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एक वस्त्र अभी बचा है, उसको भी उतार दो || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। अभी जैसे मनोरंजन की बात हो रही थी, तो एक प्रश्न है जो मेरे दिमाग में आया। बॉलीवुड के एक अभिनेता हैं जिनका नाम है रणवीर सिंह। हाल ही में उन्होंने अपना एक न्यूड फोटो शूट (निर्वस्त्र फोटोशूट) करवाया। तो इस पर उनके फ़ैन्स बोलते हैं कि ये तो वो बात हो गई– माई बॉडी माई चॉइस, हिज़ बॉडी हिज़ चॉइस (मेरा शरीर मेरा चुनाव उसका शरीर उसका चुनाव)।

आपको अगर देखना हो, तो देखिए तस्वीरों को। ना देखना है, तो ना देखिए। और नग्न होना, तो बहुत ही सहजता की बात है। हम तो हो ही सकते हैं नग्न। और दूसरी तरफ़ दूसरा विचार है कि भाई ये तो अश्लीलता है। इस चीज़ को क्यों प्रोमोट (बढ़ावा) किया जा रहा है? तो मैं इन दोनों विचारों में थोड़ा सा परेशान हूँ। तो इन दोनों विचारों में आप थोड़ा स्पष्टीकरण दे देते।

आचार्य प्रशांत: क्या तुम तब परेशान होते हो जब इंस्टाग्राम पर नग्न स्त्री शरीर को देख रहे होते हो? तब तो लोग पैसा दे देकर देखते हैं। उस व्यक्ति ने जो किया सो किया, उसकी चर्चा कर लेंगे। पर इतना हंगामा क्यों बरपा है? ये कोई नई चीज़ थोड़े ही हो रही है। ये तो रोज़ हो रहा; है न?

ये लिंगभेद है। मैं विरोध कर रहा हूँ। जेंडर इक्वालिटी (लैंगिक समानता) होनी चाहिए, मैं तुम्हारे सवाल में तुम्हारा साथ नहीं दे रहा। वैसे ही नग्न स्त्री शरीरों को आप पैसा दे-देकर देखते हो। इंटरनेट का ज़्यादा से ज़्यादा ट्रैफ़िक (भीड़) उसी दिशा में जाता है। इंस्टाग्राम चलना बंद हो जाए, अगर नग्नता ना हो।और इंस्टाग्राम तो छोटी चीज़ है। पॉर्न इंडस्ट्री (देह व्यापार) की तो बात ही क्या करनी। तब तो इस तरह की आऊटरेज (अत्‍यधिक क्रोध) देखने को नहीं मिलती। ये क्या है?

अरे दुनिया में इतने जीव हैं, भाँति-भाँति के पशु-पक्षी हैं, जंतु हैं। कोई नंगा लोट गया, तो तुम्हें क्या समस्या हो गई? मेरे खरगोश हैं, सड़क पर कुत्ते हैं, सब अपने-अपने प्राकृतिक व्यवहार का प्रदर्शन करते रहते हैं। तुम काहे के लिए पगला रहे हो? और पगलाना है, तो फिर दोनों लिंगों पर पगलाओ। फिर ये नहीं चलेगा कि ढाई इंच कपड़े वाली लॉन्जरी (स्त्रियों के अंतर्वस्त्र) पंद्रह हज़ार की है। वहाँ काहे नहीं जाकर धरना प्रदर्शन करते? वो चीज़ गलत नहीं है क्या? बेचारी मर्द जात, अन्याय का शिकार। हैं भाई! अचानक से हमारी नैतिकता जग गई है कि एक आदमी नंगा हो के फोटो काहे को खिंचा रहा है? और वही घर-घर में हो रहा है; तब नहीं जागती है।

अभी कुछ दिन पहले गोवा में महोत्सव था, वहीं से आ रहा हूँ। बंदा चल रहा होगा, उसने पूरे कपड़े पहन रखे होंगे। बंदी ने उसके एक चौथाई। और वो चीज़ हमको एस्थेटिकली प्लीज़िंग (सुंदरता की दृष्टि से मनभावन) लगती है। उसको यही बोलते हो न, 'ये तो एस्थेटिक्स (सौंदर्य) की बात है।'

एस्थेटिक्स का क्या अर्थ है? जिसका संबंध सौंदर्य से हो उसको एस्थेटिक्स कहते हैं। काहे भाई, स्त्री की जांघें नंगी हैं, तो वो एस्थेटिकली प्लीजिंग हो गई? और उस बबुआ ने क्या बिगाड़ा है? उसकी जाँघों में काँटें लगे हैं? वो भी देखो। जब तुम्हें जाँघें ही देखनी हैं, तो स्त्री की ही काहे को देख रहे हो, पुरुष की भी देखो। सब देखो! और मैं कह रहा हूँ, बिना छिली देखो। ये बाल-वाल भी पूरे रहने चाहिए। जब तुमको माँस और जाँघें ही देखने का इतना शौक है, तो वो जैसी होती हैं प्रकृति में, वैसी देखो।

महिलाओं की ही छातियाँ क्यों घूरनी हैं, पुरुषों की भी देखो। वो भी झाड़ वाली। नंगा होने पर महिलाओं का ही एकाधिकार रहेगा क्या? ये मोनोपॉली (एकाधिकार) वगैरह नहीं चलेगी। देखो भाई, ये लोकतंत्र है और फ्री मार्केट (स्वतंत्र बाज़ार) है। सब प्रजातियों को नंगा होने का एक बराबर हक होना चाहिए और सब लिंगों को भी नंगा होने का एक बराबर हक होना चाहिए। बात बिल्कुल ठीक? अन्याय नहीं।

देखिए साहब, देह में कोई बुराई नहीं होती। ठीक है! सहज रूप से अगर कोई वस्त्र त्याग दे या कम वस्त्रों में आ जाए, तो मैं कहीं से भी उसको गलत नहीं मानता। भारत अध्यात्मिक देश रहा है और आप अपने संतों, ऋषियों, मुनियों को कभी बहुत कपड़ों में नहीं देखते होंगे। बल्कि यहाँ तक होता रहा है कि मौसम खराब हो, गर्मी हो, बहुत जाड़े हों, तब भी वो बहुत कपड़े नहीं पहनतें।

तो अपने आप में देह में कोई बुराई नहीं है। और वैसे भी भारत गर्म देश है, यहाँ बहुत ज़्यादा कपड़े पहनना तार्किक बात भी नहीं है। बात लेकिन मंशा की होती है। तुम किस नीयत से अपना कर्म कर रहे हो? नीयत बताओ! सहज रूप से अगर तुम कम कपड़ों में घूम रहे हो, तो अच्छी बात है। चाहे स्त्री हो या पुरुष हो। लेकिन अगर नीयत ये है कि जिस्म दिखा के वाहवाही लूटनी है, पैसा बटोरना है, लोगों का ध्यान खींचना हैं, तो वो चीज़ फिर ठीक नहीं होती। ये बहुत सीधी-सी चीज़ है।

सौ बार हम बोलते हैं न, कर्म नहीं कर्म के पीछे के कर्ता को देखिए। न स्त्री की देह में कुछ बहुत विशेष है न पुरुष की देह में कुछ विशेष है, मिट्टी है। अभी मिट्टी से उठी है, कल राख हो जाना है। तो उसमें इतना चिल्ल-पों करने की कोई बात ही नहीं है। तुमने ऐसा क्या देख लिया? ऐसा वहाँ है ही क्या जो देख के बिलकुल विक्षिप्त हुए जा रहे हो, पगलाए जा रहे हो?

दुनिया में जितने लोग हैं, सबके पास वही देह होती है। दुनिया में आठ सौ करोड़ लोग हैं। उसमें चार सौ करोड़ स्त्रियाँ हैं, चार सौ करोड़ पुरुष हैं। तुम एक ऐसी चीज़ के पीछे पागल हो जो चार सौ करोड़ लोगों के पास है। उसमें फिर विरल क्या है, रेयर (दुर्लभ) क्या है? कुछ है ख़ास? जो ही पैदा हुआ है, उसके पास शरीर है, तो शरीर में ख़ास क्या है, बताओ? कोई ऐसी चीज़ पाने की हसरत रखनी चाहिए न जिसमें कुछ विलक्षण हो? कुछ अद्भुत हो! कुछ रेयर हो!

कोई पगला भी होगा, उसके पास भी देह होती है ना। या नहीं होती? सिर्फ़ इसलिए कि कोई पैदा हो गया, देह तो होती है। एकदम ही कोई शून्य बुद्धि का हो, उसके पास भी वैसी ही देह होगी, जैसी किसी और के पास। तो उसमें क्या इतना बात का बतंगड़ बनाना। देह में कुछ ख़ास नहीं होता। तुम्हें किसी की देह दिख गई, इसमें भी कुछ ख़ास नहीं होना चाहिए। तुम्हारे लिए ख़ास नहीं होना चाहिए।

लेकिन जो देह का प्रदर्शन कर रहा है, उससे ये प्रश्न ज़रूर पूछा जाना चाहिए, 'तेरे पास जीवन में आगे बढ़ने के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं था क्या?' कोई प्रतिभा दिखाकर के आगे बढ़ता है, किसी का ज्ञान उसे आगे बढ़ाता है, किसी का कौशल उसे आगे बढ़ाता है, और ये सब ऊँची बातें होती हैं। अपने गुण के बल पर आगे बढ़ना। देह, तो सबके पास है। पशुओं के पास भी है। तो अगर तू देह के बल पर आगे बढ़ रहा है, तो फिर ये कोई ऊँची बात नहीं हुई। बात बस ये है।

तो मैं तुम्हारी बात का ना समर्थन कर रहा हूँ ना विरोध कर रहा हूँ, कुछ और ही कह रहा हूँ। इतना मत हो-हल्ला किया करो। इतने मत उत्तेजित हो जाया करो अगर किसी की देह देख लो तो। देह को बहुत ढकना भी कोई बड़ी अच्छी बात नहीं है। तुमने अगर अपने लिए ये नियम बना लिया है कि मुझे तो अपना शरीर ढाँक कर ही रखना है, तो इससे भी यही पता चल रहा है कि तुम शरीर को बहुत महत्व देते हो। बोलो, हाँ या ना?

हम, अपने जो पूजनीय हैं, ऋषि मुनि हैं, अपने अवतारों को भी देख लो। तुम देखो कि हनुमान जी का भी किस रूप में चित्रण किया गया है। तो तुम वहाँ बहुत वस्त्र थोड़े ही पाते हो। या पाते हो? क्योंकि उनमें देहभाव है ही बहुत कम। उन्हें देह से बहुत मतलब है ही नहीं।आत्मस्थ हैं! जब आप देहभाव में नहीं होते, तो आपको देह को बहुत ज़्यादा ढँकने की भी कोई फ़िक्र नहीं होती। आप उतना ही ढँकते हो जितना सामाजिक मर्यादा के लिए और सामान्य सुविधा के लिए आवश्यक है।

थोड़ा ढँकना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि इंसान अब जंगल से बहुत बाहर निकल आया है। हमारी खाल अब ऐसी रही नहीं कि इसको अगर ना ढँको, तो भी ये चल जाए। आप अगर आज चाहो भी कि बहुत कम कपड़े पहनो, तो आप पाओगे, आपकी खाल बर्दाश्त नहीं कर रही है। अब हमारा जो शरीर है, वो सर्दी-गर्मी बहुत बर्दाश्त नहीं कर सकता और छिल भी जाएगा।

बंदर को कभी देखा है, पीछे से कैसे छिला हुआ होता है? ये तब है, जब बंदर का नग्न रहने का आदिम अभ्यास है। तब भी वो उतना छिल जाता है। एकदम लाल हो जाता है। सोचिए आप अगर पूरे वस्त्र त्याग दें, तो आप कितने छिल जाएँगे?

तो साधारण सुविधा और सामाजिक मर्यादा—वस्त्र धारण करने की ये उचित वजहें हुईं।

सामाजिक मर्यादा की बात क्यों? क्योंकि हम भीतर से बहुत दमित लोग हैं। वासना ज़बरदस्त रूप से हमारे भीतर सप्रेस्ड (दमित) रहती है। पशुओं में ऐसा नहीं होता। तो अगर आपको कोई पूरा ही नग्न घूमता हुआ दिखने लग गया, तो आपके भीतर कामुकता के विचार और कुलबुलाने लगेंगे। इसलिए आवश्यक है कि कुछ कपड़े, तो पहने ही जाए। शारीरिक सुरक्षा के लिए भी और एक सामाजिक व्यवस्था चलती रहे, उसके लिए भी। लेकिन कपड़ों का इससे अधिक महत्व नहीं है। ये साफ़ समझ लीजिए!

एक समाजिक मर्यादा बनी रहे, वो भी ज़्यादा नहीं। न्यूनतम! जिसमें काम चलता रहे। बस! एक सामाजिक मर्यादा बनी रहे और दूसरा, भ‌ई! अपने को ठंडी, पानी, गर्मी, रगड़ वगैरह से राहत मिली रहे। इससे ज़्यादा जीवन में वस्त्रों का महत्व वैसे भी नहीं है।

जब ऐसे हो जाओगे, तो फिर जो लोग देह दिखा करके आपको ललचाते हैं, उनकी दुकानें बंद होने लगेंगी।क्योंकि आप जानते हो कि देह का महत्व वैसे भी नहीं है। उसने अपना शरीर दिखा भी दिया, तो आप कहोगे, 'इसमें ख़ास क्या है। जैसा तू है वैसे ही चार सौ करोड़ दूसरे भी हैं, कोई अंतर नहीं है, जैसा तू है और जैसे दूसरे हैं, एकदम अंतर नहीं है। तो तू ऐसा क्या दिखा रहा है कि मैं बिलकुल लालायित हो जाऊँ और तुझे अपना भगवान ही मानने लगूँ या तुझको तेरी दुकान में आकर बहुत सारे पैसे दे दूँ? कुछ नहीं है, कुछ ख़ास नहीं है।'

जो लोग गलत कारणों से कम कपड़े पहनते हैं, हमने कहा कपड़े कम पहनने का एक सही कारण भी हो सकता है। सही कारण हमने कौन-से गिनाएँ? साधारण शारीरिक सुविधा और सामाजिक मर्यादा। उसकी वजह से भी आप कम कपड़े बिलकुल पहन सकते हैं।आप गर्मी के मौसम में या उमस के मौसम में अगर बहुत सारा कपड़ा पहने हुए हैं, तो ये मूर्खता है। चाहे स्त्री हो या पुरुष हो, दोनों के लिए मूर्खता है।

लेकिन जो लोग गलत कारणों से शरीर दिखाते हैं, मैं कह रहा हूँ, उनकी दुकानें बंद हो जाएँगी अगर आप शरीर को एक सहज चीज़ मानना शुरू कर दें।जो लोग सिर्फ़ वाहवाही लूटने के लिए या प्रसिद्ध होने के लिए शरीर दिखाते हैं, उनकी दुकानें आगे चलेंगी ही नहीं।

पौराणिक कहानी है। ऋषि बैठे थे, अपना तप कर रहे थे। तो देवताओं को खतरा हो गया। उन्होंने नीचे एक अप्सरा भेजी। बोले, जाओ भंग करो इनकी तपस्या। तो वो आती है। पहले उनके सामने उसने अपना उत्तरीय उतारा। वो अपना बैठे उसको देखते रहे। फिर उसने अपने बाल खोले, फिर उसने अपने आभूषण उतारे, ऋषि देखते रहें। और हर बार जब वो अपने कपड़े उतारती जा रही है, तो उससे बोलते जा रहे हैं, 'और उतारो, और उतारो।'

देवताओं को लग रहा है कि उनकी चाल सफल हो गई। ऋषि अप्सरा के शरीर के पाश में बँध गए। ऋषि अपना बैठे हुए हैं, वो एक-एक कर उनके सामने अपने कपड़े उतारती जा रही है। कह रहे हैं, 'और उतारो।' ऐसे-ऐसे कर के अप्सरा ने उनके सामने अपना आखिरी कपड़ा भी उतार दिया।अब उसके पास उतारने के लिए कुछ नहीं बचा। ऋषि ने उसको देखा और बोले, 'और उतारो, और उतारो। ये जो आखिरी खाल तुमने पहन रखी है, अब इसको भी उतारो।'

ये होता है दुनियाभर की सब अप्सराओं का हाल, जब आप में तप जग जाता है। वो आपके सामने उतार रही होंगी, आप कहेंगे, 'और उतारो।' हाल में कोई बबुआ नंगा हो गया है, आप कहेंगे, 'अभी और उतारो। अभी तो तू बहुत कुछ पहने हुए है। तू देह ही नहीं पहने हुए है, तू अपने सारे पूर्वाग्रह पहने हुए है, तू अपनी पहचानें पहने हुए है, तू दुनियाभर की वृत्तियाँ पहने हुए है।बहुत कुछ है, जो तू ने अभी धारण कर रखा है। जो कुछ तू ने धारण कर रखा है, अभी और उतार। अभी नग्न तो तू हुआ ही नहीं है। अभी तो बस यूँ निर्वस्त्र हुआ है।'

ऋषि उससे बोले, 'अभी और उतारो।' कहानी कहती है, फिर अप्सरा आ कर उनके पाँव में पड़ गई, बोली, 'गलती कर दी, ये कोशिश नहीं करनी चाहिए थी।' मैं समझता हूँ, ऋषि ने कहा होगा, 'अब उतरा पूरा, अब पूरा उतरा! अभी तक तो तू बस ऊपर ऊपर की चीज़ें उतार रही थी।'

वस्त्र उतारने में रखा क्या है? बहुत छोटी बात है कपड़े उतारना। कपड़े तो कहीं भी उतर जाते हैं। नग्नता! अपने आप को पूरी तरह उद्घाटित कर देना, अनावृत कर देना, अपने आप को, बिलकुल अलग बात है। उसके आध्यात्मिक अर्थ होते हैं। उसका अर्थ होता है—तुमने जो भी कुछ धारण कर रखा है व्यर्थ का, वो सब उतार दो, सारा अपना बोझ छोड़ दो।

जब आप ऐसे हो जाएँ कि जानने लग जाएँ कि व्यक्ति की सच्चाई आत्मा है; बाकी सब तो वैसे ही व्यर्थ का है। उसके बाद कोई आपको अपना जिस्म दिखा के रिझा नहीं पाएगा। और ना ही फिर आप कपड़ों को बहुत महत्व देंगे। ये दोनों बातें एक साथ होंगी। न तो कोई आकर आपको शरीर दिखा के रिझा पाएगा और न आप ऐसे रह जाएँगे कि किसी का आकलन उसके वस्त्रों से करने लगें। आप स्वयं भी वस्त्रों को लेकर के बड़े सहज और बड़े अगंभीर हो जाएँगे। कुछ पहन लिया, तो पहन लिया। अच्छा पहना, अच्छा पहना। बुरा पहना, बुरा पहना। फिर आपका सारा ध्यान इसी में नहीं रहेगा कि कपड़े कैसे पहन रखे हैं। नये हैं, पुराने हैं, पूरे हैं, अधूरे हैं। जैसे हैं, तो हैं। कपड़े ही तो हैं। ये बात कुछ समझ में आ रही है?

ये जो इतना शोर मचता है न कि कोई नंगा हो गया वगैरह, वगैरह, वो इसलिए मचता है क्योंकि हम में देहभाव बहुत है। जो नंगा हो गया, वो विरोध का नहीं, उपेक्षा का अधिकारी है। आप राह चल रहे होते हो, इतने जीव-जंतु अगल बगल नंगे पड़े होते हैं, आप क्या वहाँ रुककर घूरना शुरू कर दोगे और प्रतिरोध करना शुरू कर दोगे और कहोगे शेम शेम ?

उपेक्षा करो और आगे बढ़ो। आपकी ही देह में कुछ नहीं रखा, तो उसकी देह में क्या ख़ास बात है? उपेक्षा! और आनेवाले समय में ये उपेक्षा और आवश्यक होगी क्योंकि ज़माना उदारवाद का है। ज़माना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का है। कोई नंगा हो करके सड़क पर भी घूम सकता है, आप क्या कर लोगे? भारत में हो सकता है, अभी, कुछ दिन ऐसा ना हो। आप विदेश जाओगे, वहाँ पाओगे ऐसे लोग बिलकुल हैं, जो सड़क पर नंगे घूमते हैं और ये उनका अधिकार होता है। वो कहते हैं, 'हम कैसे भी चल सकते हैं।' तो आप क्या करोगे? आप पगला जाओगे? आप छाती पीटने लगोगे? आप स्वयं को परेशान करने लगोगे?

नहीं! आपको क्या करना है? उपेक्षा! और उपेक्षा एक आध्यात्मिक मन ही कर सकता है। जो कहे कि देह में रखा क्या है। जैसे ये सारे कपड़े हैं, वैसे ही एक कपड़ा ये खाल का है। सारे कपड़े जैसे उतरते हैं, वैसे ही खाल भी तो उतर ही जानी है। इतना मैं खाल को क्या महत्व दूँ? किसी की जवान खाल, किसी की बूढ़ी खाल।

आप इस पर कंट्रोवर्सी (विवाद) भी करते हो, तो वो नंगे लोगों को ही फ़ायदा होता है। वो चाहते ही यही थे कि वो चर्चा में आएँ। आपने उनको चर्चा में ला दिया। आप विरोध करके भी उनका फ़ायदा ही कर रहे हो। विरोध भी नहीं करना है। काहे का विरोध? शरीर ही तो है! कोई बात नहीं बेटा! दिखा दिया। अब चढ्ढी पहन लो।(श्रोतागण हँसते हुए) हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ा। तुम पूरे नंगे हो गए, हमें उससे भी कोई अंतर नहीं पड़ा। लेकिन तुम्हें ठंडू लग जाएगा, अब चढ्ढी पहन लो।

प्र२: तो मैं हाल-फिलहाल में ए. पी. सर्कल पर एक पोस्ट पढ़ रहा था। तो उस में एक व्यक्ति का भी एक कमेंट आया कि आप ऐसे तो बहुत बोलते हैं कि महिलाओं के कम कपड़े पहनने पर और एक्ट्रेसेज़ के कम कपड़े पहनने पर, मगर आप खुद जब टेनिस खेलने जाते हैं, तो शॉर्ट्स पहनते हैं और वो फोटो भी अपलोड करते हैं।

आचार्य: भाई, मैंने कब कहा कि कम कपड़े पहनना गुनाह हो गया। और टेनिस मैं पजामा पहन के खेलूँगा क्या? ये कैसी मूर्खतापूर्ण बात है? मैं कह रहा हूँ, 'देह को बहुत महत्व दे करके दूसरे का ध्यान खींचना और उसके मन में भी देह को महत्वपूर्ण बना देना, गलत है।'

अध्यात्म देह नहीं, देहभाव के खिलाफ़ है, अंतर समझो। देह की खिलाफ़त करके क्या मिलेगा? देह की खिलाफ़त करके, तो देह को और महत्व दे दिया न? तुम जिसके खिलाफ़ नारेबाज़ी करते हो, तुम्हारे दिमाग में वही-वही तो घूम रहा होता है। तो हमें देह का विरोध भी नहीं करना है। देहभाव गलत है। मैं देह हूँ और दूसरे के मन में भी मुझे देह ही चमका देनी है, ये काम गलत है। कोई साधारण व्यक्ति बैठा हुआ है, अपना काम कर रहा है और तुम गए उसके आसपास अप्सरा की तरह नाचने लग गए कि उसके मन में भी वासना उठ जाए; ये चीज़ गलत होती है।

बाकी तो देह, देह है। मैं उस तौर पर संस्कृतिवादी नहीं हूँ कि कहूँ कि महिलाएँ सब कुर्ता-सलवार या साड़ी में ही चलें। यही भारत की शान है। मेरा ऐसा कोई आग्रह नहीं है भाई। मेरा सारा प्रयोजन मन से रहता है। अपनी सुविधा के लिए, खेल-कूद के लिए, आप अगर कम कपड़े पहन रहे हैं, तो ये बिलकुल ठीक है। कोई दिक्कत नहीं हो गई। बुर्का पहन के थोड़े ही तुम जा के समुद्र के बीच में प्रवेश करोगे।

ये हम कई बार दो चीज़ों को आपस में मिश्रित कर देते हैं। फिर हम कंफ्यूज़ (उलझना) हो जाते हैं। हमें लगता है कि अध्यात्म आम संस्कृति की ही तो बातें करता है और आध्यात्मिक आदमी तो वही होगा न जो कहे कि सब महिलाओं को साड़ी पहन के और सर ढक के बाहर निकलना चाहिए। अंतर समझना! अध्यात्म ये भी नहीं बोलता कि महिलाओं को नग्न घूमना चाहिए।

अध्यात्म कहता है, 'मुझे इस बात से मतलब ही नहीं है। क्योंकि मुझे देह से मतलब ही नहीं रखना।' देवी जी, मैं आपकी देह से मतलब ही नहीं रख रहा। अगर मैं ये भी बार-बार आग्रह करूँ कि आप साड़ी ही पहनिए, तो इसका भी क्या अर्थ है? मैंने आपको कैसे देखा? देह की तरह देखा। तो देह ढक कर रखो, देह ढक कर रखो, आँचल ठीक करो।

और आपसे विनती है कि आप भी अपने आप को देह न मानिए। जब आप अपने आप को देह नहीं मानते हैं तो कपड़े फिर सिर्फ़ एक सुविधा की चीज़ हो जाते हैं। फिर वो इतनी बड़ी बात नहीं रहते कि लंबी-चौड़ी बहस इसी बात पर हो रही है कि आदमियों को क्या पहनना चाहिए, औरतों को क्या पहनना चाहिए। ये बेकार की बहस है। ज़्यादा महत्वपूर्ण मुद्दों की बात करो ना। ये क्या है कि औरतें क्या पहनेंगी, इस पर एक लंबा-चौड़ा कार्यक्रम तैयार किया जा रहा है। आदमी क्या पहनेंगे, इस पर एक बड़ी चर्चा छिड़ी हुई है। मैं महिला होता, तो मैं कभी ना स्वीकार करता कि मुझे कोई आकर बताए कि क्या पहनो और क्या नहीं। तू कौन है! शू!

सहज जीवन, सहज वस्त्र। देह है, तो है। देहभाव नहीं रखना है।

इन्होंने मुझे टेनिस खेलते देख लिया, तो इनको सदमा लग गया। ये मुझे स्वीमिंग (तैराकी) करते देख लेंगे, तो इन्हें क्या लगेगा? और मैं बता दूँ कि स्वीमिंग मैं स्वीमिंग कॉस्ट्यूम (तैराकी की पोशाक) में ही करता हूँ। सारी आध्यात्मिक धारणाएँ बिलकुल छनछना के टूट गई। ये क्या देख लिया स्वीमिंग पूल में! मन मंदिर ध्वस्त हो गया, ये आचार्य हैं!

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