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जो बात कोई बताता नहीं
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये तो साफ है कि जो वैश्विक समस्याऍं हैं, बड़ी समस्याऍं, जैसे ग्लोबल वॉर्मिंग (भूमंडलीय ऊष्मीकरण) या क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन), उनका कारण ये गलत खोज ही है, कि इंसान गलत जगह पर खोज रहा है। तो एक आइडियल वर्ल्ड (आदर्श विश्व) तो यही होगा कि ये खोज पूरी तरह से समाप्त हो जाए।

आचार्य प्रशांत: हाँ, जो चीज़ जहाँ है वहाँ पा लो। अब ऐसे समझो कि (सामने की ओर इशारा करते हुए) ये तुम्हारा लॉन (मैदान) है बाहर, ठीक है? और तुमने ज़िद पकड़ ली है कि अँगूठी तो यही पर है, क्यों? क्योंकि अगर तुमने ये ज़िद नहीं पकड़ी, तो तुम्हें ये मानना पड़ेगा कि ये अँगूठी और भी कही हो सकती है। फिर मेहनत करनी पड़ेगी ये पता करने के लिए कि अँगूठी कहाँ पर है।

लॉन अपना ही एक छोटा-सा क्षेत्र है, उसमें हमने ये कल्पना कर ली है, अपने-आपको बिल्कुल समझा दिया है कि इसी में है अँगूठी, ठीक है? ये सोच ही हमारे लिए बड़ी भयावह है कि अँगूठी लॉन में नहीं है। सोचो तो अब कितना श्रम करना पड़ेगा। लॉन में नहीं है तो अब कहीं भी हो सकती है। अब वो अज्ञात हो गई—और अज्ञात से हमें लगता है भय। लॉन में वो जब तक है, हमारे लिए वो क्या है? ज्ञात है। तो हम अपने-आपको बार-बार यही जताऍंगे कि अँगूठी लॉन में है।

अब आप निकले एक दिन खोजने, कि चलो अँगूठी लॉन में है तो हासिल ही कर लें, मिल नहीं रही है, तो आप क्या करोगे? आप ये नहीं मानोगे कि लॉन में नहीं है; आप कहोगे कि है तो लॉन में, इधर-उधर हो गई है। अब आप लेकर आ गए फावड़ा, कुदाल, खुर्पियाँ, और आप लगोगे लॉन को खोदने। ये है पर्यावरण की तबाही। तुम प्रकृति में वो खोज रहे हो जो प्रकृति में है ही नहीं। लॉन प्रकृति है; अँगूठी सत्य है। तुम प्रकृति में सत्य खोज रहे हो, और इसके नाते तुमने प्रकृति की ही तबाही कर दी।

और लॉन में खरगोश है, गिलहरी है। तुम्हें लग रहा है कि किसी खरगोश ने अँगूठी खा ली है, तो तुम्हें लग रहा है कि चलो खरगोशों को फाड़ डालते हैं; इनके भीतर से अँगूठी निकलेगी। देखो, कितनी जीवहत्या कर दी तुमने।

यही इंसान कर रहा है ना? सब जानवरों को मार डाल रहा है। वो सोच रहा है कि जानवरों को मारकर सुख मिल जाएगा, खरगोशों को मारकर अँगूठी मिल जाएगी। "क्या पता किसी खरगोश ने अँगूठी खा ली हो? तो चलो इन्हें मारते हैं, इनका पेट काटते हैं; पेट के भीतर से अँगूठी निकलेगी।"

यही काम तो इंसान दुनियाभर में जानवरों के साथ कर रहा है ना? "चलो इनको काटते हैं, इनको काटकर सुख मिल जाएगा। और जितने पेड़-पौधे हैं, सब काट दो। क्या पता किसकी, कौन-सी डाल पर अँगूठी लटकी हुई हो?"

हम यही तो कर रहे है ना? सारे जंगल काट दे रहें हैं। "और फिर सब जला दो। जला दोगे, सब राख हो जाएगा, राख में ढूँढना आसान होगा; नहीं तो ये पेड़-पौधे, पत्तियाँ बहुत फैली हुई है।" तुमने जला दिया, क्या निकली? कार्बन डाईऑक्साइड। ये ग्लोबल वॉर्मिंग हो गई।

अपने झूठ को कायम रखने के लिए हम फिर सौ झूठ और बोलते हैं, और सौ बेहूदी हरकते करते हैं। हम ये मानते ही नहीं कि जो चीज़ हम प्रकृति में खोज रहे हैं वो नहीं मिलेगी प्रकृति में। सत्य प्रकृति से परे है, बाहर है; लॉन में नहीं है। समझ में आ रही है बात?

हम सब करतूतें करने को तैयार हैं, सारा विनाश करने को को तैयार हैं। एक छोटी-सी बात मानने को तैयार नहीं हैं, कि हमारे खोज की दिशा ही गलत है क्योंकि खोजी का केंद्र गलत है। ये हम नहीं मानना चाहते।

हम बड़े-बड़े बुलडोज़र ले आएँ हैं, और पूरा लॉन ही उखड़वाए दे रहें हैं। कह रहें हैं, "खनो, है तो अँगूठी यही पर।" अरे, भाई! इतनी मेहनत तुम कर रहे हो इस लॉन में अँगूठी खोजने में, इससे थोड़ी कम मेहनत ही करके बाहर कहीं मिल गई होती।

यही बात संसारी आदमी को समझाई जाती है कि जितनी मेहनत तुम कर रहे हो संसार में संतुष्टि पाने के लिए, उससे ज़रा कम मेहनत में ही अध्यात्म में तुमको मुक्ति मिल गई होती। लेकिन ज़िद है पूरी, अब हम अकड़ पर आ गए हैं कि "हमने कह दिया लॉन में अँगूठी है, तो लॉन में ही है। पूरा लॉन खोद दो, मिलेगी तो यही। उसे मिलना होगा यहाँ पर क्योंकि हमने कहा है कि यहाँ पर है।"

और जितना वो नहीं मिलती है, जितना ये सिद्ध होता जाता है कि लॉन में तो नहीं है अँगूठी, उतना हम रुआसे होते जाते हैं; क्योंकि हमारी तो पूरी ज़िन्दगी, पूरी खोज का, पुरे विश्वास का आधार ही यही था कि अँगूठी कहीं गई नहीं, यहीं पर है। अब जितना ये प्रमाणित होता जाता है कि यहाँ नहीं है भैइया, उतना हमारे भीतर से रुलाई छूटती है, और क्रोध भी आता है।

और फिर उसमें खरगोश दिख गया एक, वहाँ बैठा है। तो लगता है, "मारो! तुरंत इसको मार दो! यही अँगूठी खाकर कहीं बाहर छोड़ आया है।" चिड़िया आई है। "मार दो, मार दो! यही है वो। अँगूठी उठाकर ले गई है, बाहर कहीं गिरा आई होगी।"

हम हिंसक हो जाते हैं क्योंकि हमें जो चाहिए वो मिल नहीं रहा। जब तुम भीतर से असंतुष्ट हो, तो तुम और किसी के लिए प्रेमपूर्ण कैसे हो सकते हो? आदमी की स्थिति पूरी समझ पा रहे हो ना?

एक मौलिक भूल है। उस एक मौलिक भूल के कारण हमने पूरी पृथ्वी का सत्यानाश कर दिया। मौलिक भूल ये है कि हम गलत हुए पड़े हैं, और गलत हो कर हम मान रहें हैं कि गलत तरीकों से सही चीज़ मिल जाएगी। हम भी गलत, मान्यताएँ भी गलत, हमारे तरीके भी गलत, लेकिन ठसक ये कि भरोसा पूरा है कि ऐसे ही हमको सही चीज़ मिल जाएगी। जान लगा दी है हमने पूरी। "मिल तो जाएगी ही, भरोसा मुझे पूरा है।"

अरे, इतनी मेहनत कर रहे हो उस चीज़ को खोजने में, उससे कम मेहनत में तुम बदल जाओगे, सही हो जाओगे। तुम सही हो जाओगे, जो चीज़ तुम्हें चाहिए थी मिल गई। लेकिन सही दिशा में मेहनत नहीं करेगा इंसान, यही अहंकार है। आ रही है बात समझ में?

प्र: आचार्य जी, हमने अभी समझा कि निराशा होना बहुत ज़रूरी है। जो इंसान बाहर ढूँढ़ रहा है, बुलडोज़र चला रहा है, खरगोश मार रहा है। तो मेरे ख्याल से निराशा का भी सही आयाम ज़रूरी है क्योंकि इंसान वहाँ भी निराशा पा रहा है। जैसा कि आपने बताया बुलडोज़र लाया, फिर उसने खोद दिया, फिर आग भी लगा दी। हम बार-बार शास्त्रों में सुनते भी हैं कि निराशा होना बहुत ज़रूरी है लेकिन मुझे लगता है कि निराशा का आयाम भी सही होना बहुत ज़रूरी है कि किस जगह निराश हो रहे हैं।

आचार्य: नहीं, उसको अभी निराशा हुई ही नहीं है; उसको बस खिसियाहट हुई है। निराशा का मतलब है भविष्य की समाप्ति, निराशा का मतलब है आगे के लिए तुम्हारी सारी ऊर्जा का ही समाप्त हो जाना। तुम कह रहे हो, "मैं जिस रास्ते पर चल रहा हूँ इसपर आगे अब एक कदम भी नहीं जा पाउँगा।" इसको निराशा कहते हैं। तुम अभी आगे जाकर खरगोश मारना चाहते हो, तो ये निराश कहाँ हुई अभी; ये तो अधिक से अधिक झुंझलाहट है, खिसियाहट है। तुम कह रहे हो, "है तो अँगूठी यहीं पर, इन नालायक खरगोशों ने गायब कर रखी है, इन्हें मार दो।"

तुम अभी ये थोड़े ही मान रहे हो कि "अँगूठी यहाँ थी ही नहीं, खरगोश मार कर क्या होगा?" तब तुम कहलाते वास्तव में निराश, जब तुम बिल्कुल उखड़ जाते, पाँव उलट कर वापस आ जाते। अभी तो बस तुम झुंझलाए हो। तुम कह रहे हो, "चीज़ यहीं है, ये शरारत कर रहे हैं खरगोश। इनके कारण मुझे मिल नहीं रही, इनको सज़ा दो।" तुमने ये थोड़े ही माना है कि चीज़ है ही नहीं।

चीज़ है ही नहीं! अभी भी नहीं है और आगे भी नहीं मिलेगी—भविष्य खत्म! इसको निराशा कहते हैं। भविष्य ख़त्म, अब आगे के लिए कुछ नहीं है। जब तक आगे के लिए कुछ है तुम्हारे पास, तब तक अहंकार आगे की ओर बढ़ता रहेगा। आगे के लिए जो कुछ था उसका शून्य हो जाना बहुत ज़रूरी है।

झूठ क्यों कायम रह पाता है? क्योंकि उसे आगे अपने बचे-बने रहने की और सुख की उम्मीद होती है, बड़ी तगड़ी उम्मीद होती है। इसीलिए तो झूठ जितना बढ़ेगा, उम्मीद की संस्कृति उतनी ज़्यादा बढ़ेगी। आजकल देखते नहीं हो कि होप (आशा) पर कितना ज़ोर है, और कितनी बिक रही है?

किसकी दूकान सबसे ज़्यादा चल रही है? आशा ताई की। बाज़ार में कौन-सी दूकान एकदम गरम है? आशा ताई की। और कुछ बिके ना बिके, होप ज़रूर बिकती है, क्यों? क्योंकि दुख जब सघनतर होता जाएगा, तब उसे बचे रहने के लिए उतनी ज़्यादा आशा चाहिए। वर्तमान जितना रोगी होता जाएगा, तुम्हें उतनी ज़्यादा भविष्य के लिए उम्मीद चाहिए ना? आशा खत्म हो गई, रोगी खत्म हो गया।

स्वस्थ आदमी के लिए प्रार्थना करते हो क्या? "भगवान, कल ठीक कर दो।" करते हो क्या? जो रोगी होता है उसके लिए ही उम्मीद करनी पड़ती है ना? हम बहुत मोटी चमड़ी के लोग हैं, हम आसानी से उम्मीद छोड़ते नहीं। हम उम्मीद का सहारा लेकर सच से लड़ जाते हैं, और इसीलिए आदमी को इतनी उम्मीद चाहिए क्योंकि सच से लड़ना है तो उम्मीद तो चाहिए।

सच तो तुम्हें बार-बार परास्त करेगा, फिर भी तुम डटे कैसे रह जाते हो? उम्मीद का सहारा लेकर, कि सच ने सौ बार मुझे पटकनी दी है, क्या पता एक सौ एकवीं बार मैं जीत जाऊँ? उम्मीद तो रखनी चाहिए ना? होप * । इसीलिए * होप इतनी बिकती है।

हम ये यथार्थ देखते ही नहीं कि बात सिद्धांत की है। ऐसा नहीं कि हम एक बार, दो बार या दस बार हारे हैं; हमारा हारना तय और अनिवार्य है। संयोगवश नहीं, सिद्धांतवश हारे हैं। संयोगवश हारे होते तो संयोगवश कभी जीत भी सकते थे—संयोग ने हराया, संयोग ही जिता भी सकता था — हम सिद्धांतवश हारे हैं। सिद्धांतवश कैसे हारा जाता है? सिद्धांतवश ऐसे हारा जाता है कि *ए प्लस बी होल स्क्वेयर इस ऑलवेज़ ग्रेटर देन ए स्क्वेयर प्लस बी स्क्वेयर* (ए धन बी का वर्ग, ए के वर्ग धन बी के वर्ग से हमेशा अधिक ही होता है)।

(a + b)2 > a2 + b2

ये सिद्धांत की बात है। a2 + b2 हमेशा हारेगा। ए और बी के कोई भी इसमें मान हो, एक पक्ष को इसमें हमेशा हारना है। ये बात समझ में आ रही है? चलो एक शर्त रख लो कि ए और बी दोनों पॉज़िटिव (धनात्मक) होने चाहिए। पर जब तक तुम उस डोमेन (प्रभाव क्षेत्र) में काम कर रहे हो, तब तक ये नहीं हो सकता कि तुम उम्मीद कर रहे हो कि क्या पता ए और बी का जो अगला मेल आए उसमें ए का वर्ग धन बी का वर्ग ही जीत जाए? नहीं जीतेगा बाबा, नहीं जीतेगा। दोनों पॉज़िटिव (धनात्मक) है तो भी नहीं जीतेगा, दोनों नेगेटिव (ऋणात्मक) हैं तो भी नहीं जीतेगा। उसके लिए तुम्हें एक और आयाम में जाना पड़ेगा, किसी और चतुर्भुज में जाना पड़ेगा जहाँ एक पॉज़िटिव हो, एक नेगेटिव हो, फिर हो सकता है। समझ में आ रही है बात?

हम ये मानते ही नहीं है कि हम संयोगवश नहीं सिद्धांतवश हार रहें हैं—और जो सिद्धांतवश हार रहा है वो कभी नहीं जीत सकता। हम यही मान कर चलते हैं कि वो तो इस बार बात बनी नहीं, अगली बार बन जाएगी—उम्मीद। आ रही है बात समझ में?

प्र: इससे एक और बात पता लगती है कि आत्मज्ञान की शिक्षा बहुत पहले से मिलनी चाहिए क्योंकि नहीं तो ये सिद्धांत का आपको पता लगेगा ही नहीं। पूरा जीवन निकाल देंगे ये सोचते-सोचते, आपको ये लगेगा ही नहीं कि आप गलत खेल रहे हो। अगर हम खुद सोचें इस बात को, कि जैसे हम किसी लॉन में ढूँढ़े जा रहे हैं कि इसी में सबकुछ है; ये आपको लगेगा ही नहीं कि ये भी हो सकता है कि अँगूठी यहाँ है ही नहीं। तब तो आत्मज्ञान की शिक्षा बहुत ज़रूरी हुई।

आचार्य: बिल्कुल। क्योंकि, देखो, अँगूठी नहीं मिल रही; अँगूठी के ना मिलने पर दोनों संभावनाएँ हो सकती हैं: एक ये कि नहीं है इसलिए नहीं मिल रही और दूसरी ये कि है तो पर मिल नहीं रही। तो कौन तुम्हें रोक लेगा इस संभावना को मानने से कि है तो, बस मिल नहीं रही।

तार्किक दृष्टि से अगर तुम देखो, आप एक चीज़ खोज रहे हो और मिल नहीं रही, तो दोनों बातें हो सकती है ना? एक तो ये हो सकता है कि नहीं है इसलिए नहीं मिल रही, और दूसरा ये हो सकता है कि है पर अभी नहीं मिल रही, उम्मीद ये है कि आगे मिल जाएगी। अब तर्क यहाँ पर रुक जाएगा। तर्क उम्मीद को कभी खारिज नहीं कर सकता क्योंकि तार्किक बात तो यही है। हमें यही पता है ना कि यथार्थ में अभी ये चीज़ नहीं मिली; अगर अभी नहीं मिली तो ये कैसे साबित कर दोगे कि आगे भी नहीं मिलेगी। तो बस क्योंकि तर्क ये साबित नहीं कर पता कि आगे भी नहीं मिलेगी, तो आदमी तर्क का सहारा ले कर उम्मीद का धागा पकड़े लटका रहता है।

जो कुछ मूलभूत सिद्धांत हैं, वो पता होने चाहिए। वो शिक्षा से ही पता लगेंगे। कोई कहे कि नहीं मुझे तो अपने-आप पता लग जाऍंगे इत्यादि, ऐसे नहीं होता; उसके लिए तो ठोस, आयोजित, व्यवस्थित जीवन शिक्षा चाहिए ही चाहिए। तुमको शिक्षा ना दी गई होती, तुम छोड़ो केल्कुलस, जो बिल्कुल छोटू पाइथागोरस का सिद्धांत है, वो भी तुम्हें अपने-आप पता चल जाता क्या? अब तुमको बहुत आसान लगता है कि "हाँ, पाइथागोरस का थ्योरम (प्रमेय) ही तो है, क्या हो गया?" पर तुम अस्सी साल के हो जाते, अपने-आप तुम्हें नहीं पता लगता। लेकिन दावा हमारी यही है कि अध्यात्म की शिक्षा हमें नहीं चाहिए; हम जीवन से खुद ही सीख लेंगे।

अपने-आप तो हज़ारों सालों तक करोड़ों लोगों को ये भी नहीं पता चला था कि पृथ्वी गोल है। आज तो चार साल का बच्चा भी जानता है पृथ्वी गोल है; उसके हाथ में तुम ग्लोब दे देते हो छोटा-सा। अपने-आप पता लग जाता? हज़ारों सालों तक करोड़ों लोगों को नहीं पता लगा कि पृथ्वी गोल है, पर दावा हमारा यही है कि मन के भीतर की सच्चाई क्या है, ये तो हमें जीवन के अनुभव बता देंगे, हम खुद ही कर लेंगे।

नहीं पता लगेगा स्वयं। उपनिषद् आवश्यक हैं। कोई सोचे कि हमारा हो गया, हम देख लेंगे; नहीं होगा भाई, नहीं होगा। बड़े तर्क उठते हैं, कहते हैं, "ऋषियों को कैसे पता लग गया था?" हाँ, ऋषियों को पता लग गया था। तुम ऋषि हो? तुम्हें नहीं लगेगा पता। ये बात तुम्हें बुरी लगती हो तो लगे। और ऋषियों को वैसे ही पता लगा था जैसे आइंस्टीन को रिलेटिविटी (सापेक्षता) पता लगी थी। करोड़ों में किसी एक को पता लगता है। ना तुम ऋषि हो, ना तुम आइंस्टीन हो।

तुम्हें ‘अहम् ब्रम्हास्मि’ स्वयं पता लगने की संभावना उतनी ही है, जितनी ये संभावना है कि अपने-आप ऐसे ही सड़क पर चलते-चलते तुमको स्पेस-टाइम कर्वेचर (दिक्-काल वक्रता) समझ में आ जाए। लेकिन जब तुमसे कहा जाएगा कि क्या ऐसा हो सकता है कि एक दिन तुम अपने किराने की दुकान से सब्ज़ी मंडी की ओर जा रहे थे, और अचानक तुम्हें स्पेस-टाइम कर्वेचर समझ में आ गया? तो तुम कहोगे, "नहीं, ऐसा तो नहीं हो सकता; उसके लिए तो बहुत किताबें पढ़नी पढ़ेंगी।" वहाँ तुम तुरंत मान जाओगे। लेकिन ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ तुम्हें लगता है की ऐसे ही आ जाएगा समझ में। "ऋषि को आ गया था, तो हमें भी आ जाएगा।" नहीं आएगा।

राधे लाल निकले हल्दी के छह बोरे बेचकर घर जाने को, कि तभी याद आया कि लहसुन खरीदनी है, और लहसुन वाले के सामने खड़े थे, कि बिल्कुल स्पष्ट हो गया कि प्रकाश भी आवश्यक नहीं है कि सीधी रेखा में चले। अचानक सारे समीकरण आँखों के सामने नाचने लग गए। अब क्यों हँस रहे हो? क्यों तुम्हें ऐसा लग रहा है कि ऐसा हो ही नहीं सकता? श्रोडिंजर्स का समीकरण, उसकी सारी आइजेन वैल्यू (अभिलाक्षणिक मान), वो सब मुन्ना-मुन्नी बनकर नाच रहे हैं। एक लहसुन हो गया, एक धनिया हो गया, परवल, कद्दू। और पीछे पूरा नाचने वालों का एक जमघट है। पूछा, "ये क्या है?" बोले, "ये तो बहुत सारी प्रोबेबिलिटीज़ (सम्भावनाएँ) हैं। सब समझ में आ गया हमको।" घर आए, बिल्ली दिखी, बोले, "ये श्रोडिंजर की बिल्ली है—हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती है। क्या ये कमरे में है? पक्का नहीं। क्या ये नहीं है? पक्का नहीं।" हो सकता है ऐसा?

अरे, पढ़ाया ना जाए ना, तो जीवन भर आदमी ‘अ’ नहीं लिख पाटा खुद। अस्सी-अस्सी साल के लोग हो जाते हैं और 'अ-ब' लिखना नहीं आता। 'अ-ब' लिखना नहीं आता, ‘अहम् ब्रम्हास्मि’ आ जाएगा? अपने-आप आ जाएगा? और 'अहम् ब्रम्हास्मि' नहीं आया, तो तुम बताओ मुझे, जीवन में काम क्या करना है, धंधा क्या करना है, पैसे कहाँ से कमाने है, ये तुमने कैसे सीख लिया? जब तुम स्वयं को नहीं जानते, तुम्हें कहाँ से पता कि क्या काम करना चाहिए? फिर तुम करोगे कोई घटिया काम, और पैसे आ रहे होंगे, और क्यों कर रहे हो वो घटिया काम? इसीलिए क्योंकि ‘अ’ से अहम् तुमने कभी सीखा ही नहीं।

कैसे बनाओगे रिश्ते? जब अहम् को नहीं जानते, तो तुम्हें कैसे पता कि अहम् को सम्बन्ध किसके साथ बनाना चाहिए? फिर करोगे यही कि इधर-उधर जाकर कुछ उल-जलूल शादी-ब्याह कर लाओगे, और फिर माथा फोड़ोगे, अपना भी, उसका भी। तो ऐसा नहीं है कि अगर तुमको अध्यात्म की शिक्षा नहीं मिली है, तो तुमको बस इधर-उधर के कुछ किताबी सिद्धांत नहीं पता चले, या तुम बस पुस्तकीय ज्ञान से वंचित रह गए; अगर तुमको आध्यात्मिक शिक्षा नहीं मिली है, तो तुम जीवन में हर उस चीज़ से वंचित रह गए जो सही है और सुन्दर है। और किस चीज़ से जीवन तुम्हारा भर जाएगा? हर उस चीज़ से जो गलत है और कुरूप है। जीवन को गलत ही बनाना हो, कुरूप ही रखना हो, तो कर लेना उपनिषदों की उपेक्षा।

प्र: आचार्य जी, अब तो समय कहाँ है? अभी एक रिसर्च (शोध) आया था कि सात साल और एक सौ दो दिन बचे हैं कुल, जो कि एक पर्यावरण-घड़ी बनाई गई है कि इतने समय तक अगर बदलाव नहीं रोका गया, तो सर्वनाश निश्चित है। उसके मद्देनज़र तो ये होना चाहिए कि ‘अ’ से अँगूर भी पढ़ाया जाए और ‘अ’ से अहम् भी पढ़ाया जाए। अब तो एक कानून ही बनना चाहिए। ये बात मान भी लेते हैं कि करोड़ों में से एक इंसान ऋषि हो जाता है, लेकिन उतनी संभावना है भी नहीं अब इंसान के पास। जब समय ही इतना काम है, तो ये कानून ही बनना चाहिए कि ‘अ’ से अँगूर और ‘अ’ से अहम् दोनों ही पढ़ाया जाए।

आचार्य: हाँ, बनना चाहिए, पर फिर उसके लिए सत्ता जागृत हाथों में होनी चाहिए ना? फिर उसके लिए सत्ता भी किसी ऋषि के हाथों में होनी चाहिए। ऋषि के हाथ में सत्ता होगी तभी तो वो यह अनिवार्य कर पाएगा कि सब बच्चे उपनिषद् पढ़ें। ये आम जो राजनेता हैं, ये थोड़े ही अनिवार्य कर पाऍंगे उपनिषदों को?

प्र: इसका मतलब ऋषि का राजनीती में आना ज़रूरी है?

आचार्य: अगर दुनिया उसको बचानी है तो आना होगा, और अगर उसको ये कहना है कि दुनिया क्या है, आँखों का धोखा, मिट जाए तो मिट जाए, तो नहीं आएगा। उसकी मौज पर है।

प्र: जैसे आपने बताया कि आइंस्टाइन भी साधना वाला जीवन जी रहे थे, तभी उनको मिला सिद्धांत। ऐसे ही नहीं मिल गया कि अचानक चलते-चलते मिल गया। इस तरह से ब्रह्म ज्ञान तो बिल्कुल संभव नहीं है। तो ऋषियों ने भी--

आचार्य: हाँ, बिल्कुल, जैसे e = mc2 है, 'अहम् ब्रम्हास्मि' वैसा है। अहम् बराबर ब्रह्म, ये वैसा ही है, e = mc2। अब ये सूत्र बहुत छोटा है, लेकिन इसके पीछे जो शोध और गणित है वो बहुत विशाल है, और जो प्रयोग है इसके पीछे वो बहुत ज़बरदस्त है। लेकिन चूँकि हम भौतिक लोग हैं, इसीलिए भौतिक चीज़ों को बहुत सम्मान देते हैं, और भौतिक सिद्धांतों को भी बहुत सम्मान दे देते हैं। e = mc2, इस समीकरण का सम्बन्ध पदार्थ से है, ‘एम्’ (द्रव्यमान)। उसको हम सम्मान दे देते हैं, हम कहते हैं, "हाँ, इसके साथ छेड़खानी नहीं करेंगे, और बड़ी मेहनत से ये सूत्र निकला होगा।" उसको हम सम्मान दे देते हैं। लेकिन अहम् ब्रह्मास्मि में पदार्थ तो कुछ है ही नहीं, ना अहम् पदार्थ है, ना ब्रह्म पदार्थ है। तो उसको हम सम्मान नहीं दे पाते; वो लगता है हमें कि ऐसे ही है ये तो। पनवाड़ी के यहाँ की चीज़ है, हम भी कहेंगे, "लगाना ज़रा, कत्था-चुना मार के, अहम् ब्रह्मास्मि।"

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