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हम आख़िर चाहते क्या हैं? || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल एक बहुत बड़ा जो कचरा जो मन में था, उस पर बहुत क्लेरिटी (स्पष्टता) मिली। जो कंफ्यूजन (उलझन) था, चॉइस (पसन्द) और सरेंडर (समर्पण) पर, वैसे ही एक-दो और कचरे हैं। तो इसीलिए पूछना चाह रहा हूँ, ‘हाउ माइंड वर्क्स?’ (दिमाग कैसे काम करता है?)

कॉन्शियसनेस , कंसंट्रेशन और अवेयरनेस (चेतना, एकाग्रता और जागरूकता) को लेकर बेटी ने सवाल पूछ लिया और मैं उसको सही उत्तर नहीं दे पाया। उसको मैं बड़े दिनों से अपने तरीक़े से ही समझ कर बैठ गया हूँ, जो कि लग रहा है कि उसमें भी अस्पष्टता है। थोड़ा सा देखा था आपका वीडियो यूट्यूब में तो बात उतनी स्पष्ट नहीं हो पायी। थोड़ा उस पर अगर आप प्रकाश डाल दें।

आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो यह समझना होगा कि शरीर को न कोई समस्या है, न उत्सुकता है आध्यात्मिक तल पर। शरीर को न कोई समस्या है, न उत्सुकता है। शरीर एक प्रणाली है, एक यन्त्र, एक मशीन जो अपना काम बखूबी करना जानता है। और जब मैं शरीर कह रहा हूँ, तो फिर याद दिला रहा हूँ कि मेरा तात्पर्य सिर्फ़ माँस और हड्डी से नहीं है, मैं मस्तिष्क को उसमें शामिल कर रहा हूँ। मस्तिष्क भी अपना काम करना बखूबी जानता है और उसे कोई बेचैनी नहीं है। उसके सामने अगर जैविक असुरक्षा आती है, तो वह उसके लिए जो कर सकता है करेगा। आध्यात्मिक अशान्ति नहीं है शरीर को। जो अशान्त है वह कोई और है। उसको ‘अहम् वृत्ति’ जानिए। वो, वो है जिसे आप ‘मैं’ कहते हैं। वो, वो है जो अशान्त है।

मैंने किसको छुआ? (एक श्रोता को छूकर पूछते हैं) तुम बोलोगे, ‘मुझे छूआ।‘ मैंने उँगली किसको दिखायी? ‘मुझे दिखायी।‘ और मैंने जबकि छूआ किसको था? शरीर को। इसका मतलब, यह ‘मैं’ क्या कर चुका है? यह शरीर से गुत्थम-गुत्था हो चुका है। यह शरीर में वैसे ही मिल गया है जैसे पानी में नमक। शरीर में किसी एक जगह पर ‘मैं’ है क्या?

श्रोता: नहीं।

आचार्य: यहाँ छूआ तो, किसे छूआ? (एक श्रोता को छूकर पूछते हैं)

श्रोता: ‘मैं’ को छूआ।

आचार्य: यहाँ छूआ, तो किसे छूआ?

श्रोता: ’मैं’ को।

आचार्य: और यहाँ छूआ, तो किसे छूआ?

श्रोता: ‘मैं’ को छूआ।

आचार्य: तो ‘मैं’ कहाँ पर है शरीर में?

श्रोता: हर जगह है।

आचार्य: हर जगह है न? हर जगह है। तो जैसे कि पानी में नमक या आटे में नमक हर जगह है। अब यह जो ‘मैं’ है, यह शरीर से जुड़ रहा है, इसी बात से हमें कुछ पता चलेगा। ‘मैं’ शरीर से जुड़ा हुआ है। यह हमने प्रमाणित किया ये देखकर के कि शरीर को तो कोई अशान्ति होती नहीं, हमें बहुत अशान्ति है। इसका मतलब कोई और ही है जो शरीर से जुड़ा हुआ है। उसका हमने नाम दिया ‘मैं’। प्रमाण यह भी था कि शरीर को छूते हैं तो मुँह से निकलता है, ‘मुझे छुआ।’ ठीक? कोई किसी से क्यों जुड़ता है? कोई किसी से क्यों जुड़ता है? आप किसी से क्यों जुड़ने जाते हो? आप क्यों किसी से जाकर के एकाकार होना चाहते हो?

श्रोता: फ़ायदा होता है।

आचार्य: फ़ायदा होगा, कुछ लाभ होगा। कोई कमी होगी। तो ‘अहम्’ जाकर के शरीर से जुड़ा है, इससे ‘अहम्’ के बारे में क्या बात पता चली? ‘अहम्’ फ़ायदे का आकांक्षी है। ‘अहम्’ को ज़रूर कोई अपूर्णता है जिसके कारण वह जाकर के शरीर से जुड़ गया है। ‘अहम्’ जाकर के शरीर से जुड़ गया है, ठीक है? अब कहानी आगे बढ़ेगी।

मस्तिष्क की जो आम क्रियाएँ हैं, मस्तिष्क की आम क्रियाएँ को भी ‘मैं’ पकड़ लेगा जुड़ने के लिए। तो विचार हैं, तो ‘मैं’ क्या कहेगा? 'मेरे विचार।' यह चेतना है। हमारी चेतना 'अहम् मिश्रित' चेतना है। हमारी चेतना अहम् द्वारा संक्रामित चेतना है। हम जो कुछ भी देखते हैं, ‘मैं’ के केन्द्र से देखते हैं। मौसम सिर्फ़ ठंडा नहीं है, 'मुझे ठंड लग रही है।' तो कुछ भी अब वस्तुगत नहीं बचा, ऑब्जेक्टिव (वस्तुगत) नहीं बचा। हर विचार में कौन बैठा हुआ है? ‘मैं’ बैठा हुआ है।

फ़र्क नहीं पड़ता, दुनिया में कहाँ, क्या हो रहा है, आप उसका विचार करेंगे तो आप पाएँगे कि हर तथ्य में आप मौजूद हैं। आप किसी भी चीज़ का ख़याल कर ही नहीं सकते, बिना उससे अपनेआप को जोड़े। चुपचाप, धीरे से, चुपके से आपने अपनेआप को भी जोड़ ही रखा होगा। और इसीलिए दुनिया की हर चीज़ के बारे में आपके पास मत होते हैं, ओपिनियन (राय) होते हैं।

ठीक है?

फ्रांस और जर्मनी के बीच में क्या चल रहा है, इसको लेकर भी आपके पास मत हैं और चूँकि ‘मैं’ जोड़ दिया आपने उस मुद्दे से इसीलिए जब आपके मत पर चोट पड़ेगी, तो आपको बुरा भी लग जाता है। आप चाहते हो कि आपका जो तर्क है, जो ओपिनियन (राय) है, उसका सम्मान हो। इसीलिए फिर आप बहस भी करते हो, नहीं तो फ्रांस और जर्मनी से आपको लेना-देना क्या?

जो कुछ भी फिर वहाँ चल रहा है जिसको आप मन कहते हैं, वो ‘मैं’ से संक्रामित है, वो ‘मैं’ से मलिन है और उसको कहते हैं चेतना। जहाँ जो कुछ भी हो रहा है, ये चिड़ियों का उड़ना, ये कहाँ हो रहा है? यह चेतना के आकाश में हो रहा है। सूरज कहाँ डूब रहा है? चेतना के आकाश में डूब रहा है। आम भाषा में इसे कहते हैं 'खोपड़े का सारा उपद्रव।' वो कहाँ हो रहा है? वो चेतना के आकाश में हो रहा है। सुनना, देखना, खाना, पीना, उठना, आना-जाना, जीना-मरना ये सब क्या है? चेतना।

जो कुछ भी लगे कि है, सो कहाँ है? सो चेतना में है। जो कुछ भी लगे आपको कि है, उसके साथ आपने जोड़ रखा होगा अपनेआप को। उदाहरण के लिए, यह सिर्फ़ ज़मीन नहीं है, यह ज़मीन है जिस पर मैं खड़ा हूँ। वो सिर्फ़ सूरज नहीं है, वो सूरज है जिसे मैं देख रहा हूँ। वो मात्र सूर्य नहीं है, वो सूर्य है जिसे मैं देख रहा हूँ। तो आप यह भी कह दें कि नहीं साहब, मुझे सूरज से कोई लेना-देना नहीं, तो भी आपने एक रिश्ता तो निकाल ही लिया, क्या? मैं सूर्य का दृष्टा हूँ। लो! सूरज के साथ भी ‘मैं’ जोड़ लिया।

चेतना में जो कुछ भी होगा, उसके साथ ‘मैं’ किसी-न-किसी रूप में जुड़ा हुआ होगा। ठीक है? तो मानसिक गतिविधि जिसके साथ ‘मैं’ जुड़ गया, वो कहलाती है आम-साधारण चेतना। वो कॉन्शियसनेस (चेतना) हो गयी।

ठीक है?

मनुष्य के पास सम्भावना लेकिन यह रहती है कि वो इस बात को समझ जाए कि जिस ख़ातिर वो जुड़ा है शरीर से और शरीर के कारण पूरे संसार से, वो लक्ष्य पूरा हो नहीं रहा है जुड़ने से। हमने कहा था कि कोई किसी से जुड़ता ही तभी है न जब उसे अधूरापन, अकेलापन होता है। तो शरीर से भी अहन्ता किसी मक़सद से, किसी प्रयोजन से ही जुड़ी है। और वो प्रयोजन यह है कि पूरापन मिल जाएगा, पूर्णता मिल जाएगी।

अहन्ता भलीभाँति जानती है कि वह जल रही है, अपूर्णता का तो उसको पता है न। जब उसे अपूर्णता का पता है तो फिर उसे यह भी पता है कि अपूर्णता है कि नहीं है, क्योंकि अपूर्णता की अनुभोक्ता तो वह ख़ुद है। तो अब आपने अपूर्णता को मिटाने के लिए शरीर से सन्धि करी, शरीर से एकात्म करा और शरीर से एकात्म करके भी अपूर्णता गयी नहीं, बल्कि और स्थायी हो गयी। तो तब आप शरीर के साथ यह व्यर्थ सन्धि, यह तादात्म्य त्याग देते हैं, अहंता यह तादात्म्य त्याग देती है। तब यह सम्भव हो पाता है कि चेतना शुद्ध हो जाए। तब यह सम्भव हो पाता है कि आप आकाश को देखें और आकाश मात्र आकाश है। आप कहीं नहीं हो, आकाश भर है।

आकाश भर है और तब आकाश वो आकाश नहीं रहेगा जिसे आँखों से देखा जाता है, क्योंकि जब तक आप किसी पार्थिव वस्तु को देख रहे हैं, देखने के लिए आँखें तो चाहिए ही न? पेड़ को देखा नहीं कि पक्का हो गया कि आँखें होंगी कहीं, तभी तो पेड़ दिखा। माने पेड़ को देखने के लिए कौन अनिवार्य हो गया? आप अनिवार्य हो गये न। आँख माने आप, आप तो शरीर से जुड़े हुए हो। एक होता है आकाश को देखना जिसमें बस जो देखा वही है, देखने वाला नहीं है। फिर जिसको देखा, उसे आँखों से नहीं देखा जाता। यह कहलाती है 'विशुद्ध चेतना', जिसमें ‘मैं’ नहीं शामिल है। यह विशुद्ध चेतना है जिसमें ‘मैं’ नहीं है शामिल, इसको अवेयरनेस कहते हैं।

कॉन्शियसनेस वो चेतना है जिसमें बोझ की तरह ‘मैं’ बैठा हुआ है। सामने से कोई गाड़ी जा रही है। अब वो गाड़ी मात्र नहीं है, तुरन्त विचार उठा, 'यह गाड़ी मैं कब खरीदूँगा।' लेना एक न देना दो, पर गाड़ी के साथ संयुक्त हो लिये।

आध्यात्मिक अनुशासन और आध्यात्मिक साधना और पूर्णता के प्रति प्रेम के फलस्वरूप एक मुक़ाम ऐसा आता है, जब आप कहते हो, 'अगर मुझे पूर्णता चाहिए तो फिर मुझे पूर्णता से ही जुड़ना है, मैं शरीर से क्यों जुड़ूँ? शरीर से क्यों जुड़ूँ? पूर्णता के ख़ातिर शरीर से क्यों जुड़ूँ? अगर पूर्णता ही चाहिए और मुझे जुड़ना ही है, तो मैं सीधे पूर्णता से ही जुड़ जाता हूँ न।' तब आप चेतना से जुड़ना बन्द कर देते हैं, यह कहलाती है अवेयरनेस। यह हो गयी अवेयरनेस।

फिर आपने पूछा कंसंट्रेशन क्या है। शरीर से आप जुड़े ही इसीलिए थे कि कुछ मिल जाएगा। तो फिर शरीर माने आँखें और आँखें तो देखती हैं बाहर दुनिया को। और आँखें बाहर दुनिया को देख ही इसीलिए रही हैं कि कुछ मिल जाएगा। आँखों के पीछे तो ‘मैं’ बैठा है न, अहंकार?

आँखें दुनिया को क्यों देख रही है, कि कुछ मिल जाएगा। अब जहाँ कहीं भी ज़रा उम्मीद लगी कि कुछ मिल जाएगा, पूरा चित्त जाकर के उस वस्तु पर चिपक जाता है।

अब आप इस खम्भे को देख रहे हैं। आँखों ने खम्भे को देखा और शरीर जो भी कुछ देख रहा है, उसके ऊपर कौन चढ़ा बैठा है? ‘मैं’। तो खम्भे को देखकर के अगर ‘मैं’ को यह लग गया कि इस खम्भे से कुछ लाभ हो जाएगा, तो बाक़ी सारी बातों का ख़याल हटाकर के चित्त जाकर के बस इस खम्भे पर केन्द्रित हो जाएगा। इसको कहते हैं कंसंट्रेशन , कि दुनिया में जहाँ लाभ की आशा दिखी, बिलकुल उसी पर एकाग्र हो गये। तो इसीलिए कंसंट्रेशन व्यर्थ जाता है, क्योंकि आप लाभ जहाँ खोज रहे हैं वहाँ मिलना नहीं है।

अब ये खेद की बात है कि हमारे घरों में और स्कूलों में अनुशासन के नाम पर कंसंट्रेशन खूब सिखाया जाता है कि कंसंट्रेट (एकाग्र) हो जाओ, बिना यह समझे कि मन तो चाहता ही है कि वह केन्द्रित हो जाए, एकाग्र हो जाए। सवाल यह है कि किस चीज़ पर एकाग्र हो रहे हो।

तो हक़ीक़त यह है कि एकाग्रता का सूत्र है प्रेम। आपने पूछा न कि फोकस के बारे में बेटी को बताना था। फोकस नहीं चाहिए, प्रेम चाहिए। प्रेम चाहिए पूर्णता के प्रति, प्रेम चाहिए शान्ति के प्रति, फिर अपनेआप तुम वहाँ जाकर के दत्तचित्त होकर के बैठ जाओगे जहाँ शान्ति मिलती होगी। फिर तुम्हें सिखाना नहीं पड़ेगा कि फोकस करो। जब प्रेम हो जाता है तो कोई सिखाता है क्या किसी पर फोकस करना है? मन का पंछी फिर अपनेआप ही एक ही डाल पर बैठता है न। लेकिन डाल सही होनी चाहिए। यह न हो कि किसी भी डाल पर जाकर बैठ गये।

तो हमने कहा कि कंसंट्रेशन आमतौर पर हानिप्रद ही होता है। बस एक स्थिति है जिसमें कंसंट्रेशन लाभप्रद हो सकता है — अगर आप अपना निशाना उसको बना लें जो आपको पूर्णता की ओर ले जाएगा, क्योंकि आप की मूल माँग ही पूर्णता की है।

तो दुनिया में अगर कोई ऐसा मिल जाए जो आपको पूर्णता की ओर ले जा सकता हो और आप उस पर कंसंट्रेट कर ले जाए, आप उस पर केन्द्रित हो जाए, मात्र तब कंसंट्रेशन अच्छा है। समझ रहे हैं बात को?

पतंजलि के अष्टांग योग में 'धारणा' की बात होती है और वो बात 'ध्यान' से और 'समाधि' से पहले है, धारणा। धारणा यही है — राइट कंसंट्रेशन (सही एकाग्रता)। इससे पहले कि तुम ध्येय बना सको निराकार को, तुम धारण करो उस साकार को जो तुमको निराकार की ओर ले जा सके।

अंग्रेजी के शब्दकोश में आप कंसंट्रेशन का अर्थ धारणा नहीं पाएँगे, पर अध्यात्म में धारणा और कंसंट्रेशन एक हैं। कुछ ऐसा जो तुमने धारण किया, कुछ ऐसा जिसको तुमने सच माना, कुछ ऐसा जिसको तुमने पकड़ लिया, कुछ ऐसा जिसको तुमने धर्म ही बना लिया। यही कंसंट्रेशन है। ठीक है?

जीव हो, यही मानते हो अपनेआप को और दुनिया में जी रहे हो, तो किसी-न-किसी से तो जुड़ना पड़ेगा न दुनिया में? लगातार जुड़े ही हुए हो। और कुछ नहीं तो ज़मीन से जुड़े खड़े हो। जब तक जीव हो तब तक ज़मीन तो है ही। चप्पल भी पहन ही रखी है, कुर्ता भी डाल रखा है, चश्मा भी आपने डाल रखा है। तो दुनिया में होने का अर्थ ही है जुड़ाव। उससे जुड़ो जो तुमको दुनिया के पार ले जा सके।

कंसंट्रेशन गड़बड़ है लेकिन कंसंट्रेशन अनिवार्य भी है, क्योंकि दुनिया में जब तक हो चित्त किसी-न-किसी से तो जुड़ेगा ही। कहीं-न-कहीं तो तुम कंसंट्रेट करोगे। तो कंसंट्रेशन है तो बड़ी गड़बड़ चीज़। क्यों गड़बड़ है? क्योंकि ‘अहम्’ मूर्ख है। वो जाकर ग़लत चीज़ों पर बैठ जाता है, वो जाकर ग़लत जगह कंसंट्रेट कर लेता है।

लेकिन उसी कंसंट्रेशन का सही उपयोग भी किया जा सकता है, अगर तुमने धारणा के लिए वस्तु सही चुनी हो, अगर तुमने मन को केन्द्रित करने के लिए लक्ष्य सही चुना हो। वो सही चुनाव बड़ा मुश्किल होता है। है तो बहुत सहज और स्पष्ट, पर व्यावहारिक तौर पर देखा गया है कि बड़ा मुश्किल होता है।

प्र: उसके लिए बुद्धि का उपयोग करेंगे?

आचार्य: जब जहाँ जुड़ रहे हो, बार-बार पूछते रहो, 'यहाँ क्यों जुड़ा? यहाँ क्यों खड़ा हूँ? यहाँ क्यों आया? जो कर रहा हूँ, वो क्यों कर रहा हूँ? जहाँ रह रहा हूँ, वहाँ क्यों रह रहा हूँ?' ये सब चीज़ें हमने पकड़ ही तो रखी हैं न। 'जैसा जीवन जी रहा हूँ, उसको क्यों पकड़ा है मैंने', बार-बार पूछते रहो।

पकड़ा तो इसीलिए था कि दिल की आग बुझे, आग बुझ रही है क्या? अगर नहीं बुझ रही, तो फिर ‘चल ख़ुसरो घर आपने’, कहीं और आज़माते हैं।

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