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जिसने ये जान लिया, वो फिर कभी मरता नहीं || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: दो झूठ हैं जिनको एक साथ बोलना पड़ता है, और उन्हें हमेशा जोड़े में चलना ही पड़ेगा उनमें से सिर्फ़ एक झूठ पकड़ना मुश्किल हो जाएगा। जो पहला झूठ है वो अपनेआप को अहंकार मानने की मजबूरी है और जो दूसरा झूठ है वो बोलना पड़ता है आत्मा होने के कारण। इन दोनों झूठों को समझिएगा — अगर आपको स्वयं को अस्तित्वमान घोषित करना है, उस अर्थ में जिस अर्थ में हम कहते हैं कि हम हैं, तो आप सम्पूर्ण या समष्टि नहीं हो सकते। हम किस अर्थ में कहते हैं कि हम हैं? ये दुनिया है और इस दुनिया में हम हैं। ठीक है न?

जब भी हम कहते हैं कि हम हैं, तो उससे हमारा आशय होता है कि ये रहा संसार और इस संसार में हम हैं। हम इसी संसार से आये हैं, हम ऐसा कहते हैं। इसी संसार से हमारा भरण-पोषण होता है, इसी संसार से हमें हमारी मनचाही वस्तुएँ मिलती हैं, इसी संसार से हमें भय भी मिलता है, यहाँ कुछ हमसे छिन भी सकता है, यही हमारे सब रिश्ते नाते हैं। तो जब भी आप कहते हैं, ‘मैं हूँ’ तो आप बस ‘मैं’ नहीं कहते; आप कहते हैं, ‘मैं और संसार।’ भले ही आप संसार का नाम न लें पर मैं कहने भर में ‘मैं और संसार’ दोनों की आप बात कर देते हैं। ठीक है न?

तो मैं को अपने होने के लिए संसार चाहिए। आप नहीं कह पाऍंगे कि आप हैं; कोई पूछे कहाँ हैं? तो कहे, ‘कहीं नहीं हूँ।’ कोई पूछे कब हैं? तो कहें, ‘कभी नहीं हूँ।’ कोई पूछे, ‘क्या हैं आप?’ तो आप कहें, ‘कुछ नहीं हूँ।’ ऐसा नहीं हो पाएगा। सिर्फ़ आप यही तीन प्रश्न भी ले लीजिए तो आपकी हस्ती के साथ तीन जोड़ीदार तो यहीं जम गये। आप हैं; कोई पूछे, ‘कहाँ हैं?’ तो आपको बताना पड़ेगा, न बतायें वो अलग बात है पर कहीं होंगे, स्थान। तो मैंने अपनेआप को एक स्थान पर सीमित कर लिया, अपनेआप को मैं बोलते ही। ठीक है?

आप कहें, ‘हूँ’, तो कोई पूछेगा, ‘कब?’ आपने अपनेआप को एक समय पर भी सीमित कर लिया, आप ये नहीं कह सकते कि समय का कोई भी क्षण हो, मैं तो हूँ ही हूँ! बारहवीं शताब्दी में आप थे क्या? और बत्तीसवीं शताब्दी में आप होंगे क्या? तो एक तो आपने अपनेआप को एक स्थान पर सीमित कर लिया, एक समय पर सीमित कर लिया और फिर कोई ये भी पूछ सकता है कि हो तो क्या हो? तो आपने अपनेआप को एक पहचान में भी सीमित कर लिया।

इस तरह से और भी मैं प्रश्न बता सकता हूँ कि हम किस-किस तरह से अपनेआप को सीमित कर लेते हैं और ये जो तीनों सीमाऍं लगायी हैं, ये सीमाऍं जगत की हैं। जगत में ही आप कहीं पर होते हैं, जगत में ही किसी से आपने अपनी पहचान ली होती है, जोड़ी होती है और संसार और समय एक ही चीज़ होते हैं तो समय में भी आप किसी एक बिन्दु पर केन्द्रित होते हैं। तो मैं और संसार एक साथ चलते हैं, मैं अपनेआप को मैं नहीं बोल सकता बिना संसार की बात करे, वरना विचित्र बात हो जाएगी। ठीक है?

तो ये जो पहला हम आग्रह पकड़ लेते हैं कि ‘मैं हूँ’ — उस आग्रह के कारण हमें जुड़ना पड़ता है संसार से। पहले तो एक संसार है, मानो कि है और फिर उससे जुड़ो भी उससे जुड़ोगे नहीं तो मैं नहीं बोल पाओगे, नहीं तो लोग कहेंगे, ‘मैं’ कौन? फिर फँस जाओगे दिक्क़त आएगी। तो जो जुड़ाव है उसमें सबसे पहला होता है शरीर के साथ। शरीर। और सब चीज़ें किसी की छिन रही हों तो बुरा मानेगा, शरीर छिन रहा हो तो फिर तो वो ही छिन गया जिसके लिए सब चीज़ें हैं।

संसार से जो हम पहली चीज़ पकड़ लेते हैं वो है शरीर; मैं शरीर हूँ! तो मैं कहने का जो आग्रह है, व्यर्थ का आग्रह; उसके कारण हमने जिन दो झूठों की आरम्भ में चर्चा करी उसमें से पहले झूठ का जन्म होता है, ‘मैं शरीर हूँ।’ कोई ज़रूरत नहीं थी न अपनेआप को मैं बोलने की? जिसने भी मैं बोला होगा शरीर मैं नहीं बोलता, शरीर को तो उसने पकड़ा है जो मैं बोलता है।

कोई था; जिसको बहुत हठ था कि बोलूॅंगा, ’मैं’ बोलूॅंगा। पूर्ण ‘मैं’ नहीं बोल सकता, पूर्ण मौन होता है पूर्ण किसको बोलेगा ‘मैं’, पूर्ण असंग होता है पूर्ण के अलावा कोई दूसरा नहीं जिससे मैं बोला जा सके। कोई था जिसने कहा कि पूर्ण होने में क्या रखा है हमें तो ‘मैं’ बोलना है, ‘मैं’ तो बोलेंगे।

तो इस कामना से, इस ज़िद से, इस आग्रह से ‘मैं’ आ गया और मैं आते ही कहना पड़ेगा, ‘मैं शरीर हूँ!’ क्योंकि पूर्ण से जब ‘मैं’ पैदा होता है तो जोड़े में पैदा होता है; ‘मैं और संसार’ ‘जीव और जगत’ — दो पैदा होते हैं, अब बोलना पड़ेगा कि मैं देह हूँ! ये पहला झूठ हो गया; ‘मैं देह हूँ।’ हो लेकिन आप कुछ और, देह होना तो ज़िद है बस, हो कुछ और। जो हो आप वो न शुरू होता है न समाप्त होता है। अब ये तो बस एक ज़िद कर ली है कि मैं कुछ हूँ; ज़िद पकड़ ली है कि मैं शरीर हूँ!

जैसे कि आप अभिनय करने लग जाऍं कि आप अब चिड़िया हैं, तो उससे आप उड़ने थोड़े ही लग जाऍंगे! आप अभिनय कर रहे हैं कि आप शरीर हैं, हैं तो आप कुछ और ही न? जो आप हैं उसको आप चाहकर भी भुला नहीं सकते। अपनी सच्चाई को, अपनी हस्ती के छुपे हुए सत्य को, लाख प्रयास के बाद भी पूरी तरह विस्मृत करना असम्भव है।

तो हैं तो आप आत्मा; और वो आप चाहें, तो भी भुला नहीं सकते। अब मामला फॅंस गया, आपका आग्रह है कि आप अहंकार हैं, आपकी सच्चाई है कि आप आत्मा हैं। अगर अहंकार हैं तो मरना पड़ेगा, और सत्य आपका ये है कि आप मर सकते नहीं। अगर अहंकार हैं तो मरना पड़ेगा, माने हमने जो ज़िद करी है उस ज़िद का परिणाम है, मृत्यु। क्या ज़िद करी है हमने? ‘मैं हूँ और मैं शरीर हूँ!’

‘मैं हूँ, मैं शरीर हूँ’ — इस ज़िद का एक ही अंजाम है, मौत। जन्म भी इसी ज़िद से हुआ है और ये ज़िद फिर आपको मौत देगी लेकिन ये भी भूले नहीं भूलता कि आत्मा है और आत्मा का न जन्म है न मृत्यु है; तो अब फॅंस गये, करें क्या?

रोज़ का अनुभव दिखा रहा है कि मृत्यु तो है और मृत्यु आ रही है; चारों तरफ प्रतिपल मौत-ही-मौत है। हम लोग यहाँ अभी बैठ कर बात कर रहे हैं इतनी पुरानी है पृथ्वी; कि सैकड़ों-हज़ारों जीवों की लाशें ठीक इसी जगह के नीचे होंगी जहाँ हम लोग अभी बैठे हुए हैं, और उन जीवों में बहुत सारे मनुष्य भी होंगे हम जहाँ बैठे हुए हैं वहाँ नीचे। इसी जगह की बात नहीं है आप कहीं भी चले जाइए; मुश्किल है ऐसी जगह पाना जहाँ की मिट्टी मृत्यु से न बनी हो।

तो रोज़ का अनुभव यही है कि मृत्यु है लेकिन जो भीतरी हमारी सच्चाई है वो मृत्यु से सहमत हो नहीं सकती क्योंकि आत्मा मरती नहीं। तो अहंकार एक बीच का रास्ता निकालता है, वो कहता है, ‘हूँ तो मैं अहंकार लेकिन मैं मरूँगा नहीं।’ अब अहंकार होने की शर्त ये थी बल्कि क़ीमत ये थी कि हाँ, मौत में जियो! और अगर मरना नहीं है तो जान लो कि अहम् नहीं हो। क्यों ज़िद पकड़नी कि मुझे तो होना है! मुझे तो होना है?

तो अहम् एक चालाकी भरा रास्ता निकालता है — कहता है, ‘अपनी हस्ती तो मैं नहीं छोड़ सकता, मैं तो हूँ। लेकिन मैं मरूँगा नहीं, मैं तो हूँ लेकिन मैं मरूँगा नहीं।’ मरूँगा नहीं का क्या मतलब होता है? अहम् का मतलब ही होता है मृत्यु; और मृत्यु कोई भविष्य वाली मृत्यु नहीं, प्रतिपल की मृत्यु।

मृत्यु तो हो ही रही है; हाँ, हमारा मन सक्षम नहीं होता लगातार मृत्यु के प्रति वो संवेदनशील हो पाये इतना और इन्द्रियाँ इतनी सूक्ष्म नहीं होतीं कि वो लगातार, जो मृत्यु है उसको वो देख पायें।

तो मृत्यु तो लगातार ही हो रही है कोई भविष्य की बात भी नहीं है पर अहंकार की ज़िद — उसके लिए सबसे बड़ी बात है, आत्मसुरक्षा; ‘मैं बचा रहूँ।’ तो अपनी सुरक्षा के लिए वो कह देता है, ‘हूँ तो अहंकार पर मरूँगा नहीं। मैं नहीं मरूँगा। मैं नहीं मरता, मैं नहीं मरूँगा।’ ये उसकी भीतरी धारणा होती है, गहरी। मैं नहीं मरता, मैं नहीं मरूँगा।

ऊपर-ऊपर वो भले ही ये मानने को तैयार हो जाए क्योंकि नहीं मानेगा तो अतार्किक कहलाएगा कि प्रत्येक जीव मरता है और मृत्यु एक निश्चित तथ्य है। ऊपर-ऊपर से भले ही वो ये मानने को तैयार हो जाए पर भीतरी तौर पर उसका बड़ा स्वार्थ रहता है ये भुलाने में कि मृत्यु है। तो सैद्धान्तिक तौर पर, मौखिक तौर पर वो मान लेता है कि मृत्यु है; पर आप उसका आचरण देखिए, आप उसके कर्मों को, उसके विचारों को, उसके निर्णयों को देखिए तो उसमें कहीं नहीं दिखायी देता कि उसे मृत्यु की चेतना है।

आप किसी व्यक्ति से जाकर पूछें कि क्या तुम मरोगे? तो वो मान लेगा, ‘हाँ, मरूँगा!’ क्योंकि कहेगा कि नहीं मरूँगा तो सब हॅंसेंगे उसके ऊपर। लेकिन फिर उसी व्यक्ति के आप चुनावों को देखिए, और उसके विचारों और भावनाओं को देखिए वहाँ आपको नहीं दिखायी देगा कि मृत्यु है, वो अगर इस भाव को स्वीकार कर रहा होता है कि हाँ मृत्यु तो है — तो वो बिलकुल वैसे नहीं जी रहा होता जैसे वो जी रहा है। हम ज़बानी तौर पर तो मान लेते हैं कि हाँ, हर जीव मरता है हम भी मर रहे हैं, बीमार हैं तो मरेंगे ही।

लेकिन हमारा जीवन इस बात की गवाही नहीं देता कि हमें मृत्यु का थोड़ा भी संज्ञान है। हमारे जीवन को देखिए तो हम मृत्यु को लगातार भुलाये बैठे हैं। आपको दो लोग मिलेंगे कहीं चर्चा करते हुए; और दो लोग हों चर्चा न करें ऐसा कम ही होता है, चर्चा नहीं कर रहे तो मतलब और ज़ोर की चर्चा चल रही है दोनों में एक दूसरे के लिए — कहीं भी आप मान लीजिए आप एक लम्बी दूरी की यात्रा कर रहे हैं ट्रेन से; पन्द्रह-बीस-पच्चीस घंटे की यात्रा है, और लोग आपस में बातचीत शुरू कर देते हैं; वहाँ आप पाइएगा सब मुद्दों पर बात हो रही है पर मुश्किल ही होगा कि मौत पर बात हो रही हो कि दो लोग बैठे हुए हैं और आपस में एक-दूसरे से मौत पर बात कर रहे हैं। बहुत मुश्किल है।

इसी तरह अब त्यौहार आ रहे हैं; घर-कुटुम्ब होते हैं, लोग जुटेंगे, आपस में बातें करेंगे। अब दशहरा तो सीधे-सीधे मृत्यु से सम्बन्धित है यहाँ तक कि नौ दुर्गा में भी कितने ही सारे हैं ये सब असुर-राक्षस वगैरह जिनकी मृत्यु होती है, कोई एक दो भी नहीं; पता नहीं कितने? पर आप नहीं पाऍंगे कि दोस्त-यारों में या नात-रिश्तेदारों में मृत्यु पर चर्चा हो रही है। कोई बच्चा पूछ दे कि माँ आज ये मधु-कैटभ मारे गये, ये ‘मारे गये’ माने क्या होता है? थोड़ा विस्तार से आज बताओ, आज मृत्यु पर चर्चा करो माँ!

माँ उनको झटक देगी; कहेगी, ‘त्यौहार के दिन अशुभ बातें करता है!’ अरे भाई! त्यौहार ही मृत्यु का मन रहा है तो अशुभ बात कैसे हो सकती है मृत्यु? और बड़ा मुश्किल है कि पूरा परिवार जुटा हो, भाई का परिवार, बहन का परिवार सब आये हैं, त्यौहार पर बैठे हैं और सब संयुक्त होकर बात कर रहे हैं कि ये मौत क्या चीज़ होती है? नहीं मिलेगा आपको ऐसा।

श्मशान भी शहर से बाहर बनाये जाते हैं और कोई टहलने के लिए श्मशान की तरफ़ नहीं जाता, खाली ज़मीन जबकि बहुत होती है वहाँ। हम जीते ऐसे हैं जैसे मौत न हो; और उसकी वजह है, आत्मा को मौत आती नहीं है। आत्मा को मौत आती नहीं है, मौत का बार-बार ज़िक्र करोगे तो याद आएगा कि अहंकार बनकर कितना महँगा सौदा कर लिया है।

अहंकार होने की क़ीमत ही क्या है? मृत्यु! और आत्मा को मौत आती नहीं है। हमारे लिए फिर ज़रूरी हो जाता है, मृत्यु को भुलाये रखना, मृत्यु का स्मरण, माने अपनी मूर्खता का स्मरण। किसने कहा था, मरो? जो अहंकार को नहीं चुनते उन्हें तो नहीं मरना पड़ता, “हम न मरैं, मरिहैं संसारा”, वो (सन्त) तो कह देते हैं हम तो नहीं मरेंगे; पर हम तो मरेंगे।

तो मौत मुँह पर तमाचे जैसी होती है। मौत हमें बताती है कि हमने जो होना चुना है वो कितनी मूर्खता की बात है, सौदा बिलकुल महँगा है, घटिया है, मूर्खता का है। तो हम तरक़ीब करते हैं, क्या तरक़ीब? कि हम मौत को भुलाये रखेंगे।

लेकिन मनोविज्ञान अच्छे से जानता है कि जिस चीज़ को भुलाने का इतना आग्रह हो निश्चित है कि वो चीज़ लगातार याद है, आप उसकी स्मृति का दमन कर रहे हो बस! जिस चीज़ का दमन कर दो वो विचार से बाहर हट सकती है, जीवन से बाहर नहीं हटती। जो पिछले लगभग सवा सौ सालों का मनोविज्ञान रहा है उसमें ये बड़ी खोज रही है, सच्चाई को विचार से हटा सकते हो जीवन से नहीं हटा सकते क्योंकि आपका जीवन आपके विचार से बहुत आगे का, बहुत बड़ा होता है।

आप मृत्यु के विचार का दमन कर लो, जो कि हम करते हैं लेकिन मृत्यु आपके कर्मों में, आपकी वृत्ति में, आपकी भावना में, आपके आवेगों-उद्वेगों में आपके कर्मों की छिपी हुई जड़ के रूप में तो प्रस्तुत रहेगी ही, पर हम उसको जो हमारी चेतना है जो हमारे सचेत विचार हैं उससे ज़रूर हटा देते हैं। उससे हम हटा देते हैं; मौत की बात न करके मौत को हमेशा एक त्रासदी के रूप में देखकर के, हम मृत्यु से मुँह मोड़ने का प्रयास करते हैं। समझ में आ रही है बात?

जीव को मरना क्यों बुरा लगता है, क्योंकि उसकी चाह है ही नहीं मरने की। बहुत सीधी सी बात है न? अब इसी वाक्य को देखिएगा, उसकी चाह है न मरने की, जो न मरे उसको बोलते हैं, आत्मा। तो जीव की चाह क्या है? आत्मा। तो अहम् की चाह है? आत्मा। लेकिन आत्मा का मतलब है अहम् का न होना। यहाँ पर अहम् फॅंस जाता है।

वो (ग्रन्थ) कहते है जो तुम्हें चाहिए वो तुम्हें अपने न होने पर ही मिल सकता है; या तो अपना प्रेम चुन लो, या सुरक्षा चुन लो। अहम् के पास इतना प्रेम होता नहीं कि वो अपनी सुरक्षा को दरकिनार कर सके, तो प्रेम तो उसे जीवन भर रहता है आत्मा से ही पर बचाये-बचाये वो ख़ुद को घूमता है — वो आत्मा कभी हो नहीं पाता, आत्मा हो नहीं पाता तो फिर स्वांग करता है, नाटक; कहता है, ‘पाया तो नहीं है पर मैं ऐसा अभिनय करूँगा, जैसे पाया है।’

कैसे अभिनय करता है वो? मृत्यु को भुलाकर के। अगर आत्मा को पा लिया होता तो मृत्यु से मुक्त हो जाता, अहम् जानता है कि अगर आत्मा को पा लिया होता तो मृत्यु से मुक्त हो जाता — तो एक काम करते हैं आत्मा को भले ही नहीं पाया पर अभिनय ऐसा करो जैसे मृत्यु है ही नहीं। अभिनय ऐसे करो जैसे मृत्यु है ही नहीं। अभिनय कैसे करना है? मृत्यु के तथ्य का दमन करके, मृत्यु को छुपाकर के; ‘मृत्यु नहीं है, मृत्यु नहीं है।’

भाई! अगर तुम अहंकार हो तो मृत्यु है! कौन कह रहा है कि मृत्यु अनिवार्य है, मृत्यु तो वैकल्पिक है। अगर तुम अहंकार हो सिर्फ़ तभी मृत्यु है। मृत्यु से तो बिलकुल बचा जा सकता है मत रहो अहंकार नहीं रहेगी मृत्यु! लेकिन ये दाम चुकाना आपको मंज़ूर नहीं है; आप कहते हो, ‘अहंकार तो मैं हूँ।’

‘मैं’ हूँ तो फिर मृत्यु भी है। अब धोखाधड़ी — ‘मैं अहंकार हूँ लेकिन मृत्यु नहीं है। हूँ मैं अहंकार! लेकिन मृत्यु नहीं है।’ तो नहीं मृत्यु से बचना है, मृत्यु को अनदेखा करना है, और मृत्यु को अनदेखा करना बड़ी चाल हो जाती है फिर अहंकार ही बने रहने की क्योंकि मुक्ति की ओर बढ़ने की बड़ी-से-बड़ी प्रेरणा मृत्यु से ही आती है। मुक्ति की ओर बढ़ने की प्रेरणा का स्रोत मृत्यु से ज़्यादा कोई नहीं दे सकता, कुछ नहीं हो सकता।

जिसने मृत्यु को भुला दिया उसने अपनी अमुक्ति को भुला दिया, मृत्यु को भूलना माने अपने बन्धनों को भूलना, अपनी बीमारी को भूलना, अपनी दुर्दशा को भूलना। जिन्होंने जाना है और इतिहास भी गवाही देता है कि मृत्यु का साक्षात्कार, मृत्यु का स्वीकार इतनी सक्षम बात होती है कि वो तत्काल आपके सब झूठ काट देती है, आपको सत्य की दिशा धकेल देती है।

अगर आपको अपने बन्धनों में ही सन्तुष्ट रहना है तो मौत से मुँह चुराते रहिए, शायद इसीलिए स्त्रियों को श्मशान जाने की मनाही करी गयी। समाज ने कहा कि इसका बन्धन में रहना बहुत ज़रूरी है, जो मृत्यु को जान लेगा वो फिर बन्धन को स्वीकार नहीं कर पाएगा; वो कहेगा, ‘बन्धन किसके लिए?’

जा रहे थे युवा बुद्ध और एक लाश देख ली थी; और उनका मृत्यु से परिचय ही नहीं कराया गया था, वो लाश देखकर समझ ही नहीं पाये ये मौत है — वो बोले, ये आदमी? क्या हुआ थोड़ी देर पहले तुमने मुझे बताया था, उनका सारथी था या सेवक रहा होगा जो उनके साथ था; बोले, ‘थोड़ी देर पहले तुमने मुझे दिखाया था कि वो आदमी बीमार है, तो ये आदमी कुछ ज़्यादा बीमार है ये तो फिर अपने पाँव चल भी नहीं पा रहा है इसको चार लोग लेकर जा रहे हैं? तो सेवक हँसा कहा, ये ज़्यादा बीमार नहीं है इसकी सब बीमारी ख़त्म हो गयी। तो बोले, मतलब? उनको बचाकर रखा गया था, बचपन से ही लोगों ने आकर उनके पिता को बोला था कि ये जो आपका लड़का है ये टिकेगा नहीं इसके लक्षण ऐसे हैं कि ये किसी और दिशा जाएगा पर अगर आप इसको टिका लोगे तो ये चक्रवर्ती सम्राट होगा, लेकिन सम्भावना यही है कि ये आपके राज्य में और आपके महल में टिकने वाला नहीं है। तो राजा ने कहा कि ठीक है मैं इसमें वैराग्य पैदा ही नहीं होने दूँगा तो राजा ने उसको उन सब चीजों से बचाकर रखा था जो मन में वैराग्य ला सकती हैं और वो सब चीज़ें भर-भरकर दी थीं जिनसे मन में राग पैदा होता है।

मृत्यु का उन्हें नहीं पता रहा होगा कुछ; तो पूछ रहे हैं इसको क्या हो गया है ये? टाँगें खराब हैं इसकी? क्या है अपने पाँव नहीं चल रहा है? बोले ये, ‘सब टाॅंगों से मुक्त हो गया अब इसे चलने की कोई ज़रूरत नहीं है। बुद्ध को वो शब्द तीर की तरह लगा एकदम, मृत्यु! बोले, ‘वो जो बीमार था तो तुमने कहा था कि वो बुढ़ापा आता है तो बीमारी आती उससे पहले एक बूढ़ा आदमी मिला था तब तुमने कहा था, ‘आप भी बूढ़े हो जाओगे एक दिन।’ फिर जब बीमार मिला तो तुमने कहा था कि आपको भी बीमार होना पड़ेगा, तो ये बताना ये जो इसके साथ हो रहा है ये भी मेरे साथ होगा?’ तो बोला कि युवराज बुरा लग रहा है बोलते हुए, लेकिन होगा तो आपके साथ भी यही।

तो लाइट ऑफ एशिया है। बुद्ध के ऊपर लिखी गयी सर्वश्रेष्ठ कविता है। वो कविता क्या है वो एक बहुत, उसको आप निबन्धकाव्य कह सकते हैं। तो उसमें वो कहते हैं कि बुद्ध ने कहा, “मैं मरूँगा नहीं मैं मर गया! मैं मरूँगा नहीं मैं मर गया। मैं मर गया!” मौत का दर्शन इतना मुक्तिप्रद होता है और उस दिन के बाद उन्हें बहुत समय नहीं लगा सिद्धार्थ से बुद्ध हो जाने में। मौत में ये ताक़त होती है ये आपके सारे बन्धन काट दे।

अहंकार को तोड़कर रख दे इतनी जान होती है मौत में। अहंकार अपनेआप को बोलता है जान मुझमें है, अहंकार से ज़्यादा जान होती है मौत में, अहंकार को तोड़ देती है। बुद्ध ने वो सारे स्वांग छोड़ दिये जो अपनेआप को अमर मानने के अभिनय के साथ आते हैं। बुद्ध ने कहा, “जो मैं हूँ नहीं मैं उसका नाटक क्यों करूँ? मैं तो मुर्दा हूँ! मैं मौत को कैसे भुलाऊँ? और फिर वहाँ से हमको बुद्ध का प्रकाश मिलता है। जिसने मौत के दर्शन कर लिये वो प्रकाशित हो जाता है।

बोध प्रत्यूषा में हम नचिकेता के साथ हैं, नचिकेता को ज्ञान और मुक्ति ही मिल रहे हैं मौत का सीधा साक्षात्कार करके और उससे अभागा कोई नहीं है जो मौत का साक्षात्कार करने के विपरीत, मौत को भुलाने की चेष्टा करता रहता हो, जैसा कि पूरा संसार, सब समाज करता है — ‘भुलाओ-भुलाओ! मौत को छुपाओ! मौत को छुपाओ! मौत को छुपाओ। तो अगर मृत्यु के स्मरण का मतलब है, मुक्ति; तो मृत्यु के विस्मरण का क्या अर्थ है? बन्धन।

तो इसलिए फिर सन्तों ने पूरा प्रयास करके बार-बार-बार-बार हमको मौत याद दिलायी। आप ज्ञानियों की वाणी सुनिए, चाहे सन्तों के गीत — मुश्किल ही है कि कोई बात वहाँ पूरी हो बिना मृत्यु के उल्लेख के। उनके लिए क्यों आवश्यक हो गया है बार-बार आपको मौत की याद दिलाना? क्योंकि अहंकार के लिए आवश्यक है मौत को भुलाना, चूॅंकि हमारे लिए ज़रूरी है कि हम मौत को भुलाये चलें तो उनके लिए ज़रूरी है कि मौत याद दिलाये चलें। हम मौत को भुलाते हैं ताकि अहम् बने रह सके, वो आपको मौत याद दिलाते हैं ताकि आपको याद आये कि आप आत्मा हो, मरने की कोई ज़रूरत नहीं।

वो आपको न चिढ़ा रहे हैं, न डरा रहे हैं; ये बताकर कि मौत है, वो आपको बता रहे हैं कि जो तुम बने हुए हो अगर यही बने रहोगे तो मौत है लेकिन तुमको ये बने रहने की कोई ज़रूरत है नहीं। मौत वास्तव में तुम्हारे लिए है नहीं, वो जब आपको ये भी बोलते हैं कि उड़ जाएगा हंस अकेला! तो वो आपको यही कह रहे हैं कि तुम वो हो जो उड़ता नहीं है बल्कि वो आकाश है जिसमें सब हंस उड़ते रहते हैं।

आप वो नहीं हो जो मृत्यु के उपरान्त कहीं उड़ जाता है, वो नहीं हो आप। जिसको मौत आती होगी, आये; आपको नहीं आनी है। लेकिन आप अगर आग्रह कर-करके कुछ और बनोगे तो आपको भी आएगी, तो मौत एक चुनाव है। मौत अनिवार्यता नहीं है मौत एक चुनाव है। जैसे अहम् होना एक चुनाव है, वैसे ही मरणशील होना भी एक चुनाव है, बस!

और खूब बड़ी बेईमानी ये है कि पहले तो चुन लो कि मैं अहंकार हूँ और फिर नाटक करो कि मरूँगा नहीं। ये तो खेल के नियम ही ख़राब कर दिये; नियम ये था कि भाई तुम चुन सकते हो अहम् होना, पर अगर अहम् होना चुन रहे हो तो मौत चुन रहे हो।

हमने कहा हम बेईमानी खेलेंगे, ‘हम अहम् होना भी चुनेंगे और और जिऍंगे ऐसे, जैसे हम अमर हों। जिसको पता होता कि मौत है वो अपना समय मूर्खताओं में बिताता कभी? पहला ही प्रश्न बता दीजिए जिसको पता हो कि मृत्यु है वो अपना समय मूर्खताओं में बिताएगा क्या? जिसको पता हो मौत है वो बैठे-बैठे, घंटों-घंटों व्यर्थ विषयों का विचार करेगा क्या? जिसको पता हो कि मृत्यु है वो किसी के भी प्रति गहरा द्वेष, भारी नफ़रत रख सकता है क्या? तुमको पता है तुम जिससे इतनी नफ़रत रख रहे हो वो मरने वाला है अब नफ़रत का क्या बचा?

पर जब आप किसी से नफ़रत रखते हैं उस वक्त क्या एक पल को भी ये मन में आता है कि वो मरने वाला है? न ये आता है वो मरने वाला, न ये आता है कि मैं मरने वाला हूँ, कुछ नहीं। ये सब काम सिर्फ़ तभी हो सकते हैं जब आप मृत्यु को भुला दें, तो माने आप आत्मा बने बैठे हैं, मृत्यु जिसको नहीं है उसको तो आत्मा बोलते हैं।

आत्मा बने बैठे हैं और आत्मा क्या कर रही है? आत्मा पिछले तीन घंटे से ये सोच रही है कि ये पड़ोस वाले की गाड़ी का टायर कैसे पंचर करना है। इसने आज फिर से लाकर मेरे गेट के आगे पार्क कर दी थी। ये आत्मा सोच रही है बैठे-बैठे। अगर आत्मा हो तो ये सोच नहीं सकते और अगर अहंकार हो तो ये सोचने से कोई फ़ायदा नहीं। न तुम हो, न वो गाड़ी है, न वो पड़ोसी है; कोई नहीं है क्या पंचर करोगे?

भैंसे वाले के पास टायर होते नहीं, जो चीज़ पंचर करने लायक थी वहाँ तुम्हारी कील काम आएगी नहीं। हम जो कुछ भी करते हैं वो कर सकते हैं क्या अगर ठीक उसी वक्त ये प्रबल एहसास हो कि उड़ जाएगा हंस अकेला! होगा क्या? और अगर ये एहसास आने भी लग जाता है कि मौत है हम तो भी अपनेआप को दिलासा दे लेते हैं। जो एक बहुत बड़ा झूठ मानव ने आविष्कृत करा है वो है मृत्यु के बाद जीवन।

अहंकार की मजबूरी है ये मानना कि मरने के बाद भी कुछ है ताकि जो तौर-तरीक़े तुम्हारे जीवन के चल रहे हैं वो चलते रहें। अहम् मरता है और अगर बहुत अकाट्य और बहुत सबल प्रमाण आपके सामने ले आ दिया जाए कि आप मरने वाले हो, अब आप क्या करोगे? अब तो बदलना पड़ेगा! पर आप कहते हो, ‘मैं अभी भी नहीं बदलूॅंगा, क्यों? क्योंकि मरकर मैं कुछ और बन जाऊँगा न? मैं मरा थोड़े ही। मेरा पुनर्जन्म हो जाएगा, पुनर्जन्म नहीं होगा तो कोई स्वर्ग, कुछ नर्क कुछ तो मिलेगा, कोई आफ़्टर लाइफ़ (मरणोपरान्त) तो होगी न?’

माने कुछ भी करके किसी तरह अपनेआप को बस ये साबित करे रहना है कि मैं मरूँगा नहीं। अरे! इतनी मेहनत कर रहे हो इससे अच्छा है सीधे-सीधे कि आत्मा हो लो। उधर मरने का कोई हिसाब ही नहीं, वहाँ कोई नहीं मरता, आत्मा ही हो लो, मुक्ति में मृत्यु नहीं होती। पर मुक्त होना नहीं है रहना बन्धन में है; रहना बन्धन में है, जीना ऐसे है जैसे मरेंगे नहीं।

और किसी वजह से बिलकुल प्रमाण साफ़ हो जाए कि मरने वाले हो तो क्या बोल दो? ‘अरे! मौत के बाद भी तो जीवन होता है!’ इसीलिए पुनर्जन्म तमाम तरह के पापों का कारण है, पुनर्जन्म का जो सिद्धान्त है — आदमी सुधर जाए अगर उसको साफ़ पता चल जाए कि बस यही है जो है सामने, पर कुछ धर्मों ने पुनर्जन्म को मान लिया जिन्होंने पुनर्जन्म को नहीं माना उन्होंने भी इतना तो माना कि मरने के बाद कुछ होता है।

आप उसका कारण समझ पा रहे हो न क्या है? ‘अरे, भाई कोई बात नहीं! कोई बात नहीं।’ श्यामलाल जी जा रहे हैं वजन बढ़ाये बैठे हैं ज़बरदस्त, दौड़ लो! ‘अरे बेटा! अब क्या दौड़ेंगे घुटनों में दर्द आ गया है! अब तो वज़न-अज़न अगले जन्म में ही घटेगा। ये देख रहे हो क्या किया? बात ये सिर्फ़ इन्होंने मज़ाक में नहीं बोली है, कहीं-न-कहीं वो ये मानते हैं कि है।

उन्हें पता होता कुछ नहीं है तो उन्हें अभी दौड़ लगानी पड़ती। तोंद लिये-लिये ही सही घुटनों के दर्द के साथ ही सही लेकिन दौड़ लगानी पड़ती। पर अब क्या बोल दिया अगले जन्म में देखेंगे। किन्हीं से कुछ बोलो, ‘अच्छा ऐसा सीख लीजिए मामी जी!’ कोई बात है! ‘चलिए, फ़लानी चीज़; आप रसोई में रहती हैं, एक नयी ये आप चीज़ ही बनानी सीख लीजिए!’ ‘चलिए, हम जा रहे हैं विदेश घूमने आपको साथ घुमा देते हैं।’ ‘अरे बेटा! अब तो यूरोप अगले जन्म में ही देखेंगे। ‘अरे! यही मौक़ा है देख सकती हो अभी तो देख लो!’ ‘नहीं बेटा, क्या करना है कहीं जाकर।’

ये काहे नहीं कभी कहतीं क्या करना है जीकर? जाकर कुछ नहीं करना तो जीकर भी तो कुछ नहीं करना है न? सीधे बोलो कि जीना तो है पर ठीक वैसे ही जीना है जैसे आज तक जिया है। कुछ नया करने में सीखने में नयी जगह जाने में अहंकार को ख़तरा हो जाता है, ढर्रे टूटने का ख़तरा, ढर्रों में जीता है न अहंकार! तो फिर अगला जन्म आ जाता है, अब तो अगला जन्म।

कोई कुछ उल्टा-पुल्टा कर रहा है, ‘तू अगले जन्म में छिपकली बनेगा!’ भाई अगर जो वो कर रहा है वो सचमुच ग़लत है तो उसका दुष्परिणाम ठीक अभी होगा। अगले जन्म में छिपकली बनने की क्या ज़रुरत है? और जैसा ये इंसान है, अगर छिपकली बन गया तो ये तो इसके लिए प्रोन्नती जैसी बात है। छिपकलियों को बड़ा बुरा लगेगा ये कौनसी चीज़ तुमने हमारे समुदाय में भेज दी, वो जो कर रहा है अगर सचमुच ग़लत है तो उसका दुष्परिणाम ठीक अभी होगा, वो दुष्परिणाम बता दो न!

पर वो दुष्परिणाम आप बता नहीं पाओगे क्योंकि आप स्वयं नहीं जानते कि वो जो कर रहा है उसका दुष्परिणाम क्या है तो अपने अज्ञान को छुपाने का तरीक़ा क्या हो गया? अभी आगे काम चलेगा। कुछ भी कर लो बस मौत, माने अन्त के तथ्य को झुठलाना है। अन्त नहीं आएगा, हम तो बचे रह जाऍंगे, अन्त नहीं आएगा। कभी अन्त नहीं आना, चौरासी लाख योनियाँ हैं, अन्त नहीं आना है।

तो मौज हो गयी, माने चींटी भी बन गये तो भी रहेंगे न? ऐसा थोड़े ही चले गये, चले नहीं जाओगे बेटा! जो चीज़ आत्मा मात्र को उपलब्ध होनी चाहिए थी सदा होना! वो हमने किसको दे दी? अहम् को दे दी। उसकी मौज हो गयी। तो परम्परा ने आपको बार-बार बोला कि आगे ऐसा हो जाएगा, आगे ऐसा हो जाएगा; सन्तों ने आपको आगे की बात नहीं कही, उन्होंने मृत्यु की बात कही।

आपको नहीं मिलेगा कोई सन्त, कोई ज्ञानी जो आपको डरा रहा हो कि इतनी शक्कर खाता है चींटी बनेगा। ये काम प्रथा का रहा है, रूढ़ि का रहा है, परम्परा का रहा है कुछ हद तक पंडितों का रहा है वो आपको ये सब बताऍंगे। कल किसी का आया कि अभी पता नहीं श्राद्ध के दिनों के लिए बोला है या नौ दुर्गा के लिए बोला। या यूँही बोला, बोले कि बच्चा पेट में हो तो महिला को आग नहीं जलानी चाहिए, ऐसा कहा जाता है।

‘आचार्य जी, आप बार-बार बोलते हैं अन्धविश्वास मत मानो, पर हमारी तरफ़ ऐसा कहते हैं कि गर्भ के दिनों में आग नहीं जलानी चाहिए रसोई वगैरह में। पर मेरी माँ ने जला दी थी और मेरे शरीर पर न मैं पैदा हुई तो तीन-चार तरह के कुछ दाग थे। तो तब से मेरे मन से ये बात जाती ही नहीं कि इसीलिए हुए हैं कि मेरी माँ ने आग जला दी थी।’

वो बर्थ मार्क्स होते हैं भाई! सबके होते हैं। कोई नहीं ऐसा होता जो पैदा हो तो उसके कहीं-न-कहीं कुछ-न-कुछ निशान न हों, पर वो यही लेकर बैठी हैं कि वो जो आग जला दी थी तो वो जो आग का निशान होता है; कहती हैं, आग जला दी थी यहाँ तक कि अगरबत्ती भी अगर जला दी तो उसका जो निशान होता है आग का वो बच्चे के ऊपर छप जाता है। तो बोल रही हैं, ‘मेरे छप गया मैं क्या करूँ?’ मैंने कहा, तुम्हारे शरीर पर नहीं छपा है तुम्हारे खोपड़े पर छपा हुआ है, शैम्पू लगाओ! समझ में आ रही है बात ये?

फिर सन्त बार-बार क्या याद दिलाते हैं? “उड़ जाएगा हंस अकेला, जग दर्शन का मेला, जग दर्शन का मेला।” ये जगत है, ये एकदम आपके साथ चलने वाली चीज़ ज़रा भी नहीं है, न आपको रहना है, न संसार को रहना है लेकिन आपने जो भूल कर ली है, उसके परिणाम में ही भूल सुधार की सम्भावना भी है। आप बन बैठे हो, ‘मैं’ और सामने खड़ा कर लिया है संसार। ये जो द्वैत है ये आपकी भूल का परिणाम है या भूल की अभिव्यक्ति है, ‘मैं हूँ, संसार है’ ये जो द्वैत है ये आपकी भूल की अभिव्यक्ति है। इसी अभिव्यक्ति में भूल सुधार की सम्भावना है। तो कह रहे हैं दर्शन, दर्शन। भारत में दर्शन शब्द का उपयोग साधारण अर्थों में कभी भी नहीं किया जाता, दर्शन का अर्थ ही होता है जो ऊँचाई है उसका दर्शन। सत्य का दर्शन, साधु का दर्शन; वहाँ दर्शन की बात होती है, नहीं तो दर्शन कोई हल्का शब्द नहीं है।

जग दर्शन का मेला, जगत इसीलिए है ताकि सत्य का दर्शन कर पाओ। जगत इसलिए नहीं है कि जगत को भोग लेना है, जगत इसलिए है ताकि उसमें अपनी भूल को देख पाओ और भूल को देखना माने भूल सुधार। आप रसोई में हैं और आपके घर कोई पालतू बिल्ली है या पालतू कुत्ता है और आप कुछ खाने को बना रहे हैं, मान लीजिए आपने दाल बनायी सब्जी बनायी, और वो जो दाल-सब्जी थी आप खड़े हुए हैं आप बना रहे थे वो आपके हाथ से उसका जो भी पात्र था वो गिर गया नीचे भूल हो गयी।

भूल हो गयी न? वो गिर गया नीचे और नीचे एकदम बढ़िया अच्छी दाल थी, तैयार दाल थी और वो नीचे पूरी फैल गयी या स्वादिष्ट सब्ज़ी थी वो नीचे फैल गयी, हुआ भी होगा कभी ऐसा या होते देखा होगा, होता है? आप इंसान हैं, तुरन्त आप उस फैली हुई चीज़ को देखेंगे तो आपको क्या भाव आएगा, आप क्या करेंगे?

आप कहेंगे क्या हो गयी, ग़लती हो गयी। ये जो मैंने फैला दिया है ये क्या है मेरी? ग़लती है। और आप कहेंगे, अब ये जो फैल गया है मुझे इसको साफ़ करना है; और वो जो फैल गया है आपकी बिल्ली ने देखा, वो जो फैल गया है घर में बिल्ली कुत्ता जो भी है आपके; उसने देखा उसके लिए वो क्या है? उसके लिए वो क्या है? उसके लिए कोई ग़लती-वलती नहीं है। जो आपके लिए भूल है उसके लिए भूख है। आप साफ़ करें न करें वो साफ़ कर देगा। आप थोड़ी देर के लिए इधर-उधर हो जाएँ पाँच-दस मिनट के लिए भले ही आप इधर-उधर हो गये कि कुछ खोजकर लाऊँ जिससे साफ़ करना है इतनी देर में आप लौटकर आयें, वो साफ़ हो चुका है।

ये कुत्ते बिल्ली की ये पशु की निशानी है कि वो भूल का भोग करता है। मनुष्य की निशानी ये है कि वो भूल का सुधार करता है। इंसान वो है जो जब देख ले कि भूल हुई है तो उसको साफ़ करता है, और जानवर वो है वो जब पाये कि अरे मिल गया माल, भूल हुई होगी हमें क्या करना! तो वो उसको भोग डालता है। ये जगत आपकी भूल है इसको भोगना नहीं है।

भोगोगे तो कुत्ते बिल्ली हो गये, ये काम बिल्ली का है कि नीचे गिर गयी दाल और चटाचट; वहीं दाल नीचे गिरी हुई है, नीचे हो सकता है कुछ धूल भी पड़ी हो तो धूल मिश्रित दाल को; कल्पना करिए कितनी गति से उनकी जीभ चलती है, सट-सट-सट… कहीं-न-कहीं उनको भी पता है कि ये जो गिरा है ये बहुत देर तक रहना नहीं, रहना नहीं तो जल्दी-से-जल्दी इसको भोग लो। ठीक वैसे, जैसे ज़्यादातर लोग जगत को भोगने में बड़ी तीव्रता दिखाते हैं उन्हें पता है ज़्यादा तो रहना नहीं जितनी जल्दी हो उतना इसे फटाफट-फटाफट तेज़ी के साथ भोग लो। जितनी तेज़ी दिखा सकते हो दिखाओ, और इसको भोग लो। समझ में आ रही है बात?

भूल को भोगते नहीं हैं, भूल को साफ़ करते हैं। जो भोगे वो पशु, जो साफ़ करे वो इंसान। साहब कह रहे हैं, दर्शन, दर्शन। यहाँ जो कुछ भी है उसमें दर्शन करो। दर्शन का अर्थ होता है आँखों से आगे का जानना। दृश्य के पीछे की सच्चाई को दर्शन कहते हैं। अनुभव के पीछे जो है उसको आत्मा कहते हैं, जो कुछ दिख रहा है उसके पीछे का देख लिया तो दर्शन हो गया। जगत दिख रहा है भूल हो गयी जगत दिख रहा है दिखना ही नहीं चाहिए था पर अगर दिख रहा है तो उसके पीछे क्या है ये भी देखो अब।

जो अब दिखने लगा है उसके पीछे क्या है ये भी देख लो, तो भूल सुधार हो जाएगा। दृश्य के पीछे जो है उसको देखने को दर्शन कहते हैं, और दिखने से आशय बस एक इन्द्रिय से नहीं है कि आँखें! जो कुछ भी अनुभव में आ रहा है सुनायी दे रहा है, स्पर्श में आ रहा है, विचार में आ रहा है, भाव में आ रहा है उसके पीछे जो है अब उसको भी जानो न!

ये तो कह दिया कि ऐसा भाव उठ रहा है, भाव क्यों और किसको है ये भी जानिए, तो दर्शन हो गया। दर्शन, वो सब नहीं होता कि मन्दिर में जाकर मूर्ति का दर्शन कर लिया। वो बहुत शुरुआती बात है अधिक-से-अधिक। वो अगर दर्शन है भी तो बहुत प्रारम्भिक स्तर का है। लोग कहते हैं, गये थे तीर्थ पर, वहाँ जाकर के महादेव के दर्शन कर आये। महादेव कोई व्यक्ति या वस्तु हैं क्या कि किसी एक जगह पर बैठ जाऍंगे जाकर? महादेव के दर्शन का अर्थ है, संसार की सत्यता को जानना। किसी जगह जाकर के थोड़े ही महादेव के दर्शन कर पाओगे आप। उसको या तो झूठ बोल सकते हो या अधिक-से-अधिक कह सकते हो कि वो बात बहुत शुरुआती है।

इस व्यक्ति ने अध्यात्म का बस अभी ककहरा पढ़ा है, क, ख, ग वाली बात कर रहा है ये। इसने शिव सूत्र नहीं पढ़े अभी और इनसे भी आगे वो होते हैं जिन्हें स्वप्न में ही दर्शन हो जाते हैं। ‘जी, आज सपने में दर्शन हो गये’ ऐसे नहीं दर्शन होते, खुली आँखों से भी दर्शन करना बड़ा मुश्किल है, बन्द आँखों से कैसे कर लोगे? दर्शन माने यही जो मेला बिछा हुआ है, इस मेले के यथार्थ को उसी समय जानना, जब वो दिखा। दिखा नहीं कि बात कौंध गयी कि इसकी सच्चाई क्या है। बाद में सिद्धान्त के तौर पर तो थोड़ा आसान हो जाता है जानना कि अच्छा-अच्छा जो अभी हुआ वो क्या था वो ठीक है, लेकिन उसमें लाभ फिर बहुत कम हो जाता है।

कोई आपको ज़हर खिला दे और ज़हर खिलाने के पाँच मिनट बाद आपको जो केमिकल खिलाया गया है उसकी पूरी केमेस्ट्री समझा दे तो आपको क्या लाभ हो जाएगा? और बुरी मौत मरोगे! ज़्यादातर ज्ञान ऐसे ही होता है। ज्ञान का उपयोग तब है न जब वो स्वतः स्फूर्त, तत्काल; तत् काल, ठीक उसी पल उदित हो जिस पल अनुभव हो रहा है।

अनुभव और ज्ञान बिलकुल साथ-साथ चलने चाहिए, तब तो ज्ञान अनुभव की काट बनेगा न नहीं तो अनुभव खा जाएगा आपको। अनुभव तो खा जाएगा आपको; और बाद में आपको पता भी चले कि आप खाये जा चुके हैं तो अब क्या कर लोगे? अजगर के पेट में हो अब वहाँ पर मंत्र पढ़ लेना, ज्ञान मिल गया है अब। जब वो खाने आ रहा था तब कोई जगा देता न! तब तो मस्त सोये पड़े थे वो आपको लील गया एनाकोन्डा और जब लील गया तो भीतर गये तो आँख खुली, वहाँ पर अब ज्ञान बता रहे हो तो क्या हो जाएगा उससे?

लोग आते हैं न आप लोग कई बार कहते हैं जब तक सत्रों में रहते हैं तब तक सब समझ में आता है और एकदम साफ़ साफ़ सब खुल जाता है बाहर जाते हैं लेकिन अपनी पुरानी दुनिया में तो सब भूल जाता है। तुम्हें कुछ नहीं मिल रहा फिर सत्रों से, सत्र इसलिए थोड़ी है कि यहाँ बैठकर के ज्ञान वर्धन कर लो और थोड़ा सुरक्षित अनुभव कर लो; सत्र तो इसलिए है कि बाहर जाओ तो एक ढाल लेकर के जाओ, बाहर जाओ तो एक कवच पहनकर जाओ। ज्ञान का कवच कि अब कोई नुक़सान नहीं हो सकता।

बाहर जाते हो और फिर वहाँ नुक़सान करा ही आते हो तो यहाँ बैठकर क्या सुना, क्या समझा? बाहर नुक़सान कराओगे यहाँ आओगे कुछ नहीं सीखोगे फिर बाहर नुक़सान कराओगे, तो यहाँ आना ही बन्द करना पड़ेगा क्योंकि यहाँ आना अपमान जैसी बात लगेगी न, यहाँ आप जितनी बार आओगे उतनी बार बस यही पता चलेगा और नुक़सान करा आये। नुक़सान रुक तो रहा नहीं और नुक़सान का हिसाब और मिल जाता है यहाँ चार घंटे बैठकर। या तो यहाँ बैठो तो नुक़सान रुके। ज्ञान इसीलिए होता है, रुके। और वो तभी रुक सकता है जब दर्शन हो, दर्शन हो।

जो बात दिखी, उसमें दूध-का-दूध और पानी-का-पानी हो जाए तुरन्त, उसी समय हो जाए। यही एक पल तो होता है आपके पास इसके अलावा तो सब स्मृति है, इस पल में गच्चा खा गये तो बाद की होशियारी से क्या लाभ? जब सुबह होती है तो सभी को पता चल जाता है कि चोर आये थे। फ़ायदा तो उसका है न जिसे रात में पता चल जाए कि चोर आये हैं। साहब कहते है न, ‘कौन ठगवा नगरिया लूटल रे नगरिया लुटल रे!’ नगरिया लुट गयी है ये कोई छुपी बात थोड़े ही है, चार घंटे बाद सबको पता चल जाएगा, सारा खेल बस चार घंटे का है सुबह छः बजे आपको नहीं, पूरे मोहल्ले को पता चल जाएगा कि नगरिया लुट चुकी है। लेकिन जिसे रात में दो बजे पता चल जाए, बचा तो वो न।

दर्शन समझ रहे हो क्या है? सामने खड़ा हो गया है ठग! और ठग बोलकर नहीं आएगा यहाँ टैटू कराकर थोड़ी आएगा, ठग हूँ मैं। ठग जितना बड़ा होगा वो उतना ज़्यादा ठग जैसा नहीं लगेगा वो कुछ और ही बनकर आ गया, वो बड़ा प्रिय लगेगा मिठाई बनकर आ जाएगा। जीवन में जो सबसे प्यारी-प्यारी, मीठी-मीठी, चीज़ें होती हैं ठग तो उन्हीं का रूप लेगा न?

मैं अपनी पुरानी डायरी देख रहा था तो उसमें मैंने लिख रखा था “प्रियम् त्वाम् रोत्स्यति”, जो तुम्हें प्रिय है वही तो तुम्हें रुलाता है। जो तुम्हें प्रिय है वही तो तुम्हें रुलाता है, तो ठग मिठाई बनकर आता है। जो आज प्रिय लग रहा है, वही तुम्हें बहुत बुरा रुलाने वाला है, मुश्किल होगा आपका कोई दुख उससे न हो जो आप से कभी-न-कभी प्रियता का सम्बन्ध न रखता हो।

छोटे-मोटे दुख तो संयोग से आ सकते हैं, मच्छर काट गया; अब मच्छर कभी भी महबूब नहीं था लेकिन बड़े वाले दुख मच्छरों से नहीं आते, बड़े वाले दुख तो महबूब से ही आते हैं। दर्शन का क्या मतलब है? वो जब सामने खड़ा हो तभी दिख जाए, “ठगवा नगरिया लूटल रे!” तब नहीं दिखायी देता, हाँ ईश्वर का दर्शन करना है, भाषा परिष्कृत कर लेनी है बिलकुल। मिठाई खाने जाना है कोई पूछे कहाँ को निकले, ‘ज़रा दर्शन को जा रहे थे।’

दर्शन किया दो मिनट, लड्डू ख़रीदे दो किलो! ‘पुजारी जी एक लड्डू में भी आधा लड्डू चढ़ाओ न बाक़ी वापस करो! क्या कर रहे हो!’ दर्शन समझ रहे हैं क्या है? ईश्वर के दर्शन का यही अर्थ है असली, घर से बाहर निकल रहे हैं घर से बाहर निकलते हुए जल्दी-जल्दी (हाथ जोड़कर) ऐसे करके निकल गये। घरों में लोग रखते हैं कई बार छोटे मन्दिर; अच्छी बात है! पर दर्शन का अर्थ तो समझिए। दर्शन माने क्या? अगर झूठ चारों तरफ़ है तो सच भी फिर हर समय और चारों तरफ़ है, लेकिन दिखायी वो देगा झूठ का पर्दा हटा कर ही। तो दर्शन कब हो सकता है? हर समय हो सकता है, हर जगह हो सकता है। झूठ कहाँ-कहाँ है?

हर समय और हर जगह! तो दर्शन भी कहाँ और कब हो सकता है, हर समय और हर जगह और अगर हर समय और हर जगह नहीं हो रहा दर्शन तो फिर बात ही बेकार है न? क्योंकि सच के दर्शन का एक ही विकल्प है। क्या? झूठ की फाॅंसी। दो ही सम्भावनाऍं हैं चारों तरफ़ और हर समय क्या है? झूठ! अगर सच नहीं दिख रहा तो निश्चित ही क्या दिखेगा, और कब दिखेगा? हर समय। तो अगर दर्शन नहीं है तो फिर क्या है?

दर्शन नहीं है तो फिर मर्दन है। मर्दन माने कुचला जाना। तो दर्शन ऐसी नहीं चीज़ होती कि सुबह-शाम हम जाकर के दर्शन कर आते हैं। सुबह शाम तो दर्शन कर आते हो, पूरी दोपहर क्या होता है फिर तुम्हारा, और रात भर क्या होता है? मर्दन। तो फिर दर्शन भी तुम्हारा असली नहीं रहा होगा। दर्शन प्रतिपल होना चाहिए क्योंकि झूठ… ऐसे सीसीटीवी का क्या फ़ायदा जो दिन में दो बार चालू होता है, एक बार तीस सेकंड को एक बार पचास सेकेंड को।

सीसीटीवी अगर है तो उसे चौबीस घंटे चलना पड़ेगा न? आपको वेंटिलेटर पर डाल दिया गया है और बोलता है, ‘बड़ा खास वेंटिलेटर है दिन में दो बार चलता है, आइए एडमिट हो जाइए।’ जाइए एडमिट हो जाइए वो वेंटिलेटर दिन में दो बार चलता है। लोग बड़े दुखी हो जाते हैं, ‘क्या बताएँ यहाँ पर दिन में बस दो बार पानी आता है दिन में दो बार पानी आता है दुखी हो जाते हो, दिन में दो बार दर्शन करते हो तो दुखी नहीं होते? बड़ी लोगों की समस्या रहती है, पानी बस सुबह-शाम आता है, दो-दो घंटा। गनीमत है दो घंटा तो आया, तुम्हारा दर्शन कितना है? दो मिनट भी नहीं है। सतत ध्यान, सतत ध्यान। उस सतत ध्यान को आप सतत प्रेम भी बोल सकते हैं, दोनों बिलकुल एक बात हैं।

“आठ पहर चौसठ घड़ी”, गा देना भाई लोग! “आठ पहर चौसठ घड़ी।” दर्शन होगा तो निरन्तर होगा और नहीं हो रहा तो हो ही नहीं रहा फिर झूठ मत बोलो कि गये थे मन्दिर में दर्शन कर आये। हो रहा होता तो लगातार हो रहा होता। आँख से देखने को दर्शन नहीं कहते!

आँख से किसी को देख लिया; ‘आज बड़ा अच्छा दिन है, आचार्य जी आज कैफ़े में मिल गये, बाहर निकलो तो आफ़त रहती है। आज दिन बहुत अच्छा आपके दर्शन हो गये।’ अच्छा-अच्छा माने ये संयोग नहीं हुआ होता मैं वहाँ नहीं बैठा होता तो? ‘नहीं, वो तो बस…’ माने तुम्हारी ओर से चेष्टा बस इतनी ही थी कि तुम बगल की टेबल से उठकर मेरी टेबल पर आ गये। कुल इतना दाम चुकाया है, अच्छा संस्था से संपर्क में हैं? संस्था!

गीता समागम में हैं? हाँ-हाँ... आपका गीता पर एक वीडियो देखा था पचास सेकंड का। ये इनके दर्शन हैं, बिलकुल यही शब्द थे, ‘आचार्य जी आज का दिन बड़ा अच्छा आपके दर्शन हो गये।’ मेरे थोड़े ही दर्शन करने होते हैं, जिसके दर्शन करने होते हैं उसका तो तुम पचास सेकेंड देखते हो बस!

और बहुत आग्रह से आऍंगे, और मैं हाँ बोलूँ, ना बोलूँ, मतलब ही नहीं तुरन्त सेल्फी चमकाऍंगे। आँख से देखने को दर्शन बोलते हैं क्या? किसी को आँख से देख लिया तो दर्शन हो गये? सच्चाई तक जाओ न तब दर्शन है। पहले तो तुम्हें यूट्यूब देखना है, उसमें भी क्या? वो बित्ते-बित्ते भर के क्या? शॉर्ट्स! आपके चैनल के दिन के तीस लाख व्यूज़ आते हैं सिर्फ़ जो हिन्दी वाला प्रमुख चैनल है उसी के। उसमें से पच्चीस लाख क्या होते हैं? शॉर्ट्स! और फिर ये बताते हैं आज दर्शन हो गये, इतना सस्ता है दर्शन?

ऐसे नहीं होता, कईयों को तो ऐसे हो जाते हैं कि कहीं चले जा रहे थे गाड़ी से रास्ते में मन्दिर मिल गया तो स्टेयरिंग छोड़कर ऐसे करा (हाथ जोड़कर) फिर वापस। ये दर्शन है, इतना सस्ता है दर्शन? सुबह-सुबह गये छत पर खड़े हो गये बाहर गाय दिख गयी कहते हैं, आज तो दिन बन गया सुबह-सुबह गौ माता के दर्शन हो गये। तुमने तो इतना भी नहीं करा की कहीं जाकर के ढूॅंढ़कर के करा होता ऐसे ही खड़े थे वो बेचारी आ गयी टहलती हुई, कह रहे हो दर्शन हो गये।

दर्शन, ऊर्जा माँगता है, दर्शन ध्यान माॅंगता है, दर्शन की बड़ी क़ीमत देनी पड़ती है, दर्शन सतत होना चाहिए। जहाँ दर्शन कर रहे हो वहाँ भोग मुश्किल हो जाएगा, अहंकार दर्शन से बचेगा। अहम् को भोग चाहिए क्योंकि अहम् की धारणा ही अपूर्णता की है। अहम् माने मैं अधूरा हूँ, तो अहम् को लगातार ख़ुराक चाहिए, किसकी? भोग की।

अधूरा हूँ न? फटाफट-फटाफट-फटाफट जल्दी-जल्दी और भोगो, दर्शन हो गया तो भोग नहीं पाओगे। दर्शन में जो दिख रहा है वो झूठ है, दर्शन माने जो दिख रहा है उसके पीछे क्या है? दर्शन का अर्थ ही होता है जो पीछे है उसको जान लेना, सत्य! और जो दिख रहा है उसका झूठ पहचान लेना। अब भोगोगे कैसे? अहंकार दर्शन से बहुत घबराता है। ये दो शब्द हैं और बहुत-बहुत क़ीमती रहे हैं, और हमने इन शब्दों को बिलकुल खा लिया। एक दर्शन एक श्रवण! श्रवण भी ऐसे नहीं हो जाता कि सुन लिया जैसे मैच की कमेंट्री (टिप्पणी) सुनी जाती है।

ओ वॉट अ शॉट (वाह, क्या खेल है) ये श्रवण थोड़ी ही हो गया। श्रवण माने भी क्या होता है, श्रवण माने भी क्या? जो सुनायी दे रहा है उसके पीछे क्या है ये भी सुन लो। जो सुनायी दे रहा है वो तो ठीक है, पर उसके पीछे क्या है? ये भी सुन लो और उसके पीछे कुछ है तो उसके भी पीछे क्या है? वो भी सुनो। अब विचार से नहीं सुनना है, सिद्धान्त से नहीं सुनना है, सचमुच सुनना है इसको कहते हैं, श्रवण। कभी भी आँखों देखी चीज़ को दर्शन मत बोल देना कि दर्शन कर आये; ऐसे नहीं होता दर्शन, एकदम इस बात से बाहर आ जाइए।

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