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(गीता-11) कछुए का अमर सिद्धांत || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता, सांख्ययोग, दूसरा अध्याय, अट्ठावनवाँ श्लोक।

अर्जुन क्या पूछ रहे थे? अर्जुन पूछ रहे थे, स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताइए। और स्थितप्रज्ञ के लक्षण क्यों पूछ रहे थे? क्योंकि आत्मज्ञान की चर्चा करने के बाद और वो चर्चा अर्जुन पर लगभग विफल जाने के बाद श्रीकृष्ण ने बात शुरू करी निष्काम कर्मयोग की। जो पूरा प्रवाह है शुरू से अन्त तक वो याद रखना पड़ेगा, तभी समझ में आएगा कि कौनसा श्लोक किस सन्दर्भ में है।

तो सबसे पहले जो उपदेश दे रहे हैं श्रीकृष्ण अर्जुन को, वो है आत्मज्ञान का, संक्षिप्त तथा गूढ़। उससे लगता है कि कोई विशेष बात बनी नहीं क्योंकि अर्जुन के भ्रम और जिज्ञासा लगभग यथावत् रहते हैं। तो फिर बात करते हैं निष्काम कर्मयोग की। जब निष्काम कर्मयोग की बात करते हैं तो कहते हैं, 'निष्काम कर्मयोगी स्थितप्रज्ञ हो जाता है।' और फिर स्थितप्रज्ञ के बारे में कुछ बातें बताते हैं अर्जुन को। यहाँ से अर्जुन की उत्सुकता कुछ जगती हुई दिखती है तो पूछते हैं, स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताइए, कैसे चलता है, कैसा दिखता है, कैसा आचरण करता है। जैसा कि आम तौर पर शिष्यों के प्रश्न होते हैं, 'लक्षण बता दो, बाहरी बात बता दो, आचरण बता दो।'

तो कृष्ण इस प्रश्न का सदुपयोग करते हैं, अर्जुन ने तो पूछे हैं लक्षण, और कृष्ण बताते हैं अन्तस के बारे में। वो स्थितप्रज्ञ के मन के ही द्वार खोल देते हैं अर्जुन के लिए कि देखो अर्जुन, स्थितप्रज्ञ का मन ऐसा होता है। उसी श्रृंखला में यह अट्ठावनवाँ श्लोक भी है, अब हम इसकी विवेचना करेंगे।

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।

जिस प्रकार कछुआ विविध अंगों को अपने भीतर सिकोड़ लेता है उसी प्रकार, जब यह योगी इन्द्रियों को विषयों से पूर्णतया अपने भीतर लौटा लेता है, तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित मानी जाती है।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ५८

'जिस प्रकार कछुआ विविध अंगों को अपने भीतर सिकोड़ लेता है उसी प्रकार जब यह योगी, माने निष्काम कर्मयोगी, इन्द्रियों को विषयों से पूर्णतया अपने भीतर लौटा लेता है तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित मानी जाती है।'

कछुआ अपने अंगों को भीतर खींच लेता है यह बात तो सर्वविदित है, आसानी से कल्पित भी है। इन्द्रियों को विषयों से भीतर खींच लेना, यह क्या है? बुद्धि प्रतिष्ठित तब है जब इन्द्रियों को विषयों से भीतर की ओर खींच लिया जाए। यह 'भीतर' माने क्या? 'जब यह योगी इन्द्रियों को विषयों से पूर्णतया अपने भीतर लौटा लेता है तब बुद्धि प्रतिष्ठित है।'

इन्द्रियाँ विषयों की ओर जाती ही क्यों हैं? मन के मूल अज्ञान के कारण। मन का मूल अज्ञान क्या है? 'मैं एक जीव हूँ, मैं एक अपूर्ण जीव हूँ। मैं एक अपूर्ण जीव हूँ जिसको संसार के माध्यम से पूर्णता मिल जाएगी', यह मूल अज्ञान है।

'मैं एक जीव हूँ', हर व्यक्ति यही भाव लेकर चलता है न, 'मैं एक जीव हूँ, मैं जीव हूँ।' ठीक? इसीलिए हम अपनी अवस्था को नाम भी देते हैं 'जीवित'। हम कहते हैं, हम क्या हैं? हम जीवित हैं। मैं जीव हूँ, मैं एक अपूर्ण जीव हूँ, इसी कारण मुझमें कामनाएँ हैं, पूर्णता होती तो कामना क्यों होती? 'मैं एक अपूर्ण जीव हूँ, मैं एक अपूर्ण जीव हूँ जिसे संसार में पूर्णता मिल जाएगी', यह मूल अज्ञान है।

तो इन्द्रियाँ फिर पूर्णता खोजने के लिए बाहर घूमती रहती हैं। इससे एक बात तो पक्की हो गयी कि मन को पूर्णता चाहिए। मन को पूर्णता न चाहिए होती तो आँखें ऐसे बाहर नहीं भटक रही होतीं। कामनाएँ हर दरवाज़े पर दस्तक नहीं दे रही होतीं। हर व्यक्ति को वस्तुओं की, व्यक्तियों की, साथियों की तलाश न होती। तो मन को पूर्णता तो चाहिए। कामनाएँ भी एक तरह से शुभ संकेत हैं। मन को कुछ चाहिए, मन को पूर्णता चाहिए। लेकिन कामनाएँ बहुत अशुभ हो जाती हैं जब मन को जो चाहिए उसको वो व्यर्थ जगह ढूँढने लगता है।

ग़लत क्योंकि व्यर्थ, ग़लत इसलिए नहीं कि कोई पाप हो गया, अपराध हो गया, कुछ अनैतिक कर दिया। इसलिए क्योंकि वहाँ मिलेगा नहीं। ठीक? और जब तक मन बाहर खोजता रहता है तब तक मन का यह आग्रह अक्षुण्ण रहता है कि मैं तो अधूरा ही हूँ। क्योंकि बाहर खोजोगे, मिलेगा नहीं तो अधूरे बने ही रह जाओगे। जितने अधूरे बने रह जाते हो उतना बाहर और खोजते हो। बाहर की खोज अधूरा बने रहने में सहायक हो जाती है।

वो मूल अज्ञान जब हटता है तो इन्द्रियों के पास कोई वजह नहीं बचती संसार की ओर लालायित हो देखने की या सुनने की या छूने की। आँखें फिर बस देखती हैं, खोजती नहीं। अन्तर समझ रहे हो? आँखें फिर बस देखती हैं, खोजती नहीं। अंग्रेज़ी में यह ज़्यादा सटीकता से भी अभिव्यक्त होता है — 'द आइज जस्ट लुक, दे डोंट लुक फॉर' (आँखें फिर बस देखती हैं, खोजती नहीं)।

बस देख रहे हैं, ऐसा नहीं है कि कोई आस है इसलिए देख रहे हैं। दरवाज़ा है, देख लिया, दरवाज़े की ओर इसलिए नहीं देखा कि आस है कि अभी कोई खटखटाएगा, द्वार खुलेगा और कोई विशेष व्यक्ति प्रवेश करेगा। ऐसी कोई आस नहीं।

पूर्णता की आस ही अपूर्णता का सम्बल बन जाती है। आत्मज्ञान का अर्थ है आप जान गये कि मन को जो चाहिए वो संसार में नहीं मिलना। आत्मज्ञान का अर्थ है आप जान गये कि मन को जो चाहिए वो पाने से नहीं मिलता, वो गँवाने से मिलता है। आत्मज्ञान का अर्थ है कि मन को जो चाहिए वो मन के भीतर ही है, मन को दिख नहीं रहा है। आत्मज्ञान का अर्थ है यह जानना कि आपको कुछ त्यागना है अपने भीतर से, बाहर कुछ पाना है नहीं। अब इन्द्रियों के पास कारण क्या बचा कि वो अभी भी बौरायी सी, इधर-उधर भटकती रहें। इन्द्रियों में मन भी सम्मिलित है, मन को भी इन्द्रिय मानिएगा। तो ये सब फिर वापस आ जाते हैं, इनकी छटपटाहट बन्द हो जाती है। आँखों में अब रिक्तता और बेबसी का भाव नहीं रहता।

आप रमण महर्षि का कोई चित्र देखिएगा, उनकी आँखों में कुछ नहीं है। हमारी आँखों में जो होता है जिसको हम अपना व्यक्तित्व बोलते हैं, जिसे हम अपनी विशेषता बोलते हैं, वो वास्तव में हमारी कामनाओं का प्रतिबिम्ब होता है। आपको उनकी आँखों में वो नहीं दिखाई देगा, कुछ नहीं है वहाँ। हमारे पास कृष्णों और कबीरों के भी यदि चित्र, वास्तविक चित्र उपलब्ध होते तो उनकी आँखों में भी आपको बस एक निर्दोष पूर्णता दिखाई देती। ये है इन्द्रियों का वापस आ जाना।

और एक बार इन्द्रियाँ वापस आ गयीं तो जैसे कृष्ण कहते हैं, आगे कहेंगे, 'व्यक्ति निर्मल इन्द्रिय हो जाता है।' क्योंकि इन्द्रियाँ अब बाहर का कचरा भीतर लाकर स्थापित करने के लिए नहीं हैं। बाहर का मल भीतर बैठाने का काम अब इन्द्रियों का नहीं बचा, अब वो कुछ भी भीतर नहीं बैठाना चाहतीं।

मैंने आपकी ओर देखा। मैंने आपकी ओर देखा, आप मेरे भीतर बैठ नहीं गये। जो भीतर बैठ जाए उसको ही मल कहते हैं। इन्द्रियों को भीतर खींच लेने का अर्थ है कि आँखें अब बस देखती हैं, बैठा नहीं लेतीं। जैसे समझ लीजिए कि दर्पण हो, अभी ऐसे कर रखा है उसको (हथेली की सहायता से समझाते हुए), तो उसमें क्या दिखाई देगा? इधर को उसका चेहरा उसमें आप दिखाई देंगे, उसको मैं ज़रा सा पलट दूँगा तो आप दिखाई देंगे, उसको ज़रा सा पलट दूँगा तो आप दिखाई देंगे (भिन्न-भिन्न श्रोताओं की ओर इंगित करते हुए)। उसमें कोई भी बैठ नहीं गया। दिखता उसमें सबकुछ एकदम साफ़-साफ़ है, पर बैठ उसमें कोई नहीं जाता। यह है इन्द्रियों का भीतर आ जाना, या निर्मल इन्द्रिय हो जाना, या इन्द्रजीत हो जाना। ये सब एक ही बातें हैं।

कचरा भीतर नहीं लाना है, बस देखना है। जिसको देखा है उससे तादात्म्य करने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। अब सब साफ़ दिखता है। और जब आशय ही होता है सम्बन्ध बैठाने से, बाहर की चीज़ को भीतर ले आने से, तब साफ़ कुछ दिखता ही नहीं, तब जीव भ्रमित रहता है। जिससे आपका कोई नाता होगा, कोई स्वार्थ होगा उसको आप कभी साफ़ समझ पाएँगे ही नहीं, कुछ दिखाई नहीं देगा क्योंकि आपकी इन्द्रिय उधर देख ही नहीं पा रही है साफ़-साफ़। जहाँ स्वार्थ या मोह होता है वहाँ स्पष्टता विलुप्त हो जाती है।

एक बात पर, उदाहरण के लिए, ग़ौर करिएगा। आपके लिए कोई बहुत महत्वपूर्ण होगा, बहुत महत्वपूर्ण होगा, आपके पड़ोसी के लिए वो कितना महत्वपूर्ण होता है? वो आपके जीवन का राजा होता है, रानी होता है। आपके पड़ोसी के लिए उसका क्या महत्व है, कोई महत्व है? उसी व्यक्ति से जब आपका सम्बन्ध टूट जाता है तो आपको शुरू में तो बहुत दर्द रहता है। धीरे-धीरे कुछ सालों बाद जब आप उस दर्द से उबरते हो तो आपको दिखाई देता है कि वो जो व्यक्ति था वो बहुत ही साधारण व्यक्ति था। उसको राजा या रानी तो बस आपने बना रखा था अन्यथा उस व्यक्ति में कोई खूबी, कोई ख़ासियत थी ही नहीं। ठीक? लेकिन यह बात तब तक नहीं समझ में आती जब तक सम्बन्ध है, जब तक मोह है। जिससे मोह है वो बहुत विशेष लगने लगता है, होता उसमें कुछ नहीं है। समझ में आ रही है बात?

स्थितप्रज्ञ, जिसकी बुद्धि ऐसी हो गयी है कि ग़लत जगह पर आश्रय नहीं खोजती, वो स्थितप्रज्ञ है। कल्पना करिए कि आप किसी दुकान के सामने खड़े हुए हैं और वहाँ पर एक पुतला रखा है, एक मैनिक्विन और उसने एक बहुत आकर्षक सी पोशाक पहन रखी है, और आप शीशे के दूसरी तरफ़ खड़े हुए हैं और आप उस मैनिक्विन को देख रहे हैं। उस क्षण में देखिए कि आपकी आँखें कैसी होती हैं? क्या आप देख पा रहे हैं? देखिए, अभी देखिए। कैसी होती हैं आपकी आँखें? अच्छा, स्वयं को नहीं देख पा रहे। आपके बच्चे होंगे, आपका बच्चा खड़ा हुआ है एक पेस्ट्री शॉप पर, वहाँ पेस्ट्री रखी हैं शीशे के पीछे और वो खड़ा होकर के पेस्ट्री को देख रहा है, उसकी आँखें कैसी होती हैं, कैसी होती हैं?

प्र: कि वो चीज़ मुझे मिल जाए।

आचार्य: हम वैसी आँखें लेकर पूरी ज़िन्दगी चलते हैं, हमें पता भी नहीं होता। इसीलिए अपनी कल्पना करना थोड़ा मुश्किल है, किसी दूसरे को देख पाना फिर भी थोड़ा आसान है। हमारी वैसी आँखें सदा रहती हैं और चूँकि वैसी आँखें सिर्फ़ हमारी ही नहीं होती, हमारे इर्द-गिर्द सभी की होती हैं तो हमको लगता है कि आँखें तो ऐसी होती ही हैं। आँखें जब तक वैसी हैं तब तक आपका चित्त रुग्ण रहेगा, हम रोगी हैं।

आध्यात्मिक व्यक्ति की आँखें बदल जाती हैं। लगभग मुर्दे जैसी हो जाती हैं उसकी आँखें। घबराइएगा नहीं, मर नहीं जाता। हमें उसकी आँखें मुर्दे जैसी इसलिए लगती हैं क्योंकि हमने कामना को ही जीवन मान रखा है। तो जब हम किसी की आँखों में कामना देखते हैं तो हम कह देते हैं जीवित है। उसकी आँखों में आपको कामना मिलेगी नहीं। वो भी बेबस हो जाता है, वो अपने चेहरे पर कामना दर्शा सकता है। कई बार आवश्यकता होती है तो अभिनय के नाते सही, वो चेहरे पर कामना दर्शा सकता है, वो अपनी वाणी में क्रोध दर्शा सकता है। लेकिन वो भी विवश होता है कि वो चाहकर भी अपनी आँखों में कामना नहीं ला पाएगा। इन्द्रियों में आँखें थोड़ा विशेष होती हैं। आप उसको पकड़ सकते हो, वो धोखाधड़ी कर नहीं पाएगा। वो यह दिखा भी रहा होगा कि उसे लालच आ रहा है या मोह आ रहा है या वासना आ रही है, आप उसकी आँखों में देखोगे, वहाँ आपको कुछ दिखाई नहीं देगा, खाली है। वो भ्रम पीछे छूट गया, पूरा ही टूट गया कि कहीं कुछ मिल जाना है। वो जो इकाई बैठी थी भीतर जो पाने को बिलकुल लालायित थी वो इकाई अब अपने ऊपर ही हँसती है और मस्त है।

अब जो जगत से सम्बन्ध बनते हैं वो ज़बरदस्त बनते हैं। न आपको किसी पर हिंसा करनी है, न किसी को अपने ऊपर चढ़ने देना है। न आपको किसी की कामना का शिकार होना है, न किसी के प्रति कामना रखनी है। दूसरे से सम्बन्ध रखना भी है तो शुभेच्छा का, 'हाँ, मुझे सरोकार है तुझसे, तेरी बेहतरी चाहता हूँ, अपने लिए नहीं, तेरे लिए।'

समझ में आ रही है बात ये?

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्ज रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ।।

इन्द्रियों को विषय भोग से हटा लेने से भी शब्दादि विषय दूर हो जाते हैं सही, किन्तु रस या आसक्ति तो रह ही जाती है। स्थितप्रज्ञ का यह रस भी निवृत्त हो जाता है।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ५९

"इन्द्रियों को विषय भोग से हटा लेने से भी शब्दादि विषय दूर हो जाते हैं सही, किन्तु रस या आसक्ति तो रह ही जाती है। स्थितप्रज्ञ का यह रस भी निवृत हो जाता है।" अगर अभी समझे नहीं हो, अगर आत्मज्ञान नहीं है, तो इतना अनुशासन या अंकुश अपने ऊपर कर सकते हो कि भोगों से इन्द्रियों को जबरन खींच लो। वो तुम कर सकते हो लेकिन भीतर मोह, आसक्ति ये सब तो बचे ही रह जाएँगे।

स्थितप्रज्ञ वो है जिसे अब ज़बरदस्ती नहीं करनी पड़ती, जिसे अनुशासन नहीं रखना पड़ता, जिसे श्रम नहीं करना है। जिसके लिए सहज है, जो कर्तव्य के नाते नहीं कर रहा, जिसे करना ही नहीं पड़ रहा, जिसका स्वयं हुआ जा रहा है। जिससे पूछो यदि कि क्या आपकी इन्द्रियाँ अभी कछुए की भाँति अपने खोल में आ गयीं, तो वो चौंक सा जाए, अवाक् हो, उसको कुछ कहते न बने क्योंकि उसने ऐसा सोचा ही नहीं कि क्या उसकी इन्द्रियाँ अभी अन्तर्मुखी हो गयी हैं। उसने ऐसा सोचा नहीं, बिना सोचे ही वो कछुए जैसा हो गया है। ऐसा होता है स्थितप्रज्ञ, विवश एक तरीक़े से।

उसको आप अगर कहोगे कि चलो लालच करते हैं, वो कर पाएगा ही नहीं। वो स्वयं को यह समझा ही नहीं पाएगा कि यह सही कैसे हो सकता है। उसके तर्क अब उसके ऊपर ही चलने बन्द हो गये हैं। उसने अपनी कमान किसी ऐसी जगह पर दे दी है जिसके आगे ख़ुद उसकी ही नहीं चलती। ये स्थितप्रज्ञ है। अडिग, ऐसा अडिग हुआ है कि अब स्वयं चाहे तो भी नहीं डिग सकता।

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।।

हे कुन्तीपुत्र अर्जुन, निश्चय ही बलवान इन्द्रियाँ यत्नशील विवेकी पुरुष के भी मन का बलात् हरण कर लेती हैं।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६०

'हे कुन्तीपुत्र अर्जुन, निश्चय ही बलवान इन्द्रियाँ यत्नशील विवेकी पुरुष के भी मन का बलात् हरण कर लेती हैं।' इन्द्रियाँ मन का हरण कर लेती हैं। ऐसे ही मन का हरण कर लेती हैं, जिसने इन्द्रियों को उलझे-उलझे, आदेश दे रखे हों। इन्द्रियाँ तो मन की छाया हैं न, मन जैसा होता है इन्द्रियाँ वैसी ही दिशा में चलती हैं। मन यदि कामनाग्रस्त है तो इन्द्रियाँ कामना के विषय की ओर भागेंगी बार-बार। उदाहरण के लिए, आपके मन में यदि बड़ा अनुराग है, मोह है, छोटे बच्चों के लिए तो आप यदि यहाँ बैठे हों, मेरी जगह पर, जहाँ मैं हूँ, तो यहाँ से आपकी आँखें लगातार क्या तलाश रही होंगी? कि यहाँ इधर कोई छोटा बच्चा बैठा है क्या। यह आँखों ने थोड़े ही करा, यह किसने करवाया? मन ने करा।

समझ में आ रही है बात?

तो मन में जब विवेक नहीं होता तो इन्द्रियाँ, आपकी पूरी देह, आपकी पूरी ज़िन्दगी बौरायी-बौरायी सी चलती है। एक बहुत स्पष्ट सा भटकाव परिलक्षित होता है। वो आपकी चाल में भी दिख जाएगा, आपके शब्दों में दिख जाएगा, आपके भाषा संयम में दिख जाएगा, शब्दों के चयन में दिख जाएगा, बोलने की आपकी गति में दिख जाएगा। रेडियो पर यह जो 'आरजे' आते हैं, देखो कि इनकी वाणी कैसे असंयमित, असंतुलित रहती है। शब्द ही दिखते हैं कि यहाँ से नहीं आ रहे (हृदय की ओर इशारा करते हुए), यहाँ से कहीं से आ रहे हैं (गले की ओर इशारा करते हुए)। और जल्दी-जल्दी बोलते हैं। हालाँकि वो चीज़ आज के समय में कूल होने की पहचान भी बन गयी है, खट-खट-खट बोलते जाओ।

स्थितप्रज्ञ के लिए यह मुश्किल हो जाएगा। वो चेतना के एक बिन्दु पर बैठा है, वहाँ से कुछ काम अब करे ही नहीं जाते, कोशिश भी करें तो भी नहीं। आप उससे कहें, ‘धाराप्रवाह बकवास करो,' वो कर नहीं पाएगा। आप उससे कहें, 'तीन मिनट दिये जा रहे हैं, जो बात बोलनी है बोल दो', उसको अड़चन हो जाएगी। आप उसको कहें, 'जो बोलना है इन सीमाओं के मध्य रहकर बोलो', उसको तकलीफ़ हो जाएगी। कर ले फिर भी शायद, पर अड़चन के साथ करेगा। क्यों? क्योंकि उसकी इन्द्रियाँ अब उसकी नहीं हैं। इन्द्रियाँ यदि मन की होती तो मन के कहे अनुसार चल ही देती आड़ा-तिरछा कुछ भी, उसकी इन्द्रियाँ अब किसी और की हो गयी हैं।

ये सब चुपचाप होता है। सोचने मत लग जाइएगा कि मैं कौनसी जुगत लगाऊँ कि मेरे साथ भी हो जाए। यह चुपचाप होता है, बाद में कभी लक्षण जब आते हैं तो आपको भी अनायास पता लगेगा कि कुछ बदला है, मेरे चेहरे में ही कुछ बदल गया है। आमतौर पर दूसरे लोग बताते हैं, 'व्हाट्स रॉन्ग विथ योर फेस?' वो यह नहीं कहेंगे कि बधाई हो, वो यही पूछते हैं, ‘व्हाट्स रॉन्ग?' चाल बदल जाती है।

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः। वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।

इस कारण आत्मनिष्ठ योगी को उन इन्द्रियों को संयत करके समाहित होकर अवस्थित रहना चाहिए, क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६१

आचार्य: इन्द्रियाँ और मन साथ ही चलते हैं। और इन दोनों में पहले कौन आता है, कृष्ण समझा चुके हैं। कह रहे हैं, 'सिर्फ़ इन्द्रियों का दमन कर दिया तो भी आसक्ति तो भीतर रह ही जाएगी।' मन को ऐसा कर लो कि इन्द्रियाँ इधर-उधर भटके नहीं। और चूँकि काम मन पर होना है इसलिए इन्द्रियों को मन का सहयोगी बना दो। हमें पता है कि मन प्रभावित होने के लिए लगातार तैयार है। मन एक रोगी है जो बाहर की हवा से प्रभावित होने को लगातार तैयार है। ठीक?

मन एक ऐसा रोगी है जिसका रोग ही यही है कि उसने उल्टा-पुल्टा खा लिया है लेकिन फिर भी वो बाहर का खाना खाने को लगातार आतुर है। काम हमें इस रोगी पर करना है। ज़रूरी है कि उसे परहेज़ कराया जाए, बाहर की हवा, बाहर के खान-पान से बचाया जाए। बाहर का माल उसको लाकर कौन देता है? मन को बाहर का माल लाकर कौन देता है? इन्द्रियाँ। अब इस कारण इन्द्रियों पर अंकुश रखना आवश्यक हो जाता है।

ये भेद समझिएगा साफ़-साफ़। इन्द्रिय-संयम इसलिए नहीं करना कि इन्द्रिय-संयम करके काम चल जाएगा। कृष्ण साफ़ समझाते हैं कि इन्द्रिय-संयम के बाद भी मन की मूल वृत्ति तो आसक्ति की ही रहेगी न। लेकिन इन्द्रिय-संयम फिर भी आवश्यक है क्योंकि काम भले ही इन्द्रियों पर न करना हो मूलभूत रूप से, मन पर करना हो, लेकिन मन पर काम करने के लिए भी ज़रूरी है कि उसको इन्द्रियों द्वारा लाये गए रोगों से सुरक्षित रखा जाए।

आप जानते तो हो कि कुछ देख लेते हो उल्टा-पुल्टा तो उसका मन पर क्या प्रभाव पड़ता है, नहीं जानते क्या? काम आँखों पर नहीं करना है, स्पष्ट रखिए! काम किस पर करना है? मन पर। और मन तो वैसे ही रोगी है और दुर्बल है, उस पर बाहर से कोई झटका आता है, बिलकुल छप जाता है। तो क्यों उसको झटके दिलवाये जाएँ। इसलिए फिर इन्द्रिय-संयम आवश्यक हो जाता है।

इन्द्रिय-संयम का मतलब क्या होता है? मतलब होता है ईमानदारी। मतलब होता है कि जानते तो हो अपनी हक़ीक़त, पता तो है कि फ़लानी जगह चले जाते हो तो तुम्हारी क्या हालत होती है, तो मत जाओ न वहाँ पर। तुम इतने मज़बूत नहीं हो कि वहाँ चले भी जाओगे और फिर भी अप्रभावित लौट आओगे। वहाँ अगर जाओगे तो गन्दे होकर ही वापस आओगे तो वहाँ जाओ मत, इसको बोलते हैं इन्द्रिय-संयम।

इन्द्रिय-संयम आँखों पर होता है, कि मत देखो उधर जिधर देखने से मन गन्दा होता है। और टाँगों पर होता है, कि मत जाओ वहाँ जहाँ पता है कि गन्दे कर दिये जाओगे। हाँ, तुम्हें भरोसा हो पूरा कि वहाँ जाकर भी गन्दे नहीं होओगे तो चले जाओ। पर सच-सच बताना इतने मज़बूत हो तुम? अगर हो तो बेशक चले जाओ, अगर नहीं हो तो अपने पर कृपा करो, अपनेआप को बचाओ। जब भीतरी मज़बूती बहुत बढ़ जाएगी तब निर्द्वन्द्व होकर जहाँ जाना हो चले जाना। जब तक उतने मज़बूत नहीं हो तब तक उल्टा सुनो मत, बुरा देखो मत, ग़लत संगत करो मत।

समझ में आ रही है बात?

तो इन्द्रियाँ मन के ही पीछे-पीछे चलती हैं, बिलकुल ठीक, लेकिन यदि मन भ्रष्ट हो गया है तो मन ने इन्द्रियों को शिक्षा दे दी है सब भ्रष्ट जगहों पर ही जाने की, है न? अब अगर मन को सुधारना है तो इन्द्रियों को जो यह आदेश पहले से मिला हुआ है उस आदेश को तोड़ना पड़ेगा इसीलिए इन्द्रिय-संयम भी आवश्यक हो जाता है।

अपने यथार्थ से सदा परिचित रहा करिए। कुत्सित जगहों पर यह कहकर मत पहुँच जाया करिए कि हम तो बस उत्सुकता के लिए आये हैं। 'पीने नहीं आये, देखने आये हैं। दिखाना भाई, थोड़ी सी कोकिन, कैसी होती है? नहीं, सिर्फ़ उत्सुकता है, देखेंगे। बस देखने के लिए आये हैं।' ये किसको छल रहे हैं हम?

"जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित हैं", इसका मतलब यह नहीं है कि इन्द्रियों को वश में कर लेने से सीधे-सीधे ही प्रज्ञा प्रतिष्ठित हो जाएगी। इसका अर्थ यह है कि इन्द्रियों को वश में करोगे तब जाकर के न मन वश में आएगा! मन को वश में करना है और इन्द्रियाँ बाहर से तमाम तरह के दूषणों की आपूर्ति करे ही जा रही है तो मन ठीक कैसे होगा?

स्पष्ट है ये?

बासठवाँ, तिरसठवाँ श्लोक —

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।। क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।।

विषयों को सोचते रहने से मनुष्य की उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है, आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध, क्रोध से मोह, मोह से स्मृति का लोप और स्मृति नाश से विचार-बुद्धि का नाश और बुद्धि के नष्ट होने पर तो मनुष्य ही नष्ट हो जाता है।

~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक ६३)

व्यर्थ विचार से आसक्ति आती है, आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध, क्रोध से मोह, मोह से अस्मृति। स्मृति जब गयी तो विचारणा गयी, विचारणा गयी तो बुद्धि गयी, बुद्धि गयी तो मनुष्य गया। यह इतना श्रृंखलाबद्ध करके जो कुल बताया गया है उसके आरम्भ में ही क्या है? व्यर्थ विषयों का विचार। जिसका विचार करोगे उससे आसक्ति होगी, आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध। कामना से क्रोध क्यों होगा? कामना पूरी तो होगी नहीं तो क्रोध नहीं आएगा तो क्या आएगा? शुरुआत में ही क्या है? व्यर्थ विषयों का विचार।

अब यहाँ से समझ में आएगा कि क्यों मैं बार-बार आग्रह करता रहता हूँ कि जीवन में सही उद्देश्य पकड़ो और उसमें आकंठ डूब जाओ। क्योंकि ये जो पूरी कड़ियों की श्रृंखला है इसके आरम्भ में ही क्या है? व्यर्थ विषयों क विचार। अपनेआप को इतनी मोहलत मत दो। और मन इस प्रवृत्ति के साथ पैदा ही होता है कि उसे व्यर्थ का ही विचार करना है।

एक बहुत अंकुर रूप में बच्चे विचार करना कुछ महीनों की उम्र से ही आरम्भ कर देते हैं। उनके भी विचार शुरू हो जाते हैं। उससे पहले उनके पास बस भीतरी आवेग होते हैं, इंस्टिंक्ट्स। फिर उनमें भी विचार बनने लगते हैं। जैसे-जैसे वो ध्वनियों से परिचित होते जाते हैं वैसे-वैसे विचार भी उनके मन में एक बहुत आरम्भिक, रूडीमेंटरी फॉर्म में बनने आरम्भ हो जाते हैं। आपको क्या लगता है, वो क्या विचार कर रहे होंगे? उनके विचार बड़े लोगों की तरह स्पष्ट नहीं होते, पर फिर भी उनके मन में क्या विचार उठता होगा?

और अभी उसको समाज से, दुनिया से बहुत प्रशिक्षण नहीं मिला है फिर भी उसके भीतर जो चल रहा है वो क्या है? हाथ बढ़ाना है खिलौने की ओर, 'किसी चीज़ को छू लूँ, इसमें क्या चल रहा है, दूध कहाँ से मिल जाए, कोई आसपास नहीं है, शोर मचाना है।' या राम का विचार चल रहा है?

तो हम ऐसी व्यवस्था लेकर पैदा होते हैं जिसमें विचार रहेगा ही व्यर्थ। व्यर्थ का ही विचार आना है। राम का विचार आने लगे इसके लिए तो श्रम करना पड़ता है, अनुशासन रखना पड़ता है। व्यर्थ का विचार अपनेआप आता है, अपनेआप। कोई आपसे कुछ न बोले, आपको जंगल में छोड़ दिया जाए बचपन से, किसी ने आपको आकर के भ्रष्ट नहीं करा है। तो भी वहाँ आप कोई व्यर्थ विचार ही कर रहे होंगे। यह रोग लेकर पैदा हुए हैं तो इसलिए ज़रूरी है कि कुछ ऐसा पकड़ लिया जाए जो आपको फ़ुर्सत न दें व्यर्थ का विचार करने की।

स्वयं को ही जैसे झाँसा देना आवश्यक हो, स्वयं को ही जैसे एक प्यारे बन्धन में डालना बहुत ज़रूरी हो। अपनेआप को सही बन्धन में नहीं डालोगे तो वो जो दूसरा बन्धन है वो तो पहले से तैयार खड़ा है, कौनसा बन्धन? भव-बन्धन, इसका (शरीर की ओर इशारा करते हुए)। देह का बन्धन तैयार खड़ा है। तो यह तो मज़ेदार बात निकल आयी, मुक्ति का अर्थ है अपनेआप को सही बन्धन में डाल देना। यही अर्थ है, यही विधि। क्योंकि मनुष्य होने का अर्थ ही है लगातार बन्धनों के मध्य ही गति करना।

जब रहना बन्धनों में ही है तो मुक्ति भी बन्धनों से ही मिलेगी, आप सही बन्धन का चयन करिए। सही बन्धन फिर कहलाता है आत्म-अनुशासन। व्यर्थ बन्धन क्या कहलाता है? आत्म-प्रवंचना। प्रकृति के बन्धन में फँसे हुए हो, यह व्यर्थ बन्धन है। आत्मा को अनुमति दो कि वो तुम्हें बाँध ले, उसके सामने विवश हो जाओ, यह आत्म-अनुशासन है। चिढ़ मचेगी, बुरा लगेगा क्योंकि वो दूसरा वाला जो है वो आवाज़ें देगा, पुकारेगा। और तुमको लगेगा यह कौनसी जगह फँस गये, यह हमने अपने लिए कौनसा कर्तव्य चुन लिया!

लेकिन अब चुन लिया तो चुन लिया। कुछ ऐसा चुनो जिससे किसी तरह की रिहाई की कोई गुंजाइश ही न हो। जैसे अपनेआप को बेड़ियों में बाँध लिया हो, फिर उसमें लगा दिया ताला और चाभी दी नदी में फेंक। आप चाहो भी तो छूट नहीं सकते।

असल में जो लोग भीतरी तौर पर प्रगति करते हैं और जो नहीं करते उनमें मूलभूत अन्तर यही होता है। इसको समझिएगा। भीतर से प्रगति वही कर पाते हैं जो अपनेआप को निर्विकल्प कर देते हैं, जिन्होंने चाभी पोखर में फेंक दी होती है। जिन्होंने चाभी अभी अपने पास रखी है, उन्होंने विकल्प अपने पास रखा है। विकल्प क्या रखा है? कभी अगर हमें लगेगा तो हम इस बन्धन से अपनेआप को आज़ाद कर लेंगे, उधर को चले जाएँगे। जिन्होंने अभी अपनेआप को निर्विकल्प नहीं करा, वो बेचारे दूनी मार खा रहे हैं।

उस तरफ़ के बन्धनों में कम-से-कम कुछ तात्कालिक सुख तो मिलता है। प्रकृति बहुत पीटती है, बहुत पीटती है पर बीच-बीच में शहद भी चटाती है। चटाती है या नहीं चटाती है? सबने चाटा है मधु, या नहीं चाटा? तो मधु से तो वंचित हो गये। और इधर जो आनन्द और मुक्ति का लाभ मिलना था वो भी नहीं पाओगे, क्योंकि यहाँ वो तभी मिलता है जब अपनेआप को कर दो विकल्प-शून्य। अगर अभी भाग निकलने का चोर दरवाज़ा खुला रखा है तो कुछ मिलेगा नहीं। तो उन पर दया सी आती है मुझको, जो कृष्ण के साथ होते भी हैं और साथ-ही-साथ कहीं-न-कहीं उन्होंने यह विकल्प बचाकर रखा होता है कि अगर ज़रूरत पड़ेगी तो दूसरी तरफ़ को भाग जाएँगे।

मेरे साथ भी जो लोग आये हैं, चाहे संस्था में या किसी और तरीक़े से उसमें यही दो लोग रहे हैं, आज भी वैसे ही हैं। एक वो हैं जो निर्विकल्प हो चुके हैं, जिन्हें भविष्य का अपने कुछ पता ही नहीं। दूसरे वो हैं जिन्होंने कई दरवाज़े अभी खुले रखे हुए हैं। जो निर्विकल्प हो चुके हैं वो असुरक्षा में जिएँगे, लेकिन शायद कहीं पहुँच जाएँगे। जो दरवाज़े खुले रख रहे हैं, उनके साथ मुझे सहानुभूति रहती है क्योंकि उन्हें कुछ नहीं मिलेगा।

समझ में आ रही है बात?

देखो, यह महीन मसला होता है। ख़ूब इस्तेमाल करना चाहिए बुद्धि का, विवेक का। लेकिन बुद्धि और विवेक को सही कर्म के आड़े नहीं आने देना चाहिए। कोई नहीं कह रहा कि मुक्ति के नाम पर कोई भी उल्टा-पुल्टा बन्धन उठाकर अपनेआप को बाँध लो। खूब जाॅंच लो, खूब परख लो लेकिन यह नहीं कर सकते न कि आजन्म जाॅंचते-परखते रह जाओ।

एक बिन्दु तो धीरे-धीरे ऐसा आना आवश्यक है जिसके बाद तुम कहो कि अब जाॅंचने-परखने की ज़रूरत बची नहीं है। अभी भी जाॅंचते-परखते रह गये तो सावधानी से ज़्यादा नुक़सान हो जाएगा। एक बिन्दु ऐसा आना चाहिए जब सुरक्षा और सावधानी का आपका आग्रह लगभग शून्य हो जाए। जहाँ आपको जितना जाॅंचना था जाॅंच लिया।

हम नहीं कह सकते कि हम शत-प्रतिशत आश्वस्त हैं, शून्य-दशमलव-शून्य-शून्य-शून्य-शून्य-एक प्रतिशत सन्देह हो सकता है बचा हो लेकिन उतने से सन्देह के लिए हम बहुत बड़ा नुक़सान अपना नहीं कराएँगे। उतने से सन्देह के कारण अगर हमने गोता ही मारने से मना कर दिया, अगर हमने गहरे डूबने से ही इनकार कर दिया, हम अपना सन्देह ही पकड़े रह गये, सावधानी, सुरक्षा के सरोकारों से कभी ऊपर ही नहीं उठ पाये, तो कुछ पाएँगे नहीं।

समझ में आ रही है बात?

एक बिन्दु आना चाहिए जहाँ ये जो पूरी श्रृंखला कृष्ण बता रहे हैं इसकी शुरुआत ही न होने पाये। एक बिन्दु ऐसा होना चाहिए जिसके बाद आप सुरक्षा का विचार ही छोड़ दो ताकि जो आसक्ति उत्पन्न होती है विषयों को सोचते रहने से, उसकी नौबत ही न आये।

एक बात होती है कि सोचा, सोचा, सोचा और सोच-समझकर किसी बात को अस्वीकार कर दिया। उससे आगे जाना है‌। वहाँ पहुँच जाना है जहाँ अब सोचने की ज़रूरत नहीं है। सोच को उस पूर्णता तक ले आये हैं कि जिसके बाद अब और सोचना अनावश्यक हो गया है। सोच को वहाँ तक ले आये हैं, जिसके बाद अगर और सोचा तो यह सोच की बेईमानी हो जाएगी।

ट्रेन छूट रही है और आप दौड़ रहे हो प्लेटफॉर्म पर। आप ही की ओर आ रही है प्लेटफॉर्म पर, ठीक है? आप इंजन की ओर से जा रहे थे प्लेटफार्म पर। और ट्रेन छूट रही है, ट्रेन चल रही है और आप दौड़ लगा रहे हो। बहुत तेज़ दौड़ना ज़रूरी है न, ट्रेन चल चुकी है, आपका डब्बा पीछे की तरफ़ है। आप दौड़ रहे हो, दौड़ना बहुत ज़रूरी है। आप इतनी तेज़ दौड़े, इतनी तेज़ दौड़े कि डब्बे के पार निकल गये। एक बिन्दु ऐसा आना चाहिए जहाँ और सोचना, सोचने के साथ ही बेईमानी बन जाए, कि और अगर सोचा तो ग़लत हो जाएगा। अब अगर सुरक्षा की और ख़्वाहिश रखी तो यही बात हमें असुरक्षित कर देगी।

जीवन लगातार एक ख़तरा तो है ही, जब ख़तरा उठाना ही है तो चलो इस बार सत्य और श्रद्धा के पक्ष में उठा लेते हैं। बुरे-से-बुरा क्या होगा? बुरे-से-बुरा क्या होगा? धोखा मिलेगा! तो ज़िन्दगीभर जो करते रहे उसमें नहीं मिला है क्या? (मुस्कुराते हुए)

ज़िन्दगीभर सौ धोखे खाये। झूठ का खेल खेलकर और अश्रद्धा की चाल चलकर उधर भी तो धोखे खूब खाये हैं न! चलो एक बार सच्चाई के साथ चलकर देख लेते हैं। एक बार श्रद्धा को भी आज़मा लेते हैं। धोखा ही तो मिलेगा। तो नया क्या मिलेगा? एक बार और खा लेंगे। एक बार असुरक्षित होकर भी देख लेते हैं, एक बार चाबी नदी में फेंककर भी आज़मा लेते हैं।

समझ में आ रही है बात?

आवश्यक नहीं है कि भीतरी भावों और आवेगों का क्रम उसी प्रकार हो जैसा इस श्लोक में उल्लिखित है। श्लोक कहता है कि कामना से क्रोध आता है, क्रोध से मोह आता है। आवश्यक नहीं है कि वो इसी क्रम में आये, क्रम थोड़ा आगे-पीछे भी हो सकता है। जो बहुत उल्लेखनीय बात है वो यह है कि यह सबकुछ शुरू होता है व्यर्थ चिन्तन से। और व्यर्थ चिन्तन वही करता है जो खाली बैठा है।

तो अच्छे से मुट्ठी भींचकर के सूत्र पकड़ लीजिए। सही काम में ऐसा डूबिए कि बौखला जाएँ आप, साँस लेने और पानी पीने की फ़ुर्सत न बचे। थोड़ा सा भी आपने अपनेआप को फ़ुर्सत दी कि अपना नाश ही करेंगे। आपका सबसे बड़ा दुश्मन आपका खाली समय है। और दिक्क़त यह है कि हम सोचते हैं कि हमने बड़ी तरक़्क़ी और उपलब्धि कर ली अगर अब हमें खाली समय मिलने लगा है।

हम दो काम करते हैं, या तो कोई व्यर्थ काम या खाली समय में व्यर्थ काम की तैयारी। और जब आप व्यर्थ काम कर रहे होते हो तब तो कुछ बुरा है ही, जब खाली समय मिलता है तो उसमें जितना व्यर्थ काम कर रहे होते हो, उससे दो क़दम और आगे के व्यर्थ काम की तैयारी करते हो। तो इसलिए खाली समय और बुरा है।

जो चार रुपये की बेईमानी करता हो, मान लो वो आठ घंटे चार रुपये की बेईमानी करने में व्यस्त है पूरा। और उसको तुम चार घंटे फिर खाली दे दो तो क्या करेगा चार घंटे में? वो अस्सी रुपये की बेईमानी की तैयारी करेगा। तो खाली समय तो बेईमान समय से भी ज़्यादा ख़तरनाक है।

समझ में आ रही है बात?

ज़िन्दगी आपको फ़ुर्सत देकर लूटती है। सेवा में जीना सीखो। मालिक बनना चाहते हो तो नौकर की तरह जियो। मतलब समझ रहे हैं? नौकर को फ़ुर्सत मिलती है? वो वाला नौकर बन जाओ जिसकी चौबीस घंटे की ड्यूटी होती है, फ़ुर्सत ही नहीं है। चिढ़ोगे, दूसरों से तुलना करोगे तो ईर्ष्या आएगी। पर अगर निर्विकल्प हो गये हो तो समझ जाओगे कि अब यही है, इसी को चुन लिया। फिर धीरे-धीरे मज़ा आने लगता है।

कभी फिर किसी दोपहर अचानक से पहली बार समझ में भी आएगा कि इसी को तो कहीं आनन्द नहीं बोलते! जान ख़राब रहती है सुबह से लेकर रात तक लेकिन फिर भी अब छोड़ने वाली कोई बात बची नहीं, कहीं इसी को तो आनन्द नहीं बोलते! और जिस दोपहर ऐसा ख़याल आएगा, जानते हो क्या होगा? थोड़े से लजा जाओगे। जैसे अभी-अभी पता चला हो कि प्रेम में हो, ब्लशिंग। कई बार नहीं पता चलता न, अपना कोई दोस्त होता है उससे बड़ा अपना प्रगाढ़ रिश्ता होता है। फिर एक दिन अचानक पता चलता है कि दोस्ती नहीं है, इससे तो दिल के तार जुड़ रहे हैं, 'इज़ इट लव?'

शुरुआत हुई थी नौकर बनने से, पाया कि प्रेम हो गया है। शुरुआत ऐसे हुई थी जैसे किसी ने ज़बरदस्ती अगवा कर लिया हो तुमको और बाँध-बूँधकर तुमको निर्विकल्प कर दिया हो, फिर पाया कि अब यह छोड़ भी दे तो कहीं जाना नहीं है। 'हरि' बोलते हैं भगवत्ता को, कृष्ण को भी कहते हैं 'श्रीहरि'। जिसने अगवा कर लिया हो, जिसने हरण कर लिया हो, जो ले गया हो, उठाकर ले गया हो, बिना आपसे पूछे। आप तो चाह रहे हैं कि आप कहीं और चले जाएँ, वो आपको ले गया। आप हाथ-पाँव भी चला रहे हैं, जितनी अपनी सामर्थ्य है, मुक्के चला रहे हैं, लात-वात मार रहे हैं, जो कर सकते हैं।

जैसे छोटा बच्चा करता है न, छः फुट का बाप हो, साल-भर का बच्चा हो, वो उसको उठाये हो तो वो खूब घूसा-वूसा चलाता है। वैसे आपको उठाये लिए जा रहे हैं हरि। अपनी ओर से आप जो कर सकते हैं कर रहे हैं। और फिर एक दोपहर आती है, कि एक रात आती है जब पता चलता है कि अब उठाये ही रहो, अब उठा लिया तो छोड़ना मत, अब यहीं बैठना है, अब एक हो गये।

ये उनके लिए है जो शुरू की चिढ़ और आन्तरिक विरोध को बर्दाश्त करने के लिए तैयार हों। शुरू में तो बुरा लगेगा ही। यह समझ रहे हो न। वैसे ही जैसे बच्चा है, उसको खेलने जाना है शाम को और माँ ने पकड़ लिया कि नहीं, पढ़ाई कर। बुरा तो उसको लगता ही है, वैसे ही।

आपमें से जो लोग इस चक्कर में हों कि शास्त्र इत्यादि पढ़कर आध्यात्मिक हो जाएँगे, उनसे होगा नहीं क्योंकि फ़ुर्सत बहुत बच जाएगी न! गहराई से कर्म में डूबना पड़ता है। सिर्फ़ ज्ञान इकट्ठा करने से होता नहीं, उस ज्ञान को जीना पड़ता है। इसीलिए पोंगा-पंडितों का मज़ाक ही बना है। खूब जाने रहते हैं, जो जाने रहते हैं वो उनकी ज़िन्दगी में कहीं दिखाई दे नहीं रहा होता।

सत्य के ख़तरे उठाना सीखिए! क्या? सत्य के ख़तरे उठाना सीखिए। और जब लगे कि ज़्यादा ख़तरा है तो अपनेआप से पूछिए, 'उधर कुछ कम है क्या? उधर कुछ कम है?' एक सबसे बड़ा ख़तरा तो उधर यही है कि कोई ख़तरा नहीं भी उठाया तो मर जाएँगे। यह कैसा ख़तरा है? इसको कैसा कहेंगे, छोटा ख़तरा है या बड़ा ख़तरा है? आप ज़िन्दगी-भर कोई भी ख़तरा नहीं उठाइए तो भी आप मर जाएँगे।

जब यह हो ही जाना है कि मरना तय है, इतना बड़ा ख़तरा है जैसे सिर पर लटकती तलवार, तो थोड़ा इधर का भी ख़तरा उठाकर देख लेते हैं। चोटें तो उधर भी लगती रही हैं और एक आख़िरी चोट यमराज दे देगा। तो थोड़ा ख़तरा इधर उठाकर देख लेते हैं। उधर भी न जाने कितनों पर भरोसा करा और कितनी बार भरोसा टूटा, एक बार इधर भी भरोसा करके देख लेते हैं। नहीं?

करें! जिएँ!

जान रहे हो तो जीकर दिखाना। हम यहाँ कथा सुनने के लिए, प्रवचन करने के लिए नहीं बैठे हैं। मेरे देखे यह मज़दूरों की वर्कशाॅप (कार्यशाला) है। यहाँ हम अपने हथियार पैने करने आये हैं। यहाँ ज्ञानी नहीं तैयार होने हैं, यहाँ सैनिक तैयार होने हैं। बाहर जाकर आसन नहीं लगाना है, लड़ाइयाँ लड़नी हैं। तीन दिन का मनोरंजन थोड़े ही है!

'मोह से स्मृति-शक्ति का लोप', यह क्या बात है? फिर आगे कहा है कि स्मृति जब नहीं होती तो बुद्धि जाती है, बुद्धि जाती है तो इंसान ही चला जाता है। 'मोह से स्मृति चली जाती है', यह बात मुझे थोड़ी रोचक लग रही है। कैसे? मोह से स्मृति चली जाती है, यह क्या बात है?

प्र: पूराने धोखे भूल जाते हैं।

आचार्य: ठीक, बस इतनी सी बात, एकदम ज़मीनी बात। बस इतना सा।

कोई भी धोखा ऐसा नहीं है जो हम आज खा रहे हों और पहली बार खा रहे हों। हममें से कोई भी पहली बार नहीं मूर्ख बनाया जा रहा। क्योंकि प्रकृति बड़ी आत्मविश्वासी है, आपको ठगने के लिए उसे नयी-नयी चालें नहीं चलनी पड़ती। उसके पास दो-चार तरह की चालें हैं, बल्कि एक ही तरह की, वो उसी को बार-बार चलती रहती है। और हम बार-बार उसमें फँसते रहते हैं क्योंकि हम भूल जाते हैं कि अभी सुबह ही तो ठगे गये थे, ऐसे ही ठगे गये थे।

यदि याद भी रह जाए कि आज तक क्या झेला है तो आगे झेलने से बच जाओगे।

लगभग यही बात बुद्ध कहते हैं, कई जगहों पर, जहाँ वो सम्यक् स्मृति की बात करते हैं, ‘याद तो रखो, याद तो रखो।’ और कई धार्मिक धाराओं के ग्रन्थों में 'स्मृति' की महत्ता पर बहुत ज़ोर दिया गया है क्योंकि मन बहुत चालबाज़ होता है, जो स्मृतियाँ उसके उद्देश्यों में बाधा बन रही होती हैं उनको वो दबा देता है। जो स्मृतियाँ उसके उद्देश्यों का समर्थन कर रही होती हैं उनको वो बढ़ा लेता है।

तो किसी बात की यथार्थता का यह प्रमाण तो बिलकुल कभी मत मानिएगा कि वो बात आपको याद है क्योंकि आपको जो याद है वो याद झूठी है। मन भीतर-ही-भीतर स्मृतियों के साथ सौ तरह की चालाकियाँ कर रहा होता है। आप बिलकुल कह सकते हो कि आपने कुछ देखा, आपको याद है। पर जो आपने देखा, भीतर-ही-भीतर मन ने बिना आपसे पूछे उसमें कई तरह के अन्तरण कर दिये होते हैं। उसका कोई हिस्सा छुपा दिया होता है, कोई हिस्सा याद रखता है।

एक बार एक प्रश्न आया था, लखनऊ से कोई सज्जन थे, शायद जावेद नाम था उनका। किसी किताब में वो अध्याय होगा भी, उसका नाम है, 'जानेमन की महकती यादें'। तो उन्होंने अपनी व्यथा लिखकर भेजी थी कि मेरा ब्रेकअप हो गया है और मैं भूल ही नहीं पाता उन हसीन लम्हों को और उन खुशबुओं को और वही सब, वही सब तैरता रहता है।

उसमें मैंने पूछा था कि बेटा, कैसे हो सकता है कि वो सबकुछ जो हसीन था तुम्हें वही याद है? सबकुछ अगर हसीन था तो ब्रेकअप कैसे हो गया? बहुत सीधा सवाल नहीं है? सबकुछ अगर हसीन था तो ब्रेकअप कैसे हो गया?

माने बहुत कुछ था जो कड़वा भी था पर वो तुम याद रखना ही नहीं चाह रहे। तुम्हारी स्मृति ने उसको पीछे धकेल दिया है ताकि तुम रूमानी कल्पनाओं में गोते मारते रहो। तुम्हें यह याद ही नहीं आ रहा कि उसने तुम्हें कितनी गालियाँ दी, तुम्हें याद ही नहीं आ रहा कि इत्र की खुशबू नहीं थी, पसीने की दुर्गंध भी थी। और सब था, पर तुम याद नहीं रखना चाह रहे। तुम स्मृतियों के उन हिस्सों को बिलकुल ग़र्क़ कर देना चाह रहे हो, जो तुम्हारे स्वार्थ के अनुकूल नहीं हैं।

तुम्हें यह तो याद है कि शाम को बाग में गये थे, टहल रहे थे और बड़ी हसीन हवा बह रही थी। और तुम्हें यह नहीं याद है कि पीछे से तभी कॉन्स्टेबल ने आकर दो लाठी लगायी थी, वो बिलकुल भूल गये?

विवेकी मनुष्य की एक निशानी यह होती है कि वो अपनी स्मृति पर भरोसा नहीं करता। और जब वो अपनी स्मृति पर बहुत भरोसा नहीं करता तो उसकी स्मृति शुद्ध रहती है। स्मृति पर भरोसा करने का अर्थ है स्मृति को तोड़-मरोड़ देना।

चलिए, एक प्रयोग कर लेते हैं। आगे के लिए याद बनी रहे इसके लिए हम क्या करते हैं? आपके जीवन में कोई भी घटना घट रही हो, उसके आगे तक याद बनी रहे इसके लिए आप क्या करते हैं? फ़ोटो लेते हैं और वीडियो बनाते हैं, यही करते हैं न? अभी से क्या तैयारी रहती है? पहली बात, आप उसी घटना को स्मृति में रखना चाहते हो, जो आपने आज से तय कर लिया है। ठीक? पूरे जीवन के यथार्थ को तो आप स्मृति में रखना भी नहीं चाहते। आप उसी घटना को स्मृति में रखना चाहते हो जो आप तय कर चुके हो। दूसरी बात, वो जो फ़ोटो खिंचती है, उसमें आप अभी से सच्चाई रखते कितनी हो? जल्दी बोलिए!

अगर आपके बच्चे, आपसे दूर हो गये हों किसी वजह से दो साल की उम्र से ही और फिर जब वो बीस वर्ष के हो जाएँ तब वो लौटकर आयें। मान लीजिए, वो पढ़ने चले गये थे, बीच में आप से मिले नहीं। दो की उम्र में चले गये थे, बीस की उम्र में वापस आये। और इस दौरान घर में क्या हुआ, इसकी ख़बर उन्हें सिर्फ़ फ़ोटो और वीडियो से मिले तो वो कहेंगे, ‘पापा बहुत हैंडसम हैं, और माँ बहुत सुन्दर है और फिट है, और मम्मी-पापा में बहुत प्यार है।’ और ये तीनों ही बातें?

श्रोतागण: बिलकुल झूठी होंगी।

आचार्य: बिलकुल झूठी होंगी। पर हमने स्मृतियों को जान-बूझकर तैयार ही इस तरह से करा है कि धोखा हो। पापा को अभी-अभी कान पर पड़ा है बढ़िया, लाल है, फ़ोटो खिंचेगी? फोटो खिंची? क्यों नहीं खिंची, बताओ तो? और वो यथार्थ है। लेकिन जो मुस्कुराती हुई फ़ोटो खिंची गयी है, उसमें ज़बरदस्ती मुस्कुराना पड़ता है। कान ज़बरदस्ती नहीं लाल है, कान तो लाल है और यह सच्चाई है। पर उसकी फ़ोटो नहीं खिंचेगी, सच्चाई की। हाॅं, ज़बरदस्ती मुस्कराती हुई फ़ोटो खिंच जाएगी।

अब गोलू बीस साल बाद घर वापस आ रहा है, उस बेचारे को लग रहा है कि माँ-बाप में तो बहुत प्यार है। ये धोखा सिर्फ़ हम गोलू को नहीं देते, ख़ुद को भी दे देते हैं। हर आदमी को अपना बचपन बहुत प्यारा लगता है। और हर बच्चा रो रहा होता है कि बड़ा कब होऊॅंगा। दुनिया उसके ऊपर चढ़ी बैठी होती है। जहाँ बड़े हुए नहीं कि हर आदमी यही बता रहा होता है कि माइ गोल्डन चाइल्डहुड!

कइयों को तो मैं जानता हूॅं, तो मैं कहता हूॅं, इतनी दुर्गति थी इसकी बचपन में, नाक टपकाता घूमता रहता था। इधर पिट रहा है, उधर भाग रहा है, गिर रहा है, हर समय बीमार रह रहा है। अभी बड़ा हुआ है तो गाता है 'कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।' कौनसी कागज़ की कश्ती? बारिश में तू निकलता था, दो मिनट के अन्दर बुखार आ जाता था तुझे। अब ऐसे बता रहा है कि मैं तो छम-छम नाचता था बारिश में। यह क्या है? यह हम अपनेआप को धोखा दे रहे हैं।

कहीं भी वो नहीं हुआ जो आपने अनुभव किया, पहली बात। और अनुभव के बाद समस्त अनुभवों में से आपने जो याद रखा वो तो बिलकुल ही नहीं हुआ। पहली बात तो अनुभव धोखा देते हैं। दूसरी बात, अनुभवों में भी आप जो याद रखते हो वो और धोखे की बात होती है।

एक ही घटना को लेकर के पाॅंच लोगों के विवरण बिलकुल अलग तरह के होंगे। यह जानना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि हमारी आइडेंटिटी , हमारी पहचान बहुत हद तक हमारे अतीत से आती है और अतीत माने स्मृति। आप स्मृतियों पर आधारित अपनी पहचान बनाते हो और वो स्मृतियाँ हैं ही झूठी। आपको कुछ ऐसा याद है जो कभी हुआ ही नहीं। और जो हुआ, उसको आप जान-बूझकर भुला चुके हो।

कोई आपसे लड़ने आये, उसके इल्ज़ाम सुनिएगा कभी, अवाक् रह जाएँगे। हुआ होगा आपके साथ, ख़ासतौर पर जब किसी बहुत निकट के व्यक्ति से आपकी बहसबाज़ी हो जिसके साथ आपने बहुत समय गुज़ारा हो, वो आप पर ऐसे-ऐसे इल्ज़ाम लगाएगा, आप कहेंगे, 'यह हुआ कब!' और उसको पूरा भरोसा होगा कि वो जो कह रहा है बिलकुल ठीक कह रहा है। कहेगा, 'फिर ऐसा हुआ था, फिर ऐसा हुआ था, फिर तुमने ऐसा कर दिया था।' वो पूरी तरह झूठ नहीं बोल रहा, कुछ थी छोटी सी बात जिसको उसने फुला दिया और कुछ थी छोटी सी बात जिसको आपने भुला दिया। उसका फुलाने में स्वार्थ था, आपका भुलाने में। स्मृति सच नहीं है। तो आपने जो अपनी स्मृतिबद्ध पहचान निर्धारित करी है वो भी सच नहीं है। समझ रहे हो?

रागद्वेषवियुक्तेस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ।।

परन्तु आसक्ति, विद्वेष से रहित होकर अपने वशीभूत इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करके संयतेन्द्रिय मनुष्य अपने मन में प्रसाद (प्रसन्नता) प्राप्त करता है।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६४

"परन्तु आसक्ति विद्वेष से रहित होकर अपने वशीभूत इन्द्रियों के द्वारा विषयों का उपभोग करके संयतेन्द्रिय मनुष्य अपने मन में प्रसन्नता, प्रसाद प्राप्त करता है।" उसी प्रसाद को अनुवाद में प्रसन्नता लिख दिया गया है। "आसक्ति विद्वेष से रहित होकर वशीभूत इन्द्रियों के द्वारा विषयों का उपभोग करके संयत मनुष्य प्रसाद प्राप्त करता है।" यह जो जगत हैं इसमें जो कुछ है उसका उपभोग तो करोगे ही, यह प्राकृतिक व्यवस्था है। उसका उपभोग बस इस दृष्टि से नहीं करना है कि उसका उपभोग करने से कुछ मिल जाएगा बहुत ऊँचा। बस है, सूक्ष्म बात है। बस है, है तो उपभोग कर लिया। नहीं भी हुआ होता तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ता। कर भी लिया तो कोई वरदान नहीं मिल गया।

न पाने की आस, न खोने का डर। नहीं मिला तो रो नहीं रहे हैं और मिल गया तो डर नहीं रहे हैं कि अरे! हमें मिल गया है, हमने कोई अपराध तो नहीं कर दिया। नहीं था तो नहीं था, है तो है। उसके होने में जैसा भाव रख रहे हैं, उसके खोने में भी वैसा ही भाव रखेंगे।

अध्यात्म पलायन नहीं है। अध्यात्म संसार से ऐसा रिश्ता रखने की कला है जिसमें आप मूर्ख न बनें। नहीं तो संसार मूर्ख बहुत बनाता है। मन को जैसे स्वयं को ही मूर्ख बनाना है, इसके लिए वो संसार को प्रक्षेपित करता है। संसार जैसे और कुछ है ही नहीं, मन की मन के विरुद्ध ही चाल है मूर्ख बने रहने की। मन प्रक्षेपित तो करेगा संसार को, वो उसकी प्रकृतिबद्ध व्यवस्था है। बच्चा पैदा होगा, आँख खोलेगा, उसे दुनिया दिखेगी। दुनिया तो दिखेगी जिस दिन तक जीव चल रहा है। दिखती रहे, ठीक है। बेवकूफ़ न बनाये भई! यह अध्यात्म है।

समझ में आ रही है बात?

"आसक्ति विद्वेष से रहित होकर वशीभूत इन्द्रियों के द्वारा विषयों का उपभोग करके संयतेन्द्रिय मनुष्य प्रसाद प्राप्त करता है।" तो जो मिला है, प्रसाद की तरह है, प्रमुख बात नहीं है। प्रमुख बात क्या थी? मन्दिर आना। मन्दिर इसलिए नहीं आये थे कि प्रसाद मिलेगा। मिल गया, अच्छी बात है, बोनस जैसा है। माॅंगा नहीं था, मिल गया। नहीं भी मिला होता तो भी जो प्रमुख था वो तो मिल ही गया। प्रमुख क्या था? मन्दिर में होना। मन्दिर में आ गये, यह बात प्रमुख थी। प्रसाद मिल गया, अच्छी बात है, नहीं मिला तो नहीं मिला।

समझ में आ रही है बात?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं आपको पिछले छः महीने से सुन रही हूँ। मैंने आपको सुना, बहुत से ऐसे सवाल थे मन में कि भगवान क्या है, ईश्वर क्या है, परमात्मा क्या है। जब मैंने आपको सुना तो बहुत सी चीज़ें स्पष्ट हुईं।

तो जैसे कि हम पूजा करते हैं तो जो साकार कृष्ण हैं उनसे हम निराकार कृष्ण तक कैसे जा सकते हैं? मुझे यह जानना है।

आचार्य: साकार कृष्ण ऐसे हैं जैसे भगवद्गीता की प्रति। निराकार कृष्ण ऐसे हैं जैसे भगवद्गीता का ज्ञान। भगवद्गीता की प्रति न रखी हो आपके सामने तो ज्ञान लेना मुश्किल हो जाएगा न? भगवद्गीता की वो जो प्रति है वो साकार है, सगुण है, है न? और जो उसका मर्म है, उसके भीतर जो बोध है वो निराकार है, निर्गुण है। लेकिन बड़ा मुश्किल होगा अगर आपके सामने वो कागज़ की वो प्रति न रखी हो। ठीक उसी तरीक़े से जैसे कागज़ की प्रति की महत्ता है उसी तरह से पत्थर की मूर्ति की महत्ता है।

प्रति की जो महत्ता है वही प्रतिमा की है। लेकिन अगर कोई कागज़ पर ही अटककर रह जाए, जैसे बहुत लोग करते हैं, उनके घर में कागज़ की गीता होती है लेकिन गीता का ज्ञान उन्होंने बिलकुल भी गहा नहीं होता। होता है न? घर में गीता रखी है, कभी पढ़ी नहीं, पढ़ी भी तो गुनी नहीं। उसी तरीक़े से अगर प्रतिमा आपको अब अप्रतिम तक नहीं ले जा पायी, मूर्ति आपको अमूर्त तक नहीं ले जा पायी तो व्यर्थ हो जाएगी। जैसे गीता रखना काफ़ी नहीं है, गीता के मर्म को ग्रहण करना आवश्यक है वैसे ही साकार कृष्ण की प्रतिमा को पूजना काफ़ी नहीं है, कृष्णत्व के मर्म को ग्रहण करना आवश्यक है। मूर्तिपूजा में यही दोष रह जाता है। मूर्ति को अमूर्त तक पहुँचने का माध्यम होना चाहिए लेकिन बहुत लोग सोचते हैं कि मूर्ति पूजा पर्याप्त है, वो बेकार की बात है।

प्र: जैसे कि मम्मी जी बोलती हैं कि पूजा करो, बेटा! सुबह भोग लगाओ ठाकुर जी को। तो वो सब करने से मन को शान्ति तो मिलती है लेकिन सुकून नहीं मिलता। जैसे कि अब प्रभु जी थे उनके मैं वचन सुन रही थी तो उन्होंने बोला था कि जब आप कृष्ण को जान जाओगे तो वो आपको इतने स्पष्ट दिखाई देंगे जैसे कोई वस्तु आपको दिखाई दे रही है, वो इतने स्पष्ट हैं कि दिखाई देने लगते हैं।

आचार्य: ‘सब दिखाई देना बन्द हो जाता है।’ ये सब जो हमने करा है गीता के साथ, कृष्ण के साथ, सब के साथ हमने अन्याय करा है कि वो दिखाई देने लग जाएँगे। वो, वो हैं जिन तक आँख क्या, कोई इन्द्रिय नहीं पहुँच सकती, वो आपको वस्तु की तरह कहाँ से दिखाई देने लग जाएँगे, भाई! हर वस्तु सीमित होती है, वो आपको दिखने कहाँ से लग जाएँगे!

ये सब जो हमने रूमानी कथा-वाचन करा है कृष्ण के नाम पर यह बड़ा ख़तरनाक रहा है। इसने हमसे गीता को छीन लिया। कृष्ण की हमने जो अलौकिक छवि बना दी, उस छवि के कारण गीता हमसे छिन गयी। हमें समझ में ही नहीं आता। कृष्ण को भी हमने एक पर्सनालिटी बना दिया, व्यक्तित्व, अब क्या बचा? अब क्या बचा? सब बर्बाद कर दिया न!

देखो, सगुण की पूजा करने का जो आग्रह रहा है न, यही सनातन धर्म की ताक़त भी रहा है और बड़े-से-बड़ा दोष भी। ताक़त इसलिए रहा है क्योंकि इसने सनातनियों को बड़ा उदार बना दिया। सगुण की पूजा माने प्रकृति की पूजा, माने जो कुछ भी गुण-युक्त है चारों तरफ़ — नदी, पत्थर, पहाड़ — उसकी पूजा करनी है। तो हिन्दू मन बड़ा उदार हो गया, सहिष्णु हो गया, अब वो ले लेता है। कहता है, 'सबकुछ वही तो है तो क्या विरोध करें।' तो बहुत न विरोध करता है न क्रान्ति करता है, जैसा चल रहा है चलने देता है। तो इस मामले में तो जो सगुण की पूजा है वो ताक़त रही है। लेकिन वही कमज़ोरी भी रही है क्योंकि उसके कारण जो सनातनी मन है वो कभी असली चीज़ की ओर आसानी से नहीं जा पाया, असली चीज़ तो निर्गुण ही है न!

यही वजह है कि फिर जो सनातन धारा है उससे पहले जैन धारा को, फिर बौद्ध धारा को, फिर सिख धारा को उभरना पड़ा। और इन तीनों में ही ख़ास बात यह थी कि इन्होंने सगुण से वास्ता नहीं रखा। क्योंकि सगुण को पकड़-पकड़कर आप निर्गुण से ही दूर हुए जा रहे हो तो ऐसे सगुण का क्या लाभ? और सगुण का बहुत लाभ है अगर सगुण ही आपको निर्गुण तक ले जा सके। मूर्ति बहुत अच्छी है अगर मूर्ति के माध्यम से आप ब्रह्म तक जा सको। और मूर्तिपूजा का उद्देश्य भी यही था कि मूर्ति आपको कुछ आगे का याद दिला दे। लेकिन माया ऐसी है न, हमारा मन ऐसा मूर्ख होता है न कि हम उद्देश्य भूल गये।

मन तो ऐसा मूर्ख होता है कि बौद्ध धर्म निकला और फिर बौद्धों ने बुद्ध की ही मूर्तियाँ बना डालीं। और बौद्ध धर्म निकला था सनातन धारा से ताकि जितने दोष थे सनातनियों के उन दोषों को हटाकर के एक साफ़ और नयी धारा की रचना की जा सके। वह साफ़ और नयी धारा क्या होगी, वहाँ भी तमाम तरह के दोष आ गये।

सिख धारा निकली, गुरुओं ने कभी जात-पात, ऊँच-नीच की बात नहीं करी। पर वहाँ भी जात-पात, ऊँच-नीच आ गयी। मन बड़ा कपटी होता है, शास्त्र कुछ सिखाये, गुरु कुछ सिखाये, मन सब मटियामेट कर देता है। लेकिन इन सब चीज़ों से तो बहुत बचकर रहो। देखो, तीन हैं हमारे पास नाम जो सनातन धर्म के स्तम्भ हैं — राम, कृष्ण और शिव। ठीक? राम के साथ योगवाशिष्ट जुड़ा हुआ है, कृष्ण के साथ श्रीमद्भगवद्गीता और शिव के साथ अनेकानेक ग्रन्थ हैं जो बहुत प्रचलित नहीं हैं, अवधूत गीता है जैसे, शिव गीता है। इन सबमें सबसे जो प्रचलित है वो कृष्ण की गीता है। ठीक है न?

अब अगर आपने कृष्ण की गीता को खो दिया तो आपने बहुत कुछ खो दिया। सनातन धर्म के जो तीन स्तम्भ हैं उनमें से जो आपको ज्ञान देता है वास्तव में, जिसका ज्ञान प्रचलित है जनमानस में वो एक ही है, कौनसा? कृष्ण का स्तम्भ। क्योंकि योगवाशिष्ट जनमानस में प्रचलित नहीं है। उसी तरीक़े से शिव से सम्बन्धित ज़्यादातर जो अद्वैत मूलक ग्रन्थ हैं वो भी जनमानस में प्रचलित नहीं हैं, पर गीता प्रचलित है।

गीताकार को लेकर के कहानियाँ मत चलाइए। और गीताकार को लेकर, कृष्ण को लेकर के हमने जितनी कहानियाँ बना दी हैं वो बहुत ख़तरनाक हैं। उनके कारण हम गीता से हाथ धोते जा रहे हैं। लोगों को बहुत रस आ गया है बस कृष्ण के नाम पर नाचने में। और यह व्याधि, ख़ासतौर पर यह जो पूरा क्षेत्र है — मथुरा, वृन्दावन — यहाँ बहुत फैली हुई है। वहाँ से पूरे देश में। वहाँ गीता का कम महत्व है और कृष्ण को लेकर के बाक़ी सब जितने किस्से हैं वो ज़्यादा चलते हैं।

समझ रहे हो?

‘फिर प्रभु ने ऐसा कहा, फिर प्रभु ने फ़लाने गोपी के चरणों को ऐसे स्पर्श करा, फिर प्रभु राधा-रानी के साथ फ़लाने झूले पर बैठ गये, फ़लाने बाग़ में आते हैं रात में, अभी भी कोई जाकर वहाँ देखेगा तो अन्धा हो जाएगा।’ यह क्या कर रहे हो? यह अध्यात्म है? क्या है ये? और इसको भक्ति बोलते हो? फिर इसीलिए तो भक्त शब्द अब एक मज़ाक बनकर रह गया न।

अब एक समस्या है बड़ी, समस्या यह है कि राम के चरित्र के साथ हमारे पास मोटा-मोटा जो ग्रन्थ उपलब्ध है वो बहुत रसीला नहीं है, वो त्रासद है, उसमें गम्भीरता का भाव है। मैं रामचरितमानस की बात कर रहा हूँ। आप वहाँ रस बहुत नहीं पाओगे। वहाँ पर वियोग है, वहाँ कष्ट है, वहाँ त्याग है। तो इसीलिए रामचरितमानस को लेकर के लोग इतने उत्कंठित होते नहीं। क्योंकि वहाँ तो आप न भी चाहे तो आपको इस बात को देखना पड़ेगा कि राम ने त्याग करा और मर्यादा का पालन करा। अब त्याग और मर्यादा का पालन कौन करना चाहता है आज के समय में? तो जनमानस में प्रचलित क्या होता जा रहा है? भागवत पुराण। और भागवत पुराण जैसी कोई चीज़ न राम के लिए मौजूद है न शिव के लिए मौज़ूद है पर कृष्ण के लिए मौजूद है। और भागवत पुराण में बहुत ऐसी कहानियाँ हैं जिसमें आपको विवेक, बुद्धि का कोई प्रयोग करना नहीं पड़ता और आप उनको लेकर के खूब रसपान कर सकते हैं। लोग रसपान करते हैं और कथावाचक कराते हैं। वो बोलते ही हैं 'कथामृत'।

मैं नहीं देखता कि गीता-कथामृत कहीं चल रहा हो या गीता-यज्ञ कहीं चल रहा हो? पर हर गली-मोहल्ले में भागवत की कथाओं का कथामृत चल रहा होता है और वहाँ जो रस-सुधा बरसती है, पूछिए मत! सबसे ज़्यादा एक चीज़ को लेकर के — ‘फिर फ़लानी गोपी को क्या बोला?’ और महिलाएँ नाच रही हैं। इस सबसे मुझे आपत्ति बस यह है कि यह करके आप गीता से दूर हो जाते हो। आपके लिए कृष्ण का अर्थ फिर गीताकार नहीं रह जाता। आपके लिए कृष्ण, आपके कान्हा और वो लड्डू-गोपाल, यह सब बन जाते हैं।

एक बार आपने कृष्ण को माखन चोर ही बना दिया, उसके बाद आप कैसे उनको गीताकार की तरह देख पाओगे, नहीं देख पाते लोग। और इसमें उनको सुविधा भी खूब रहती है क्योंकि गीता को पढ़ना ख़तरे की बात है न। वहाँ आपके भ्रम टूटते हैं, अहंकार टूटता है। और ये सब करोगे कि फिर माखन लेकर भागे, फिर फ़लाने ग्वाले से क्या कहा, फिर यह हुआ, फिर फ़लानी गैया आ गयी, फिर ऐसा-वैसा। वो सब में बड़ा आनन्द आता है, कोई बुद्धि नहीं लगानी पड़ती, कोई सीख भी विशेष नहीं है। नाचने-गाने को भी मिल जाता है, पूरी सुविधा है।

भागवत पुराण की कथाओं में भी सार है। पर वो सार तब समझ में आएगा जब पहले गीता समझ में आएगी। गीता पहले आती है, पुराण बाद में आता है। गीता के कृष्ण को यदि आप जान गये हैं तो भागवत के कृष्ण को फिर आप समझ जाएँगे। पर अगर आपने सिर्फ़ भागवत के कृष्ण को जाना है तो गीता के कृष्ण से शायद आप और दूर हो जाएँगे।

प्र२: भगवान श्री, नमन! जो अभी चर्चा चल रही थी सूत्र में कि विचार उस स्थिति में पहुँच जाए जिसको कहेंगे कि सन्देह श्रद्धा में बदल जाए, मतलब बेकार के विचार न रहें।

मैं अपने को जब देखता हूँ तो शुरू में जब आया था तो सन्देह से भरा था। आपने कहा कि प्रश्न पूछो, सन्देह उठाओ ताकि जो सन्देह हमारे मन पर चढ़े होते हैं वो उतर जाएँ। लेकिन वो जो बात हैं, 'चाभी फेंक देने वाली' वो अटकी हुई है। उस बिन्दु के क़रीब भी हैं, कह सकते हैं कि उतारकर रख दें, चाभी फेंक दें लेकिन फिर अन्दर एक ये रहता है कि वो विवेक चला जाए, ऐसा लगता है कि जो पुराने बाबा लोगों के साथ हुआ है।

आचार्य: तो विवेक को और बढ़ाइए। अगर विवेक को ही लेकर इतनी असुरक्षा है कि कहीं विवेक न छूट जाए, तो विवेक को और बढ़ाइए। हो सकता है विवेक ही बढ़कर यह संस्तुति करे कि अब चाभी फेंक दो। हो सकता है बढ़ा हुआ विवेक ही आपसे कहे कि अब फेंक दो चाभी। और विवेक बढ़ने के उपरान्त अगर कहता है कि नहीं, अभी चाभी पकड़कर रखो तो मत फेंकिए। चाभी फेंकना अविवेक नहीं है, चाभी फेंकना ऊँचे विवेक का निर्णय है, चयन है। अगर नहीं फेंक पा रहे चाभी तो माने अभी विवेक में ही कमी है। और जाँच-पड़ताल करिए, और परखिए। या तो पकड़ने में मदद मिलेगी या फेंकने में, अटके नहीं रहेंगे बस।

प्र३: प्रणाम आचार्य जी। पहले श्लोक में हमने बात शुरू करी थी इन्द्रिय-संयम की और वो एक रास्ता था स्थितप्रज्ञ होने के लिए। तो सुनते-सुनते ही कुछ संकल्प किया इन्द्रिय-संयम को लेकर। और आख़िरी श्लोक में यह बात हुई कि ऐसे हो जाना चाहिए मन को कि अगर मिला तो भी ठीक और नहीं मिला तो भी ठीक। तो मैं इन दोनों में उलझ रही हूँ।

आचार्य: इसमें आप भेद कहाँ देख रही हैं?

प्र: इन्द्रिय-संयम की बात अगर हम कर रहे हैं तो वो एक आत्मानुशासन की बात हो रही।

आचार्य: ठीक शुरू में, बिलकुल ठीक।

प्र: और बाद में हम यह कह रहे हैं कि अगर वो मिल भी गया तो ठीक।

आचार्य: हाँ, तो आप कह रही हैं कि अन्त में इन्द्रिय-संयम की आवश्यकता नहीं बचती है? हाँ, ऐसा ही है।

प्र: तो यह एक सतत् प्रक्रिया है, यह एक प्रगति है।

आचार्य: हाँ, प्रसाद है।

प्र: जी। यह एक इंसान की एक स्थिति में नहीं हैं दोनों चीज़ें?

आचार्य: नहीं-नहीं।

प्र: जी, उसी में दुविधा हो गयी थी।

आचार्य: ये अलग-अलग स्थितियाँ हैं। एक आरम्भिक स्थिति है और एक है मन्दिर की ओर जाने में जो आप कष्ट का अनुभव करते हैं जिसके कारण अनुशासन चाहिए। और दूसरा प्रसाद है मन्दिर पहुँच जाने का। जो प्रशिक्षु है, उसको इन्द्रिय-संयम, इन्द्रिय-अनुशासन, इन्द्रिय-निग्रह ये सब रखना पड़ेगा। फिर एक स्थिति ऐसी आती है जहाँ उन पर संयम रखो कि नहीं रखो, फ़र्क नहीं पड़ता।

प्र४: प्रणाम आचार्य जी। मैं आपको पिछले दो सालों से सुन रहा हूँ। यह मेरा पहला सत्र है। तो पिछले काफ़ी समय से मैं तनाव में था, तो सत्र में आने से पहले काफ़ी चीज़ें, आपके सारे पुराने वीडियोज मैं देख रहा था। तो उसमें आपने यह कहा था कि अपनेआप को देखो, पूछो कि तनाव कहाँ है, किधर है।

तो जब ख़ुद से सवाल पूछता था तो सारी समस्याएँ ख़त्म होती नज़र आती थीं। कुछ सामने होता नहीं था, मन में हल्का सा आनन्द सा उठता था। फिर पाँच मिनट बाद फिर से वो सारी चीज़ें दोबारा हो जाती थीं।

तो अब वो समझ नहीं आता कि आख़िर जो दो पल के लिए जो तनाव मेरा कम हुआ था, चीज़ें जो मैंने ख़ुद से सवाल करा था तो उस चीज़ को मैं कैसे बनाये रखूँ?

आचार्य: नहीं, वो बन नहीं सकती है, वो वैचारिक शान्ति है। वो द्वैतात्मक शान्ति है। वो वैसी ही शान्ति है कि तनाव की लहर चलती है तो उसमें ऐसे एक शीर्ष आता है फिर एक घाटी आती है (हाथ लहर बनाकर समझाते हुए)। वो वैसी ही शान्ति है, उसमें कुछ नहीं रखा है। तुम सोच-समझकर शान्ति लाना चाहते हो तो वो नहीं की। लेकिन आजकल वो सब बहुत चलता है, 'पॉजिटिव थिंकिंग वगैरह'। वही है यह भी कि कुछ ऐसा सोचो जिससे शान्त हो जाओ।

बहुत सोचोगे तो बीच-बीच में शान्त हो ही जाओगे, इसलिए नहीं कि तुमने कुछ बहुत बढ़िया या बहुत सही सोच लिया, इसलिए कि सोच होती ही है ज्वार-भाटा की तरह। उसमें दुख का ज्वार आएगा तो शान्ति का भाटा भी आएगा। वो सब शान्ति नहीं है। शान्ति इतनी सस्ती चीज़ नहीं होती है कि बैठकर के विचार-भर करने से मिल जाएगी, ज़िन्दगी की आहुति देनी पड़ती है।

असल में जो एक बात है वो यह है कि आपमें से बहुत सारे लोग आ जाते हैं यूट्यूब वीडियो देखकर के, और वो साधन भी है, वैसे ही आएँगे। तो काम बहुत श्रवण आधारित रहता है, कुछ सुना, कुछ सोचा। श्रवण कर लिया, कुछ मनन भी कर लिया, जीवन नहीं किया। मैं जहाँ से देखता हूँ वहाँ श्रवण, मनन, निदिध्यासन, उसके बाद आता है जीवन, उसी को समाधि कहते हैं। श्रवण, मनन तो ठीक है, जीवन कहाँ है? जीवन होता नहीं। आपको लगता है कि यूट्यूब पर एक वीडियो है, मैं बोल रहा हूँ, आप सुन रहे हो और कुछ आपको एक-दो चीज़ें मिल गयी हैं, आप उनको पकड़े बैठे हो।

वो 'टिप ऑफ़ द आइसबर्ग' है भाई, जो सुन रहे हो। वो उतना भी नहीं है। बहुत-बहुत शुरुआती चीज़ है वो कि सुन लिया। उसको बहुत सालों तक जीना पड़ता है तब जाकर शुरुआत होती है। बहुत सालों तक जीना पड़ता है तब जाकर शुरुआत होती है। डेढ़ महीना, दो महीना, छः महीना, एक साल इतने में तो वार्मअप भी नहीं होता। इंस्टेंट कॉफ़ी थोड़े ही है, वो भी यूट्यूब रेसिपी वाली! पर दुनिया में हर चीज़ अब वैसी ही है, 'टू मिनट्स'। तो हमें लगता है कि यहाँ भी कुछ वैसा ही है।

कई लोग तो आते हैं और बड़े आग्रह के साथ बोलते हैं, ‘आचार्य जी, आपको सुनते हुए पूरे सात महीने हो गये लेकिन यह संशय अभी भी नहीं जा रहा है। भई, सात महीने! क्या चाहते हो? प्रकृति के इतने कल्पों के बन्धन तुम्हें सात महीने में त्याग देने हैं, इतना श्रम किया तुमने क्या? वजह यही है कि हमको लगता है कि स्पष्टता या शान्ति या समाधि भी कोई हल्की चीज़ है। हल्की चीज़ है तो भई मिल जानी चाहिए न! दो महीने, सात महीने, दो साल में मिल जानी चाहिए।

वो इतनी बड़ी चीज़ है कि अगर बीस साल में भी मिल जाए तो उपकार मानो। पर हमें उस चीज़ की महत्ता का कोई अनुमान ही नहीं है। हमें लगता है हमने दो महीने या दो साल लगा दिये हैं तो बहुत दे दिया।

ग़लती किसी की नहीं है, ग़लती ये है कि यह जो हम काम कर रहे हैं, वास्तव में यह काम किसी यूट्यूब के स्तर का है ही नहीं। लेकिन इस युग की विडम्बना यह है कि यूट्यूब से ज़्यादा अच्छा माध्यम नहीं है इस काम को प्रसारित करने का। अब यूट्यूब पर जो बाक़ी सामग्री रहती है वो उसी तरह की रहती है जो आपको तुरन्त लाभ दिला देगी, वो लाभ भले ही एकदम ही घटिया लाभ हो पर मिल तुरन्त जाएगा।

तो आप चार-छः उस तरह का कुछ देख रहे हो, जिस भी दिशा का है वो, कुछ देख रहे हो, कोई ख़बर पढ़ ली, कुछ और देख लिया, ये देखा, वो देखा। फिर आप एक ऐसे वीडियो पर भी आ जाते हो। तो यकायक आपको यह बात कौंधती ही नहीं कि यह जो वीडियो मेरे सामने आ गया है यह किसी और आयाम का है। आप उस वीडियो को लेकर के भी यही उम्मीद पाल लेते हो कि इससे भी बस दो-चार महीने में कुछ मिल जाएगा। वो चीज़ दूसरी है भाई। यह सिर्फ़ संयोग की बात है कि वो यूट्यूब पर है। वास्तव में यह उस वीडियो का अपमान है कि वो यूट्यूब पर है। यह इस युग की त्रासदी है कि ऐसी बातें यूट्यूब पर रखनी पड़ रही हैं क्योंकि वहाँ न रखें तो आप तक पहुँचेंगे ही नहीं। कोई और काल होता तो जनता सम्मुख आकर बैठती, पर अब कितनी जनता को सम्मुख बैठायें! एक-सौ-चालीस करोड़ तो भारत की ही आबादी है, इतने सम्मुख बैठने लग गये तो मर जाएँगे हम ही, तो चलो भाई यूट्यूब पर।

और वो भी कुछ ऐसे ही आड़ा-तिरछा देख लिया, एक दो-हज़ार-सत्रह का वीडियो देखा फिर एक दो-हज़ार-बाइस का देखा। एक देखा जिसमें कोई प्रौढ़ व्यक्ति, मान लीजिए यतेन्द्र जी हैं (श्रोता की ओर इंगित करते हुए) उनसे बात हो रही है। एक देखा जिसमें कोई कॉलेजी लड़का है उससे बात हो रही है। एक कहीं का देखा, एक कहीं का देखा। “कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा।” और फिर मेरे सामने आये, कह रहे हैं, 'आचार्य जी, आपके पाँच वीडियो देखे हैं, अभी तक भ्रम नहीं मिटा।' मैं बोलता हूँ, 'यस सर, कस्टमर सटिस्फ़ैक्शन इज़ ऑवर फर्स्ट प्रायॉरिटी। बताइए, क्या कर सकते हैं आपके लिए?'

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