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जीवन में अच्छा साथी नहीं मिल रहा? || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! सर मेरा सवाल था रिलेशनशिप (रिश्ते) को लेकर। आप कहते हैं कि जो साथी चुनने का मुद्दा है वो बहुत इम्पॉर्टन्ट (महत्वपूर्ण) है, तो जैसे उसको मैं रियल (असली) लाइफ़ (जीवन) में उतारने कि कोशिश कर रहा हूँ तो उसमें मेरे को जैसे तीन ऑप्शन्ज़ (विकल्प) समझ में आ रहे हैं।

पहला कि धीरे धीरे जो टेन्डन्सीज़ (प्रवृत्ति) होती हैं इसको अतिक्रमण करके इसके आगे बढ़ जाएँ इसके, दूसरा ये है कि पहले कुछ बन जाएँ अच्छा और फिर साथी का चुनाव करें और तीसरा ये कि साथ में ही कोई अभी ऐसा हो जो इसी रास्ते पर चलना चाहता हो तो उसके साथ चला जाए।

तो कौन सा बेहतर है और इसमें क्या प्रिकॉशन (एहतियात) लेने चाहिए जो भी अगर यूज़ (उपयोग) करें तो, या फिर आपके पास कोई और ऑप्शन (विकल्प) हो तो?

प्रतिभागी: हँसते हैं। ,

प्रश्नकर्ता: मतलब इसको में कन्सेप्चूअल (वैचारिक) लेवल (स्तर) पर तो समझ पा रहा हूँ लेकिन ऑपरेशनलाइज़ (परिचालन) कैसे करूँ लाइफ़ (ज़िंदगी) में?

आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो मैं देखता हूँ कि हमारी भाषा कैसे-कैसे खेल खेलती है ये साथी माने क्या होता है? माने साथी क्या होता है? आप छोटे थे तो आपको ज़रूरी था कि कोई आपके साथ कोई रहे तो माँ रह लेती थीं, पिता रह लेते थे, ठीक है। उसके बाद आप वहाँ से उठकर पच्चीस से तीस साल के हो गए होंगे जानें पैंतीस साल के हो गए होंगे उतना समय आपने बिता लिया, बिना किसी फ़ुल टाइम साथी के, रहते थे साथी वो आते-जाते रहते थे एक स्कूल से दूसरे स्कूल गए पुराने साथी पीछे छूट जाते थे फिर कॉलेज आ गए वहाँ नए बन जाते थे ये सब हो जाता था।

और अब जब आप अपने सामर्थ्य के शिखर पर हैं, ठीक, इस वक़्त आप शरीर से तगड़े हैं, तंदुरुस्त हैं, कमा रहे हैं ज्ञान भी है आपको ये आपके जीवन का शिखर है, चोटी है, पीक (चोटी) है इस समय, तो अचानक आपको क्या दुर्बलता आ गई है कि आपको साथ चाहिए किसी का, क्या हो गया है।

मैं मुद्दे कि थोड़ा जड़ में जाना चाहता हूँ ये साथ चाहिए किसलिए साथी माने क्या? गाइड (मार्गदर्शक) चाहिए! क्या चाहिए? माने करेंगे क्या साथी का? एकदम खरी-खरी बात होनी चाहिए न, नहीं तो फिर बात का कोई समाधान नहीं निकलेगा ऐसे ही होगा कि अपना इधर-उधर कुछ बोल दिया बात ख़त्म कर दिया; ऐसे तो कुछ फ़ायदा नहीं। करेंगे क्या साथी का? और मैं कोई उससे इनकार नहीं कर रहा हूँ कि कोई होना चाहिए; पर साथी काहे को बोल रहे हो उसको। ठीक है आपको कुछ चाहिए; पर क्या चाहिए, उस चीज़ को पहले साफ़-साफ रखो न सामने मेज़ पर फिर बात करेंगे।

यह साथ क्या होता है? साथ माने क्या होता है? वैसे ही आ जाते हैं कि सोलमेट चाहिए! मुझे बड़े मज़े आते हैं कहता हूँ, “आओ-आओ, बताओ-बताओ ये क्या चीज़ होती है नया खिलौना लाए; सोलमेट!” साथ माने क्या? क्या करोगे उस साथ का? और मैं पहले से मन बनाकर के कोई नहीं बैठा हुआ हूँ कि मुझे मतलब आपको आधा- अधूरा अकेला रखना है कि साथी न मिला आपको, ऐसा कुछ नहीं है। मैं बस चाह रहा हूँ कि हमारे वक्तव्य में थोड़ी ईमानदारी आए। किसी को साथी-वाथी नहीं चाहिए;क्या करोगे साथी का;साथी चाहिए उसी साथ से मुँह छिपाते फिरते हो फिर कोशिश करते फिरते हो किसी तरीक़े से मायके भग जाए, महीने भर का चैन मिले, दूर भागते हो मोबाइल बंद कर देते हो कि दोस्तों के साथ रहूँगा पीछे से फ़ोन करके दुखी करेगी। साथी थोड़े ही चाहिए!

और जो उस तरीक़े के हों “यशराज फिल्म्स” टाइप के जिनको लग रहा हो नहीं,नहीं,नहीं साथी ही तो चाहिए होता है जिसका ऐसे हाथ थाम सकें जिसने वो स्विट्ज़रलैण्ड में एब्स पर सिफ़ॉन की साड़ी पहन रखी हो जो धीरे-धीरे सरक रही हो;उनसे मुझे बात नहीं करनी है। वो जाकर के, जाकर देखो डीडीलजे देखो! “रामाधीर सिंह” का डायलॉग ग़लत नहीं था! (प्रतिभागी हँसते हैं)

आचार्य: क्या चाहिए होता है? बोलो-बोलो क्या चाहिए होता है? साथी माने क्या?

प्रतिभागी: शरीर का सुख दे सो साथी।

आचार्य: सीधे बोलो ना सेक्स पार्टनर चाहिए होता है। तो साथी काहे को बोला, यहीं सारी गड़बड़ हो जाती है। सीधे बोलो दो सेक्स पार्टनर। ठीक है फिर ठीक है, ईमानदारी है, ठीक है।

प्रतिभागी: सोशल पार्टनर।

आचार्य: सोशल हटाओ न, सोसायटी के साथ थोड़े ही सेक्स कर रहे हो। सोसायटी कहाँ से बीच में आ गई। ये अगर पता रहे साफ़-साफ़ दोनों पक्षों को ईमानदारी से कि हमारा लेना देना सेक्स का है तो फिर एक दूसरे से बेकार कि उम्मीदें और अपेक्षाएँ नहीं रखोगे। फिर पता रहेगा एक ट्रांज़ैक्शनल (लेन-देन) रिलेशनशिप है; उससे ज़्यादा कुछ नहीं। ठीक है, लेना-देना हो गया बात ख़त्म। तुम अपना रास्ता देखो; हम अपना रास्ता देखें, भले ही वो रास्ता एक ही घर में देखना है, चलो कोई बात नहीं, वो भी बात नहीं लेकिन ये ईमानदारी हम रखते नहीं हैं। हम बता देते हैं इश्क़ है, प्यार है, सात जनम का साथ है, वो बहुत ऊँची चीज़ होती है; वो ऐसे कैसे तुमको मिल जाएगी, बस सात फेरे ले- लेने से, प्रेम कोई हल्की बात होती है क्या कि तुम कह दो साथी चाहिए तुमने शादी डॉट कॉम पर विज्ञापन दे दिया उसके बाद तुमने जाकर के अपनी कोर्ट में मैरिज (विवाह) रजिस्टर (पंजीकरण) कर दी उससे, उससे तुमको प्रेम उपलब्ध हो जाएगा क्या? प्रेम बहुत अलग बात होती है; प्रेम तो सीखना पड़ता है, कमाना पड़ता है;अपनी आहुति देनी पड़ती है तब जीवन में प्रेम आता है।

तो ये मामला साथी ढूँढने का, प्रेम का तो बिलकुल भी नहीं होता; हो सकता है प्रेम का, पर होता नही है। प्रेम तो दस हज़ार में से किसी एक आदमी को ज़रा सा मिल पाता है, ज़रा सा; बाक़ी सब तो प्रेम से बिलकुल अछूते वंचित ही मरते हैं। तो ये जो शादी वगैरह का मामला है, ये शादी, साथी; यह सब ये सेक्शुअल (यौन सम्बन्धित) मामला है, तो ठीक है, बस मान लो कि सेक्शूअल मामला है अब इसमें मुझसे क्या पूछ रहे हो ये तो अब तुम्हारा पर्सनल (निजी) मैटर (मामला) है, देख लो तुम्हें क्या पसंद हैं, चीज़ें! इसमें मैं क्या बताऊँगा ये तो ऐसा है कि जैसे कपड़े ख़रीद रहे हो, ये सब तो शरीर की बात है जिसको जो चीज़ फिट (उपयुक्त) आती हो देख ले!

प्रश्नकर्ता: इसके अलावा एक सवाल और था?

आचार्य: ये सुलझ गया?

प्रतिभागी: ठहाका लगाते हैं।

प्रश्नकर्ता: ईमानदारी बात वाली बात है।

आचार्य: ये अरेंजड मैरिज वगैरह में जैसे आकर मिलते भी है न कि जो सबसे एक वल्गर (अशिष्ट्ट) प्रैक्टिस (अभ्यास) होती है कि लड़की देखने गए हैं लड़का देखने गए हैं; मुझे ये समझ में नहीं आता कि ये कोई बर्दाश्त कैसे कर सकता है कि देखने आए हैं, देखने आए हैं फिर ख़ासतौर पर लड़कियों को खड़ा वगैरह करके भी देखा जाता है क्या ऊँचाई है अच्छा इतनी ऊँची है ऐसी दिख रही है अच्छा साइड व्यू दिखाना ज़रा अब बैक व्यू दिखाओ ये सब भी चलता है। अच्छा ठीक है बिना बाल खोले अपना एक बार पोज़ देना फिर बाल खोल के भी दिखाओ कैसी है, फिर जो वर पक्ष की महिलाएँ होती है वो आपस में बात करती हैं;ठीक रहेगी? हाँ, हाँ ठीक रहेगी, लगता है फर्टाइल (उपजाऊ) है, ठीक है चलेगी! ख़ैर।

जब जाते हो लड़की-लड़का वग़ैरह देखने तो आपस में ईमानदारी से बात कर लिया करो। वहाँ भी एक दूसरे को नहीं बताते हो कि किस नज़र से एक दूसरे को देख रहे हो और नज़र तो एक ही होती है वो तुम भी जानते हो लेकिन कोई बोलता नहीं है। ये रिश्ते के शुरू में ही जब पाखंड कर लेते हो तो वैवाहिक जीवन सुखी कैसे होगा बताओ न! रिश्ते के शुरू में ही पाखंड कर लिया तो वैवाहिक जीवन कैसे चलेगा।

सबसे पहले तो ये होना चाहिए कि दोनों पक्षों का पूरा-पूरा मेडिकल (चिकित्सा) टेस्ट (जाँच) हो; क्योंकि होने जा रहा है शरीरों का मिलन, यही होने जा रहा है न, सेक्स करने जा रहे हो यही होगा लेकिन वो भी नहीं कराते एक एचआईवी पॉज़िटिव (एड्स) हो तो पचानवे प्रतिशत मामलों में वो बात बिलकुल छुपी रह जानी है वधू पक्ष के लोगों कि हिम्मत ही नहीं होती कि वर पक्ष के लोगों को बोल पाएँ कि इसके सारे मेडिकल (चिकित्सा) टेस्ट (जाँच) तो करा दो एक बार पता नहीं कौन सी इसको इन्फेक्शस (संक्रामक) डिजीज़ (बीमारी) लगी हुई हो। दोनों पक्षों का होना चाहिए, हो सकता है लड़की को भी लगी हुई हो कोई भरोसा नहीं। लेकिन किसी पक्ष का ऐसा कोई टेस्ट नहीं होता;क्योंकि हम इस बात को दबा देना चाहते हैं कि ये तो फिज़िकल (भौतिक) यूनियन (मिलन) ही है हम ऐसे कहते हैं कि ‘नहीं,नहीं,नहीं, नहीं ये तो इनकी आत्माएँ उड़-उड़ के आपस में कू-कू करेंगी!’

अरे! भैया वो दो बॉडीज़ (शरीर) मिलने जा रही हैं उन दोनों बॉडीज़ (शरीर) का टेस्ट (परीक्षा) कराओ सबसे पहले ईमानदारी के साथ खुलेपन के साथ फैक्टफ़ुलनेस (तथ्यात्मकता) के साथ थोड़ा तथ्यों पर ग़ौर करो। तुम उन दोनों को इसीलिए साथ ला रहे हो कि अब वो सेक्स (संभोग) करेंगे तो चेक (जाँच) कराओ कि किसको क्या इन्फेक्शन (संक्रमण) है किसका क्या चल रहा है ब्लड-ग्रुप से लेकर आरएच वगैरह सब चेक (जाँच) कराओ, नहीं कराते तब ऐसे बनते हैं कि हाँ! जी अब दो परिवारों का मिलन होने जा रहा है ये क्या हैं! दो परिवार कि अब शर्मा परिवार और वर्मा परिवार एक हो जाएँगे, कैसे एक हो जाएँगे? क्यों झूठ बोल रहे हो! और खुला झूठ चल रहा है लेकिन ऐसा ही हो रहा है और घर के जितने वो बूढ़े-बाढ़े हैं इतने बड़ी तोंद वाले वो बैठ करके हा-हा-हा लाओ, भई दो जलेबी और लाना! (प्रतिभागी हँसते हैं)

एक बार दिल को टूटने दो, एक बार ये स्वीकार कर लो कि ये सब जो लोग शादी के लिए तलाश रहे होते हैं ये सब वास्तव में शरीर ही तलाश रहे होते हैं जब ये स्वीकार कर लोगे न तो भीतर अपमान की आग उठेगी फिर प्रेम ढूँढने को विवश हो जाओगे। अभी क्या होता है कि तुम तलाश तो रहे होते हो शरीर लेकिन अपनेआप को जतला देते हो कि ‘मैं तो प्रेम तलाश रहा हूँ’ और जब तुमको शरीर मिल जाता है तो तुम अपनेआप को जतला देते हो कि ‘मुझे प्रेम मिल गया’, तुम्हें प्रेम तो मिला ही नहीं है, किसी हालत में प्रेम नहीं मिला है; तुम्हे शरीर मिला है, एक बार स्वीकार कर लो कि तुम्हें सिर्फ़ शरीर मिला है प्रेम नहीं मिला है; फिर शायद प्रेम मिल पाए।

यह जो मैं विवाह के मुद्दे पर इस तरह बोला करता हूँ उसका कारण समझो न चेतना की प्यास होती है प्रेम कि और जिसको तुम विवाह वगैरह बोलते हो वो इस तरीक़े से तुमने निर्मित कर दिया है कि वो प्रेम के रास्ते अवरुद्ध कर देता है। प्रेम पर दरवाज़े बंद कर देता है; क्योंकि तुम अपनेआप को बोल देते हो कि ‘प्रेम तो मिल गया, पति मिल गया, माने प्रेम मिल गया’ ‘पत्नी मिल गई, माने प्रेम मिल गया’ कैसे मिल गया भाई? कैसे मिल गया? इतना सस्ता होता है प्रेम!

और हाँ, अभी जलेबी मैंने बोला कि वो मोटी तोंद वाले जलेबी, जलेबी से याद आया— जलेबी और गुलाब जामुन—ये दोनों भी बाहर से ही आए हैं। समोसा भी गया जलेबी भी गई अब क्या करोगे, और कोई है शादी के लिए उत्सुक?

और आप अगर एक शरीर तलाश रहे हो तो इसमें आपने कोई अपराध नहीं कर दिया। मैं ये इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि आप इसमे बुरा महसूस करो। बस ये बात साफ़ रखो, स्वीकार करो और उस लड़की को भी बताओ और उस लड़की में भी ये ईमानदारी होनी चाहिए कि लड़के को साफ़ बताए— हाँ, मैं भी एक शरीर तलाश रही थी। फिर दोनों ज़्यादा इधर-उधर की फ़ालतू बातें नहीं करेंगे, मुद्दे कि बात करो, मुद्दे की, खरी-खरी लेने-देने की बात करो। हाँ, भई तुम अपने पूरे शरीर का हालचाल बयाँ करो; हम अपना करते हैं अगर मामला जमेगा तो आगे बढ़ेंगे।

अब लग रहा है न कितना अश्लील होगा; यह सब कुछ हाँ ये इतना ही अश्लील है लेकिन हमने इसको पर्दे से ढँक रखा है, मैं चाहता हूँ कि उस अश्लीलता को उघाड़ दूँ, ताकि तुम्हारा उससे मन हटे, अश्लील तो ये पूरा मामला है ही है बस हमने इस पर पर्दा डाल रखा है मैं वो पर्दा हटाना चाहता हूँ ताकि इसकी अश्लीलता तुम्हें एकदम रिपल्सिव (घिनौना) लगे तुम कहो— छी! कितना गंदा है ये।

लेकिन इसका फल, सिला मुझे ये मिलेगा कि लोग कहेंगे कि ये अश्लील है मैं कैसे अश्लील हूँ, मैंने तो किया ही नही, करते तुम हो; अश्लील मैं हूँ कैसे! सेक्स में पता नहीं कितनी खोट होगी, बेईमानी में तो बहुत बड़ी खोट है। एक वयस्क पुरुष हो गए हो, तुमको सेक्स करना है मैं नहीं समझता इसमें कोई खोट हो जाती है, एक वयस्क महिला है उसे सेक्स करना इसमें खोट कि क्या बात हो सकती है, लेकिन जो तुम करने जा रहे हो सेक्स वगैरह वो तुम बेईमानी के पीछे से करो इसमें तो खोट ज़रूर है, है कि नही है, है कि नही है तुम वासना को प्रेम का नाम दो इसमें तो खोट ज़रूर है, है न! वासना में हो सकता है कोई खोट न हो, वासना में बिलकुल हो सकता है प्राकृतिक बात है कोई खोट न हो, एकदम हो सकता है मान लिया। लेकिन वासना को प्रेम का नाम देना तो ग़लत बात है न! हाँ वो नहीं होना चाहिए।

प्रेम के पीछे-पीछे सेक्स आ जाए वो एक अलग चीज़ होती है, बहुत अलग चीज़ है, उसको मैंने एक बार बोला था जैसे, “हाथी की पूँछ” इतना बड़ा हाथी है अब छोटी सी उसके पीछे पूँछ भी होती है। एक पुरुष हैं, स्त्री हैं उनमें सचमुच आत्मिक सम्बन्ध है उसके पीछे-पीछे कभी बाद में सेक्स भी हो गया वो ठीक है उसमें एक सौंदर्य है उसमें सहजता है वो ठीक है।

पर जब दो लोग मिल ही इस नीयत से रहे हों कि मैं तो लड़की देखने आया हूँ, मैं लड़का देखने आयी हूँ तो ये बात अश्लील है; क्योंकि वहाँ शुरुआत ही किससे है सेक्स से, प्रेम के पीछे सहज सम्बन्ध के पीछे सेक्स हो गया तो ठीक है, दो युवा लोग थे वयस्क लोग थे बहुत सारे मामलों में एक दूसरे से मित्रवत थे; उन्होंने शरीर भी अपने साझे कर लिए ठीक है, बढ़ियाँ बात, सुंदर बात।

लेकिन वहाँ ये है कि अब हम तीस साल के हो गए हैं बड़ी बेचैनी उठती है, ‘अरे मौसी कुछ करो न’, मौसी बोली ‘अरे! बगल में वो राधेश्याम रहते हैं न, उनकी छोरी जवान हो रही है तू आ अभी मिलवाती हूँ’ और फिर पूरा मैं कुनबे के एक कार्यक्रम तय किया गया, वहाँ जाकर बैठे सब लोग हा-हा-हा समोसा कचौड़ी चल रही है, उसको लाया गया, अब पूछ रहे हैं, हाँ बता! यह क्या है— वल्गर (अशिष्ट)।

मैं जो ये बात बोल रहा हूँ बहुत लोगों को बहुत इम्प्रैक्टिकल (अव्यावहारिक) लगेगी वो कहेंगे, ‘इनकी बात पर चलने लगे तो समाज में अनाचार- दुराचार फैल जाएगा’ मैं बताता हूँ आपको मेरी बात इम्प्रैक्टिकल (अव्यावहारिक) क्यों लग रही है; क्योंकि “मैं जो बात बोल रहा हूँ न वो आज़ाद लोगों के लिए है, मैं जो बात बोल रहा हूँ वो सिर्फ़ एक स्वतंत्र समाज में संभव है और स्वतंत्रता की क़ीमत देनी पड़ती है;आप वो क़ीमत नहीं देना चाहते; इसलिए आप एक आज़ाद जीव बन नहीं सकते, जब आप एक आज़ाद जीव बन नहीं सकते तो आप वैसा जीवन जी नहीं सकते, मैं जिसकी आपको झलक बता रहा हूँ।“

मैं जो बात बोल रहा हूँ न कि दो मुक्त लोगों में पहले प्रेम पनपे और फिर उसी प्रेम की छाया जैसा सेक्स (संभोग) हो जाए ठीक है, बढ़िया है, सुंदर है।

मैं जो ये आपको बात बता रहा हूँ, ये सिर्फ़ दो मुक्त मनुष्यों के बीच हो सकती है। दो सुंदर और ऊँचे मनुष्यों के बीच हो सकती है और हमारा समाज ऐसा नहीं है जिसमें सौंदर्य या मुक्ति के लिए कोई स्थान हो, तो न उस तरह का लड़का संभव है मैं जिसकी बात कर रहा हूँ, न वैसी लड़की संभव है मैं जिसकी बात कर रहा हूँ तो फिर आप ठीक ही कह रहे हैं कि मेरी बात इम्प्रैक्टिकल (अव्यावहारिक) है। मैं जो बात कह रहा हूँ वो साकार तभी हो सकती है जब ये पूरा समाज बदले तब जाकर के वैसे स्त्री और पुरुष पैदा होंगे न! नहीं तो होंगे भी तो हज़ार में एक दो और वो जो एक दो होंगे बेचारे समाज उनको जीने नहीं देगा, तो अभी तो मेरी बात आपको ऐसे ही लगेगी; ‘ये देखो, ये ज़्यादा हवाई बातें किताबी बातें करते हैं, बिलकुल अव्यावहारिक और पूरा समाज गर्त में चला जाएगा पाताल में इनकी बातें सुनकर के सब लड़की लड़के भ्रष्ट हो जाएँगे।‘

वैसे ही संस्कृति बहुत गिर रही है, ये युवा पीढ़ी एकदम उन्मुक्त होती जा रही है और इस तरीक़े के दुराचार्यों की बात सुनकर तो कुछ नहीं बचने वाला, यही प्रतिक्रिया आनी है; है न! और अब शादी भी नहीं होनी; इससे अच्छा मेरी बात न ही सुनो!

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