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कामवासना को लेकर शर्म और डर
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मन में ये चलता रहता है कि आसपास के लोग क्या सोचते हैं। नफरत से डर लगता है। ये शायद देह की असुरक्षा का ही भाव है। इसका संबंध कामवासना से भी है, कामवासना को लेकर एक असहजता रहती है हमेशा से। बाहर प्रकट नहीं होने देता पर अकेले में पोर्न देखता हूँ और मैथुन भी करता हूँ। ऐसा लगता रहता है कि किसी से संबंध बनाकर तृप्त हो जाऊँगा पर अभी तक वो किया नहीं है, तिरस्कार का डर रहता है शायद। दूसरों को देखता हूँ और यही दिखता है कि संबंधों में तृप्ति नहीं मिलती। फिर भी मेरा भ्रम तो बना ही रहता है। कामवासना को लेकर सहज कैसे हुआ जा सकता है? वो मेरे लिए छोटी बात कैसे बन सकती है?

आचार्य प्रशांत: बीरबल की लकीर याद है न? एक लकीर छोटी करनी हो तो क्या करना होता है? उसके बगल में एक बड़ी खींच देनी होती है। ये अभी जो तुमने अपने बारे में बताया ये समस्या बिल्कुल नहीं है। जवान आदमी हो अगर दैहिक वृत्तियाँ सक्रिय हैं तो इसमें ऐसा क्या है जिसके लिए गमगीन हो रहे हो? पहली बात तो उसमें कुछ असामान्य नहीं, कुछ पाप नहीं। दूसरी बात जो कुछ हो रहा है, वो तुमने जानते-बूझते माँगा नहीं।

एक बच्चा होता है दस साल-बारह साल का, उसमें कोई अभी दैहिक वृत्ति सक्रिय नहीं होती है और फिर अगले दो-तीन साल में उसमें कामवासना सक्रिय हो जाती है। ऐसी उसने माँग करी थी क्या? फरमाइश करी थी? उसने माँगा तो नहीं था। हो गया, क्या करे वो? तो ये जो कुछ है- ये जैसा है वैसा ही रहेगा और रहता है। ये जो कुछ है वो समझ लो कि आदमी के अतीत की छाया है उसके वर्तमान पर। अतीत हमारा पाशविक है, अतीत में तमाम तरह के अनुभव हुए हैं हमको, आज का अतीत तो नहीं है न हमारा?

आदमी की जो देह है, वो तो विकास की एक बहुत लंबी प्रक्रिया से होकर आई है। आदमी को जैसा हम जानते हैं वैसा ही ज़मीन पर आए बीस लाख साल हो गये। जैसा हम आदमी को जानते हैं जब हम उसे कह सके कि मनुष्य है। वैसा ही हुए उसे बीस लाख साल बीत चुके हैं। आपके-हमारे चेहरे वाले लोग इस पृथ्वी पर पिछले बीस लाख साल से रमण कर रहे हैं और ये बीस लाख साल कुछ भी नहीं हैं। इन बीस लाख साल से पहले क्या था? उससे पहले ऐसे लोग थे जिनके चेहरे हमसे थोड़ा कम मिलते-जुलते थे पर फिर भी मिलते-जुलते थे। फिर उनसे लाखों वर्ष और यदि आप पूर्व में चले जाएँ तो और लोग मिलेंगे जिनके चेहरे हम से और भी कम मिलते-जुलते हैं पर उनको देखते हीं आप कह देंगे कि ये हैं कुछ हमारे ही बप्पा! ये बहुत दूर के नहीं हैं फिर और पीछे चले जाएँ, और पीछे चले जाएँ, तो आपको जो भी दिखाई देगा उसका चेहरा हमसे कम-कम और कम मिलने लगेगा। थोड़ा और पीछे जाएँगे तो वो दो पाया भी नहीं रहेगा, चौपाया रहेगा। थोड़ा और पीछे जाएँगे तो आप पाएँगे कि उसका रूप एकदम बदलने लग गया है, और पीछे जाएँगे तो पाएँगे कि अब वो पृथ्वी पर भ्रमण ही नहीं कर रहा अब वो समुद्र का निवासी है और पीछे जाएँगे तो पाएँगे कि अब उसमें बहुत ज़्यादा जटिल कोशिका समूह और तंतु भी नहीं रहे। उसकी शारीरिक संरचना बड़ी सरल हो गई है, कुछ हज़ार या कुछ लाख कोशिकाओं की मात्र। और पीछे जाएँगे तो कहेंगे कि एक कोशिका, दो कोशिका और पीछे जाएँगे तो फिर कहेंगे कि प्रोटीन और अमीनो-एसिड बचे हैं बस। चेतना कहाँ गई? तो हम इतना पीछे से निकल कर आ रहे हैं जिस प्रोटीन और अमीनो एसिड ने पहली जीवित कोशिका को जन्म दे दिया उस प्रोटीन और अमीनो एसिड की वृत्ति का नाम जानते हैं क्या है? कामवासना। यही तो कामवासना है- भविष्य के लिए किसी और को जन्म दे जाना। तो पहली गलती किसने करी थी? वो मॉलिक्यूल्स ने करी थी प्रोटीन के। साधारण प्रोटीन नहीं बड़े लंबे-लंबे... उनका अगर आप सूत्र, फॉर्मूला लिखेंगे तो वो ऐसा नहीं होगा कि- CO2, H2O वो कितना लंबा होता है? ये लम्बा...पर ये काम उन्हीं का है, खेल शुरु उन्हीं से हुआ है। एक लंबी मॉलिक्युलर चेन दूसरी मॉलिक्युलर चेन से मिली और उसने कुछ और बना दिया और बनाते ही बनाते पता ही नहीं चला, जड़ चेतन में कब परिवर्तित हो गया?

कहने वाले तो हम से कहते हैं जड़, चेतन में कभी परिवर्तित ही नहीं हुआ। चेतना, जड़ता के ही दूसरे सिरे का नाम है। जड़-जड़ जड़जाड़ाता रहा और उस जड़जड़ाने का ही आज एक बहुत सुविकसित नाम है- चैतन्य। लेकिन आप जिसको भी चेतना कह लो, उसमें जड़ गुणधर्म तो पूरी तरह से पुराना शेष ही है न? वो जो पुरानी आदिकालीन यात्रा शुरू हुई थी उसी का तो नवीनतम उत्पाद हैं न हम? उस यात्रा के सब निशान, उस यात्रा की सब धूल, उस यात्रा के सब अनुभव हम में समाए हुए हैं। उन्हीं का आज हम नाम दे देते हैं वासना, विकार, वृत्ति। इनको समझने की ज़रूरत है, इनकी निंदा भर करने से क्या काम चलेगा? कि बार-बार निंदा कर दी, कई बार आत्मनिन्दक ही हो गये और बड़ी ग्लानि में चले गए कि "अरे! मैं तो बहुत गलत आदमी हूँ, मैंने ये कर दिया मैंने वो कर दिया।" तुम्हारी बस की है न करना? जो ताकत तुम्हारा दिल धड़का रही है, जो ताकत तुम्हारी साँस चला रही है, जो ताकत तुम्हारी पलक झपका रही है, जिस ताकत के चलते तुम भूखे होने पर भोजन करते हो, वही ताकत है जो तुम्हें कामवासना की ओर भी ढकेलती है। वो सब एक ही स्रोत से आ रहा है। उस स्रोत का मैं नाम दे दिया करता हूँ- प्रकृति। प्रकृति ही सबकुछ करा रही है और प्रकृति का उद्देश्य जो है, कोई बड़ा ख़ुफ़िया और कुराफ़ाती नहीं है। प्रकृति का सीधा-सादा उद्देश्य है-भईया! तुम बने रहो, तुम्हारी देह चलती रहे और प्रकृति ये भी जानती है कि तुम्हारी अपनी व्यक्तिगत देह बहुत दिन चल नहीं सकती। आम आदमी आज भी बहुत हुआ तो सत्तर-अस्सी साल का मेहमान होता है। तो फिर प्रकृति ये व्यवस्था करती है कि तुम न रहो तो तुम्हारे जैसा कोई रहे वो वास्तव में तुम्हें ही बचाना चाहती है।

कुछ जीव होते हैं उनको प्रजनन के लिए किसी दूसरे जीव की जरूरत नहीं पड़ती। नर को मादा की ज़रूरत नहीं पड़ती, मादा को नर की ज़रूरत नहीं पड़ती, वो नर और मादा एक ही जीव में होते हैं। क्या बोलते हैं उनको? हरमाफ्रॉडाइट (उभयलिंगी)। तो ये जो हरमाफ्रॉडाइट होते हैं इन्हें कोई ग्लानि नहीं होती। इन्हें जा कर चौराहों पर सीटी नहीं बजानी होती, लड़कियाँ नहीं छेड़नी होती। इन्हें किसी दूसरे की जरूरत ही नहीं, इनका काम अपने आप से ही चल जाता है। पर काम वो भी यही कर रहे हैं क्या? ये तो प्राकृतिक विकासवाद है- तुम हो, तुम्हारे बाद कोई और आता है, और तुम्हारे बाद जो कोई आता है अगर प्रकृति ने खेल सही खेला है तो कुछ मायनों में तुमसे शारीरिक रूप से बेहतर होता है। अगर प्रकृति ने अपना खेल सही खेला है तो हर पीढ़ी, पिछली पीढ़ी से थोड़ा उन्नत होती है और यही होते-होते जो सबसे ऊँची प्रजाति होती है वो और सशक्त होती जाती है और वो निचली प्रजातियों पर हावी होती जाती है, धीरे-धीरे करके निचली प्रजातियाँ विलुप्त ही होती जाती हैं। मोटे तौर पर यही बात बाबा डार्विन की है। ठीक है? समझ में आ रही है बात?

तो तुम काहे के लिए लजाए जा रहे हो कि हाय! ये मैंने क्या कर दिया? हाय ये मैंने क्या कर दिया? ये सब बातें प्रकृति के तल की हैं। लाज तो अगर आनी ही चाहिए तो फिर इस बात पर कि मैं उसी तल पर सीमित क्यों हूँ? मैं उसी तल पर सीमित क्यों हूँ? समझ में आ रही है बात? तुम्हारे पास ईंधन है, तुम्हारे पास चूल्हा है, और तुम रो इस बात पर रहे हो कि ईंधन क्यों जल रहा है? ये कोई रोने की बात है? ईंधन और चूल्हा हैं ही किस लिये? ईंधन जले, आग हो, गर्मी उठे, इसीलिए तो है न? अगर रोना ही है तो किस बात पर रोना चाहिए? खाना क्यों नहीं पका अभी तक? उसकी तुम बात नहीं करना चाहते? तुम ऐसी चीज़ का रोना रो रहे हो जो अपरिहार्य है, जिसको रोका नहीं जा सकता। कल को तुम इस बात पर भी परेशान हो जाना कि आचार्य जी मुझे प्यास लगती है। शरीर है तो ये सब कुछ होगा। ये सब बातें ग्लानि की नहीं हैं। ग्लानि की बात अगर है तो ये है कि शरीर में ये जो ऊर्जा दहक रही है, ये जो ईंधन जल रहा है इससे आज तक कुछ पक कर सामने क्यों नहीं आया? वो बात अध्यात्म के तल की है। अध्यात्म के तल की बात हम करना नहीं चाहते। हम प्रकृति के ही तल पर उलझे रहेंगे। जैसे कि यही बहुत बड़ी समस्या है?

तुम्हारे भीतर ऊर्जा है, प्रकृति तुम्हारे माध्यम से प्रकट हो रही है, वो सब ठीक है। पर तुम प्रकृति मात्र तो नहीं हो न? प्रकृति मात्र होते तुम तो अन्य पशुओं की तरह ही होते। उन्हें कोई लज्जा, कभी ग्लानि आती नहीं। वो कभी किसी आचार्य को पकड़ कर नहीं पूछते "आचार्य जी, मैंने ऐसा कर दिया!" और जानवर सबकुछ करते हैं देखा है? चोरी भी करेंगे, चकारी भी करेंगे, उनमें कोई नैतिकता इत्यादि नहीं होती। खाना रखा है उन्हें फर्क नहीं पड़ता है किसका था, किसका नहीं लेकर चल देंगे। जिसे हम हत्या कहते हैं जानवर वो भी मज़ें में कर लेते हैं। तोड़-फोड़ कर देंगे। तुमने कोई ऊँचे से ऊँचा चित्र बना रखा होगा, कोई बहुत सुंदर तुमने शिल्पकला का नमूना तैयार किया होगा, बन्दर आएगा तोड़-फोड़ देगा और उसको ज़रा भी लाज नहीं आएगी कि हाय ये मैंने क्या किया? ये आदमी की चेतना का अनुपम प्रतीक था जिसको अभी-अभी मैंने तोड़-ताड़ दिया। पर आदमी को ये सब प्रश्न उठते हैं। तो स्पष्ट है आदमी प्रकृति मात्र नहीं है। आदमी प्रकृति से आगे कुछ और है। प्रकृति से आगे जो तुम कुछ और हो उसकी बात करो। वो क्यों नहीं अभी तक फलित हो रहा? वो क्यों नहीं परिणाम दे रहा?

कि जैसे गैराज में कोई अपनी गाड़ी को लेकर जाए और शिकायत क्या कर रहा है वहॉं पर? शिकायत कर रहा है- गाड़ी आवाज़ करती है। अच्छा! और? ये गाड़ी तेल पीती है। अच्छा! और? गाड़ी का इंजन गर्म होता है जब गाड़ी स्टार्ट हो जाती है। अच्छा! और? धुआँ निकलता है गाड़ी में से। ठीक! बोला ये सब मेरी गाड़ी की बीमारियाँ हैं। क्या? गाड़ी का इंजन आवाज़ करता है, गाड़ी का इंजन स्टार्ट करने के बाद गर्म होता है, गाड़ी से धूआँ निकलता है और गाड़ी मेरी तेल पीती है। ये सब बीमारियाँ बताई गयीं। अब वहाँ पर जो मेकैनिक है, वो बड़ा हैरान! बोला ये सब जो आप बता रहे हैं ये तो गाड़ी में होगा ही होगा क्योंकि वो गाड़ी है भाई! ऐसी गाड़ी कहाँ से लाओगे जो तेल नहीं पीती? ऐसी गाड़ी कहाँ से लाओगे जिसका ईंजन नहीं गर्म होता?ऐसी गाड़ी कहाँ से लाओगे जो धूआँ नहीं देती? और ऐसी गाड़ी कहाँ से लाओगे जिसका ईंजन ज़रा भी आवाज़ नहीं करता? गाड़ी है तो ये सब करेगी आप शिकायत क्यों कर रहे हैं?

बोले नहीं-नहीं बड़ी मुझे तकलीफ है। मेकैनिक कुछ देर समझाता रहा। साहब काहे को माने? बोला अच्छा लाइए फिर मैं देखता हूँ आपकी गाड़ी को कुछ कर सकता हूँ तो करता हूँ। आवाज़ तो रहेगी ही थोड़ी और कम हो पाएगी तो मैं कर दूँगा तो उसने गाड़ी स्टार्ट की, थोड़ा इधर-उधर कुछ परखा, फिर गियर डाला, गाड़ी बढ़े काहे को? उसने सब कुछ कर के देख लिया गाड़ी बढ़े ही नहीं। आगे के किसी गियर में नहीं बढ़ी तो उसने रिवर्स भी लगा लिया कि क्या पता है इसमें चलती हो उसने भी न चले। वो नीचे उतरा गाड़ी के मालिक से बोला कि ये आपकी गाड़ी चलती नहीं है। मालिक बोला "हाँ, पर वो कोई बात नहीं, वो कोई बात ही नहीं, वो कोई समस्या ही नहीं है कि चलती नहीं। समस्या असली ये है कि ये आवाज़ क्यों करती है? आवाज़ क्यों करती है? आवाज़ हटाओ! आवाज़! समस्या असली ये है कि ये तेल क्यों पीती है? चलती नहीं है उसकी तो मुझे कोई समस्या ही नहीं है। मैं तुम्हारे गैराज तक भी इसको धक्का देकर लाया हूँ। ये धक्का खा कर चलती हो, उसमें मुझे कोई समस्या नहीं है बस इसे आवाज़ नहीं करना चाहिए। इसे ज़रा भी गर्म नहीं होना चाहिए।"

ऐसा ही बहुत लोगों का हमारे यहाँ सवाल होता है। असली समस्या की बात ही नहीं करेंगे। असली समस्या ये है कि तुम्हारी गाड़ी सब कुछ कर रही है पर चल नहीं रही। तुम्हें तुम्हारी मंजिल की ओर नहीं ले जा रही है। किस गाड़ी की बात कर रहा हूँ? शरीर की। उसका नाम ही नहीं लेना चाहते कि शरीर एक गाड़ी है, जो किसी प्रयोजन के लिए मिली है, किसी मंजिल तक पहुँचना है और समय भी बाँध दिया गया है। कुछ दशकों का समय दे दिया गया है कि आपको ये गाड़ी(शरीर की ओर इशारा करते हुए) दे दी गयी है और जिंदगी क्या है? समय। जीवन माने समय। तो ये रही गाड़ी और ये रहा जीवन, दोनों चीज़ें दे दी गयीं। इतना समय दे दिया गया और गाड़ी दे दी गयी और कह दिया गया कि इतने ही समय में मंजिल तक पहुँच जाना और गाड़ी हमारी चल ही नहीं रही है मंजिल की ओर। हम उसकी बात नहीं करना चाहते। उसकी जगह हम शिकायत क्या करते हैं? कि मेरी गाड़ी न गर्म हो जाती है। "आचार्य जी, मुझे न क्रोध आ जाता है।" अरे यार! शरीर है तो आएगा न? आचार्य जी मेरी गाड़ी कूलेंट माँगती है, ब्रेक ऑयल माँगती है, स्टेयरिंग ऑयल माँगती है, पेट्रोल माँगती है। भाई गाड़ी है तो ये सब माँगेगी ही। भाई! इसका जिक्र ही भी क्यों कर रहे हो?

तमाम तरह के छोटे और अनुपयोगी मुद्दे आप खड़े कर देंगे ताकि जो असली मुद्दा है उसकी ओर देखना ही न पड़े। असली मुद्दा क्या है? गाड़ी हमारी मंज़िल की ओर बढ़ नहीं रही है, हम उसकी बात नहीं कर रहे। हम उसकी बात क्यों नहीं कर रहे? बोलिये? और क्या आप प्रतीक्षा करेंगे कि आपकी गाड़ी जब बिल्कुल ठीक हो जाये तो ही मंजिल की ओर बढ़ेगी। बताइएगा आप सब लोगों के पास गाड़ियाँ हैं, किसकी गाड़ी आज ठीक वैसी ही है जैसी की फैक्ट्री से निकल कर आयी थी? किसकी गाड़ी ऐसी है जिसमें कोई भी दोष-डिफेक्ट न हो? बोलिये? है किसी की गाड़ी है ऐसी जिसके टायर नये के नये हैं बिल्कुल? किसी की गाड़ी ऐसी जिसकी बॉडी में कोई निशान, कोई डेंट न हो? एकदम आपकी नयी गाड़ी हो, हफ्ते भर पुरानी भी, तो भी उसमें कुछ न कुछ तो आपने कर ही डाला होगा। लोग नयी गाड़ी पर जाकर स्वास्तिक बनाते हैं, वो जो आप स्वास्तिक बनाते हैं वो भी गाड़ी पर एक तरह की खरोंच है। है कि नहीं है? एक बार आपने वाइपर चला दिया, शीशे पर सूक्ष्म निशान तो पड़ ही गये। एक बार आप गाड़ी में बैठ गये तो उसका रबड़ और प्लास्टिक तो थोड़ा-बहुत तो घिस ही गया। बोलो? इसीलिए जानने वाले कहते हैं कि शोरूम से गाड़ी बाहर निकली नहीं कि उसकी कीमत 20% तभी घट जाती है। शोरूम से गाड़ी आपने सड़क पर उतारी और उसकी कीमत 20% तभी घट गयी अब आप उसको बेचेंगे 20% कम मिलेगा।

क्या आप इंतजार कर रहे हैं कि आपकी गाड़ी बिल्कुल जब परफेक्ट रहेगी, तभी आप मंजिल की ओर बढ़ाएंगे उसे? अगर आप ये इंतजार कर रहे हैं तो फिर आपने भीतर ही भीतर अपने खिलाफ साजिश कर ली है कि आपको मंजिल की ओर कभी जाना ही नहीं है। काम-क्रोध-मद-लोभ-भय आदि विकार आपकी गाड़ी में लगे ही रहेंगे भाई! कृपा करके इंतजार मत करिये इनके पूर्ण शमन का। वो कभी नहीं होने वाला। एक जवान आदमी मुझसे आकर के कहे जिस दिन वो अपनी कामवासना पर पूरा अधिकार और नियंत्रण पा लेगा उसके बाद ही वो जीवन के लक्ष्य की ओर प्रस्थान करेगा तो मैं समझ जाऊँगा कि इस आदमी का एक सही जिंदगी बिताने का कोई इरादा ही नहीं है। तुम्हें कोई जरूरी काम करना होता है और तुम्हारी गाड़ी थोड़ा खड़-खड़ कर रही है तो तुम इंतजार करते हो कि गाड़ी ठीक कर लूँगा फिर इसको काम पर लेकर जाऊँगा। बोलो? या गाड़ी जैसी भी है, उसको लेकर के चल देते हो? बोलो? हाँ गाड़ी की देखभाल करते रहते हो बीच-बीच में पर गाड़ी की देखभाल हम किस लिये करते हैं ताकि गाड़ी अच्छी बनी रहे या इसलिए ताकि गाड़ी हमारे काम आ सके?

गाड़ी उद्देश्य है या माध्यम? पर आप जो प्रश्न पूछ रहे हैं उसमें तो बस माध्यम की ही फिक्र दिख रही है, उद्देश्य का उल्लेख भी नहीं है और इतना ही सताती है कामवासना, और इतना ही तुम आहत हो, और इतना ही बात तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण है तो जाकर के सर्जरी करवा लो। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। उसके अलावा कोई तरीका नहीं है कामवासना से पूर्णमुक्ति का। कि है? काहे के लिए फिर उसमें इतना शोर मचा रहे हो? उसको पड़ा रहने दो न? तुम्हारा घर है, उसमें इतनी चीज़ें पड़ी रहती हैं, क्या सब चीज़ें तुम्हारे काम की हैं? क्या तुम प्रतीक्षा कर रहे हो कि जब तक घर में से मैं कचरा पूरे तरीके से नहीं निकाल देता तब तक मैं घर में रहूँगा ही नहीं। क्या ऐसा कहते हो? तो

कामवासना को जीवन का कचरा ही मान लो भाई! अगर तुम्हें इतनी ही समस्या है तो।

जिन्होंने जाना है, उन्होंने तो ये भी कहा है वासना भी घर को सुसज्जित और आभूषित करने वाला शोभायमान प्रतीक बन सकता है। पर चलो वो पहुँचे हुए लोगों की बात थी। उनकी वासना भी, उनके बोध के रंग में रंग गई थी। तुम ऐसा अगर नहीं भी कर पा रहे कि तुम्हारी वासना भी तुम्हारे बोध के केंद्र से संचालित हो तो तुम वासना को कचरा ही मान लो और उस कचरे को चुपचाप एक जगह पड़ा रहने दो। पड़ा हुआ है एक जगह। घर के पिछवाड़े हमने कचरा फेंक दिया है, वहाँ पड़ा हुआ है, हमें उससे कोई मतलब ही नहीं है, ना हमें वो दिखाई देता है न हमें उसकी गंध आती है, वहाँ कोने में पड़ा हुआ है। ज़्यादा हो जाता है बाहर फेंक आते हैं पर करें क्या? जब तक घर है, उसमें कचरा पैदा होता ही रहेगा जैसे कि जब तक कि शरीर है उसमें तमाम तरह के मल-मूत्र, न जाने कितने त्याज्य पदार्थ पैदा होते ही रहते हैं। उनकी खातिर जीना छोड़ दोगे? बोलो?

कि कोई योद्धा आए और कहे कि "मैं लड़ाई पर नहीं जाऊँगा।" क्यों? टट्टी आई है। कहे कि मैं इस शरीर से लड़ाई क्या करूँगा, इसमें तो मल भरा हुआ है। अरे! मल भरा हुआ है तो निकाल यार! आगे बढ़! लड़ाई कर! मल पर इतना ध्यान देते हैं क्या? है कोई योद्धा ऐसा जो युद्ध भूमि में ही पाँच दिन लगातार रहा हो बिना टट्टी मारे? बोलो? पर कल्पना हमारी कुछ ऐसी ही है- कि जो लोग संग्राम में उतरते हैं वो तो देह से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं। देह से मुक्त इस तरह हो जाते हैं की देह पर ध्यान देना छोड़ देते हैं अन्यथा देह तो अपना काम करेगी न। होगा बड़े से बड़ा जुझारू सैनिक, मल-मूत्र त्याग तो उसे भी करना पड़ेगा न? लड़ाई करते हुए भी। तो उतनी अवधि के लिए तो वो भी कहेगा कि बंदूक रखो यार! झाड़ कहाँ है? और झाड़ नहीं है तो खुले मैदान में ही सही, या खाई खण्डक में ही सही, कहीं भी। पर इन बातों पर हम सोचते ही नहीं। हम सोचते हैं वहाँ पर जो सैनिक लड़ाई कर रहा है, उसका शरीर तो बस बंदूक पकड़ने के लिए है और टट्टी? वो कौन करेगा? क्योंकि हम टट्टी पर ध्यान ही नहीं देते तो फिर जब हमें टट्टी आती हैं तो हमें बड़ी आत्मग्लानि उठती है। हमें लगता है कि हम महा पापी हैं। हमें टट्टी कैसे आ गयी? अरे लड़ रहा है तो क्या हगेगा नहीं? ये क्या मूर्खता है? या उसको पा लोगे हगते हुए तो कहोगे ये देखो! नराधम! नीच! पापी! वहाँ लड़ाई चल रही है और ये हग रहा है? तो क्या करे वो? लड़ते-लड़ते पतलून में हग दे? तो तुम्हें फिर क्यों अपने ऊपर इतनी शर्म आ रही है अगर बीच-बीच में तुम भी दूसरे छोर से हग दिया करते हो। वही तो कर रहे हो न?

सैनिक का अपमान तब है, सैनिक ने अपराध तब किया, जब वो बंदूक छोड़ दे। बंदूक मत छोड़ना भाई! बाकी सब शरीर के काम हैं वो लगे रहेंगे। ये बात समझ में आ रही है? सैनिक का काम ये नहीं है कि टट्टी रोक के रखे। कहे कि- इसी बात पर बहुत बड़े सैनिक हो गये, इन्होंने विशेषज्ञता हासिल की है, पिछले 20 साल से इन्होंने मल त्याग नहीं करा। ऐसे कहलाओगे तुम बड़े सैनिक? या ऐसे कहलाओगे कि हाथ से बंदूक नहीं छूटी, धर्म कभी नहीं छोड़ा। मल त्याग करने भी बैठे थे तो हाथ में बंदूक लेकर बैठे हुए थे कि शरीर अपना काम करता रहेगा, हम अपना काम कर रहे हैं। हमारा निशाना अभी भी दुश्मन पर है। ठीक है! अभी बैठे हुए हैं, अभी आवश्यक है। जैसे मान लो खाना खाने बैठे हुए हैं, वो भी शरीर की माँग है न? खाना खाने बैठे हैं, थोड़ा सोना भी पड़ेगा, सो भी रहे हैं तो सिरहाने क्या रखी है? बंदूक रखी है। ज़रा-सी आहट होगी और नींद खुल जाएगी और तुरंत हाथ में बंदूक आ जाएगी और गोली चल जाएगी। ये सैनिक का काम है। सैनिक को तुम इस बात पर थोड़े ही मापोगे कि मल त्याग कर नहीं करता, खाना नहीं खाता, सोता नहीं है, पानी नहीं पीता।

सैनिक वो जो सोते-सोते भी सैनिक है। सैनिक वो जो खाना खाते हुए भी सैनिक है। सैनिक वो जो मल त्याग करते हुए भी सैनिक है। सैनिक वो नहीं है, जो मल त्याग ही नहीं करता पर हमारी धारणा कुछ ऐसी है कि सैनिक हो गये हो, आज से टट्टी बंद। क्या बेवकूफी है? ये बात जो कहे उसके बारे में इतना ही पता चलता है कि उसके चेतना के केंद्र पर क्या बैठी हुई है? टट्टी। तो वो जिसको भी नापता है, बस इसी पैमाने पर नापता है कि फलाना आदमी टट्टी करता है कि नहीं करता है?

अजीब हमारा मोह है इन बातों से। सात हजार वीडियो हैं इस वक्त इंटरनेट पर, आपके आचार्य जी के। उसमें से मुश्किल से दर्जन-दो दर्जन कामवासना से संबंधित होंगे, मुश्किल से और कुल सात हजार वीडियोज़ पर जितने व्यूज़ आते हैं। उसमें से आधे इन दर्जन- दो दर्जन पर आते हैं। लोगों को यही देखना है। सब की समस्या ही यही है। दिल्ली से मुंबई आया हूँ, मेरा स्वागत ही आपने पहले ही किस सवाल से करा? आचार्य जी टट्टी आती है। अरे! मैं यहाँ ये निपटाने आया हूँ? कुछ ख्याल तो किया होता, पहला ही सवाल यही दाग दिया? बात समझ में आ रही है?

वृत्तियाँ मौजूद रहेंगी, सदा मौजूद रहेंगी, आख़िरी साँस तक मौजूद रहेंगी। शारीरिक वृत्ति अगर तुम्हारी बिल्कुल मिट गयी तो, तुम्हारी साँस भी मिट जाएगी, जी ही नहीं पाओगे। अभी बोला न कि जो वृत्ति तुम्हारा भोजन पकाती है, और जो वृत्ति तुम्हारी साँस चलाती है और जो वृत्ति हर रात के बाद तुम्हें सो कर उठाती है वो एक है। और जब वो जाएँगी तो सब एक साथ जाएँगी। फिर अगली सुबह सोकर नहीं उठोगे। उसे जीवेषणा कहते हैं, जीने की इच्छा। वही सब कुछ करा रही है। वही तुम में कामवासना का भी संचार कर रही है। उसको दबाने की कोशिश मत करो। उसको इतना बड़ा मुद्दा मत बनाओ। मुद्दा दूसरी चीज़ है, मुद्दा क्या है? बंदूक से गोली दुश्मन पर चल रही है कि नहीं? मुद्दा ये है कि तुम्हारी गाड़ी मंजिल की ओर चल रही है कि नहीं? और मंजिल का क्या नाम है?

श्रोता: मुक्ति!

आचार्य प्रशांत: क्या बात है! सब वीडियो देख कर आए हैं।

तो बात ये मत करो कि मेरी गाड़ी पर तीन-चार स्क्रैच लग गये। बात ये करो कि गाड़ी जा किधर को रही है? कोई यहाँ पर नहीं है जिसके शरीर पर निशान नहीं है। कोई यहाँ नहीं है जिसके मन पर दाग नहीं हैं। है कोई यहाँ पर? जो मद-मोह, काम-क्रोध से पूरी तरह से सुने हो? है कोई यहाँ पर? और वो लगे ही रहेंगे गाड़ी पर। गाड़ी को सही दिशा ले जाओ। आ रही है बात समझ में? तुम्हारा भी यही रहता है (शिविर के एक प्रतिभागी की ओर इशारा करते हुए) यही सवाल पूछते रहोगे हर समय।

अब टैंक(तोप) हो और उसमें दुश्मन की गोलियों के निशान न हों तो वो टैंक हुआ कोई? बोलो? और तुम कहो हमारे टैंक में गोली लग गयी, आचार्य जी क्या करें? अरे टैंक में गोली नहीं लगेगी तो क्या लगेगा? तिलक लगेगा? होली खेलोगे टैंक के साथ? गुलाल लगाओगे टैंक पर? टैंक पर होली थोड़े ही लगेगी गोली ही तो लगी होगी, और गोला लगेगा आ के बहुत बड़ा। इसमें फिर ताज्जुब क्या है? और कहो हमारा टैंक डीजल बहुत पीता है? कुछ उपाय बताइए। अरे टैंक है वो डीजल नहीं पिएगा तो क्या पियेगा? कह रहे हैं- "नहीं, वो पड़ोसी की लूना है, वो एक लीटर में दो सौ जाती है, ये दस लीटर में एक किलोमीटर जाता है- टैंक। ये टैंक ठीक नहीं है, पहले टैंक ठीक करिये उसके बाद हम युद्ध लड़ेंगे और लगे हुए हैं पेट ठीक करने में। पहले पेट ठीक किया जाए, पहले शरीर की शुद्धि की जाए, ये डीजल बहुत पी रहा है, उसके बाद मंजिल की ओर बढ़ेंगे तो तुम करते रह जाना। शरीर की ही शुद्धि करते रह जाना, लगे रहो यही करने में। जितनी देर में तुम शरीर के इन उपगद्रवों की शुद्धि करोगे, तुम्हें क्या लग रहा है? उतनी देर में अपना दोस्त- भैंसे वाला! वो तुम्हें मौलत ही देता जाएगा? कि तुम अभी शरीर साफ कर लो, कि तुम अभी वजन घटा लो, तुम अभी चेहरा चमका लो, अभी तुम अपना वीर्य पकड़ कर बैठ जाओ। वो मोहलत देगा इतनी?

जहाँ हो, जैसे हो, बढ़ो उधर को जिधर बढ़ने के लिए एक-एक जीव का मन छटपटा रहा है। मत करो प्रतीक्षा, इसी का नाम साधना है। और प्रतीक्षा करने के बेटा! बहाने बहुत मिल जाएँगे। जीव हो, जीव को परफेक्शन या पूर्णता कैसे मिलेगी? मिल सकती है क्या? नहीं मिलेगी न? तो इसमें तुम्हें क्यों अचंभा होता है कि "आचार्य जी मुझ में इंपरफेक्शन है, अपूर्णता हैं।" सब में होती हैं। रो क्यों रहे हो? जितने भी तुम में दोष हैं उन सब दोषों के साथ आगे बढ़ो! रुकना नहीं है! इंतजार नहीं करना है क्योंकि वक्त और मौत किसी का इंतजार नहीं करते, तो तुम किसका इंतजार कर रहे हो? कोई दिन नहीं आने वाला जब तुम मनुष्य देह में ही परफेक्ट हो जाओ। पूर्ण तो सिर्फ आत्मा है। पूर्ण तो सिर्फ सत्य है। मनुष्य देह में तो जो भी है वो इंपरफेक्ट और अपूर्ण ही होगा और तुम कह रहे हो जब तक मेरी देह में मुझे पूर्णता और परफेक्शन नहीं मिल जाते तब तक मैं सत्य की ओर यात्रा ही नहीं करूँगा फिर तो तुम बैठे ही रहो।

ज़िन्दगी में कुछ करने लायक है न? जानते हो न? कुछ है चीज़ें जो अपने में ठीक करनी है, कुछ हैं चीज़ें जो अपने परिवार में ठीक करनी हैं, कुछ हैं चीज़ें जो अपने मोहल्ले में ठीक करनी हैं, कुछ है चीज़ें जो अपने देश में, कुछ दुनिया में ठीक करनी हैं। हैं न? करने के लिए बहुत कुछ है न? और तुम जानते हो कि जो करने के लिए बचा हुआ है वो बहुत आवश्यक भी है। ये सब जानते हो न? वो सब कब होगा? कौन करेगा? तुम इसी बात का रोना रोते रह गये कि आचार्य जी मुझमें तो कामवासना सक्रिय है तो फिर वो सारे ज़रूरी और बड़े काम कौन करेगा? बोलो कौन करेगा?असली काम में इतना डूब जाओ कि इन सब छोटी-छोटी चीज़ों पर ध्यान जाना ही बंद हो जाये।

अब गाड़ियों के बारे में कुछ बताता हूँ- जब मैंने ड्राइविंग सीखी थी, मैं छोटा था काफी, लाइसेंस की उम्र भी नहीं थी। तभी घर पर एक ड्राइवर होता था उसने शौकिया मुझे सिखा डाली। तो जाड़ों की सुबह जब गाड़ी स्टार्ट करे, तो गाड़ी आवाज़ें करें। पुरानी प्रीमीयर पद्मीनी और आज से बात भी तीस साल पहले की। गाड़ी आवाज़ करे तो मैं कहूँ कि "ये आवाज़ कर रही है।" तो ड्राइवर साहब मुझसे कहते थें, "कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जो गाड़ी के गर्म होने के बाद गायब हो जाती हैं। ध्यान मत दीजिए! गाड़ी आगे बढ़ा दीजिये, आवाज़ अपने आप चली जाएगी।" उनकी बात बिल्कुल ठीक थी। बेल्ट, बियरिंग, कई आवाज़ें ऐसी थीं, जो जब गाड़ी चलने लग जाती थी तो पाँच-दस मिनट बाद गायब हो जाती थीं। इसी तरीके से गाड़ी न्यूट्रल में खड़ी रहे तो साइलेंसर थोड़ा-सा बजे उसका। तो मैं कहूँ ड्राइवर साहब, साइलेंसर की आवाज़। बोले "ध्यान मत दीजिये, कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं, जो जब गाड़ी चलने लगे, स्पीड पकड़ ले तो गायब हो जाती हैं। ये साइलेंसर बजेगा ही तब जब आरपीएम लो रहेगा, जैसे ही आप इंजन का आरपीएम बढ़ा देंगे साइलेंसर का बजना बंद हो जाएगा।" और मैंने पाया कि उनकी बात सही थी। फिर गाड़ी आगे बढ़े तो उसका जो चेज़ी है वो भी आवाज़ करे, शॉकर कुछ बोल रहे हैं, दरवाज़ें कुछ बोल रहे हैं, सीट चूँ-चूँ कर रही है, ये सब भी होता था थोड़ी पुरानी गाड़ी थी। तो मैं कहूँ, "ड्राइवर साहब ये सब आवाज़ें आ रही हैं गाड़ी में।" तो वो बोलें, "कुछ आवाज़ें ऐसी होती थी हैं जो बंद हो जाती है, जब गाड़ी लोडेड होती है।"

तो आपकी गाड़ी अगर आवाज़ कर रही है तो उस पर वजन बढ़ाइये। भरी हुई गाड़ी सड़क को चिपक कर चलती है बिल्कुल। पकड़ के चलती है और भरी हुई गाड़ी कम आवाज़ करती है। खाली गाड़ी ज़्यादा आवाज़ करती है। कुछ बात समझ में आ रही है? जो लोग अपनी गाड़ी की आवाज़ों को लेकर के बड़े परेशान रहते हों, उनको इशारा दे रहा हूँ। तुम्हारी गाड़ी खाली बहुत है इसलिए बहुत आवाज़ कर रही है। उसको भरो! भर दो उसके बाद आवाज़ कम हो जाएगी। तुम्हारी गाड़ी खड़ी हुई है इसलिए आवाज़ कर रही है, उसको चलाओ आवाज़ कम हो जाएगी और तुम्हारी गाड़ी ठंडी है इसलिए आवाज़ कर रही है उसको गर्म करो! आवाज़ कम हो जाएगी। शून्य कभी नहीं होगी, बंद कभी नहीं होगी आवाज़ लेकिन कम हो जाएगी। इसी तरीके से वासना है। तुम गाड़ी को मंजिल की ओर बढ़ाओ! वासना की ओर तुम्हारा ध्यान जाना अपने आप कम हो जाएगा। जो सैनिक मोर्चे पर लड़ रहा है, तुम्हें क्या लग रहा है उसके दिमाग में वासना तैरेगी? उसे ख्याल ही नहीं आएगा और अगर वो मोर्चे पर छह महीने है तो उसे छह महीने ख्याल नहीं आएगा भाई! या आयेगा भी तो एकदम न्यून, एकदम कम आएगा। उसको फुरसत ही नहीं है ये सब सोचने की।

जो खाली बैठे हैं बिल्कुल! व्यर्थ! आज की भाषा में वेल्ले! उन्हीं के दिमाग में सेक्स ज़्यादा करता है। अगर ज़्यादा तैर रहा है तो उसका अर्थ ये नहीं है कि तुम्हारी देह में कुछ गलत है या तुम पापी हो। उसका अर्थ ये है कि तुमने जीवन में सार्थक काम से किनारा कर रखा है। तुम कोई ऊँचा और असली काम कर ही नहीं रहे, तो दिमाग में यही ख़ुराफात नाचती है।

आ रही है बात समझ में? और इतना परेशान क्यों हो? बोलो?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शुरुआत में मैं आत्मग्लानि में रहता था फिर ओशो का कुछ सुना यूट्यूब पर तो इस तरह की बातें थोड़ी-सी कम हो गयी, आत्मग्लानि कम हो गयी। बाकी चीज़ें तो मैं ओपन भी डिस्कस कर सकता हूँ जैसे मुझे स्वादिष्ट खाना अच्छा लगता है तो मैं कुछ भी बोल दूँगा, मुझे झिझक नहीं रहेगी उस बात में। ये बात बोलने में झिझक रहती है। अगर थोड़ा समझ में भी आ जाता है कि कोई बड़ी चीज़ नहीं है, प्रकृति में हर जगह हो रहा है और इसके साथ सहज हुआ जा सकता है पर फिर भी मैं सहज नहीं हूँ और आप जो कह रहे हैं कुछ बड़ा और सार्थक, वो तो नहीं है जीवन में। अभी इसमें ही रस आता है। हाँ, थोड़ी परेशानी भी होती है कभी-भी। लेकिन ये भी सही है कि इससे बड़ा रस जीवन में है नहीं।

आचार्य प्रशांत: बड़े रस को पाना कोई मुश्किल बात नहीं है। नुस्खा समझिए! हम सबकी ज़िंदगी में कुछ तो ऐसा है जो करने लायक है और उसको लेकर के हमको कोई शंका ही नहीं है कि ये काम तो करने लायक है। कुछ न कुछ तो होगा ऐसा? ठीक, सबकी जिंदगी में है। करो फिर उसको! जो असली होता है उसकी एक खूबी ये होती है कि वो अनंत भी होता है। जो काम असली होगा, वो फिर ऐसा भी होगा कि वो कभी खत्म नहीं हो सकता, उसमें कितना भी डूबते जाओ। क्योंकि अगर वो काम सही है तो उसमें सीमा क्यों लगानी? सीमा तो सामाजिक और सांसारिक कामों पर लगानी पड़ती है कि वहाँ अच्छाई भी फिर सीमित ही रखनी चाहिए न। ये तो सामाजिकता का लक्षण है कि किसी के साथ अच्छा भी करो, तो थोड़ा अच्छा कर दो। ज़्यादा अच्छा करोगे तो मार पड़ेगी। पर जो काम वाकई असली होगा और सही होगा- वो अनंत भी होगा। अगर वो अनंत होगा तो वो आपको पूरे तरीके से सोख लेगा। वो आपके समय और संसाधन पूरे तरीके से माँग कर के अपने अधिकार में ले लेगा। समझ में आ रही है बात? तो इतनी बेबसी से ये मत कहो जो असली काम है, वो आज तक मिला नहीं। जो भी तुम्हें लगता है सही है उसमें शुरू हो जाओ। शुरू हो जाओगे, वही तुम्हें आगे का रास्ता दिखाएगा। उससे कुछ और ऊँचा काम पता चलेगा, फिर उससे कुछ और ऊँचा पता चलेगा।

चुपचाप बैठे रहने के लिए तो कोई दलील ही नहीं हो सकती कि हम कुछ भी नहीं करते हैं। जिस काम से शुरू करोगे वो काम तुम्हें आगे का रास्ता दिखाएगा। हो सकता है जो काम तुम कर रहे हो, वो तुम्हें लगे कि ये काम अब मुझे और आगे नहीं ले जा पा रहा है। और आगे नहीं ले जा पा रहा तो फिर अब अगली सीढ़ी पर कदम रखो न। जो भी काम तुमने शुरू करा था वो जितना तुम्हारी मदद कर सकता था, उसने कर दी। अब आगे बढ़ना है तो अगली सीढ़ी पर कदम रखो। ये सब धीरे-धीरे होता जाएगा। देख है तो ये( सत्र कक्ष की सीढ़ी की ओर इशारा करते हुए) देख रहे हो ये सीढ़ियाँ? ज़मीन पर यहाँ घूमते रहने से क्या फायदा? उछल करके दूसरी सीढ़ी पर भी कदम रखना बहुत मुश्किल होगा। पहली पर तो कदम रख सकते हो न? पहली पर कदम रखोगे तो क्या होगा? दूसरी पर कदम रखना संभव हो जाएगा और ये कोई दलील होगी ही नहीं कि "हम तो साहब पहली सीढ़ी भी नहीं जानते।" वो देखो वो रही पहली सीढ़ी। क्या नहीं जानते? इतना तो सभी को पता होता है कि कोई एक छोटी-मोटी चीज़ जो करने लायक है, कौन-सी है और उसे करना है। ये तो सभी जानते हैं। सोचो नहीं! एक सीमा के बाद सोचना उपयोगी नहीं होता, अब करो!

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