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जीवन में ऊब और परेशानी क्यों? || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मानव जीवन में ‘बोरियत’ शब्द का क्या कोई वास्तविक मतलब है? मैं अपने आसपास बहुत लोगों को यह बोलते सुनती हूँ कि – “बहुत बोर हो रहे हैं।” लेकिन मैं अपने जीवन में अभी बोरियत या ऊब महसूस नहीं करती हूँ, चाहे मैं अकेले ही बैठी हूँ। तो मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि मैं ही ग़लत हूँ, और मेरे आसपास लोग ज़्यादा एक्टिव हैं, सक्रिय हैं। तो ये बात क्या है?

आचार्य प्रशांत: एक्टिव, सक्रिय, किस लक्ष्य की तरफ़?

प्र: लोग जैसे महसूस करते हैं कि बोर हो रहे हैं, लेकिन मैं ऐसा कभी महसूस नहीं करती हूँ।

आचार्य: कदम-दर-कदम चलिए न। कुछ कर रहे हैं वो। और जब वो उस काम को नहीं कर पाते, तो परेशान हो जाते हैं, और उसी को कहते हैं – ऊब।

क्या कर रहे हैं वो?

प्र: जॉब (नौकरी) कर रहे हैं ।

आचार्य: जॉब तो नाम है। क्या कर रहे हैं वो?

प्र: मैं तो यही देखती हूँ कि जॉब कर रहे हैं वो।

आचार्य: ‘जॉब’ नाम है। क्या कर रहे हैं वो?

प्र: जो उनका काम है, वो कर रहे हैं वो।

आचार्य: आप इस भाषा में बात करेंगी, तो आपको कुछ समझ नहीं आएगा। संसार की भाषा में बात करेंगी, तो संसार से आगे कुछ दिखाई भी नहीं पड़ेगा। थोड़ा साफ़ भाषा में बात करिए न।

‘जॉब’ माने तो काम होता है। मैं पूछूँ – क्या कर रहे हैं?- तो बात खुलकर ही नहीं बताई आपने। कोई इनसाइट ही नहीं है, कोई अंतर्दृष्टि ही नहीं है। थोड़ा गहराई से देखकर बताईए न – क्या कर रहे हैं वो?

प्र: वो तो खोये हैं अपनी इसी जॉब में।

आचार्य: एक आम आदमी, जिसको आप कहते हो एम्प्लॉयड है, जॉब कर रहा है, वो क्या कर रहा है वास्तव में?

प्र: कुछ सुविधाओं का, और खाने-पीने का जुगाड़।

आचार्य: शरीर का, और कुछ सुविधाओं का इंतज़ाम कर रहा है वो। इससे ज़्यादा तो कुछ नहीं कर रहा। पेट चलता रहे, कुछ सुख-सुविधाएँ मिलती रहें, यही कर रहे हैं न?

प्र: हाँ।

आचार्य: इसीलिए छटपटा जाते हैं जब खाली समय मिलता है, क्योंकि जब तक व्यस्त हो, तब तक ये देखने की मौहलत नहीं मिलती कि जीवन व्यर्थ बीत रहा है। और खाली समय मिला नहीं, कि ये प्रश्न खड़ा हो जाता है – “ये कर क्या रहे हैं सप्ताह के पाँच या छः दिन? इसीलिए पैदा हुए थे?”

इसीलिए बहुत लोग हैं जो खाली समय से बहुत घबराते हैं। खाली समय मिला नहीं कि कुछ-न-कुछ करने लग जाते है, इधर-उधर भागते हैं। अकेलेपन से उन्हें बहुत दहशत रहती है। क्योंकि अकेलेपन में समाज, संसार थोड़ा पीछे हट जाता है, मन को कुछ दबी-पुरानी मद्धम आवाज़ें सुनाई देने लगती हैं, जो संसार के शोर में नहीं सुनाई देती हैं आमतौर पर ।

प्र: आचार्य जी, प्रणाम। जब मैं अपना आत्म-अवलोकन करता हूँ, तो साफ़ दिखता है कि शरीर है। अंदर कुछ है, जो शरीर से अलग है, उसको ‘मन’ कहें, या ‘चेतना’ कहें। जैसा की आपने पिछले सत्र में बताया था कि मन और चेतना एक हैं। अब ‘अहम्’ की बात आती है। मैं देखता हूँ कि ‘अहम्’ मन में ही है। पर ये बात मुझे अभी स्पष्ट नहीं हुई है कि – क्या ‘अहम्’, ‘मन’ में ही एक विचार है?

आचार्य: अभी कुछ ही दिन पहले, आप साथ में ही थे, तो हमने ‘मन’ और ‘अहम्’ को लेकर करीब आधा-पौना घंटा चर्चा की थी। क्या बात की थी उस दिन?

‘अहम्’ केंद्र है, ‘मन’ अहम् की छाया है।

अब क्या शक है इसमें?

प्र: अंदर तो मन ही दिखाई देता है।

आचार्य: किसको?

‘अहम्’ दृष्टा है, ‘मन’ दृश्य है।

‘अहम्’ मैं है, ‘मन’ संसार है।

आप वो हैं, ‘जिसको’ दिखाई देता है। आप जो कुछ भी देख रहे हैं, वो यूँही नहीं देख रहे हैं। वो आपकी दुनिया है, आप इसीलिए उसको ऐसा देख रहे हैं। आपका उससे सम्बन्ध है, इसीलिए आप उसको देख रहे हैं। आपका उससे सम्बन्ध न होता, तो आप उसको देख भी नहीं रहे होते।

प्र: आचार्य जी, प्रणाम। मेरे जीवन में बहुत सारे दुःख आते हैं, परेशानियाँ आती हैं, तो बस मैं यह सोचकर उपेक्षा कर देता हूँ कि – जीवन है, इसमें परेशानियाँ आती रहती हैं। मेरा ऐसा सोचना सही है, या गलत है?

आचार्य:

सही-ग़लत सिर्फ़ तुम्हारी मंज़िल होती है।

तुम जैसे हो, तुम्हारी मंज़िल वैसी होगी।

और क्या मंज़िल बना ली है तुमने, इससे तुम्हारा और तुम्हारे जीवन का निर्धारण हो जाता है।

मंज़िल सही है, तो यात्रा में कितनी भी परेशानियाँ आएँ, छोटी हों या बड़ी हों, सबका स्वागत है। फ़िर बात यही नहीं है कि छोटी परेशानियों की उपेक्षा करो। फ़िर परेशानी चाहे छोटी हो या बड़ी हो, उसको बोलो, “आओ, स्वागत है।”

प्रश्न ये है कि वो परेशानी तुम्हें किस राह में मिल रही है। गलत राह में छोटी परेशानी मिले, तो क्यों झेल रहे हो? गलत राह में बहुत मुनाफ़े भी मिलते दिखें, तो क्यों ले रहे हो? और राह अगर सही है, और उसमें बड़ी-बड़ी परेशानियाँ भी आ रही हैं, तो झेलो। मुस्कुरा कर झेलो। झेलने के अलावा विकल्प क्या है? लक्ष्य थोड़े ही बदल दोगे। वो लक्ष्य अगर परेशानियाँ झेलकर ही मिलना है, तो ऐसा ही सही।

लोग ये तो बताते हैं कि – “मुझे ये परेशानी है। मुझे ये समस्या है।” ये नहीं बताते कि वो परेशानी किसकी ख़ातिर है। सच्चाई की ख़ातिर, मुक्ति की ख़ातिर, प्रेम की ख़ातिर, तुम परेशानियाँ झेल रहे हो, क्या बात है! बहुत बढ़िया! और स्वार्थ की ख़ातिर, ईर्ष्या की ख़ातिर, द्वेष की ख़ातिर, लोभ की ख़ातिर, तुम परेशानियाँ झेल रहे हो तो धिक्कार है।

तुम्हारी परेशानियों का कारण क्या है, ये क्यों नहीं कभी बताते? बस इतना ही कहकर टाल देते हो कि – “मैं तो परेशान हूँ, दुखी हूँ।”

सत्य की राह में दुःख मिले, तो प्रसाद जैसा।

झूठ की राह में सुख मिले, तो ज़हर जैसा।

प्र: आचार्य जी, क्या कोई बंधन ऐसा भी होता है, जो शुरुआती दौर में मददगार हो, और हमें मुक्ति की ओर ले जाए?

आचार्य:

मुक्ति की ओर जा रहे हो, तो रास्ते में जो कुछ मिले सब ठीक है।

बंधन अच्छे-बुरे नहीं होते, बंधनों के पीछे देखने की मंशा देखनी होती है।

क्यों स्वीकार किया है ये बंधन, ये देखना पड़ता है।

ये भी एक बंधन ही है तुम्हारे लिए कि अनुशासन के साथ बैठना है। इतने बजे बैठना है, इतने बजे उठना है। शिविर में भी तो कई तरह के बंधन हैं।

बंधन न अच्छे होते हैं, न बुरे होते हैं। बंधन किस दिशा में हैं? – ये पूछना होता है।

मैं ये कह दूँ कि इस आसन में बैठने का बंधन अच्छा ही होता है, और तुम इसी तरीके से आसन मारकर शराबख़ाने में बैठ जाओ, तो वो बंधन अच्छा हुआ क्या? बात ये है कि – वो बंधन क्यों है? किस उद्देश्य से है? क्या प्राप्त करने के लिए है?

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