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कुछ तो नया करो, एक ही ज़िन्दगी है! || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता हेलो सर, सर मैं एक साल से कुछ अमेरिकन स्टूडेंट्स को और कुछ जो इंडियन स्टूडेंट्स वहाँ सेटल्ड (सुव्यवस्थित) हैं, उन्हें पढ़ाती हूँ। इस वज़ह से उनकी फैमिलीज (परिवार) के साथ भी मेरा क्लोज कांटेक्ट (क़रीबी सम्पर्क) है, रेगुलर (नियमित रूप से) बात होती है। तो अमेरिकन जो लाइफ़ स्टाइल (जीवन शैली) जी रहे हैं और जो इंडियंस वहाँ लाइफ़ स्टाइल जी रहे हैं, वो बहुत डिफ्रेंट (अलग) लगती है।

तो उसके रिगार्डिंग (सम्बन्धित) मुझे कुछ ऑब्जर्वेशंस (अवलोकन) आपके सामने रखने थे। जैसे जो अमेरिकन हैं वो अपना समय बहुत प्रोडक्टिवली यूज (उत्पादकता के साथ उपयोग) करते हैं। उन्हें जैसे ही फ्री टाइम (ख़ाली समय) मिलता है उसे वो सिंगिंग , डांसिंग , स्विमिंग , चेस इन सब में लगा देते हैं।

और यही चीज़ उनके बच्चों में भी दिखती है कि वो बच्चे भी समय बहुत प्रोडक्टिवली यूज कर रहे हैं। लेकिन यही चीज़ जब मैं इंडियंस में देख रही हूँ तो वो ऑफिस से आते हैं, मूवी देखते हैं और सो जाते हैं। और बच्चों का भी ऐसे ही फिर समय बर्बाद होता है।

वो कितना भी देर वीडियो गेम्स खेलते रहते हैं। साथ में अमेरिकन्स के घर में मुझे बड़ी लाइब्रेरी (पुस्तकालय) दिखती है सारे म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट (वाद्य यंत्र) दिखते हैं। भारतीय घर में मुझे वो भी मिसिंग दिखता है।

फीमेल्स (महिलाओं) की भी अगर मैं बात करूँ तो अमेरिकन बच्चों की जो मम्मी हैं वो जॉब करती हैं। चाहे उन्हें रात भर काम करना पड़ रहा है, नाइट ड्यूटी करनी पड़ रही है, या फिर सुबह चार बजे उठ कर करना पड़ रहा है तो वो कर रही हैं। और बच्चों की लाइफ़ में भी इक्वली इन्वोल्वड (समान रूप से शामिल) हैं।

लेकिन जब मैं इंडियंस को देख रही हूँ तो उनकी मम्मी घर में ही रहती हैं, इसकी वज़ह से यह मेरा आब्जर्वेशन है कि थोड़ा बच्चों पर नेगेटिव इम्पैक्ट (नकारात्मक प्रभाव) दिखता है। क्योंकि वो बच्चे बहुत डिपेंडेंट (आश्रित) हैं अपनी मम्मी पर, उन्हें हर चीज़ उनकी मम्मी करके दे रही हैं।

जबकि अमेरिकन जो है, सात-आठ साल का बच्चा भी अपना रूम ख़ुद क्लीन (सफ़ाई) कर रहा है, जो भी करना है, वो खाने के लिए ख़ुद किचन (रसोई) में जाकर ले रहा है।

तो मुझे जानना था कि क्या वो अमेरिकन लाइफ़ स्टाइल जो है, वो सही है? अगर सही है तो इंडियन की इतनी अलग क्यों है?

आचार्य प्रशांत आपको कौनसी चाहिए? पूरी स्वतंत्रता रहे इन दोनों में से क्या चुनोगे?

प्र: अमेरिकन वाली।

आचार्य वही ठीक है! कितनी गन्दी बात हो गयी है, एक आध्यात्मिक मंच से माना जा रहा है कि अमेरिकन लाइफ़़ स्टाइल ज़्यादा अच्छी है। हमें तो लगातार यही बोलना है न हमारी संस्कृति ही महान है।

और यहाँ जितने लोग बैठे हैं न, अगर वाक़ई इन्होंने जीवन को समझा है और ग्रंथों को समझा है थोड़ा-बहुत भी तो अवसर मिलने पर वो इन दोनों में से उसी पक्ष को चुनेंगे जिसको आपने चुना। क्योंकि वही पक्ष ठीक भी है।

हालाँकि आप जिस तरीक़े का ख़ाका खींच रहे हो वो बिलकुल ब्लैक एंड वाइट है। आपने एक पक्ष को बिल्कुल बता दिया कि वो एकदम अच्छे हैं, प्रोडक्टिव है, क्रिएटिव (रचनात्मक) हैं और इंडिपेंडेंट (स्वतंत्र) हैं। सब कुछ उनका अच्छा-अच्छा है। और दूसरे पक्ष को आपने एकदम ऐसा बता दिया कि ये तो कुछ करते नहीं, बच्चे बेकार पड़े हैं। न इनको स्वीमिंग आती, न इनको सिंगिंग आती, न इनको स्पोर्ट्स आते। तो मामला इतना भी ब्लैक एड वाइट है नहीं।

तो मैं इसको अमेरिकन और भारतीय न कह करके ऐसे कह दूँगा एक पक्ष और दूसरा पक्ष। इस तरह के दो ध्रुव होते तो ज़रूर हैं, पर वो अनिवार्य रूप से अमेरिकन और भारतीय हों, आवश्यक नहीं है।

हालाँकि यह बात बिलकुल ठीक है कि वो जो चीज़ है कि ज़िंदगी में रौनक ज़्यादा हो, ज़िंदगी में सृजनात्मकता ज़्यादा हो; खेलना भी है, सीखना भी है; कुछ भी पल खाली मिला है, दो घंटे भी मिले हैं तो उसका कोई रुचिकर उपयोग कर लेना है; वो बात भारतीयों में कम ही पायी जाती है। तो वो बात आपकी ठीक भी है कि वो चीज़ अमेरिकन में ही ज़्यादा है।

लेकिन मैं ये भी जानता हूँ कि अमेरिकन लाइफ़ स्टाइल बहुत हद तक इस पृथ्वी की बर्बादी के लिए ज़िम्मेदार भी है। तो इसलिए मैं यह नहीं कहना चाहता कि अमेरिकन लाइफ़ स्टाइल ही ऐसी है जिसका आप सबको अनुकरण करना है; वह बहुत ख़तरनाक बात हो जाएगी।

तो इसको अभी ऐसे ले लेते हैं कि ऐसा जीवन जीना है जिसमें एक-एक पल में जान है, या ऐसा जीवन जीना है जिसमें अब आर्थिक सुरक्षा मिल गयी है और समाज में इज़्ज़त मिल गयी है, घर बस गया है, बच्चे वग़ैरह हो गए हैं तो अपना मस्त पड़े रहो।

खेद की बात यह है कि भारत का जो शिक्षित वर्ग है, जो संपन्न वर्ग है उसका सपना यही है कि एक बार किसी तरह से नौकरी लग जाए, पैसे आने लग जाए या व्यापार कर रहे हैं तो व्यापार चलने लग जाए। घर बस जाए, पति मिल जाए या बीवी मिल जाए, जितने बच्चे चाहिए वो हो जाए। दुनिया बोलने लग जाए कि वाह! ही हैज अचीव्ड समथिंग (इसने कुछ हासिल कर किया है)। उसके बाद अपना मस्त पड़े रहो।

दुनिया के सबसे कम सृजनात्मक लोगों में भारतीय आते हैं, लीस्ट क्रिएटिव (बहुत ही कम सृजनात्मक)। देखिए, ऐसे ही थोड़ी है कि आपका एक सौ चालीस करोड़ लोगों का देश होता है और कॉमनवेल्थ में कुछ पदक मिल जाए तो एकदम उत्तेजित हो जाते हैं। यहाँ तो कॉमनवेल्थ में भी एक ब्रोंज (कांस्य) आ जाता है तो ऐसा लगता है वाह क्या बात हो गयी। उसके लिए भी देश के प्रधानमंत्री तक बधाई देते हैं। जबकि कॉमनवेल्थ खेलों का स्तर ही बड़ा नीचे का होता है। और यह भी कोई कहने की बात नहीं कि हमारे यहाँ पर खेल की सुविधा वग़ैरह नहीं है तो इसलिए इतना हम आगे नहीं बढ़ पाए। इतने सारे दुनिया के ग़रीब मुल्क हैं और वो ओलंपिक्स के स्तर पर भी अच्छा परफॉर्म (प्रदर्शन) कर लेते हैं।

किसी भी ग्रैंड स्लैम के मेन ड्रॉ (फाइनल) में आपने किसी भारतीय को कब देखा था आख़िरी बार, कितने साल पहले, कितने दशक बीत गए? एक सौ चालीस करोड़ लोग हैं जिसमें सब-के-सब अब ग़रीब भी नहीं हैं। एक काफ़ी बड़ा अब तबका निकल कर आ गया है जो आर्थिक रूप से ठीक-ठाक है। लेकिन जो आर्थिक रूप से ठीक-ठाक हैं वो कहते हैं अब तो बन गयी न लाइफ़ , अब करना क्या है, अब क्या करना!

मैं अड़तीस का था जब मैंने स्कॉश (टेनिस बॉल से खेला जाने वाला खेल) सीखना शुरू किया। तो मेरे कोच के पास बहुत सारे बच्चे आते थे सीखने के लिए। अच्छी बात थी, बच्चे सीखें, अच्छा है। तो मैं बहुत खुश हुआ, मैंने कहा ये तो बड़ी अच्छी बात है, यह आठ साल, दस साल, बारह साल वाले आपके पास आते हैं, गाड़ी भर-भरकर आते हैं सीखने के लिए। बोले ये जब तक पंद्रह के हैं तब तक सीखने आ रहे हैं, उसके बाद एकदम अकाल पड़ जाता है। मैंने कहा क्यों। बोल रहे, इनको इनके माँ-बाप भेज रहे हैं ताकि इनका किसी अच्छी यूनिवर्सिटी (संस्था) में स्पोर्ट कोटे में एडमिशन (दाखिला) हो जाए। और स्कॉश इसलिए भेज रहे हैं क्योंकि स्कॉश अभी भी भारत में ज़्यादा लोग खेलते नहीं, तो स्कॉश में अच्छी रैंकिंग पाना ज़्यादा आसान हो जाता है। और जैसे अच्छी रैंकिंग मिलेगी उस रैंकिंग के दम पर यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिल जाएगा, इसलिए इनको भेजा जा रहा है खेलने के लिए।

ये है हिंदुस्तानी चित्त। उसे सबकुछ किसलिए करना है? एक बंधी-बंधाई नौकरी मिल जाए सुरक्षित, बस। एक सुरक्षित नौकरी मिल गयी है और उसके बाद घर-परिवार बसा लिया है जिसमें लगभग वैसे ही ज़िंदगी जी रहे हैं जैसे अपने बाप-दादे जिया करते थे; बस ज़्यादा पैसों के साथ। ज़िंदगी का आधार वही है जो बीस साल या पचास साल पहले होता था, बस पैसे ज़्यादा आ गये हैं। और इस बात में गौरव का भी अनुभव है कि देखो हम बदले नहीं हैं, पैसा भले आ गया हो लेकिन हम गँवार बराबर हैं। कितना भी पैसा आ जाए, गँवरई नहीं छोड़ेंगे।

और इस बात को माना जाता है कि देखिए अपनी जड़ों से नहीं कटा ये इंसान, जड़ों से नहीं कटा। यह पहले भी मानता था कि पीपल के पेड़ पर चुड़ैल उल्टी लटकी है और इसकी महानता देखिए कि अमेरिका से एमबीए करने के बाद भी यही मानता है। ये है हमारी गौरवशाली संस्कृति! चुड़ैल को नहीं छोड़ेंगे, पढ़ाई कितनी भी हो जाए। पिताजी भी हार्ट अटैक (हृदयाघात) से मरे थे, ये भी हार्ट अटैक से मरेंगे; क्यों? क्योंकि पिता जी भी डेढ़ सौ किलो के हो गए थे, ये भी डेढ़ सौ किलो के होंगे। ऐसा नहीं कि इनके पास पैसे की कमी है, ऐसा नहीं इनके पास अवसर की कमी है, ये चाहे तो कुछ भी खेलने जा सकते थे पर काहे को खेलने जाए! अरे भाई, मेहनत-मज़दूरी करना यह तो मज़दूरों का काम है न। पसीना बहाने के लिए थोड़ी हम इतने बड़े अफ़सर बने हैं। और फिर हम ऊँचे कुल के आदमी हैं, ये दौड़ना-भागना ये सब तो नीचे लोगों का काम होता है। हमारा तो अब काम है बैठ कर के बादाम फाँकना।

दुनिया भर में सबसे ज़्यादा हार्ट अटैक भारत में होते हैं। मधुमेह सबसे ज़्यादा भारत में होता है। और ये सब लाइफ़ स्टाइल डिसऑर्डर्स (जीवनशैली विकार) हैं। कहने को ये ग़रीब देश है लेकिन हम सब खा-खाकर मर रहे हैं, क्योंकि हमने जीवन का उद्देश्य ही बना लिया है खाना। कुछ भी करते हो उसमें एक उद्देश्य होता है— खाना, भोगना। कोई उच्चतर आदर्श हमारे लिए है ही नहीं।

पश्चिम के पास कोई आध्यात्मिक आदर्श हो न हो, उनके पास कम-से-कम एक लौकिक आदर्श तो है। उनके पास नहीं है आदर्श लिबरेशन का या मुक्ति का, पर उनके पास ये आदर्श है कि जितना जी रहे हैं इसको सुरुचिपूर्ण जीना है। जीवन में जितने रंग ला सकते हैं सब लाने हैं। दुनिया जितना घूम सकते हैं घूमेंगे। जो अधिक-से-अधिक कलाएँ सीख सकते हैं सीखेंगे। डांस क्लासेज (नृत्य की कक्षाएँ) होंगी, वहाँ पर साठ-साठ, अस्सी-अस्सी साल वाले दाखिला लेकर डांस सीख रहे होते हैं। भारत में आप बोल दीजिए साठ, अस्सी साल वालों को एनरोल करने के लिए, कहेंगे ये देखो बद्तमीज़ दादी को नचाएगा। तेरी हिम्मत हो गयी इस तरह का संस्कृति विरुद्ध विचार लाने का! दादी को फिर क्या करना है? दादी को कुर्सी पर बैठाओ, उनके पाँव मीजो, हिलने भी मत दो। साठ की हों तो भी वो नब्बे जैसी लगें। नाचने की बात कर दी! दादी नाचने जाएँगी, ये कैसी बात कर दी! नाचना तो वैसे भी भारत में माना गया है कि अरे यह तो छोटे वर्गों का काम है न, नाचना। कुछ भी ऐसा मत करो जिससे ज़िंदगी आगे बढ़ती है।

पश्चिम अध्यात्म में बहुत विकसित न हो पाया हो। जितना वो जीवन समझता है उसको तो वो (और बेहतर बनाने में लगा रहता है।) कला उनकी बेहतर, संगीत उनका बेहतर; आपका बॉलीवुड हॉलीवुड को चुराने के अलावा और क्या करता है! और अब तो फिर भी खुल जाता है, म्यूजिक पर कॉपी राइट है वो दिखने लग जाता है। पहले जब इतना नहीं दिखता था, बीस साल पहले, तो आपके जो शीर्ष संगीतकार थे सीधे-सीधे हॉलीवुड से चुरा रहे होते थे। और पता भी नही चलता था कि चुरा रखा है।

जिसको हम कुछ ऊँचा नाम दे सकें ऐसा अधिकांश आज जीवन में पश्चिम से ही आया है। यह बहुत खेद की बात है लेकिन हमें इसे स्वीकार करना होगा। हम बस अपना थोथा गौरव पकड़ कर बैठे रहते हैं कि हम महान हैं। और कभी कोई हॉलीवुड का अभिनेता योग करता दिख जाए तो तुरंत कहेंगे, 'देखो, बड़े होशियार बनते थे, अभी योग करना पड़ा न! हम महान हैं।' उन्हें तुमने एक दिन योग करते देख लिया तो तुम महान हो गए, तुम्हारा तो एक-एक पल पश्चिमी आयातों से भरा हुआ है, तब नहीं महानता हो गयी पश्चिम की!

मैं कह रहा हूँ कि हम विचार करें कि हम जीवन का अर्थ क्या समझते हैं। हमारे लिए खाने, भोगने और सुरक्षा से आगे का कुछ भी है क्या जीवन? हममें से कितने लोग यहाँ बैठे हैं जो खेलने जाते हैं? (तीन श्रोता हाथ ऊपर करते हैं) बहुत-बहुत अच्छा लग रहा है ये तीन हाथ देख कर भी। (कुछ और लोग भी हाथ ऊपर करते हैं) अब तो ऐसा हो रहा है कि कहीं मैं हार्ट अटैक से न गुज़र जाऊँ! बारह-चौदह हाथ खड़े हो गए, सैकड़ों में बारह-चौदह। वाह!

और ऐसा नहीं है कि किसी के पास पैसा नहीं है; आप सब पैसे वाले लोग हैं, इतना तो सबके पास है कि एक रैकेट ख़रीद लें और एक जूता ख़रीद लें। लेकिन नहीं जाना खेलने, नहीं जाना। क्यों? 'अरे! इतनी पढ़ाई इसलिए थोड़ी करी थी कि रैकेट घुमाएँगे, ये कोई बात है!' यही आदर्श है अभी, सुनने में आप इसको मज़ाक़ की तरह ले रहे हैं, बात अगर मज़ाक़ की होती तो सिर्फ़ दस-बारह हाथ ही क्यों खड़े हुए होते, वो भी सिर्फ़ जवान लोगों के?

'पचास से ऊपर के यहाँ कितने लोग हैं जो खेलने जाते हैं?' 'चालीस से ऊपर के कितने लोग हैं यहाँ जो खेलने जाते हैं?' (चार-पाँच हाथ उठें।) 'क्या खेलते हैं?'

श्रोता: मैं हमेशा से ही जाता हूँ जहाँ ये सारे खेल होते हैं, कबड्डी वग़ैरह।

आचार्य: आप क्या खेलते हैं?

श्रोता: यही।

आचार्य: यही माने क्या?

श्रोता: जैसे कबड्डी।

आचार्य: जैसे कबड्डी! 'अच्छा, कितने लोग हैं, चालीस से ऊपर वाले, जो ढंग से पाँच मिनट नाच सकते हैं?' (एक-दो श्रोता शर्माते हुए हाथ उठते हैं) 'इतना शर्मा के क्यों हाथ उठा रहे हैं, गुनाह हो गया क्या?' (आचार्य जी हँसते हुए)

'किसी भी कला में पारंगत कितने लोग हैं जिसका अभ्यास करते हैं?' ये न कह दें कि स्कूल के दिनों में एक ड्राइंग (चित्र) बनाई थी 'माई हाउस' ('मेरा घर')।

'कितने लोग हैं जो आज भी किसी कला का अभ्यास करते हैं, कोई भी कला, वो फोटोग्राफी भी हो सकती है, कोई भी कला?' (लगभग आधे से कम लोग हाथ ऊपर करते हैं)

क्या! जीवन किस लिए है फिर?

'कितने लोग हैं जिन्होंने भारत भ्रमण भी करा है ठीक से? भारत के उत्तर-पूर्व को कितने लोगों ने देखा है?' (कुछ ही लोग हाथ ऊपर करते हैं)

'आप में से बहुत से ऐसे हैं जो विदेश यात्रा की सामर्थ्य रखते हैं, है न? विदेश यात्रा कितने लोगो ने करी है?'

(कुछ थोड़े लोग ही हाथ ऊपर करते हैं)

'दुबई वाले हाथ नीचे कर लें।'

(श्रोतागण हँसते हैं)

'विदेश यात्रा माने विदेश; नेपाल, भूटान नहीं।'

क्यों? किस लिए कमा रहे हो आप? जन्म किस लिए है, जीवन किसलिए है, समय किसलिए है? किस दिन की प्रतीक्षा कर रहे हो?

आज बीस के हो, चालीस के हो; कल साठ के, अस्सी के हो जाओगे। हालाँकि साठ-अस्सी बोलने में भी मेरा आशय यह नहीं है कि साठ-अस्सी के हो जाओगे तो जीवन का अंत हो गया।

सात साल पहले यूरोप के टूर पर गया था, दो-तीन हफ़्ते का, तो वहाँ पर नीदरलैंड्स में एक गाँव है छोटा सा — जैंडबोट। तो सत्र था, सत्र लेकर लौट रहे थे, मैं और दो-चार लोग थे संस्था के। समुद्र तट पर ही है वो गाँव। तो वहाँ पर एक रस्म सी है कि हर शुक्रवार की रात को या हर शनिवार की रात को पूरा गाँव नाचता है एकसाथ। और वो जो गाँव है वो एम्सटर्डम से थोड़ी दूरी पर है, वो रिटायर्ड (सेवानिवृत्त) लोगों का गाँव है जो कि शहर की भीड़-भाड़ में नहीं रहना चाहते, तो एक शांत तटीय जगह पर आकर रह रहे हैं। कह रहे हैं, 'अब अलग रहना है।'

और इतना वो ज़बरदस्त दृश्य था, गाँव का ही एक चौराहा जैसा था — अब उनका गाँव हमारे गाँव जैसा नहीं होता है कि झोपड़ी और ये सब है। गाँव माने बढ़िया है — और उसमें पूरा गाँव नाच रहा है जिसमें अस्सी-नब्बे साल वाले भी हैं। और गाने वाले भी वहाँ पर सब साठ-साठ, अस्सी-अस्सी साल वाले हैं। भारत में यह सोच पाना भी असंभव है न! हो रहा होगा, आपको कोई बुलाने आएगा तो आप कहेंगे, 'हट! तुम जाओ, छोकरे लोगों का काम है। हम थोड़े ही आएँगे।'

वैसे ही अस्सी-अस्सी साल वाले वहाँ पर खुली जगह में अपना साईकिल चला रहे हैं। और चला ही रहे हैं साइकिल, लम्बी ख़ाली जगहें हैं उनपर अपना साइकलिंग चल रही है, चल रही है, चल रही है। और एकदम फिट हैं।

हम जीते कहाँ हैं! इतना ही नहीं है, यहाँ जो आदमी जितना मुर्दा हो वो उतना सम्मान का पात्र बन जाता है। और जो आदमी जीवित दिखाई दे, जीवन की गर्मी और ऊर्जा और तरंग से विभोर, उसको लेकर के हममें असम्मान आ जाता है, है न? एकदम अभी कोई मुर्दा होकर बैठ जाए, आपको लगेगा ये तो आदमी बढ़िया है। इतनी लम्बी मैं दाढ़ी कर लूँ और ऐसे बाल-वाल हो जाएँ और ख़बर आ जाए कि बहुत बीमार रहते हैं आचार्य जी और यहाँ पर आऊँ ऐसे बैठूँ (बीमार और कमज़ोर जैसा बैठने का अभिनय करते हैं। श्रोतागण हँसते हैं।), देखिए आपके मन में कितना सम्मान उमड़ेगा!

जो जितना मुर्दा है वो उतना प्रशंसनीय है, उतना सम्माननीय है। हमने मुर्दा होने को ही आदर्श बना लिया है। यही वज़ह है कि भारत को बूढ़ा देश बोलते हैं। अजीब बात है! अगर औसत उम्र के हिसाब से देखें तो बूढ़े देश हैं जापान और यूरोप। वहाँ पर औसत उम्र भारत से दूनी है। वो वास्तव में बूढ़े देश हैं शारीरिक आयु के हिसाब से, लेकिन सदा से बूढ़ा देश माना भारत को जाता रहा क्योंकि यहाँ का मन बूढ़ा है। यहाँ का बच्चा भी बूढ़ा है, यहाँ का बच्चा सीधे बूढ़ा हो जाता है बिना जवान हुए। बच्चा पैदा हुआ, वो दो-चार साल के अन्दर बूढ़ा गया। यहाँ जवानी आती ही नहीं और जवानी अगर कभी दिख जाए तो हमें ख़तरा पैदा हो जाता है, 'ये क्या है!'

आपने देखा है, एजिंग कितनी तेज़ी से होती है भारत में ख़ासकर विवाह के बाद? किसी की शादी हो अठ्ठाईस-तीस की उम्र में और उसको देखिएगा आप पाँच साल बाद कम-से-कम पचीस किलो वज़न बढ़ा होगा, चेहरा इतना फूल गया होगा और उम्र लग रही होगी पंद्रह साल बढ़ी हुई, क्योंकि हमारा उद्देश्य जीवंतता नहीं है, हमारा उद्देश्य भोग है।

अब बताइए, मटेरिअलिस्ट कौन हुआ अमेरिकन या इंडियन ? बोलो! वो तो फिर भी हैप्पीनेस (खुशहाली) माँगते हैं, हम सिर्फ़ कंजम्शन (भोग) माँगते हैं। वो तो फिर भी नये-नये रास्ते खोजते हैं कि हैप्पीनेस और कहाँ-कहाँ मिलेगी। हम तो वो जो पुराना सड़ा-गला ढर्रा है भोग का, बस उसमें अटके रहते हैं और उससे आगे निकलने की हममें हिम्मत भी नहीं होने पाती। कुछ नया देख लेते हैं तो थर्रा जाते हैं ‌ 'यह क्या, यह कैसे! नहीं ऐसे नहीं।'

कल ही था नोएडा की डीएलएफ मॉल में, कभी ऐसा नहीं होता कि वहाँ पर यह न दिखाई दे कि जो वहाँ स्केलेटर बना रहता है उतरने के लिए और चढ़ने के लिए, इसमें लोगों को डर न लग रहा हो। दो-चार लोग हमेशा होंगे जो पहले देखेंगे उतरें कि नहीं उतरें, क्या करें!

कुछ भी अलग हो रहा हो तो हमारे लिए चिंता का विषय बन जाता है। नये के प्रति हम खुले नहीं हैं, नये के प्रति हम और बंद हैं। हम डरे हुए लोग हैं जिन्हें अतीत जैसा ही जीना है क्योंकि अतीत एक बार जिया जा चुका है, इसलिए जाना-पहचाना है, इसलिए सुरक्षित लगता है। हमें कुछ नया उतारना नहीं है जीवन में। एक चिंता होती है — खाने-पीने को हो जाए, सेटल हो जाएँ; उसके आगे कुछ नहीं चाहिए। और सेटल तो आप हो जाते हो तीस-बत्तीस की उम्र में। तो उसके आगे जब आपको कुछ चाहिए नहीं, तो उसके आगे फिर कुछ मिलता भी नहीं। आप किसी से अरमान पूछो, जवान आदमी से — क्या चाहिए तुझे जिंदगी में? वो बस इतना ही बता पाता है प्लेसमेंट, जॉब, यूपीएससी या अगर घर के धंधे में लगा है तो पैसा। पूछो, ये ठीक है, अब इसके बाद? तो एकदम हक्का-बक्का क्योंकि इसके आगे उसने कभी सोचा ही नहीं, इसके आगे का उसे कभी चाहिए ही नहीं। ठीक है बाबा तेरी लग गयी नौकरी, अब बता? 'अअ.. अब!'

नहीं, चलो शादी भी उसमें जोड़ लो, चलो हो गयी शादी, अब? 'हो गयी तो इसके आगे थोड़ी कुछ होता है।' पूछो, अब द एंड है, मर जाएगा? अब क्या करेगा? ले तो आया लड़की घर में, अब क्या करना है? 'आ गयी न, तो पिक्चर ख़त्म हो जाती है न यहाँ पर फिर तो!'

यही तो होता है जब आप फ़िल्म देखने जाते हो, शादी हो जाती है फिर पिक्चर ख़त्म हो जाती है। उसके आगे का तो कभी सोचा ही नहीं। आगे कुछ चाहिए ही नहीं। किसके पास अरमान होते हैं कि पचास का होने से पहले इतने देश मुझे दुनिया के देखने हैं? आपको किसी चीज़ से प्रेम हो, मान लीजिए आपको अंग्रेजी पिक्चरें अच्छी लगती हैं। आप कभी सोचते हो कि एक बार जाकर हॉलीवुड घूम कर आओगे? हॉलीवुड छोड़ दो, हम सभी तो फ़िल्मी हिंदी गाने सुनते हैं; कितने लोगों ने जाकर बंबई में भी स्टूडियोज देखे हैं? कितने लोग जाकर के बम्बई में भी थियेटर में बैठ कर आये हैं?

परलोक छोड़ दो, इसी लोक में इतना कुछ है जो जानने, समझने, जीने के लायक़ हैं। हमें उसका कुछ पता है क्या? हमारे लिए इतना पर्याप्त है कि महीने का गल्ला आ रहा है, इतना बहुत है।

और लाइफ़ सेट हो चुकी है। घर में बीवी है क़तई पतिव्रता है, कहीं नहीं भागेगी, तो सोचना नहीं पड़ता। एक नुन्नु है, एक नुन्नी है। नुन्नी के लिए दहेज़ पूरा जमा कर दिया है, कोई समस्या की बात नहीं। नुन्ना नालायक हैं लेकिन डोनेशन देकर उसको कहीं-न-कहीं, कुछ-न-कुछ करा ही देंगे, इंजीनियरिंग करा देंगे, कुछ आगे करा देंगे, हो गया, सेट है।

जब सेट है तो फिर दिन भर करते क्या हो? कुछ नहीं, ऐसे ही अपना गॉसिप , व्यर्थ के काम, अनुत्पादक काम, हिंसात्मक काम। टीवी देखो बहुत सारा, हम टीवीखोर लोग हैं। क्या करता है दिन भर? टीवी खाता है, सोशल मीडिया खाता है, ट्विटर पर कमेंटबाजी करता है।

अभी ट्विटर बिका है तो वहाँ पर जो बातें निकल के आ रही हैं जिसकी वजह से बंधू को समस्या हो रही थी ख़रीदने में। बंधू को पता चला था कि ट्विटर का जो अस्सी-नब्बे प्रतिशत भीड़ है वो उसके एक-दो प्रतिशत अकाउंट से आता है। अस्सी-नब्बे प्रतिशत मतलब जो जेन्युइन ट्रैफिक है, नॉन बोट (मानवीय, रोबोटिक नहीं)। काफ़ी सारा तो सिर्फ़ बोट से है। जो आपको लगता है कोई ट्वीट कर रहा है या जो ट्रेंड वग़ैरह चलते हैं, वो कोई इंसान नहीं होता, वो बोट से होता है। कोई भी ट्रेंड चलाना हो, बोट वही ट्वीट करता रहेगा, करता रहेगा। आप पाएँगे कि एक ही वाक्य होगा या एक ही पैराग्राफ होगा, वो हज़ार जगह पर चल रहा है, एक लाख जगह पर चल रहा है।

लेकिन जो जिंदा भी लोग हैं उसमें से एक बहुत छोटी संख्या, एक बहुत छोटा अनुपात है, वो हेवी ट्विटर्स कहलाते हैं। और जानते हैं आप, वो दिन में औसतन कितनी ट्विट करते हैं? पंद्रह से पचीस। ये एक इंसान की ज़िंदगी है और ऐसों के बूते ट्विटर चल रहा था। तो उन्होंने कहा भईया ये तो ख़तरनाक है, वो हाथ पीछे खींच रहा था कि नहीं चाहिए। अब उसको कोर्ट ने कहा, नहीं तुझे ख़रीदना पड़ेगा।

ये हमारी ज़िंदगी है। आपके पास करने को कुछ सृजनात्मक होता जीवन में, तो आप ये कर रहे होते?

और वहाँ पर जाकर के आप कोई लोगों की ज़िंदगी बेहतर बनाने का काम तो करते नहीं, गाली-गलौज कर रहे होगे। ट्विटर पर तो ख़ास तौर पर सिर्फ़ यही चलता है।

टिकटॉक भारत में बैन हुआ, उससे पहले टिकटॉक के ट्रैफिक — अब आँकड़े नहीं याद हैं, कोई गूगल कर लेगा तो आ जाएगा— टिकटॉक के ट्रैफिक का एक बहुत बड़ा हिस्सा भारत से आता था, बहुत बड़ा हिस्सा। लेकिन टिकटॉक के रिवेन्यू (आय) का बहुत छोटा हिस्सा भारत से आता था।

इसका मतलब समझ रहे हो? कमाने-धमाने से कोई मतलब नहीं है, कोई आर्थिक आधार भी नहीं है उस व्यक्ति का। लेकिन वो बस क्या कर रहा है दिनभर? टिकटॉक में बैठा हुआ है। तो ट्रैफिक दे रहा है, ट्रैफिक दे रहा है मतलब वो स्क्रॉलिंग कर रहा है, लाइक कर रहा है, कमेंट कर रहा है। लेकिन टिकटॉक को आमदनी कुछ नहीं होती थी भारत से। बस ख़ाली बैठ करके समय ख़राब करना है।

अभी जब बैंगलोर में थे, आईआईएससी में जब शिविर हुआ था। इतना अच्छा लगा, अब सत्र ख़त्म होता था, रात देर हो जाती थी। फिर मैं कहता था मुझे खेलना है। तो वहाँ पर एक एप चलती थी कि ऐप से बुकिंग होती है खेलने की जगह की। तो आप जहाँ हो, आप बस ये डाल देते थे कि इसके पाँच किलोमीटर के अंदर-अंदर बता दो, हालाँकि रात में एक-दो बजे पाँच किलोमीटर का भी कोई मतलब नहीं है, ट्रैफिक ख़ाली रहता है और इतने सारे कोर्ट्स वहाँ ख़ाली मिल जाते थे। आप जाओ और खेलो। उत्तर भारत में ये भी नहीं होता। आप यहाँ कहें कि रात के एक बजे भी खेलना है तो आपको कुछ नहीं मिलेगा। यहाँ ग्रेटर नोएडा में जो सरकारी स्टेडियम है वो नौ बजे ही बंद हो जाता है। पहले तो उसमें घुसने के लिए आपको काफ़ी कुछ करना होता है, फिर नौ बजे बंद भी हो जाएगा। हम संस्कारी लोग हैं भाई, जल्दी सोते हैं। और दूसरा ये जेपी वालों का है, वह दस बजे बंद हो जाता है। आप नौ-दस बजे के बाद खेलना चाहें तो आप खेल नहीं सकते।

और बैंगलोर में रात में दो बजे खेलना शुरू किया था, रात में चार बजे तक खेल रहे हैं। एक दिन मुझे याद है, शायद शिविर का आख़िरी दिन था या शायद आईआईएम बैंगलोर वाला दिन था जिस दिन वहाँ पर टॉक (संवाद) थी। तो रात में तीन या चार बजे तक खेला, मैं और कुणाल खेल रहे थे। तो शुभंकर अपना बाहर था। बाहर आया तो बाहर है नहीं। फोन किया तो आया। पूछे, कहाँ थे? बोला, खोज आए है। क्या? बोला, यहाँ बगल में स्टारबक्स है वो खुला है अभी भी, रात में तीन बजे। और वो इतना अच्छा अनुभव था कि रात में तीन बजे तक आपने बैडमिंटन खेला और उसके बाद जाकर आप एक स्टारबक्स में बैठ रहे हो, वो भी बाहर। अंदर नही बैठे थे हम, बाहर खुले में बैठे थे।

हमें ज़िंदगी से कोई मतलब ही नहीं न। हमारे लिए रात के तीन बजे का मतलब होता है, 'खिड़की बंद करो! कुंडी लगाई कि नहीं, चिटकनी चढ़ाई कि नहीं।' कोई बोले, रात में तीन बजे कोई बैडमिंटन खेल कर खुले में बैठा हुआ है स्टारबक्स में। बोलेंगे, 'होव! गन्दा बच्चा। ऐसे करते हैं! नुन्नू को इसकी संगत से दूर रखना, बिगाड़ देगा।'

मेरी बात का मर्म समझिएगा। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि रात में तीन बजे जो जगे वही ज़िंदा आदमी है। पर कुछ तो हो! इतनी कलाएँ किसलिए होती है?

हिन्दुस्तान से जो अच्छी पत्रिकाएँ निकलती थीं वो सब बंद हो गईं। उन्हें पढ़ने वाले पाठक नहीं मिलते हैं। छोटा था तो 'पराग' निकलती थी, बंद हो गयी। और याद आ रही हैं अच्छी पत्रिकाएँ जो बंद हुई हैं सब?

श्रोता: 'नंदन, चंपक'।

आचार्य: 'नंदन, चंपक' आती हैं अभी भी। ये तो एक स्तर की हैं। मैं साहित्यिक पत्रिकाओं की बात कर रहा हूँ।

श्रोता: 'चंदा मामा'।

आचार्य: 'चंदा मामा' साहित्यिक हो गई?

पता करिएगा।

और वो सब बंद इसलिए हुई थीं क्योंकि उनको पाठक नहीं मिल रहे थे। क्या देखने में मगन है आम आदमी – क्रूरदर्शन, ये, वो, इसमें लगे हुए हैं। उससे आपकी ज़िंदगी को मिल क्या रहा है?

जो कुछ भी जीवन को रस से भरता है एक ऊँचाई देता है उससे हमें कोई ताल्लुक़ नहीं। मैं कई बार पूछता हूँ, क्योंकि सुरक्षा की ज़्यादा चाहत हमारे यहाँ महिलाओं को होती है। मैं पूछता हूँ, आप खाना बनाती हो, आप चालीस-पचास साल से खाना बना रही हो, आपका मेन्यू भी बदला है? आप एक ही काम चालीस साल से कर रहे हो— दाल, चावल, सब्जी, रोटी? यही कर रहे हो तो इसी में कुछ विविधता ले आ लो।

ज़्यादातर घरों में तंदूर तक नहीं होता और ऐसा तो नहीं है कि आप तंदूरी चीज़ें खाते नहीं होंगे बाहर जाकर। तंदूरी रोटी तो खाते होंगे और तंदूर से कितनी और चीज़ें भी बनती हैं, वो भी खाते होंगे— माँसाहार की बात नहीं कर रहा हूँ। कितने घरों में तंदूर है? (एक श्रोता हाथ खड़ा करते हैं और जल्दी से हाथ नीचे कर लेते हैं) इज़्ज़त बचा ली उसने, कोने में। अब वो भी डर के नीचे कर लिया कि मैं ही क्यों फँसूँ। जो गुनाह कोई नहीं कर रहा, वो मैं ही क्यों करूँ, नहीं मेरे यहाँ भी तंदूर नहीं है।

और जब आप जाते होंगे रेस्टोरेंट में आप ज़्यादातर तंदूरी रोटी मँगाते हैं। ठीक? अगर रोटी मँगा रहे हैं तो आप तवा रोटी तो नहीं बोलते होंगे ज़्यादातर। ठीक बोला न? घर में तंदूर तक नहीं होता।

चाय तो सब पीते हैं? क्या चाय में भी विविधता लेकर के आये? आज भी वैसी ही चाय पी रहे हो न जैसे चालीस साल पहले पीते थे। और कम-से-कम चालीस तरह की अलग-अलग चाय बन सकती है, वो भी बनावाई कभी? सब्जियाँ भी बहुत तरह की होती हैं। लेकिन हम एक मध्यम वर्गीय संस्कारित क्षेत्र के भीतर फँसे रहते हैं।

उसके पीछे जाओ तो गाँव-गँवई की बहुत सारी सब्जियाँ मिल जाएँगी, हमें उनसे भी कोई लेना-देना नहीं। और उसके आगे जाओ तो अंतरराष्ट्रीय सब्जियाँ मिल जाएँगी, वो महँगी आती हैं, लेकिन मिलती हैं बाजार में, हमें उनसे भी कोई लेना-देना नहीं।

हमारी बँधी-बँधाई चार-पाँच सब्जियाँ हैं। उनसे कार्यक्रम चल रहा है ज़िंदगी का— आलू; मेरे ख़्याल से सूची यही ख़त्म हो जाती है नब्बे प्रतिशत। भारत में आलू बोल दिया तो नब्बे प्रतिशत तो सब्जी ख़त्म हो गयी। अब बाक़ी दस प्रतिशत में दो-चार नाम और जोड़ लो, आलू गोभी, आलू-मटर जोड़ लो। कहीं भी कुछ ऐसा है कि कुछ नया हो, कुछ ताज़ा हो, कुछ जानना है? सब-का-सब बस अतीत का दोहराव! माँ ने आलू गोभी खिलाई, मैंने आलू गोभी बनाई। नया कुछ नहीं; न जानना है न सीखना है न करना है।

कपड़े, आप जो कपड़े पहन रहे हो भारतीय तो ये भी नहीं हैं। अगर आप यही कहोगे कि मुझे वही कपड़े पहनने हैं जो हमारे श्रेष्ठ पूर्वज पहना करते थे तो आपके श्रेष्ठ पूर्वज शर्ट पैंट तो नहीं पहनते थे। लेकिन शर्ट पैंट पिताजी पहनते थे तो वो देखा हुआ है, वही दोहरा रहे हैं। कपड़ो में भी कोई नवीनता है? लवलेस एंड कलरलेस।

दुनिया बदल गयी। त्यौहार भी आज हम वैसे ही मनाते हैं जैसे पहले मनाया करते थे। एक बदली दुनिया में त्योहार का बदलना ज़रूरी है या नहीं? त्यौहार का मर्म नहीं बदल सकता, निश्चित रूप से, राम नहीं बदलेंगे और राम जिन ऊँचाइयों के प्रतीक हैं वो ऊँचाइयाँ नहीं बदलेंगी। पर त्यौहार कैसे मनाना है, वो चीज़ तो बदलनी चाहिए न! पर वो चीज़ भी जैसे पचास साल पहले थी वैसी ही है। और हम बहुत पीछे नहीं जाते, हम सिर्फ़ पचास साल पीछे जाते हैं क्योंकि बहुत पीछे जाएँगे तो ख़तरा हो जाएगा। बहुत पीछे जाएँगे तो वहाँ भी बहुत कुछ ऐसा मिल जाएगा जिससे हम परिचित नहीं हैं। हम बस अपने परिचय के दायरे के भीतर क़ैद रहना चाहते हैं।

तो माने पिछले पचास साल में जो चला, जो हमने देख लिया, पिताजी और दादाजी का, उसी को दोहराते रहना है, उसी को दोहराते रहना है। और जो न दोहराए उसको बोल दो पापी। तो पिताजी थोड़े ही गये थे उत्तर-पूर्व घूमने। जब पिताजी ने नहीं घूमा तो हम कैसे घूमें, संस्कारों की बात है!

पिताजी ने अपना गाँव देखा था और पूरी ज़िंदगी में कुल एक बार जिले में शहर तक गये थे। तो हमने यही बड़ा पाप कर दिया है कि हम जिले से बाहर निकल कर थोड़ा प्रांत देख लिए हैं। अब हम ये थोड़ी करेंगे कि प्रांत से भी बाहर निकल कर उत्तर-पूर्व चले जाएँ या कहीं और चले जाएँ।

खेलिए, नाचिए, सीखिए, जानिए, यात्रा करिए, पढ़िए। दोनों बातें याद रखिए— पहली बात, ज़िंदगी बहुत बड़ी नहीं है; दूसरी बात, अभी मर नहीं गये। याद रखेंगे कि ज़िंदगी बहुत बड़ी नहीं है तो थोड़ी जल्दी रहेगी, वो जल्दी आवश्यक है। और याद रखेंगे कि अभी मर नहीं गये तो ये बहाना नहीं दे पाएँगे कि अब तो बहुत देर हो गयी है, अब क्या करना है। देर हो गयी होगी, हो सकता है आप पचास के हो गए हों, पर अभी मर तो नहीं गये न। आप शुरू करिए। ज़्यादा बड़ी अनुचित बात बोल दी? ठीक नहीं लग रहा?

और ये भीतर से अकड़ तो बिलकुल ही निकाल दीजिए कि जो लोग आपकी तरह की ज़िंदगी नहीं जी रहे हैं वो आपसे नीचे के हैं। भूलिएगा नहीं कि आप जो ज़िन्दगी जी रहे हैं वो आपने चुनी नहीं है, वो आपके ऊपर थोपी गयी है। जिस ज़िंदगी को सिर्फ़ इसलिए जी रहे हैं कि थोपी गयी है, यह एक तरह की विवशता है; उसको लेकर अकड़ कैसी भाई!

अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं, विवाहित महिलाएँ बाल ही नहीं कटवाती थीं शायद अभी भी बहुत घरों में ये चलता हो, कहते हैं ये अपशकुन होता है, बाल तो विधवा के मुंडे जाते हैं न। मुझे अपने ही जान-पहचान के क्षेत्र में बड़ी जद्दोजहद करनी पड़ी कि आप जब अपने बालों का ख़्याल नहीं रख पाती हैं तो क्यों इतने लम्बे रखे हुए हैं। और बालों का ख़्याल रखने से ज़्यादा बेहतर काम है ज़िंदगी में करने के लिए। कटवा लीजिए, अच्छे लगेंगे छोटे बाल। (आचार्य जी मुँह पर हाथ रखकर आश्चर्य का अभिनय करते हैं। श्रोतागण हँसते हैं)

मुझे बड़े बालों से कोई समस्या नहीं है लेकिन मजबूरी नहीं होनी चाहिए न, चाहे बड़े बाल हों, चाहे छोटे बाल हों। चुनाव हो हमारा और चैतन्य चुनाव हो, तब तो कोई समस्या नहीं। पर सिर्फ़ संस्कारवश, विवशतावश ढो रहे हो तो कौनसी बात हो गयी भाई!

अच्छा, फिर एक मानसिक प्रयोग करिएगा। आज से बीस साल पहले एक पल में चले जाएँ और उस पल में आपको आपकी वो तस्वीर दिखाई जाए जैसे आप आज हैं। मान लीजिए, आप आज चालीस के हैं। आप बीस के हो जाइए, उस पल में चले जाइए और उस पल में आपको आपकी आज की तस्वीर दिखाई जा रही है। बीस साल बाद तुम ऐसे होगे, ऐसे दिख रहे होगे, ऐसे जी रहे होगे, ऐसे कपड़े पहन रहे होगे, ऐसा खा रहे होगे, ऐसा सोच रहे होगे; आप स्वीकार कर लेते? नहीं कर लेते न। तो कौनसी मज़बूरी है फिर?

कुछ नहीं, बस सेटल हो गए हैं। द ग्रेट इंडियन ड्रीम — गेट सेटल्ड। सेटल हो गए ना, अब क्या करना है! आप भी कभी कॉलेज में थे, कभी जवान थे, बूढ़े नहीं पैदा हुए थे। अच्छा, यहाँ ऐसे भी लोग होंगे न जिनके घर में गाड़ी है पर उन्हें गाड़ी चलानी नहीं आती। अब छिपाइए मत, देखिए हमारी-आपकी बात है उठा ही दीजिए हाथ। घर में गाड़ी है पर चलानी नहीं आती। उठाइए, उठाइए, देवियों के ज़्यादा उठेंगे, उठाइए।

आप समझ गईं न मुझे क्या बोलना है? क्यों? क्यों? स्मार्टफोन से पहले वाला चलता था नोकिया, वो अभी भी बिकता है भारत में। और उसकी वज़ह यह नहीं है कि वो सस्ता है स्मार्टफोन भी बहुत सस्ते हो गए हैं। उसकी वज़ह ये है कि बहुत लोग ऐसे हैं जो स्मार्टफोन चलाना जानते ही नहीं, उन्हें सीखना ही नहीं है। उनकी आदत उसी की लगी है, वो कह रहे हैं आदत लग गयी न, संस्कार लग गए। और जो संस्कारों को बदले वो पापी। तो कह रहे हैं वही दे दो बस। वही चलाते हैं वो।

आपमें से कितने लोग क्रिप्टो समझते हैं? कितने लोग नहीं समझते हैं? ये बात! क्यों नहीं समझते हैं? क्या मिलेगा ना समझ कर? क्या मिलेगा ना समझ कर? और कितना मुश्किल है समझना? किसी जानने वाले से आधे-पौन घंटे बात कर लीजिए, मैं नहीं कह रहा हूँ आप ट्रेडिंग करने लगेंगी, पर समझ तो जाएँगी।

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