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करीब आने का क्या अर्थ है? || आचार्य प्रशांत (2017)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्न: करीब का क्या अर्थ है? वाक् में आपके साथ, केबिन में आपके साथ या जो आप हैं उसे समझना? मैं चाहता हूँ मेरा संबंध आपसे प्रेम का बने, प्रभावित करने का नहीं।

वक्ता: करीब आना क्या है? वो तो जो करीब हैं वही बता सकते हैं। और अगर बता सकने वाली चीज़ होती तो बता-बता के ही करीब कर दिया होता उन्होनें। करीब आना क्या है, उसके लक्षण अगर बता भी दिए जाएँ तो उससे कुछ विशेष लाभ होगा नहीं क्यूंकि वो बातें तो चखने की होती हैं। जिसने पाया, बस उसी ने जाना। तो मैं करीबी से विपरीत दूरी पर बात करूँगा कि दूरी क्या है? दूरी तुम बखूबी जानते हो। उस पर चर्चा हो सकती है। दूरी पर बात करते-करते हो सकता है, करीबी के बारे में कुछ बातें पता चल जाए।

अहंकार को आश्वस्ति कभी नहीं होती और अहंकार से ज़्यादा आश्वस्त कोई होना नहीं चाहता।

अहंकार लगातार तरीके खोजता है किसी बात को तय कर लेने के, पक्का कर लेने के। बात जितनी तय होती है, अहंकार को एक छोर पर बड़ा सुकून मिलता है कि बात ठीक है; मैं कुछ जान गया। मैं शांत हो सकता हूँ, मैं चैन से सो सकता हूँ। लेकिन जितनी आश्वस्ति बढ़ती जाती है, अहंकार का खौफ़ भी उतना ही बढ़ता जाता है। जैसे कि तुम किसी टूटे हुए कटोरे में पानी भरने की कोशिश कर रहे हो। जितना ज़्यादा तुम पानी उसमें डालते जाओगे, उतना ही तुम्हारी निराशा बढ़ती जाएगी क्यूंकि पानी का डालना ही तुम्हें यह सिद्ध कर देगा कि यह कटोरा तो कभी भी भरेगा नहीं। जिसने अभी थोड़ा बहुत ही पानी डाला, उसको अभी उम्मीद बंधी रहेगी। उसको ऐसा लगेगा कि अभी उस पर प्रयत्न करूँगा तो शायद यह कटोरा भर जाए। पर जिसने जितना भरा, उसे कहीं न कहीं, साफ़-साफ़ दिखता जाता है कि यह चीज़ तो भरने की नहीं है। इसका तो अंत कभी आएगा नहीं। यहाँ तो कभी चैन पाऊँगा नहीं।

आश्वस्ति का भी यही हिसाब है। तुम जितना ज़्यादा अपनी सुरक्षा बढ़ाते हो; तुम जितना ज़्यादा यह तय करने की कोशिश करते हो कि, ‘’मुझे पता है कि क्या है, मैं कौन हूँ और दुनिया कैसी है,’’ तुम जितना ज़्यादा यह तय करने की कोशिश करते हो, उतना ज़्यादा तुम्हारा खौफ़ बढ़ता जाता है कि तय करने की तमाम कोशिशों के बाद भी तुम पाते हो कि तुम्हारे भीतर दुविधा बची हुई है। तुम्हारे भीतर संशय, संदेह बचे हुए हैं। तुम्हें खुद ही प्रमाण मिलते रहते हैं। तुम अटक-अटक जाते हो। तुम ठिठक जाते हो। निर्णय लेने से पहले सोचना पड़ता है बहुत। फंस जाते हो! यह सब इसी बात के प्रमाण हैं कि तुमने जाना नहीं और अगर तुम बहुत जानकार आदमी हो, तो यह प्रमाण तुम्हें डर से निराशा से और कुंठा से भर देते हैं। तुम कहते हो अभी भी कुछ पता नहीं है मुझे। और इतना तय करने के बाद भी अगर अभी भी पक्का नहीं हुआ है, तो अब आगे के लिए भी क्या उम्मीद है!

तुम्हें यह एहसास लगातार सताता ही रहता है कि, ‘’मैं नकली हूँ, झूठा हूँ, कुछ जानता नहीं। जितना जानता हूँ, वो सतही है। जितना जानता हूँ, वो जीवन जीने में उपयोगी नहीं है। जितना जानता हूँ, वो सत्य के सामने बिलकुल नाकाफ़ी है। जब जीवन की चुनौतियाँ आती हैं, तो मैं जैसा हूँ, मैं कहीं ठहर नहीं पाता।’’ यह एहसास रहता है, सताता रहता है। तुम क्या कोशिश करते हो? जितना ही यह एहसास तुम्हें सताता है, तुम अपने आप को आश्वस्ति से उतना ही और भरते हो! तुम कहते हो, ‘’ठीक है, यह पता कर लूँ, वो पता कर लूँ।’’ तुम और करोगे क्या? क्यूंकि तुम्हें और जीने का कोई तरीका आता नहीं! तो आप देख रहे हैं क्या हो रहा है? अहंकार जितना ज़्यादा दुःख और कुंठा पा रहा है, वो उतना ही ज़्यादा अपने आप को और बढ़ा रहा है। क्यूंकि वो सोच रहा है कि दुःख और कुंठा को हटाने का तरीका ही यही है कि, ‘’मैं और बढूँ!’’ अब यह बड़ा कुचक्र है जो मन में चलता रहता है; विशियस साइकिल। जितनी कोशिश करता जाता है, मन उतना ही ज़्यादा उसको पक्का होता रहता है कि, ‘’मैं नाकाफ़ी हूँ, झूठा हूँ, असत्य हूँ,’’ पर उसकी बेचारे की त्रासदी यह है कि कुछ और तरीका जानता नहीं। तो वो एक झूठ आविष्कृत करता है; वो झूठ यह होता है कि सब ठीक है! हम सब के लिए वह झूठ बहुत ज़रूरी है।

एक फ़िल्म आई थी और उसमें जो केंद्रीय चरित्र था वो बार-बार बोलता था, ‘’*आल इज्ज़ वेल*’’ और लोगों को वो बात बड़ी पसंद आई! लोगों को वो बात इसलिए नहीं पसंद आई क्योंकि लोगों को उससे आत्मा की प्रतीति हो गयी! लोगों को वो बात इसलिए पसंद आई क्यूंकि, ‘’उससे हमें एक सहारा मिलता है। हमारे झूठों को एक सहारा मिलता है कि जो है, ठीक है। दिल में हम जानते हैं कि ठीक कुछ भी नहीं है! सब ठीक होता तो हमारी ज़िन्दगी ठीक वैसी चल रही होती, जैसी चल रही है?’’ सकुची, सहमी, कदम-कदम पर ठोकरें खाती! प्रेम हीन! आनंद हीन! ऐसी होती? अब प्रेमहीन, आनंदहीन है, लेकिन कोई तरीका भी नहीं जानते हैं कि प्रेम पाएं कैसे? आनंद पाएं कैसे? तो हम अपने आप से एक झूठ बोलते हैं कि, ‘’प्रेम है, आनंद है! आल इज्ज़ वेल! सब ठीक! ऐसा ही तो होता है, सब ठीक है! ज़िन्दगी ऐसी ही होती है! इससे बहतर कुछ नहीं मिलेगा।’’ तो हम सब इस झूठ में शरण लेते हैं कि सब ठीक है। सब ठीक है! और हम अपने आप को यह भी आश्वस्त कर लेते हैं कि सब ठीक ही है! जिसने अपने आप को यह आश्वस्त कर रखा हो कि सब ठीक ही है, वो एक परिस्थिति और एक इंसान से बहुत डरेगा और कभी उसके करीब नहीं आएगा।

किस परिस्तिथि से और किस इंसान से?

जिसके सामने आते ही यह दिख जाए कि कुछ भी ठीक नहीं है। वहाँ तुम्हारे लिए बहुत आवश्यक हो जाएगा दूरी बढ़ाना। बढ़ाओगे क्या? बढ़ी ही हुई है! तो दूरी बना के रखना! कि जैसे बीमारों की एक सभा हो, क्लांत मुरझाए हुए सबके चेहरे, और वहाँ कोई स्वस्थ आदमी आ जाए। और उसके होने का तेज़ ही अलग हो। तुम उस व्यक्ति के चेहरे की ओर देखना नहीं चाहोगे क्यूंकि उसका होना इस बात को प्रमाणित करता है कि तुम बीमार हो। कि तुमने अपने आप को जितने आश्वासन दे रखे थे, सब झूठे हैं कि, नथिंग इज्ज़ वेल! तुम उसका चेहरा नहीं देखना चाहोगे। तुम दूरी बनाना चाहोगे। तुम्हें बहुत बुरा लगेगा।

यह है दूरी का मनोविज्ञान। दूरी बनाना आवश्यक है। पर समझो कि अगर तुम दूरी भी बनाते हो तो, उसमें भी तुम अच्छे से समझ रहे हो कि तुम दूरी क्यूँ बनाते हो। और वो समझ तुम्हें मैंने नहीं दी है। दूरी बनाने का निर्णय किसका है? तुम्हारा। उस निर्णय के पीछे जो कारण है, वो मैंने नहीं दिया है तुमको। यह बोध है तुम्हें! कि कुछ गड़बड़ है और वो बोध तुम्हारा अपना है। मैंने नहीं दिया है। जहाँ से वो बोध आ रहा है, वहीँ से जीवन परिवर्तन की उर्जा भी आएगी, अगर उसे सही दिशा दे सको। जो उर्जा तुम अभी मुझसे बचने में लगाते हो, वही उर्जा जब तुम्हारी ओर मुड़ेगी तो तुम्हारा काया-कल्प कर सकती है। वो उर्जा अभी व्यर्थ जा रही है। वो उर्जा अभी बस तुम्हारे अहंकार की सुरक्षा में व्यतीत हो रही है। और उससे कोई सुरक्षा मिल भी नहीं रही अहंकार को, क्यूंकि

अहंकार की दूरी बनाने की सारी कोशिशें बताती हैं कि डरा हुआ तो वो है ही।

डरा हुआ न होता, तो वो दूर क्यूँ रहता? तो दूर रह कर के तुम दूर रहने वाले फ़ायदे भी नहीं उठा पा रहे। मिल क्या रहा है दूर रहने से? जो भय तुम्हें दूर रखता है, वो भय तो अपने सीने में ही लेकर घूम रहे हो न! तो दूर रह कर क्या मिला?

पर भूलना नहीं, तुम अपने सीने में सिर्फ़ वो डर ही लेकर नहीं घूम रहे। तुम अपने सीने में बोध का बीज भी लेकर के घूम रहे हो। उस बोध के बीज के बिना तो, वह भय भी नहीं आ सकता था! कोई आदमी अगर सूरज को देखना नहीं चाहता और अँधेरे में पनाह मांगता है तो एक बात तो पक्की है, अँधा नहीं है वो। अँधे नहीं हो। बस आदत पाल ली है अँधेरों की, बिलों में छुपने की। और सूरज से भागोगे कैसे? सूरज तुम्हारे ह्रदय में बैठता है। वहाँ कोई अन्धकार नहीं होता। मन को तुम चाहे जितना भर लो अँधेरे से, ह्रदय में तो प्रकाश ही रहता है। तो प्रकाश से भागोगे कैसे? मन कहीं भी जाएगा, कितने भी अँधेरे में छुपेगा, अपने ही स्रोत से, अपने ही केंद्र से कहाँ भागेगा? वहाँ प्रकाश है।

भागते हुए आदमी की यही तो विडम्बना है। भागने की जो उर्जा देता है, उसी से तुम भाग रहे हो।

समझिये, कोई ज़ोर से भाग रहा है, किससे बचने के लिए? उससे जो भागने की उर्जा देता है। तुम कितना भी भागोगे उससे कहाँ जाओगे बच कर? तुम आँखों से देख रहे हो कहीं वो आसपास तो नहीं है? और आँखों से देख-देख कर के तुम किससे बचना चाहते हो? जो आंखों के पीछे बैठा है! कैसे बचोगे? कैसे बचोगे?

और फिर बात मेरी नहीं है। मैं तो शरीर हूँ, आज हूँ, कल नहीं। मुझसे बचने के तुम हज़ार तरीके निकाल सकते हो। और तुम नहीं भी निकालो तो भी प्रकृति की बात है कि एक दिन मुझे नहीं होना है। तो बच जाओगे। उम्र में मुझसे छोटे हो, ज़्यादा सम्भावना इसी की है कि पहले मैं ही जाऊंगा। बात मेरी नहीं है। तुम जिससे बचना चाहते हो, अंशु,(श्रोता को इंगित करते हुए) वो मैं नहीं हूँ। वो तुम्हारे ही भीतर का प्रकाश है। तुम उससे बच नहीं पाओगे। तुम उसी से दूरी बना रहे हो। अपने आप से दूरी बना कर कौन जी सकता है? तो तुम में से जिन भी लोगों की यह कोशिश रहती है कि मुझसे बचें वो नाहक व्यर्थ कोशिश में लगे हैं। तुमसे होगा ही नहीं। फिर इसी लिए मैं चिंता भी नहीं करता जो बचने की कोशिश करता है। ठीक है। जो मुझसे बचने की जितनी कोशिश कर रहा है, जो खूब उर्जा लगा रहा है, कोशिश लगा रहा है; वो बड़ा करीब है मेरे। मुझ ही से तो उर्जा पा रहा है!

तो तुम दुबको, तुम उधर कोने वाले कुर्सी में जा कर बैठ जाया करो। कि तुम सेशन ख़त्म होने के बाद आया करो। तुम्हें जितनी कोशिशें करनी हैं कर लो। वो तुमसे कोशिशें भी तो, मैं ही करवा रहा हूँ न।

अब रही बात करीब आने की, जिसकी हमने बात करी नहीं। दूरी ही दूरी कहते रह गए। मुझे नहीं मालूम, किसको कहते हो तुम, करीब आना। जो करीब है उसको तो पता भी नहीं है कि करीब है।

करीब होना कोई ज़ोर की उद्घोषणा नहीं होती। करीब होना कोई घटना नहीं होती। वो तो ऐसे होता है जैसे पानी में पानी मिला हुआ है।

अब कौन उसका हिसाब रखे और कौन उसका निशान ढूंढें। किसको पता, जो पानी मिला था वो कहाँ गया और जिससे मिला था वो कहाँ गया? कोई लेबिल चिपका है? ढूंढ लो। वो तो बड़ी सहज, बड़ी साधारण घटना होती है। तुमने लिखा है न कि करीब आने का क्या अर्थ है? कि आपके केबिन में साथ बैठूं, वाक् में साथ चलूँ, क्या आप जो कहते हैं वो समझूँ? आप जो हैं उसे समझूँ? कुछ भी नहीं। यह सब तो छवियाँ हैं तुम्हारे मन में। निकटता तो बहुत अलग बात है। उसको तुम कभी समझ नहीं पाओगे। और जब तक समझोगे तब तक देर हो चुकी होगी। समझने वाला ही जाने को तैयार खड़ा होगा।

निकटता का अर्थ होता है: एक पूरा ऐसा जीवन जिसमें निकटता संभव हो। किन्हीं भी दो इकाइयों में निकटता तभी होती है जब उन्होंनें अपने ऊपर सुरक्षा कवच न लगा रखे हों। जब वो दोनों डरी हुई न हों। नहीं तो निकट कैसे आएँगी? आप एक टैंक में बैठे हुए हैं और दूसरा वाला दूसरे टैंक में बैठा हुआ है, गले कैसे मिलोगे? और हम सब टैंकों में ही बैठे रहते हैं। उससे कम में हमारा डरा हुआ मन राज़ी नहीं होता! टैंक का कवच देखा है कितना मोटा होता है, आरमर उसका? तो आप एक टैंक में बैठे हैं। आपकी तथाकथित प्रेमिका दूसरे टैंक में बैठ कर आई है और रोमांस चल रहा है। टैंक नाच रहे हैं और गोले दागे जा रहे हैं और कह रहे हैं, ‘’यह देखो! यह रास लीला है।’’ निकटता का अर्थ होता है, टैंक से नीचे उतरना। बहुत हिम्मत चाहिए। असुरक्षा चाहिए। आप असुरक्षा तभी बर्दाश्त करते हो, जब आप जानते हो कि बहुत सुरक्षित हूँ। हम में से ज़्यादातर लोग तो इतने अभ्यस्त हो चुके हैं, टैंक में बैठने के कि वो अपने आप को पहचान ही नहीं पाएँगे अगर वो टैंक से उतरे। कि, ‘’अरे! मैं कोई और हूँ क्या?’’ हाँ! कोई और ही होना पड़ता है।

निकटता का अर्थ है: पहचानों का मिटना।

तुम जो अपने आप को माने बैठे हो, वो मिटने लगता है। और जब तुम उतरते हो टैंक से, तो सम्भावना बनती है कि एक से ही नहीं, समष्टि से गले मिल सको। निकटता में भी यही है। यह न कहो कि, ‘’सर, आपके निकट नहीं आ पाता।’’ तुम किसी के निकट नहीं जा सकते और जो निकट आ सकता है एक के, वो सबके निकट जा सकता है। कोई ऐसा थोड़ी है कि टैंक में बैठोगे, तो बस एक से ही बचे रहोगे। जो टैंक में बैठा है, वो सुरक्षित है। वो फ़िर सबसे ही बचा हुआ रहेगा। वो किसी के निकट नहीं हो सकता। निकटता का अर्थ यह नहीं है कि किसी आदमी के करीब आ गए। किसी इंसान के खासम ख़ास बन गए। निकटता का अर्थ है कि, ‘’मैं वो हूँ जो नज़दीकी जानता है। हममें से ज़्यादातर लोग नहीं जानते। किसी के भी नज़दीक नहीं हो सकते। यह न सोचिएगा कि आपके कुछ नज़दीकी लोग होते हैं। आप किसी के नज़दीक नहीं होते। दो टैंक अगल-बगल रगड़ रहे हैं एक दूसरे को, तो नज़दीक नहीं हो गए एक दूसरे के। उसमें से सिर्फ़ चिंगारियाँ उठेंगी। हम किसी के नज़दीक नहीं हो सकते। यह भ्रम है हमारा। हम कहते हैं न कि कुछ लोग हैं जो हमारे करीबी मित्र वगैरह थे। कोई करीबी नहीं होता। जब आप जानेंगे नज़दीकी का अर्थ; तो आप सबके नज़दीक होंगे। फिर आप बाँट के नहीं देख पाएँगे कि यह भीतर वाला और यह बाहर वाला।

बड़ा बढ़िया रहता है, आप लोग आते हैं, बाइक नीचे पार्क करते हैं, कार नीचे पार्क करते हैं और टैंक लेकर यह तीसरी मंज़िल तक आ जाते हैं। चमत्कारों में चमत्कार!

वक्ता: सोचिए, कुर्सी पर बैठे हुए हैं, टैंक के अन्दर। गाड़ी वहाँ नीचे पार्क हो गयी और टैंक यहाँ छत तक आ गया। उतरने को राज़ी नहीं हैं, कोई कह रहा है, ‘देखो!’ तो भीतर से दूरबीन लगा के देख रहे हैं। ऐसा ही है। कोई हाथ मिलाने को कह रहा है, तो तोप की नली!

शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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