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ध्यान से उठता है उपनिषद
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: मृत्यु की खोज में जाने का अर्थ क्या है, आचार्य जी?

आचार्य प्रशांत: मृत्यु की खोज में जाने का अर्थ क्या है? ज़मीनी तौर पर हुआ क्या? अगर इस कहानी के समानांतर एक वास्तविक घटना खड़ी करें, तो वास्तविक घटना में क्या हो रहा है? ये तो ठीक है, कथा रूप में कहा जा रहा है कि पिता ने यज्ञ किया। उसमें ऐसा ऐसा हुआ। जो गाय दी जा रही थी वो बूढ़ी थी। तो बेटे ने कहा, फिर उन्होंने कहा कि तुझे मृत्यु को देता हूं। तो यमराज के पास जाते हैं, और ऐसा-ऐसा बोलते हैं। इसके समकक्ष अगर कोई वास्तविक घटना हुई हो, तो वास्तव में क्या हुआ होगा? यमराज से बात कर रहा है नचिकेत, यह तो संकेत है। हो क्या रहा है? वास्तव में क्या हुआ होगा? यह बात हमारे मन में उठती नहीं है। हम बस ऐसे ही, "हां, ठीक है। नचिकेत और यम का संवाद चल रहा है और यम उसे कुछ-कुछ बोल रहे हैं।" ये जो यम बोल रहे हैं, ये जो मृत्यु से वो बात कर रहा है, ये क्या है?

प्र: शायद अपने मन में।

आचार्य जी: मन से बात कर रहा है, तो फिर कल्पनाओं में जी रहा है, फिर तो क्या बात करी।

प्र: खोजने निकले होंगे, तो जो भी मिलता गया होगा, उससे बात करी होगी।

आचार्य जी: मृत्यु से बात करने का अर्थ क्या है? और जब तक हम ये समझ नहीं रहे हैं, तब तक हम नहीं समझेंगे, क्योंकि बाकी सारे काम तो हो ही जाएंगे। एक बार आप यम के सामने खड़े हो जाएं, तो उसके बाद जो कुछ लिखा है वो आपको पढ़ने की जरूरत क्या है? वो तो आपको भी मिल जाएगा। जो मूल प्रश्न था वो किसी ने पूछा नहीं। जो मूल प्रश्न था वो ये था कि मृत्यु के सामने खड़े होंगे का अर्थ क्या है—ये संवाद शुरू कैसे हुआ? क्या यही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं है? एक बार संवाद शुरू हो जाए, तो उसके बाद तो उत्तर अपने आप मिलने लग ही जाते हैं। एक बार बातचीत शुरू हो गई, तो फिर तो जो होनी है वो होगी। बातचीत शुरू ही कैसे हुई? ये बातचीत शुरू होने का अर्थ क्या है? मैं मौत से बात कर रहा हूं—इसका क्या अर्थ है?

प्र: अपने सबसे बड़े भय का सामना कर रहे हैं।

आचार्य जी: बहुत बढ़िया। बात कैसे कर रहा हूं मैं उससे? क्योंकि यमराज तो कुछ होते नहीं। कोई होता है क्या आदमी कि भैंसे पर बैठकर आ रहा है? जो उनकी छवि बनाई गई है, वैसा तो कुछ होता नहीं।

प्र: मृत्यु के क्षण में।

आचार्य जी: मृत्यु के क्षण में, तो नचिकेत मरने वाला है इसका मतलब। मृत्यु का क्षण है नचिकेत का—क्या अर्थ है इसका? इसका अर्थ है कि जो मन में सबसे गहराई से छुपा हुआ डर है, नचिकेत ने उससे आंखें चार करी हैं। वो क्षण ध्यान का होता है। ये जो कुछ आप पढ़ रहे हैं पूरा उपनिषद, ये और कुछ नहीं है, ये नचिकेत के ध्यान से निकले हुए वचन है। जब एक व्यक्ति ध्यान में होता है, गौर से देख रहा होता है अपने आपको, तब वो जो कुछ भी जानता है या बोलता है, वही उपनिषद है।

और कुछ नहीं होता उपनिषद! ये बात स्पष्ट हो रही है?

उपनिषद कोई ब्रह्म वाक्य नहीं है कि कोई इधर-उधर से आकर देवी-देवता बोल गया या यमराज बोल गए हैं। ये साधारण आदमी की ही बात है। ये एक साधारण आदमी के ही वचन है, लेकिन उस समय उसकी स्थिति ध्यान की है। वो वैसा नहीं है कि हमारी तरह बैठा हुआ है कि मन पांच जगह बटा हुआ है, हैं यहां पर लेकिन सोच कहीं और की रहे हैं। आपके-मेरे जैसे लोग ही जब ध्यान में होते हैं, तो हम जो कुछ कहते हैं, उसी का नाम उपनिषद कहलाता है, उसी का नाम कोई भी धर्म ग्रंथ है।

हमारे अलावा कोई भी नहीं है दुनिया में, पर हमारी ही दो अवस्थाएं हो सकती हैं: एक बिखरी हुई, और दूसरी हो सकती है ध्यान की। तो कठोपनिषद जो आपने पिछली बार जितना भी सुना और जहां से आज हम आगे की बात चालू करेंगे, वो और कुछ नहीं है, वो नचिकेत के ही वचन है। कोई यमराज नहीं आया नचिकेत से मिलने। वो नचिकेत के अपने वचन है। नचिकेत का अपना जानना है, परंतु ध्यान में जानना है। जिसने ये बात नहीं समझी, उसने कुछ नहीं समझा क्योंकि जो ये बात समझ जाएगा कि ये नचिकेत के अपने वचन है उस क्षण में जब वो अपने भय को साफ-साफ देख रहा है, तब वो हर उस मौके पर जो उसको मिलेगा कि अपने भय को खोल कर रख दो, अपने भय को खोल कर रख देगा, और डरा हम में से हर कोई है। अगर कोई कहता है कि मेरे जीवन में डर नहीं है, तो वो झूठ बोल रहा है।

हमने भी अभी कुछ ही दिन पहले एक मौका ऐसा तलाशा था कि जहां अपने-अपने डर को खोल कर रख दें। तलाशा था. कुछ लोगों ने खोल कर रख दिया, कुछ लोग भाग गए, "हमारे जीवन में तो डर ही नहीं है।" उन्हें कुछ नहीं मिलेगा। वो भिखारी आए थे और वापस वैसे ही लौटेंगे। जिन्होंने अपने आपको उद्घाटित कर दिया, उनके जीवन में उपनिषद उतर सकता है। जो इधर-उधर की बातें कर के बहाने बना कर के निकल लिए, उनको कुछ मिलेगा नहीं। मौके हम सबको मिलते हैं। आप ये मत समझ जाएगा कि उपनिषद कोई बड़ी दैवीय बात है, कि कोई खास जगह होगी, वहां बैठते होंगे, खास आयोजन किया जाता होगा, तब उपनिषद निकलता होगा। नहीं, ऐसा नहीं है।

ये रोजमर्रा की घटनाएं हैं। उपनिषद खुद कहते हैं कि उपनिषद कैसे उठते हैं। कोई शिष्य गुरु से कह रहा है कि उपनिषद बोलो, और गुरु कह रहा है, "उक्ता ते उपनिषद (जो हम बोल रहे हैं अभी, यही उपनिषद है)।" जो बोले वही उपनिषद है। हम जो ये साधारण जीवन जी रहे हैं, इससे अलग कुछ होता नहीं। इसी में अगर ध्यान से आप जी रहे हैं, तो उस वक्त आप जो कुछ भी कहेंगे वो उपनिषद ही है।

उपनिषद का क्या अर्थ है? उपनिषद का अर्थ है सत्य; और कोई अर्थ नहीं है। तो वो सच होगा। और उसी में आप अगर बिखरे-बिखरे रहेंगे, बेहोश रहेंगे, आपको पता भी नहीं होगा कि आपने क्या मौका गवां दिया, तो जैसे रहे आ रहे हैं वैसे रहे आइए। अपने आपसे ही झूठ बोल गए, अपने आपसे ही बहाने बना दिए, मौका था हाथ से जाने दिया। जिन्होंने मौके का इस्तेमाल कर लिया, उन्हें लाभ हुआ कि नहीं हुआ?

हुआ।

जिन्होंने नहीं किया, वो घूमते रहें अपना।

प्र: यहां पर एक और चीज है कि नचिकेत बहुत गहरे ध्यान में है।

आचार्य जी: बेटा तुम जितने गहरे जा सकते हो, वहीं जाओ ना। जो कर ही नहीं सकते, उसकी कल्पना क्यों करनी? जहां खड़े हो, उस वक्त तुम्हारे लिए जो संभव है, वो तो करो। जिन झूठों का तुम्हें पता भी नहीं है, उनको तो तुम खोल भी नहीं पाओगे। कमसेकम जिनको जानते हो, उनको तो खोलो। जिन डरो का तुम्हें पता भी नहीं—कि इतने गहरे बैठे हुए हैं कि हमें पता भी नहीं है कि हम डरे हैं; जो इतने गहरे बैठे होते हैं कि हमें पता भी नहीं होता उनका—उनको तो तुम वैसे भी नहीं बोल पाओगे। उनको बोल पाने का कोई तरीका नहीं है, पर जिन को बोल सकते हो, उनको तो बोलो।

जो उनको भी नहीं बोल रहा, वो अपने आपसे धोखा कर रहा है। उसका कुछ नहीं हो सकता, वो चाहे कृष्णमूर्ति पढ़े, चाहे कुछ पढ़ता रहे। उसे कुछ मिलेगा नहीं क्योंकि कुछ पढ़ कर कभी किसी को कुछ मिला नहीं है। कुछ पढ़ कर कभी नहीं मिला। नचिकेत होना पड़ता है, और ये बात में सौ बार कह चुका हूं। नचिकेत पढ़कर कुछ नहीं पाएंगे, नचिकेत हो कर पाएंगे। नचिकेत ने अपने डर का सामना किया है—मृत्यु माने सबसे बड़ा भय। उसने अपने भय से आंखें चार करी है। बहादुर आदमी है वो। नचिकेत बनकर ही कुछ मिलता है। ये नहीं है कि इस कमरे में आकर उसकी कहानी सुन ली और उससे कुछ पा जाओगे। क्या पा जाओगे? जब मौका था तब तो सटक लिए। अब उसकी सुनते रहो कहानी। ये भी मैं कई बार कह चुका हूं पहले कि नचिकेत जैसे को समझने के लिए नचिकेत जैसा होना पड़ता है।

जो तुम हो ही नहीं नचिकेत, तो तुम्हें क्या लाभ होगा उसकी कहानी सुनकर? नचिकेत वो आदमी है जिसने अपने गहरे से गहरे डर को कहा है, "आ, बता। अपना राज़ खोल मेरे सामने। मृत्यु का राज़ खुले मेरे सामने। अपना राज खोल, तू क्यों है? मेरा जीवन ऐसा क्यों बीत रहा है—सहमा-सहमा, उथला?" तो जो वैसा हो गया, उसके लिए फिर ये उपनिषद मायने ही नहीं रखता क्योंकि वो तो हो गया। जो वैसा है नहीं, वो लाख सुनता रहे, उसे मिल क्या जाना है?

एक बड़ी गहरी संवेदना चाहिए अपने पूरे जीवन के प्रति। ये जो हो रहा है, ये क्या हो रहा है? हजार बच्चे होते हैं जिनके सामने उनके मां-बाप पता नहीं क्या-क्या कुकर्म करते रहते हैं। बच्चे उन्हें कुछ नहीं बोलते। हम सब घरों में रहते हैं और घरों में पता नहीं क्या-क्या चल रहा होता है। हमने कभी प्रश्न उठाया? नचिकेत के घर में भी कुछ चल रहा था, उसने सवाल उठा दिया। हमारे घरों में सौ तरह के पाखंड चलते रहते हैं और हमें पता है ना कि चलते रहते हैं। हम कभी पूछते हैं कि क्यों चल रहे हैं? नचिकेत जाकर खड़ा हो गया। बोलता है, "ये क्या कर रहे हो, पापा? और दान देना ही है, तो गाय का क्या देते हो, मेरा दो ना। अगर असली दानी हो, तो मेरा दो ना।" हमने कभी बोला? हमने कभी बोला क्या? बोला, तो आप नचिकेत हो गए, और जिसने नहीं बोला, उसे कोई फायदा नहीं होगा ये सब सुनकर।

नचिकेत क्या है? नचिकेत एक विद्रोही है जो अपने घर में चल रहे आडंबर के विरुद्ध खड़ा हो सकता है। आप अपने घरों में चलते आडंबर के विरुद्ध खड़े हो पा रहे हो? कोई है जिसके घर में आडंबर, पाखंड, धोखे ना चल रहे हो? उपनिषद शुरू ही वहां से होता है कि जहां पर एक बेटा अपने बाप के आडंबर के विरुद्ध खड़ा हो रहा है। उपनिषद शुरू ही वहां हो रहा है। जो बेटा अपने बाप के विरुद्ध खड़ा होने को तैयार नहीं, जो पत्नी अपने पति के विरुद्ध खड़ी होने को तैयार नहीं, जो व्यक्ति समाज के विरुद्ध खड़े होने को तैयार नहीं, वो क्यों अपना समय खराब करें उपनिषद सुनकर। ये बात साफ-साफ समझ में आ रही है कि उपनिषद कहां शुरू होता है? जहां पर एक बेटा अपने बाप से कहता है कि तुम धोखेबाज हो और अगर असली आदमी हो, तो इन गायों को नहीं, मुझे दान दो; और जहां पर वो अपने छोटे-मोटे नहीं, सबसे बड़े डर के सामने खड़ा होता है। "मौत का राज़ जानूंगा। मुझे बताओ मौत क्या है! मुझे समझना है।" जो आदमी अपना छोटा-सा डर खोलने में हिचकता हो, सटक लेता हो इधर-उधर, क्या जिंदगी में करेगा? बेकार है। व्यर्थ।

ऐसे ही मौके होते हैं। नचिकेत के सामने भी एक मौका आया था, वो चाहता तो कहता, "क्या फर्क पड़ रहा है? पापा कर रहे हैं, करने दो। कुछ उनका काम है। मैं क्यों हाथ डालूं? मुझे फट्टे में क्या लेना-देना? क्या करना है? करने दो, उनका काम है। कुछ कर रहे होंगे दान या हवन आयोजन। मैं क्यों जाऊं और कहूं, 'पापा वो गाय तो बूढ़ी हैं। इनका दान से क्या फायदा? तुम किस को बेवकूफ बना रहे हो?'" हम तो ऐसे ही करते हैं ना।

मूल बात समझो, बाकी तो 70 बातें लिखी हुई हैं, वो सब मंबो-जंबो है। वो कोई बड़ी कीमती नहीं है। मूल बात समझो। उपनिषद पढ़ने से नहीं कुछ होगा। उपनिषद जीवन में उतरे, तब होता है। अपना जीवन उपनिषद बने, हम नचिकेत बन जाए, तब बनती है बात। जो मूल घटना है, उसको पकड़ो: कि एक आदमी, जब मौका आया, तो पीछे नहीं हट गया।

बस यही है उपनिषद कि जब मौका आया, तो खड़ा हो गया बिल्कुल तन के।

यही है उपनिषद। और कुछ नहीं है उपनिषद। उसे फर्क नहीं पड़ रहा था कि बाप के सामने खड़ा होना है। उसने कहा, "ठीक।" बड़ा नहीं था बहुत ये—जवान आदमी नहीं है—नचिकेत बच्चा ही है। निर्भर भी रहा होगा आर्थिक रूप से, कई तरीकों से, बाप पर, लेकिन हट नहीं गया पीछे। कहा, "ठीक है, निर्भर हूं, तो भी अंतर नहीं पड़ता। जो बात ठीक है, वो होनी चाहिए।" और फिर मौत से भी नहीं डर गया। ना बाप से डरा, ना मौत से डरा।

'बाप' और 'मौत' का अर्थ समझिएगा। बाप है 'समाज' और मौत है 'प्रकृति।' आदमी दो ही तरीके से कंडीशंड होता है: सोशल और फिजिकल (समाज से और प्रकृति से)। बाप है 'समाज' और मौत है 'प्रकृति।' मौत माने समय, प्रकृति। नचिकेत दोनों से भिड़ गया है। मन के दोनों तलों के पास जाने की उसने ठान ही ली है, तो निश्चित रूप से वो वहीं पहुंचेगा जहां उसे पहुंचना है। मन के दोनों तलों के पार वो खुद बैठा हुआ है, 'आत्मन' है। उस आत्मन तक वो पहुंच जाता है। अर्थ समझ रहे हैं? पिता का अर्थ समझते हैं क्या है? पिता का अर्थ है 'समाज।' मां का अर्थ होता है 'प्रकृति'। मां प्राकृतिक होती है, पिता सामाजिक होता है। मां माने 'जन्म'। जन्म प्रकृति है, मृत्यु भी प्रकृति है। तो बाप से भिड़ गया है मतलब समाज से भिड़ गया है, और मृत्यु से भिड़ गया है मतलब प्रकृति से भिड़ गया है।

हमारे मन में कंडीशनिंग की, संस्कारों की यही तो दो सतह होती है। सबसे जो नीचे की सतह होती है, तल होता है, जहां पर वृत्तियां वास करती है, वो होती है, प्राकृतिक। जिसको आप बोलोगे, "मेरे डीएनए में बैठा हुआ है।" उसके ऊपर जो होता है, जो जन्म के बाद शुरू होता है, जो हमें समाज देता है, को तल होता है, सामाजिक। पिता उसका प्रतिनिधि है—सामाजिक संस्कार का। तो दोनों से नचिकेत ने पंगे ले ही लिए है। नचिकेत खड़ा हो गया है एक साथ दोनों के विरुद्ध। यही कारण है कि वो जीतेगा। उसकी जीत पक्की है। वो आधा अधूरी लड़ाई नहीं लड़ रहा है। जहां तक वो जा सकता है, पूरा-पूरा जा रहा है।

इसको आप नचिकेत का अंतर्ज्ञान ही समझिएगा। यम और इधर-उधर की बातें, वो सब काल्पनिक है। ये नचिकेत का अपना बोध है। किसी ने सिखा नहीं दिया उसको। ये क्या है? ये नचिकेत का अपना बोध है, और नचिकेत यहां तक क्यों पहुंच पा रहा है, ये भी स्पष्ट हो रहा है? क्योंकि जो मन के दोनों तलों के पार पहुंच गया, वो आत्मा तक पहुंचेगा ही। आत्मा माने खुद तक; आत्म मने 'मैं'। आत्मा कोई काल्पनिक वस्तु नहीं है। आत्मा कोई सिद्धांत नहीं है। आत्मा का इतना ही अर्थ है कि *मेरी असलियत*। मैं वास्तव में जो हूं, उसी को क्या बोलते हैं?

आत्मा।

आत्मा कोई वो चीज नहीं है, जो कहीं छुपी होती है, और बड़ी सूक्ष्म-सी होती है, और हवा में तैरती है, और गर्भ में प्रवेश करती है, वो सब नहीं है आत्मा। आत्मा याने "मैं"। मेरी हकीकत का नाम है आत्मा। मैं जो वास्तव में हूं, वो है आत्मा। ठीक है? तो नचिकेत जब समाज को पार कर गया, प्रकृति को पार कर गया, तो आत्मा तक पहुंचता है। क्या कह रहे है आत्मा के विषय में? एक रथ की बात हुई थी पिछली बार। कौन सा रथ था?

प्र: जीवन एक रथ है; आत्मा उसका सारथी है; और बुद्धि उसकी ड्राइवर है।

आचार्य जी: विषय वो मार्ग है जिस पर घोड़े दौड़ रहे हैं, जिसकी ओर आकृष्ट हो रहे हैं; इंद्रियां घोड़े है; मन लगाम है।

प्र: यहां हम नचिकेत के बोध की बात कर रहे हैं क्या ऐसे ही कुछ स्थिति रही होगी बुद्ध की?

आचार्य जी: हां, बस वही। नचिकेत इस समय उसी बोध की स्थिति में है। बोध का ही तो अर्थ है बुद्ध * । बोध माने जानना और * बुद्ध मने जो जान रहा है। तो नचिकेत इस समय बुद्ध ही है।

प्र: प्रतीक बदल गए हैं बस।

आचार्य जी: हां। इसीलिए बौद्ध कभी ये नहीं कहते कि * बुद्ध * एक था। बुद्ध तो है ही। हजारों बुद्ध है। गौतम बुद्ध को शाक्यमुनि बुद्ध कहते हैं। बुद्ध कोई एक नहीं है। जो ही जाने, वही बुद्ध है। नचिकेता भी बुद्ध है। तो जो चित्र है रथ का, इंद्रियों का, मार्ग का, उसी को आगे बढ़ाया गया है। देखिए, क्या कहा गया है।

प्र: इंद्रियां घोड़े हैं।

आचार्य जी: और उन घोड़ों का स्वभाव क्या है? जो रास्ता है, उस रास्ते पर हजार वस्तुएं है, और इंद्रियां क्या कर रही हैं?

प्र: वस्तुओं की तरफ भाग रही हैं।

आचार्य जी: घोड़े कितने हैं? पांच। कभी पांच कहा जाता है, कभी छ:, और कभी ग्यारह भी कहा जाता हैं, पर आप पांच ही मानिए। घोड़े भागे जा रहे हैं, भागे जा रहे हैं। घोड़ों के पीछे क्या होनी चाहिए? लगाम। लगाम के पीछे क्या होना चाहिए? सारथी। तब तो बात बनेगी।

देखिए, विषयों में अपने आपमें कोई आकर्षण नहीं है। विषयों में बुराई नहीं है। विषय का त्याग करने से कोई फायदा नहीं होने वाला। अक्सर क्या होता है कि हम लोग घोड़ों को कसने की जगह विषयों को त्यागने में जुट जाते हैं। ये ऐसा ही है कि मेरी गाड़ी का इंजन खराब है, तो मैं उसे पहाड़ों पर लेकर नहीं जाऊंगा। कब तक पहाड़ों से बचोगे? अगर पहाड़ों पर लेकर नहीं जाओगे, तो पहाड़ों की सुंदरता भी नहीं देख पाओगे। अगर गाड़ी का इंजन खराब है, तो मुझे पहाड़ त्यागने चाहिए या गाड़ी ठीक करनी चाहिए? आप अगर पहाड़ों पर नहीं जाओगे, तो आप पहाड़ों के पत्थरों से तो बच जाओगे, लेकिन साथ ही पहाड़ों की सुंदरता भी कभी नहीं पाओगे। विषयों का त्याग करने से इसलिए फायदा नहीं है।

इन इंद्रियों को साधना होगा। क्या कहा जा रहा है? जिसके पास विवेक नहीं उसका क्या होता है? जैसे सारथी सोया पड़ा है और घोड़े दौड़ रहे हैं। अब क्या होगा जीवन रथ का? बिखरा हुआ है, टूटा हुआ है, भगदड़ मची हुई है, एक बेतरतीबी है। कभी इधर को भाग रहे हैं, कभी उधर को भाग रहे हैं। आपस में ही लड़ रहे हैं। कोई दिशा नहीं है। गति भी नहीं आएगी बहुत। कभी थोड़ी देर को इधर भागेंगे फिर वापस ही भाग लेंगे। बड़ी अजीब हालत रहेगी। इस पूरी प्रक्रिया में जो रथ है, उसका जो ढांचा है, उसका क्या होगा? टूटने को हो रहा होगा। उसको कबीर बोलते हैं: माया मरी न मन मरा मर मर गया शरीर।

मन कभी नहीं मरता, शरीर मरने को हो जाता है। मन कह रहा है अभी और चाहिए।

आशा तृष्णा ना मरी कह गए दास कबीर।।

ये 'आशा' 'तृष्णा' क्या है? ये वो लगामें हैं जो बीमार हो गई हैं। आशा और तृष्णा मन की बीमारियां हैं। जब मन बीमार होता है, तो वो इंद्रियों को संयम में नहीं रख सकता। अब तो घोड़े भागेंगे। जहां भागना होगा वहां भागेंगे, और रथ खटारा बन जाएगा।

माया मरी न मन मरा मर मर गया शरीर।

शरीर मर जाएगा। मरता ही रहता है कई बार। अब क्या कहा जा रहा है?

प्र: मन को वश में कर लिया, तो इंद्रियां अपने आप...

आचार्य जी: याद रखिएगा, घोड़े नहीं साधे जाते। मन साधा जाता है। आप इंद्रियों के साथ कुछ नहीं कर सकते। इंद्रियां महाजड़ है। इंद्रियों को आप नहीं कुछ कर पाएंगे। मन ही है जिसे कुछ कर सकते हैं। इंद्रियां तो इतनी जड़ है कि यही उपनिषद आगे आपसे कहने वाला है कि इंद्रियों से बेहतर तो वो पदार्थ हैं जिन्हें इंद्रियां देखती हैं, सुनती है, छूती है। इंद्रियां तो इतनी जड़ है। मन के साथ ही कुछ किया जा सकता है। आंखों का काम है दिखाना—वो तो दिखाती रहेंगी। मन के साथ ही कुछ किया जा सकता है। जो देखो वो विवेक के साथ देखो। ऐसे ना देखो कि देखा और चल पड़े, देखा और आकर्षित हो गई, उत्तेजित हो गए। विवेक भी रहे।

प्र: सारथी को साधा जाएगा कहीं सो ना जाए।

आचार्य जी: सारथी सदा जगा हुआ है। दिक्कत उस लगाम की है। बीमारियां उसमें लगती है। सारथी आत्मन्य है। जो इसमें निरूपण किया गया है, जो छवि बनाई गई है, वो ये है। वैसे तो फिर सब कुछ उसी से निकला है, तो घोड़े भी सारथी है, रास्ता भी सारथी है, सब कुछ वही है। समझाने के उद्देश्य से जो मॉडल तैयार किया गया है, उस मॉडल को समझो।

प्र: यानी आंखें देखेंगी जो देखना है, हम बोलेंगे जो बोलना है। परन्तु यदि मन में विवेक है, तो यू कैन (तुम कर सकते हो)

आचार्य जी: आप उसी मॉल से निकलोगे जहां वही सेल लगी हुई है। आंखें दिखाएंगे कि इतने पर्सेंट सेल लगी हुई है। वो एक लटक रहा है वहां पर कार्ड, दिखाने के लिए आपको। आंखें दिखा रही हैं पर मन जाकर के घुस नहीं गया कि अभी चाहिए, यही चाहिए। कान आपको सुना रहे हैं कि इधर से, उधर से, ऊपर से, आ रही है कुछ आवाजें, पर मन संयमित है। मन जान रहा है क्या कर रहा हूं। मन जाकर छत पर नहीं बैठ गया कि ऊपर आवाज आ रही है। क्या हो रहा होगा—ड्रिल चल रही है, वेल्डिंग हो रही है, क्या हो रहा है। मतलब समझ रहे हो? किसी का भी कान, कान ही होता है। बुद्ध के कान भी ठीक वही आवाज सुनेंगे जो आप सुन रहे हैं। नचिकेत का कान भी ठीक ऐसे ही सुनेगा इसको जैसे आप सुन रहे हैं। लेकिन हमारा मन बहकेगा, उसका वो(नचिकेत) करेगा नहीं—अंतर इतना ही है। वो अगर यहां पर है, पढ़ रहा है, सुन रहा है, तो वो सुन रहा है। वो छत पर नहीं चला जाएगा। हममें से कई लोग छत पर जाकर बैठ जाएंगे। अंतर समझ रहे हैं ना?

यह बात बोलनी इसलिए पड़ रही है—तीन मंत्र है जो आ चुके हैं अब तक इस बात को बोलते हुए—क्योंकि हम में से कई लोग बड़ा उल्टा कार्यक्रम कर देते हैं। मन को साधने की जगह हम इंद्रिय दमन में लग जाते हैं। इंद्रियों के सप्रेशन में लग जाते हैं। इंद्रियों को दबाने का मतलब ये है कि इनको आहार देना बंद करो, ऐसी फलानी जगहों पर जाना बंद करो, और ये सब करो। वो तात्कालिक रूप से लाभप्रद हो सकता है। किसी विशेष समय में उसका फायदा हो सकता है। लेकिन वो हमेशा काम नहीं आएगा। वो बात हमेशा काम आने की नहीं है। आप किस-किस चीज से आंख चुराओगे? आप किस-किस ध्वनि के कारण कान बंद करोगे?

प्र: गांधी जी कहते हैं बुरा मत देखो।

आचार्य जी: वो दवाई हो सकती है कुछ समय के लिए। जीवन ऐसे नहीं किया जा सकता। जीवन में ऐसे नहीं किया जा सकता, नहीं तो आप वैसे बंदर जैसा ही करोगे: ऐसे बैठा हुआ है और सुन भी नहीं रहा, देख भी नहीं रहा। वो बड़ी बंदरों की हालत हो जाएगी। आप मौज नहीं ले रहे हो फिर जीवन की। सोचिए ना कैसा है। अभी उस दिन बात हो रही थी, हमने कहा था कि उत्सव है, पार्टी है, याद है? पार्टी चल रही है और आप ऐसे घूम रहे हो, "बुरा ना देखो, बुरा ना सुनो।"

देखिए, ये बीमार है, तो उसका तंत्र उससे खुद ही कह रहा है कि खाना मत खाओ। ये ठीक है। उसका सिस्टम खुद ही जानता है कि चूंकि पेट गड़बड़ है, तो खाना नहीं खाना चाहिए, तो नहीं खाना है। पर अब वो इसको नियम ही बना ले—खाना ना सूंघो, खाना ना खाओ—तो उसका क्या होगा? भाई, आप बीमार हैं, तो एक दवाई की तरह परहेज़ कर सकते हैं। मैं बहुत बीमार हूं, तो मैं परहेज़ कर सकता हूं, पर अगर मैं उस परहेज़ को जीवन का एक ढर्रा ही बना लूं, तो मेरा क्या होगा? कोई बहुत बीमार है, तो उसे कुछ समय के लिए सलाह दी जाती है कि तुम इस तरह की चीजें मत देखो, मत सुनो, मत खाओ। पर तुम उसे जीवन का अगर एक नियम ही बना लोगे, फिर तो कोई मजा नहीं है। जीवन इसलिए नहीं है कि उसमें वर्जनाएं रखी जाए, रोक-टोक रखी जाए।

प्र: हमारे घर के पास में एक मंदिर है तो वहां पर जो स्वामी हैं उन्होंने खुद को ऐसा ही कर रखा है कि वो महिलाओं को नहीं देखेंगे कुछ ऐसे कार्य नहीं करेंगे।

आचार्य जी: तो अभी उनका उपचार ही चल रहा है, अभी वो बीमार है। अभी उनको अपने आप पर भरोसा नहीं है कि औरत देखूंगा तब भी मुझे कुछ हो नहीं जाएगा। अभी होता होगा की औरतों को देखते होंगे तो कुछ हिलने-डुलने लगता होगा मामला, तो अपने ऊपर उन्होंने नियम बांध रखा है। पर कोई नियम क्यों बांधे अगर उसको पता है कि मैं कुछ भी देखूं, कहीं जाऊं, कुछ भी करूं, मेरे मन की शांति पर, उसके संयम पर, उसके विवेक पर कोई अंतर पढ़ना ही नहीं है, तो मैं ऐसे नियम बांधू ही क्यों? जो आदमी औरतों को देखने से बच रहा है, निश्चित बात है कि कहीं ना कहीं उसमें वासना बाकी है। कहीं ना कहीं तो क्या उसमें बड़ी गहरी वासना बाकी है कि औरत देखी नहीं और पूरे तार झनझना गए। शायद ठीक कर रहा होगा अपने लिए, पर अभी फिर वो उपचार की स्थिति में ही चल रहा है, अभी वो परहेज़ की स्थिति में चल रहा है। आप परहेज़ कब करते हो? जीवन भर करते हो क्या? परहेज़ तो आप तभी करते हो ना कि जब जरूरत हो परहेज़ की? तब कर लीजिए परहेज़। कुछ समय के लिए लाभप्रद है। मैं बिल्कुल मना नहीं कर रहा हूं। कुछ समय परहेज़ करना चाहिए भी। जब बीमारी है, तो उसका उपचार करना चाहिए भी, पर उपचार जितना जल्दी खत्म हो जाए उतना अच्छा।

प्र: ऐसा भी है कि अगर छोटी लड़की भी है, तो भी वो नहीं जा सकता पूजा-पाठ के लिए।

आचार्य जी: ये तो आप खुद ही समझिए ना। खुद ही समझ जाइए कि फिर इसमें मामला क्या है। खुद ही जान जाइए कि ये क्या हो रहा है। जिसकी इंद्रियां एक छोटी-सी बच्ची को देखकर भी संयमित हो जाती है, वो आदमी तो अभी बहुत जूझ रहा है।

प्र: तब भी वो स्वामी कहलाते हैं।

आचार्य जी: वो कहलाते नहीं है, आप कहते हैं। तो ये आपकी बात है कि आपने किन लोगों को स्वामी जान रखा है। ये आप देखिए।

प्र: और मंदिरों में भी ऐसा ही होता है। तो ये सब नियम किसके बनाए हुए हैं? क्या ये हमारे ग्रंथों में लिखे हुए हैं?

आचार्य जी: ग्रंथों में कहीं नहीं लिखा है। कोई ग्रंथ नहीं है जो ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें करता है। ज़्यादातर बातें जो आप आचरण के चारों ओर देखते हैं वो किसी ग्रंथ में कहीं नहीं लिखी। आप जिस कमरे में बैठे हुए हैं, पिछले ढाई साल से यहां हफ्ते में दो बार, तीन बार, कई बार चार-चार बार भी ग्रंथों पर ही चर्चा होती है। और एक दिशा से नहीं, हर तरह के ग्रंथों पर यहां चर्चा होती है— वैदिक; वेदान्तिक; कृष्णमूर्ति को लेकर यहां कुछ नहीं तो 50 बार तो सेशन हो ही चुका होगा; सूफी * —कोई बड़े सूफी नहीं है जिनको हमने यहां पर देखा नहीं, परखा नहीं, गाया नहीं; * कबीर; मीरा। भजनों में आप में से बहुत सारे लोग थे ही। तो हर दृष्टि से दुनिया में आज तक जिस भी व्यक्ति ने जो कुछ भी जानने लायक कहा है—*क्रिश्चियन मिस्टिक्स: सेंट फ्रांसिस, एकहार्ट*—जिसने जो भी जानने लायक कहा है, हमने यहीं बैठ कर इसी कमरे में चर्चा की है, और हमें तो कभी ऐसा कुछ मिला नहीं। मिला हो तो बता दीजिए।

छोटी लड़कियों को ना देखो, और ये ना करो, वो ना करो—हमें तो कभी नहीं मिला। ये किसके दिमाग की उपज है, भगवान जाने। हमें तो मिला नहीं। पूरा छान लिया। और भी है, अभी और भी छानेंगे। क्या पता कहीं कुछ मिल जाए। आज तक तो मिला नहीं। ये कोई पहला उपनिषद नहीं है। ये 25वां-30वां उपनिषद होगा जिसकी यहां पर चर्चा हो रही है। आज तक तो मिला नहीं। अब स्वामी जी कौन से उपनिषद से पढ़कर कर रहे हैं, वो जाने, जहां लिखा हो कि छोटी बच्चियों की भी शक्ल ना देखो। उनको उसमें बेटी नहीं दिखाई देती? कैसा आदमी है। फिर तो कोई अंत ही नहीं है ना। छोटे लड़कों के साथ भी कुछ भी हो सकता है। फिर तो उन्हें किसी को नहीं देखना चाहिए। जानवरों के साथ भी, कुछ भी, कहीं भी—मन तो मन है, क्या पता कहां उद्वित हो जाए। उसकी उद्दंडता किसके संभाले संभालती है? फिर तो परहेज़ का कोई अंत ही नहीं होगा।

प्र: शायद समझ का मतलब यही होता है कि कड़ा आचरण।

आचार्य जी: सम्यक आचरण।

प्र: जी, हमारे लिए।

आचार्य जी: सम्यक आचरण कभी-कभी कड़ा भी हो सकता है, पर वो तभी होगा जब बीमारी बड़ी गहरी हो, तो कुछ समय के लिए, सिर्फ कुछ समय के लिए, फिर अपने आप धीरे-धीरे वो...

प्र: इसको ऐसा कह सकते हैं कि जब वो बीमार थे तब कर लिया।

आचार्य: और अगर अभी भी करे जा रहे हो वही, तो तुम और बीमार हो जाओगे। वो फिर बीमारी के टिके रहने का कारण बन जाएगा। आप पथ्य लेते हो बीमारी में और वही पथ्य लेते ही रह जाओ, तो फिर शरीर कमजोर का कमजोर ही रह जाएगा।

दिक्कत ऐसे पैदा होती है: अब यहां शुची शब्द का इस्तेमाल किया गया है। ना समझने वाले शायद उसको ये समझ लेंगे कि दिन में दो-तीन बार नहाने को कहते हैं शौच। शुचिता का अर्थ है सफाई। आप देखेंगे कि जो ज्यादा धार्मिक प्रवृत्ति के लोग होते हैं, अगर वो अघोरी ही ना हो, तो उनका नहाने धोने और सफाई में बड़ा यकीन रहता है। शुचिता का यहां वो अर्थ ही नहीं है। आप इस पूरे को देखें तो आपको साफ-साफ समझ आ जाएगा कि शुचिता का क्या अर्थ है। शुचिता का अर्थ है: जिसकी बुद्धि विवेकपूर्ण ना हो—ऊपर साफ-साफ लिखा हुआ है—वो गंदा है। गंदा कौन? वो नहीं जो नहाया नहीं है; वो जिसका मन साफ नहीं है। अब पंडित जी अगर सोच रहे हैं कि मैं अपने आप पर बड़ा आचरण बांध लू कि मैं तो दिन में तीन बार नहाता हूं, तो इससे आप नहीं साफ हो जाओगे।

मीना सदा जल में रहे, धोए बास न जाए।

आप तो तीन ही बाहर जल में घुस रहे हो, मीन हमेशा जल में ही घुसी रहती है, और इतना साफ करो फिर भी बदबू नहीं जाती उसकी। पूरे को देखिए तो आपको समझ में आ जाएगा कि शुचिता का अर्थ क्या है: जिसका मन संयम में नहीं है, जिसके बुद्धि में विवेक नहीं है, और जो अपने लक्ष्य की प्राप्ति नहीं कर पा रहा। अब यहां लक्ष्य से क्या अर्थ है? विवेकानंद ने भी कहा हुआ है और इसमें भी आएगा कि उठो और अपने लक्ष्य को पा लो। यहां पर लक्ष्य के लिए कहा है "तत्पदम्"। तत्पदम् मतलब वो जगह, वो गद्दी, वो सिंहासन। लक्ष्य है मैं—वह पद, वो जगह। वो जगह क्या है? अपने आपको पाना है; और कोई लक्ष्य नहीं है। लेकिन उपनिषद का हो चाहे विवेकानंद का हो, इनका इस्तेमाल ये बताने के लिए हो जाएगा कि जीवन में अपने लक्ष्यों को पाओ, और वो लक्ष्य क्या है? कपड़ा, घर।

प्र: विवेकानंद के भाषणों का ज्यादातर उदाहरण इसीलिए दिया जाता है।

आचार्य जी: मोटीवेशन: कि जाओ और जो पाना है पाओ। विवेकानंद का तो जितना दुरुपयोग किया गया है, उससे उन पर बड़ी दया आती है। बेचारे क्या बोल रहे थे और क्या बना दिया गया है। वो जब लक्ष्य कह रहे हैं विवेकानंद, तो उस लक्ष्य से अर्थ है *आत्म-साक्षात्कार*—खुद को पाना। पर विवेकानंद के कहे का इस्तेमाल ये जताने के लिए किया जाता है कि नौकरी पा लो एक—यह लक्ष्य है। विवेकानंद इस लक्ष्य की बात कर ही नहीं रहे हैं। बड़ा अच्छा लगता है, "विवेकानंद ने कहा है। देखो, हम ही नहीं हैं।" जितने ये मोटिवेशनल स्पीकर्स होते हैं, ये शुरुआत भी इसी से करते हैं कि विवेकानंद ने कहा था। विवेकानंद अगर बैठे हो ऑडियंस में, तो एक झापड़ लगाएंगे।

प्र: लगाम को फिर संभाले कैसे?

आचार्य जी: नचिकेत बनना ही एकमात्र तरीका है। जब मौका मिले, तो चूकिए मत। मौका कब होता है? अभी मौका है, बस चूकिए मत। बाहर जाएंगे बाहर मौका है बस चूकिए मत। यही है; और कोई तरीका नहीं है। जिंदगी लगातार मौके देती रहती हैं, लगातार, उनसे चूकिए मत। बस यही है। और उसकी कोई विशेष प्रक्रिया नहीं है कि ऐसा कर लेंगे तो मन संयमित हो जाएगा। जहां भी है, जैसे भी हैं, उस मौके से चूकिए मत। मौका लगातार है।

प्र: कई बार इंद्रियां विचलित तो करती ही हैं।

आचार्य जी: चूकिए मत। वही मौका है इंद्रियों को जानने का कि ये इनका स्वभाव है। "वाह बेटा, दिखा दी औकात?" आप जा रहे हैं, नाक में खुशबू पड़ी कुछ खाने की और कदम मुड़ने को हो गए। ये भगवान के द्वारा भेजा गया अवसर है। इतना बढ़िया मौका है जानने का कि "देखो, ये है इंद्रियों की असलियत। कहां को जा रहा था, क्या कर रहा था, और नाक में ज़रा खुशबू पढ़ी नहीं, मुड़ लिए। ये है इनकी असलियत।"

यह भूख को जानना, प्यास को जानना, सुगंध को जांगना, दृश्य को जानना, ये बड़ी ट्रेनिंग है। हमारे शिक्षा इसकी ट्रेनिंग नहीं देती है कि देखो, जानो, भूख क्या है। ये आंखें कैसे काम कर रही है, इसको समझो। कोई स्कूल इसकी कोई शिक्षा दे नहीं रहा है। आप यहां बैठे हो, आपको प्यास लग रही है, उसको देखो कि ये क्या चल रहा है। आपने दिनभर खाना नहीं खाया, दिनभर जब आप खाना नहीं खाते हो, तो शाम को क्या होता है, इसको ऑब्जर्व करो।

आजकल रमज़ान चल रहा है, और मुझे बड़ा मजा आता है। अखबारों में रमज़ान को लेकर रिपोर्टिंग भी होती है महीना चल रहा है तो। रिपोर्टिंग क्या है? आप किसी से भी पूछ लीजिए, सबको पता होगा कि आजकल शाम को इतने बजे फलानी जगहों पर स्टॉल लग जाते हैं और पार्टियां भी होती हैं। दिल्ली में कई जगहें है, नोएडा में कई जगहें है, पूरे बाजार है, जहां पर शाम को खाने का मिल रहा है। आप किसी से भी पूछ लीजिए कि रमज़ान है क्या? इस पूरे महीने का अर्थ क्या है? नहीं पता होगा।

तो आप उस आदमी की सोचिए जो दिन भर भूखा है, वो कर क्या रहा है? वो शाम का इंतजार कर रहा है। किसी और महीने में इतने व्यंजन बनते हैं? ये आदमी का मन है। ये बहुत अच्छा मौका है उस मन को जानने का। जिस दिन आप व्रत-उपवास करते हैं, उस दिन देखिए मन की क्या दशा होती है। उस दिन खाने का जितना ख्याल आता होगा, और कभी नहीं आता होगा। दूर-दूर से खुशबू उठती हैं, और सो जाइए कुछ करके, तो सपने में जलेबियां बरस रही है, समोसा उग रहा है। ये आदमी का मन है। इसकी शिक्षा होनी चाहिए। बच्चे को सिखाना चाहिए। प्यास को समझो, भूख को जानो, सुगंध को जानो। इंद्रियों को जानने की व्यवस्था बचपन से ही दी जानी चाहिए। हमें नहीं पता। हम एक मायने में अशिक्षित है। हम नहीं जानते। हमारा ही पूरा तंत्र काम कैसे करता है, हमें उसका कुछ पता नहीं है। इसीलिए हम उसके वशीभूत हो जाते हैं। फिर हमें इस तरह के उपाय करने पड़ते हैं कि मेरे सामने छोटी लड़की को भी मत लाना। क्योंकि उन्हें अपने तंत्र का ही पता नहीं कि उन्हें किस बात पर, कहां उसका क्या हिसाब-किताब हो जाएगा।

प्र: ये जो बच्चे की बात है, ये सिर्फ उपचार का प्रतीक है या ये इस बात का प्रतीक है कि हमारी बीमारी बहुत गहरी है?

आचार्य जी: ये इस बात का प्रतीक है कि बीमारी गहरी भी है और मुझे पता भी नहीं है कि बीमारी है क्या। सिर्फ दुख है। बीमारी है, पीड़ा है, पर डायग्नोसिस नहीं है। बीमारी है, और बीमारी के कारण पीड़ा भी है, पर बीमारी की समझ नहीं है। मैं नहीं जानता कि बीमारी क्या है—डायग्नोसिस नहीं है। मुझे नहीं पता कि क्या है।

प्र: या केवल आडंबर है?

आचार्य जी: हो सकता है। पर ये भी अगर मान ले कि आडंबर नहीं है, वास्तविकता है, तो भी बड़ा वास्तविक अज्ञान है। इन्हें पता नहीं है कि मैं ये क्यों कर रहा हूं।

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