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एक छोटी सी चेतावनी उनको, जो उलझे हैं छोटी बातों में
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
31 min
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प्रश्नकर्ता: मैंने जीवन में अभी तक लाभ-हानि देखकर ही निर्णय लिया लेकिन अभी मुझे जीवन में कोई सार नज़र नहीं आता। अब मैं आपके पास बैठकर बस देखना चाहता हूँ। अब मैं अध्यात्म की ओर ही आना चाहता हूँ।

आचार्य प्रशांत: अच्छा है। कहीं कोई दुविधा है?

प्र: आपके पास बैठकर सारी दुविधा दूर हो जाएँगी।

आचार्य: बात क्या है पूरी उसको याद रखा करिए।

पूरी बात के छोटे हिस्सों में उलझ गए तो पूरी बात को गँवा देंगे। ये जो छोटा हिस्सा है ये है तो पूरे का ही पर जो छोटे में लिप्त हो गया, छोटे में ही खो गया वो पूरे को गँवा देगा।

पूरी बात क्या है? बहुत सीधी है — जीने के दस-बीस हद-से-हद किसी के तीस-चालीस साल और बचे हैं और ये बहुत ज़्यादा होते नहीं क्योंकि इतने तो आप जी ही चुके हैं न?

जितनी ज़िंदगी आप जी चुके हैं, ये देखा है कैसे पलक झपके बीती है? गौर किया?

अभी तो जवान थे आप बस कुछ ही दिन पहले। अभी स्कूल में थे, कॉलेज में थे और अभी बच्चे थे आप, यूँ ही दौड़-भाग रहे थे मैदान पर गलियों में, अभी-अभी, है न? और अचानक आप पाते हैं कि आप तीस के हैं, चालीस के हैं, पचास के हैं, साठ के हैं। कई युग, कुछ कल्प बीत गए क्या वहाँ तक पहुँचने में जहाँ आप आज पहुँच चुके हैं?

ये जो समय बीता है ये कैसे बीता है?

ये ऐसे बीता है चुटकी बजाते, ऐसे ही बीता है न? तो जो शेष है समय वो भी कैसे बीतेगा? कैसे बीतेगा?

देखिए अभी पैदा हुए थे आप। बहुत पीछे की बात नहीं है वो और अगर पैदा होने का क्षण बहुत पीछे की बात नहीं है तो चिता पर लेटने का क्षण भी बहुत आगे की बात नहीं है, या है?

देखिए अभी पैदा हुए थे, देखिए अभी अर्थी उठ ही रही है, देखिए अभी चिता को अग्नि दी जा रही है। बहुत आगे की बात है? सीमित है न समय, एकदम सीमित है, तो क्या करना है? भूल मत करो।

राख और मिट्टी को, खून और पानी को, हड्डी-माँस को आत्मा का दर्जा मत दो। आत्मा अमर होगी, नहीं मिटती होगी, ये काया कितने दिन की मेहमान है? कल, बस कल, तुम नहीं रहोगे इसी को 'अध्यात्म' कहते हैं।

'अध्यात्म' क्या है? स्वयं को जानना ही अध्यात्म है। आत्मा को जानना नहीं, मन को, काया को, इस नश्वर अस्तित्व को ही जानना अध्यात्म है। जो इसको जान गया वो जानने वाले में स्थापित हो जाता है।

आत्मा जानी नहीं जाती, आत्मस्थ हुआ जाता है। दो बहुत अलग-अलग बातें हैं। आत्मज्ञ होना असंभव है, आत्मस्थ होना संभव है।

तो अध्यात्म पूरा यही है कि जानना कल नहीं रहोगे। अब क्या करना है इस एक पल का, इस ज़रा से समय का जो उपलब्ध है जीने के लिए?

मजबूरी में गुज़ार देना है, शिकायतों में गुज़ार देना है, मुँह लटकाए-लटकाए गुज़ार देना है? उलझ-उलझ कर, चिढ़-चिढ़ कर, चोट, खरोचें और घाव खा-खाकर गुज़ार देना है या कुछ और उद्देश्य हो सकता है समय का, जीवन का?

ये है बड़ी बात और ये बड़ी बात नहीं याद रहती हमें, हमें छोटी बात याद रहती है। छोटी बात ऐसी कि गाड़ी का इंश्योरेंस (बीमा) करा लें, आज सुबह नाश्ते पर पत्नी ने क्या कह दिया — ये सब याद रहता है। ये सब जीवन के क्षुद्र हिस्से हैं। ये जीवन नहीं है। और इन छोटे हिस्सों में जो खो गया वो छोटा ही हो जाएगा।

बड़े को याद रखकर के फिर छोटे से बातचीत की जाती है। बड़ी बात याद रहे तो छोटी सब चीजें अपने-आप ठीक हो जाती हैं पर छोटा महत्वपूर्ण हो गया इतना ज़्यादा कि छोटे का ही नशा हो गया और बड़े की कोई स्मृति ही नहीं, सब व्यर्थ जाता है फिर।

मंज़िल याद हो तो व्यक्ति बड़ी आसानी से तय कर लेता है कि रास्ते में जो दोराहे, तिराहे, चौराहे आ रहे हैं उनमें कैसे निर्णय लेने हैं। ठीक? मंज़िल अगर पता हो तो रास्ते की सब बाधाएँ झेलने योग्य हो जाती हैं और व्यक्ति भी इस योग्य हो जाता है कि उन्हें झेल ले क्योंकि तुम्हें मंज़िल का पता है। तुम जानते हो कि बड़ी बात क्या है तो छोटी सब बातें तुम सह जाओगे मुस्कुरा कर और छोटे तुम्हारे सारे निर्णय आसान हो जाएँगे बिना द्वंद के। ये लाभ होता है, ये वरदान मिलता है उसको जिसे बड़े की याद है।

जिसे बड़े की याद नहीं उसके लिए हर निर्णय बड़ा यातनापूर्ण होता है। खड़े हो चौराहे पर समझ ही नहीं पा रहे हो कि इधर जाएँ, उधर जाएँ, किधर जाएँ। बार-बार लौट रहे हो, तमाम तरह के प्रयोग कर रहे हो, सर खुजला रहे हो, इससे पूछ रहे हो, उससे पूछ रहे हो। जीवन और समय और ऊर्जा व्यर्थ गँवा रहे हो।

कभी देखा है तीन-सौ चार-सौ किलोमीटर की यात्रा पर जाओ और खुद ही चला रहे हो गाड़ी, रास्ते में कितनी सम्भावनाएँ आती हैं। सैकड़ों तो दुकानें आती हैं किसी पर भी रुक सकते हो, रुक सकते हो या नहीं? न जाने कितनी गलियाँ, कितने मोड़ आते हैं कहीं भी मुड़ सकते हो, मुड़ सकते हो कि नहीं? पर क्या बेचैनी होती है, घबराहट होती है कि, "अरे बाप रे, सामने फिर से एक और मोड़ आ रहा है, क्या करें मुड़ें कि न मुड़ें?" होती है ऐसी बेचैनी? होती है क्या?

मंज़िल पता हो और सामने चौराहा दिख रहा हो तो अचानक बेचैन हो जाते हो कि, "क्या करें? एक और चौराहा आ गया!" ऐसा होता है?

तुम्हें फर्क ही नहीं पड़ता चौराहा आ रहा हो, दोराहा आ रहा हो, बल्कि तुम्हें तब भी फर्क नहीं पड़ता अगर सीधा रास्ता अवरुद्ध हो। रास्ता अवरुद्ध है कोई बात नहीं तुम्हें मंज़िल पता है तुम क्या करते हो? तुम दूसरा रास्ता खोज लेते हो। खोज लेते हो न?

और यहीं न पता हो मंज़िल तो कदम-कदम पर बड़ी पीड़ा है क्योंकि सब दुकानें तुमको बुला रही हैं, "यहाँ आ जाओ, वहाँ आ जाओ।" मोड़ पर मोड़ हैं, रुकने के अड्डे हैं, आओ आराम कर लो; विश्राम गृह है।

देख रहे हो दोनों तरफ से कैसे मारे जा रहे हो? पहली बात, जितने भी तुमको रास्ते में अवसर मिल रहे हैं वो सब तुम्हारे लिए बड़े दर्द का कारण बन जा रहे हैं क्योंकि तुम्हें मालूम ही नहीं कि उन अवसरों का करना क्या है।

रास्ते की हर दुकान क्या है? एक अवसर। हर ढाबा, हर होटल क्या है? एक अवसर। कि रुक जाएँ कि न रुकें।

तो रास्ते में जो कुछ भी है वो तुम्हारे लिए क्या बन गया? वेदना का कारण, तुम्हें पता ही नहीं उसका करें क्या। ये पहली चोट है।

और दूसरी तरफ से क्या चोट पड़ रही है? इधर-उधर रुक करके, गलत राहों को चुन करके समय गँवा रहे हो। दोनों तरफ से मारे गए न।

ये हम सब की हालत है। वो दोनों तरफ से चोट खा रहा है। माया मिली न राम — मंज़िल तक तो पहुँच ही नहीं पा रहा तो राम से चूका और माया भी उसे कोई सुख नहीं दे रही है उसे लगातार नचा रही है। वो रास्ते पर ही लट्टू की तरह नाच रहा है।

ये हम सब की कहानी है, है न? ये सज़ा है बड़ी बात न याद रखने की। बड़ी बात याद न रखना अपनी सज़ा आप है। जिसे बड़ी बात नहीं याद है वो छोटी बात में उलझेगा। उसका चित्त हमेशा जो क्षुद्रतम चीज होगी उसी की तरफ आकर्षित रहेगा, उसी से जाकर लिपट जाएगा, लपटा-झपटी करेगा।

छोटी-छोटी चालें, चालाकियाँ, छोटे लाभ, छोटी हानियाँ और ये सब बड़े उलझाऊ होते हैं। इनमें उलझ जाओ समय कैसे बीतेगा तुम्हें पता नहीं चलेगा, दिन-महीने, साल-दशक कहाँ फिसल गए समझ ही नहीं पाओगे।

तुम्हारे पास एक सौ का नोट भी होता है तो थोड़ा तो ख्याल करते हो न कि, "खर्च कहाँ कर रहा हूँ?" करते हो कि नहीं? ज़िंदगी की कीमत सौ के नोट से भी कम है क्या कि उसका ख्याल ही नहीं करते कहाँ खर्च कर रहे हो?

क्या किया आज तीन घंटे? क्यों किया? क्यों खर्च कर रहे हो अपना समय वहाँ जहाँ कर रहे हो? कोई कारण तो बताओ जहाँ अपना समय रोज़ लगा रहे हो वहाँ क्यों लगा रहे हो?

भाई, तुम्हारे पास बस इतना-सा ही समय है और उसे तुम रोज़ कहीं पर व्यय कर रहे हो, क्यों?

क्यों? कुछ उत्तर दीजिए, क्यों?

प्र१: पैसा मिलेगा।

प्र२: आजीविका के लिए।

आचार्य: क्या करोगे उसका?

गाड़ी में पेट्रोल, इंधन डला कर करोगे क्या अगर मंज़िल का ही पता नहीं?

पैसा इंधन है। करोगे क्या उसका?

तुम्हारी हालत उस आदमी की है जो चला है मंज़िल की ओर और रास्ते में ही कहीं रुक करके कहीं नौकरी करने लग गया है, वो वहीं रुक गया है और नौकरी कर रहा है उससे पूछो, "नौकरी क्यों कर रहे हो?"

तो बोल रहा है, "उसी से तो पेट्रोल खरीदूँगा न, पैसा!" तू उस पेट्रोल का करेगा क्या, तू तो रुक गया है?

मंज़िल को तो तू कब का भूल गया। तू कहता है तू नौकरी करता है, नौकरी से तू इंधन खरीदता है। भोजन क्या है? पेट्रोल।

जिस आदमी को मंजिल का कुछ पता नहीं, वो कर क्या रहा है बार-बार गाड़ी की टंकी भरा कर?

शहर के चक्कर काटते हो और फिर जब गाड़ी थक जाती है तो कहते हो कि, "थोड़ा और इसमें अब पेट्रोल डलाना है तो उसके लिए नौकरी करनी पड़ेगी।"

बरसाती कीड़े का-सा है आदमी का जीवन, ऐसे बीत (चुटकी बजाते हुए) जाता है। और हम इसी भ्रम में हैं कि अभी समय बहुत है हमारे पास। जब समय लगता है कि बहुत है, करीब-करीब यही भाव रहता है कि, "हम तो अभी चलेंगे", अहम् अपने आप को आत्मा ही मानता है न?

अहम् अपने आपको सत्य ही मानता है, सत्य माने आत्मा। तो जब अपने-आपको आत्मा मानता है तो अपने-आपको अमर भी मानता है तो भाव हमें यही रहता है कि, "हम अभी चलेंगे, अमर जैसे ही हैं।" और जहाँ ये भाव आया कि अभी हम चलेंगे तहाँ तुम समय का सम्मान करना छोड़ देते हो। जहाँ ये भाव आया कि, "हम तो अभी चलेंगे, हम ही आत्मा हैं, हम ही अमर हैं!" तहाँ तुम समय व्यर्थ करना शुरू कर देते हो।

याद रहे कि अगर एक ही पूंजी है और वो हाथों से फिसलती जा रही है तो कैसे वो सब कुछ कर पाओगे जो करते हो रोज़? दम नहीं घुटेगा, घिन्न नहीं आएगी अपने मिनट, अपने घण्टे मूर्खताओं में बर्बाद करते हुए?

पहली बात तो देने वाले ने समय बहुत कम दिया। उम्र के जितने भी साल होते हैं उनमें से एक तिहाई तो सोते हुए निकल जाते हैं, एक चौथाई दैनिक क्रियाओं, दैनिक आवश्यकताओं में निकल जाते हैं। और एक चौथाई समझ लो कि बचपन और किशोरावस्था में निकल गए, जब कुछ समझ ही नहीं थी। और एक चौथाई जर्जर बुढ़ापे में निकल जाएँगे जब कोई शक्ति, कोई ऊर्जा नहीं रहेगी, कोई होश भी नहीं रहेगा, पड़े हैं बिस्तर पर तो कुल समय कितना बचा?

पंद्रह साल हटा दो किशोरावस्था के आखिरी के भी दस साल हटा दो, कितने हटे? पच्चीस, और मान लो कि तुम्हारी उम्र जितना तुम जियोगे वो है कुल पचहत्तर, बहुत दिया, बहुत सारे लोग इतना चलेंगे नहीं पर दिए, कितने दिए? पचहत्तर। पचहत्तर में से अभी कितने उड़ गए? पच्चीस।

अब एक तिहाई उसमें से सोने के हटा दो, कितने उड़ गए? कुल पचास, ठीक?

पचहत्तर में से हटा रहे हैं, पंद्रह हटाए किशोरावस्था तक के, दस हटाए बुढ़ापे के, पच्चीस हटाए सोने के तो अब कुल कितने हट चुके हैं? पचास।

अब उसमें से दस करीब हटा दो नित्य क्रियाओं के। ये जो सुबह उठते हो फिर खाना खाने में समय लग रहा है, नाश्ते में समय लग रहा है, मुँह धो रहे हो, स्नान-शौच कर रहे हो, जी रहे हो तो कुछ कमाना भी पड़ेगा उसमें भी कुछ तो न्यूनतम समय लगाओ ही।

ये वो समय है जो तुम्हारी मर्जी से नहीं जा रहा, तुमसे छीना जा रहा है। सड़क पर समय लग रहा है, खड़े हुए हैं ट्रैफिक लाइट के सामने, वो कोई समय का सदुपयोग है? तो ऐसे भी करीब हटा दो दस-पंद्रह साल, तो पचास में जोड़ दो पंद्रह और कितने हटे? पैंसठ।

आदमी को कुल समय कितना मिलता है कुछ सृजनात्मक, सकारात्मक कर लेने के लिए कि जीवन सफल हो पाए, मंज़िल तक पहुँच पाए? कितना मिलता है?

श्रोतागण: दस साल।

आचार्य: दस साल मिलता है वो भी तब जब पचहत्तर दिए हैं, पचहत्तर अगर दिए हैं तो उसमें से दस साल मिलते हैं कुछ करने के लिए। अब दस साल तुम तो कब के गँवा आए, छोड़ो न! दस साल तो धुँए में उड़ा दिए।

हमें बिलकुल होश नहीं आता। देने वाले ने कुल दस साल दिए हैं होश के और ऊर्जा के, कि कुछ कर सकते हो तो कर लो।

होश किस चीज़ ने ढक लिया?

कभी कामवासना ने, कभी ईर्ष्या ने, कभी पैसे ने। और ऊर्जा कहाँ चली गई? इन्हीं चीज़ों में — कभी दुकान चलाने में, कभी घरेलू पच-पच में, कभी औरतों के पीछे भागने में, कभी आदमी के पीछे भागने में। इतने लफड़े-पचड़े हैं, दस साल तो उसके लिए बहुत कम हैं न?

हमने जो पैंसठ साल गिने थे उसमें लफड़ों के लिए साल गिने थे अभी तक?

पचहत्तर में से अभी हाल हमने कितने हटाए थे? पच्चीस सोने के, पंद्रह बचपने के, दस बुढ़ापे के और पंद्रह नित्य क्रियाओं के। उसमें अभी तो हमने प्रपंचों के साल तो हटाए ही नहीं थे या हटाए थे? दो-दो, चार-चार घण्टे "डार्लिंग! डार्लिंग!" वो तो अभी गिना ही नहीं था कि गिना था?

और सप्ताह अंत आया है तो दोस्तों के साथ चार-चार, छः-छः घंटे की शराब की महफ़िल और बकवास, गॉसिप वो तो हमने गिना ही नहीं कि गिना?

वो सब किसमें से जा रहा है?

वो जो कुल दस साल बचे हैं और वो सब करने के लिए तो दस साल बहुत कम हैं, हैं न? उसमें तो हम पहले ही शायद दस से ज़्यादा साल निकाल चुके हैं तो अब बचा क्या है हाथ में? झोली खाली।

सोना कम कर नहीं सकते, बचपन में जो पंद्रह गँवा दिए वो लौट कर नहीं ला पाओगे, नित्य क्रियाओं में समय लगेगा-ही-लगेगा, बुढ़ापे पर कोई बस नहीं और कुल दस साल का जो शेष समय मिला था वो तो कब का उड़ा दिया धुँए में। अब कमा किसके लिए रहें हो भाई? जीने का फायदा क्या है ये तो बता दो?

इसको मैं कहता हूँ बड़ी बात, बड़ी पिक्चर। वो हमें दिखती नहीं।

साधक में, मेरी दृष्टि में, एक हड़बड़ाहट होनी चाहिए, उसके भीतर लगातार ये भाव होना चाहिए कि समय कम है, वो उपलब्ध नहीं होना चाहिए जीवन का एक भी क्षण व्यर्थ गँवाने को। और जब मैं साधक कह रहा हूँ तो आशय न सफेद रंग से लगा लेना, न भगवे रंग से लगा लेना, न अध्यात्म से लगा लेना, न ज्ञान से, न भक्ति से।

जब मैं साधक कह रहा हूँ तो मेरा आशय है एक आदमी जो पागल नहीं है। जब मैं कहूँ, "साधक" तो उससे मेरा आशय किसी बहुत विशिष्ट या उच्च-कोटि के आदमी से नहीं है। 'साधना' से मेरा आशय है सामान्य, होशपूर्ण जीवन।

जो साधक नहीं है वो पागल है। ऐसा नहीं होता कि तीन कोटियों के लोग होते हैं — पागल, समान्य और साधक। हम आमतौर पर यही तीन कोटियाँ समझते हैं तो हम कहते हैं, "देखिए हम पागल भी नहीं हैं, हम साधक भी नहीं हैं हम तो आमजन हैं" ऐसा ही कहते हो न?

नहीं, तीन कोटियाँ नहीं होती, दो ही कोटियाँ होती हैं, या तो पागल है या साधक है। सामान्य जैसा कुछ नहीं होता। जिसको तुम सामान्य कहते हो अगर वो साधक नहीं है तो पागल ही है।

साधक में, मैं कह रहा हूँ, एक जल्दबाज़ी होनी चाहिए। इस जल्दबाज़ी का संबंध वियोग से है। जो मंज़िल से दूर है उसमें सब्र तो बहुत होना चाहिए लेकिन साथ-ही-साथ दूरी की पीड़ा भी। दूरी की जब पीड़ा है तो वो कहेगा, "मंज़िल जितनी जल्दी मिले उतना अच्छा।" वो बार-बार कहेगा, "मंज़िल चाहिए! मंज़िल चाहिए! कम-से-कम में चाहिए, हाँ, समय लगेगा जितना भी उसके लिए हम तैयार हैं।" ये बात सब्र की और धैर्य की हुई। समय जितना भी लगेगा उसके लिए हम तैयार तो हैं पर इच्छा हमारी यही है कि समय कम-से-कम लगे।

इन दोनों बातों को एक साथ समझिएगा। साधना में धीरज और अधीरता दोनों एक साथ चाहिए। धीरज चाहिए कि, "जितना भी समय लगेगा हम अडिग रहेंगे, समय ज़्यादा लग रहा होगा तो हम टूट नहीं जाएँगे। कितना भी समय लगेगा हम बर्दाश्त करेंगे।" और उसमें अधैर्य भी होना चाहिए, कि, "पीड़ा बहुत होती है मंज़िल से दूर रहने पर तो जितना कम समय लगे मंज़िल पहुँचने में उतना अच्छा।"

अगर आप में वो अधैर्य है, अगर आप में वो तत्परता है, अगर आपमें वो शीघ्रता है तो आप समय गँवा कैसे दोगे? आप कैसे कह दोगे कि, "ये धंधा करना और वो धंधा करना है और इस मसले में उलझना है और उस टंटे में लिप्त रहना है? और इसने ये कह दिया और उसने वो कह दिया और ये अच्छा है वो बुरा है।" वही रोज़ की किच-किच मच-मच, ये सब कर कैसे लोगे?

तुम मैराथन दौड़ रहे हो, मैराथन दौड़ना कई मायनों में सौ मीटर, दो-सौ, चार-सौ मीटर दौड़ने से ज़्यादा मुश्किल है, कैसे?

पहली बात, तो दूरी बहुत लंबी है और दूसरी बात प्रतिस्पर्धा है तो तुम्हें कम-से-कम समय में पहुँचना है। तुमने ज़्यादा समय लगाया तो हार गए। तो पहली बात लंबी दूरी, धीरज चाहिए न, लंबी दूरी तय करने के लिए क्या चाहिए? धीरज।

दूसरी बात प्रतिस्पर्धा भी है तो समय कम-से-कम लगना चाहिए तो अधैर्य भी चाहिए, जल्दबाज़ी भी चाहिए। यही नहीं कह सकते, लंबी दूरी है धैर्य रखो हम पहुँच जाएँगे दो-चार दिन में। तुम दो-चार दिन में पहुँचोगे तो हार गए खेल।"

जीवन को मैराथन समझो, दूरी बहुत लंबी भी है और समय भी कम-से-कम लगना चाहिए क्योंकि प्रतिस्पर्धी हैं। बहुत सारे प्रतिस्पर्धी नहीं हैं एक ही है उसका नाम है मौत।

मंज़िल पर तुम पहले पहुँचते हो या मौत पहले पहुँच कर जीत जाती है, तुम मंज़िल तक पहुँचे या मौत तुम तक पहुँची, कौन पहले पहुँचा सारा खेल इसी बात का है।

हमें एहसास ही नहीं है ज़रा सा भी कि ये चल क्या रहा है, बड़ी बात क्या है हमें दिख ही नहीं रहा। हमारी हालत ऐसी है कि कोई मैराथन का धावक, वो दौड़ते-दौड़ते फ़ोन पर लगा हुआ है — "हाँ, तू क्या कह रही है? नहीं मेरी माँ से न लड़ आज, नहीं तो मैं तेरी माँ से भी लड़ूँगा।" और फ़ोन लिए ये कोने में हो गया है और वहाँ बात कर रहा है — "देख, मेरी मम्मी तेरी मम्मी से अच्छी है न? भैया, ज़रा चाय बनाना!" वहाँ बगल में एक खोखा भी मिल गया है उसको तो वहाँ चाय भी बनवाने लग गया, बैठ कर चाय पी रहा है। ये मैराथन के धावक हैं और ये, "मेरी मम्मी, ये तेरी मम्मी" चल रहा है।

ये बात करनी ज़रूरी है। अध्यात्म का ये अर्थ नहीं है कि यहाँ ऊँची-ऊँची ही बाते होंगी। मुझे उन बातों को भी तो संबोधित करना है न जो आपकी ज़िन्दगी खा गई बिलकुल, कौन-सी बाते ज़िंदगी खा गई? यही तो खा गई — "मेरी मम्मी, तेरी मम्मी!" इन्हीं बातों ने न खा ली ज़िंदगी?

कोई माया नाम की शक्ति तो नहीं आई थी आपको तबाह करने, कि आई थी किसी दिन? आई हो तो बताओ कि सत्ताईस सितंबर दो-हज़ार चौदह को माया आई थी। माया तो नहीं आती, जिंदगी को कौन खा गया? साफ-सुथरी तत्सम भाषा में तो शब्द भी नहीं है उसके लिए जो खा गया ज़िंदगी को, उसके लिए तो मैं यही कह सकता हूँ, "लफड़े-पचड़े, झगड़े-टंटे"।

यहीं खा गए न? काहे में फँसे हुए हैं? एक नया लफड़ा शुरू किया है जनाब ने।

दोस्तियाँ, यारियाँ उसके बाद दोस्त पैसे लेकर भाग गया, दिल टूट गया। यही चल रहा है न? और याद ही नहीं कि तुम हो कौन। तुम मैराथन के धावक हो भाई।

न जीतने की सज़ा क्या है? मौत ही नहीं, मौत तो सबको आती है, अतृप्त मौत, बिलखती हुई मौत, हारी हुई मौत। क्षमा कीजिएगा - कुत्ते की मौत। हमें पता ही नहीं कि ये सज़ा इंतज़ार कर रही है हमारा।

हमारा यही चल रहा है — "तू ऐसी, तेरा भइया ऐसा! फ़ोन दिखा ज़रा क्या है तेरे वॉट्सएप में? ये नौकरी छोड़ देता हूँ ज़रा बगल की दुकान की नौकरी कर लेता हूँ!" इससे बड़ा कोई मुद्दा है जीवन में?

मैराथन का धावक दौड़ते-दौड़ते मुड़ गया है एक गली में और वहाँ जाकर बैठ गया है पिंटू समोसे वाले के यहाँ और वहाँ बैठ कर समोसे वाली को देख रहा है समोसा छनते हुए!

(प्रश्नकर्ता मुस्कुराते हैं)

मुस्कुरा क्या रहे हो, ज़िंदगी इन्हीं बातों में गई है और जा रही है और क्या किया है जीवन भर? सार बताओ जीवन का क्या किया है? क्या हाँसिल किया है? कहोगे, "नौकरी करी है" किसलिए? पेट चलाने के लिए।

जो खाया भीतर वो या तो माँस बन गया या तो मल। ये पूरे जीवन की उपलब्धि है कि तुमने माँस और मल पैदा किया है? बताओ न और क्या किया है?

सबका एक नाम है — "माँस-मल"!

मुझे बताओ पूरे जीवन में क्या है जो खड़ा किया तुमने, जिसको जन्म दिया तुमने, जो तुम्हारे जीवन का उत्कर्ष कहलाए, आभा कहलाए? और क्या है? माँस और मल! और इसी में पूरी व्यस्तता है - "नौकरी करने जा रहे हैं!"

करोगे क्या उसका? "खाएँगे!" "तरह-तरह से खाएँगे, मुँह से खाएँगे, आँख से खाएँगे, कान से खाएँगे, हर तरह से भोग करेंगे।"

कुछ निर्णय लेना आसान हो रहा है? बड़ी बात दिखाई देती है तो निर्णय लेना आसान हो जाता है न बिलकुल?

कश्मीर से कन्याकुमारी भी जा रहे हो, अगर साफ पता है कहाँ पहुँचना है तो रास्ते चुनना बहुत मुश्किल रहेगा क्या? बोलो?

और यहाँ बगल वाले ही चौराहे पर खड़े हो और जानते ही नहीं जाना कहाँ है तो रहना परेशान। ये गोल चक्कर है बहुत बड़ा सा, उसी में गोल-गोल जीवन भर घूमते रहो क्योंकि जानते ही नहीं जाना कहाँ है।

जो जानता है कहाँ जाना है उसके लिए कोई निर्णय कठिन नहीं और ये बड़े आनन्द की बात होती है। निर्णय लेने में हमें सोचना पड़ता ही नहीं, हमारे सारे निर्णय तत्क्षण होते हैं, हम द्वंद के शिकार ही नहीं होते कभी। ओहा-पोह में फँसते ही नहीं!

एक ज़िंदगी, एक मंज़िल — यही सूत्र है, यही मंत्र है। रास्ते में चिंटू-पिंटू, समोसा वाली, तेरी मम्मी-मेरी मम्मी, अंटे-टंटे-पंटे, अंडे-डंडे ये दिखाई भी नहीं देने चाहिए न? कि दिखाई देने चाहिए?

जानते हो आदमी अकेला जीव है जो काम करता है और उसे काम करना पड़ेगा, कोई पशु काम नहीं करता वो क्रियाएँ करते हैं।

पशु क्या करते हैं? क्रियाएँ, कर्म नहीं करते, कर्म का सिद्धांत पशुओं पर लागू ही नहीं होता। पशुओं के पास क्या होती है सिर्फ? क्रियाएँ। मनुष्य के पास क्या होता है? कर्म।

आदमी काम करता है, आदमी काम इसलिए करता है क्योंकि आदमी को सिर्फ पेट नहीं चलाना है, आदमी को कुछ और चाहिए और अधिकांश लोग काम के नाम पर सिर्फ पेट चलाते हैं और धिक्कार है ऐसी ज़िंदगी पर जो पेट के लिए जी जा रही है, चाहे अपना पेट हो चाहे दूसरे का पेट हो। चाहे ये कहो कि, "अपने पेट के लिए मैं दिनभर खटता हूँ", चाहे ये कहो कि, "अपने और बीवी-बच्चों के पेट के लिए दिनभर खटता हूँ।" धिक्कार है! फिर पशु हो, ये तो क्रिया है।

गाए घास चरती है, किसके लिए? पेट के लिए। ये काम तो गाए भी कर रही है, बंदर भी कर रहा है, शेर भी कर रहा है सब कर रहे हैं। पेट के लिए जो जी रहा है सो पशु है।

मनुष्य को कर्म करने हैं और समस्त कर्मों का एक ही आशय हो सकता है — मुक्ति। तो तुम ये बताओ कि कर्म कर भी रहे हो या पशुओं जैसा ही जीवन बिता रहे हो? हाँ, कोई छोटा पशु हो सकता है मनुष्य रूप में और कोई मनुष्य रूप में बड़ा पशु हो सकता है।

कोई छोटी-मोटी नौकरी कर रहा है कम कमा रहा है तो वो छोटा पशु है, बंदर है। उसके हाथ बस छोटे-छोटे फल लग रहे हैं पत्तियाँ लग रही हैं और कोई बहुत बड़ी नौकरी कर रहा है, सी.ई.ओ है, सरकार में बड़ा अधिकारी है पर अगर वो भी नौकरी पेट के लिए ही कर रहा है तो वो अधिक-से-अधिक क्या हुआ? बड़ा पशु, हाथी हो गया।

छोटा पशु छोटा कमाता है पर डालता कहाँ है? पेट में। बड़ा पशु ज़्यादा कमाता है, डालता कहाँ है? मूलतः तो बराबर ही हैं न दोनों? दोनों ही क्रियाएँ कर रहे हैं। ये प्राकृतिक क्रिया है - खाओ!

खाना-पीना, सोना-उठना-जगना, प्रजनन — ये सब क्या है? ये प्राकृतिक क्रियाएँ हैं। इनमें कहीं पर भी कर्म नहीं है। इन्हें श्री कृष्ण कहते हैं 'अकर्म', इनमें कुछ रखा नहीं है। ये तुम नहीं कर रहे, ये प्रकृति तुमसे करवा रही है। पेट तो चलाना ही है, ये प्राकृतिक घटना है। कौवे को भी पेट चलाना है, कोयल को भी पेट चलाना है, गिद्ध, सुअर सब को पेट चलाना है, चलाना है न?

पेट चलाने के लिए जो जी रहा है वो क्या हुआ फिर? पशु। पेट चलाने में ही जिसका पूरी दिन व्यतीत हो रहा है वो क्या हुआ फिर? पशु।

ये बात याद रहेगी? जो कोई पेट के लिए नौकरी कर रहा है चाहे वो ऊँची-से-ऊँची नौकरी कर रहा है, वो है जानवर ही। अब पैसे को पेट से अलग मत समझ लेना, सब उपभोग्य चीज़ है।

ठीक है अगर तुम महीने के कई-कई लाख कमा रहे हो तो वो सब तुम मुँह से नहीं खा जाओगे, उदरस्थ नहीं कर लोगे लेकिन खाते तो हो ही न?

कोई गरीब हो वो महीने का आठ-दस हज़ार ही कमाता है तो वो जितना कमाता है करीब-करीब पूरा ही पेट में डाल लेता है, अपने पेट में, अपने परिवार के पेट में। जो लोग कम कमाते हैं उनकी कमाई का सत्तर-अस्सी-नब्बे प्रतिशत कहाँ चला जाता है? उनके पेट में चला जाता है।

जो ज़्यादा कमाते हैं उनकी कमाई का दो ही चार प्रतिशत उनके पेट में जाता है लेकिन बाकी भी वो खाते ही है। मुँह से नहीं खाते तो कहाँ से खाते हैं?

आँखों से खाते हैं, कान से खाते हैं, मन से खाते हैं।

बहुत बड़ा वाला टीवी ले लिया। इतने बड़े भी तो आते हैं न, यहाँ से लेकर यहाँ तक वाले भी तो आते हैं (दीवार के एक छोर से दूसरी छोर तक इशारा करते हुए) कि नहीं आते? वो इंच में नहीं फुट में नापे जाते हैं कि छत्तीस फुट का टीवी।

वो टीवी का क्या कर रहे हो? खा ही तो रहे हो, कहाँ से खा रहे हो? आँख से और कान से खा रहे हो।

खा ही तो रहे हो, बड़े जानवर ही तो हो। पूरी ज़िंदगी काहे में जा रही है? खाने में जा रही है। वो चर रहा है वहाँ बैल, बैल क्या कर रहा है? चर रहा है, बहुत सा चर रहा है कोई बात नहीं।

खरगोश इतनी घास खाता है, और हाथी? अरे बाप रे बाप! मन भर खाता है हाथी।

चींटी इतना सा दाना पकड़ती है और मीठा उसे बहुत पसंद है, किसके लिए? पेट के लिए। हाथी को भी मीठा-मीठा गन्ना बहुत पसंद है पर चींटी और हाथी में कोई मौलिक अंतर है क्या? दोनों को मीठा पसंद है किसके लिए? पेट के लिए।

तो ये जो नौकरी पेशा लोग हैं मैं इनसे कह रहा हूँ, "ये कर क्या रहे हो? पशुओं से भी गए गुज़रे हो?" पशु तो वो ही कर रहे हैं जो करने के लिए वो निर्मित हैं, प्रकृति ने उनका निर्माण ही ऐसा किया है कि वो बस खाएँगे और ये तुम क्या कर रहे हो? तुम तो इतने गए गुज़रे हो कि जानवर हो और जानते भी नहीं कि जानवर हो। तुम अपने-आपको न जाने क्या समझते हो!

कहते हो, "हम तो वित्तीय में काम करते हैं"। ठीक है, तुम वित्तीय में काम करने वाले जानवर हो। "हम तो आई.टी कम्पनी में काम करते हैं।" ठीक है, आई.टी कम्पनी के भीतर घूम रहे हैं बहुत सारे गाए-बैल-बकरे-सुअर वो सब वहाँ पर पहुँचे किसलिए है? खाने को और क्या करने को पहुँचे हैं?

उनके पास जीने के लिए कोई ऊँचा मकसद है पेट के अलावा? 'पेट' से भूलना नहीं मेरा आशय है उपभोग, पूरा-पूरा उपभोग। उपभोग के अलावा तुम्हारी ज़िंदगी में कोई लक्ष्य है? कोई मर्म है? कोई राग है? भोग के अलावा मुझे बताओ तुम्हारे पास कोई वजह है जीने की? सपने भी हैं जितने तुम्हारे उनके केंद्र पर क्या बैठा है बोलना सही-सही? भोग ही बैठा है न? "कल मैं और भोगूगा!" भग्ग बैल!

नाम अपना बताते हैं, "मैं वित्तीय सलाहकार हूँ", तो? तरह-तरह की भाषाएँ बोलते हैं जानवर तैने अंग्रेजी बोल दी। इतने कीड़े हैं सबकी अलग-अलग भाषा है तू आंग्ल भाषा में काँव-काँव कर रहा है, तो? है तो तू जानवर ही न? नरपशु!

पर हमारा मूल्यांकन गड़बड़ा गया है। मूल्य देने की जो पूरी आंतरिक व्यवस्था है वो भ्रष्ट हो गई है। हम इज़्ज़त देने लग जाते हैं इन सब बातों को, तुम बहकते क्यों हो ये समझा रहा हूँ।

हम इज़्ज़त देने लग जाते हैं इन सब बातों को, किन बातों को? "मैं वित्तिय सलाहकार हूँ।"

तत्काल नहीं कहते, "भग्ग जानवर!" ये न पूछा करो कि कोई किस नौकरी में है, पूछा करो कि जी किसके लिए रहा है? कर रहा होगा बड़ी-से-बड़ी नौकरी, किसके लिए कर रहा है? पेट के लिए ही तो कर रहा है।

उपेक्षा रखो, तिरस्कार रखो, दब मत जाया करो, तुम दब इसलिए जाते हो क्योंकि तुम्हें भी उन्हीं सब चीज़ों की चाह है जो उनके पास हैं। तुम देखते हो उन सब के पास वो सब चीजें हैं तो तुम बड़े प्रभावित हो जाते हो, तुम कहते हो, "वाह! क्या गाड़ी है! क्या बंगला है! बंगले के भीतर क्या बीवी है! यही सब तो मुझे भी चाहिए था।" तो तुमको लगता है, "बड़ी बात, बड़ी बात!"

अरे, इनमें से ये बताओ ऐसा क्या है जो जानवरों के पास नहीं होता? लंगूर के पास लंगूरी नहीं होती? बंदर के पास बंदरिया नहीं होती? अरे, होती है कि नहीं होती? उनके पास तो बहुत सारी होती हैं, तुम्हें क्या लगता है एक बंदर का एक ही बंदरिया के साथ चल रहा है? वहाँ तो रास्ते-ही-रास्ते हैं।

और तुम प्रभावित हो जाते हो, "अरे, वाह! अरे, वाह!"

उनके पास जो कुछ है वो जंगल का है। इंसान के पास जो होना चाहिए वो उनके पास नहीं है और तुम चूँकि उनसे प्रभावित हो इसलिए वो तुम्हारे पास भी नहीं है।

वो वही सब चीज़ों की आकांक्षा रख रहे हैं जिनके पीछे कोई पशु भी भागता है। बस पशुओं के तरीके बड़े आदिम होते हैं बिलकुल आदिकालीन, शुरुआती तरह के। आदमी के तरीके बदल गए हैं पर मंशा आदमी की भी वही है जो जानवर की है और जंगल की है। आदमी जंगल से बाहर आ गया है, जंगल आदमी के भीतर से अभी तक बाहर नहीं गया।

सब पशु जो कुछ करते हैं किसके लिए करते हैं? अपने लिए करते हैं। मादाएँ अधिक-से-अधिक अपने छौनों के लिए कर देती हैं पशुओं में। तुम भी अगर बहुत कुछ कर रहे हो लेकिन अपने लिए ही कर रहे हो या अपने छौनों के लिए कर रहे हो तो तुम जंगल के पशु या सड़क के कुत्ते से अलग कैसे हो ये बताओ?

सड़क पर भी जो जानवर है वो भी अपने छौनों के लिए कुछ-न-कुछ व्यवस्था कर ही देता है, करता है कि नहीं करता है? वही काम तो तुम भी कर रहे हो, तो तुम उनसे अलग कैसे हो ये बताओ? अपने लिए जीने पर तो पशुओं का एकाधिकार है ही, है या नहीं है? बोलो? और अपने पेट के लिए दूसरों को मार देने के लिए भी पशुओं को पूरी माफी है। वही काम तुम कर रहे हो, अपने पेट के लिए दूसरों को मार भी सकते हो।

हाँ, पशु जब मारते हैं तो बात सीधी रहती है, साफ-साफ दिख जाती है। मगर ने मुँह में मछली ली और दबा दी खच! और पानी में ख़ून फैल गया साफ दिख जाता है काम हो गया। तुम ज़रा होशियार और चालाक आदमी हो। तुम ऐसे नहीं मारते, तुम धीरे-धीरे खून चूसते हो किसी का। लेकिन काम तो बिलकुल वही कर रहे हो न जो जंगल का है? बोलो?

हम नरपशुओं के समाज में रह रहे हैं, हम नहीं जानते कि हम कौन हैं और हमें क्यों जीना चाहिए।

हमारी व्यवस्था में कुछ भी ऐसा नहीं है जो दैवीय हो। हमारी व्यवस्था में कुछ भी वैसा नहीं है जो हमें चैन दिला सके।

ये बात अगर समझ लो तो जीवन के सब निर्णय लेना बहुत आसान हो जाएगा। यही है वो जिसे मैं कह रहा हूँ 'बड़ी बात'। ये बड़ी बात है इसको समझ लो छोटी बातें सब हल हो जाएँगी, छोटे द्वंद बचेंगे ही नहीं।

इंसान पैदा हुए हो क्रिया नहीं कर्म करो और हमारा पूरा दिन भरा हुआ है क्रियाओं से, पचहत्तर में से साठ साल बीते हैं क्रियाओं में और जो शेष दस-पंद्रह साल हैं दुर्भाग्यवश वो भी जा ही रहे हैं क्रियाओं में ही, कर्म हम कर ही नहीं पा रहे, पुरुषार्थ हम दिखला ही नहीं पा रहे।

अब बात समझ में आ रही है साहब ने क्यों कहा था -

हीरा जनम अनमोल था, कौड़ी बदले जाय। रात गँवाई सोय कर, दिवस गवायों खाय।।

ये हमारी हालत है। ये उलाहना किसी बिल्ली या कुत्ते को दी जा सकती है?

वो भी तो यही करते हैं, सोते हैं और खाते हैं, इसके अलावा और कुछ करते हैं? पर उनको ये उलाहना कभी नहीं दी जाएगी, उनको ये ताना नहीं मारा जाएगा कि अरे, तूने रात गँवाई सोय के, दिवस गँवाया खाय।

हमारे खरगोश हैं वो सिर्फ यही करते हैं — सोते हैं और खाते हैं। तुम इंसान हो भाई उपभोग के लिए अगर जी रहे हो, उपभोक्ता ही बन गए हो, तुम्हारा जीवन बस उपभोग करने के लिए ही है अगर, तो छी!

बड़ी तस्वीर याद रखो।

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