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धर्म की आलोचना, मौत की सज़ा? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: अभी हाल ही में, न्यूयॉर्क में एक संवाद सत्र के लिए, जो एक मशहूर लेखक हैं सलमान रुश्दी जी, वो गए थे और वहाँ पर उनके ऊपर हमला हुआ। उस बात की यदि हम जड़ों में जाएँ, तो चौंतीस साल पहले उनके लिए जो एक फ़तवा निकाला गया था, वो व्यक्ति वहाँ से प्रेरित था जिसने ये हमला किया। इस पर ये प्रश्न बनता था कि क्या कभी भी, किसी धर्म या मज़हब की निंदा करना सही है या ग़लत? इस पर आप क्या कहेंगे?

आचार्य प्रशांत: क्यों नहीं होनी चाहिए, बिलकुल होनी चाहिए। वास्तविक धर्म तो जिज्ञासा से ही आगे बढ़ता है। वास्तविक धर्म तो चाहता है कि तुम उसको ठोको-बजाओ, उसकी परख करो। धर्म वास्तविक है या नहीं, इसका पता ही इसी बात से चलता है कि वो तुमको सवाल-जवाब, निंदा-आलोचना की कितनी अनुमति दे रहा है।

लेकिन दुनिया भर के सब सम्प्रदायों में, तथाकथित धर्मों में, मज़हबों में, ये सी-असहिष्णुता, पहले भी रही है और हम पा रहे हैं कि अब और ज़्यादा बढ़ती जा रही है, 'हमें कुछ कह मत देना'। क्यों भई! तुम इतने कमज़ोर हो क्या कि तुम्हें कुछ कह दें तो तुम्हें चोट लग जाती है? गर्दनें काट दी जाती हैं, आक्रमण हो जाते हैं। ज़रा-ज़रा सी बात पर लोग कोर्ट में चले जाते हैं कि, 'हमारी धार्मिक भावनाओं को ठेस लग रही है।'

किसी किताब में आप कुछ लिख दीजिये, जो ज़रा भी किसी समुदाय के ख़िलाफ़ हो; वो पहले तो किताब चौराहों पर जलाई जाएगी, फिर जिन भी बुक स्टोर्स पर वो किताब रखी होगी उसके शीशे तोड़ दिए जाएँगे। उसके बाद सरकार खुद ही उस किताब पर प्रतिबन्ध लगा देगी, अगर तब तक कोर्ट ने उसको छोड़ दिया है तो। नहीं तो फिर कोर्ट कर देगा।

ये बात किताबों पर ही नहीं, फिल्मों पर भी होती है। अभिव्यक्ति के जितने माध्यम हैं, सब पर अंकुश लगाया जा रहा है। बोलने वालों के मुँह में कपड़ा ठूसा जा रहा है; तुम बोल नहीं सकते। बोलने वालों से मैं हमेशा कहता हूँ, बोलने से पहले सौ बार सोचो। तुम जो बात बोल रहे हो क्या वो बोलने लायक भी है? तमाम मौकों पर मैंने उन लोगों की बड़ी भर्त्सना करी है, जो धर्म की भर्त्सना करते हैं। जो दिन-रात धर्म की निंदा करने में ही लगे रहते हैं। बहुत सारे ऐसे पेशेवर लोग हैं, जिनका एक ही काम है–धर्म की निंदा करो।

मैंने कितनी ही बार उनको चेताया है कि ये तुम क्या कर रहे हो? उनको इसलिए नहीं चेताया कि तुम धर्म की निंदा कर रहे हो; बल्कि इसलिए क्योंकि तुम्हें अभी निंदा करने का अधिकार नहीं है। तुम खुद बेहोश हो, तुम कैसे बताओगे कि क्या सफ़ेद है क्या काला? कौन सोया है कौन जगा है? जो खुद अभी सोया हुआ है, वो कैसे बता पाएगा कि कौन सो रहा है, कौन जग रहा है?

तो आमतौर पर ये सब लोग जो धर्म के आलोचक बने बैठे हैं, इनको यही बोलता हूँ, बोलने से पहले अपनेआप से पूछा करो तुम्हें अभी बोलने का हक़ है क्या? लेकिन जो लोग इनके बोलने का हक़ छीनना चाहते हैं, उनसे मैं ये कहूँगा, उनके बोलने का हक़ मत छीनो। ये जो मैं कह रहा हूँ बात, ये थोड़ी सी बारीक है। समझिएगा। दोनों तरफ़ को है।

जो अपनेआप को उदारवादी वगैरह बोलते हैं, अतिआधुनिक बनते हैं, और यही कहने में लगे रहते हैं कि, धर्म गए ज़माने की चीज़ है। धर्म का आज कोई महत्व नहीं। उनसे मैं बार-बार क्या पूछता हूँ, तुम होश में हो? तुम्हें कुछ पता भी है तुम क्या बोल रहे हो? और तुम समाज में बोल रहे हो तो तुम्हारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है क्या कि बोलने से पहले अपनेआप से अच्छे से पूछ लो कि, 'ये जो मैं बात बोल रहा हूँ, जो अब दुनिया सुनेगी, इस बात में कोई दम है? कोई सच्चाई है? कोई वज़न है?' उनसे ये बोलता हूँ। और दूसरी तरफ़, जो लोग अभिव्यक्ति का गला घोटने को तैयार हैं, उनसे कहता हूँ, तुम्हें क्या अधिकार है भाई! बोलने वाले को चुप करने का? तुम कितने होश में हो? वो इसलिए बोल रहे हैं क्योंकि वो 'मदान्ध' हैं। 'मद्य' माने नशा।

जो धर्म की आलोचना कर रहे हैं वो 'मदान्ध' हैं। नशे ने उनको अन्धा कर रखा है। और जो धर्म की आलोचना करने वालों पर आक्रमण कर रहे हैं वो 'धर्मान्ध' हैं। उन्हें धर्म ने अन्धा कर रखा है। अब एक अन्धे को दूसरे अन्धे की भर्त्सना करने का अधिकार क्या है, ये बता दो?

कुछ इसलिए अन्धे हैं क्योंकि उन्हें धर्म का महत्व नहीं पता। और कुछ इसलिए अन्धे हैं क्योंकि उन्होंने धर्म को पकड़ रखा है, धर्म को जाने बिना। अन्धे तो दोनों ही तरफ़ हैं न? कोई भी चीज़ हो उसपर प्रश्न करने की पूरी अनुमति होनी चाहिए।

सवाल निचले तल का हो सकता है, सवाल ऊँचे तल का हो सकता है लेकिन कोई भी सवाल पाप नहीं होता। कोई भी सवाल ऐसा नहीं होता कि जिसको पूछो तो तुम्हें हत्या की धमकी मिलने लगे।

सवाल अच्छा-बुरा ज़रूर हो सकता है। बहुत सारे सवाल, बहुत बुरे सवाल होते हैं। बुरे इस अर्थ में कि व्यर्थ के हैं। बुरे इस अर्थ में कि पूछने वाले को पता ही नहीं है कि क्या पूछ रहा है। लेकिन कोई भी सवाल गुनाह नहीं हो गया। और गुनाह है भी यदि तो वो इस अर्थ में हो सकता है कि सवाल पूछ करके उसने बहुतों का समय ख़राब करा; बस इस अर्थ में तुम कह सकते हो कि वो सवाल गुनाह है, पूछना अपनेआप में कभी गुनाह नहीं हो जाता।

आपने विचार करा है, और विचार करने के बाद आपको कोई चीज़ लगी है, वो बताना कभी गुनाह नहीं हो जाता। भाई! आपको जो लगा, आपने बता दिया। अब ये ज़िम्मेदारी सुनने वालों पर है कि वो जो लेखक है या वक्ता है, वो जो बोल रहा है, उसकी बात को ठीक से तोल लो। और ठीक नहीं है, तो उसकी उपेक्षा करो न; उसकी जान काहे को लेते हो?

हाँ, लेखकों से मैं ये बोलूँगा कि, तुम लिख रहे हो, तो तुम्हारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है क्या? तुम लिख रहे हो, तुमने सोचा नहीं कि तुम जो लिख रहे हो उसका प्रभाव क्या पड़ेगा? तुमने सोचा नहीं कि तुम किस मानसिक अवस्था में हो, जो लिख रहे हो? तुमने अपने भीतर कभी झाँककर के अपनी शुद्धता देखी या बस लिख ही डाला? ये मैं लेखकों से कहूँगा। और मैं पाठकों से कहूँगा कि, अगर किसी लेखक ने कुछ लिख दिया है, जो तुम्हें ठीक नहीं लग रहा तो उपेक्षा करो न; पर उसके लेखन का अधिकार आप नहीं छीन सकते।

वैदिक तो पूरी परम्परा ही संवाद की है। और संवाद और विवाद में अंतर बस नीयत का होता है। वरना चीज़ जो है, वो द्विपक्षीय है दोनों में। दोनों बोल रहे होते हैं। आप अष्टावक्र गीता उठाएँगे तो उसमें ऐसा नहीं है कि जनक सिर्फ़ जिज्ञासा कर रहे हैं, जनक बहुत कुछ बोल रहे हैं। आप 'भगवद्गीता' उठाइये। कृष्ण पर लगभग आरोप लगा दिए हैं अर्जुन ने कि, 'कृष्ण तुम मुझे भ्रमित कर रहे हो।' और कृष्ण ने ये थोड़ी करा है कि, 'मैं भगवान हूँ, तूने मुझे ऐसे बोल दिया, मैं तेरी गर्दन काट दूँगा।'

साक्षात कृष्ण भी सामने खड़े हों, तो भी 'गीता' ये अधिकार देती है अर्जुन को कि कह सकते हो कि, 'मुझे लग रहा है कि आप मुझे भ्रमित कर रहे हैं।' और कृष्ण गर्दन नहीं काट देते। वरना तो सुदर्शन चक्र है, काटो अर्जुन की…। सामने ही खड़ा है, काट दो अर्जुन की गर्दन। नहीं, ऐसा नहीं।

मुझे समझ में ही नहीं आता है कि बिना बातचीत के ज्ञान की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी कैसे बाबा! कैसे बढ़ेगी? ऋषि और शिष्य आपस में संवाद न करें, तो उपनिषद् कहाँ से आएँगे? मुझे ये खेल ही समझ में नहीं आता कि कोई चीज़ है, जो बोल दी गयी है और आखिरी है, और उसपर कोई सवाल मत उठा देना। ये क्या है? कैसे हो सकता है ऐसा?

स्वयं कृष्ण ऐसा नहीं कह रहे। उपनिषदों के ऋषि ऐसा नहीं कह रहे। जो मूर्धन्य ग्रन्थ हैं तुम्हारे, कोई ऐसा नहीं कह रहा कि हमपर सवाल मत उठा देना। वो तो कहते हैं–पूछो! बोलो! कुछ समझ में नहीं आ रहा वो भी बताओ और कुछ ग़लत लग रहा हो वो भी बताओ। हाँ, बस बोलते वक़्त नीयत साफ़ रखना। नीयत, बात को घुमाने की नहीं होनी चाहिए। नीयत, बात को जानने की होनी चाहिए।

सवाल पूछते वक़्त या आलोचना करते वक़्त इरादा ये नहीं होना चाहिए कि मामले को और घुमा दें, पेचीदा कर दें, उलझा दें। आलोचना करो, चाहे सवाल पूछो, इरादा होना चाहिए समझने का जानने का।

क्या समस्या हो गयी? मैं आपसे सामने आते ही पहली चीज़ क्या बोलता हूँ? क्या बोलता हूँ? पहला ही प्रश्न क्या होता है? या पहला ही शब्द क्या होता है मेरा? बोलिए! मैं नहीं बोलने लग जाऊँगा। मैं क्या बोलूँ? आपके पास अगर बोलने को कुछ नहीं है तो मैं क्या बोलूँ। कोई प्रवचन थोड़े ही देना है। मुझे ये थोड़े ही बोलना है कि बस अभी-अभी ऊपर से डाउनलोड हुआ है और अब मैं आपको बता रहा हूँ। ये तो बातचीत है, विचार-विमर्श है, संवाद है, डायलेक्टिकल है पूरी प्रक्रिया।

मेरे लिए तो बल्कि तकलीफ़ हो जाती है, जब कोई कह देता है कि आप फलाने विषय पर बोलिये। ऐसे आमंत्रण आते हैं। वो आमंत्रण पत्र में ही विषय लिखकर भेज देते हैं। बोलते हैं, 'हम चाहते हैं कि आप हमारे यहाँ आएँ और दो घंटे तक इस विषय पर व्याख्यान दें।'

(विस्मयभरी मुद्रा दिखाते हैं) मैंने कहा, हैं! ये नहीं हो पाएगा। सामने लोग होने चाहिए, उनके सवाल होने चाहिए तब बात बनती है। बात और गाढ़ी हो जाती है, रसीली हो जाती है, अगर जो सामने बैठे हैं वो आपत्तियाँ कर रहे हों। मैंने अपने शुरू के दस साल, बात ही बस 'आपत्तियों' से करी है। इसको आप सुन सकते हैं कि, बात ही सिर्फ़ 'आपत्तियों' से करी है। किनसे करता था बात? हाँ! कॉलेजी छात्र-छात्राएं। अब उनके सामने बैठ जाऊँ, उनके पास आपत्तियों के अलावे कुछ होता ही नहीं था। उनका तो बस चले तो नारेबाज़ी कर दें। उसी में फिर हममें भी जान आती थी। हमने कहा अच्छा! चलो बताओ क्या करना है फिर? और वो रस जैसा तब था, आज आता ही नहीं।

ये दूर-दूर से निशाना लेने में क्या है? कुछ नहीं। कुश्ती करते हैं। पसीना होना चाहिए, धूल होनी चाहिए, अखाड़ा होना चाहिए, लोट लगनी चाहिए, भीतर कुछ चरमराने की आवाज़ आनी चाहिए तब न मज़ा आता है। ये थोड़े कि पीपीटी लेकर आ गए हैं, और दिखा दी और चले गए। ये तो डर की निशानी है न, कि सवाल बर्दाश्त नहीं कर सकते, आलोचना नहीं सहेंगे, निंदा की अनुमति नहीं है।

और ये चीज़ अब हर जगह छाती जा रही है। रोज़ ट्विटर पर कुछ न कुछ रहता है–'देखो इन्होंने ऐसा बोल दिया। इससे हमारी धार्मिक भावना आहत हो गयी।' हर वर्ग, हर सम्प्रदाय, सब इसी में लगे हुए हैं। कुछ दूसरों से आगे हैं, कुछ अभी थोड़ा पीछे हैं। जो थोड़ा पीछे हैं, वो कह रहे हैं, 'हमें भी आगे हो जाना है। दूसरा काहे को आगे रहे? वो लोग इतने कट्टर हैं, तो हम कट्टरता में पीछे क्यों रहें? हम कट्टरता में पीछे हैं तभी तो फिर हम हारते हैं न। तो आगे वालों से जीतने का एक ही तरीका है, कि अगर वो सर काटते हैं तो फिर हम भी सर काटेंगे। अगर वो किसी तरह की आलोचना नहीं बर्दाश्त करते, तो हम भी किसी तरह की फिर आलोचना नहीं बर्दाश्त करेंगे।' ये क्या है?

रेस लगी है कि पहले गड्ढे में कौन गिरेगा और कौन कितना गहरा गिरेगा और कौन कितने रसातल में जा करके मरेगा? इस बात की प्रतिस्पर्धा चल रही है? दूसरा अगर बहका हुआ है, तो तुम उससे ज़्यादा बहकने की रेस लगा रहे हो क्या? फिर आप किसी को कुछ समझाना भी चाहते हो, तो उसके लिए ज़रूरी होता है न कि पता चले कि वो क्या बात नहीं समझ रहा? है न? जब वो आलोचना करता है न आपकी, तो पता चल जाता है कौन सी बात नहीं समझा। इससे आपको मौका मिल जाता है उसको समझाने का।

तो समझाने वाले के लिए ये बहुत अच्छी चीज़ है कि उसकी आलोचना की जाए। इससे उसको अपनी बात की सफ़ाई देने का मौका मिल जाता है। क्योंकि उसका उद्देश्य तो यही होना चाहिए कि मैं एक अच्छी बात बता रहा हूँ, सामने वाला उसको समझ जाए। अब सामने वाला समझने की जगह क्या कर रहा है, अगर मान लो निंदा कर रहा है, आलोचना कर रहा है, आपत्तियाँ कर रहा है, विवाद कर रहा है, तो ये बात तो शुभ है। शुभ नहीं है क्या?

हाँ, ठीक है तुमने ये बोला, हमने ये उत्तर दे दिया। तुम नहीं समझो, पर हमारे उत्तर से और बहुत सारे लोग समझ जाएँगे। हो सकता है तुम्हारी नीयत ही न हो समझने की, तो हम कितना भी बढ़िया उत्तर दे दें, तुम समझने से इंकार कर दो, संभव है। लेकिन फिर भी तुम्हारा जो प्रश्न है वो उपयोगी रहा। तुमने जो आपत्ति करी, निंदा करी, वो उपयोगी रही क्योंकि तुमने वो निंदा नहीं करी होती, तो हमने इस तरह फिर सफ़ाई देकर समझाया नहीं होता। और चूँकि हमने समझाया, तो इसीलिए बहुत दूसरे लोग हैं जो बात को समझ पाए। धर्म का वास्तविक काम फिर आगे बढ़ा। धर्म का तो उद्देश्य यही होता है न–भलाई हो सबकी, लोग समझे चीज़ को।

जिससे बात कर रहे हों, अगर वाकई आप उसके शुभचिंतक हैं, आप उसे कुछ समझाना चाहते हैं, तो खोद-खोद करके उसके भीतर जो भ्रम हैं, शंकाएँ हैं, आपत्तियाँ हैं, विरोध हैं, उनको बाहर निकलवाइए। कई बार हमें लगता है कि जो बात लिखी है वो ठीक है, हमने मान ली। लेकिन हमने मानी नहीं होती है, हमारे भीतर विरोध छुपा बैठा होता है। तब समझाने वाले का ये दायित्व हो जाता है कि वो उस छुपे विरोध को भी प्रकट करवा दे।

चूहा अगर बिल में ही छुपा रहा जाएगा तो पकड़ा कैसे जाएगा? उसको पकड़ना है तो? उसको बाहर निकलवाना होता है न। लेकिन उसको बाहर निकलवाने के लिए पहले आप में ये आत्मविश्वास होना चाहिए, कि चूहा बाहर निकलेगा तो आप उसे पकड़ लोगे। अगर आप इतने डरे हुए हो कि चूहा बाहर आ गया अगर तो हमें ही खा जाएगा, तो आप फिर चूहे के बाहर निकलने पर पाबन्दी घोषित कर दोगे। आप इतने डरे हुए क्यों हो? चूहे को बाहर आने दो न। चूहा ही तो है, क्या बिगाड़ लेगा आपका? और चूहों से मैं कहता हूँ, चूहा ही बने रहना है क्या? बात ये दोनों तरफ़ की है, क्योंकि धर्म की हानि दोनों तरफ़ हो रही है।

ये जो युग ही है हमारा, ये धर्म के संकुचन का युग है। यहाँ जो आलोचक हैं, वो भी बदनीयत हैं। और जो धर्म के रक्षक हैं, वो भी बदनीयत हैं। जो धर्म की आलोचना कर रहे हैं उनकी तो नीयत ख़राब है ही, जो धर्म की रक्षा कर रहे हैं उनकी भी नीयत बराबर की ख़राब है। तय करना मुश्किल हो जाता है कि इन दोनों में ज़्यादा बदनीयत कौन है।

आप पाएँगे कई बार कि आपको दोनों काम करने पड़ते हैं। किसी मौके पर आपको आलोचना करनी पड़ेगी और किसी मौके पर आपको किसी आलोचक को जवाब देना पड़ेगा।

मैं कह रहा हूँ, आप चाहे आलोचना करें, चाहे आलोचना का उत्तर दें; इरादा साफ़ होना चाहिए। नीयत ठीक होनी चाहिए। नीयत होनी चाहिए सच को जानने की। नीयत ये नहीं होनी चाहिए कि अपने अहंकार की रक्षा करनी है।

नीयत ये नहीं होनी चाहिए कि कोई ऐसी मसालेदार बात कह दो, जिससे कि प्रसिद्धि मिल जाए। और धर्म पर कीचड़ उछालने से प्रसिद्धि ज़रा जल्दी ही मिल जाती है। और कोई बोल दो मसालेदार बात, जल्दी मिल जाती है। एकदम कोई बहुत ही सनसनीखेज़ अपमानजनक बात बोल दो किसी अवतार वगैरह के लिए, बहुत जल्दी प्रसिद्धि मिल जाएगी। तो सस्ती लोकप्रियता पाने का भी आजकल ये तरीका है कि धर्म पर कीचड़ उछालो।

ऐसों से कहता हूँ, अपने गिरेबान में झाँको ज़रा। तुम आलोचना नहीं कर रहे हो, तुम टीआरपी बटोर रहे हो। और जो धर्म के रक्षक हैं, उनका तो कहना ही क्या! उनसे पूछो कि तुम धर्म की रक्षा के लिए तो आ गए हो, तुमने अपना कोई धर्म ग्रंथ पढ़ा है आज तक? समझा है आजतक? तुम्हारे जीवन में कितनी धार्मिकता है जो तुम धर्म के रक्षक बन रहे हो? लालच तुममें कूट-कूटकर भरा हुआ है, वासना तुममें भरी हुई है, तमाम तरह के विकार तुममें भरे हुए हैं। ग्रंथों से तुमको एलर्जी है और अपनेआप को कह रहे हो, 'मैं धर्म-रक्षक हूँ!' कैसे तुम धर्म-रक्षक हो गए भाई? तुम अपने गिरेबान में झाँको।

धर्म अगर सच्चा है तो उसमें प्रश्न-प्रतिप्रश्न के लिए, संदेह के लिए, शंका के लिए, आपत्ति के लिए, आलोचना के लिए, बहुत जगह होगी। उसे डर नहीं लगेगा। उसमें एक गहरा आत्मविश्वास होगा। वो कहेगा, 'आओ बात करो! बोलो क्या बोलना है? तुम अपने विचार ही तो अभिव्यक्त कर रहे हो न, करो। तुम्हारा कोई भी विचार, सत्य से ज़्यादा मजबूत तो नहीं हो सकता न? तो तुम्हारे किसी भी विचार से सत्य टूट नहीं जाएगा; तुम बोलो तुम क्या बोलना चाहते हो।'

‘हमें भरोसा है कि हम जवाब दे पाएँगे। और अगर हम पाते हैं कि हम जवाब नहीं दे पा रहे, तो फिर हम अंतर्मनन करेंगे। हम अपने भीतर, ज़रा पूछेंगे कि, हम उसकी आपत्ति का जवाब क्यों नहीं दे पाए? उसके तर्क का कोई समुचित उत्तर क्यों नहीं हैं हमारे पास? कहीं ऐसा तो नहीं कि हममें ही कोई खोट है? कहीं ऐसा तो नहीं कि धर्म को हमने कभी समझा ही नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे? जो आलोचना कर रहा है उसकी आलोचना का हमारे पास कोई जवाब नहीं है, इसलिए हम उसपर अब व्यक्तिगत आक्रमण कर रहे हैं; ये कहीं ऐसी बात तो नहीं है? ये फिर हमें सोचना चाहिए।’

धर्म कोई किस्सा-कहानी नहीं होता है। धर्म की क्या परिभाषा है? 'मन को शुद्धता और शांति की ओर ले जाना ही धर्म है।' इसके अलावा धर्म की कोई परिभाषा नहीं होती।

अब बताइए इसमें कोई क्या आलोचना कर सकता है? कोई क्या इल्ज़ाम लगाएगा? आपके भीतर तो ज़बरदस्त विश्वास होना चाहिए कि धर्म की कोई भी जो आलोचना होगी, वो व्यर्थ ही होगी। तो अगर कोई आया है आलोचक, तो उसको तो आप बुलाइये, 'हाँ, आओ-आओ! वहाँ से क्या बोल रहे हो, हम तुमको माइक देते हैं। माइक में बोलो। बोलो क्या आलोचना कर रहे हो?' लेकिन हम उस धर्म को जानते नहीं, जो इतना सहज है। कि मन को शांति-शुद्धि की ओर ले जाना ही धर्म है।

हमारे लिए धर्म का मतलब होता है किस्से-कहानियाँ। ऐसा हुआ फिर ऐसा हुआ, फिर ये होगा, फिर जब मौत होती है तो उसके बाद ऐसा होता है, फिर ऐसा होता है। ये सब कहानियाँ, इनको हमने धर्म मान लिया है। ये सब किस्से-कहानियाँ, ये बच्चों की बातें, ये सब थोड़े ही धर्म होता है। और फिर जब कोई आ करके इन कहानियों की हवा निकाल देता है, पंक्चर कर देता है, तो हमें ठेस लग जाती है। हमें लगता है– 'देखो! इसने हमारे धर्म पर ऊँगली उठा दी।' उसने धर्म पर नहीं ऊँगली उठाई है, उसने किस्से-कहानी पंक्चर करे हैं। छोडो़ न किस्से-कहानियों को, उनमें वैसे भी क्या रखा है? धर्म से कोई भी मनुष्य आपत्ति कर ही नहीं सकता। पूछो क्यों? क्योंकि शांति सबको चाहिए। और मन का शांति की ओर जाना ही धर्म है, तो कोई धर्म को ले करके क्या टिप्पणी कर सकता है? कुछ नहीं। संभव ही नहीं है। डरो मत!

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