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इतना क्यों लिपटते हो दुनिया से? || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्न : आचार्य जी, कुछ दिन पहले घर में एक दुर्घटना हुई। घर के बगल की बिल्डिंग में काम चल रहा था। अचानक उसकी एक दीवार मेरे घर की एक दीवार पर गिरी। संयोगवश मेरी पत्नी उस दीवार के पास थीं और उन्हें काफ़ी चोट आई। उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती करवाया और एफ.आई.आर दर्ज कराई।

अभी आपको सुन रहा हूँ तो समझ आ रहा है कि कैसे परिस्तिथियों ने मेरा मन जकड़ लिया था; मैं विरक्त नहीं रह पाया। अभी आपको सुन रहा हूँ तो मन शांत है, पर जब घटना घटती है तो मन विरक्त नहीं रह पाता।  

आचार्य प्रशांत: जितना अभी समझ में आएगा, उतना अगली बार विरक्त रहने में मदद मिलेगी। इसका अर्थ यह नहीं है कि अगली बार इस तरह की कोई घटना घटेगी  - चाहे अच्छी, चाहे बुरी, क्योंकि विरक्ति दोनों में चाहिए; अभी जो घटना घटी है वह कष्टप्रद थी, आगे जो घटना घटे हो सकता है वह सुखप्रद हो। पर अनासक्ति तो दोनों में ही चाहिए न? जितना आप इस बात को अभी समझेंगे, उतना अगली बार अनासक्त रहने में मदद मिलेगी। इसका अर्थ लेकिन यह बिल्कुल नहीं है कि अगली बार जब कोई इस तरह की उत्तेजक या मूल्यवान प्रतीत होती हुई घटना घटेगी, तो आप उससे पूरे तरीक़े से विरक्त रह पाएँगे। न! लेकिन ‘विरक्ति’ थोड़ी बढ़ेगी। घटना का आप पर जो प्रभाव हो रहा है, वह थोड़ा कम होगा। घटना आपको जितना झंझोड़ गई, वह कम हो जाएगा। 

अभ्यास से आता है।

देखिए, अहम् ने प्रकृति के साथ जुड़े रहने का बड़ा लंबा अभ्यास कर रखा है। एक तरह का रिफ्लेक्स एक्शन हो गया है। 'रिफ्लेक्स एक्शन' जानते हैं न? जिसके लिए आपको विचार भी नहीं करना पड़ता, अपनेआप हो जाता है - जैसे नाक पर मक्खी बैठी और आपने हाथ से हटा दिया। इस तरीक़े से हम वृत्तियों के गुलाम हो गए हैं, क्योंकि हम उनसे बहुत समय से जुड़े रहे हैं। अब हटने का भी अभ्यास करना पड़ता है। समय लगता है; तत्काल नहीं होगा। लेकिन हाँ, समय कम लग सकता है अगर आपका इरादा पक्का हो। लेकिन यह मत समझिएगा कि आप सुनेंगे और काम हो जाएगा। सच तो यह है कि सुनकर भी काम हो सकता है, लेकिन फिर उसके लिए अनंत इरादा चाहिए।

कृष्णमूर्ति कभी-कभार कहा करते थे कि — “अगर तुम ठीक-ठीक सुन रहे हो, अगर गहराई से सुन रहे हो, तो जब तुम इस हॉल से बाहर निकलोगे, तुम मुक्त होगे।” इतनी लंबी बात कह दी उन्होंने। बोलते थे कि - "अगर आपके सुनने में दम है, तो आपको एक दिन भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी; जब आप यहाँ से बाहर निकलेंगे, आप बिल्कुल आज़ाद होंगे।" लेकिन वैसा श्रोता होना मुश्किल है न? वैसा श्रोता मिलना मुश्किल है। वैसा वक्ता मिलना भी मुश्किल है कि उसकी बात में ही इतना दम हो कि कोई सुनकर ही आज़ाद हो जाए। लेकिन अभ्यास से काम होता है।

आपने जो बात कही, उस संदर्भ में श्रीकृष्ण अर्जुन को जो दो मंत्र देते हैं, श्रीमद्भगवद्गीता में, वह दोनों आपके लिए उपयोगी हैं। वो कहते हैं — "‘अभ्यास’ और ‘वैराग्य’ — अर्जुन, इससे होगा!" ‘अभ्यास और वैराग्य’। समय लगेगा। 'अभ्यास' का मतलब ही है समय, धीरे-धीरे होगा। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में अगर आपको थोड़ी भी सफलता मिल रही हो, तो उसको बहुत मानें, और उस सफलता से अपनेआप को प्रेरित रखें। आप कहें कि अगर थोड़ी सफलता मिली है, थोड़ा आगे बढ़े हैं, तो माने और आगे भी बढ़ सकते हैं; क्योंकि चुनौती बड़ी है।  

लाखों वर्षों का हमारा अभ्यास है प्रकृतिगत रहकर ही जीने का। यह तो एक नई चीज़ हो रही है न कि - "प्रकृति से जुड़े-जुड़े यह जो मुझे एक छटपटाहट हो रही है, उसके कारण अब मैं दूर होना चाहता हूँ प्रकृति से। प्रकृति का भोक्ता नहीं, साक्षी होना चाहता हूँ।"

यह नई चीज़ है।

पुराना अभ्यास बहुत लंबा है, उसको मिटाने में थोड़ा समय तो लगेगा।

प्रश्नकर्ता: इन्होंने अपनी पत्नी के संबंध में जो उदाहरण दिया, अगर हम लोगों की अपेक्षा के अनुसार व्यवहार नहीं करें, भावुकता नहीं दिखाएँ, तो लोग उसको इस तरह लेंगे कि आपको लगाव नहीं है।

आचार्य प्रशांत: तो आप अगर शांत हैं और संयमित हैं किसी विपत्ति की घड़ी में भी, तो लोग आपको देखकर कह सकते हैं कि - "यह आदमी तो निर्मम है, यह आदमी तो संवेदनाहीन है।" आप पर सीधे-सीधे इल्ज़ाम भी लगा सकते हैं कि — "तुम तो हृदयहीन आदमी हो! तुम्हें तो कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता दूसरे के दुःख-दर्द से!" ऐसा जब कोई बोले, तो अपनेआप को क्या बोलना है? "मैंनूँ की? तुम्हारा काम है इल्ज़ाम लगाना, तुम लगा लो।" यहाँ बात ही यही हो रही है कि बाहर की घटनाओं से अप्रभावित रहना है। ठीक? दूसरे आप पर दोषारोपण कर रहे हैं, यह घटना भी कहाँ की है? बाहर की। तो इस बात से भी अप्रभावित रहिए न! 

सिर पर दीवार गिर जाए, यह बाहरी घटना है न? और सिर पर पड़ोसियों का ताना आकर गिरे, यह भी तो बाहरी घटना है न? तो दोनों से अछूते रहिए। एक का असर शरीर पर पड़ता है, एक का असर मन पर पड़ता है, पर दोनों ही स्थितियों में जो कारक है, वो तो बाहरी ही है न? आदमी को दोनों से चोट लगती है - कोई थप्पड़ मार दे, तो भी, और कोई गाली दे-दे, तो भी; अछूता दोनों से रहना है। थप्पड़ और गाली अलग-अलग चीज़ हैं? आपके सवाल से ऐसा ही लग रहा है।

प्रश्नकर्ता: नहीं-नहीं। अगर कोई बोल रहा है कि मैं असंवेदनशील हूँ, मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन अगर उनको मेरे व्यवहार से दुःख पहुँचा तो?

आचार्य प्रशांत: मैंनूँ की?

असल में आप पूरी बात बता नहीं रही हैं। आपको समस्या इससे नहीं होती है कि उन्हें चोट लग गई। सवाल से तो ऐसा लग रहा है कि  - "मैं क्या करूँ अगर मेरे बैरागी आचरण से किसी दूसरे का मन दुखता हो?" सवाल सुनने में ऐसा लग रहा है। है न? पर सवाल वास्तव में यह नहीं है। असली बात थोड़ी आगे की है। 

असली बात यह है कि उसको चोट अगर लगती है तो आपको ख़तरा हो जाता है कि वो आपको चोट दे देगा। इसलिए आप परेशान हैं। यह कोई सहृदयता की बात नहीं है कि आप कह रहे हैं कि - "अगर मेरे आचरण से दूसरे को दुःख हुआ तो?" आपके आचरण से बहुतों को दुःख होता है, आपको कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता। आपको फ़र्क़ सिर्फ़ तब पड़ता है, जब जिसको दुःख हो रहा है, वह पलटकर आपको दुःख दे-दे। उसकी यह हैसियत हो।

बात समझ रहे हैं, कि नहीं समझ रहे हैं?

अच्छा, आप बिना हेलमेट के बाइक लेकर भागे जा रहे हैं।रास्ते में आपको कई लोगों ने टोका कि - "यह ग़लत कर रहे हो, यह ग़लत कर रहे हो," आपको कोई फ़र्क़ पड़ता है? अब एक पुलिस वाले ने हाथ दिखाकर कहा कि - "आप यह ग़लत कर रहे हो," अब फ़र्क़ पड़ता है न? अब आप कहेंगी, "देखिए, पुलिस वाले को बुरा लग रहा है, यह काम निश्चित रूप से बुरा है।" (व्यंग्य करते हुए) आपका दिल बहुत धड़क रहा है पुलिस वाले के लिए! आपको पुलिस वाले की तकलीफ़ से इतनी तकलीफ़ हो गई? और जब इससे पहले पचास लोग आपको रोक कर बोल रहे थे कि ग़लत कर रहे हो, तब कोई तकलीफ़ नहीं हो रही थी?

बात सीधी है — आपको किसी की तकलीफ़ से कोई तकलीफ़ नहीं है; आपको बस तकलीफ़ यह है कि पुलिस वाले को तकलीफ़ हुई तो आपको तकलीफ़ दे देगा। आप यह बात कोई सहृदयता के नाते नहीं पूछ रही हैं; आप यह बात डर के नाते पूछ रही हैं। 

जब आप कहते हैं, "मुझे डर है कि कोई मेरे व्यवहार से चोटिल होगा," यह ‘कोई’ कौन है? यह ‘कोई’ वही है जो बदले में आपको चोट पहुँचाने की क्षमता रखता है, और इसीलिए आप ये सवाल पूछ रही हैं। क्योंकि आप अपनी सुरक्षा के लिए डरते हैं, इसलिए नहीं कि आपको डर है कि वह आहत हो जाएगा।आप डरते हैं कि अगर उसको चोट लगेगी, तो वह आपको वापस चोट पहुँचाएगा। है न? ऐसा ही है?

यह मत कहिएगा कि ‘करुणा’ या ‘कंपैशन’ के नाते आपने यह सवाल पूछा है, क्योंकि ‘करुणा’, ‘कंपैशन’ कभी दूसरे के विचारों और भावनाओं की फ़िक्र नहीं करते। ‘करुणा’ और ‘कंपैशन’ फ़िक्र करते हैं दूसरे के हित और वेल्फ़ेयर की। और यह दो बहुत अलग-अलग चीज़ें हैं। एक चीज़ है यह कहना कि, "मैं उसकी भावनाओं को आहत नहीं करना चाहता," और एक चीज़ है ये कहना, "मैं उसके कल्याण को आहत नहीं करना चाहता।" इन दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है। पहली चीज़ कि - "मैं दूसरों की भावनाओं को आहत नहीं करना चाहता," यह आप तब कहते हो जब आपको डर होता है कि - "उसको आहत किया, तो वह मुझे आहत कर डालेगा।" और जब आप यह कहते हो कि - "मैं यह नहीं चाहता कि उसकी ‘कुशलता’, उसके ‘वेल्फ़ेयर’ पर कोई आँच आए," तो यह कंपैशन है।

यहाँ आप कहते हो, "उसकी भावनाएँ आहत होती हों तो हों, उसको बुरा लगता हो तो लगे, पर उसकी बेहतरी, उसकी भलाई के लिए ज़रूरी है कि उसको बुरा लगे; तो लगे। और उसको बुरा लग रहा है, इस नाते अगर वह पलटकर मुझपर वार कर रहा हो तो मैं वार भी बर्दाश्त कर लूँगा, लेकिन उसकी भलाई ज़रूरी है।"

कृपा करके आप ये न सोंचे कि जिन लोगों को आप पाते हैं कि दूसरों के प्रति बड़ा शालीन और प्यार भरा व्यवहार रखते हैं, वो लोग ऐसा प्रेमवश या करुणावश करते हैं।  ऐसा बिल्कुल भी नहीं!  हम ऐसे लोग नहीं हैं कि दुनिया के प्रति प्रेम या करुणा रख पाएँ।  हम दुनिया के लिए अच्छाई करते हैं तो सिर्फ़ इसलिए कि दुनिया भी पलट के हमें अच्छाई दे, और हम दुनिया के लिए अच्छाई करते हैं तो सिर्फ़ इसलिए कि अच्छाई नहीं करी तो दुनिया कहीं हमारी बुराई न कर दे।

जब रोक लेते हैं ट्रैफिक वाले, तो देखा है कि लोग उनसे कैसे मुस्कुरा-मुस्कुराकर बात करते हैं? पीछे से बोलते हैं ‘ठुल्ला’, और जब रोक लेते हैं ट्रैफिक वाले तो बोलते हैं ‘जी सर’। होता है कि नहीं होता है? मैंने न जाने कितने लड़कों को ये करते देखा है सड़क पर। 

हमारा भी ये जो प्यार भरा और शिष्ट और शालीन आचरण होता है दूसरों के प्रति, वो इसलिए नहीं होता कि हमें उनसे प्रेम या करुणा है।  वो इसीलिए होता है क्योंकि उनसे अगर हमने ज़रा भी वैसा आचरण नहीं किया जैसा वो हमसे चाहते हैं, तो वो हमें नुक़सान और तकलीफ़ दे देंगे। 

तो बहुत सावधान रहिएगा जब कोई यह कहे कि, "मैं यह काम इसलिए नहीं कर रहा हूँ क्योंकि इससे मेरी माँ की भावनाएँ आहत होंगी।" अजी छोड़िए! निश्चित रूप से माँ से अभी कोई स्वार्थ होगा। जिस दिन माँ से कोई स्वार्थ नहीं बचेगा, उस दिन देखते हैं कितने लोग हैं जो अभी-भी माँ की फ़िक्र करेंगे। और जब आप अपनी माँ की भावनाओं की रक्षा कर रहे हैं, तो क्या आप वास्तव में माँ की फ़िक्र कर रहे हैं? नहीं! आप बस माँ को उसकी दुनिया में रखना चाहते हैं। आप बात समझ रहे हैं? आप नहीं चाहते हैं कि माँ अपने स्वरचित संसार से बाहर आए; बाहर आएगी तो उसको तकलीफ़ होगी। बाहर आएगी तो उसको पता चलेगा कि वह जिस दुनिया में रह रही थी, वह दुनिया झूठी थी, उसे चोट लगेगी। तो जब आप माँ की भावनाएँ आहत नहीं कर रहे हैं, आप तब भी माँ की भलाई नहीं कर रहे हैं। आप बस उसको उसकी झूठी दुनिया में बने रहने पर मजबूर कर रहे हैं। और यह क्रूरता है। यह बहुत बड़ी क्रूरता है।

किसी ने आपसे पूछा कि, "आपने पाँच दिन से फ़ोन नहीं किया? तुम्हें मेरी याद नहीं आई?" आप कहते हो, "अगर मैं इसको सच बता दूँ तो इसके दिल को चोट लगेगी, ये दुखी हो जाएगा।" तो आप कहते हो, “नहीं, याद तो बहुत आती है, वो नेटवर्क नहीं था। याद तो बहुत आई लेकिन फ़ोन ख़राब था, रिचार्ज नहीं था, गला बैठा हुआ था।" साफ़-साफ़ क्यों नहीं बता देते हैं कि - "जो काम कर रहा था वो ज़रूरी था, और उस वक़्त ये उचित ही नहीं है कि तुम्हारी याद करूँ। सत्य का सुमिरन सदा बना रहे तो ठीक है! तुम कौन हो? मैं तुम्हारी भलाई चाहता हूँ, तुमसे प्रेम करता हूँ, तुम्हें इज़्ज़त भी देता हूँ। पर तुम परमात्मा थोड़े ही हो गए कि तुमको लगातार याद करता रहूँ!" हम बोलते हैं, "नहीं-नहीं, याद तो तुम्हारी हर पल आती थी, मैं बोर्ड के सामने प्रेजेंटेशन कर रहा होता था, पूरा बोर्ड बैठा है कंपनी का, उसके सामने प्रेजेंटेशन कर रहा हूँ, और दिल में तुम्हीं तुम नाचते थे। मैं तो कई बार अपने सी.ई.ओ. को तुम्हारे नाम से संबोधित कर देता हूँ।"

अभी आपने क्या किया है? जो सामने व्यक्ति है, वो एक झूठे संसार में रह रहा है। और आपने ये सब बोलकर अपनी ओर से तो ये किया है कि - "मैं इसकी भावनाएँ आहत न करूँ," पर आपने अभी ये इंतज़ाम कर दिया है कि - वो अपने झूठे संसार से कभी बाहर न आए।

हॉस्टल में था, तो एक दक्षिण भारतीय फ़्रैशर आया। वो बड़े ही संस्कारी परिवार से था, और इस तरह के बच्चों पर हमारी ख़ास नज़र रहती थी। कोई पहले ही बिगड़ा हुआ आए, तो उसे कौन छेड़ता है? कोई आए बिल्कुल गोल-मटोल संस्कारी, तो एकदम लार आ जाती थी सीनियर्स के मुँह में — "मिला! इसके साथ मज़ा आएगा!" तो उसको सुधारा गया। 

वो आया था तो सुगंध में नहाया हुआ, चंदन पोते हुए। दिन में दो-बार नहाए, पूजा अर्चना करे। खाना खाने के पहले भी कुछ क्रिया-व्रिया करे। सोने से पहले मंत्र जाप करे। जो कुछ भी उसके साथ होना चाहिए था, वह सब हुआ। उसको भी आनंद आ गया। बन्दा ज़बरदस्त निकला। पहले दो-तीन दिन तो उसको हैरत हुई, फिर चौथे दिन से वो रात को दो-तीन बजे सीनियर्स का दरवाज़ा खटखटाए। बोले, "आज की अभी हुई नहीं, थोड़ा और करते हैं।" रंग गया बिल्कुल हॉस्टल के रंग में। 

अब एक फ़ोन हुआ करता था, लैंडलाइन का ज़माना था; पूरे हॉस्टल के लिए एक फ़ोन। उसको मैंने एक बार बात करते हुए सुना। अपने घर पर बात कर रहा है, पर उसकी भाषा मुझे बहुत समझ में आए न। प्रथम वर्षीय छात्रों को ये अनुमति नहीं थी कि वो चुपचाप बात कर सकें। पता नहीं क्या बात करे। इसलिए कोई-न-कोई कान दिए रहता था। तो जितना मुझे एक दो बार सुनके समझ आया कि वो ये बता रहा था कि - "हाँ माँ, रोज़ सुबह नहाता हूँ, पूजा करता हूँ और यहाँ ये जितने सीनियर्स हैं, सब बड़े धर्म-परायण हैं। भजन और आरती से हॉस्टल गुंजायमान रहता है।" 

मैंने पकड़ा और पूछा कि - "ये क्या बात कर रहा था?" तो उसने खुलकर बताया। मैंने पूछा, "क्यों?" तो उसने कहा कि - "माँ को ठेस लगेगी।" मुझे तब इतनी स्पष्टता तो नहीं थी कि ये जो कर रहा है वो वास्तव में क्या कर रहा है, पर फिर भी मैंने भाँपा। मैंने कहा, "दोबारा फ़ोन जब आएगा तो मेरे सामने बात करेगा और सारी बात सच-सच बताएगा।" बोला, "जो रैगिंग करनी है कर लो। कहाँ नंगा होकर कूदना है, बोलो? कौन-कौन से काम मुझसे करवाने हैं करवा लो। लेकिन ये काम मत करवाओ।” मैंने कहा, “क्यों?” बोला, "माँ का दिल टूट जाएगा।" मैंने कहा, "दिल-विल कुछ नहीं, यही रैगिंग है तेरी।" उसने माँ को बताया। कुछ देर तक तो उस तरफ़ सन्नाटा रहा, थोड़ा सुबकी भीं। फिर कुछ नहीं, समझ गईं। बोलीं, "ठीक है।"

अगर वास्तव में प्रेम करते हो, तो दूसरे तक सच्चाई लेकर आओ न! 

माँ अपनी छोटी-सी दुनिया में कैद है। वही घर में रहती है, वही रसोई, वही घर, वही पूजाघर। तुम चाहते हो वो वैसे ही जिए, वैसे ही मर जाए? यही चाहते हो? और इस बात को बड़े फ़क्र के साथ कई लोग बताते हैं, "मेरी माँ की तो छोटी-सी सुंदर-सी दुनिया है।" अरे, वो छोटी-सी सुंदर-सी दुनिया नहीं है, उसे जेल बोलते हैं। एक झटके में नहीं बता सकते तो धीरे-धीरे बताओ, पर बात तो खोलनी पड़ेगी। कुछ उपाय करो! पर फिर डर ये लगता है कि उधर अगर चोट पहुँची, तो इधर भी चोट पहुँचेगी-ही-पहुँचेगी। हम कहाँ बच जाने वाले हैं। 

हम अपनी सुरक्षा की ख़ातिर दूसरे को सत्य से वंचित कर देते हैं। 

कर देते हैं न? नहीं करना है!

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