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छुपे बलात्कारी || आचार्य प्रशांत के नीम लड्डू
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: मैं कुछ बातें सामने रख रहा हूँ, मुझे नहीं मालूम मैं उनको पूरी तरह समझा सकता हूँ या नहीं। पर अगर आप में ज़रा भी अंतर्दृष्टि होगी तो आप संबंध बैठा पाएँगे। दुनिया की आबादी का बहुत बड़ा तबका है, जो अब यह कहने में गौरव महसूस करता है कि पदार्थ है और सिर्फ़ पदार्थ है और पदार्थ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वह अपनेआप को आधिकारिक तौर से, ऑफिशियली घोषित करते हैं एथीस्ट (नास्तिक) या एग्नोस्टिक (संशयवादी)।

मुझे नहीं मालूम कि उनमें से कितने लोग समझते भी हैं कि वह क्या कर रहे हैं। मुझे नहीं मालूम उनमें से कितने लोगों को नास्तिकता का वास्तविक अर्थ भी पता है। पर इतना उन्होंने बिलकुल विश्वास के साथ घोषित कर दिया है कि सिर्फ़ और सिर्फ़ मटीरियल है। अगर सिर्फ़ और सिर्फ़ मटीरियल है तो किसी भी चीज़ को सम्मान क्या देना, मटीरियल तो मटीरियल है, मॉलिक्यूल (अणु) है; चाहे कोई मटीरियल हो।

अब कोई भी चीज़ श्रद्धा और सम्मान की हकदार कहॉं रही? फिर तो अपना शरीर भी क्या है? मटीरियल, और सामने वाली स्त्री का शरीर भी क्या है? मटीरियल। अब कौन–सा सम्मान, कौन सी श्रद्धा! द सेक्रेड हेज गॉन टॉटली आउट ऑफ इक्वेशन, नथिंग इज सेक्रेड। कोई भी चीज़ अब ऐसी नहीं बची है कि उसको हम कह दे कि यह पवित्र है, इसको छू मत देना। जब कुछ पवित्र नहीं है, तो फिर हम हर चीज़ को गंदा करे जा रहे हैं। कुछ भी पवित्र नहीं है। हम कहते हैं, कुछ भी नहीं है, जिस पर सवाल नहीं उठाए जा सकते हैं। कुछ भी नहीं है, जिस पर जाकर के मल नहीं त्यागा जा सकता अपना। तो वही चल रहा है।

भोग की ओर प्रेरित करने वाली ताकतें दिन–ब–दिन और–और–और मजबूत होती जा रही हैं। और भोग से रोने वाली ताकतें, भोग को रोकने वाली ताकतें बिलकुल कमज़ोर होती जा रही हैं। अब तो समय इंस्टेंन्ट ग्रेटीफिकेशन (तत्काल संतुष्टि) का है न। ‘ओ यस अभी! लुक फॉर योर हैप्पीनेस इन दिस मोमेंट (इसी क्षण में ही खुशी पाओ)।’ तो बलात्कारी अब क्यों न कहे कि ‘बाद में सज़ा हो, चाहे मौत हो, आई लिव इन दिस मोमेंट एंड ऑन माय हैप्पीनेस ऑन डेट इज़ गॉल ऑफ़ माय लाइफ (मैं इसी पल में जीता हूँ और मेरी खुशी ही मेरे जीवन का उच्चतम लक्ष्य है)? जीवन है ही इसलिए कि अपने सुख की ओर बढ़ो और वह सुख तुम्हें कब पाना है? इसी पल में। तो इसी पल में सुख पा लो, आगे जो होगा देखा जाएगा। आगे की परवाह करना तो मूर्खों का काम है। हम क्यों सोचें कि आगे सज़ा होगी।’ यह लो, यह है बलात्कारी का गणित।

मुझे अचंभा होता है, एक टीवी चैनल में लिखा आ रहा था, बलात्कार की बेचारी पीड़िता के साथ, उस पर नाम लिखा आ रहा था, 'बिटिया'। मान लो उसका कुछ नाम है, कुछ भी नाम है, कोई भी काल्पनिक नाम ले लो, रेखा। तो वैसे भले ही उसका नाम आता तो वह कह देते रेखा, पर अब कुछ मामला ऐसा हुआ था कभी तो उसके साथ अब लिखा आ रहा था रेखा बेटिया। ‘रेखा बिटिया के अपराधियों को सज़ा दो।’ ऐसा बड़ा–बड़ा स्क्रीन में लिखा हुआ आ रहा था। ‘रेखा बिटिया के अपराधियों को सज़ा दो।’ और उसके तुरंत बाद एक रियलिटी शो चला दिया जिसमें छह साल की लड़की नाच रही है और उसके इर्द–गिर्द छह–सात पुरुष नाच रहे हैं। और वह गाना क्या है, जिस पर वो नाच रही है? मुझे ठीक से याद नहीं पर एक नंबर का कामोत्तेजक गाना। और उस पर तुम छह साल की लड़की को नचा रहे हो और सबसे ज़्यादा दु:खद बात, उसी लड़की के माँ–बाप ऑडियंस में बैठकर ताली बजा रहे हैं।

और इस न्यूज़ चैनल को समझ में भी नहीं आ रहा कि थोड़ी देर पहले तुम बिटिया बोल रहे थे और अब जो बिटिया है, उसको तुम क्या कर रहे हो! अब बलात्कार होगा कि नहीं होगा? जाकर सज़ा दो न इस न्यूज़ चैनल को और जाकर सज़ा दो उस फ़िल्म के प्रोड्यूसर को जिसकी फ़िल्म में वह गाना था और जाकर सज़ा दो उस अभिनेत्री को जो उस गाने पर अर्धनग्न नाची थी और सज़ा दो उन सब लोगों को जो उस फ़िल्म का दो–दो सौ, तीन–तीन सौ का टिकट लेकर देखने गए थे और उस प्रोड्यूसर की जेब में तीन सौ करोड़ों का मुनाफ़ा भरा था।

उनको सज़ा क्यों नहीं दे रहे?

हम सज़ा की माँग करते हैं घर बैठकर के। एक न्यूज़ चैनल पर सज़ा की माँग चल रही है, दूसरे न्यूज़ चैनल पर एक रियलटी शो चल रहा है, जिसमें हद दर्जे की काम–लोलुपता दर्शायी जा रही है। आपको यह विरोधाभास दिखाई नहीं देता? फिर आप कहते हो, 'अरे–अरे–अरे! वह लोग बड़े खराब हैं, जो बलात्कार करते हैं।' वह लोग निश्चित रूप से खराब हैं जो बलात्कार करते हैं पर पूरी बात करो! उनकी बात कौन करेगा जो पूरे देश में बलात्कार का माहौल बना रहे हैं; और देश में नहीं, पूरी दुनिया में। उनकी बात कौन करेगा?

उन फिलॉस्फर , इंटेलेक्चुअल दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों की बात कौन करेगा जिन्होंने हमें समझा दिया है कि खुशी के लिए ही तो जिया जाता है? उन लिबरल्स (उदारवादियों) की बात कौन करेगा जिन्होंने किसी भी चीज़ को सेक्रेड मानने से इंकार कर दिया है? उन उद्योगपतियों की बात कौन करेगा, जो हजार तरीक़े के विज्ञापन देकर के हमें भोग की तरफ़ प्रेरित करते रहते हैं। और भूलियेगा नहीं, अधिकांश विज्ञापनों में एक अर्धनग्न लड़की ही होती है जो आपको भोग के लिए उकसा रही होती है।

पुरुषों के रेजर का भी विज्ञापन पूरा नहीं हो सकता, जब तक उसमें एक जवान लड़की आकर के अपनी अदाएँ न बिखेरे। पुरुषों के अंतर वस्त्रों का, चड्डी और बनियान का भी विज्ञापन नहीं हो सकता अगर उसमें कोई लड़की नहीं घूम रही। ऐसे विज्ञापनदाताओं को सज़ा कौन देगा, बताओ? और ऐसे विज्ञापनदाता क्या एक के बाद एक शृंखलाबद्ध बलात्कारी नहीं पैदा कर रहे? जवाब दो!

इंटरनेट फ्री हो गया है, ठीक? निकलो सड़क पर, यह जो सर्वहारा तबका है – मजदूर हो, रिक्शावाला हो, छोटा किसान हो, सबके हाथ में एंड्रॉयड है। और हर फ़ोन पर पॉर्न चल रही है। और पॉर्न माने यही नहीं कि तुमको पॉर्न वेबसाइट पर जाना है। लोग कहते हैं, 'यह पॉर्न वेबसाइट प्रतिबंधित होनी चाहिए।' पॉर्न वेबसाइट प्रतिबंधित कर दोगे, टीवी को कैसे प्रतिबंधित करोगे और फिल्मों को कैसे प्रतिबंधित करोगे? अब यह नहीं हुआ है कि लोग या तो फ़िल्म देखते हैं या पॉर्न देखते हैं; अब यह हुआ है कि फ़िल्म ही पॉर्न है। उसको भी बैन कर दो।

अख़बारों की भी जो वेबसाइट्स हैं, उनमें जाकर के देखो। अभी एक में था, एक युवती का नाम और उसमें आगे लिखा हुआ है, कुछ भी काल्पनिक नाम ले लो उसका – स्नेहा, दीज कर्व ऑफ स्नेहा विल मेक यू ड्रूल। स्नेहास कर्व विल मेक यू ड्रूल। ड्रूल माने जानते हो क्या होता है? लार टपकाना, और यह बात एक पॉर्न वेबसाइट नहीं कह रही, यह प्रतिष्ठित समाचार–पत्र की वेबसाइट बोल रही है कि स्नेहा के उभार देखकर के तुम लार टपकाना शुरु कर दोगे। यह समाचार–पत्र की हैडलाइन है, यह न्यूज़ आइटम है! जाकर इस समाचार पत्र के मालिक को और इस समाचार पत्र में विज्ञापन देने वालों को क्यों नहीं सज़ा देते? यह कितने बलात्कारी पैदा कर रहे हैं, कुछ हिसाब है?

यह ड्रूल माने क्या होता है? तुमने कैसे लिख दिया? क्या यह महिलाओं का अपमान नहीं है? कहॉं है हमारा इंटेलीजेंसिया? कहॉं है हमारे लिबरल्स? कैसे लिख रहे हो, स्नेहाज कर्व विल मेक यू ड्रूल? और यह हॉट माने क्या होता है? ‘विच ऑफ दीज़ बेब्स इज़ दी हॉटेस्ट?’ ये हॉट माने क्या होता है, बताओ? हॉट माने यही न, कामोत्तेजक? किसको देखकर के तुम में कामोत्तेजना आ जाती है। जब यह लिखा जाता है, तब इनको कोई सज़ा क्यों नहीं देता?

और मैं यह सब इसलिए नहीं बोल रहा हूँ क्योंकि मैं हिंदुत्व का पैरोकार हूँ या भारतीय संस्कृति का पक्षधर हूँ। मुझे एक बात पता है कि अगर आपके मन में बार–बार कचरा भरा जा रहा है तो आप जीवन में कोई सार्थक काम नहीं कर सकते। और बार–बार आपको स्त्री के शरीर को भोगने के लिए लालायित करा जा रहा हो, यह मन में कचरा ही भरने की बात है। मैं बिलकुल आध्यात्मिक दृष्टि से इनका विरोध कर रहा हूँ। न हिंदू बनकर कर रहा हूँ और न संस्कृति का ध्वजारोहक बनकर कर रहा हूँ। मैं बहुत सीधे–साधे इंसान की तरह पूछ रहा हूँ, यह जो तुम कर रहे हो, इससे तुम बलात्कारियों की ही फसल नहीं पैदा कर रहे हो तो और क्या कर रहे हो?

और यह सब करने वाले जो भी लोग हैं, उनको समर्थन देने वाला देश का आम–आदमी है। इस आम–आदमी को सज़ा कौन देगा? विज्ञापनदाता जो भी होगा, उस विज्ञापन को देखकर के उस उत्पाद को ख़रीदने वाले तो हम ही हैं न? हमें सज़ा कौन देगा? फ़िल्म चाहे जिसने बनाई हो, उस फ़िल्म का धंधा चमकाने वाले तो हम ही हैं न; हमें सज़ा कौन देगा?

कितने ही नेता हैं अब जिनकी राजनीति चल ही इस पर रही है कि 'मारो, हिंसा; मारो, हिंसा’। उनकी बात सुन–सुनकर के अगर आदमी भी हिंसक हुआ जाता हो तो उन नेताओं को सज़ा कौन देगा? और यह कहकर के, मैं दोहरा रहा हूँ, तेहरा रहा हूँ, मैं बचाव नहीं कर रहा हूँ उनका, जो बलात्कार इत्यादि करते रहते हैं। उन्हें सबसे पहले सज़ा दो, कड़ी–से–कड़ी सज़ा दो, पर सिर्फ़ को सज़ा मत दो। अगर तुम वास्तव में चाहते हो कि यह अपराध रुकें, तो समस्या की जड़ तक पहुँचो, समस्या के मूल तक पहुँचो। समस्या का मूल यह है कि बहुत मूर्ख लोगों के हाथ में ताकत है और धन है। और वह इस स्थिति में बैठ गए हैं कि वह सब जनता को प्रभावित कर सकते हैं। मीडिया के कॉलमिस्ट (स्तंभलेखक) भी वो हैं और मीडिया के मालिक भी वही हैं। इन सबमें साझा क्या है? एक चीज़ — अध्यात्म से इन्हें कोई सरोकार नहीं, सच्चाई की इन्हें कोई तलब नहीं, बोध–ग्रंथों के प्रति इनमें कोई श्रद्धा नहीं।

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