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'हृदय' का अर्थ क्या है? || (2016)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: सर, हार्ट (ह्रदय) क्या है? आध्यात्मिकता में ‘हृदय’ शब्द का क्या अर्थ है?

आचार्य प्रशांत: अर्थ मन करता है। उसका कोई भी यदि आपको अर्थ दिया जाएगा, तो आप उसके बारे में सोचना शुरू कर देंगे, उसके बारे में फिर से एक मानसिक धारणा बना लेंगे। अर्थ मत पूछिए, बस इतना समझ लीजिए कि मन सीमित है। और ये समझने के लिए, आपको ईमानदारी से, मन की सीमाओं को देखना पड़ेगा।

मन सीमित है, और मन के आगे जो कुछ है, वो उस अर्थ में है नहीं जिसमें मन है। ‘है’ शब्द ही वहाँ पर लागू नहीं होता, पर इतना तो पक्का है कि मन की सीमा है, मन रुक जाता है। सीमा है, तो मन के आगे भी कुछ होगा। किसी और आयाम में होगा, अचिन्त्य होगा, पर वो जो कुछ भी है जिसमें मन प्रवेश नहीं कर सकता, जो मेरी साधारण क्षमता के बाहर का है, उसे ‘ह्रदय’ कहते हैं।

उसके बारे में विचार आपको बहुत कुछ नहीं बता पाएगा। बस ऐसे समझ लीजिए कि जीवन में वो जो भी कुछ है, जिससे आपको सुकून है, शान्ति है, पर जिसका कोई अर्थ, कोई कारण, ना है, ना खोजा जा सकता है, वो ‘ह्रदय’ से सम्बंधित है।

क्यों आपको खुला आसमान भाता है? पक्षी की उड़ान क्यों आपको निस्तब्ध कर जाती है? इनका कोई कारण नहीं है। चलते-चलते अचानक ठिठक कर खड़े क्यों हो जाते हैं? अनायास प्रेम क्यों पकड़ लेता है आपको? मन सोच-सोच कर भी कुछ पता नहीं लगा पाएगा। दुनिया की सारी सहूलियतें मिली रहें आपको, लेकिन फिर भी आज़ादी क्यों प्यारी होती है? मन इसका कोई कारण नहीं जान पाएगा, यह ‘ह्रदय’ है।

वहाँ जाने की कोशिश मत करिए। वहाँ जाने के लिए तत्पर मत होइए। आपकी सतर्कता आपको वहाँ नहीं ले जा पाएगी। सतर्क होकर किसी को प्रेम में उतरते देखा है?

‘ह्रदय’ को जिसे जानना हो, उसे तो ह्रदय से जीना पड़ेगा। जो दिल से जीते हैं, वो दिल को जानते हैं। जो आत्मा से जीते हैं, मात्र वही आत्मा को जान पाते हैं। पर आम जिज्ञासु की, साधक की, हमेशा इच्छा यही रहती है कि – “बौद्धिक मार्ग से जान लूँ, परिभाषित कर लूँ, ख़याल बनाकर ज़ेहन में बंद कर लूँ।”

तुम्हारे ज़ेहन में समा सकता, तो तुम ही ख़ुदा थे।

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