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जंगल से बाहर आ गए, भीतर से अभी भी जंगली हैं || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य: देखो, आदमी बहुत पुराना है। है न? जो पूरी हमारी विकास की प्रक्रिया ही रही है जिसमें हम जंगल से उठे हैं, वो करोड़ों साल पुरानी है। जैसा हम मनुष्य को जानते हैं, कम–से–कम सत्तर हजार साल पुराना है। और जैसा हमारा आज का शारीरिक आकार है और रूप है, ये लगभग ऐसा ही लाखों साल पहले भी था। और जैसे हमने विचार करना शुरू कर दिया है। हम सोचने लगे हैं न? हमारे पास आज भाषा है।

ये सब पिछले पचास हज़ार साल, सत्तर हज़ार साल से लगभग ऐसा ही है, इतने पुराने हैं हम। हम तब भी परेशान थे, जबकि तब हमारे पास वैसा कोई मुद्दा नहीं था जैसा हमारे पास आज है। आज आप परेशान हो, आपका आईफोन खो गया, तब आईफोन था क्या? आज आप परेशान हो कि आपका वीजा नहीं लग रहा, अमेरिका का। तब अमेरिका का वीजा लगता था क्या?

लेकिन आप उस समय के आदमी को लेकर के आयें और आज के आदमी के बगल में खड़ा कर दें। दोनों को कपड़े एक से पहना दें, किसी भी तरह के एक से कपड़े पहना दें दोनों को। आपको दोनों की शक्लों में अन्तर करना मुश्किल हो जाएगा। आप हज़ारों साल पहले के एक आदमी को लेकर के आयें और आप उसे अपने बगल में खड़ा कर दें। बस कपड़े उसे अपने जैसे पहना दीजिए।

आपको चेहरों में और आखों में अन्तर करना मुश्किल पड़ जाएगा। वो भी परेशान था, वो भी दुखी था, वो भी कामनाग्रस्त था, वो भी क्रोधित था, वो भी आतंकित था; ठीक वैसे जैसे हम हैं। लेकिन हमारे ऊपर जब ये सब चीज़ें आती हैं तो हमें लगता है वो हमारी हैं। वो हमारी नहीं हैं, वो इतिहास की हैं। वो प्रकृति की हैं, वो सदा से रही हैं। और जैसा हमारा ये शरीर है ऐसा ही रहा तो वो आगे भी रहेंगी। ये ताप मन का नहीं, तन का है।

आप पुरानी सब लड़ाईयाँ देखो इतिहास की, वो किन मुद्दों पर हुईं हैं, क्या मुद्दे थे? महाभारत की लड़ाई किन मुद्दों पर हुई थी? यूरोप के क्रूसेड्स किन मुद्दे पर हुए थे? मैथेलॉजी उठाओ, इतिहास उठाओ, कुछ उठाओ। जब भी लड़ाईयाँ हुई हैं, मुद्दे क्या रहे हैं? — जमीन, प्रतिष्ठा, लालच, अहंकार, स्त्री–पुरुष के खेल। यही सब रहा है न?

और आज भी जो लड़ाईयाँ चल रही हैं, वो किन मुद्दों पर हैं? अदालतों में इतने मुक़दमें पड़े हुए हैं, करोड़ों मुक़दमें हैं भारत की अदालतों में। उनमें मसला क्या रहता है? क्या वही नहीं जो महाभारत के समय में था? कुछ बदला क्या? कुछ भी बदला है क्या? तो आप अपने मसलों को अपना क्यों बोल रहे हो?

अपना बोलने का तो मतलब ये होता न कि उनमें कुछ स्पेशफीसिटी है, कुछ विशेषता है। वो व्यक्ति सापेक्ष है। वो आपके कहाँ हैं, वो तो..। दुर्योधन का भी वही मुद्दा था जो आज है और दुर्योधन से पहले भी लड़ाईयाँ हुईं थीं उनके भी मुद्दे वही थे जो आज हैं। और, और पहले की लड़ाईयाँ हैं जिनका कोई इतिहास नहीं मिलता, उनके भी वही मुद्दे थे जो आज हैं।

पुराने आदमी के जो हमें अवशेष मिलते हैं, हड्डियाँ, खोपड़ियाँ। जानते हैं अक्सर वो हथियारों के साथ मिलते हैं। खोपड़ियाँ मिलती हैं, चटकी हुई। और फिर शोधकर्ता अनुमान लगाते हैं कि ये जो इंसान मिला है अभी–अभी, ये खोपड़ा तोड़ के मारा गया है। नहीं तो ऐसे कैसे होता कि बाक़ी जो पूरा शरीर है, वो सलामत है और बस इसका जो स्कल (खोपड़ी) है वो फैक्चर्ड (अस्थि भंग) है। लड़ाई हुई है और किसी दूसरे व्यक्ति ने इसके सिर पर मारा है, इसका सिर फट गया और ये मर गया है।

तब भी यही चल रहा था, आज भी वही चल रहा है। तो ये सबकुछ झँझट हमारा कहाँ है, ये तो आदिकालीन है। भ्रम में हम आज भी हैं, भ्रम में हम तब भी थे। पुरानी लाशें मिलती हैं तो उसमें चालीस एकसाथ कंकाल मिलेंगे। और वो सब एक ही तरीके से बिछा दिये गये हैं। और उनकी सबकी एक ही तरीक़े से गर्दन काटी गयी है। और उनके साथ फिर एक मिलती है चमकती हुई तलवार। और वो जो तलवार होती है वो ज़रा भी इस्तेमाल की गयी नहीं होती है। ऐसी एक जर्मनी में मिली है। जो तलवार इस्तेमाल की जाती है न उसकी धार पर निशान पड़ जाते हैं।

लेकिन धार्मिक अनुष्ठानों वगैरह के लिए ख़ासकर जो तलवारें बनायी जाती हैं, वो कभी इस्तेमाल की नहीं जातीं। उनका तो एक बार इस्तेमाल होता है, तो ऐसी चालीस एकसाथ कंकाल मिले और उनके साथ एक तलवार रख दी गयी है और वो गाड़ दी गयी थी कंकालों के साथ तलवार। और फिर अब जब खुदाई हो रही है तो कंकाल और तलवार एकसाथ मिल रहे हैं। तो चालीस लोगों की बलि दी गयी थी। किसी देवता इत्यादि को प्रसन्न करने के लिए चालीस लोगों की बलि दी गयी थी।

वो आज भी चल रहा है। आज भी गाहे-ब-गाहे इंसानों की बलि की ख़बरें आ ही जाती हैं, दूर–दराज़ के क्षेत्रों से। और जानवरों की बलि का तो कहना ही क्या। अभी बक़रीद आ रही है।

आपके भ्रम क्या आपके हैं सचमुच? आपके भाव क्या आपके हैं सचमुच? बलि क्या है? अपने स्वार्थ के लिए किसी की जान भी ले सकता हूँ। अपने स्वार्थ के लिए किसी की जान भी ले सकता हूँ। मेरा स्वार्थ, मेरी कामना, यही मेरा राम है। यही तो बलि हुई न? मेरी कामना इतनी बड़ी चीज़ है कि उसके लिए किसी की जान जाए तो जाए।

वो भाव तब भी था, वो भाव आज भी है तो हम हमारा कहाँ है, पराया हुआ कि नहीं हुआ, हमारा कहाँ है? मिस्र के राजा लोग थे, उनके किसी के दस रानियाँ, किसी के चालीस, किसी के चार सौ। और उनके जब शरीर मिलते हैं तो साथ में जितनी रानियाँ थी उनके भी मिलते हैं। ये कैसे हो गया?

वहाँ प्रथा बना दी गयी थी, नियम बना दिया गया था कि जब राजा मरेगा तो उसके साथ–साथ जितनी रानियाँ थीं वो भी जाएँगी, उसके जो ख़ास अनुचर, नौकर–चाकर थे, वो भी जाएँगे और जो ख़ास मंत्री लोग थे वो भी जाएँगे। और ये काहे को प्रथा बनायी गयी थी, ताकि ये सब मिलकर उसको ज़िन्दा रखें। कहीं ये अगर टपका तो हम भी जाएँगे।

तो जितने नौकर–चाकर हैं लगे हुए हैं। कोई ज़हर नहीं देगा। रानियाँ हैं वो कोई बवाल नहीं करेंगी। बोलेंगी, ‘अगर हमने कुछ करा और इसको दिल का दौरा पड़ गया, और मरते सब ऐसे ही हैं दिल के दौरे से। तो रानी ने कहा, ‘हम कुछ नहीं करते, हाँ बताओ भईया, क्या चाहिए, ठीक है। मंत्री भी फिर किसी तरीके का कोई विद्रोह, कुछ षड्यंत्र, कुछ नहीं करेगें राजमहल में।

हम तब भी कामातुर थे, कुटिल थे, सशंकित थे। हम आज भी तो वैसे ही हैं न? जिन रानियों को बोला गया हो कि राजा मरेगा तो तुझे भी जाना पड़ेगा, उन रानियों का, उस राजा का रिश्ता प्रेम का होगा क्या? वहाँ प्रेम चल रहा होगा? वो तो कुछ और ही होगा रिश्ता। वैसे ही रिश्ते हमारे आज भी हैं। बदला क्या है? सारा ताप तन का है। क्योंकि तन ही है जो तब भी था और आज भी है। बाक़ी तो सब बदल गया, वरना और कुछ है?

आज जैसी सड़क है, तब थी? ये माइक था? ये कागज भी था? ये कलम थी? ये कोट था? ये दीवारें थीं? ये कंप्यूटर्स थे? ये मशीनें थीं? जैसे आज संविधान हैं, ये थे? आज जिस तरह की आइडियोलॉजीज् हैं, विचारधाराएँ हैं, ये थीं? आज जितना ज्ञान है और सूचना प्रौद्योगिकी है, कुछ भी था? तो सबकुछ तो बदल गया, इंसान फिर भी वैसे–का–वैसा कैसे है?

श्रोता: तन के कारण।

आचार्य: तन नहीं बदला न (हँसते हुए)। आप मुझे कुछ भी बता दो जो तब से अब तक अपरिवर्तनीय रहा हो। कुछ और सोचिए, शायद बचा हो। वो गुफा में रहते थे, आपके क्या शानदार घर हैं। कई बार तो बेचारे गुफा में भी नहीं रहते थे, पेड़ के ऊपर रहते थे। कुछ भी है। वो या तो कुछ पहनते नहीं थे या फिर पहनते भी क्या थे, पत्ती बाँध ली, किसी जानवर की खाल बाँध ली। हमारे कपड़े–ही–कपड़े हैं, अलमारियाँ–ही–अलमारियाँ भरी हुई हैं कपड़ों से।

कुछ भी है जो हममें उनमें साझा है। कुछ भी नहीं। सबकुछ बदल गया लेकिन फिर भी कुछ नहीं बदला क्यों? क्योंकि तन नहीं बदला। उस आदमी का शरीर बिलकुल इस आदमी के शरीर जैसा था। तो जितनी भी भावनाएँ हैं, विचार हैं, सब शरीर से ही हैं। ये विचारकों के मुँह पर तमाचे जैसी बात है। क्योंकि वो बड़ा विचार करते हैं, क्योंकि उनको लगता हैं विचार कोई अंदरूनी बात है। तुम्हारा सारा विचार कहाँ से आ रहा है।

श्रोता: तन से।

आचार्य: हाँ। और यही वजह है कि तन को थोड़ा-सा बदल दें तो तुम्हारा विचार भी बदल जाएगा। करें थोड़ी–सी ब्रेन सर्जरी फिर दिखाते हैं कि तुम्हारा विचार बचता है कि नहीं बचता है। अब यहाँ से हमें पता चलेगी कि दो तरह की शान्ति क्या होती है और दो तरह का मौन क्या होता है? और दो तरह की स्थिरता क्या होती है? बहुत ध्यान से सुनिएगा!

एक आदमी है जो कहता है — मैं तो बड़ा शान्त रहता हूँ, मैं तो बड़ा शान्त रहता हूँ। उसको क्रोध का इंजेक्शन लगा दिया गया। उसको क्रोध का इंजेक्शन लगा दिया गया। क्या हुआ उसकी शान्ति का?

श्रोता: अशान्ति।

आचार्य: शान्ति गयी। एक दूसरा व्यक्ति था, जो सहज है। आपने उसको क्रोध का इंजेक्शन लगा दिया। उसके तन में ताप उठ गया है, पर वो अभी भी शान्त है। वो क्रोध के मध्य भी शान्त है। ये दो तरह की शान्ति होती है। एक शान्ति सिर्फ़ वो थी जो आपको आपका मस्तिष्क दे रहा था। कि मस्तिष्क शान्त है तो मैं शान्त हूँ।

यहाँ पर मस्तिष्क ही क्या बना हुआ है, ‘मैं’। क्योंकि आप कह रहे हो मस्तिष्क शान्त तो 'मैं' शान्त। तो मस्तिष्क ही क्या बना हुआ है? तो मस्तिष्क की शान्ति तो मेरी शान्ति। यहाँ धोखा हो गया। अब वो ऊपर–ऊपर से लगेगा शान्त है। लेकिन वो सिर्फ़ इसलिए शान्त है क्योंकि उसका मस्तिष्क — मस्तिष्क माने उसका शरीर, तन। ब्रेन माने तन।

ये व्यक्ति तभी तक शान्त है जब तक इसका मस्तिष्क शान्त है। असली शान्ति वो होती है जो तब भी रहे जब तन अशान्त है। ये दो तरह की शान्तियाँ हैं। जो पहली शान्ति है वो प्राकृतिक संयोग मात्र है क्योंकि तन कभी शान्त रहेगा, कभी नहीं रहेगा। जब तन शान्त है तब आपको धोखा हो जाएगा।

आपको लगेगा हम शान्त हैं। आप शान्त नहीं हो, ये तो अभी संयोग कि बात है कि तन को कोई कारण नहीं मिला अशान्त होने का। लेकिन थोड़ी ही देर में तन को अशान्त होने का कारण मिल जाएगा। संयोग की बात है। अभी कुछ जो जाएगा, कोई आकर के दो गाली दे गया। कोई आकर के बता गया कि आपका इतना पैसा डूब गया है। कुछ हो गया।

मस्तिष्क को अशान्त होने का कारण मिल गया और आपने मस्तिष्क को ही ‘मैं’ बना रखा है। तो मस्तिष्क अशान्त हुआ, तो आप भी अशान्त हो गये। तो ये सस्ती शान्ति है। ये बहुत सस्ती शान्ति है। क्योंकि जब तक तन शान्त रहेगा ये टिकेगी और तन गया तो शान्ति भी गयी। दूसरी शान्ति, वो असली होती है। वो कहती है, तन में तो भँवरें पड़ती रहती हैं, हलचल चलती रहती है, लहर उठती–गिरती है। तन कभी शान्त होगा, कभी…।

श्रोता: नहीं।

आचार्य: तन शान्त है, अशान्त है, ऊपर है, नीचे है। मैं अपनी जगह हूँ। ये असली शान्ति है। इन दोनों का अन्तर समझ में आ रहा है? देखो मस्तिष्क शान्त हो तो गधा भी शान्त रह लेगा। उसमें क्या ख़ास बात हो गयी। गधे को अशान्त बहुत कम लोगों ने देखा होगा। ये तामसिक शान्ति है। कि मूर्ख हो इसलिए शान्त हो। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा तो शान्त बैठे हैं, खड़े हैं अपना।

बेचारे छोटे–छोटे टट्टू होते हैं, खच्चर। उनके आगे के दो पाँव बाँध देते हैं उनके मालिक और उनको छोड़ देते हैं जा चरकर आ ख़ासतौर से बरसात के मौसम में, बाहर घास अच्छी है जा चर ले। वो कहते हैं, ‘घास पर खर्चा कौन करे?’ अभी तो बारिश में प्राकृतिक घास है, जा चर ले।‘ और चरने भेजते हैं और आगे के दोनों पाँव बाँध देते हैं। और दोनों वो जो टट्टू है, वो क्या कर रहा है, बड़ी शान्ति से वो अपना घास चर रहा है।

आप घोड़े को तो एक बार फिर भी उत्तेजित देख लेंगे। गधे को कभी देखा है, कुपित। गधे जैसा शान्त, सहिष्णु जीव होता ही नहीं दूसरा। तो बड़ी आध्यात्मिक ऊँचाईयाँ पा ली हैं गधे ने। इतना शान्त कैसे हो गया? क्योंकि उसका तन ही ऐसा है। प्रकृति ने कहा, ‘तू गधा है, तुझे शान्त रहना पड़ेगा। तभी तो तेरा शोषण होगा। तो कूदफाँद करने लग गया तो तू गधा कहाँ रह गया फिर।‘

समझ में आ रही है बात ये?

तो शरीर से ही आप ऐसे बने हों कि आपको उत्तेजना उठती ही नहीं। तो आपकी शान्ति का मूल्य कितना है, दो कौड़ी। और ऐसे बहुत लोग होते हैं, उनका शरीर ही ऐसा होता है कि वो ऐसे होते हैं हर समय (अपने चेहरे और शारीरिक भावभंगिमा द्वारा भाव शून्यता दिखाते हुए)। और मुर्दे को कोई गुस्सा आता है कभी? तो मुर्दे की शान्ति का मूल्य कितना है, दो कौड़ी।

शान्ति वो भली जो घोर अशान्ति के मध्य भी बनी रहे।

शान्ति वो भली जो घोर अशान्ति के मध्य रहे। सबकुछ ठीक चल रहा है और शान्त हो तो? कुछ नहीं रखा। एसी चल रहा है, इसलिए तन कूल है और तन कूल है इसलिए…।

श्रोता: मन कूल है।

आचार्य: मन कूल है। तो बेटा धोखे में हो। कूल तो उसको मानेंगे जो तब भी कूल रहे जब…।

श्रोता: एसी न रहे।

आचार्य: एसी न रहे। स्पष्ट हो रहा है? ऐसे ही मौन है। कई होते हैं जिन्हें कम बोलने की आदत होती है बचपन से, उनसे बोला ही नहीं जाता। उनका काम होता है अपना बैठे हुए हैं, चुप बैठे हैं। अब ऐसों को थोड़े ही कहोगे कि इन्होंने मौन साध लिया है। मौन तब है जब बहुत कहा जा रहा हो, बहुत सुना जा रहा हो और सब कहने और सुनने के मध्य भी आप मौन हो।

आप कह भी रहे हो, आप सुन भी रहे हो और इसके बीच में आप मौन हो, तब मौन की क़ीमत है। सब कहना-सुनना चल रहा है और कहने-सुनने के बीच में आप मौन हो। तब मौन की क़ीमत है। समझ में आ रही है बात? तन की दी हुई चीज़ अगर अच्छी भी लग रही है तो वो धोखा देगी। क्योंकि वो असली चीज़ नहीं है।

तन की दी हुई शान्ति — धोखे में मत आइएगा — तन का दिया हुआ मौन, तन का दिया हुआ स्थायित्व, तन का दिया हुआ सुख — ये धोखा देंगे। ये असली नहीं हैं। ये तभी तक हैं जब तक तन को अनुकूल हालात मिले हुए हैं। तन को सही परिस्थिति मिली है तो तन सुख दे रहा है। स्थिति बदलेगी तो तन दुख दे देगा। सचमुच फिर सुखी कौन है? सचमुच सुखी कौन हुआ?

श्रोता: (21:22)=== (21:24)

आचार्य: हाँ। तन सुख दे रहा है, ले लेंगे। तन (21:29)===दुख रहा है दुख दे रहा है, ले लेंगे। लेकिन तन के सुख और तन के दुख दोनों के ही मध्य हम कैसे रहेंगे?

श्रोता: अडिग रहेंगे।

आचार्य: तन के सुख को हम रोक नहीं सकते। काय को रोकें? जब हम तन के दुख को नहीं रोक सकते तो तन के सुख को काय के लिए रोकने जाएँगे। तन दुख देने आया, हमने हाथ जोड़कर ले लिया। उसे रोका नहीं जा सकता, पराई चीज़ है। पराई चीज़ में बाधा नहीं डालते।

दूसरे के घर में कोई कुरियर डिलीवर हो रहा है, आप कूदकर उसको रोकने जाओगे? आपके पड़ोसी के घर में कोई आया है, कुरियर डिलीवर कर रहा है। आप काय को जाकर के उसको रोक रहे हो कि रूक। तो वैसे ही तन को आगे दुख डिलीवर हो रहा है तो रोकने जाओगे? पड़ोस का घर है। उसको दुख की डिलीवरी आयी है आज। आपको रोकने जाना है? और जब दुख रोकने नहीं जाना है तो…

श्रोता: सुख…।

आचार्य: सुख रोकने भी नहीं जाना है। पड़ोसी का घर है उसको सुख आया है लेता रहे, हम नहीं रोकते। लेकिन ये नहीं करना है कि सुख आया तो नहीं रोका, दुख आया तो…।

जो स्वीकार भाव सुख के प्रति है वही दुख के प्रति भी रहना चाहिए।

दुख भी आएगा तो उसको भी वैसे ही कहेंगे ठीक है, जैसे सुख को कहा था ठीक है। हमारा अधिकार ही नहीं है आपको रोकने का। आप तो संयोग से आते हो, संयोग से जाते हो। हमारा क्या अधिकार है। और जो ये कर लेता है वो सुख-दुख के पार के सुख में स्थापित हो जाता है। सुख-दुख के पार के ही सुख को क्या कहा गया है?

श्रोता: आनन्द।

आचार्य: आनन्द। असली सुख। असली सुख इसमें है कि हमें परवाह नहीं कि सुख आया कि दुख आया। आया था, भारी दुख आया था। किसको आया था?

श्रोता: पड़ोसी को आया था।

आचार्य: पड़ोसी को आया था। भारी दुख था। आपने कुछ करा नहीं, इतना दुख आया। नहीं, कुछ नहीं करा, आने दिया। आने दिया माने दुख आया, दुखी हो गये। दुख आया, दुखी हो गये। पर आप तो आध्यात्मिक आदमी हैं? इसीलिए तो जब दुख आता है, दुखी हो जाते हैं। अच्छा! अच्छा! ठीक, ठीक है। हाँ, अध्यात्म तो सुख वर्जित करता है न।

आध्यात्मिक आदमी कभी हँसता हुआ नहीं देखा, नहीं-नहीं, नहीं-नहीं, नहीं, जब सुख आता है तो हम सुखी भी हो जाते हैं।

ज़ेन मास्टर से एक बार उनके किसी शिष्य ने पूछा कि क्या करें जब बहुत सर्दी हो जाए और बहुत गर्मी हो जाए? तो बोले, ‘जब सर्दी हो जाए तो सर्द हो जाओ और जब गर्मी हो जाए तो गर्म हो जाओ। जब सर्दी हो जाए तो सर्द हो जाओ और जब गर्मी हो जाए तो गर्म हो जाओ। तुम होते कौन हो विरोध करनेवाले। मामला, मामला….।

श्रोता: बाहरी है।

आचार्य: बाहरी है। तुम कौन होते हो उसकी कुरियर की डिलीवरी रोकने वाले? उसके घर कुछ आया है, तुम क्यों रोक रहे हो? आने दो न। दुख आया, दुखी हो लिए। सुख आया, सुखी हो लिए। ये जो अविरोध है, नॉनरेसिस्टेंस। ये बताता है कि आपको ‘राम’ मिल गये।

प्रकृति के प्रति आप अविरोधी तभी हो सकते हैं जब परम् में स्थापित हो गये हों। फिर आप अपनेआप को अनुमति दे सकते हैं, जाड़ों में ठंडे होने की और गर्मियों में गर्म होने की। ठीक है। प्रकृति का झूला है। कभी इधर उठा है, कभी उधर उठा है, कभी बीच में है। पूरा घूमता है, हम क्या करें इसमें। बहुत रो रहे हो। हाँ, बहुत दुख आया है, रो रहे हैं। बहुत मज़े ले रहे हो। हाँ, सुख बहुत आया है, क्या करें?

समझ में आ रही है बात ये?

हम इशारा करना चाहते हैं स्वत्व की ओर। मेरा क्या है, ये जानना जरूरी है। मैं कौन हूँ और हम ये भी कह रहे हैं कि जब एकदम साफ़ हो जाता है, मैं कौन हूँ, तब पराया कहने की ज़रूरत भी समाप्त हो जाती है। पर अभी ज़रूरी है भेद करना, विवेक करना। अन्त में आकर विवेक भी आवश्यक नहीं रह जाता। जानते हैं, विवेक भी त्याग की चीज़ बन जाती है। स्थितप्रज्ञ को विवेक नहीं चाहिए होता है।

महर्षि ऋभु या अष्टावक्र से पूछेंगे तो कहेंगे, ‘विवेक, ये क्या होता है?’ और ये उन्होंने लिखित में दिया है। बोल रहे हैं, ‘ज़रूरत क्या है विवेक की।‘ विवेक का तो अर्थ होता है भेद। अभेद। बोले, ‘कोई भेद की ज़रूरत नहीं।‘ पर वो आख़िरी बात है, अन्तिम। वो जल्दी से नहीं सुननी चाहिए। प्रकृति के प्रति भी करुणा रखने के लिए, मैत्रीय रखने के लिए, हृदय में ‘राम’ का होना आवश्यक है। हृदय में राम नहीं तो प्रकृति के प्रति आप भावना तो रख सकते हो, करुणा नहीं रख सकते। और भावना, करुणा नहीं होती।

(श्रोताओं से पूछते हुए) यहाँ तक बात बन रही है या बहुत तेजी से आगे जा रहे हैं, बढ़िया चल रहा है?

आप जिससे अलग हो ही नहीं, आप उसके बीच में रहोगे और उसी के लिए तरसोगे, ये कहाँ की बुद्धिमानी है। बोलिए। इसी बात को अद्वैत वेदान्त ऐसे कहता है कि:-

जगत अहंकार का ही प्रक्षेपण है, जगत अहंकार की ही छाया है।

तो कितना पगला होगा वो आदमी, जो अपनी छाया में कुछ ऐसा ढूँढे जो उसके पास नहीं है। अरे! नाक कट गयी (अपनी नाक पर ऊँगली रखकर)। हमें नाक की बहुत फ़िक्र रहती है न, हम संसारी इज़्ज़तदार लोग हैं। अरे! नाक कट गयी! नाक कट गयी! और वो छाया में तलाश रहा है कि नाक शायद यहाँ मिल जाए। अरे! सचमुच तुम्हारी नाक अगर कट ही गयी है…।

श्रोता: छाया में भी…।

आचार्य: तो छाया में कहाँ से मिलेगी, वो छाया में भी कट गयी होगी। तो, विशुद्ध अद्वैत तो जगत की सत्ता को मानता ही नहीं। कहता है, ‘जगत कुछ नहीं।‘ ये बड़ा अन्तर है। जो हमारा षड्दर्शन है, उसमें न्याय आदि जो हैं और योग भी, ये सब जगत की सत्ता को मानते हैं। कहते हैं, ‘जगत है, जगत है।‘ कहते हैं, ‘जगत है, लेकिन मन जगत से आसक्त रहता है तो मुक्ति चाहिए।‘

सबका आदर्श अन्तिम एक ही है ‘मुक्ति’। सबका आदर्श, चाहे वो वेदान्त हो, वेदान्त में भी चाहे वो अद्वैत वेदान्त हो, द्वैत वेदान्त हो, कोई भी हो और चाहे न्याय वैशिष्ट्य हो, सबका आदर्श क्या है, ‘मुक्ति’। लेकिन अद्वैत वेदान्त एक बात बड़ी ख़ास कहता है। एकदम अनूठी, क्या?

कहता है मुक्ति का मतलब ये नहीं कि वो कुछ है और तुम्हें उससे मुक्त होना है। मुक्ति का मतलब ये कि तुम्हें अभी लग रहा है वो है और तुम्हें इस भाव से मुक्त होना है कि वो है।

(हँसकर) नहीं समझे?

एक तो ये है कि ये है (गिलास को दिखाते हुए) और मुझे इससे मुक्त होना है। अद्वैत कहता है कि मुक्त तो होना है पर इसका मतलब ये नहीं है कि ये है। तुम्हें मुक्त ही इसी भ्रम से होना है कि ये है। ये तुम्हारी छाया है।

अब ये बात एकदम समझ में न आने वाली है। एकदम काउंटर इंट्यूटिव (सहज ज्ञान का प्रतिकार) है। क्योंकि हाथ में पकड़ रखा है, पी रहे हैं, रंग दिखायी दे रहा है उसका, तापमान पता चल रहा हैं, उसकी गंध आ रही है और उसके बाद हमसे कहा जा रहा है कि ये…।

श्रोता: नहीं है।

आचार्य: तो इसलिए अद्वैत वेदान्त सबसे ऊँचा दर्शन भी माना गया और सबसे कम प्रचलित भी हुआ। कह रहे, ‘पहले तो वेदान्त है दर्शनों–में–दर्शन और वेदान्त में भी अद्वैत वेदान्त सबसे ऊँची चीज़, जिसे न कोई समझता है, न स्वीकार करता है (सभी हँसते हैं)।

पूरा पश्चिम लेकर घूमता रहता है नॉन ड्यूअलिटी, नॉन ड्यूअलिटी। बड़ी बात लगती है। कुछ है भीतर जिसको लगता है कि बात बिलकुल ठीक है ये। लेकिन और भी कुछ है बहुत बड़ा भीतर, जो कहता है ये बात ठीक नहीं हो सकती। मैं कैसे मान लूँ कि ये नहीं है। क्योंकि अगर ये नहीं है तो आशय क्या हुआ?

श्रोता: मैं भी नहीं।

आचार्य: जिस हाथ ने इसको उठा रखा है?

श्रोता: हाथ भी नहीं।

आचार्य: हाथ भी नहीं। अरे! अरे! हाथ मत काटो। जान जाती है अद्वैत वेदान्त को हाँ बोलने में। तो उसको हाँ नहीं बोल पाये लोग। लेकिन इतना फिर भी थोड़ी ईमानदारी थी तो मान लिया कि हाँ, सबसे शुद्ध बात तो यही है।

तो अभी हम ये समझाने के लिए — अद्वैत वेदान्त पर नहीं है सत्र आज का — अभी तो बस ये समझाने के लिए है कि वहाँ वो नहीं मिल सकता जो यहाँ नहीं है। जैसे कि तुम्हें अपनी छाया से वो नहीं मिल सकता जो तुम्हारे पास नहीं है। तो इसमें हम बड़ा अनूठा काम करते हैं।

ये भी अद्वैत वेदान्त की ओर से ही आता है। कहते हैं — चालाकी इतनी है, वहाँ कहते हैं पहले कि — जगत, जैसे अभी बोला कि जगत तुम्हारी छाया है। वैसे ही बोलते हैं जगत तुम्हारा सपना है और कई बार ऐसे बोल देते हैं कि तुम चित्रकार हो और जगत तुम्हारे द्वारा रचित चित्र मात्र है। या तुम कहानीकार हो और जगत तुम्हारी…।

श्रोता: कहानी है।

आचार्य: कहानी है। कहते हैं अच्छा, अपनेआप को ग़रीब मान ही रखा है। ये भाव बिलकुल पकड़ रखा है कि मैं छोटा–सा हूँ, मैं सागर की एक बूँद हूँ, मैं तो मछली हूँ। तो एक छोटा सा अपना अस्तित्व बना रखा है फिर जाकर के दीवार पर, जाकर के चित्रकला कर दी। और उसमें बहुत सारे हीरे-मोती दिखा दिये। और उसके बाद उसके आगे बैठकर लगे ज़ोर–ज़ोर से रोने। क्या?

श्रोता: हीरे–मोती चाहिए।

आचार्य: हीरे-मोती चाहिए मेरे पास तो नहीं है, दीवार के पास है। लोगों को समझ में नहीं आता। लोग कहते हैं कि पर हीरे-मोती हमने थोड़े ही रचे हैं। हीरे-मोती तो हमारे जन्म से पहले ही बाज़ार में मौजूद थे न।

मैं पैदा हुआ हूँ उन्नीस सौ अस्सी में और ये देखो उन्नीस सौ साठ में हीरे का चित्र। और ब्रिटिश हमारा कोहिनूर चुरा ले गये थे, ये देखो उसकी तस्वीर। मेरे पैदा होने से सौ साल पहले की।

तो आप कैसे कह रहे हो कि हीरा–मोती मैंने रचा? अब समझाना बड़ा मुश्किल है, तो फिर ज्ञानी लोग उसको ऐसे समझाते हैं। कहते हैं, ‘अच्छा, चलो ठीक, तुमसे पहले का था। लेकिन एक बात बताओ, एक ही चीज़ है मैं दो लोगों को दिखाऊँ, ठीक है।

ये है (गिलास को ऊपर उठाकर दिखाते हुए)। सब लोग अपने मन में इसका एक मूल्य लगाइए, मुझे बताइए मत, लगा लीजिए। ये हम अद्वैत वेदान्त समझ रहे हैं, ठीक है (मुस्कुराते हुए)।

सबने अपना मूल्य लगा लिया और मुझे बताया नहीं है। ठीक है। आपने कितना लगाया इसका (श्रोताओं से पूछते हुए)?

श्रोता१: एक हज़ार।

आचार्य: एक हज़ार। आपने कितना लगाया?

श्रोता२: पाँच सौ।

आचार्य: पाँच सौ। आपने कितना लगाया?

श्रोता३: पचास।

आचार्य: पचास। पचास से लेकर के एक हज़ार तक सब लग गया। अब बताओ इसका मूल्य कितना है।

श्रोता: जो मेरी सोच में है?

आचार्य: तो इसका क्या है? यही समझाता है वो आपको। आपने क्या मूल्य लगाया था इसका?

श्रोता: पाँच सौ।

आचार्य: किसी ने दो हज़ार भी लगाया होगा। किसी ने दस रुपये भी लगाया होगा। इसका क्या है? इसका क्या है? तो हीरे–मोतियों का अपना क्या मूल्य है, जो तुमने लगाया, वही तो है। तो तुम्हीं तो मूल्य लगाते हो। और फिर तुम्हीं हाय! हाय! करके रोते हो। तो काहे के लिए रो रहे हो (हँसते हुए)।

समझ में आ रही है बात?

जल में रही, जल ही बिन पीना।

बहुत रोओगे। कृष्णमूर्ति इसको बोलते थे:-

ऑब्जर्विंग विदाउट सेपरेशन (बिना अलगाव के अवलोकन करना)।

मैं उससे भिन्न नहीं हूँ। वो टिंडा , मैं तरोई। हम दोनों का साझा नाम — तरकारी। ऑब्जर्विंग विदाउट सेपरेशन का यही मतलब है।

समझ में आयी बात?

तू आलू, मैं टमाटर बस। ले-देकर हम दोनों हैं मिट्टी की पैदाइश, ऑब्जर्विंग विदाउट सेपरेशन। अलग नहीं हूँ तुसझे। और जब आप अलग नहीं होते हो तो जो भुक्खड़ कामना होती है वो शान्त हो जाती है। ये सब मेरा ही विस्तार है, ये सब मेरा ही रचा हुआ है। सब मेरा ही रचा हुआ है।

कारणता, भारतीय दर्शन में बहुत महत्वपूर्ण रही है; कॉज़लिटी । तो कहते हैं, ‘एकदम मटेरियल कॉज (भौतिक कारण)।‘ कहते हैं, ‘तुम वो हो — कई तरह के कारण होते हैं न, निमित्त कारण, उपादान कारण — कहते हैं — तुम वो हो जिसने इस जगत को वैसे ही रचा है, जैसे मकड़ी अपने जाल को रचती है अपने ही भीतर से। मकड़ा जाल कहाँ से लाया?

श्रोता: अपने ही अन्दर से।

आचार्य: कहीं से खरीद के लाया? फिर अनपैक किया, फिर बिछा दिया, फिर मक्खी को बोला, ‘आओ, आओ।‘ ऐसा किया? मकड़ा जाल कहाँ से लाया?

श्रोता: भीतर से।

आचार्य: हाँ। तो वेदान्त कहता है, ‘तुम एक मकड़े हो, जिसने ख़ुद ही जाल बुना है अपने ही भीतर से।‘ जैसे कहते हैं न, अपनी छाया या अपना चित्र। वैसे ही तुमने अपने ही भीतर से ये जाल बुना, तुम ही इसके कारण हो कॉज हो।

और फिर तुम ही इसमें फँस जाते हो। मक्खी तो क्या फँसेगी। तुमने ही जाल बुना और तुम ही उसमें फँस गये। बताओ और तुम कैसे फँसे अपने जाल मे, ठीक वैसे ही जैसे मक्खी फँसती है। मक्खी क्या सोचकर आती है, गुड्डीज।

वैसे ही तुमने रचा और तुम उसको देखकर क्या सोचने लग गये, ख़ुद ही भूल गये कि मैंने ही रचा है। आपमें से किसी को याद है कि दुनिया मैंने रची है? किस–किस को याद आ रहा है। किसी को याद आ रहा, दुनिया आपने रची? कैसे याद आएगा, दुनिया हमने रची थी नहीं। हम दुनिया को प्रति क्षण रच रहे हैं।

तो याद वाली कोई बात नहीं है, पास्ट टेंस (भूतकाल) नहीं है। हम दुनिया प्रतिपल रच रहे हैं। लेकिन हमें उसका बोध नहीं है क्योंकि हम होश में नहीं हैं। तो अब वो रच दी है चीज़ और फिर कह रहा है, ‘बहुत बढ़िया चीज़ है। जरूर इसमें कुछ अलग है, ख़ास है जो आजतक पाया नहीं वैसा कुछ मिलेगा।‘ और जाकर उसमें फँस गये।

तुम कुछ भी कर लो, तुम्हें उसमें कुछ कैसे मिलेगा? तेरे ही पेट से निकली है दुनिया। ये पूरी दुनिया, तेरे ही पेट से निकली है, मकड़ी। अगर इस दुनिया में कुछ ख़ास है तो वो तेरे पेट में पहले से ही मौजूद है। दुनिया की ओर देखने की जगह, अपने पेट की ओर देख न।

अच्छा वहाँ है। हाँ, वहाँ इतना कुछ है कि तूने उससे पूरा ब्रह्माण्ड रच डाला। अपने पेट की ओर देख मकड़ी। तो मकड़ी का उदाहरण, छाया का उदाहरण, चित्र का उदाहरण…।

समझ में आ रही है बात?

जो इन बातों को समझ जाते हैं, कारणता, कॉज़ेशन। जो कारणता को समझ गया, वो कामना से मुक्त हो जाता है। कहता है, ‘मैं ही कारण हूँ, मैं क्या कामना कर रहा हूँ।‘ जैसे मिट्टी है, अब मिट्टी से घड़ा बना। तो उसके दो कारण होते हैं — एक मिट्टी और एक कुम्हार।

कुम्हार को कहते हैं निमित्त कारण। अब मिट्टी, घड़े को देखकर के लार बहाये और क्या बोले, अं, मुझे चाहिए। चाहिए माने क्या? तू ही तो है वो। तू ही तो है। बोले, ‘नहीं।‘ कुम्हार भी तो बीच में आया था। वो कुम्हार भी कौन है? तू ही तो है (हँसते हुए)।

तो फिर बाबा लोग समझाते हैं। कहते हैं, ‘तुम पगला क्यों रहे हो?

माटी कुदम करेंदी यार।

ये मिट्टी है। तुम मिट्टी को देखकर के पगला रहे हो। मिट्टी घड़े को देखकर के क्या कर रही है, छाती पीट रही है। क्या बोल रही है, चिज्जू चाहिए। ये नयी चिज्जु दिखी, आजतक देखी नहीं थी। जे वाली चिज्जू चाहिए और रो रही है यां, यां। तो कॉज़ेशन कहाँ से आया, मुझसे ही तो आया।

ये पूरी तरह नहीं स्पष्ट हो रहा होगा?

ये सिर्फ़ मानसिक सामग्री नहीं है। इसको जीना पड़ता है। मैं भी जब इसपर अभी बोल रहा हूँ तो शब्दों की समस्या आ रही है। बहुत सारे उदाहरण देने पड़ रहे हैं। क्योंकि ये बात कौंधने की होती है। इसको बहुत–बहुत लम्बे अभ्यास से साधना पड़ता है। मैं प्रसिद्ध गायकों से भी मिला हूँ जो कबीर साहब को ही दशकों से गा रहे हैं और मेरे लिए बहुत चौंकने की बल्कि सदमे की बात रही है।

और बड़ी विनम्रता से कह रहा हूँ कि उनको कबीर साहब समझ में नहीं आये हैं। ऐसे उन्होंने उल्टे–पुल्टे अर्थ बताए, अपने हिट भजनों के भी। मैं उचक गया बिलकुल। कहा, ‘ये समझकर गा रहे थे आप इसको आजतक। पर हाँ, गा रहे हैं। गा रहे हैं और चूँकि मधुर गा रहे हैं इसलिए लोग भी सुन रहे हैं।

समझना है। क्या करा सत्संग करके आये थे, भजन हुआ था। और भजन में तो फिर भी समझने–बुझने के लिए इतनी सी जगह बच जाती है। कीर्तन में उतनी भी नहीं बचती। कीर्तन में तो और ज़ोर से, शोर से और एक प्रमुख होता है मुखिया, वो बोल रहा है, उसके पीछे–पीछे लोग दोहरा रहे हैं और आम तौर पर उसमें एक मंत्र होता है, कोई एक पंक्ति होती है और उसी को बार–बार, बार–बार, दोहराया जाता है अपना बिलकुल।

और किसी चीज़ को दोहराने में एक ख़ास बात होती है, मन थोड़ी देर के लिए शिथिल पड़ जाता है। पर वो शिथिलता मौन नहीं है भाई! वो नम्बनेस है जैसे सुन्न पड़ गया हो कुछ। मन का सुन्न पड़ जाना और मन का मौन हो जाना अलग–अलग बातें होती हैं।

भजन, कीर्तन दोनों बहुत सार्थक हैं लेकिन सिर्फ़ तब, जब समझा तो हुआ हो कि कहा क्या जा रहा है? समझा नहीं है तो सब बेकार है। आप कितना नाच लें, गा लें, झूम लें, कुछ कर लें; दोहरा लें, जिंदगी भर जपते रहें। जपना, मंत्र, सूत्र, चैंटिंग , कुछ नहीं काम आने की अगर आप समझे नहीं हो तो, माला..।

मैं ये नहीं कह रहा कि वो सब विधियाँ बेकार हैं। मैं कह रहा हूँ वो सारी विधियाँ काम तभी करती हैं, जब पहले बात समझी हुई हो। जो चीज़ समझी ही नहीं उसको दोहराकर क्या मिलेगा, बताइए? फिर तो बस आप अपने अज्ञान को ही दोहरा रहे हो न।

जो समझा नहीं, अगर उसको दोहराये जा रहे हो और गाये जा रहे हो तो अपने अज्ञान को ही गा रहे हो और अपने अज्ञान को ही दोहरा रहे हो। क्या मिलेगा उससे, अज्ञान ही आगे बढ़ेगा। अज्ञान गुणा एक अज्ञान, अज्ञान गुणा दो, दूना अज्ञान, अज्ञान गुणा तीन, तिगना अज्ञान, और दोहराओ (श्रोताओ की हँसी)।

हम छोटे थे, घर में आरती होती थी–ओम् जय जगदीश हरे। उस समय अच्छा लगता था। लेकिन किसी बात का अच्छा लगना और किसी बात का मुक्तिप्रद होना, दो बहुत अलग–अलग चीज़ें हैं। न मुझे ओम का पता था, न जगदीश का पता था, न हरी का पता था। क्या मिलेगा रोज दोहराकर?

और जैसे–जैसे समझता गया, वैसे–वैसे बात खुलती गयी। जिस दिन ‘ओम्’ खुला मेरे लिए, उस दिन जैसे विस्फोट हुआ! अच्छा ओम माने ये। और ओम् नहीं खुलता अगर, उपनिषद् नहीं आते मेरे जीवन में। उपनिषदों के अलावा कौन बताता कि ओम माने क्या?

यही लगता कि ओम माने हिन्दुओं का होता है, जैसे सबका होता है। कहीं एक ओमकार होता है, आमीन कह देते हैं। वैसे ही इधर हमें तो यही कह दिया गया था कि सबके अपने–अपने धार्मिक चिन्ह, प्रतीक और ध्वनियाँ होती हैं, तो वैसे ही हिन्दुओं का भी होता है। और ओम बात ही कुछ और थी।

ज्ञानी लोग कहते हैं, ‘जानना हो तो सबसे पहले शर्तें हटाओ अपनी। कहीं भी जानने जाओ न, तो पुछल्ला मत बाँधकर जाना, शर्तें हटाओ। कि मैं तो तभी जानूँगा जब जो बात कही जा रही है वो कम–से–कम इन अनिवार्यताओं का पालन करती हो। मैं तो तभी सुनूँगा, जब सुनाने वाला थोड़ा बहुत मेरे तरीक़े से बोले, कम–से–कम थोड़ा–बहुत मेरी पसन्द–नापसन्द का ख़्याल करे। कंडीशंस , शर्तें रखकर के काम नहीं चलता।

सत्य हमें इसलिए नहीं मिलता क्योंकि हमने एक बहुत बड़ी भारी शर्त रख दी है और वो शर्त है ‘मैं’। मैं तो हूँ ही, अब तुम कौन हो, तुम बताओ? सत्य से हम कहते हैं, ‘मैं तो हूँ ही और इसपर तो हम कोई बहस, झगड़ा नहीं करेंगे, कोई विवाद नहीं। और इसपर बात करनी है तो वापस जाओ, वापस जाओ! मैं तो हूँ ही, अब तुम बताओ, तुम कौन हो? ऐसे हम सत्य को जानना चाहते हैं।

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