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कंचन कामिनी, और मन || (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: हमने बहुत बातें करी हैं तीन दिन में, लेकिन देखिए, कैसे कहूँ? क्योंकि इतनी बार कहा है इसीलिए, कैसे कहूँ? बार-बार कहा है, हर बार कहा है, ज़िन्दगी कैसी है? सब कुछ इस पर। जब निर्णय की घड़ी आती है तब निर्णय किधर को करते हो? सब कुछ इस पर। आज मैं कह रहा था सुबह कि रामकृष्ण बोल गए थे कि आदमी को दो ही चीज़ें लुभाती हैं, डिगाती हैं, कंचन और कामिनी; कंचन माने सोना, कामिनी माने स्त्री। उसमें मैंने रिश्ते और जोड़ दिया है, कामिनी माने स्त्री ही क्यों माने? अगर स्त्री है तो फिर उसको डिगाता है पुरुष, और पुरुष ही भर नहीं डिगाता, बच्चे भी होते हैं, तमाम और नात-रिश्तेदार भी होते हैं। तो ले-देकर दो ही चीज़ें होती हैं जो आदमी को पकड़े रहती हैं, कंचन और रिश्ते; कामिनी को हम थोड़ा व्यापक करे देते हैं, हम बोलेंगे रिश्ते। कंचन वो जो मन को आकर्षित करे, देह को कंचन नहीं चाहिए, देह को कंचन से कुछ मिलता है क्या? देह खाएगी क्या कंचन को? कंचन क्या जो?

श्रोतागण: जो मन को आकर्षित करे।

आचार्य: और कामिनी क्या? जिससे देह का रिश्ता हो। तो माँ से, बाप से, बच्चों से, पति से, पत्नी से इन सबसे क्या होता है? देह का रिश्ता होता है न? तो इन्हीं दोनों चीज़ों में आदमी अटका रहता है, मन में और तन में। तन को जो आकर्षित करे उसको क्या नाम दिया गया? कामिनी या रिश्ता, और मन को जो आकर्षित करे उसको क्या नाम दिया गया? कंचन। तो सारा खेल बस इस बात का है कि जब निर्णय लेने की घड़ी आती है तो कंचन-कामिनी की तरफ निर्णय लेते हो या सत्य की ओर, धर्म की ओर? इसके अलावा तो और कोई बात होती ही नहीं, और जीवन पग-पग पर हमसे फैसले माँगता है, तो बताओ तुम किसकी ओर फैसला कर रहे हो? कंचन-कामिनी की ओर या धर्म की ओर? बस यही बात है, और तो कोई बात ही नहीं।

प्रश्नकर्ता: हमें लगता है कि गुरु के हाथ में हैं मोह-माया से दो मिनट में निकाल देना और वापस डाल देना।

आचार्य: और कोई आए ही ना गुरु के सामने, फिर? फ़ैसला तो हमेशा खुद को ही करना होता है न? गुरु भी बेचारा लाचार। गुरुओं के हाथ में होता तो ये दुनिया कब की मुक्त हो गई होती। और दुनिया मुक्त नहीं है, तो क्या फिर हम ये कहना चाहते हैं कि गुरुओं के बस में था पर उन्होंने मुक्ति बचा कर रखी, दबा कर रखी, दी नहीं? गुरुओं ने, ज्ञानियों ने, सन्तों ने तो सदा यही चाहा न कि सबको मुक्ति मिले, आनंद मिले, पर ऐसा हुआ नहीं। इसका मतलब कमी किसकी ओर से थी, हमारी ओर से थी न?

“गुरु बेचारा क्या करे, शब्द ना लागे अंग”। कहे कबीर काली चादर, कैसे चाढ़े रंग।"

"गुरु बेचारा क्या करे, हृदय भया कठोर।" आगे का मुझे याद नहीं, लेकिन कबीर साहब कहते हैं कि गुरु भी ऐसे शिष्य के सामने क्या करे कि जिसका ह्रदय कठोर हो गया है। आगे का याद आ गया, आगे कहते हैं कि अब ठीक से नहीं याद है, कुछ ऐसा ही है कि वर्षा होती रहती है और जो पत्थर होता है उसका ह्रदय, उसका कोर (अन्तर्भाग) नहीं भीगता, वैसे ही, कितनी भी बारिश होती रहे, पत्थर का दिल भीगता है क्या? पानी पत्थर के ऊपर-ऊपर से निकल जाता है, तो ऐसे ही कबीर साहब कहते हैं कि गुरु बेचारा क्या करे अगर शिष्य का ह्रदय इतना कठोर हो कि गुरु बोले जाता है, बोले जाता है, और शिष्य दिल कड़ा करे हुए है, वो भीजता ही नहीं?

आप के हाथ में है, ज़िन्दगी के निर्णय आप लेते हैं, उन निर्णयों में देखिए कि निर्णय कंचन-कामिनी की ओर हैं या धर्म की ओर हैं। अब शिविर लगते हैं, हमारी बातचीत हो रही है, पर कल सोमवार है, दफ़्तर है और दफ़्तर का सम्बंध किससे है? कंचन से। तो लो, लोग लापता हैं कि साहब हमें भागने दो, हमें तो कंचन की ओर जाना है। लो हो गया न सारा फैसला? अब कोई बात बची नहीं, सारा अध्यात्म ख़त्म। सारी ज्ञानचर्चा तुम्हारे फैसलों से छोटी बात है, असली चीज़ क्या है? कि तुम जी कैसे रहे हो। असली चीज़ क्या है? कि निर्णय की घड़ी में तुम किसके पक्ष में निर्णय करते हो और जब निर्णय की घड़ी आई तो तुमने गुरु के पक्ष में तो निर्णय किया नहीं, तुमने किसके पक्ष में निर्णय कर लिया? कंचन के पक्ष में, कि हम जल्दी से पहुँच जाएँ, अपना काम-काज देखें, या कि घर-द्वार देखें, पत्नी-बच्चा देखें; ख़त्म बात।

मौखिक श्रद्धा-सुमन चढ़ाने से कुछ नहीं होता। जहाँ पर ज़रूरत होती है हाथ चलाने की, वहाँ पर ज़ुबान चलाने से क्या होगा? और अध्यात्म के क्षेत्र में ज़ुबान बहुत चलती है, हाथ बहुत कम। लोग कहते बहुत हैं, करते कुछ नहीं हैं, करते बल्कि विपरीत हैं, ये गड़बड़ है न? निर्णय की घड़ी और निर्णय की घड़ी रोज़ आती है। तुम्हें ये ना लगे कि प्रतिपल आती है तो भी दिन में कई दफ़े तो आती ही है, सही निर्णय लिया करो।

प्र: करेज (साहस) कैसे आता है?

आचार्य फेथ (श्रद्धा), लव ( प्रेम)। प्रेम होता है तो अपने आप साहस आ जाता है। एक गाय होती है, वो तो आध्यात्मिक-प्रेम भी नहीं जानती, वो तो बस जैविक-मोह जानती है। उसको तो वास्तविक प्रेम का कुछ पता नहीं, उसको तो बस शारीरिक-मोह पता है कि मेरे शरीर से ये बछड़ा-बछिया हुए हैं, तो इनका ख़्याल रखना है। तो गाय वैसे तो ऐसी है कि उसको ज़रा धकिया दो कि चल, जिधर को धकिया दोगे, ऊधर को ही चल देगी। हमारी देसी गाय तो सींग-वींग भी नहीं मारती, कुछ नहीं। छोटे-छोटे बच्चे उसके ऊपर चढ़ जाते हैं, देखो जाकर के तो उसके सींग पकड़ कर झूल रहे होंगे बच्चे, वो कुछ नहीं करती। यही तुम उसके बछड़े के साथ ज़्यादा छेड़खानी कर दो, तो फ़िर देखो गाय का रौद्र-रूप।

तो जहाँ प्रेम होता है वहाँ साहस अपने-आप आ जाता है। मैं कह रहा हूँ गाय का प्रेम तो मिश्रित प्रेम है, गाय का प्रेम तो मोह मात्र है, शारीरिक प्रेम है, तब भी गाय को इतना साहस आ जाता है कि अगर बछड़े पर भेड़िया भी टूटे तो वो भेड़िये से भिड़ जाएगी। तो जिसको आध्यात्मिक-प्रेम हो गया, जिसको विशुद्ध-प्रेम हो गया, सोचो उसमें कितना साहस आ जाएगा। प्रेम के बिना अगर तुम साहस दिखाते हो तो वो साहस नहीं है, फिर वो धृष्टता है, उद्दंडता है। बहुत ऐसे होते हैं जिनके पास प्रेम कुछ नहीं है, पर वो हिम्मत खूब दिखाते हैं, वो साहस दुःसाहस है। साहस और दुःसाहस का अंतर समझ लेना- प्रेम से जो शक्ति आविर्भूत हो, वो साहस है। प्रेम के कारण जब तुम चुनौतियों का सामना करने को तैयार हो जाओ, तो वो साहस है, और अहंकार के कारण जब तुम भिड़ जाओ, तो वो धृष्टता है, उद्दंडता है, दुःसाहस है। ऊर्जा दोनों जगह से आ सकती है, प्रेमी भी भिड़ता है और अहंकारी भी खूब भिड़ता है। तुम देख लो कि तुम क्यों भिड़ रहे हो। तुम प्रेम में भिड़ रहे हो या तुम अपने अहं की रक्षा के लिए भिड़ रहे हो? और कहने की ज़रूरत नहीं कि जीतता कौन है, कौन जीतता है?

प्र: साहस वाला।

आचार्य साहस तो दोनों में होता है।

श्रोतागण: प्रेम।

प्र: आचार्य जी, प्रेम शब्द क्लियर (स्पष्ट) नहीं होता है।

आचार्य: क्या करोगे क्लियर (स्पष्ट) करके? तुम प्रेम करो। प्रेम में क्लैरिटी (स्पष्टता) चाहिए न? अरे भाई, प्रेम माने चाहना, सीधी सी बात, इच्छा। इच्छा और प्रेम बहुत दूर के नहीं हैं, बस जब तुमको बड़े की इच्छा होती है तो प्रेम शुद्ध कहलाता है। जब तुम छोटी-छोटी चीज़ों की इच्छा रखते हो, तो उसको बस तुम इच्छा कह सकते हो, और जैसे-जैसे तुम्हारी इच्छा निःस्वार्थ होती जाती है, विराट होती जाती है, वैसे-वैसे तुम उसे प्रेम कह सकते हो। तो प्रेम कोई इतनी भी बड़ी गुत्थी नहीं है जितना उसको शायरों और कवियों ने बना दिया है, कि द एटर्नल मिस्ट्री ऑफ लव! क्या मिस्ट्री (रहस्य) है? चाहते तो सभी हैं न? तो प्रेम भी चाहने का ही नाम है, बस जब तुम छोटे को चाहते हो तो वो कुत्सित प्रेम है, वो गर्हित प्रेम है। छोटी चीज़ क्या? कि, "मुझे हार चाहिए, मुझे अपने लिए नया कपड़ा चाहिए, मुझे अपने लिए सम्मान चाहिए", ये सब क्या हैं? ये साधारण इच्छाएँ हैं, ये तुमको और प्यास, और तड़प-तृष्णा देते हैं, और जब तुम कुछ बहुत बड़ा माँगते हो, बड़ा माने जो अपने से हटकर हो क्योंकि हम तो छोटे से हैं, तो जो हमसे हटकर जो होगा वही बड़ा होगा। जब हम बहुत बड़ा कुछ माँगते हैं, तो फिर वो कहलाता है शुद्ध प्रेम, उसको फिर इच्छा नहीं कह सकते।

प्र: दूसरों के लिए।

* * आचार्य: * * हाँ,अपने से हट करके।

देखो, दूसरों के लिए तो कई बार तुम स्वार्थवश भी माँग लेते हो। अब अपने बच्चे के लिए कुछ माँग रहे हो, ये तुमने दूसरे के लिए थोड़े ही माँगा, या हो सकता है कि तुम पूरी दुनिया के लिए कुछ माँग लो, पर पूरी दुनिया के लिए तुम इसलिए माँग रहे हो कि पूरी दुनिया से फिर तुम्हें सम्मान मिलेगा, तो ये भी तुमने फिर दूसरों के लिए नहीं माँगा, तो बात दूसरों के लिए माँगने की नहीं है, बात है अपने लिए ना माँगने की।

प्र: आचार्य जी, अभी हमने अपने हस्बैंड (पति) से सबसे ज़्यादा कमिटमेंट (प्रण) कराया पेड़ लगाने में। दिल्ली पोस्टिंग (तैनाती) होने वाली थी, हो गई गुवाहाटी और किन्हीं का नहीं हुआ अभी कमिटमेंट (प्रण) पूरा, क्योंकि जगह ही नहीं है वहाँ पेड़ लगाने की।

आचार्य: उसका तो रास्ता खोजिए। वहाँ नहीं लग सकते तो कहीं और लगाइए न। पेड़ तो पेड़ हैं, जहाँ पर भी लगे कि लग सकते हैं, मिट्टी अच्छी है, देखभाल हो जाएगी, लगा दीजिए। कुछ समय के बाद पेड़ वैसे ही देखभाल नहीं माँगता। छः महीने, साल दो-साल अगर उसकी देखभाल कर ली तो उसके बाद तो वो देखभाल ऐसे ही नहीं माँगेगा।

प्र: आचार्य जी, कल आपने बोला कि सब कुछ साइंटिफिक (वैज्ञानिक) होता है, पर पिछली बार जब हम लोग खुर्पाताल में थे, तो आपने बोला, चार बजे अगर उठते हो तो छत पर चले जाना, दिव्य अनुभव होगा। वैसे ही बहुत अच्छा लगा, पर ऐसा लगा जैसे कोई ने बोला, पीछे मतलब हट गए हम, रह नहीं पाए ज़्यादा देर वहाँ पर। और फिर जब हस्बैंड (पति) के साथ गए, फिर सोचा कि फिर जाएँगे शाम को, वैसे ही लगेगा लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ, वो जगह क्यों अच्छी लगी आपके बोलने पर। अगर सब साइंटिफिक (वैज्ञानिक) ही था तो?

आचार्य: पदार्थगत जो कुछ होता है न, सब साइंटिफिक (वैज्ञानिक) होता है। देखो! छोटा पत्थर, बड़ा पत्थर। (दो पत्थरों को उछालते हुए) देखना, दोनों एक साथ आए न नीचे? अब एक बहुत बड़ी चट्टान ले आओ, उसके साथ एक छोटा-सा पत्थर उछालो, वो दोनों भी एक साथ ही नीचे आएँगे। लेकिन अगर एक रूई का फाहा ले आओ और चट्टान, तो दोनों एक साथ नीचे नहीं आएँगे। क्यों? अब उसमें भी विज्ञान है भाई! हवा का घर्षण था। चट्टान पर हवा का घर्षण उतना प्रभावी नहीं होता, रुई के फाहे पर हवा का घर्षण प्रभावी होता है, ये सब वैज्ञानिक बातें हैं; जहाँ तक पदार्थ का सवाल है, पूरी तरह से वैज्ञानिक रहो।

प्र: आचार्य जी, मतलब, साहस प्रेम के कारण है या अहंकार के कारण है, ये मतलब कैसे कन्फर्म (पक्का) हो सकता है?

आचार्य: अहंकार के कारण होगा तो बार-बार ये सोचोगे कि, "मुझे क्या मिल रहा है, मुझे क्या मिल रहा है?" प्रेम के लिए होता है तो अपनी चिंता नहीं करते हो। अपने ख़्यालों को देखो कि उसमें किसकी चिंता बसी हुई है, अगर अपनी चिंता बसी हुई है, "मेरा क्या होगा?" तो तुम्हारा लक्ष्य तुम्हारी अपनी सुरक्षा है, तुम्हारा साहस तुम्हारे स्वार्थ की ख़ातिर है। जो कुछ भी ऐसा है, कैसा? पत्थर जैसा, वहाँ पर तो विज्ञान ही चलेगा और वहाँ पर कुछ और मत चला दीजिएगा, नहीं तो अंधविश्वास हो जाएगा, सुपरस्टीशन (अंधविश्वास)। कोई आपसे बोले कि तुम्हारी बीमारी को मैं जादू से ठीक कर दूँगा, तो कहिएगा, "भाग!" अगर शरीर की बीमारी है, तो दवाई माँगेगी, मन की बीमारी है, तो बोध माँगेगी। शरीर की बीमारी क्या माँगेगी? दवाई। मन की बीमारी क्या माँगेगी? बोध, प्रेम, ज्ञान। ठीक है?

प्र: आचार्य जी, जब हम भगवान के या परमात्मा के प्रेम में होते हैं, तो उसमें भी हमारा ख़ुद का ही स्वार्थ निहित होता है न कि हमें कुछ चाहिए, वहाँ आनंद में होते हैं या मतलब अच्छा लगता है या कैसे?

आचार्य: जब परमात्मा के प्रेम में होते हो तो ये नहीं कहते कि आनंद चाहिए, वहाँ समर्पण होता है, वहाँ कहते हो, जो तू दे सो भला, “जो तुध भावे सोई भलीकार”। जो तुझे भाए सोई अच्छा। तू दुःख भी देगा, चलेगा! परमात्मा के सामने शर्तें नहीं रखते, कि अब तुम्हारे पास आए हैं तो आनंद देना।

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