हैं, दोषपूर्ण हैं! पर यह मानना माँ के अहंकार को बड़ी चोट पहुँचाता है क्योंकि माँ होने के साथ बड़ी पदवी जुड़ी हुई है, “हम माँ हैं!” और बोल गया यहाँ पर फिर बेटा, “माता तो मेरी कुमाता है। रघुबीर, तुम तारो!”

एक पुरुष पिता बनता है तो उसका ओहदा बढ़ जाता है, स्त्री जब माँ बनती है तो उसका ओहदा बढ़ता ही नहीं है, बहुत बढ़ जाता है। माँ बनना माने अहंकार में पाँच-सौ फ़ीसदी का इज़ाफा। और ठीक है, अधिकार है, क्योंकि माँ बनना छोटी बात नहीं है। लेकिन कौन-सी माँ? तुम अगर सुमाता हो तो फिर तुम्हें अधिकार है यह कहने का कि मैं कुछ हूँ। पर तुमने सिर्फ एक भौतिक क्रिया करके, एक भौतिक जन्म दे दिया, तुम इतरा किस बात पर रही हो? ये तो पशु भी कर लेते हैं।

जीवन अवसर है, सुमाता हो जाओ। मार्ग क्या है सुमाता होने का? वही मार्ग जो तुम्हारे बच्चे का है। जैसे बच्चा फरियाद कर रहा है न, “रघुबीर, तारो!” तुम भी यही फरियाद करो कि, “रघुबीर, तारो!” तुम भी तो बच्चे ही हो। जिसको आज कुमाता कह रहे हो, वह भी तो किसी का बच्चा ही है। तो उस बच्चे के लिए भी वही मार्ग है जो उसके बच्चे के लिए है।

प्रार्थना करो, झुक जाओ। इस घमंड में मत रहो कि हम तो माँ हैं तो हमारी तो परिपूर्ति पहले से ही है। तुम्हें भी गुरु की उतनी ही ज़रूरत है जितनी तुम्हारे बच्चे को। बल्कि तुम्हें ज़्यादा ज़रूरत है।

मैं दोहरा रहा हूँ इस बात को: बच्चा अभी निर्मल है, तुम ज़्यादा संस्कारित हो। बच्चा अभी साफ है, तुम पर ज़माने भर की और वक्त की धूल है। तुम्हारे लिए भी वही रास्ता है जो बच्चे का है। बच्चा राम से प्रार्थना कर रहा है, राम ही प्रथम गुरु हैं। तुम भी राम से ही प्रार्थना करो। बच्चा जब जाता हो गुरु के पास तो उसके रास्ते का कांटा मत बनो, उसके साथ चलो, कहो कि, “तुझे मिल गया है तो मुझे भी मिला दे।”

उल्टा होता है। तुम में इतना दर्प है कि तुम कहते हो कि, “न, तुझे राम की ज़रूरत क्या? हम हैं तो! तुझे परमात्मा की ज़रूरत क्या? माँ है तो! तुझे गुरु की क्या ज़रूरत? घर वाले हैं न!”

कबीर जब गुरु की बात करते हैं तो कहते हैं:

सतगुरु मिला तो ऊबरै, न तो मिला न कोय।

मात पिता सुत बान्धवा, यह तो घर घर होय।।

हर घर में माँ है, बाप है, भाई है, बंधु है – ये तो घर-घर पाए जाते हैं, इनसे थोड़े ही तर जाओगे। पर घर वालों का दम्भ यही है कि, “तू कहाँ जा रहा है? हम हैं तो!” तुम तो घर-घर हो, और घर-घर जर्जर है।

इससे पहले कि आपके बच्चे को राम से प्रार्थना करनी पड़े कि, “मुझे तारो, माता भयी कुमाता,” आप राम से प्रार्थना कर लीजिए कि, “मुझे तारो”। आप भी तर जाएंगी और आपका बच्चा भी तर जाएगा। माँ जब तरती है तो कइयों को साथ लेकर तरती है। बड़ी विशिष्ट, बड़ी अभिनव स्थिति होती है माँ की। माँ अगर ठीक है तो उसके दायरे में जितने आते हैं, पूरा परिवार, सब ठीक हो जाने हैं। बच्चे को प्रार्थना करनी पड़े, बच्चे को भाव विह्वल हो करके, रो करके राम को मनाना पड़े कि, “राम, कहाँ फँसा दिया?” इससे पहले आप राम से प्रार्थना कर लीजिए। क्या प्रार्थना? यही, “आपण जानि न त्यागहहिं, मोहि रघुबीर भरोस"; मुझे त्यागना मत, रघुबीर। बस इतना बोल दीजिए और कुछ नहीं चाहिए। कुछ बहुत थोड़े ही बोलना है। बड़ी-बड़ी बातों में क्या है!

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