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जानवरों से दोस्ती करके तो देखो || पंचतंत्र पर (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सादर प्रणाम। आप जानवरों की कथाएँ पढ़वा रहे हैं, और मेरी समस्या ये है कि मुझे तो छोटे-छोटे जीवों से भी डर लगता है। कैसे इनसे डरना बंद करूँ? क्या मुझमें शरीर बोध ज़्यादा है?

आचार्य प्रशांत: शुरुआत कर लो। जिससे प्यार हो जाता है, जिससे दिल का रिश्ता बन जाता है, बाद में उसकी गलियाँ भी अच्छी लगने लगती हैं, उसका मोहल्ला ही अच्छा लगने लगता है।

शुरुआत कर लो। किसी एक से शुरुआत कर लो, फिर उसका पूरा कुटुंब प्यारा लगने लगेगा। सबसे बराबर का डर तो लगता नहीं होगा? कुछ तो होगा जो कम सताता होगा। जो कम सताता हो, उससे दिली दोस्ती कर लो।

तुम्हारे भीतर कुछ बहुत-बहुत अधूरा रह जाएगा अगर कोई जानवर तुम्हारे कुनबे में शामिल नहीं है। अगर कोई जानवर तुम्हारे परिवार का ही सदस्य नहीं है, तो समझ लो कि अभी तुम इंसान नहीं हुए। इंसान होने के लिए बहुत ज़रूरी है कि जानवर से दोस्ती करो। कहीं से शुरुआत करो, कोई बिल्ली, कोई कुत्ता, कोई भी।

एक बार किसी पशु को गले लगा लिया, एक बार उसके साथ समय बिताया, उसकी आँखें देखी, फिर बड़ा मुश्किल हो जाएगा तुम्हारे लिए डरना। और आदमी के मन की कितनी सीमाएँ हैं, ये तुम्हें देवताओं के और गुरुओं के पास जाकर बाद में पता चलेगा, पहला आभास तो जानवर की निकटता में मिल जाता है। क्या समझेगा आदमी का मन सत्य को, आदमी का मन तो पशु को ही नहीं समझ पाता!

किसी जानवर से दोस्ती करो, फिर देखना कितना कुछ है जो वो तुमसे कहना चाहता है, और तुम्हें एहसास-सा होता है कि इसने कुछ कहा, और तुम जान नहीं पाते। जानवर के पास जाओ कि तुम्हें पता चलेगा विचार कितना क्षीण है, मन कितना दुर्बल है—ये बेचारे कुछ नहीं जानते!

ठीक अभी, जब तुमसे बात कर रहा हूँ, मेरे पाँव पर गोलू (खरगोश) बैठा हुआ है। बीच-बीच में कुछ हरकत करता रहता है; कभी पजामा खींच लेता है, कभी उसको लगता है कि “दूसरों पर ही ध्यान दे रहे हैं, हम बेवफ़ा हो गए,” तो थोड़ा काट भी लेता है। यहाँ ऊपर-ऊपर एक क़िस्सा चल रहा है, नीचे-नीचे दूसरा। और वो क़िस्सा दुनिया को कभी पता नहीं चलेगा, वो मेरी निजी प्रेम कहानी है। क्या दिख रहा है गोलू आप लोगों को? नहीं दिख रहा है शायद उधर से!

तो ये जनाब यहाँ बैठे हुए हैं, और इन्हें कहा नहीं गया यहाँ बैठने को। यहाँ जहाँ बैठे हैं, वहाँ उनके पास न दाना है, न ख़ुराक, न पानी है। और खरगोश खाते ख़ूब है, जल्दी-जल्दी कुतरने की आदत होती है। घंटे-दो घंटे भी ये खाए बिना आमतौर पर गुज़ारते नहीं, थोड़ा-थोड़ा, थोड़ा-थोड़ा हमेशा कुतरते रहते हैं। पर ये सज्जन—सत्र दो घंटे चले, चार घंटे चले—ये सभी की तरह सुनते हैं। इन्हें भी बैठने के लिए आसन चाहिए, तो अब ये नीचे इनका आसन लगा है, गद्दे लगा दिए गए हैं, उस पर अपना ये सुनेंगे।

अब मुझसे पूछोगे तो मैं कहूँगा, वो सब समझता है। आपमें से जिन लोगों ने गोलू को सत्रों में देखा होगा, वो अगर ध्यान में होंगे तो दूसरे ध्यानी जीव को भी पहचान जाएँगे। ध्यान का भाषा से क्या संबंध है? सब समझता है।

स्वयं आमंत्रित कर लो किसी जीव को। बड़े जीवों से डर लगता हो—अजगर, भेड़िए, चीतें—तो नन्हें जीव से शुरुआत कर लो। हाँ, उसको पिंजरे में मत क़ैद कर देना, कि दोस्ती करने के लिए पिंजरे में बंद कर लाई तोते को और उस पर दोस्ती के प्रयोग चल रहे है। दोस्त को क़ैद नहीं किया जाता न, या करते है? नहीं न।

तो कहीं से शुरुआत कर लो, और न कर पाओ शुरुआत तो यहाँ आ जाओ। यहाँ गोलू भी है, गोलू का पूरा ख़ानदान भी है, कोहम-सोहम हैं।

जब नॉएडा में थे तो गिलहरियाँ थीं, बड़ी निर्भीक हो गई थीं। बाहर धूप में तख़्त थे, तुम बैठकर खाओ उस पर दोपहर में खाना, और बगल में तुमने कुछ रख दिया, थोड़ी देर में देखोगे तो गायब। वो आएँ और बगल से ही उठाकर ले जाएँ।

(गोलू खरगोश बाहर निकल आता है) देखिए, वो खुद ही बाहर आ गए आप लोगो को दर्शन देने के लिए।

आदमी अपनी पशुता से ही तो इतना आक्रांत है न, कि उसने अपने-आपको दबाने के लिए, अपने-आपको सीध में रखने के लिए न जाने कितने अनुशासन बना लिये, कितनी संस्थाएँ बना लीं, कितनी मर्यादाएँ और कितनी वर्जनाएँ बना लीं।

आदमी बहुत डरता है जानवर से, क्योंकि आदमी भी एक जानवर ही है न। तुम्हारा जानवर न प्रकट हो जाए, इसीलिए तो सारी सभ्यता और संस्कृति है। और ख़तरनाक बात ये है कि जिस जानवर का दमन करने के लिए तुमने उसके ऊपर इतनी वर्जनाएँ, इतने व्यर्थ अनुशासन डाले, वो जानवर इन बंधनों, इन तकलीफ़ों के कारण और व्याकुल हो गया, विक्षिप्त हो गया।

तुम दोनों तरफ़ से मारे गए। जिस पशुता को नियंत्रित करने के लिए, बल्कि मिटाने के लिए तुमने पूरी शिक्षा व्यवस्था खड़ी की, तुमने समाज के नियम, क़ायदें, मर्यादाएँ बनाईं, वो पशुता कहीं गई नहीं, बस विक्षिप्त हो गई, पागल हो गई। आदमी का जानवर पागल हो चुका है क्योंकि आदमी उससे बहुत डरता है। आदमी का जानवर तो पागल हुआ ही, साथ ही आदमी के मन पर बोझ आ गया तमाम तरीके के कृत्रिम संस्कारों का।

हमने अपने-आपको संस्कारित किया ही इसीलिए ताकि कहीं हमारी पशुता प्रकट न हो जाए। और मैं सहमत हूँ इस बात से कि आदमी को पशुता के आगे जाना चाहिए, पर जिसको तुम समझते ही नहीं, उससे तुम आगे नहीं जा सकते। पशुता से आगे जाने के लिए पशुता का दमन उपयोगी नहीं होगा; पशुता से आगे जाने के लिए पशुता से दोस्ती करनी पड़ेगी।

जो भी पशु, जो भी जीव तुम अपने चारों ओर देख रही हो, ये सारे जीव तुम्हारे भीतर मौजूद हैं। जैविक विकास की दृष्टि से भी हम देखें तो हम जैसे कहते हैं कि सारे दुनिया के इंसान आपस में भाई-बहन हैं, उसी बात को थोड़ा और बढ़ाओगे तो तुम्हें कहना पड़ेगा कि आदमी और चिम्पैंजी (वनमानुष) भाई-बहन हैं। फिर और बढ़ाओगे तो कहना पड़ेगा कि सारे ही जो एप (वानर) हैं, सारे ही बड़े बंदर, वो सब आपस में रिश्तेदारी में हैं। फिर इसी को और बढ़ाओ तो तुम्हें ये भी कहना पड़ेगा कि दुनिया के जितने जीव हैं, वो सब भाई-बहन ही हैं, क्योंकि सबकी उत्पत्ति एक ही आरम्भिक कोशिका से हुई थी अफ़्रीका में।

दुनिया के सारे जानवर हममें मौजूद हैं, वो जानवर भी जिनसे तुम इतना घबराती हो। तो दूसरे जानवरों से अगर तुम घबरा रही हो, तो वास्तव में किससे घबरा रही हो? खुद से ही। और अकेली नहीं हो। अभी हमने कहा न कि आदमी अपने जानवर से हमेशा घबराता आया है, बहुत डरता है। लेकिन डर करके तुम उस जानवर से आगे नहीं निकल पाओगे। उससे आगे निकलने का एक ही तरीका है, क्या? उस जानवर से दोस्ती करना।

देखा न तुमने बुद्ध को; उन्हें मुक्ति चाहिए थी तो पहले पशु की तरफ़ गए। नगर को छोड़ करके कहाँ गए थे बुद्ध? जंगल को गए थे। जंगल किसका संकेत है? प्रकृति का, पशुता का।

परमात्मा बाद में मिलेगा, पहले प्रकृति को तो समझ लो। देह को पार करके आत्मा तक बाद में पहुँचोगे, पहले देह को तो समझ लो। और देह तुम्हारी और पशु की एक जैसी है; देहगत वृत्तियाँ भी तुम्हारी और पशु की एक जैसी हैं। पशु को समझ लिया, तुम अपने-आपको समझ जाओगे। बहुत आसान हो जाएगा फिर जिसे तुम आत्मज्ञान कहते हो। और अगर जानवर से डर लगता है, तो इसका मतलब आत्मज्ञान नहीं है।

आत्मज्ञान और क्या होता है? देह का ज्ञान, मन का ज्ञान। देह तुम्हारी और जानवर की एक जैसी, मन की भी मूल वृत्तियाँ तुम्हारी और जानवर की एक जैसी। जानवर को नहीं समझते माने आत्मज्ञान नहीं है। ऐसा कुछ भी नहीं है जो कोई भी जानवर करता हो और तुम न करते हो, इस बात को आज़माकर देख लेना।

तुम पाओ किसी बंदर को बंदरघुड़की देते, तुम पाओगे कि तुम भी वही करते हो। तुम पाओ दो कुत्तों को रोटी के पीछे लड़ते, तुम पाओगे कि तुम भी वही करते हो। तुम पाओ एक अजगर को अपने शिकार को जकड़ते, तुम पाओगे कि तुम भी वही तो करते हो। तुम पाओ कि एक बिल्ली ने भूख की ख़ातिर एक कबूतर का सिर चबा लिया, तुम पाओगे कि तुम भी यही करते हो।

जानवर कुछ भी ऐसा नहीं कर रहे जो इंसान न करता हो। फिर अगर इंसान जानवरों से दूर है, इसका मतलब अपने-आपसे दूर है। हमारी सारी आदिम वृत्तियाँ पाशविक ही हैं।

मोर नाच रहा है मोरनी को रिझाने के लिए, ये क्या सिर्फ़ जंगलों में होता है? क्यों, भाई? दो बिल्ले लड़ पड़े एक बिल्ली के पीछे, ये क्या सिर्फ़ बिल्ली-बिलौटों में होता है? मकड़ी ने जाल बुना है, मक्खी को पता भी नहीं चलेगा और फँस जाएगी। जाल मकड़ी ही बुनती है? खून मच्छर ही चूसते हैं क्या?

पुराना सूत्र है – जिसको समझ लिया, उसके आगे बढ़ गए।

प्रकृति के आगे जाना है तो प्रकृति को समझो। पशुओं से घबराहट प्रकृति के प्रति घबराहट है। ख़्याल में ले लेना कि जो व्यक्ति पशुओं के सामने बेचैन हो जाता है, वो कभी भी अपनी देह का पूरा स्वीकार नहीं कर पाएगा। वो अपनी ही देह को ले करके ज़रा असहज रहेगा, लचरता-सा रहेगा।

पशु क्या है? देह ही तो है। बहुत लोग हैं, देखना तुम, उनके हाथ में एक बिल्ली का बच्चा भी रख दो तो कहते हैं, "उई माँ!" उनको यही बड़ा विचित्र लगता है कि मेरे हाथ पर एक देह रख दी गई। देह उनके लिए बहुत बड़ी बात है; और देह अगर तुम्हारे लिए बहुत बड़ी बात है, तो फिर देह संबंधित कई विकार तुम्हें पकड़ेंगे। कामुकता भी ख़ूब होगी तुममें। देह बड़ी बात है!

एक जानवर से दोस्ती करो, शुरुआत करो, तुम्हारी बहुत सारी तकलीफ़ें अपने-आप मिट जाएँगी। हमारे पास जीतू था, मुर्गा—मस्त, गुस्सैल, उद्दंड मुर्गा, दस किलो का, बेताज बादशाह बोधस्थल की छत का—मजाल है कोई बोधस्थल आ जाए बिना जीतू की अनुमति के। एक क़ायदा था, जब भी कोई नया आदमी आएगा, जीतू उसे पहले पाँच-छह राऊंड (चक्कर) दौड़ाएगा। बढ़िया नज़ारा होता था, एक मोटा मुर्गा आपके पीछे दौड़ रहा है, आप 'हाय! हाय!' करके कह रहे हैं, "हम तो अध्यात्म के लिए आए थे। ये कौन-सा बोधस्थल है, मुर्गे दौड़ा रहे हैं!"

कई तो और विचित्र प्रश्न पूछें, वो कहें, "हमें तो पता था कि आचार्य जी शाकाहारी हैं। ये मुर्गे पालते हैं!" उन्हें ये भरोसा ही न आए कि कोई मित्रता के नाते भी मुर्गे को पाल सकता है। उन्हें लगे कि अब पाला है तो...।

तो जीतू ने बहुतों को दौड़ाया, और चोंच मारता था सीधे ‘टक्क’, और चोंच उसकी ऐसी थी कि जूता छेद दे।

बहुतों को थी जीतू से दुश्मनी। पर जिनसे उसकी दुश्मनी भी हुई, उनसे उसका एक नाता बन गया। और बहुत लोगों का माँस खाना छूट गया जीतू से एक रिश्ता बनने के बाद। जो ये भी कहा करे कि "हमें ये मुर्गा बिलकुल पसंद नहीं है," उन्होंने भी उससे एक नाता तो बना लिया न। और एक बार वो नाता बन गया, उसके बाद फिर उनसे माँस नहीं खाया गया; बहुत बदलाव आएँगे।

लेकिन फिर कह रहा हूँ, दोस्ती का अर्थ ये नहीं है कि तुम गाय ले आओ और उसको ज़ंजीर से बाँध दो। ये मत कर बैठना। भैंस पालकर रोज उसका दूध दुहो और कहो, "ये देखो, हमें पशुओं से कोई समस्या नहीं है।" नहीं, मैं उस रिश्ते की बात नहीं कर रहा। दोस्ती समझते हो न? दोस्ती का मतलब होता है, वो स्वयं तुम्हारे पास आए।

हमारे कोहम-सोहम थे, ये पूरे सेक्टर में जहाँ चाहते थे, वहाँ घूमते थे और फिर आ जाते थे, या जब हमें इनकी याद आती थी, तब हम उठा लाते थे। अब कोहम बीमार है, उसे कैंसर (कर्क रोग) हो गया है। वहीं बाहर सोफ़े पर लेटा हुआ है। उसकी दवाई चल रही है। भरपूर कुत्ता होता था, मस्त, वज़नी। अब जा रहा है। वैसे ही है यहाँ पर जैसे घर का कोई सदस्य होता है अपने आख़िरी दिनों में।

फिर मुश्क़िल हो जाएगा कि आप कुत्तों को पत्थर मार रहे हैं या उन पर गाड़ी चढ़ा दे रहे हैं। बात दया इत्यादि की नहीं है, बात नैतिकता की नहीं है कि दूसरों को दुःख देना बुरी बात है; मैं कह रहा हूँ, ये कोहम-सोहम तुम्हारे भीतर मौजूद हैं। अगर तुममें इनके प्रति करुणा नहीं, तो फिर तुम अपने भी दुश्मन ही हो।

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