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कामनाग्रस्त मन जगत में कामुकता ही देखेगा || आचार्य प्रशांत (2015)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्न: चरित्र को नर-मादा संबंधो में ही क्यों देखा जाता है इस समाज में? और क्या किया जाए, अगर लोगों में ऐसी धारणा है तो किया क्या जाए?

वक्ता: आचरण, चरित्र, यह एक ही धातु से निकले हैं| आप यहाँ मेरे सामने बैठे हो, सौ गुण हो सकते हैं आपके, गुण माने विशेषताएँ, उपाधियाँ, मुझे क्या दिखाई देगा?

आपके सौ गुण हैं, पर मुझे क्या दिखाई देगा?

सिर्फ एक-दो गुण, कौन से?

जो काम सम्बंधित है, मुझे उसके अलावा कुछ नहीं दिखाई देगा| तो आप पूछ रहे हो कि भारतीय समाज में चरित्र को काम से ही क्यों जोड़ दिया गया है? क्योंकि जो लोग देख रहे हैं उनको काम के अलावा कुछ समझ में ही नहीं आता| जब समाज ऐसा हो कि पुरुष और स्त्री मिलते ही एक वजह से हों, और क्या वजह?

चलो, सेक्स करेंगे!

श्रोता: लेकिन समाज में नहीं है ऐसा|

वक्ता: और? ऐसा ही है बिलकुल…

श्रोता: ये तो मन है हमारा जो….

वक्ता: अरे! तो समाज और क्या होता है? समाज और मन में कोई भेद है क्या? जब समाज ही ऐसा हो जहाँ पर पुरुष और स्त्री का सम्बन्ध ही मात्र काम का सम्बन्ध हो, तो निश्चित सी बात है कि चरित्र का अर्थ ही उस समाज में आपके काम संबंधित गुण हो जाएँगे| यह तो होना ही है न, इससे इतना ही पता चलता है कि उस समाज की जो पूरी व्यवस्था है, उसकी जो पूरी धारणाएँ हैं वो बड़ी बेहोशी की हैं, उसने जीवन को समझा नहीं है|

काम, जीवन का ही हिस्सा है, जीवन को नहीं समझा है, काम को भी नहीं समझा है, जब काम को समझा नहीं जाता तो सर चढ़ के बोलता है| जब काम को समझा नहीं जाता, तो वो बिलकुल हावी हो जाता है मन पर| वो फिर एक रोज़मर्रा की, आमतौर की, छोटी घटना बन कर नहीं रह जाता, फिर वो जीवन का एक हिस्सा नहीं, वो जीवन पर छाया हुआ बादल बन जाता है| जिसने सब कुछ ढक रखा है, मेरा उठना, बैठना, हंसना, छूना, सोचना, सब काम से भरा हुआ है| मैं खाता भी हूँ तो वहां पर मुझे काम ही काम दिखाई देता है; मेरे जितने चुटकुले है, वो सब काम संबंधित है| मेरी भाषा भी ऐसी हो गयी है कि उसमें सिर्फ काम भरा हुआ है| आपने गौर किया? आप व्यक्ति को व्यक्ति की तरह संबोधित नहीं करते, आप कहते हो, ‘वो जा रहा है, वो जा रही है’, आपने कोई और सूचना उसके बारे में नहीं दी पर एक सूचना ज़रूर दी, क्या?

कि उसका लिंग क्या है| कुछ और आप न बताइए पर ‘जा रही है’, इतना तो पता चल गया कि मादा है| आपने नहीं बताया कि उसके बाकी गुण क्या है पर भाषा ही ऐसी कर दी है कि वो लिंग ज़रूर बता दे – ‘लड़का-लड़की’| दुनिया की हर भाषा यह काम करती है कि तुरंत! जैसा हमारा मन है सेक्सुअली ग्रस्त वैसी ही हमारी भाषा है | दुनिया की हर भाषा सेक्सुअली ग्रस्त है|

समझिए न, आप कभी यह नहीं कहते कि अलग-अलग शब्द इस्तेमाल करो अगर एक बुद्ध जा रहा हो और एक मूढ़ जा रहा हो, आप नहीं अलग-अलग शब्द इस्तेमाल करोगे, पर हाँ, एक पुरुष जा रहा हो, एक स्त्री जा रही हो तो आप निश्चित रूप से अलग शब्द इस्तेमाल करोगे|

इसका मतलब क्या है?

इसका मतलब है कि आपका मन सर्वप्रथम लिंग देखता है, और यह कैसा मन है!

अस्पताल में बच्चा पैदा होता है, बच्चा नीला पड़ा हो, पर फिर भी सबसे पहले क्या देखा जाता है?

लिंग!

उसके बाद उसकी जान बचाने की कोशिश की जाएगी, पहले यह देख लो लड़का है या लड़की, फिर जान बचाओ| जान दोनों की भले बचा ली जाए, पर यह उत्सुकता सबसे पहले रहती है, क्या? कि लिंग क्या है क्योंकि हमारा मन पूरे तरीके से काम से भरा हुआ है|

पूरे तरीके से! वरना आप सोचिए, मैं कुछ सवाल पूछ रहा हूँ आप से:

आपको एक एयरलाइन का टिकट बुक कराना है, मर्द हो औरत हो, एक ही सीट घेरेगा, एक ही खाना भी खाते हैं, एक ही पानी की बोतल आती है उनके लिए, टॉयलेट भी, शौचालय भी वो एक ही इस्तेमाल करते हैं, फिर आपको जब एयरलाइन की ऑनलाइन टिकट की बुकिंग करानी हैं तो उसमें आपको लिंग बताना ज़रुरी क्यों है?

नहीं! एयरलाइन को क्या फर्क पड़ जाएगा किसी दिन सारी औरतें हैं! क्या फर्क पड़ जाएगा अगर किसी दिन सारे मर्द हैं!

पर पूछा ज़रूर जाएगा| और कुछ पूछे न पूछे, ‘लिंग बताओ’ ये क्या फूहढ़ उत्सुकता है! क्यों पूछते हो बार-बार ‘क्या लिंग है?’

आप गौर नहीं करते? यही तो जीवन है, तुम पूछ रहे थे न ‘किताबें न हो तो क्या पढ़े?’, किताबे न हो तो ये सब पढ़ा करो| कि यह सब जानकारी क्यों ली जा रही है…

आप कोई फॉर्म भर के दिखा दो, ऑफलाइन, ऑनलाइन, जिसमें आपसे लिंग न पूछा जा रहा हो| आपने कभी पूछा अपने आप से यह जेंडर क्यों पूछा जाता है बात-बात में, क्या यही मेरी विशिष्ट पहचान है?

हाँ यही है!

श्रोता: यह चीज़ में हर बार सोचता हूँ, जैसे डोमिनोस यहीं कहीं और जाते हैं न तो हर बार नाम पूछते हैं, खाना तो मुझे ही देना है न, सामने ही बैठा हूँ फिर नाम क्यों पूछा?

श्रोता: सर, लेकिन यहाँ पर मेरा इसी के बारे में एक सवाल है- जो मैंने समझा है चरित्र का मतलब वो अपने गुण हैं जैसे खुश रहना, सच्चाई, ज्ञान, पवित्रता आदि| ये सभी इन्द्रियगत हैं और इनको संचालित करने वाला मन|

वक्ता: शरीर सिर्फ व्यक्त करने का काम करता है, अभिव्यक्ति शरीर कर सकता है अन्यथा शरीर के पास अपनी कोई चेतना नहीं होती| जो भी कुछ शरीर करता है, वो मन से ही आता है| तो यह मन का ही काम है, इसको आप यह न समझिएगा कि एक इंद्रिय का काम है और मन उसको संचालित करता है| यह मॉडल आपके मन में बड़ा गलत है|

श्रोता: लेकिन अगर स्पर्श है, और वो अपोज़िट सेक्स का स्पर्श है, और उस पर फिर तुम्हारा जो काम का उद्वेग आता है, ठीक है, तो जहाँ पर सधा हुआ मन है वो संचालित करेगा…

वक्ता: कहाँ पर आता है? काम का उद्वेग कहाँ पर आता है?

श्रोता: वो जो सिग्नल , माइंड पर गया…

वक्ता: माइंड को ही आता है न? शरीर नहीं उत्तेजित होता|

श्रोता: मन ही तो उत्तेजित होता है

पर हुआ तो इंद्रीयों से न…

वक्ता: अरे! आप समझिये, इन्द्रियगत आपको न भी मिले कोई इनपुट तो भी आप सिर्फ अपने मानसिक बल का प्रयोग करके उत्तेजित हो सकते हो|

श्रोता: वो तो इमेजिनेशन…

वक्ता: सब कुछ वही है! सब कुछ वही है और कुछ नहीं है| अन्यथा कोई भी स्पर्श, कैसा भी स्पर्श, मात्र स्पर्श है| उसमें अर्थ मन ही भरता है, स्पर्श तो स्पर्श है|

श्रोता: पर जो काम गुण है, वो तो शरीर से सम्बंधित है, मन से सम्बंधित है जो बाकी गुणों की तरह सेल्फ़ से नहीं आता

वक्ता: हर गुण मन से है…

श्रोता: क्या सच्चाई मन से है, पवित्रता मन से है?

वक्ता: और क्या! और कहाँ से?

और कहाँ से? मन के अलावा किसकी सत्ता है, मन के अलावा कहाँ कुछ और है| कौआ भी वहीं बैठा है, और हंसा भी वहीं बैठा है|

जब हमने बात करी थी चार तलों की, एक-दो-तीन-चार, क्या यह हमने स्पष्ट रूप से नहीं समझा था कि जो कुछ है कहाँ है? जो भी कुछ है वो कहाँ है?

वो मन में ही है|

जो कुछ भी अनुभव के दायरे में आता है, किसी भी तरीके से, वो मानसिक है| और कहीं कुछ नहीं है|

मन ही आपका दोस्त हो सकता है, मन ही आपका दुश्मन हो सकता है, मन ही कौआ हो सकता है, मन ही हंसा हो सकता है, सब मन पर है| और कृपा करके काम को अपने बाकी जीवन से कटा हुआ न समझिएगा| लिबीडो जो शब्द है वो मूलतः काम के लिए नहीं प्रयुक्त होता वो लाइफ़ एनर्जी है, वही जब उचित चैनल नहीं पाती तो वो तमाम तरीके की बीमारियाँ लेकर के सामने आती है|

आपको क्या लगता है, आपका काम आपके बाकी जीवन से असम्प्रक्त हो सकता है? आप बात-बात में बेईमान हो, आप काम में ईमानदार हो जाओगे क्या? आपके जीवन में आप जिस तरह के निर्णय ले रहे हो, काम के लिए उससे कुछ अलग निर्णय लोगे क्या?

श्रोता: पर लोग शादी के केस में …

वक्ता: बिलकुल भी नहीं! बिलकुल भी नहीं! आप शॉपिंग मॉल में जाते हो, आप कौनसा कपड़ा खरीदते हो? शोपिंग मॉल कभी जाइए, लोग कौन सा कपड़ा खरीद रहे हैं, कौन सा कपड़ा बिकता है? रखा ही कौन सा कपड़ा जाता है?

जो सबसे ज़्यादा आकर्षक हो, सबसे ज़्यादा रंग-बिरंगा हो, जो सबसे ज़्यादा इन्द्रियों को भाता हो, जो छूने में अच्छा हो, दिखने में अच्छा हो, जो पहन के शरीर को सुख देता हो|

एक मन है जो कपड़ा खरीदने जाता हो और वो कपड़ा खरीदते समय कह रहा है: दिखता अच्छा हो, छूने में अच्छा हो, शरीर पर अच्छा हो और जब मैं इसे पहनूँ तो दूसरों को यह लगे महंगा कपड़ा है| उसने चार शर्तें रखी है कपड़ा खरीदने के लिए| ध्यान दीजिएगा, आँखों से अच्छा, दिखे छूने में मस्त हो, जब उसको अपने ऊपर लपेट लूँ, जब अपने ऊपर कस लूँ उसको, तो शरीर को सुख दे, और जब दूसरे उसको देखें तो महंगा दिखाई दे| यह औरत जब पति चुनने जाएगी तो क्या यही चारों शर्तें नहीं रखेगी?

आँखों से अच्छा लगता हो, छूने में मस्त हो, जब उसे लपेट लू तो बड़ा सुख मिले, और जब दूसरे देखें तो कहे, ‘महंगा वाला है’ तो एक ही तो मन है न जो कपड़ा खरीदता है और जो काम में जाता है| अंतर कहाँ है? जिस मन के साथ पूरा जीवन बिताते हो उसी मन के साथ आप काम में भी उतरते हो|

ज़्यादातर संत अविवाहित रह गए, उसका एक कारण और भी था| ऐसा नहीं उन्हें किसी चीज़ से विरोध था — संत विरोध की ज़िन्दगी तो जीता ही नहीं है उसको तो सब स्वीकार है — पर आप पाएँगे कि सामान्य जनसंख्या की अपेक्षा संतो में, बुद्ध पुरुषों में, अविवाहित लोगो की संख्या बहुत ज़्यादा है| कारण है, उनको प्यार नहीं किया जा सकता| आप गिरे से गिरे आदमी को प्यार कर लोगे, एक बुद्ध को प्यार करना आपके लिए असंभव है| आपसे करा ही नहीं जाएगा, क्योंकि आपका जो पूरा वेल्यु सिस्टम है वो तो वही है न जो कपड़े की दुकान वाला है| क्या है आपका *वेल्यु सिस्टम* ?

आँखों को अच्छा रुचे, छूने में प्यारा हो, महंगा दिखे | अब बुद्ध न तो छूने में महंगा दिखता है, न आँखों को प्यारा दिखेगा, तो आप कैसे प्यार कर पाओगे बुद्ध को? तो यह नहीं है कि उन्हें जीवन से कोई विरोध था, बात यह है कि ऐसी कोई मिलेगी ही नहीं|

आप किसी से भी आकर्षित हो सकते हो, एक संत की ओर आकर्षित होना ‘आपके’ लिए असंभव है |

यह भी हो सकता है कि वो संत जब तक सामान्य पुरुष था तब तक आप उसके साथ रहो, लेकिन जिस दिन उसकी आँखें खुलने लगे उसके बाद आप उसे छोड़ दो| होता है न ऐसा?

बिलकुल ऐसा ही होगा, क्योंकि वो अब आपकी पहुँच से दूर निकल गया| अब वो महंगा लगता ही नहीं! पहले तो फिर भी अच्छा लगता था अब वो आँखों को प्यारा ही नहीं लगता ! पहले तो फिर भी अच्छे कपड़े पहन लेता था, अब तो वो और फटी चादर में घूमता है| आपको कैसे भाएगा? आप तो वही हो न जो कपड़े खरीदने जाते हो तो कहते हो कि ‘दूसरे कहेंगे अच्छा है’, मुलायम-मुलायम लगे…

श्रोता: सामाजिक तौर पर स्वीकार भी नहीं है

वक्ता: छुपाना पड़ता है| बड़ी दिक्कत है !

श्रोता: वो भी नहीं चाहते न कि उनको कोई पसंद आए|

वक्ता: वो पसंद-नापसंद में रहते ही नहीं, मैने कहा न उनका विरोध ख़त्म हो गया होता है वो तो सदा उपलब्ध हो गए होते है, वो आत्म सामान हो जाते है; वो ब्रह्म समान हो जाते है, ब्रह्म क्या है ?

ब्रह्म वो जो सदा उपलब्ध है |

जो सदा उपलब्ध है पर उसके पास जाना तुम्हें पड़ेगा| बुद्ध पुरुष वैसे ही हो जाता है, वो सदा उपलब्ध है पर उसके पास जाना तुम्हें पड़ेगा|

‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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