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केन उपनिषद का क्या महत्व
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: केन उपनिषद है हमारे सामने। सबसे पहले तो 'केन' और 'उपनिषद', इसी में बहुत कुछ छिपा हुआ है। 'केन' शब्द का अर्थ क्या हुआ? केन शब्द का क्या अर्थ है?

"किसके द्वारा किया गया है ये सब?" किसके द्वारा? किसके द्वारा? ये उसी अर्थ में हैं जैसे हम कहते हैं हस्तेण, कि हाथ के द्वारा कुछ उठाया। किसके द्वारा? किसके द्वारा किया गया है ये सब? तो सवाल है। उपनिषद भी आ सके, उससे पहले क्या आया है? सवाल। सवाल न हो, तो उपनिषद का भी कोई सवाल ही नहीं उठता। आज भी हम यहाँ पर बैठे हैं तो क्यों बैठे हैं? किसी के मन में सवाल उठा। ठीक है? एक आदमी की जिज्ञासा थी, उसके फलस्वरूप अभी यहाँ पर पाँच-छह लोग बैठे हुए हैं। वो जिज्ञासा, सवाल, वो मूल में है, परमावश्यक। उसके बिना नहीं हो पाएगा। श्रद्धा नहीं है, विश्वास नहीं है, जिज्ञासा है, जानना है। उत्तर बाद में आते हैं, कई बार नहीं भी आते हैं, कई बार सिर्फ़ इशारे रहते हैं, लेकिन सवाल बड़ा स्पष्ट है, बिल्कुल स्पष्ट है। पहला ही सूत्र लेंगे, उसमें कितने सवाल हैं, उन्हें गिनेंगे। सिर्फ़ गिनती बता देगी कि सवाल साफ़ है, तीखे हैं, पूर्णतया केंद्रित हैं और जानने की पूरी कोशिश है। एकदम आतुर आदमी है कि जानना है। जब ये स्थिति होती है, तब उपनिषद का जन्म हो सकता है।

जब ये स्थिति होती है, जहाँ पर आप सवाल पूछने के लिए बेताब हैं, सिर्फ़ तभी उपनिषद का जन्म हो सकता है। उपनिषद शब्द में इतना तो छुपा हुआ है कि भई! साथ बैठे और साथ बैठने के फलस्वरूप एक प्रक्रिया घटी। उप-साथ, निषद-बैठे और साथ बैठने के फलस्वरूप एक प्रक्रिया घटी, उसी प्रक्रिया का नाम है उपनिषद। लेकिन कोई साथ बैठे ही क्यों अगर जिज्ञासा न हो? तो उपनिषद से पहले आती है-जिज्ञासा और शायद ये कहा जा सकता है कि अगर जिज्ञासा होगी, तो उपनिषद पैदा हो ही जाएगा, किसी भी तरीके से। अगर जिज्ञासा होगी तो उपनिषद का पैदा होना पक्का है। इधर नहीं तो उधर, किसी न किसी तरीके से, कोई मिल ही जाएगा, कोई स्थिति पैदा हो ही जाएगी। तो 'केन' है, वो शिष्य जो अब तैयार है, और उपनिषद है वो घटना जो उस तैयारी के फलस्वरूप घट रही है। ठीक है?

ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः।

केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षु: श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति।।

(केनोपनिषद, खण्ड १, श्लोक १)

हिंदी अनुवाद: किसके द्वारा प्रेरित किया हुआ यह मन अपने विषयों तक पहुँचता है? किसके द्वारा नियोजित किया हुआ यह श्रेष्ठ प्राण चलता है? किसके द्वारा प्रेरित की हुई वाणी को मनुष्य बोलते हैं? कौन सा अव्यक देव हमारे नेत्रों और कानों को कार्य में नियुक्त करता है?

अचार्य: किसने भेजा है मन को? मन बहुत सारे चक्कर चला रहा है। मन की दुनिया है, मन के रंग हैं, चारों तरफ मन ही मन का विस्तार दिख रहा है। पर मन का विस्तार किसने किया है? संसार, मन में समा जाता है ठीक है! समझने वाले इतना आसानी से समझ सकते हैं कि, इस पूरे संसार का जो फैलाव है, वह क्या है? मन है, और मन का जो फैलाव है वो क्या है? वो कहाँ से आया? मन कहाँ से आ गया? संसार तो मन है, और मन क्या है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वैसे तो मन तो मन का ही प्रक्षेपण है।

आचार्य: और वो प्रक्षेपण कहाँ से आ रहा है?

प्र: यह शरीर स्वयं की कल्पना कर रहा है और वो कल्पना कुछ भी हो सकती है।

आचार्य: और शरीर स्वयं की कल्पना क्यों कर रहा है?

प्र: कल्पना के माध्यम से वो ख़ुद को परिभाषित कर रहा है।

आचार्य: कल्पना स्वयं की कल्पना कर रही है, क्यों? और कौन ये सब देख रहा है? उस कल्पना का स्रोत क्या है? स्वप्न नकली हो सकता है, स्वप्न देखने वाला भी नकली होगा क्या? तो शरीर काल्पनिक हो सकता है और मन काल्पनिक हो सकता है, पर इनके पीछे कुछ तो असली होना चाहिए। कुछ तो असली होना चाहिए। पहला सवाल यही है- ये मन कहाँ से आ गया? नहीं पूछ रहा वो कि ये संसार कहाँ से आ गया। क्योंकि ये बात तो स्पष्ट है कि संसार कहाँ से आता है?

प्र: मन से आता है।

आचार्य: थोड़ा एक कदम आगे जाकर पूछ रहा है कि मन कहाँ से आ गया? ये मन कहाँ से आ गया? इसका स्रोत क्या है? जो ये सवाल न पूछे उसके लिए ये उपनिषद वैसे भी फ़ालतू ही हैं। जिसके मन में ये उत्सुकता हीं न उठती हो कि ये सब माज़रा क्या है? ये जो चारों तरफ गोल-गोल घूम रहा है मेरे, ये पूरा संसार, ये आ कहाँ से रहा है? ये सब है ही क्यों? उपनिषद उसके लिए है ही नहीं।

उपनिषद तो उसी के लिए है, जो गहराई से जानने में उत्सुक हो कि, अगर जी रहा हूँ तो इस जीने का मतलब क्या है? सत्य क्या है? एक बड़ी गहरी उत्सुकता हो, जो कि किसी बहुत पढ़े-लिखे आदमी में हो, ये आवश्यक नहीं है। एक बच्चा भी ये सवाल पूछ सकता है। मुझे लगता है बच्चे ही ज़्यादा पूछते होंगे, कि ये सब आया कहाँ से? बड़े पूछना भूल जाते हैं। सवाल साधारण है, मन का स्रोत क्या है? अच्छा ठीक है, ये जो पूरा त्रिआयामी संसार है, ये मन ने खड़ा कर दिया। स्थान और समय और मन। समय भी मन है, ठीक? मन को किसने खड़ा कर दिया? आप कहें, "नहीं! संसार मन है, मन संसार है।" तो बच्चा पलट कर पूछेगा, अच्छा दोनों को किसने खड़ा कर दिया? ये गोल-माल जवाब नहीं चलेंगे।

प्र: बल्कि इसका तो मैंने सामना किया है, घर में जो मेरा भतीजा है, वो पूछ रहा था कि भगवान बादल के पार रहते हैं? तो रॉकेट बादल के पार जाता होगा तो भगवान से मिलता होगा? अब जब सब लोगों ने पहले ही जो पूरा-पूरा ढाँचा ही है, वो नकली बना रखा है तो उत्तर कहाँ से असली मिल सकता है? और अब तो मैंने ये ध्यान देना शुरू कर दिया है, 3 साल की उम्र में, जब शब्द बहुत आ जाते हैं मन में, तो ऐसे प्रश्न फूटते हैं, और ये करीब 6-7 साल तक प्रक्रिया चलती रहती है, जिसके बाद संस्कारों के द्वारा बिल्कुल समाप्त कर दी जाती है।

आचार्य: है ही, ऐसा ही है! मान लो! मान लो!

प्र: प्रश्न तो मेरे पास ऐसे आते हैं कि समाधान ही नहीं मिलता। बंदर गिर कैसे गया? अब कैसे गिरा, कैसे समझाऊँ?

आचार्य: कोई बड़ी बात नहीं हो, जिसने ये लिखा है वो बिल्कुल बाल-वृत्ति ही हो, होना ही पड़ेगा उसको। ये जो सुलझे हुए, समझदार लोग होते हैं, वो ये पूछ ही नहीं पाएंगे, क्यों पूछेंगे? आगे तो और ख़तरनाक सवाल हैं- ज़बान की ज़बान क्या है? आँख की आँख क्या है? बड़े लोग, थोड़े ही पूछेंगे ये सवाल। जीवन है, ठीक है? जीवन क्यों बढ़ रहा है आगे? समय क्या है? प्राण क्या है? क्या है प्राण? आप कह सकते हैं कि तुम में प्राण आया, तुम्हारे पूर्वजों द्वारा, उनमें आया उनके माँ-बाप द्वारा। इस पहले वाले में कहाँ से आया?

प्र: ओशो समझाते हैं कि, एक बच्चा जब पूछता है कि पेड़ हरा क्यों है? इसका उत्तर यही है कि मुझे नहीं पता और मैं ख़ुद असमंजस में हूँ कि पेड़ हरा क्यों है? आपके उत्तर, प्रश्न को एक स्तर पीछे भले ही ले जाएँ कि पेड़ हरा है, क्योंकि उसमें क्लोरोफिल है। लेकिन बच्चा अब यह पूछ सकता है कि ये क्लोरोफिल ही क्यों आया? अब क्लोरोफिल को कैसे पता चल जाता है कि ये पेड़ है और मुझे इसमें आना है?

आचार्य: और क्लोरोफिल क्यों हरा है? अब ये भी बता दो

केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः

प्रथम का मतलब हुआ 'स्रोत'। सबकुछ कहाँ से निकल पड़ा? कहीं से तो निकलना चहिये, कुछ तो स्रोत होगा, कहाँ से आ रहा है ये सबकुछ? ठीक है चारों तरफ अब हज़ारों तरीके की जैव-विविधता दिखती है, इतने सारे अलग-अलग तरीके के प्राणी हैं। प्राणी तो हैं, प्राण कहाँ से आता है? उसका उद्गम बताओ? हम नहीं पूछते।

प्र: बचपन में पूछा किसी का जवाब नहीं आया।

आचार्य: खरगोश-खरगोश क्यों है? चींटा-चींटा क्यों है? पारस-पारस क्यों है? कोई नहीं पूछता। अब ये कोई बहुत पंडिताई की बात है, जो लिखी हुई है? और ये केन उपनिषद है। मुक्तिका, जो 108 उपनिषदों की वरीयता बनाती है, उसमें नम्बर दो का है ये। जो आपके मुख्य उपनिषद हैं, उन मुख्य उपनिषदों में भी मुख्य उपनिषद है ये और सवाल क्या पूछ रहा है? मौलिक, और यही इसको मुख्य बनाता है कि ये बिल्कुल साधारण प्रश्न पूछ रहा है, यही इसको मुख्य बनाता है

"केनेषितां वाचमिमां वदन्ति"

ये शब्द मुँह से निकल रहा है, कहाँ से आ रहा है? ये भी कहाँ से आ रहा है? स्रोत क्या है? वही प्रथम तक जाने की आकांक्षा। उससे पहले रुकना नहीं है और प्रथम को नहीं जाना तो कोई फ़ायदा नहीं है। ये इतनी गहरी जिज्ञासा तब तक मन में उठ नहीं सकती, जब तक ये भाव न निकल जाए कि 'ऐसा तो होता ही है।' जो आदमी ज़िंदगी को बिल्कुल ढर्रे पर चला रहा हो, लिखकर दे सकता हूँ, उसको ये सवाल उठेंगें नहीं, और अगर उठ भी गए, तो उसको लगेगा कि व्यर्थ हैं। आप उसे यहाँ बैठा दोगे, वो कहेगा "यार! कुछ मुद्दे की बात करो न, ये क्या फ़ालतू के सवाल उठाते हो कि ये कहाँ से आता है? वो कहाँ से आता है?" ये सवाल उसी मन में उठ सकते हैं, जिसको पता होने का भाव न हो, जो बिल्कुल ही ख़प न गया हो दुनिया में, जिसकी दुनियादारी बहुत गहरी न हो गयी हो।

प्र: आजकल एक और चलन-सा चला है 'एक्सेप्टेन्स' को लेकर के, हर चीज़ स्वीकार कर लो। तो ये मैंने सुना है कुछ लोगों से कि तुम किसी चीज़ को आराम से क्यों नहीं ले सकते हो- "जैसा है वैसे ही लो। तुम क्यों नहीं उसको वैसे ही लेते हो जैसा वो है? तुम्हें क्यों हर चीज़ को लेकर के प्रश्न करना है?"

आचार्य: बड़ा ख़तरनाक शब्द है ये 'एक्सेप्टेन्स', बहुत ख़तरनाक शब्द। इसका अर्थ कुछ और है, और उस एक्सेप्टेंस को बना दिया गया है - जड़ता, कि जड़ हो जाओ। सवाल मत पूछो, जानने की कोशिश नहीं, ज़िंदगी अनुभव के आधार पर नहीं। जो है उसको मान लो, स्वीकार कर लो, और एक्सेप्टेंस का ये अर्थ बिल्कुल भी नहीं है, एक्सेप्टेंस बिल्कुल कोई दूसरी बात है, एक्सेप्टेंस, जब कोई कहे- एक्सेप्ट इट, तो पूछो क्या स्वीकार करूँ? दो बातें हैं जो स्वीकार की जा सकती हैं।

हर परिस्थिति में दो ही चीज़ें होती हैं- या तो सत्य या असत्य। या तो मैं ये स्वीकार कर लूँ, कि मेरा मूल स्वभाव आनंद है, प्रेम है या मैं ये स्वीकार कर लूँ कि बड़ी घृणा है चारों तरफ़, और घृणा तो है ही। क्या स्वीकार करूँ? जो है उसी को तो स्वीकार किया जाएगा न? और जो है, उसे जानना पड़ेगा स्वीकार करने से पहले। आपने एक बार ये स्वीकार कर लिया, कि मन तो भौतिक प्रक्रिया का उत्पाद है, तो फ़िर केन उपनिषद कहाँ से आ जाएगा? फ़िर कोई क्यों पूछेगा कि मन कहाँ से आता है?

एक्सेप्टेंस तो इसे ख़त्म कर देगी, ये बचेगा ही नहीं, ये स्वीकार का उपनिषद है? ये सवाल पूछा जा रहा है। न स्वीकार किया जा रहा है न अस्वीकार किया जा रहा है, जानने की कोशिश की जा रही है। जानूँगा और उसी आधार पर जियूँगा, और बिना जाने जियूँगा नहीं। कुछ भी मान नहीं लूँगा कि 'ऐसा ही होता है!' बिल्कुल कुछ नहीं मान लूँगा कि ऐसा ही होता है, कि ऐसा तो होना ही चाहिए।

मैं फ़िर कह रहा हूँ, बात इसमें भले ही दूर की हो रही हो, कि किस देवता ने आँख को ज्योति और कान को सामर्थ्य दे दिया? लेकिन ये दूर की बातें उठेंगी उसी के मन में, जो ज़िंदगी बड़े साफ़-सुथरे, सरल तरीके से बिता रहा है, वर्ना ये बातें उठेंगी ही नहीं, किसी हालत में नहीं उठ सकतीं। जिसने ये मान ही रखा है कि इतनी उम्र में ऐसा होना चाहिए, उसके बाद ऐसा होना चाहिए और फ़िर ऐसा होना चाहिए और ऐसा होना चाहिए, इन लोगों से ऐसे संबंध रखो, ऐसी समाजिकता निभाओ, इस तरीके से जियो, इस तरीके से पैसे इकट्ठा करो, फ़िर ये करो, फ़िर वो करो। जिसने मान ही रखा है कि जीवन का ये अर्थ है उसको ये सवाल नहीं उठ सकता, ये सवाल उस आदमी का उठाया हुआ सवाल नहीं है।

जो सड़क पर आम आदमी चल रहा है, जिसने ज़िंदगी को पहले से ही बने बनाए रंग दे रखे हैं, केन उपनिषद उसका नहीं है। देखिए! केन उपनिषद पर चर्चा करना तो बहुत आसान है, करोड़ों लोग बैठ कर चर्चा कर चुके होंगे, और बड़े-बड़े पंडित हुए हैं जिन्होंने इसपर अपनी टीकाएँ, व्याख्याएँ लिखी हैं, कोई फर्क नहीं पड़ गया उससे। जब तक आप इस काबिल नहीं हो जाते कि ये केन उपनिषद आप ख़ुद कह सको, जब तक ये सवाल आपके अपने सवाल नहीं बन जाते, तब तक किसी और के दिए उपनिषद से हमें कोई विशेष फ़ायदा होगा नहीं।

जीवन ऐसा हो, कि वो इस उपनिषद को जिए, जीवन ऐसा हो जिसमें इतनी जिज्ञासा हो, जानने की एक प्रबल उत्कंठा कि मुझे पता होना चाहिए, कि नहीं क्यों? जीवन ऐसा हो जो पलट-पलट कर बार-बार पूछे कि नहीं क्यों? नहीं क्यों? तब तो केन उपनिषद सार्थक हुआ, नहीं तो बैठकर पढ़ते रहिये, उससे कुछ हो नहीं जाएगा। हिंदुओं का एक प्रमुख शास्त्र है ये, वास्तव में करोड़ों लोग पढ़ चुके होंगे इसे अब तक, क्या हो गया उससे? उपनिषद पढा नहीं जाता, उपनिषद हुआ जाता है, होना पड़ेगा, ज़िंदगी ऐसी बितानी पड़ेगी। उसके बाद कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप इन्हीं शब्दों में ये सवाल पूछ रहे हैं कि नहीं पूछ रहे हैं कोई फर्क नहीं पड़ता, सवाल होना चाहिए।

शब्द आपके अलग हो सकते हैं, भाषा अलग हो सकती है, होनी ही चाहिये। ये किसी और समय में लिखा गया था, आज का समय अलग है, भाषा अलग होनी ही चाहिए, लेकिन सवाल तो हो, और ऐसा ही बचकाना सवाल, बिल्कुल बचकाना ही, बच्चे से आता हुआ। तब तो कुछ बात है वर्ना नहीं। और आगे भी सब वही है, इसको पढ़कर कुछ पा नहीं सकते हैं, ये उपनिषद आपको कुछ दे नहीं पाएगा, हाँ! आप में ये कुछ जगा ज़रूर सकता है। आप में ये यह जगा सकता है, कि ये सवाल पूछे जा सकते हैं, ऐसा जीवन भी संभव है, एक संभावना जग सकती है भीतर, कि यार अगर कुछ लोगों ने पूछा, मैं क्यों नहीं पूछ सकता।

प्र: आचार्य जी, बहुत सारे सवाल होते हैं, अब आदत ऐसी बन चुकी है कि या तो उन्हें टाल देते हैं या ध्यान ही नहीं देते, हम ख़ुद ही मार देते हैं उस प्रश्न को। इस चर्चा के बाद, यदि सवाल मन में आएगा तो उसे मरने तो नहीं देंगे कम से कम।

आचार्य: और यह याद रखना कि हमारे मन में जो सवाल आ रहा है, वो इससे ज़्यादा तो बचकाना नहीं हो सकता। कतई बचकाना सवाल है ये। मन कहाँ से आ रहा है? वाणी के पीछे कौन बैठा हुआ है? आँख का प्रोजेक्टर कौन चला रहा है? कान की मशीन कौन ऑपरेट कर रहा है, ये इस तरीके के सवाल हैं। और ख़बरदार अगर किसी बच्चे को डाँटा ये सवाल पूछने पर, इससे बड़ा पाप नहीं हो सकता। समझ में आ रही है बात?

यही प्रमुख सवाल है, और कोई प्रमुख सवाल नहीं है, बाकि सवाल तो दो कौड़ी के हैं, बाकी जितने भी सवाल हैं, वह दो कौड़ी के हैं, यह मौलिक सवाल है, स्रोत पर बैठे हुए हैं। कुछ भी नहीं है जो मान ही लेना है। कृष्णमूर्ति जो बोल गए, "ट्रुथ इज़ अ पाथलेस लैंड।" इसका अर्थ समझिए- कोई रास्ता नहीं है जिस पर चलना आवश्यक है, पाथलेस, कोई रास्ता नहीं है जिस पर चलना आवश्यक है।

प्र: और चल पाओगे भी नहीं कोई रास्ता ढूंढ़कर।

आचार्य: सारे रास्ते कल्पनाएँ हैं, डर के प्रतीक हैं बस, कि इसपर-इसपर चले चलो, वास्तव में हैं भी नहीं वो।

प्र: ये तो कुछ ऐसा है, जिसको बोल नहीं सकते हैं, जो है, बस इतनी-सी बात है, तो उसको हम रास्ता थोड़े ही दिखाएँगे।

आचार्य: पर रास्ते तो चारों तरफ हैं कि नहीं हैं? वो पंक्तियाँ हैं 'मुक्तिबोध' की कि अब तो रस्ते ही रस्ते हैं मुक्ति के राजदूत सस्ते हैं। मुक्ति चाहिए? ये रहा रास्ता। रस्ते ही रस्ते हैं, रस्तों पे चल के ये सवाल नहीं पूछे जाते। अगर इस प्रश्नकर्ता को इतने रास्ते दिखाई देंगे, तो ये क्या पूछेगा? कि सारे रास्तों के स्रोत क्या है? ये कहाँ से आ गए सब? और हम उसपर भड़क कर आगे बढ़ जाएंगे, "ऐसा तो होता ही है! ऐसा तो होना ही चाहिये!"

प्र: ये किसने बताया?

आचार्य: बहुत पंगे मत लो! परेशान मत करो देखो! जो कहा जा रहा है चुपचाप मान लो!(कटाक्ष करते हुए)

प्र: आज समझ आता है, भौतिकी कितनी पास है, क्यों वह और जानने की कोशिश कर रही है बिग-बैंग थ्योरी, पॉज़िट्रॉन, और अंदर घुसने की कोशिश कर रही है, कहीं रुकती नहीं है।

आचार्य: कहीं रूकती ही नहीं, बच्चे का ही मन है बिल्कुल, नहीं ये क्यों? तो ये क्यों? और तुम इसे देखोगे ध्यान से, अंततः इसमें जो जवाब भी आ रहे हैं, वो कोई आखिरी जवाब नहीं हैं, वो जवाब हैं ही नहीं, कुछ इशारे दे करके बात ख़त्म कर दी गई है। उपनिषद उत्तर नहीं दे रहा है। 'येन' उपनिषद इसका नाम नहीं है, केन उपनिषद नाम है इसका। सवाल! जवाब उपनिषद नाम नहीं है इसका, एक और उपनिषद है उसका तो नाम ही है प्रश्नोपनिषद। उत्तरोपनिषद जैसा कुछ भी नहीं है कहीं, आजतक नहीं लिखा गया, उत्तर की कोई कीमत ही नहीं है। मैं फ़िर कहूँगा इन शब्दों की कोई कीमत नहीं है, उस मन की कीमत है जहाँ से ये सवाल पूछे जा रहे हैं।

अगर हम वो मन बन सकें तब तो इसको पढ़ना सार्थक है, वर्ना इसमें कोई विशेष बात है नहीं, इसको पढ़कर आपको कोई ज्ञान ऐसा नहीं मिल जाना है जो बड़े काम का हो। आप दिन-रात इसे मंत्र की तरह उच्चारित कीजिए कुछ नहीं मिल जाएगा, कुछ भी नहीं है इसमें। अगर ऐसा बन सकें तब तो कुछ है, ये हममें कुछ जगा सके, इसको पढ़ के कुछ प्रतिध्वनित हो हमारे भीतर। वही जो बच्चा(मन) सो गया है बिल्कुल, वो बच्चा अगर जग सके, तब तो इस केन उपनिषद की कीमत है।

जैसे होता है न कि एक बच्चा घर में बिल्कुल उदास पड़ा हुआ है, और बाहर चार-पाँच खेलना शुरू कर दें, और उनकी आवाजें आने लगे भीतर, तो जो ये भीतर वाला क्या करता है, ये भी ऐसे जाएगा और खिड़की से देखेगा ये क्या हो रहा है, और अंदर तूफान मचाएगा कि मुझे भी खेलना है। अगर वो प्रक्रिया हो सके, तब तो इसको पढ़ने की कोई कीमत हुई। इसने पूछा, ये पूछ सकता है, ये मुझे याद दिला दे कि मुझ में भी सामर्थ्य है पूछने की, वो याद अगर आ सके, वो प्रतिध्वनि अगर पैदा हो सके, नकल करने की बात नहीं कर रहा हूँ कि यह जैसे पूछे रहा है, मैं भी वैसे ही नकल कर लूँगा, मैं आह्वाहन की बात कर रहा हूँ।

मुझे भी मेरी स्मृति आ सके, ये ताकत तो मुझ में भी है, जो चेतना यह सवाल पूछ रही है, वो चेतना तो मैं भी हूँ। यहाँ पूछा जा सकता है, यहाँ ज़िंदगी इतनी सरल तरीके से जी जा सकती है तो मैं क्यों नहीं जी सकता? ये हो सके, तब तो समझना कि कुछ हुआ नहीं तो फ़ालतू ही समय ख़राब किया।

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः।

चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥२॥

(केनोपनिषद, खण्ड १, श्लोक २)

हिंदी अनुवाद: जो (परमात्मतत्व) कर्णेन्द्रिय का श्रोत्र (श्रवण शक्ति) है, मन का मन (मनन क्षमता) है, वागिन्द्रिय की वाणी (वाक् शक्ति), प्राण का प्राण (संचालक) है, चक्षु का चक्षु (दर्शन क्षमता) है, अर्थात् जो इन सबका कारणभूत तत्त्व है, (उसे जानने वाले) धीर पुरुष (जो चक्षु, श्रोत्र, मन आदि के आवेगों से उद्वेलित नहीं होते) इस लोक से जाते हुए (अथवा जीवन मुक्त होकर) अमर हो जाते हैं ॥२॥

आचार्य: श्रोत्रस्य श्रोत्रं- कान का कान, बात विरोधी है, बच्चा है, जो यह कह रहा है, साथ चल सको तभी मजा आएगा। मनसो मनो- मन का मन, यद वाचो ह वाचं- वाणी की भी वाणी, स उ प्राणस्य प्राणः - बड़ा पोयटिक बच्चा है, जान की जान, आँखों की आँख, और फ़िर एक वक्तव्य आ गया है जिसका कोई कारण नहीं दिया गया है, क्या है वक्तव्य?

"धीरपुरुष (ज्ञानी जन) अतिमुक्त होकर इस लोक से जाने पर अमृतस्वरूप हो जाते हैं।"

आचार्य: क्या है जो मर सकता है?

प्र: ये शरीर मर सकता है, मन मर सकता है, और जो नहीं मर सकता वो जो साक्षी है, जिसकी हम बात करते हैं।

आचार्य: पानी ख़त्म हो जाएगा झरने का, और होता ही रहता है लगातार, बहना शुरू करा नहीं कि उसके ख़त्म होने की यात्रा भी आ गयी। कुछ इधर छिटकेगा, कुछ भाप बन जाएगा, कुछ जा करके समुद्र में मिल जाएगा, जो स्रोत है वो भी ख़त्म होता रहता है क्या? बहना किसका स्वभाव है? पानी का, या स्रोत का भी है? स्रोत भी बहता रहता है पानी के साथ? अभी आ रहे हो टाइगर फॉल से, क्या बह रहा था वहाँ पर? पानी। या उद्गगम भी बह रहा था? जब हम कहते हैं कि हम मर जाएंगे तो उसका अर्थ बस यही होता है कि मैं ये शरीर हूँ और यह शरीर ख़त्म हो जाएगा, और अगर मैं उद्गगम हूँ तब?

प्र: तब तो ख़त्म होने की बात ही नहीं है, और शब्दों को भी हम पकड़ें तो कहते हैं कि देहांत हो गया।

आचार्य: बहुत बढ़िया, तो देहांत तो हो सकता है, पर स्रोत का भी कोई अंत होता है? अब देह के अंत को अपना अंत मान लेना आपका फैसला है, माने रहो। देहांत होता है, निश्चित रूप से होता है और वह प्रतिक्षण हो रहा है। अभी हम बैठे भी हैं तो भी देह में कितनी ही कोशिकाएँ हैं जो ख़त्म हो रही हैं। वैसे न देखो तो ऐसे देख लो कि प्रतिक्षण मौत की तरफ ही बढ़ रहे हैं, हमने अभी जब 10 मिनट पहले बात करना शुरू किया था तब हम मौत के जितने करीब थे, अब हम मौत के 10 मिनट ज़्यादा करीब हैं।

तो मौत तो प्रतिक्षण घट रही है देह की, देहांत होगा पक्का होगा, देहांत को अपना अंत मानना है तो मान लो। धीर शब्द प्रयोग किया है बुद्धिमान के लिए, धीर पुरूष मृत्यु के पार चले जाते हैं, अर्थ समझिएगा इसका। धीर शब्द का इस्तेमाल किया गया है, धर उसका स्रोत है। रुट- "धर", धर मतलब जो बेस है, जो धर्ता है, जो धारण करता है, जो मौलिक है। तो कौन है बुद्धिमान? जो स्रोत पर पहुँच गया है, जो मूल पर पहुँच गया है। मूल की कभी मृत्यु नहीं होती, स्रोत की कभी मृत्यु नहीं होती।

प्र: "दिस वर्ल्ड" जो है, मन की दुनिया है या अभी जो भी हमारे आँखों के सामने घट रहा है वही है? दिस वर्ल्ड का मतलब बताइए।

आचार्य: दिस वर्ल्ड एक ही वर्ल्ड है, यही। यह संसार।

प्र: आचार्य जी इसको ऐसे भी सम्बंधित कर सकते हैं, हम जानते हैं इस बात को कि एक तारे का भी अंश हमारे अंदर है, यानी कि जो पहला इंसान हुआ होगा, उसका भी अंश हमारे अंदर है, हमारे शरीर में कहीं न कहीं अंश है, तो इसे ऐसे भी देखा जा सकता है कि मरना तो है ही नहीं, मरती तो सिर्फ़ देह ही है।

आचार्य: देखो देह का अर्थ यही है कि ये व्यवस्था बनी रहे, बाकी तो हमें पता है, पदार्थ नष्ट नहीं हो सकता। तो जला भी दिए जाओगे तो गैस-वैस बन जाओगे, राख बन जाओगे, यही होगा, पर फ़िर भी मृत्यु तो घटित होगी, क्योंकि व्यवस्था टूट गयी।

प्र: पर आचार्य जी, मृत्यु भी किसकी होती है, जो इस समय चल रहा है मन, अगर ध्यान दिया जाए तो एक जिंदा शरीर और मृत शरीर में अंतर ही क्या है? जिंदा शरीर सोचता है, मृत शरीर सोचता नहीं है।

आचार्य: तो ये लेकिन सबसे पहले बिल्कुल गहराई से मान लेना होगा कि शरीर और मन, ये तो ख़त्म होने ही होने हैं। ये फैसला मेरा है कि मुझे उनके साथ अपनेआप को जोड़कर देखना है कि नहीं है। भई! मैं ये कर सकता हूँ, कि मैं ये दीवार हूँ, और जिस दिन ये दीवार टूटे मैं क्या घोषणा कर दूँ? मैं मर गया। दीवार टूटेगी, ये फैसला मुझे करना है कि मुझे अपनेआप को इस दीवार के साथ जोड़कर देखना है कि नहीं देखना है। इंद्रियों को पकड़ लिया है इस आदमी ने, इंद्रियों को इस पूछने वाले ने पकड़ लिया है, शरारती है ये बहुत, कोई उत्तर नहीं देना चाहता लेकिन कह रहा है कि आँख वहाँ नहीं जाएगी, वाणी वहाँ नहीं जाएगी, मन वहाँ नहीं जाएगा। और तुम्हें कैसे पता नहीं जाएगा? कोई जवाब नहीं दे रहा।

न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो

न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्या

दन्यदेव तद्विदितादयो अविदितादधि।

इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्वयाचचक्षिरे॥३॥

(केनोपनिषद, खण्ड १, श्लोक ३)

हिंदी अनुवाद: वहाँ (परब्रह्म परमात्मा तक) चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों, वाक् आदि कर्मेन्द्रियों तथा मन की भी पहुंच नहीं है। उसे जानने की बुद्धि हममें नहीं है, न ही किसी अन्य की व्याख्या से यह संभव हो सकता है, क्योंकि वह ज्ञात और अज्ञात सभी तत्त्वों से सर्वथा परे है- ऐसा हमने अपने पूर्वाचार्यों के मुख से सुना है, जिन्होंने हमें उस ब्रह्म के विषय में भली-भाँति व्याख्या करके समझाया है।

आचार्य: तीसरा सूत्र है, आँख वहाँ नहीं जाएगी, वाणी वहाँ नहीं जाएगी और मन वहाँ नहीं जाएगा, कहाँ नहीं जाएगा? यह भी नहीं बता रहा, बस कह रहा है वहाँ जाएगा नहीं, इशारा डाल दिया है। बिल्कुल शरारत!

"न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः।"

तत्र माने कहाँ? नहीं बताया।

प्र: सोचते रहो, सोचने के लिए भी मन को भी ख़त्म कर दिया है न, सोचते रहो, सोचने से पहुँच नहीं पाओगे।

आचार्य: सोचते रहो, सोचकर पहुँच नहीं पाओगे।

सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार।।

चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिव तार।।

कौन हैं ये? गुरु नानक, जे सोची लख वार। सोच-सोच कर तो नहीं पहुँच पाओगे, पर यह पक्का पता है कि 'तत्र' जैसा कुछ है ज़रूर, एक जगह है ज़रूर, अगर नकली है तो असली है ज़रूर, अगर झरना है तो उसका उदगम है ज़रूर, ये पक्का है, छाया हैं तो कोई असली चीज़ है ज़रूर। न जाना जा सकता है, न जनाया जा सकता है। तो ये उन्हीं के लिए है उपनिषद, जिनको पहले ही ऐसी प्रतीतियाँ हो रही हों, बाकियों के लिए तो यह बड़ी एक खाली पहेली बन जाएगी, जो उन्हें सिर्फ़ चिढ़ा सकती है। न जाना जा सकता है, न जनाया जा सकता है।

"न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्"

यह नाम देना भी गलत होगा कि 'अंजाना' है, न जाना है, न अनजाना है। क्योंकि मन ने अगर यह भी कह दिया कि अगर अंजाना है, तो मन के भीतर हो गया, मन के क्षेत्र में आ गया, लेबल लग गया, नाम हो गया। न जाना है न अनजाना है, कौन-सी प्रक्रिया चल रही है ये? "नेति-नेति"।

जब मन के पार है तो आप नेति-नेति के अलावा और कुछ कर भी नहीं सकते, ऐसा हमसे कहा है उन्होंने जिन्होंने जाना है। कहा तो बहुतों से गया है, पर कोई ही है जो उस कहने को जी पाया है। मैं बार-बार इसी पर वापस आऊँगा, कि इन शब्दों का कोई मोल नहीं है, कि आँख की आँख, ज़बान की ज़बान, जाने से परे और अनजाने से परे, इन बातों का कोई मोल नहीं है, ये करीब-करीब ज़ेन-क़्वान ही हैं, ये करीब-करीब क़्वान हैं, जो अपनेआप में कोई विशेष महत्व नहीं रखते, महत्व उनका इसमें होता है कि वह आपके भीतर क्या जगा रहे हैं? इशारा किधर को कर रहे हैं? आपको क्या बना दे रहे हैं?

अब अगले जो कुछ सूत्र आएँगे, उनकी जो दूसरी पंक्ति है वो सब में समान है, और बड़े काम की है उसपर ध्यान दीजिएगा। जो पहली पंक्ति होगी वो फ़िर से एक साधारण सी बात कह रही होगी, दूसरी पंक्ति दोहराई जाएगी, और जो दोहराया जा रहा है, कोई कारण है कि इसको दोहराया जा रहा है कहने वाले ने ज़रूरत समझी है, कि बात महत्वपूर्ण है इसे बार-बार कहा जाए, इसीलिए उसको दोहरा रहा है।

यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥४॥

(केनोपनिषद, खण्ड १, श्लोक ४)

हिंदी अनुवाद: जो वाणी के द्वारा वर्णित नहीं किया जा सकता; अपितु वाणी ही जिसकी महिमा से प्रकट होती है, उसे ही तुम ब्रह्म समझो। वाणी द्वारा निरूपित जिस तत्त्व की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है।

आचार्य: क्या दोहराया जा रहा है?

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥

हमने पहली पंक्ति पढ़ी भी नहीं है, दूसरी पर आ रहे हैं, मैं समझ रहा हूँ दूसरी का ही महत्व ज़्यादा है, और देखिए कितनी बार जो दूसरी पंक्ति का दोहराव हुआ है? गिनिए। कोई वजह है, कोई कारण है, उसको समझना पड़ेगा, अर्थ क्या है इस पंक्ति का?

उसको ही तुम ब्रह्म जानो, न कि उसको जिसकी वह सब पूजा कर रहे हैं। निश्चित रूप से कल्पनाएँ और अंधविश्वास हर समय में फैले होते हैं, निश्चित रूप से उस समय भी बहुत लोग थे, जो अपने ही मन के आकारों की पूजा कर रहे थे, उसे ब्रह्म जानकर, सत्य जानकर। जो छायाओं की पूजा कर रहे थे, उसे मूर्त जानकर, एक और छाया न पैदा कर दे, एक और भ्रम न पैदा कर दे, शायद इसीलिए सिर्फ़ इशारे किये गए हैं। जो पहली पंक्ति है वह क्या बोलती है?

"यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते।"

वह, शब्द जिसे पकड़ नहीं सकता, पर वह जिसके द्वारा, जिसके सामर्थ्य से, जिसकी वजह से शब्द उच्चारित होता है, उसको ही तुम ब्रह्म जानो न कि उसको, न कि किसको जिसकी ये चारों तरफ उपासना चल रही है। जगराते आज ही नहीं चालू हुए हैं।

प्र: यज्ञ तो तब भी होते ही थे सूर्यदेव हैं, सबको देव बना ही दिया था।

आचार्य: तब भी मूढ़ों की कमी नहीं थी, जो सत्य को अलग-अलग तरह की कल्पनाओं में बांधने की कोशिश में लगे थे।

प्र: इशारे को ही पकड़ के उसकी पूजा करते रहते थे। इशारे की ओर नहीं जाते थे।

आचार्य: जब भी किसी को सत्य के बारे में बड़ी ठसक के साथ बोलते हुए देखिए, पॉजिटिव अफर्मेशन (सकारात्मक पुष्टि) के तौर पे, तो समझ जाइए कि यह आदमी कल्पनाओं में खोया हुआ है, और यह मुझे भी लेकर डूबेगा।

देख रहे हो कितने आदर के साथ, कितनी सूक्ष्मता से ब्रह्म की ओर बड़ा एक हल्का इशारा भर किया जा रहा है, ये धृष्टता की ही नहीं जा रही कि मैं बहुत ज़्यादा बोलूँ। बस इतना बोल दिया गया कि वाणी जिसे बोल नहीं सकती, पर जो वाणी के पीछे की शक्ति है वही ब्रह्म है।

प्र: पांडित्य बखारने का प्रयोजन नहीं है।

आचार्य: कोशिश ही नहीं की गई है कि ब्रह्म की बड़ी व्याख्या कर दी जाए। ब्रह्म माने सिर्फ़ रियलिटी, सत्य। यह कोशिश ही नहीं की गई है कि बहुत ज़्यादा कुछ बोला जाए, बड़ी विनम्रता है, गहरी विनम्रता है, ये दम्भ है ही नहीं कि मैंने सच को मुट्ठी में पकड़ लिया है। मज़ेदार बात है, जो पकड़ लेता है उसको फ़िर बड़ा आनंद आता है दूसरों को परोसने में भी, ये तुम देख रहे हो ये आदमी कितना विनीत है?

प्र: सच सीधा-सीधा अगर बोल दिया जाएगा, फ़िर वही बात है न कि लेबलिंग कर दी, उसको बोल ही नहीं सकते।

आचार्य: मगर कहकर भी ध्यान से देखो तो कुछ कहा नहीं है, इतना ही कहा है- शब्द जिसकी ओर नहीं जा सकते, पर जो सब शब्दों का आधार है उसी को ब्रह्म जानो। कुछ भी नहीं कहा है, ये आदमी असली है, ये कोई दावे कर ही नहीं रहा, इसने कहने को कह दिया है पर देखो ध्यान से कि क्या कुछ भी कहा है? कुछ भी नहीं कहा है, असल में यह वही कह रहा है जो लाओत्ज़ु कहता है।

पहली बात, सत्य के बारे में कुछ भी कहा तो नहीं जा सकता, पर कुछ तो कहना ही है, तो एक हल्का-सा इशारा डाल दिया है बस, और ऐसे ही आदमी को सच्चा जानना। जो तुमसे मिलकर कहे कि मेरी दुकान पर सच बिकता है, वहाँ समझ जाना कि बस समोसे से ही होंगे सच नहीं हो सकता। समोसे बेचे जा सकते हैं, सच नहीं बेचा जा सकता, न परोसा जा जा सकता है, न मुफ़्त हीं दिया जा सकता है, जिया जा सकता है। आगे भी ऐसा ही है, कुछ कह ही नहीं रहा, कहने वाला आपको भ्रम में डाल रहा है कि कुछ कह रहा है, कह कुछ रहा ही नहीं है।

प्र: ये ब्रह्म और भ्रम, इसमें बड़ा अंतर हैं, ब्रह्म, भ्रम से नहीं निकलता है, मतलब हम जो देख रहे हैं वो डर है।

आचार्य: हम जो देख रहे हैं वह भ्रम है, फ़िर वही कहा है-

यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्।

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥५॥

(केनोपनिषद, खण्ड १, श्लोक ५)

हिंदी अनुवाद: मन से जिसका मन नहीं किया जा सकता; अपितु मन जिसकी महत्ता से मनन करता है, उसी को ब्रह्म समझो। मन द्वारा मनन किए हुए जिसकी लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है। आचार्य प्रशांत: वह जिसे मन सोच नहीं सकता, पर जिसके द्वारा मन सोच में प्रविष्ट होता है, बस उसी को ब्रह्म जानो। बस पहेली है- तुम उसे देख नहीं सकते पर तुम्हारे देखने के पीछे वही बैठा है तुम उसे ही ब्रह्म जानो।

प्र: सोच में प्रवेश करना क्या है?

आचार्य: सोचना, सोचना, बस सीधे-सीधे सोचना

प्र: अगर सोचने से प्राप्त नहीं हो सकता है, तो फ़िर वह क्यों सोचने के लिए कह रहा है?

आचार्य: हम उसे नहीं सोच पाते, पर हमारे सोचने की ताकत वही है। सोच उसे सकते नहीं, पर उसके बिना सोचा जा सकता नहीं। आप उसे नहीं सोच सकते पर उसके बिना सोचना संभव नहीं है।

प्र: आचार्य जी, ब्रह्म रचनाकार ही तो हैं न?

आचार्य: 'ब्रह्म' की बात हो रही है, 'ब्रह्मा' की नहीं बात हो रही है यहाँ पर।

प्र: जो सत्य है, ये 'ब्रह्म' यही है, और जो 'ब्रह्मा' है, वो?

आचार्य: वो कुछ नहीं है, खिलौना है।

प्र: एक कहानी है कि, एक रहस्य है, बच्चे को कहानी कही जा रही है कि 14 लोग हैं, उसमें 3 आदमी हैं राजा था, उसने 3 शरीर धारण किये थे- एक पीला, एक सफेद और एक काला रंग था, तो ये बने ब्रह्म-विष्णु-महेश। तो ये जो आध्यात्मिक ग्रंथ हैं, बस समझने के लिए एक इशारा किया है, क्योंकि मन तो मन है।

आचार्य: ये कुछ भी नहीं है देखिए, ये कुछ भी नहीं है और इसे आध्यात्मिक साहित्य कहना भी नहीं चाहिए, ये वही हैं, खिलौने।

प्र: मन को शांत करने के लिए ये कहा गया है।

आचार्य: कोई शांत नहीं होता, इनको सुन के कोई शांत नहीं हो जाता, आपके पुराण जो हैं, उनका सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है इस वक्त मन को अशांत करने में। मन कहानियों से नहीं शांत होता, मन अपने ही द्वारा रची गयी कल्पनाओं से सिर्फ़ संस्कारित ही हो सकता है, यह सारी बातें इधर-उधर की उनसे नहीं हो जाता है मन शांत।

प्र: ये सब उस मन का काम है, जो उत्तर खोजते है, केन उपनिषद तक नहीं पहुँच सकते हैं।

आचार्य: मिल गया उत्तर। अब क्या करना है- जगत कहाँ से आया? ब्रह्मा ने बनाया, ख़त्म प्रश्न। अब क्या करना है केन उपनिषद का?

यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षुःषि पश्यति।

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥

(केनोपनिषद, खण्ड १, श्लोक ६)

हिंदी अनुवाद: जिसे चक्षु के द्वारा नहीं देखा जा सकता; अपितु चक्षु जिसकी महिमा से देखने में सक्षम होता है, उसे ही तुम ब्रह्म जानो। चक्षु के द्वारा द्रष्टव्य जिस तत्त्व की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है।

आचार्य: आँख नहीं देख पाएगी, पर जिसके बिना आँख बेकार है। जैसे मुर्दे की आँख कि होते हुए भी नहीं देख सकती। आँख होती है न मुर्दे के पास भी? और उसकी आँख और हमारी आँख में कोई अंतर नहीं है, सच तो यह है, कि ताज़ा मुर्दे की आँख अगर निकाल लो और असली आदमी के लगा दो, तो काम आ जाती है, कोई दिक्कत नहीं होती। मुर्दे की आँख और जिंदा व्यक्ति की आँख में कोई अंतर नहीं है, सिवाय इसके कि अब वो स्रोत से कट गयी है, प्राण नहीं रहा, और उस प्राण को पकड़ा नहीं जा सकता, जाना नहीं जा सकता।

प्र: आप कितनी भी कोशिश कर लीजिए पर आप ये नहीं बता सकते किसी भी इलेक्ट्रिकल इंस्टूमेंट से कि इलेक्ट्रिसिटी आखिर होती क्या है? और उसके बिना सब बेकार है।

आचार्य: अगले दो श्लोक भी यही कह रहे हैं, कान जिसे सुन नहीं पाएगा पर जिसके द्वारा कान सुनने की शक्ति पाता है उसी को ब्रह्म जानो, उसको नहीं जिसकी उपासना हो रही है चारों तरफ।

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