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देवी की दैत्यों के प्रति भीषण हिंसा भी अहिंसा क्यों है? || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: फिर देवी का और दैत्यों का संग्राम होता है और वो संग्राम बड़े विस्तार के साथ वर्णित है पूरे मध्यम चरित्र में। कि दैत्यों के इस सेनापति ने हमला किया तो देवी ने फिर कैसे उसको परास्त किया, वो किन-किन अस्त्रों का प्रयोग करके देवी पर आघात कर रहा था तो फिर देवी ने किन अस्त्रों का प्रयोग किया, उसने कैसे आसमान में उछल करके शूल फेंका तो फिर देवी ने शूल फेंका, फिर उसने देवी की बाँह पर तलवार मारी तो तलवार टूट गई। ये सब जो पूरा वर्णन है, ये सब विस्तार है।

जब देवी ने प्रकट हो करके गर्जन करा तो उस सिंहनाद के विषय में कहा गया है कि आकाश उसके सामने लघु प्रतीत होने लगा।

"बड़े ज़ोर की प्रतिध्वनि हुई जिससे सम्पूर्ण विश्व में हलचल मच गई, समुद्र काँप उठे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत हिलने लगे। तो देवताओं ने फिर बड़ी प्रसन्नता से सिंहवाहिनी भवानी से कहा, 'देवी तुम्हारी जय हो', और महर्षियों ने भक्ति भाव से विनम्र होकर उनकी स्तुति करी।"

"दैत्यों को जब पता चला कि देवी का इस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ है तो वे अपनी समस्त सेना को कवच आदि से सुसज्जित कर, हाथों में हथियार ले, सहसा उठकर खड़े हो गए।"

"महिषासुर ने बड़े क्रोध में आकर कहा, 'यह क्या हो रहा है?' फिर वह सम्पूर्ण असुरों से घिरकर उस सिंहनाद की ओर लक्ष्य करके दौड़ा और उसने वहाँ पहुँचकर देवी को देखा जो अपनी प्रभा से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रही थीं, उनके चरणों के भार से पृथ्वी दबी जा रही थी, माथे के मुकुट से आकाश में रेखा सी खिंच रही थी और वे अपनी धनुष की टंकार से सातों पातालों को क्षुब्ध किए देती थीं। देवी अपनी हज़ारों भुजाओं से संपूर्ण दिशाओं को आच्छादित करके खड़ी थीं। तदनन्तर उनके साथ दैत्यों का युद्ध छिड़ गया। नाना प्रकार के अस्त्र शस्त्रों के प्रहार से सम्पूर्ण दिशाएं उद्भासित होने लगीं।"

"चिक्षुर नामक महान असुर महिषासुर का सेना नायक था। वह देवी के साथ युद्ध करने लगा। अन्य दैत्यों की चतुरंगिणी सेना साथ लेकर चामर भी लड़ने लगा। साठ हज़ार रथियों के साथ आकर उदग्र नामक महा दैत्य ने लोहा लिया। एक करोड़ रथियों को साथ लेकर महाहनु नामक दैत्य युद्ध करने लगा। जिसके रोएँ तलवार के सामान तीखे थे और असिलोमा नाम का महदैत्य पाँच करोड़ रथी सैनिकों सहित युद्ध में आ डटा।"

"साठ लाख रथियों से घिरा हुआ बाष्कल नामक दैत्य भी उस युद्ध भूमि में लड़ने लगा, परिवारित नामक राक्षश हाथी सवार और घुड़सवारों के अनेक दलों तथा एक करोड़ रथिकों की सेना लेकर युद्ध करने लगा। बिडाल नमक दैत्य पाँच अरब रथियों से घिर कर लोहा लेने लगा। इसके अतिरिक्त और भी हज़ारों महा दैत्य रथ, हाथी, और घोड़ों की सेना साथ लेकर वहाँ देवी के साथ युद्ध करने लगे।"

"वे दैत्य देवी के साथ तोमर, भिन्दिपाल, शक्ति, मूसल, खड्ग, परशु और पट्टिश आदि अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करते हुए युद्ध कर रहे थे। कुछ दैत्यों ने उन पर शक्ति का प्रहार किया, कुछ ने पाश फेंके तथा कुछ दूसरे दैत्यों ने खड्ग प्रहार करके देवी को मार डालने का उद्योग किया। देवी ने भी क्रोध में भरकर खेल-खेल में ही अपने अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करके दैत्यों के वे समस्त शस्त्र काट डाले।"

"उनके मुख पर परिश्रम या थकावट का रंच मात्र भी चिन्ह नहीं था। देवता और ऋषि उनकी स्तुति करते थे, और वे भगवती परमेश्वरी दैत्यों के शरीरों पर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करती रहीं। देवी का वाहन सिंह भी क्रोध में भरकर गर्दन के बालों को हिलाता हुआ असुरों की सेना में इस प्रकार विचरने लगा मानों वनों में दावानल फैल रहा हो।"

"रणभूमि में दैत्यों के साथ युद्ध करती हुई अम्बिका देवी ने जितने निश्वास छोड़े, वे सभी तत्काल सैकड़ों हज़ारों गणों के रूप में प्रकट हो गए," — गण मतलब यहाँ पर अनुचर, सैनिक, कि देवी की सांस से हज़ारों सैनिक देवी के प्रकट हो गए — "और परशु, भिन्दिपाल, खड्ग तथा पट्टिश आदि अस्त्रों द्वारा असुरों का सामना करने लगे।"

"देवी की शक्ति से बढ़े हुए वे गण असुरों का नाश करते हुए नगाड़ा और शंख आदि बाजे बजाने लगे। उस संग्राम महोत्सव में कितने ही गण मृदंग बजा रहे थे। तदनन्तर देवी ने त्रिशूल से, गदा से, शक्ति की वर्षा से और खड्ग आदि से सैकड़ों महा दैत्यों का संघार कर डाला। कितनों को घंटे के भयंकर नाद से मूर्छित करके मार गिराया, बहुतेरे दैत्यों को पाश से बांधकर धरती पर घसीटा। कितने ही दैत्य उनकी तीखी तलवार की मार से दो-दो टुकड़े हो गए। कितने ही गदा की चोट से घायल हो धरती पर सो गए, कितने ही मूसल की मार से अत्यंत आहत होकर रक्त वमन करने लगे। कुछ दैत्य शूल से छाती फट जाने के कारण पृथ्वी पर ढेर हो गए।"

“उस रणांगण में बाण समूहों की वृष्टि से कितने ही असुरों की कमर टूट गई। बाज़ की तरह झपटने वाले देवी पीड़क दैत्यगण अपने प्राणों से हाथ धोने लगे। किन्हीं की बाहें छिन्न भिन्न हो गईं, कितनों की गर्दनें कट गईं, कितनों के मस्तक कट-कटकर गिरने लगे। कुछ लोगों के शरीर मध्य भाग में ही विदीर्ण हो गए। कितने ही महा दैत्य जाँघे कट जाने से धरती पर गिर पड़े।"

"कितनों को ही देवी ने एक बाँह, एक पैर और एक नेत्र वाले करके दो टुकड़ों में चीर डाला, कितने ही दैत्य मस्तक कट जाने पर भी गिरकर फिर उठ जाते और केवल धड़ के ही रूप में अच्छे-अच्छे हथियार लेकर देवी के साथ युद्ध करने लगते थे। दूसरे कबंध युद्ध के बाजों की लय पर नाचते थे। कितने ही बिना सिर के धड़ हाथों में खड्ग, शक्ति और शिष्ट लिए दौड़ते थे तथा दूसरे महा दैत्य ठहरो-ठहरो कहते हुए देवी को युद्ध के लिए ललकारते थे।"

"जहाँ वह घोर संग्राम हुआ था, वहाँ की धरती देवी के गिराए हुए रथ, हाथी, घोड़े और असुरों की लाशों से ऐसी पट गई कि वहाँ चलना-फिरना असंभव हो गया। दैत्यों की सेना में हाथी, घोड़े और असुरों के शरीरों से इतनी अधिक मात्रा में रक्तपात हुआ कि थोड़े ही देर में वहाँ खून की बड़ी-बड़ी नदियाँ बहने लगीं। जगदम्बा ने असुरों की विशाल सेना को क्षण भर में नष्ट कर दिया, ठीक उसी तरह जैसे तृण और काठ के भारी ढेर को आग कुछ ही क्षणों में भस्म कर देती है। और वह सिंह भी गर्दन के बालों को हिला-हिलाकर ज़ोर-ज़ोर से गर्जना करता हुआ दैत्यों के शरीरों से उनके प्राण चुने लेता था।"

स्पष्ट ही है कि कोई बात संकेत के रूप में कहने की कोशिश की जा रही है, उसको समझना होगा। ये ग्रन्थ का बड़ा अनादर और दुरुपयोग है यदि आप इन घटनाओं को तथ्य के तल पर प्रमाणिक मान लें। और ग्रंथकार ने चेष्टा भी नहीं करी है बात को रंच मात्र भी प्रमाणिक रखने की। साठ करोड़ की सेना, पाँच हज़ार वर्षों तक युद्ध, फिर एक करोड़ रथी आ गए, फिर श्वास से सैनिक पैदा हो गए। ग्रंथकार की कोई इच्छा भी नहीं है कि आप मानें कि कोई ऐसा वास्तव में हुआ, उस तरह से हुआ, जैसा हम प्रतिदिन अपने सामने संसार में होता देखते हैं। नहीं, ये वो नहीं है।

ये वैसी घटनाएँ नहीं हैं जो प्रतिदिन आपके सामने संसार में होती हैं, ये वो घटनाएँ हैं जो प्रतिदिन आपके भीतर के संसार में होती हैं। इन घटनाओं को इतिहास मत समझ लीजिएगा। कोई युग, कोई काल, कोई कल्प ऐसा नहीं था जब ये घटनाएँ आपकी आँखों के सामने घटी हों। लेकिन कोई युग, कोई काल, कोई कल्प, कोई क्षण ऐसा नहीं है जब ये घटनाएँ आपकी आँखों के पीछे न घट रही हों। ये निरंतर घटने वाली घटनाएँ हैं हमारे अंतर लोक में।

इसी तरीके से इसमें एक प्रश्न जो उठना चाहिए, वो है हिंसा सम्बन्धी। इतना सजीव चित्रण किया गया है, रक्त की नदियाँ बह रही हैं, उसमें जो हताहत सैनिक हैं, उनके अंग बहे जा रहे हैं। किसी का हाथ कट रहा है, किसी की जांघ कट रही है, किसी के शरीर के कई टुकड़े कर दिए गए हैं, और उन सब बातों का बहुत विस्तार पूर्वक, बड़ा सजीव वर्णन किया गया है, जिसको आप कहेंगे *ग्राफ़िक डिस्क्रिप्शन*।

ये क्या है? अहिंसा कहाँ गई? अब इसके पीछे जो सिद्धांत है, उसको हमें थोड़ा ध्यान से समझना होगा।

हिंसा है चेतना को मिटाने की कोशिश। चेतना को मिटाने या दबाने के प्रयास को हिंसा कहते हैं।

जब आप चेतना के प्रति गहरे आदर भाव से भर जाते हैं, तो आपका सारा सम्मान बस चेतना के लिए आरक्षित हो जाता है। आप कहते हो सम्मान तो मुझे देना है तो बस किसको? चेतना को देना है। जब आप प्रबल रूप से अहिंसक हो जाते हो तो आप सारा सम्मान किसको दोगे? चेतना को। यही तो अहिंसक मन की निशानी है न, कि वो चेतना के प्रति गहरे आदर भाव से भरा होता है। यही अहिंसा है उसकी, कि जहाँ कहीं भी चेतना होगी, उसको क्षति नहीं होनी चाहिए। यही अहिंसा है न?

लेकिन उसी के साथ-साथ फिर निश्चित रूप से ये बात भी चलेगी कि सारा सम्मान मैं दूँगा मात्र चेतना को, माने जहाँ चेतना नहीं है उसको मैं सम्मान रंच मात्र भी नहीं दूँगा, ज़रा भी नहीं दूँगा। और विशेषकर वहाँ तो सम्मान बिल्कुल भी नहीं दूँगा जहाँ अब चेतना के उठने की संभावना ही शून्य कर दी गई है।

एक व्यक्ति है जो बुद्धि से अल्प है। वहाँ कम-से-कम ये संभावना तो है कि धीरे-धीरे करके, प्रयास करके, धैर्य रखकर इसमें कभी चेतना का संचार किया जा सकता है। एक छोटी सी चींटी, उसमें जितनी भी चेतना है, वो कम-से-कम उस चेतना को दबाने मिटाने के लिए तो कोई प्रयत्न नहीं कर रही है न? कम है चेतना, पर है।

दूसरी ओर एक व्यक्ति हो सकता है जो चेतना के विरुद्ध अपने-आपको पूरे तरीके से प्रतिबद्ध, संकल्पित, समर्पित कर चुका है, वो कमिटेड है चेतना के विरुद्ध। ये व्यक्ति सबसे हीन श्रेणी का हुआ। इसने तो संभावना ही मार दी कभी भी सचेत होने की। ये पशु से बहुत नीचे के तल पर गिर गया क्योंकि पशु में कम है चेतना, लेकिन जितनी है पशु कम-से-कम कभी उसको हटाने की, मिटाने की कोशिश नहीं करता। जितनी है, उतनी है।

दैत्य वो है जिसमें जितनी है वो उसके ख़िलाफ़ मोर्चाबंद हो गया है, बल्कि उसने अपनी चेतना की धारा ही अचेतना की ओर मोड़ दी है। कैसे? वो कह रहा है कि मैं स्वयं तो चेतन हूँ नहीं, जो चेतन होगा, मैं उसको मार भी दूँगा, ख़त्म भी कर दूँगा। मैं स्वयं तो चेतन नहीं भी हूँ, जहाँ कहीं मुझे चेतना दिखेगी, मैं उसको भी ख़त्म कर दूँगा।

अब बताओ, अहिंसा क्या कहती है?

चेतना का समर्थन, चेतना को आश्रय देना और सम्मान देना — यही अहिंसा है।

और आपको अगर कोई ऐसा मिल गया जो स्वयं तो चेतना शून्य हो ही चुका है, साथ ही साथ वो दूसरों की चेतना को भी समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है, तो अब अहिंसा क्या माँगेगी आपसे? वध। और क्या? क्योंकि वो व्यक्ति अब व्यक्ति है ही नहीं—व्यक्ति तो उसको मानेंगे न जिसमें चेतना हो—वो व्यक्ति, व्यक्ति नहीं रहा, उसको तुम रेत मान लो, पत्थर मान लो। और वो रेत और पत्थर से भी निचले दर्जे का है क्योंकि रेत और पत्थर स्वयं उठ करके किसी सचेत व्यक्ति की चेतना छीनने नहीं आते, पर ये दैत्य स्वयं तो अचेत है ही, और इसको जो कोई मिलता है चैतन्य, उसकी चेतना पर आक्रमण के लिए भी आतुर है। इसका जैसे जीवन में एक ही लक्ष्य हो कि जहाँ भी मुझे कुछ ऐसा मिलेगा जो चेतना की ओर अग्रसर होगा, मैं उसको समाप्त कर दूँगा।

अब बताओ अगर अहिंसक हो तुम तो क्या करोगे? अहिंसक होने का अर्थ क्या है? चेतना के प्रति श्रद्धा, सम्मान, प्रेम। चेतना को अगर बचाना है, अहिंसक हो तुम, तो सबसे पहले तुम्हें उसका वध करना पड़ेगा न जो चेतना के विरुद्ध खड़ा हुआ है? तो जिस तरीके की तुम यहाँ पर हिंसा देख रहे हो या जैसी हिंसा तुम श्रीमद्भगवद्गीता में देखते हो, वो वास्तव में गहरी अहिंसा है। वही अहिंसा है।

तुम्हारे सामने कोई निर्दयी, आततायी, अत्याचारी खड़ा हो जो तुम्हारे देखते-देखते कितने ही चैतन्य लोगों की चेतना प्रभा को बुझाए दे रहा हो, और तुम कहो कि नहीं, मैं तो अहिंसक हूँ, मैं इसके विरुद्ध नहीं जाऊँगा। तो तुम अहिंसक नहीं हो, तुम घोर हिंसक हो क्योंकि तुम अपनी आँखों के सामने देख रहे हो एक अत्याचारी को अत्याचार करते हुए और तुम उसे रोक नहीं रहे हो। ये हिंसा है, उसे न रोकना हिंसा है। चेतना के विरुद्ध अत्याचार हो रहा है और तुम उस अत्याचार का प्रबल विरोध नहीं कर रहे — ये हिंसा है।

शरीर कट रहा है, रक्त बह रहा है, इस बात को हिंसा मत मान लेना, क्योंकि चेतना शरीर की नहीं होती। जब उस शरीर में चेतना ही नहीं थी तो उस शरीर के कटने से अहिंसा कैसे बाधित हुई, बताओ? बोलो मुझे। तुम एक पत्थर के दो टुकड़े कर देते हो, क्या तुम इसको हिंसा मानते हो? एक पत्थर के दो टुकड़े कर दिए, क्या हिंसा मानी जाती है? वैसे ही ऐसा शरीर जिसमें चेतना है ही नहीं, उसके दो टुकड़े कर दिए तो हिंसा कहाँ हुई? बल्कि वो शरीर पत्थर से भी मैं कह रहा हूँ गया गुज़रा है, क्योंकि पत्थर खुद उठ करके किसी चैतन्य व्यक्ति को घात पहुँचाने नहीं आता।

पर अभी जिस शरीर की बात कर रहे हैं, ये तो ऐसा है कि मैं खुद तो नशे में हूँ, मद में हूँ, बेहोशी में हूँ, और अगर मुझे कोई दिख गया जो नशे में नहीं है, जो होश में है, जो सच की तरफ़ बढ़ना चाहता है, तो मैं उसको मार डालूँगा। ये तो पत्थर से भी गया गुज़रा है, और पत्थर को ही तोड़ना जब हिंसा नहीं तो इस व्यक्ति के शरीर को दो टुकड़ों में काट देना हिंसा कहाँ से हो गई? ये तर्क है।

इस तर्क को ले करके आपके पास अपने मतभेद हो सकते हैं, लेकिन जो बात समझाई जा रही है, उसको समझिएगा। क्योंकि इस तरह के आरोप भी बहुत लगते हैं कि भारतीय चित्त तो गहरे रूप में हिंसक है ही, क्योंकि यहाँ तो पुराणों में ही देखो कैसे बताया जाता है कि एक की बाँह काट ली, एक का सिर काट लिया, एक की जीभ काट ली।

सिर काटना, बाँह काटना, जीभ काटना आवश्यक नहीं है कि अपने-आप में हिंसा हो। बल्कि उल्टा भी संभव है, इस सम्भावना पर गौर करिएगा। कई बार सिर न काटना बहुत बड़ी हिंसा हो सकती है। जहाँ ज़रूरी है कि सिर काट लो, वहाँ तुमने नहीं काटा तो बहुत बड़ी हिंसा हो सकती है।

मैं यहाँ पर किसी का सिर काटने की वकालत नहीं कर रहा हूँ, न मैं आपको सिखा रहा हूँ कि आप खून बहाना शुरू कर दें। मैं बस उस तर्क का उत्तर दे रहा हूँ जो कहता है कि भारतीय धर्मशास्त्रों में हिंसा-ही-हिंसा फैली हुई है। मैं उनको समझाना चाह रहा हूँ हिंसा और अहिंसा का वास्तविक अर्थ। मैं उनको उत्तर दे रहा हूँ जो कहते थे कि श्रीकृष्ण पापी थे क्योंकि उन्होंने महाभारत का युद्ध कराया और हिंसा करायी, मैं उन्हें जवाब दे रहा हूँ।

अधिकांशतः जब आप खून बहाते हैं तो आप इसलिए नहीं बहाते कि आप चेतना की रक्षा करना चाहते हैं — इसलिए खून बहाना बुरा है। निन्यानबे दशमलव नौ नौ प्रतिशत मामलों में जब भी आपने खून बहाया है, आपने इसलिए थोड़े ही बहाया है कि जो सामने वाला व्यक्ति था, वो सत्य के ख़िलाफ़ था, वो चेतना का विरोधी था, इसीलिए मैंने ख़ून बहाया, ऐसे थोड़े ही किया।

ऐसे अगर आपको ख़ून बहाना होता तो सबसे पहले तो अपना बहाते क्योंकि सत्य के सबसे ज़्यादा ख़िलाफ़ तो आप स्वयं होते हैं, चेतना के धुर विरोधी तो आप स्वयं होते हैं। यदि सत्य और चेतना की ख़ातिर ही आपको रक्तपात करना होता तो सबसे पहले तो रक्त आपका बहना चाहिए था। इसलिए खून बहाना बुरा है क्योंकि हम खून सही कारण से नहीं बहाते, और सही कारण सदा एक ही होता है जीवन में: चेतना की रक्षा, चेतना को संरक्षण, आश्रय, सम्मान।

तो हम यहाँ पर खून बहाने का समर्थन नहीं कर रहे हैं। हम तो बिल्कुल जानते हैं कि दस हज़ार में से नौ हज़ार नौ सौ निन्यानवे मामलों में जो खून बहाया जाता है वो महापाप है। लेकिन हम ये भी आपको समझाना चाहते हैं कि हिंसा का मापदंड ये बिल्कुल भी नहीं है कि खून बहा या नहीं बहा।

हिंसा हुई या नहीं हुई, यह इससे नहीं नापा जा सकता कि खून बहा कि नहीं बहा, वो इससे नापना होगा कि आपका मन चेतना के साथ है या चेतना के ख़िलाफ़ है — यह बात निर्धारित करेगी कि हिंसा हुई या नहीं हुई। हिंसा का निर्धारण रक्तपात मात्र से नहीं किया जा सकता। कई बार जहाँ एक बूँद भी खून न बहा हो, हो सकता है वहाँ घोर हिंसा चल रही हो और कई बार जहाँ रक्त की नदियाँ बह रही हो, हो सकता है वहाँ अहिंसा का खेल चल रहा हो।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जिस वध की बात चल रही थी, वो जो मैं समझता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति विशेष की चल रही है, अगर आतंरिक वृत्तियों की बात चल रही है तो वो स्पष्ट है कि जो वृत्ति ग़लत दिशा की तरफ़ जा रही है उसका तो वध होना चाहिए। लेकिन अगर व्यक्ति विशेष की बात चल रही हो तो जो व्यक्ति हर समय अलग-अलग चेतना के स्तर में रहता है, कभी वो सत्य के विरोध में है और कभी वो सत्य के साथ भी है, तो कैसे इस चीज़ का मापदंड होता है?

आचार्य: तुम महाभारत में दुर्योधन को कृष्ण के साथ कब देखते हो? चेतना के अलग-अलग रूप दर्शा रहा है दुर्योधन, पर सब रूपों के मध्य में केंद्र तो उसका एक ही है। केंद्र क्या है उसका? अकृष्ण। तो ऐसा तो नहीं है कि वो कभी भी कृष्ण के साथ है, या ऐसा है? वो तो कभी भी नहीं है न?

हाँ, कभी वो जब कर्ण के साथ खड़ा है तो हो सकता है थोड़ा विनोद करता हो, हँसता हो। अपनी माता के समक्ष जाता है तो हाथ जोड़कर गांधारी से नमित है। द्रोण के पास जाएगा तो हो सकता है प्रणाम कर ले। उसके अपने भी बालक हैं, शिशु हैं, पुत्र हैं दुर्योधन के, उनके पास जाए तो हो सकता है स्नेह दर्शा दे। पर इन सभी स्थितियों में मुझे बताओ वो कृष्ण के साथ कब है?

उसकी चेतना के निश्चित रूप से अलग-अलग रूप हैं। कभी वो किसी का मित्र है, कभी किसी का पति है, कभी हँस रहा है, कभी क्रुद्ध है, कभी सम्मान दे रहा है, कभी स्नेह दे रहा है, पर वो जो कुछ भी कर रहा है, उसके केंद्र में तो अकृष्णत्व ही बैठा है न, कृष्ण विरोध ही बैठा है। चेतना के सब रूप होंगे, बहुत अलग-अलग तरीके से है वो, कभी बाप है, कभी बेटा है, कभी पति है, कभी मित्र है, कभी सेनापति है, कभी शिष्य है, पर कृष्ण के साथ कब है वो?

इतना ही नहीं है कि वो स्वयं कृष्ण के साथ नहीं है, बात ये है कि जितना उसका बस चलेगा, जितना उसका प्रभाव जाएगा, वो जितनों के भी संपर्क में आएगा, उन सबको कृष्ण के विरुद्ध ही करेगा। यदि वो राजा बन जाता है तो पूरा राज्य ही धर्मविरुद्ध कर देगा। अब मुझे बताओ, अहिंसा क्या कहती है? जीने दें दुर्योधन को? बोलो, अब अहिंसा क्या कहती है? जीने दें उसे?

देखो, मैं रक्तपात का समर्थक होकर ये नहीं बोल रहा हूँ, मैं जो गीता के पीछे का सिद्धांत है, वो समझाना चाह रहा हूँ बस, क्योंकि कृष्ण पर ये आरोप बहुत लगता है कि इतनी आपने हज़ारों-लाखों लाशें क्यों गिरवाईं? अर्जुन तो कह रहा था, “मुझे राज्य वगैरह नहीं चाहिए,” पहले ही अध्याय में वो कह रहा था, “मैं जा रहा हूँ, विरक्त हो गया, सन्यासी बन जाऊँगा, मुझे जाने दीजिए, अपनों पर मैं बाण नहीं चलाऊँगा।” आपने क्यों अर्जुन को प्रेरित किया, कि नहीं युद्ध करो ही?

मैं उस बात का स्पष्टीकरण दे रहा हूँ कि कृष्ण का केंद्र क्या था। कृष्ण के कर्मों के पीछे, निर्णयों के पीछे कारण क्या था? वो कारण समझना ज़रूरी है। तुमको ये तो दिख रहा है कि एक दुर्योधन मारा गया, तुम्हें ये भी हो सकता है दिखा रहा है कि हज़ारों-लाखों सैनिक मारे गए, पर तुमको वो करोड़ों लोग नहीं दिख रहे जो उस युद्ध के कारण बच गए।

जो प्रत्यक्ष है, वो आसानी से दिख जाता है और तुमने आसानी से देख लिया कि "अरे! कृष्ण की वज़ह से इतनी लाशें गिरीं" ये तुम्हें दिख गया। पर ये तुम्हें नहीं दिखा कि अगर दुर्योधन का राज्य हो जाता तो तुलनात्मक रूप से, अपेक्षतया, और कितने ज़्यादा वध होते। और वध तभी नहीं है जब तुमने किसी की जान ले ली, किसी को अगर एक ग़लत, अधार्मिक, जीवन जीने पर विवश कर दिया, तो ये तो मृत्यु से भी बड़ा दंड हो गया न?

तो देखो, जहाँ तक हो सके बिल्कुल एकदम ठीक बात है कि क्यों किसी की हत्या करनी। लेकिन अगर स्थिति ऐसी बन ही गई है कि कोई व्यक्ति पूरे तरीके से अधर्म को ही प्रतिबद्ध हो गया है, अब वो यही नहीं कह रहा है कि मैं सिर्फ़ अपना जीवन अधर्म में जिऊँगा, वो कह रहा है कि मैं तो अधर्म का प्रचार-प्रसार करूँगा। अब मुझे बताओ क्या करें?

कृष्ण की विवशता तो समझो। वो तो गए थे अपनी ओर से शांतिदूत बनकर दुर्योधन के पास। उसके सामने खड़े हो गए थे और दुर्योधन क्या कर रहा था? बोला कि इनको ही तुम बंधक बना लो। यहाँ तक उन्होंने निवेदन कर दिया था कि हमारा प्रस्ताव है कि बस हमें बस पाँच गाँव दे दो, दुर्योधन उसके लिए भी सहमत नहीं था।

तो रक्तपात करने में किसी की रूचि नहीं हो सकती, किसी कृष्ण की कोई पहली रूचि ये नहीं हो सकती, कोई पहला उनका निर्णय या पहला विकल्प ये नहीं हो सकता कि रक्तपात करना है। पर यदि सामने कोई ऐसा व्यक्ति पड़ गया है जिसके साथ और कोई चारा ही नहीं बच रहा, तो क्या किया जाए?

और अगर नहीं किया जाए फिर रक्तपात तो उसका क्या परिणाम होगा, ये भी तो सोचा करो। नहीं किया रक्तपात, अब क्या होगा? बन जाने दो दुर्योधन को राजा, अब बताओ क्या होगा? अब कितना रक्तपात होगा कभी इसकी गणना करी? इतना तो गिन लेते हो कि कुरुक्षेत्र में अट्ठारह दिन में कितनी लाशें गिरीं। पर फिर आगे, अठारह साल, एक सौ अस्सी साल या अठारह सौ साल तक कितनी लाशें गिरतीं दुर्योधन के राज्य में उसकी गणना कौन करेगा?

ये कोई आदर्श स्थिति नहीं है, पर जीवन आदर्शों पर चलता भी नहीं न कभी। आदर्श स्थिति तो ये होती कि दुर्योधन दुर्योधन बनता ही नहीं। उसको शिक्षा ऐसी मिलती, उसको परवरिश ऐसी मिलती कि कोई दुर्योधन इतना विधर्मी हो कर तैयार ही न हो। पर अब दुर्योधन तैयार हो गया है तो अब क्या करें?

इसी तरीके से अब दैत्य तैयार हो गए हैं तो अब क्या करें देवी? और समझाने-बुझाने से अगर दैत्य मान सकते तो पहला विकल्प यही होना चाहिए कि समझाओ-बुझाओ। "अरे, मत दो आधा राज्य, पाँच गाँव ही दे दो, हम इतने में भी तैयार हो जाएँगे। हम खून नहीं बहाना चाहते, बिल्कुल खून बहाने में हमारी कोई रूचि नहीं है।" लेकिन वो तो कह रहा है कि मैं सुई की नोक बराबर भी भूमि नहीं दूँगा। अब क्या करें, बताओ?

हमें अहिंसा का बड़ा सतही, बल्कि विकृत अर्थ पढ़ा दिया गया है। हमें बता दिया गया है कि दूसरे को चोट पहुँचाना हिंसा है, दूसरे को चोट न पहुँचाना अहिंसा है। जबकि बात बिल्कुल उल्टी है। दूसरा अगर अहंकार का पुतला है तो उसको चोट न पहुँचाना हिंसा है, दूसरा अगर अहंकार का पुतला है तो उसको चोट पहुँचाना सबसे बड़ी अहिंसा है। चोट पहुँचाइए, क्योंकि आपके सामने तो अहंकार खड़ा हुआ है, उसे चोट पहुँचाइए, बिल्कुल पहुँचाइए, यही अहिंसा है।

अहिंसा कोई आचरण भर की चीज़ नहीं है, कोई हल्की-फुल्की चीज़ नहीं है। अहिंसा अगर समझनी है तो तुम राजनीतिज्ञों के पास मत चले जाना, अहिंसा समझनी है तो तुमको अध्यात्म में गहरे पैठना होगा। वेदांत की गहरी समझ पैदा करो, तब अहिंसा समझ पाओगे कि क्या है।

नहीं तो अहिंसा के नाम पर तुम इसी तरह की बातें करते रहोगे कि नहीं-नहीं, मैं तो मीठा बोलता हूँ क्योंकि मैं तो बड़ा अहिंसक हूँ। ये कितनी मज़ाक जैसी बात है कि अहिंसा का मतलब है कड़वा न बोलना इत्यादि-इत्यादि। बेकार है, ये व्यक्ति न स्वयं को समझता है, न जीवन को समझता है, बहुत सतही बातें कर रहा है। ज़्यादातर लोग ऐसे ही बातें करते हैं।

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