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इतने हल्के में मत लो माया को || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: मैं एक धार्मिक परिवार से हूँ, छोटी उम्र से ही परिवार में मुझे सत्संग, कीर्तन वगैरह का माहौल मिला। आपसे जाना है कि संगत, शास्त्र, भजन-कीर्तन जीवन को ऊँचा उठाते ही हैं। पर मैं तो अभी भी ख़ुद को बहुत पिछड़ा पाता हूँ जबकि बचपन से ही घर में माहौल धार्मिक रहा। तो क्या सुसंगति और शास्त्र मेरे काम नहीं आ पाये, क्या मैं बेईमान था या किसी जीवित मार्गदर्शक की कमी थी? कृपया समझाएँ।

आचार्य प्रशांत: कई बातें समझनी पड़ेंगी इसमें — परिवार क्या है? धर्म क्या है? आध्यात्मिक उन्नति क्या है? इन सब बातों को समझने के लिए जानना पड़ेगा कि इंसान क्या है।

देखिए, शरीर से इंसान पशु है। पशु माने एक सीमित चेतना का जीव, एक जीव जिसकी चेतना एक दायरे में क़ैद है और वो उस दायरे में सन्तुष्ट है। उसके भीतर कोई इच्छा ही नहीं है कि वो अपने दायरे का उल्लंघन करे। उसकी चेतना किसी पार का, किसी असीम का, किसी उड़ान का ख़्वाब देखती ही नहीं, यह पशु है। यह पशु की परिभाषा है।

तो जो जीव अपने जीवन के दायरों में क़ैद हो और उस क़ैद के भीतर ही एक तृप्त, सन्तुष्ट ज़िन्दगी बिता रहा हो उसको जानवर कहते हैं। ठीक है? जानवर क्यों, क्योंकि उस क़ैद में सन्तुष्ट रहता है, क्योंकि उसकी शारीरिक वृत्तियाँ उसको संचालित करती हैं, उसकी शारीरिक वृत्तियाँ उसकी चेतना पर हावी रहती हैं। उसको कोई इच्छा आती ही नहीं कि वृत्तियों से दूर जाकर, वृत्तियों से आज़ाद होकर जिये। उसका अहम् वृत्तियों से जुड़ा हुआ है, वृत्तियों से बँधा है, घिरा है, आच्छादित है। किसी भी तरह की मुक्ति की उसमें कोई कामना नहीं है।

ये सब वृत्तियाँ शारीरिक हैं, वो सारी शारीरिक वृत्तियाँ इंसान में भी होती हैं। ठीक है न? तो इंसान बहुत सारे वो काम करेगा-ही-करेगा जो कोई पशु करता है क्योंकि वृत्तियों के तल पर आदमी और पशु बिलकुल एक हैं। जैसे एक जानवर के बच्चे का जन्म होता है वैसे एक इंसान के बच्चे का जन्म होता है। जैसे एक जानवर का बच्चा सुरक्षा माँगता है, भोजन माँगता है, माँ माँगता है, वैसे ही एक इंसान का बच्चा माँगता है।

दिखने में भी इंसान में और जानवर में क्या अन्तर है? अभी लॉकडाउन के बाद बहुत लोग जब घरों से बाहर निकले होंगे तो जानवर जैसे ही दिख रहे होंगे। बाल-वाल बढ़ आये, आपको जंगल में छोड़ दिया जाए, ज़्यादा नहीं, बस दो-चार महीने को, कपड़े फट जाएँ, आप कैसे कह पाएँगे कि आप जानवरों से भिन्न हैं?

ये तो हमने अपनी खाल के ऊपर बहुत सारे प्रयोग कर-करके अपनेआप को जानवरों से अलग दिखने वाला बना दिया है, अलग हैं नहीं। जंगल में आदमी को अभी भी छोड़ दिया जाए तो जंगली ही है। तो शरीर के तल पर हम भी जानवर हैं।

आदमी और जानवर में अन्तर ये है कि आदमी की चेतना के पास ये विकल्प होता है कि वो शारीरिक वृत्तियों से जुड़ी रहे या शारीरिक वृत्तियों से जूझ जाए।

जानवर की चेतना बड़ी क्षीण होती है, बड़ी दुर्बल होती है; उसके पास ये विकल्प होता ही नहीं। जानवर की चेतना को अपनी वृत्तियों से जुड़ना ही है, माने अपनी वृत्तियों से हार माननी ही है। और जानवर इतनी बुरी तरह हारा होता है अपनी वृत्तियों, अपने शरीर के सामने कि उस हार के अलावा भी कुछ हो सकता है जीवन में, इसका उसे झीना सा, धुँधला सा एहसास भी नहीं होता।

एक जीव है, यूँही साधारण, उसको जहाँ लगता है वहीं मल त्याग कर देता है, जहाँ भोजन दिखता है खा लेता है, कामवासना उठती है तो नर-मादा साथ हो लेते हैं। जहाँ जगह मिली वहीं पर सो लिया, कहीं घोसला बना लिया, कहीं माँद खोज ली। और सब जानवर अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार व्यवहार करते हैं, उनके पास अपनी प्रकृति से हटने का कोई तरीक़ा नहीं है।

कौआ काँव-काँव नहीं बोलेगा तो क्या करेगा! आपने कभी कोई शाकाहारी शेर तो देखा नहीं होगा। अब शेर की प्रकृति है माँसाहार तो माँसाहार करेगा-ही-करेगा, कोई विकल्प नहीं है। जानवर की चेतना जानवर के शरीर से एकदम हारी हुई है, पिटी हुई है, दबी हुई है। जो कुछ शरीर कराएगा, जानवर की चेतना करेगी। किसी शेर को कभी यह भीतर से प्रश्न नहीं उठेगा, ग्लानि नहीं उठेगी कि मैने क्यों एक नन्हें, भोले हिरण के छौने को मार दिया। उसका शरीर उसकी चेतना में यह सवाल उठने ही नहीं देगा। हम कह रहे हैं न उसकी चेतना उसके शरीर के आगे बड़ी अशक्त है, कमज़ोर। तो ये जानवर की स्थिति होती है।

आदमी बहुत हद तक जानवर जैसा है बल्कि ये कह लीजिए कि आदमी के पास विकल्प है कि वो जानवर जैसा भी हो सकता है। लेकिन आदमी की चेतना सशक्त है या ये कह लीजिए कि आदमी की चेतना के पास विकल्प है कि वो सशक्त हो सकती है। तो आदमी की चेतना के पास ये विकल्प है कि वो या तो जानवर की तरह हो जाए और शरीर के आगे घुटने टेक दे, या वो शरीर से लड़े, शरीर के विरुद्ध जाए। या तो शरीर से, हमने कहा, जुड़ जाए या शरीर से जूझ जाए। जानवर के पास एक ही विकल्प है – शरीर से जुड़ जाए। आदमी के पास दो हैं – शरीर से जुड़ जाओ या शरीर से जूझ जाओ।

अब आते हैं परिवार पर। तो परिवार सब जानवरों का होता है, होता है न? चूँकि सब जानवरों का परिवार होता है इसीलिए आदमी का भी परिवार होता है। तो ये जो परिवार की संस्था है, ये वास्तव में सामाजिक नहीं है, ये जैविक है, ये शारीरिक है। आप जंगलों में जाइए, आप समुद्रों में जाइए, क्या वहाँ आपको परिवार नहीं मिलते?

तो ये कहना कि परिवार एक सामाजिक इकाई है, ये कोई बहुत समझदारी की बात नहीं है। समाज हो या न हो, परिवार तो रहते ही हैं, जंगलों में भी परिवार होते हैं। जंगल जाइए, वहाँ पर आपको सिंहों के परिवार दिख जाएँगे, सड़क पर आपको कुत्तों के भी परिवार दिख जाएँगे, जंगलों में आपको हाथियों का समुदाय दिखायी दे जाएगा। उसमें कहाँ किसी ने उनको सामाजिक ज्ञान की शिक्षा दी है, कहाँ किसी ने उनको नैतिकता सिखायी है। कहाँ किसी ने कोई नियम बनाया है, कोई सामाजिक स्मृति या क़ायदा स्थापित किया है। नहीं, कुछ नहीं। बिना किसी के सिखाये-पढ़ाये भी परिवार अस्तित्वमान रहता है।

तो चूँकि आदमी के पास जानवर होने का विकल्प है, चूँकि आदमी बहुत हद तक जानवर है ही, इसीलिए आदमी के पास भी परिवार होगा ही। ऐसा ही समझ लीजिए कि परिवार का मतलब होता है वो रिश्ते-नाते जो शरीर के होते हैं, ठीक है? तो जहाँ शरीर है, वहाँ परिवार का होना लाज़िमी है, है न? और पशु क्या है, वो जो पूरी तरह शरीर ही बनकर जीता है या जो अधिकांशत: शरीर बनकर जीता है उसका नाम पशु है।

तो इसीलिए आप इंसानों में भी पाते हैं कि जिसको हम परिवार कहते हैं, परिवार माने यही न कि चार पाँच या सात लोग इकट्ठे रह रहे हैं या दो लोग इकट्ठे रह रहे हैं। उन सबमें क्या साझा होता है? अच्छा बताइए, आप चले जाइए किसी मोहल्ले में, किसी सोसाइटी में, कहीं भी, ठीक है न? वहाँ आपको भाँति-भाँति के परिवार मिलेंगे। कहीं आपको दो लोगों का परिवार मिल जाएगा। और कहीं हो सकता है आपको संयुक्त परिवार मिल जाए, उसमें दस-बारह लोग भी रहते हों, पंद्रह लोग भी रहते हों। कहीं परिवार हो सकता है जिसमें सब बुज़ुर्ग-ही-बुज़ुर्ग हों, बस एक या दो जवान लोग हों। कई परिवार हो सकता है जहाँ पर बस एक वयस्क है और सात-आठ बच्चे हैं, पति की या पत्नी की मृत्यु हो गयी है तो एक आदमी है और पाँच बच्चों को सम्भाल रहा है। तो कई तरह की आपको जोड़ियाँ मिल सकती हैं।

परिवार माने मनुष्यों का समूह। वो समूह आपको मिल सकता है और तरह-तरह के समूह होंगे, उनमें बड़ी भिन्नता होगी। पर वो समूह कैसा भी हो, सब समूहों में आपको एक बात साझा मिलेगी, क्या? लोगों के आपस में जुड़ने का जो आधार होगा वो शारीरिक होगा। परिवार माने आदमी और आदमी शारीरिक आधार पर माने पाशविक आधार पर जुड़ा हुआ है, ठीक है।

ये परिवार की बिलकुल मूलभूत परिभाषा है, एकदम जैविक परिभाषा, क्योंकि परिवार की संस्था देखिए आयी ही वहीं से है। तो इसलिए इस परिभाषा को ध्यान में रखना बहुत ज़रूरी है। परिवार जंगल से उठा है, परिवार शरीर से उठा है तो इसलिए ये जानना ज़रूरी है कि जंगल, शरीर और जानवर इन तीनों का बहुत गहरा सम्बन्ध है परिवार से।

आपको कोई परिवार नहीं मिलेगा जहाँ पर लोग हैं और वो आपस में शरीर का कोई रिश्ता नहीं रखते। मान लीजिए चार दोस्त साथ रह रहे हों तो उनको आप परिवार तो नहीं बोलते या बोल देते हैं? कहिए, नहीं बोलते न? लेकिन एक आदमी-औरत साथ रहने लग जाएँ तो आप कहते हैं परिवार होगा, क्यों? क्योंकि बहुत सम्भावना है कि उनमें शारीरिक रिश्ता होगा।

आप यूँही किन्हीं अजनबियों के साथ बहुत दोस्ती कर लें या कुछ बच्चे हों, उनके साथ आपका बड़ा क़रीबी रिश्ता बन जाए तो भी आप सामान्यतः ये नहीं कहेंगे कि ये परिवार है। हाँ, आप थोड़ा सा अतिशयोक्ति के तौर पर, मुहावरे के तौर पर ऐसा बोल सकते हैं कि ये मेरे परिवार हैं, फैमिली हैं। लेकिन वो बस एक कहने का तरीक़ा होगा, आप भी जानते होंगे कि परिवार तो नहीं हो गया। जिन लोगों से शारीरिक रिश्ता नहीं, उनसे आप बड़े घनिष्ट हो जाएँ, बड़े अंतरंग हो जाएँ तो भी नहीं कहेंगे कि परिवार है। लेकिन जिनसे आपका शारीरिक रिश्ता है उनसे आपकी रोज़ मुठभेड़ होती हो, रोज़ जूतम-जूता होती हो, रोज़ गाली-गलौज होती हो तो भी आप कहेंगे कि परिवार है?

ये बात आपको बिलकुल साफ़ कर देगी कि परिवार का आधार क्या है। बात समझ रहे हैं? चार दोस्त साथ रहते हों और वो ऐसे हों कि एक-दूसरे पर जान छिड़कते हों, एक-दूसरे के लिए भाई से बढ़कर हों, वो तो भी नहीं कहते हैं कि वो परिवार हैं।

मान लीजिए जनगणना चल रही है, ठीक है? और जनगणना करने वाला कर्मी दरवाज़े पर आया और दरवाज़ा खटखटाया और पूछा यहाँ कितने लोग रहते हैं। बताया गया चार लोग रहते हैं और हम चार मित्र हैं, तो आपको क्या लग रहा है कि सरकार और समाज उन चार लोगों की गणना एक परिवार के रूप में करेंगे? बिलकुल नहीं करेंगे, भले ही वो चार लोग, मैं कह रहा हूँ, ऐसे हों कि एक-दूसरे पर जान छिड़कते हों। तो जान छिड़क रहे हैं लेकिन शारीरिक सम्बन्ध नहीं है तो परिवार नहीं कहलाएँगे।

अब एक दूसरा दरवाज़ा देख लीजिए, बगल का घर, वहाँ चार लोग रहते हैं जो एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे हैं, रोज़ एक-दूसरे का सिर फोड़ते हैं। लेकिन एक पुरुष है, एक स्त्री, उनमें शारीरिक सम्बन्ध है। और उनके शारीरिक सम्बन्ध के कारण स्त्री ने दो बच्चों को जन्म दिया है तो वहाँ भी शारीरिक सम्बन्ध है। तो वो चारों परिवार कहला जाएँगे।

तो आप समझ गए न कि परिवार माने क्या? परिवार माने रक्त का रिश्ता, परिवार माने चमड़ी का रिश्ता, परिवार माने देह का रिश्ता। आवश्यक नहीं है कि परिवार माने प्रेम का रिश्ता। अभी जो हमने दूसरा घर देखा, उसमें क्या प्रेम का रिश्ता है? प्रेम का रिश्ता नहीं है लेकिन फिर भी वो क्या कहला रहा है? परिवार। और हमने जिस पहले घर की चर्चा की, उसमें प्रेम तो ख़ूब है न। लेकिन क्या वो परिवार कहला रहा है? वो परिवार नहीं कहला रहा है, क्योंकि उसमें क्या नहीं है? शरीर का रिश्ता नहीं है। तो देखिए, अच्छा लगे या बुरा लगे, सच, सच होता है, सच की बात होनी चाहिए।

परिवार का आधार जिस्म है, परिवार का आधार शरीर है और परिवार का आधार शरीर इसलिए है क्योंकि आदमी अभी भी बहुत हद तक जानवर है। जानवर एक-दूसरे से शरीर का ही रिश्ता बनाते हैं और शारीरिक रूप से सम्बद्ध जो जानवर होते हैं वो साथ-साथ रहते हैं कभी दो महीने को, कभी सालभर को, कभी बहुत लम्बे समय तक, उसी को परिवार कहा जाता है। भेड़िया परिवार हो गया, गौरैया परिवार हो गया, मछलियों का परिवार हो गया, ये सब परिवार होते हैं। तो जैसे वहाँ परिवार होते हैं वैसे यहाँ भी परिवार होते हैं। ठीक है? तो ये तो बात हो गयी परिवार की।

अब आप कह रहे हैं कि आप एक धार्मिक परिवार से हैं, कह रहे हैं बचपन से ही सत्संग, कीर्तन का माहौल मिला। तो आपके अनुसार 'आचार्य जी, जहाँ सत्संग है, कीर्तन है, वहाँ आध्यात्मिक प्रगति होनी चाहिए।' लेकिन प्रश्नकर्ता कह रहे हैं कि मेरी तो कोई आध्यात्मिक प्रगति ख़ास हुई नहीं, मैं बड़ा पिछड़ा पाता हूँ अपनेआप को। तो ऐसा क्यों हुआ?

देखिए, समझिएगा बात को। माया को हम बहुत हल्के में ले लेते हैं, हम सोचते हैं कि यूँही कुछ थोड़ा-बहुत उससे हम संघर्ष कर लेंगे, यूँही हम उसको कुछ मौखिक चुनौती दे लेंगे, टोकन रेज़िस्टेंस (सांकेतिक प्रतिरोध), तो काम चल जाएगा। ऐसा होता नहीं है।

हमारी रग-रग में घूम रही है माया, नख-शिख माया हम पर चढ़ी हुई है पूरे तरीक़े से।

माया माने क्या होता है? माया माने वो सबकुछ जो आपकी चेतना को दुख देता है, जो आपकी चेतना को बन्धन में रखता है।

ये मूल परिभाषाएँ स्पष्ट होनी चाहिए। अध्यात्म विज्ञान है। जैसे विज्ञान में परिभाषाएँ बिलकुल स्पष्ट होनी चाहिए, साफ़, पत्थर की लकीर की तरह, उसी तरह अध्यात्म में भी स्पष्ट होनी चाहिए। यूँही कुछ हवा-हवाई, धुँधली बात कर देने से आपको मुक्ति नहीं मिल जानी है। यहाँ जीवन-मरण का सवाल है, यहाँ पर तो सारी जो बात है वो बिलकुल सटीक होनी चाहिए, एकदम धारदार होनी चाहिए, साफ़-साफ़ होनी चाहिए न।

तो जब हम कहते हैं, 'माया, माया।' माया माने क्या? माया की परिभाषा है वो जो कुछ आपकी चेतना को रोके रहता है, बाँधे रहता है, आज़ाद नहीं होने देता, उसको माया कहते हैं। ठीक है? ये माया है। अब आपने कहा, 'परिवार में भजन-कीर्तन होता था तो भी मेरे ऊपर माया चढ़ी हुई है, मैं मुक्त क्यों नहीं हो पाया?'

देखिए, परिवार मूलतः माया का ही प्रतिनिधि है। माया माने वो सबकुछ न, जो आपकी चेतना को बाँधे रखता है! आपकी चेतना को क्या बाँधे रखती हैं? शारीरिक वृत्तियाँ। शारीरिक वृत्तियाँ ही चेतना को बाँधे रखती हैं और शारीरिक वृत्तियाँ ही परिवार को एक रखती हैं। तो परिवार फिर क्या है, शारीरिक वृत्तियों की अभिव्यक्ति ही तो है। शारीरिक रिश्ता न हो तो कितने आदमी-औरत एक साथ रहेंगे, बोलिए।

माँ की ममता की हम बहुत बात करते हैं पर उसकी ममता भी उन्हीं बच्चों के लिए होती है न जो उसके शरीर से उत्पन्न हैं। तो परिवार को एक रखने वाली जो गोंद है, परिवार को एक में बाँधकर रखने वाली जो रस्सी है, वही क्या है? वही शारीरिक है, उसी का नाम तो माया है। आपको समीकरण स्पष्ट हो रहा है?

आपकी चेतना को जो चीज़ दबाकर रखे है उसका क्या नाम है? माया। हमारी चेतना को क्या चीज़ दबाकर रखती हैं? हमारी शारीरिक वृत्तियाँ। और वही शारीरिक वृत्तियाँ अभिव्यक्त होती हैं परिवार के रूप में। तो परिवार अपनेआप में शरीर ही तो है। कई शरीर एक साथ इकट्ठा हो गये हैं क्योंकि उन्हें शरीर भाव से ही एक-दूसरे को देखना है।

पुरुष स्त्री को आत्मा की तरह नहीं देख रहा है, स्त्री की तरह देख रहा है तो उसको बोलता है मेरी पत्नी है। अगर पुरुष को स्त्री में आत्मा दिखायी दे रही होती तो उसे पत्नी कैसे बोल सकता था? आत्मा का तो कोई लिंग होता नहीं, पत्नी कैसे हो गयी? स्त्री को पुरुष में आत्मा दिखायी देती होती तो पति कैसे बोल देती? आत्मा का तो लिंग होता नहीं, तुमने कैसे पतिदेव बना दिया और कहने लग गयी कि ये मेरा शौहर है, ये मेरा आदमी है, कैसे? इसका मतलब ही यही है कि परिवार इकट्ठा ही तब होता है जब शरीरभाव होता है, देहभाव होता है, है न?

तो परिवार अपनेआप में माया है। परिवार की जो इकाई है, परिवार की जो संरचना है, वो अपनेआप में मायावी है। अब आप इस मायावी संरचना के बीचों-बीच हैं, आप कह रहे हैं कि मैं बच्चा हूँ, मैं परिवार के बीचों-बीच हूँ लेकिन साहब मेरा परिवार धार्मिक है तो वहाँ भजन-कीर्तन होता है। उसके बाद आपको ताज्जुब हो रहा है कि भजन-कीर्तन होता है लेकिन मुझे आज़ादी क्यों नहीं मिली।

दादा, माया इतनी हल्की नहीं है न कि तुम उसे 'ओम जय जगदीश हरे' कर दोगे तो हार जाएगी? परिवार में जो भजन-कीर्तन होता है वो क्या होता है? सांझ को दादा-दादी, बच्चे सब खड़े हो गये और 'स्वामी जय जगदीश हरे' कर दिया, आरती कर दी। तुम्हें लग रहा है इससे तुम आध्यात्मिक प्रगति कर जाओगे, तुम्हें लग रहा है इससे तुम्हारी चेतना को ऊँचाइयाँ और उड़ान मिल जाएगी, कैसे बाबा?

इसका मतलब ये है कि हम अपने दुश्मन को समझते ही नहीं हैं और दुश्मन को न समझना, दुश्मन की ताक़त का पूरा अनुमान न रखना, दुश्मन से हारने की पूरी तैयारी होती है। ये तो छोड़िए कि हमें दुश्मन का ज्ञान है, हमें तो दुश्मन का अनुमान भी नहीं है। तो हम सोच रहे हैं कि ऐसे ही थोड़ा कर दिया, दीया जला दिया, धूप-बत्ती फेर दी तो इससे हम माया को जीत लेंगे। कैसे जीत लोगे बाबा?

देखो, मैं बिलकुल मानता हूँ कि किसी घर में ज़रा भी धार्मिकता न हो उससे तो बेहतर ही है कि दो-चार आरती हो जाए, कुछ भजन हो जाए, कुछ कीर्तन हो जाए, कहीं कोई बैठकर थोड़ा सा गीता का, भागवत का कुछ पाठ कर दे। वो ठीक है। उसको आप कह सकते हैं कि कुछ नहीं से कुछ भला।

लेकिन ये जो ‘कुछ नहीं से कुछ भला’ है इससे आपको मुक्ति नहीं मिल जानी है। ये तो ऐसे ही है बस, खानापूर्ति है। ये तो ऐसा ही है कि कोई मर गया तो श्रद्धांजलि दे आये, उससे वो ज़िन्दा थोड़ी हो जाएगा! मरे हुए को आप जाकर बोल दो बड़े अच्छे आदमी थे तो इससे वो ज़िन्दा हो जाता है? नहीं, ये तो कुछ नहीं है, यूँही थोड़ा सा आपने कह दिया कुछ।

माया के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त संघर्ष करना पड़ता है, जीवनभर संघर्ष करना पड़ता है। वो इतनी कमज़ोर नहीं है, वो इतनी लिबलिबी नहीं है कि आप यूँही जाकर के दिन के आधे घंटे कुछ ध्यान कर देंगे, कुछ भक्ति बता देंगे, कुछ थोड़ा-बहुत ज्ञान चर्चा कर देंगे या कहीं इधर-उधर जाकर बाबाजी के यहाँ पर कथा सुन आये, सत्संग कर आये तो उससे माया को आप हरा लेंगे। ऐसा थोड़े ही होता है, पूरी जान लगानी पड़ती है, भाई।

अच्छा, एक बात बताओ मुझे, सौ फीट गहरा पानी है कहीं पर, ठीक है? और आपके पास एक रस्सी है। आप उस सौ फीट गहरे पानी में नीचे पहुँच गये, तल पर पहुँच गये बिलकुल। आपके ऊपर कितना पानी है? सौ फीट पानी है। आपके पास एक रस्सी है, आप उम्मीद कर रहे हो कि वो रस्सी आपको तार देगी, ठीक है? वो रस्सी अगर बस पाँच फीट लम्बी है तो आप बच जाओगे? बोलो, बच जाओगे? नहीं बचोगे न।

ये जो पानी है जिसमें आप डूबे हुए हो, इसी को भवसागर बोलते हैं। हम सब इसमें डूबे हुए हैं। धर्म वो रस्सी है जो हमें बचा सकता है पर धर्म हमारी चेतना की तड़प के बराबर ही होता है।

हमारी धार्मिकता हमारी मुमुक्षा पर निर्भर करती है न। आपकी धार्मिकता बस उतनी ही गहरी होगी जितनी कि आज़ाद होने के लिए आपकी तड़प।

अब आपका बन्धन तो है सौ फीट गहरा और आज़ाद होने की जो आपकी तड़प है उसमें बस पाँच फीट की गहराई है तो आप कैसे आज़ाद हो जाओगे? नहीं हो पाओगे, नहीं पाओगे न? तो आप मर गये, आप डूब गये। इसी को कहते हैं कि संसार सागर में डूब मरा, ख़त्म हो गया।

अच्छा, चलिए पाँच फीट की रस्सी नहीं है आपके पास, आपकी धार्मिकता थोड़ी और प्रबल हुई। पाँच फीट वाला वो घर हो गया जिसमें बस होली-दिवाली में दीया जलता है। आप थोड़े और ज़्यादा धार्मिक परिवार से हो‌, ठीक है? और उस धार्मिक परिवार में होली-दिवाली ही नहीं जलता, हर महीने हो जाता है या हर एकादशी पर हो जाता है। तो आपकी रस्सी जो है, वो पचास फीट लम्बी है। बच जाओगे? अभी भी नहीं बचोगे। और जो मौत होगी, वो पाँच फीट वाली रस्सी की ज़्यादा होगी और पचास फीट वाली जो रस्सी है उस मामले में थोड़ी कम होगी क्या? मौत तो मौत होती है न!

भई, आप बिलकुल तल पर बैठे हुए थे, आपके ऊपर सौ फीट पानी था, किसी ने ऊपर से पाँच फीट की रस्सी डाली, आप मर गये। एक मौत ये है। दूसरी मौत ये है कि आप तल पर हो, ऊपर से किसी ने पचास फीट की रस्सी डाली, आप मर गये। क्या जो दूसरी मौत है वो पहली मौत से आधी मौत है, कम मौत है? मौत तो मौत है। मौत तो पूरी है, आप मर गये।

अब थोड़ा सा आप और धार्मिक परिवार में हो, वहाँ प्रतिदिन पाठ वगैरह होता है तो आपकी जो रस्सी है वो अस्सी फीट लम्बी है। लेकिन अभी भी आपको मौत उतनी ही बदतर मिलेगी जितनी पाँच फीट वाले को मिली। ठीक? आप और धार्मिक परिवार से हो, वहाँ पर टीका भी किया जाता है, तमाम तरह के संस्कारों का पालन किया जाता है, लगातार रामधुन चलती रहती है। इनकी जो रस्सी है वो निन्यानवे फीट लम्बी है। लेकिन मौत तो इनकी भी उतनी ही भयावह होगी जितनी पाँच फीट रस्सी वाले की हुई थी।

तो आपकी धार्मिकता में माया से ज़्यादा गहराई होनी चाहिए। माया की गहराई तो पहले से तय है। माया की गहराई कहाँ बैठी हुई है? माया की गहराई बैठी हुई है शरीर के अन्दर। माया सौ फिट गहरे सागर में या पानी में आपको डुबो देना चाहती है तो माया की गहराई तो तय है। आपकी धार्मिकता में कितनी गहराई है? सब डूबेंगे! थोड़े-बहुत से काम नहीं चलेगा। सब डूबते हैं। बचता तो बस वो है जिसके भीतर बड़ी अदम्य इच्छा हो तर जाने की। उसकी धार्मिकता में फिर जान होती है।

लेकिन अब गड़बड़ क्या होती है, समझिएगा। पाँच फीट का जिसका धर्म था उसने देखा कि जो पचास फीट वाला है वो भी मर रहा है। तो उसने कहा, 'इसका मतलब ये है कि धर्म में जान ही नहीं होती तो मैं पाँच फीट वाली धार्मिकता भी क्यों करूँ, मैं कम कर दूँगा और।'

जिसकी पचास फीट की धार्मिकता थी, उसने देखा कि जिसकी निन्यानवे फीट की धार्मिकता है वो भी मर रहा है, बच तो वो भी नहीं रहा तो उसने भी कहा, 'भगवान कुछ होता ही नहीं, धर्म से कोई फ़ायदा ही नहीं है, हम तो देख रहे हैं बड़े-बड़े धार्मिक लोग ख़त्म हुए जा रहे हैं तो मैं अपनी पचास फीट की धार्मिकता भी काहे को रखूँ।' उसने वो भी बन्द कर दी। अपने-अपने तर्क हैं भाई!

इनको ये बात समझ में नहीं आयी कि जब तक सौ फीट नहीं जाओगे, कुछ होगा नहीं। और सौ से नीचे जितने हैं, सब एक बराबर हैं। अस्सी, सत्तर, बीस, पाँच, शून्य, सब एक बराबर हैं, सब मरेंगे। किसी ने ये नहीं समझा कि सौ पार करना है, इन्हें ये समझ में आया कि धर्म से कोई लाभ ही नहीं होता।

बिलकुल धर्म से कोई लाभ नहीं होगा जब तक सौ का आँकड़ा पार नहीं करोगे। हाँ, सौ का पार किया नहीं आँकड़ा कि लाभ होना तुरन्त शुरू हो जाएगा, तुम तरने लग जाओगे।

'तो ठीक है भाई, थोड़ी-बहुत धार्मिकता रखने से तो फिर अच्छा है कि एकदम ही मत रखो क्योंकि जिसकी रस्सी पचास फीट की है और जिसकी रस्सी पाँच फीट की है, दोनों एक सी बदतर मौत मरते हैं। तो इससे अच्छा है कि कुछ करो ही मत, कोई धार्मिकता मत रखो।' आज दुनिया इसी सिद्धान्त पर चल रही है, कि कुछ भी करने से फ़ायदा क्या, मरना तो सबको है।

नहीं, सबको नहीं मरना, कुछ अनिवार्य नहीं है। माया प्रबल है पर माया का ज़ोर एक बिन्दु पर जाकर के रुक जाता है। ठीक वैसे, जैसे शरीर से सम्बन्धित हर चीज़ का ज़ोर एक जगह जाकर रुक जाता है।

माया क्या है? हम ये पाँचवीं-आठवीं बार बोल रहे हैं इस चर्चा में, माया हमारी शारीरिक वृत्तियों का ज़ोर है न। शरीर से सम्बन्धित जितनी भी चीज़ें हैं, वो सब क्या हैं? सीमित। तो हमारी शारीरिक वृत्तियों का भी जो ज़ोर है वो क्या है? सीमित। तो कहीं-न-कहीं जाकर रुक जाता है, वो जहाँ जाकर रुक जाता है मैंने उसी बिन्दु का नाम दिया है सौ फीट।

तो शरीर आपके भीतर जो भावनाएँ उठाता रहता है, शरीर आपके भीतर जो आवेग-संवेग उठाता रहता है उनमें जान बहुत होती है, पर आपके लिए खुशख़बरी ये है कि वो असीमित नहीं होते, उनकी ताक़त एक-न-एक जगह जाकर रुकती है। और जहाँ उनकी ताक़त रुकती है, उसके आगे आपकी फ़तह है। बस आपमें ये धैर्य होना चाहिए और आपमें ये तड़प होनी चाहिए कि शरीर से आगे निकल जाना है।

शरीर असीम-अनन्त नहीं है, शरीर तो हर तरीक़े से बँधा हुआ है तो उससे आगे निकला जा सकता है। जो उससे आगे निकल गया वो जीत जाएगा और जो वहीं पर हार मान गया, उसके लिए कोई उम्मीद नहीं है।

समझ में आ रही है बात?

तो आपने जो सवाल करा कि परिवार में भजन-कीर्तन होता था फिर भी मैं पिछड़ा हुआ हूँ, इससे यही पता चलता है कि आप ये सोच रहे हो कि आप टैंकों का मुकाबला तीर और भालों से कर लोगे। माया समझ लीजिए जैसे एक अत्याधुनिक टैंक है जिसमें इतना ज़बरदस्त आर्मर है, कवच है कि वो आण्विक हमला भी बर्दाश्त कर सकती है। उसके आसपास आप एक न्यूकलियर (नाभिकीय) विस्फोट भी कर दें तो भी वो टैंक झेल जाएगा, माया वो है।

और उसके सामने आप कौनसा धर्म लेकर पहुँच गये हो? उसके सामने आपका धर्म ऐसा है कि धनुष-बाण, आप उस पर तीर मार रहे हो, भाला मार रहे हो, उसे पत्थर फेंक कर मार रहे हो। और फिर आप कह रहे हो, 'अरे! अरे! आचार्य जी, कुछ फ़ायदा नहीं हुआ, वो टैंक जीत गया।'

बाबा, टैंक दुर्जेय है पर अजेय नहीं है। अन्तर समझिएगा। दुर्जेय माने जिसे मुश्किल से जीता जा सकता है, अजेय माने जो जीता ही नहीं जा सकता। टैंक को जीता जा सकता है, दुनिया में आज तक ऐसा टैंक नहीं बना जो हराया नहीं जा सकता। पर उस टैंक को हराने के लिए उस टैंक से ज़्यादा बड़ा टैंक आपको खड़ा करना पड़ेगा न, मेहनत करनी पड़ेगी न उतनी, पूरा दिमाग लगाना पड़ेगा, पूरी जान लगानी पड़ेगी।

अब वो टैंक आप खड़ा कर नहीं रहे, उल्टे आप वहाँ पर कंकड़-पत्थर लेकर पहुँच गये हो, झाड़ू की सींक की तीर बनाकर के आप टैंक में मार रहे हो और उसके बाद बहुत बड़ा मुँह फुला करके दुनियाभर से शिक़ायत कर रहे हो कि 'अरे! हम तो बड़े धार्मिक थे; पर देखो हमें न समाधि मिली, न मुक्ति मिली।' कैसे मिल जाएगी? तुम्हें पता है कि तुम्हारा दुश्मन कौन है? वो इतना बड़ा टैंक है, उस टैंक का नाम ‘शरीर’ है।

और जैसा मैंने कहा, वो अत्याधुनिक टैंक है, तो हमारा जो शरीर है न वो अत्याधुनिक होता जा रहा है। शरीर में मस्तिष्क भी शामिल है न, मस्तिष्क अत्याधुनिक होता जा रहा है, ज़बरदस्त होता जा रहा है, ताक़तें ग्रहण करता जा रहा है। ये विज्ञान, ये टेक्नोलॉजी , ये दुनियाभर की सूचना, हर तरह का जो ज्ञान विकसित हो रहा है, ये सब क्या है? ये हमारी शारीरिक वृत्तियों की ताक़त बनता जा रहा है।

विज्ञान जो भी खोजें करता है, ज्ञान के क्षेत्र में जो भी शोध होते हैं, जो भी आदमी के हाथ जानकारियाँ लग रही हैं, वो सब किस काम आ रहे हैं? वो हमारी शारीरिक वृत्तियों की ग़ुलामी करने के ही तो काम आ रहे हैं न। आपकी कोई नयी टेक्नोलॉजी आती है, आप उसका क्या करते हो? अपनी शरीर की माँगों की पूर्ति के लिए आप उस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर लेते हो। तो हमारा जो शरीर नाम का टैंक है ये बड़ा ज़बरदस्त होता जा रहा है। जब इतना ज़बरदस्त होता जा रहा है तो इसके सामने धर्म को भी फिर अत्याधुनिक होना पड़ेगा, धर्म को भी ज़बरदस्त होना पड़ेगा। और पुराने तरह का तुम 'ओम जय जगदीश हरे' करोगे तो बड़ा मुश्किल है।

आज तो नयी विधियाँ चाहिए, आज तो बड़ी सतर्कता चाहिए। तुम्हारा दुश्मन जो तुम्हारे ही भीतर बैठा हुआ है, वो बहुत प्रबल हो चुका है। उससे लड़ने के लिए तुम्हें आज का धर्म चाहिए, जिसके सिद्धान्त बहुत पुराने होंगे पर जिसका कलेवर, जिसका रूप-रंग, जिसके तौर-तरीक़े आज के समय के ही होने चाहिए न। वो अगर आज के समय के नहीं हैं तो फिर तो तुम्हारी हार पक्की है, ठीक है?

प्र: क्या एक सत्संगी परिवार सम्भव है?

आचार्य: बिलकुल सम्भव है। पर फिर वो परिवार जैसा लगेगा नहीं न, वो परिवार जैसा लगेगा नहीं। जब आप कहते हैं परिवार 'में' रहकर मुक्ति चाहिए तो आप भूल ही जाते हैं कि मुक्ति का अर्थ ही होता है अपनी शारीरिकता से मुक्ति। और शारीरिकता से मुक्ति हो गयी अगर तो पत्नी को पत्नी कैसे बोलोगे और पति को पति कैसे बोलोगे? तो फिर कैसे बोलोगे कि मैं परिवार 'में' हूँ? ये वैसी सी बात हो गयी, 'क्या बेड़ियों में रहकर मुक्ति सम्भव है?' बेड़ियों में ही रहना है तो तुम्हें मुक्ति चाहिए किससे फिर?

तो मुक्ति सम्भव है और मुक्ति के बाद भी सम्भव है कि बहुत लोग एक साथ रहें, पर वो जो फिर एक साथ लोग रह रहे होंगे, वो बिलकुल वैसे नहीं रह रहे होंगे जैसे एक साधारण परिवार रहता है। वो साथ रहने का, सहवासिता का एक बिलकुल नया, ताज़ा, अद्भुत तरीक़ा होगा। उसकी हम कल्पना नहीं कर सकते, उसकी चर्चा भी करना मुश्किल है थोड़ा क्योंकि हम चर्चा करेंगे तो आप उसकी कल्पना करके उसकी नकल करनी शुरू कर दोगे।

इंसान को अध्यात्म थोड़ी बताता है कि बाक़ी इंसानों से दूर हो जाओ या बाक़ी इंसानों के साथ रह नहीं सकते। एक इंसान दूसरे इंसानों के साथ निश्चित रूप से रह सकता है। और जो दूसरे इंसान हैं वो किसी भी आयु वर्ग के हो सकते हैं, किसी भी रंग के हो सकते हैं, किसी भी नस्ल के हो सकते हैं, किसी भी लिंग के हो सकते हैं।

तो इंसान और इंसान निश्चित रूप से एक साथ वास कर सकते हैं। लेकिन फिर वो उनका जो इकट्ठापन है, वो जो उनकी एकजुटता है, वो जो उनका एकत्व है, वो इसलिए नहीं होगा क्योंकि वो एक-दूसरे को शरीर की तरह देखते हैं। तो आप उसे कहना चाहें तो एक आध्यात्मिक परिवार कह सकते हैं पर वो आध्यात्मिक परिवार बड़े अलग तरीक़े से काम करेगा। उसकी जो पूरी ठाठ होगी, उसके तौर-तरीक़े जो होंगे, उसके नैन-नक्श होंगे, वो एकदम अलग होंगे।

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