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चार महावाक्य || आचार्य प्रशांत, उपनिषदों पर (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: जैसे-जैसे कुछ भी समझ में आता है, शुरुआत कहीं से भी करो, जैसे-जैसे कुछ भी समझ आएगा उस क्षेत्र के जो हिस्से हैं वो मिटते जाएँगे और एक एकीकृत करने वाली कोम्मुनालिटी सामने आती जाएगी, ये तो है ही है।

इतने सारे धूप के यहाँ छोटे-छोटे टुकड़े पड़े हुए हैं ज़मीन पर, धूप के कितने छोटे-छोटे टुकड़े दिख रहे हैं ज़मीन पर पड़े हुए हैं। जैसे-जैसे समझते जाओगे कि ये धूप क्या है, ये प्रकाश क्या है, वैसे-वैसे ये छोटे-छोटे टुकड़ों से शुरुआत करके एक सूरज तक पहुँच जाओगे। शुरुआत तो ऐसे ही करोगे कि अरे! ये टुकड़ा, वो टुकड़ा, वो टुकड़ा, असंख्य टुकड़े हैं।

अब ये टुकड़े भी पैदा क्यों होते हैं, जानते हो? ये पत्तियों के बीच में छोटे-छोटे छेद हैं। पिन-होल कैमरा पढ़ा होगा। ये सूरज है, ये धूप के टुकड़े नहीं हैं, ये सूरज है। वो जो पत्तियों के बीच में ज़रा-ज़रा सी छेद है, ज़रा-ज़रा सी दरारें हैं वो पिन होल कैमरा का काम कर रही हैं और ये पूरा-का-पूरा सूरज है जो यहाँ उतर आया है।

प्र१: सर अगर कोई बहुत ही छोटा कोई पौधा हो मैगनीट्यूड के हिसाब से तो?

आचार्य: वो भी पूरा सूरज ही उतर आता है।

प्र१: सर, उसको तो वो सूरज ही लगेगा।

आचार्य: लगेगा नहीं, है, लगेगा नहीं। बात लगने की नहीं है, है। बात समझ रहे हैं?

पूर्णात् पूर्णम् उदच्यते

पूर्ण से पूर्ण ही पैदा होता है।

क्या कहते हैं उपनिषद्?

ॐ पूर्नामिदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णम् उदच्यते

पूर्ण से पूर्ण ही पैदा होता है; लगता अपूर्ण है, लगता छोटा है पर ये पूरा सूरज उतरा हुआ है।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते

और जब पूर्ण से पूर्ण पैदा हो जाता है उसके बाद भी पूर्ण, पूर्ण ही रहता है।

दृष्टि का फेर है कि अंश दिखाई देते हैं। अंश नहीं हैं, जो है वो सब पूरा-ही-पूरा है। वो भी पूरा है सूरज, ये टुकड़ा भी पूरा है। और अगर आप ध्यान देंगे तो जिन पत्तियों की दरारों से, छिद्रों से ये छोटा सूरज सामने आ रहा है वो ख़ुद भी सूरज हैं। वो पत्तियाँ भी सूरज के अत्तिरिक्त और कुछ नहीं हैं। जितना भी जीवन है इस धरती पर, जितनी भी उर्जा है वो सब सूरज की ही उर्जा है। तो पेड़ के भीतर भी जो ऊर्जा प्रवाहित है वो भी सूरज की ही उर्जा है। ये भी सूरज के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

सूरज ऊपर, सूरज बीच में, और सूरज नीचे। अब ये आपकी मर्ज़ी पर है कि आप उसे सूरज ना कहें, कभी पेड़ कह दें, कभी धूप का टुकड़ा कह दें, कभी कुछ और नाम दे दें। पर सूरज के अलावा और कुछ है नहीं। समझ में आ रही है बात?

प्र२: सर, सूरज भी तो किसी और एनर्जी (ऊर्जा) से चल रहा है।

आचार्य: सूरज को हमने प्रतीक की तरह इस्तेमाल किया है। सूरज तो कुछ भी नहीं है, बहुत छोटा है। पूरे ब्रह्माण्ड को लोगे तो उसमें सूरज रेत के एक कण बराबर भी नहीं है। हमारा जो सूरज है वो बहुत छोटा सा तारा है। सूरज बस प्रतीक है बात को समझने के लिए।

आँखों के तल पर तो हमेशा धूप का टुकड़ा ही दिखाई देगा। एक दूसरा तल है जहाँ से सब कुछ सूरज है। बात समझ रहे हो? जब हम कहते है, “सब कुछ सूरज है।” तो वो 'सब कुछ' क्या? जो आँखों को दिखाई देता है। सब कुछ सूरज हो सके तो उसके लिए सबसे पहले आँखों को सूरज होना होगा। बात समझ रहे हो न? उस तल से सबसे पहले ये जाना जाता है कि मेरी दृष्टि और कुछ नहीं है, मेरा ही प्रक्षेपण है।

संसार को आप कह सको कि सत्य है, इसके लिए ज़रुरी है न कि पहले उसको सत्य कहो जो संसार को देख रहा है। संसार आपको प्रतीत ही इन्द्रियों से और मन से होता है। जब तक आपने ये नहीं जाना साफ़-साफ़ कि मन और इन्द्रियाँ आत्मा से उद्भूत हैं, तब तक संसार आपके लिए सत्य नहीं हो सकता। तब तक संसार आपके लिए वही रहेगा वैविध्य से भरा हुआ, हिस्सा-हिस्सा, टुकड़ा, अंश।

बात समझ रहे हो न?

तो प्रज्ञान में स्थित होने पर ऐसा नहीं है कि हिस्से दिखाई देने बंद हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि हर हिस्से को देख कर के तुम खयाल करते हो कि, "अरे! ये अंश नहीं है, ये पूर्ण है।" इतना ही होता है कि हिस्से के पीछे जो हिस्से को देखने वाला यंत्र है, वो यंत्र अपने स्रोत को समर्पित हो चुका होता है।

जब मन आत्मा में डूबा होता है तो संसार सत्य में।

ये सूत्र अच्छे से समझ लो। जब मन आत्मा में डूबा होता है तो संसार सत्य में डूबा होता है। तब सत्य में और संसार में कोई भेद नहीं रह जाता है।

प्र३: आचार्य जी, लोग बड़े-बड़े शहरों में और भीड़-भाड़ वाली जगहों पर रहते हैं, क्या यह भी उनका शांति पाने का प्रयास है?

आचार्य: जिधर मन शांति पाएगा उधर को जाएगा। वही उसकी गहरी-से-गहरी आकांक्षा रहेगी लेकिन मन क्योंकि स्वयं सीमित है इसीलिए इस बात की पहचान करने में भ्रमित हो सकता है कि शांति कहाँ है। तलाश तो वो शांति की ही करेगा। जहाँ भी उसे आशा बंधेगी कि शान्ति है वो वहीं को जाएगा। तुम्हे आशा बंधी है कि यहाँ शांति है, तुम यहाँ आए हो। तुम कह रहे हो शहरों में भीड़ है, क्लटर है, तो लोग शहरों में क्यों रह रहे हैं? उन्हें वहाँ आशा बंधी हुई है। और जिसकी आशा तुम्हें यहाँ है, ठीक उसी की आशा उन्हें वहाँ है, बस ये है कि तरीका दूसरा है।

शांति ही तो वो भी खोज रहे हैं न? शहर में जो उन्हें मिलना है उनसे उन्हें शांति की उम्मीद है।

प्र४: शहर में तो सेफ्टी (सुरक्षा) होता है। क्या सुरक्षा और शांति एक ही हैं?

आचार्य: बिलकुल एक सी हैं। मन को सुरक्षा की ही तलाश है। पर उसे ये पता नहीं है कि सुरक्षा मिलेगी कहाँ पर इसीलिए वो बहुत विक्षिप्त तरीकों से सुरक्षा खोजता है – पैसे में, संबंधो में, रिश्तों में, प्रतिष्ठा में, वो इन चीज़ों में सुरक्षा खोजता है।

प्र३: सर, उपनिषद् किस शाखा में आते हैं?

आचार्य: हर उपनिषद् किसी-न-किसी वेद से जोड़ा जाता है। वेद के चार हिस्से होते हैं: मंत्र, ब्राह्मण, अरण्यक, उपनिषद्। और इनका ‘आध्यात्मिक’ भी बढ़ता जाता है।

मंत्र में तो ये कहा जाता है कि ‘देवता की कैसे पूजा करें?’, ‘क्या मंत्र जाप करें?’

ब्राह्मण में फिर यह आता है कि जब यज्ञ हो रहा हो तो उसका तरीका क्या है, उसमें क्या होता है, कैसे करें। उसमें थोड़ा और आध्यात्मिक हो जाता है इंसान।

फिर उपनिषद् आते हैं।

प्र५: सर, जो बातें वेदों में लिखी हैं, उनको उपनिषदों में विस्तार मे समझाया गया है?

आचार्य: हाँ, पर आमतौर पर जो लोग वेद-वेद चिल्लाते हैं, उनका उपनिषद् से कोई मतलब नहीं होता है। उनको बस उपरी चीज़ से मतलब है और उसका कोई फायदा नहीं है। वेदों का जो उत्कर्ष हैं पूरा वो उपनिषद् हैं।

प्र६: सर “परमात्मा ब्रह्म है” इसका मतलब?

आचार्य: यह आत्मा ही ब्रह्म है।

प्र७: सर, इसका मतलब क्या है, “परन्तु जब किसी अधिकारी देह में परिपूर्ण हुआ वह परमात्मा बुद्धि के साक्षी रूप से अधिकारी को फाँसने में लग पड़ता है।"

आचार्य: जब किसी अधिकारी देह में, किसी अधिकारी शरीर में परिपूर्ण वह परमात्मा बुद्धि के साक्षी रूप से और अधिकारी को फाँसने भी लग जाता है, साक्षी हो कर खुद को देखने लग जाता है।

प्र: सर, अगले वाक्य में अहम् का प्रयोग किया गया है।

आचार्य: विटनेस (साक्षी) ही अहम् हो जाता है। परमात्मा ही साक्षी बनता है उसी को अहम् कहा गया है। जिसको देखा जा रहा है वो अहम् नहीं है, जो देखने वाला है वो अहम् है। वैसे तो अहम् तुम हो, लेकिन इस महावाक्य में अहम् तुम्हारे पीछे वाला वो है जो तुमको देख रहा है।

उपनिषदों में चार महावाक्य हैं।

पहला महावाक्य है, “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐतरेय उपनिषद् ३.३, ऋगवेद)

दूसरा महावाक्य है, “अयं आत्मा ब्रह्म” (मांडूक्य उपनिषद् १.२, अथर्ववेद)

तीसरा महावाक्य है, “तत् त्वम् असि” (छान्दोग्य उपनिषद् ६.८.७, सामवेद)

चौथा महावाक्य है, “अहम् ब्रह्मास्मि” (बृहदारणयक उपनिषद् १.४.१०, यजुर्वेद)

”प्रज्ञानं ब्रह्म” — ज्ञान का अर्थ होता है टुकड़े-टुकड़े संसार की जानकारी। संसार के किसी टुकड़े को जान लिया उसका नाम है ज्ञान। मन ऐसे असंख्य टुकड़ों से घिरा रहता है। जब ध्यान में इनमें से किसी भी अंश को देखा जाता है — और ध्यान की शुरुआत गहरे विचार से ही होती है — जब गहरे रूप से विचार किया जाता है, तब जल्दी ही विचार निर्विचार में तब्दील हो जाता है। टुकड़े की सीमाएँ हटने लगती हैं और उसके नीचे का जो आधार है वो दिखाई देने लग जाता है। वो आधार किसी एक टुकड़े का नहीं होता। ये ऐसे ही है जैसे आप एक पत्ती को समझना चाहें और उसे समझते-समझते जड़ तक पहुँच जाएँ।

तो जड़ किसी एक पत्ती की नहीं होती है। फिर आप पाते हैं कि सारी पत्तियाँ, टहनियाँ, डालियाँ, फूल उसी जड़ से निकल रहे हैं। ज्ञान का अर्थ है पत्ते का विश्लेष्ण करना, पत्ती की विवेचना करना। “प्रज्ञान” का अर्थ है मूल तक ही पहुँच जाना। समझ रहे हो? आँखें जहाँ तक देखती हैं उन्हें पत्तियाँ ही दिखाई देती हैं। आँखें सतह के ऊपर-ऊपर ही देख पाती हैं। ज्ञान है आँखों का विषय।

ब्रह्म को तो विचारातीत मौन में ही जाना जाता है और जब वो विचारातीत मौन है, तब जानने वाले भी तुम नहीं हो।

ऐसे समझ लो – आँखें पत्ती को जानती हैं और जो तुम्हारा केंद्र है, वही पत्ती के मूल को जान सकता है। तुममें आँखों की जो जगह है वही जगह वृक्ष में पत्ती की है। और तुममें जहाँ बोध है ठीक वहीं पर वृक्ष में जड़ है, मूल है। आँखों से पत्ती का रिश्ता है और बोध से मूल का रिश्ता है। आँखों से पत्ती का रिश्ता है और प्रज्ञान से ब्रह्म का रिश्ता है।

ज्ञान से संसार का रिश्ता है और प्रज्ञान से सत्य का रिश्ता है। ये पहला महावाक्य हुआ, “प्रज्ञानं ब्रह्म्”।

“अयम् आत्मा ब्रह्म” — यह आत्मा ही ब्रह्म है। पहले में और दूसरे में सम्बन्ध साफ़ है। चारों महावाक्य एक ही सत्य की घोषणा कर रहे हैं। ज़रा ध्यान से देखोगे तो “प्रज्ञानं ब्रह्म” और “अयम् आत्मा ब्रह्म”, तो एक ही सत्य सीधे नज़र आएगा।

हमने कहा, “आँखों से ज्ञान है, आँखों से संसार है और जो तुम्हारा केंद्र है उसमें सत्य है, मूल है।” जो तुम्हारा केंद्र है, जिसको अभी हम प्रज्ञान कह रहे थे, उसी प्रज्ञान को आत्मा भी कहा जाता है।

मन – ज्ञान, आत्मा – प्रज्ञान। मन से विचारोगे और आत्मा से जानोगे। मन से जब भी देखोगे तो विचारना पड़ेगा, मन विचारने के अलावा कुछ नहीं कर सकता। और आत्मा विचारती नहीं है, वहाँ ज्ञान के लिए कोई जगह ही नहीं है। आत्मा ज्ञानातीत है। अज्ञानी भी कह दो तो कोई बुराई नहीं है। ग़लत नहीं होगा अगर आत्मा को ज्ञानातीत कह दो या सीधे अज्ञानी भी कह दो, क्योंकि ज्ञान से आत्मा का कोई सम्बन्ध नहीं। ज्ञान बहुत छोटी चीज़ है आत्मा के सामने। ज्ञान तो टुकड़ा, हिस्सा, सीमित है।

आत्मा जानती है, आत्मा सोचती नहीं है। तुम्हारे जीवन में जो कुछ भी ऐसा है जहाँ बिना सोचे जान लिया गया है और पुख़्ता जान लिया गया, संदेह की कोई संभावना नहीं है, वहीं आत्मा है।

जब कहा जा रहा है कि आत्मा ही ब्रह्म है। तो कहा जा रहा है कि बाहर के पूरे विस्तार का जो सत्य है, वही तुम्हारे व्यक्तिगत विस्तार का सत्य है। शरीर का संसार से जो रिश्ता है, आत्मा का ब्रह्म से ठीक वही रिश्ता है। एक हैं दोनों; तुम्हारे शरीर के बिना संसार नहीं, एक हैं दोनों।

दृष्टि का अंतर है, अलग-अलग करके देखते हो। शरीर को जो जानने निकलेगा, सत्य की राह पर, जो शरीर से शुरुआत करेगा, वो आत्मा तक पहुँच जाएगा। सत्य तक जाना है तुमको, तुमने अगर शरीर से शुरुआत करी तो आत्मा पर जा पहुँचोगे। और अगर तुमने संसार से शुरुआत करी तो ब्रह्म तक जा पहुँचोगे। पहुँचे एक ही बिंदु पर हो। सत्य जानना चाहते थे, चले शरीर से तो आत्मा तक पहुँच गए और चले संसार से तो ब्रह्म तक पहुँच गए। पहुँचे एक ही जगह, अलग-अलग नहीं पहुँचे।

यह आत्मा ही ब्रह्म है। जो आत्मा को जानते हैं उन्हें आत्मा में और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं दिखाई देता। लेकिन जो शरीर की दुनिया में जीते हैं उन्हें शरीर में और संसार में सदा भेद दिखाई देता है। भेद ही नहीं, उन्हें शरीर और संसार में विरोध भी निरंतर दिखाई देता है। वो लगातार शरीर को बचाने की कोशिश में लगे रहते हैं। दुनिया से उनका रिश्ता हिंसा का रहता है।

मैं कौन हूँ? जिसे दुनिया को किसी तरह से अपने अनुरूप बनाना है अन्यथा दुनिया मुझे खा जाएगी। मुझे माहौल को अपने अनुरूप ढालना है अन्यथा मैं बचूँगा नहीं। उसकी सारी लड़ाई बस किसी तरीके से ‘*सर्वाइवल*’ (जीवित रहने) की होती है; सुरक्षा। जो शरीर की दुनिया में होगा, उसे शरीर में और संसार में वैमनस्य दिखाई देगा और जो आत्मा के तल पर जीएगा वो कहेगा, “आत्मा और ब्रह्म एक हैं, विरोध कहाँ!”

अब उसका संसार से भी रिश्ता प्रेम का होगा, हिंसा का नहीं। स्वयं को शरीर मानोगे तो संसार से सदा डर में, विरोध में, लालच में, द्वैत में जियोगे और अगर ध्यान में आत्मा तक उतर जाओगे तो फिर यही संसार प्रीतिकर हो जाएगा, अब ऐसा नहीं लगेगा जैसे दुनिया खाने को दौड़ी चली आ रही है फिर बात-बात में झगड़ोगे नहीं।

जब-जब ये लगे कि मैं और संसार एक दूसरे के विपरीत हैं, विरोधी हैं, तब-तब समझ लेना बड़े सतही तरीके से जी रहे हो। जब-जब लगे मैं इसका अविभाज्य हिस्सा हूँ, अलग हो ही नहीं सकता, अपरिच्छिन्न हूँ, जब भी कभी ऐसी अनुभूति उठे तो जान लेना कि तुम नहीं आत्मा बोल रही है। यही है दूसरा महावाक्य।

तीसरा है — “तत् त्वम् असि।” पहले, दूसरे को जिसने जान लिया वो सहज ही तीसरे में उतर जाएगा। कोई नई बात कही नहीं गई है क्योंकि कोई दूसरी बात है ही नहीं कहने के लिए। एक ही बात है अनेक रूपों में उसे कहा गया है।

‘तत् त्वम् असि’, वह तुम ही हो। वह सत्य, वह ब्रह्म, वह तुम ही हो। जब यहाँ ‘तुम’ कहा जा रहा है तो निश्चित रूप से उससे नहीं कहा जा रहा है जो स्वयं को देह जानता है, जो देहाभिमानी है। ये महावाक्य एक विधि जैसा है जो तुम्हें याद दिलाएगा कि कहा तो उससे जाएगा जो कान मात्र है। जो अपने आप को कान समझता है कि, "मैं कान से सुन रहा हूँ" पर सुनने के फल स्वरूप अचानक तुम्हें कुछ याद आ जाएगा , “हाँ, हाँ, ठीक कहा, मैं ही तो हूँ।” ये जो मैं है, ये शरीर-रूपी नहीं है।

ये वो नहीं है जिसको तुमने अपना नाम दे रखा है, जो कभी पैदा हुआ था, जो किसी का भाई है, किसी की माँ है, ये उससे नहीं कहा जा रहा है, “तत् त्वम् असि।” पड़ेगा उसी के कान में, क्योंकि शब्द हैं तो कान में ही पड़ेंगे, पर कान में पड़ते ही उसे बदल देगा। त्वम् बदल जाएगा।

जिसने सुना वो त्वम् दूसरा था और सुन कर के ध्यान में जिसने जाना वो दूसरा है। ये महावाक्य ‘तत् त्वम् असि’ समझ लो एक दवाई की तरह है, जिसको पीता रोगी है पर पीने के साथ ही स्वस्थ हो जाता है।

त्वम् कौन है इसमें? रोगी, या वो जो स्वस्थ हो गया? वो जो स्वस्थ हो गया। वो जो अब आत्मा में केन्द्रित हो गया।

‘तत् त्वम् असि’, वो तुम वो हो। वो तुम हो। नहीं, तुम अपनी दिनचर्या में ऐसे नहीं जीते हो कि वो तुम हो। दिनचर्या तो तुम्हारी ऐसी ही रहती है, जिसमें तुम सीमित, क्षुद्र मानसिकता में काम करने वाले हो। पर कभी कोई आता है सामने जैसे कि ये महावाक्य सामने आ गया। वैसे ही कभी घटनाएँ सामने आती हैं, ग्रन्थ सामने आते हैं, व्यक्ति सामने आते हैं, जिनके सामने आते ही बिजली-सी कौंध जाती है और बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि मैं ही तो हूँ। वो सत्य जिसको मैं लगातार खोज रहा हूँ वो मैं ही तो हूँ। अपनी पूरी यात्रा का अंत मैं ही तो हूँ। अपनी आखिरी मंज़िल मैं ही तो हूँ। 'वह' से अनजाने का आभास होता है। वह से विस्तार का आभास होता है। वह से उसका आभास होता है जिस तक तुम अभी पहुँचे नहीं हो, जो तुम्हारा सपना है, जिसको तुम जानते नहीं लेकिन जिसकी तरफ बढ़े चले जाते हो।

वह से उसका आभास है जो तुम्हारी सारी बैचैनी के लिए ज़िम्मेदार है, जो तुम्हें मिला नहीं है और तुम बेचैन हो कि किसी तरह मिल जाए। महावाक्य तुमसे कह रहा है, “वो तुम ही हो, अपना अनुसंधान करो। स्वयं को जान लो, बाहर नहीं मिलेगा वो। तुम ही हो अपनी यात्रा की मंज़िल और कहीं मंज़िल नहीं है। तुम्हारा सफ़र तुम्हीं से शुरू हुआ और तुम्हीं पर ख़त्म होगा। ‘तत् त्वम् असि'।"

इच्छा है तुम्हारी तो भटक लो, इच्छा है तुम्हारी तो सुख-दुःख चखने की, चख लो। पर रुकोगे तो खुद पर ही आकर, अन्यथा भटकते रहोगे।

प्र७: आचार्य जी, शरीर तो लगातार परिवर्तित होता रहता है, लेकिन मैं समझता हूँ कोई तो ऐसी चीज़ होगी जो हमेशा कॉन्स्टेंट (स्थिर) रहती होगी।

आचार्य: वो जो तुम ‘*कांस्टेंट*’ बोल रहे हो वो जब तक याद रहेगा तब तक शरीर डराएगा नहीं, पागल नहीं होगा, नहीं तो शरीर का ही दूसरा नाम डर है।

प्र६: सर, प्रज्ञान और आत्मा भी एक ही चीज़ हैं?

आचार्य: बिलकुल एक चीज़ हैं। दोनों में कोई अंतर नहीं है। बस सन्दर्भ थोड़ा सा अलग है।

जब आप प्रज्ञान कहते हो तो आप मन की नज़र से आत्मा का अनुभव बता रहे हो। प्रज्ञान में शुरुआत ज्ञान से ही कर रहे हो, हालाँकि जब प्रज्ञान आया तो ज्ञान अब कहीं नहीं है। ये प्रज्ञान में ही कह रहा है। मन कह रहा है कि, "यूँ ही देखा तो ज्ञान मिला और गहरा उतरता रहा, गहरा उतरता रहा तो मिल गया प्रज्ञान।" पर जब मिल गया प्रज्ञान तो मैं कहीं नहीं था, आत्मा थी।

आत्मा का ही दूसरा नाम प्रज्ञान है। बोध को ही प्रज्ञान जानो।

फिर आता है जो इन चारों वाक्यों में भी शिखर वाक्य है “अहम् ब्रह्मास्मि।" ये महावाक्य कम है, उत्सव ज़्यादा है। पहले तीनों महावाक्य तुमसे कह रहे थे कि दो तल हैं।

पहले में कहा तुमसे कि ज्ञान है और प्रज्ञान भी है। दूसरे में भी तुमसे यही कहा गया कि सत्य है और संसार भी है। शरीर है तो संसार, और आत्मा हो तो ब्रह्म। तीसरे में तुमसे कहा गया कि जिसे तुम खोज रहे थे, वो तुम हो।

अब चौथा जो है वो दोनों तालों को एक कर देता है। अब कोई भेद नहीं रहा। “मैं” अहम और मेरा अहं अब बैठ गया है जाकर के ब्रह्म की गोद में।

दोनों दुनिया एक हो गई हैं। शरीर है पर शरीर अब शरीर ना रहा, ब्रह्म हो गया। अहम् ब्रह्मास्मि, अह्म तो मैं था सदा से पर वो अहम् संयुक्त किससे था? छोटे-छोटे टुकड़ों से, अंशो से, संसार से, शरीर से। ये अह्म इन से संयुक्त था। अह्म अभी भी है पर अब वो अह्म दैवीय है। अब वो अह्म ब्रह्म से जुड़ गया है, विलीन हो गया है ब्रह्म में, कहीं देखने को नहीं मिलता।

अब कोई मुझसे ये ना कहे कि मन है तो संसार, और सत्य है तो ब्रह्म, ना। अब दो वाक्य कहने की ज़रूरत नहीं। अब तो मन भी आत्मा है और संसार भी सत्य है, अह्म ब्रह्मास्मि। अब कोई मुझसे ये ना कहे कि इसका निषेध करना है, और इस तरफ को जाओ। अब कोई ये ना कहे। अब कोई ये ना कहे कि, "दो राहें हैं और दोनों राहों पर अलग-अलग यात्राएँ हैं, किस राह पर जाऊँ?" मैंने अब बिंदु को पा लिया जहाँ सब जुड़ता है, जहाँ परम योग होता है।

अहम् का तल ब्रह्म से जाकर के मिल गया है। वो जो सबसे ज़्यादा तिरस्कृत था, नीचे-से-नीचे, दुःख का कारण था, वो अब जाकर के आनंद में समा गया है। अहम् जो मेरी बीमारी थी, वो अह्म परम स्वास्थ में घुल गया है। रोग स्वास्थ में विलीन हो गया है। अब कोई मुझसे ये ना कहे कि, "देखो ऐसा करोगे तो रोग लग जाएगा।" हाँ, हमें रोग लगा था, अहम् रोग है, पर मेरा रोग अब योग हो गया है।

प्र७: सर, हम असली के सामने पर्दा डाल देते हैं। एक बार मैंने आपसे सुसाईड के बारे में पूछा था, मर जाने के बारे में और आपने बताया था कि मरना शारीरिक है और अगर शरीर नहीं है बस चेतना है तब?

आचार्य: आम तौर पर जिसे तुम चेतना बोलते हो, वो सिर्फ ज्ञान है। ज्ञान के तल पर है क्योंकि जिसे आप चेतना कहते हो उसमें सदा कोइ वस्तु होता है, विषय। उसके बिना चेतना नहीं हो सकती। ‘तुम किसी चीज़ के प्रति चेतन हो।'

प्र७: सर, मैं उसकी बात कर रहा हूँ जो ‘*कांस्टेंट*’ है।

आचार्य: जो कांस्टेंट रहता है उसे हम नहीं जान सकते, उसे तुम नहीं जान सकते। हम जिसे चेतना बोलते हैं वो तो द्वैत का खेल है। तुम विचार को जान सकते हो, तुम बिलकुल दावा कर सकते हो कि, "मैं इस वक़्त फलानी वस्तु का या घटना का विचार कर रहा हूँ।" उसमें तुम हो, वो घटना है, दो हैं, द्वैत है, रहेगा-ही-रहेगा।

‘चेतना’ और ‘*अवेयरनेस*’ में बहुत अंतर है। चेतना मन के तल पर है और ‘*अवेयरनेस*’ आत्मा के तल पर है। ‘चेतना’ ज्ञान है, ‘*अवेयरनेस*’ प्रज्ञान है। इन दोनों शब्दों को एक साथ, एक ही अर्थ में कभी इस्तेमाल मत करना। चेतना तो मस्तिष्क में घटने वाली घटना है। उसे नाप सकते हैं, डॉक्टर नाप सकता है कि तुम कितने ‘सचेतन’ हो।

हाँ, ‘*अवेयरनेस*’ को नहीं नापा जा सकता। ठीक वैसे ही जैसे ज्ञान की परीक्षा हो सकती है पर प्रज्ञान की कोई परीक्षा नहीं होती।

प्र७: सर, तो मरने पर केवल ‘*अवेयरनेस*’ रहे ऐसा नहीं हो सकता?

आचार्य: नहीं, कहाँ रहे? मरने पर कहाँ रहे? क्या मरा? शरीर मरा, शरीर ‘ स्पेस * ’ है। तो तुम कहना चाहते हो कि * अवेयरनेस स्पेस की कोई चीज़ है कि शरीर मर जाएगा और वो बची रह जाएगी। वो चला जाएगा और ये बची रहेगी।

बोलने से पहले अपने फ्रेम वर्क को परख लिया करो कि क्या बोल रहे हो। तुम कहते हो, "जब मैं मरूँगा 'चेतना' मर जाएगी अवेयरनेस बच जाएगी।" कहाँ बच जाएगी? तुम बचने का अर्थ क्या करते हो? जब भी तुम कहते हो बच गया तो तुम्हारा आशय यही होता है – तुम्हारी थाली में रोटी थी और सब्जी थी, रोटी हट गई सब्जी बच गई। बची कहाँ? थाली में ही न?

हम अक्सर कहते हैं कि शरीर मर जाएगा, आत्मा रह जाएगी। कहाँ रह जाएगी?

प्र७: सर, आत्मा को ध्यान से जाना जाता है?

आचार्य: पर जानने वाला मन नहीं है और आप जानोगे ऐसे नहीं कि आपको पता चल जाएगा कि आप जान रहे हो। आप ब्रह्म को जियोगे और आपको उस अर्थ में पता भी नहीं होगा, जिस अर्थ में विचार होता है।

आमतौर पर आप जब कहते हो, “मैंने जाना”, तो आप उसका विचार करते हो, विचार का ही दूसरा नाम आपका जानना है। यहाँ कहा जा रहा है विचारातीत मन से ब्रह्म को जाना जाता है। तो इसका अर्थ ये नहीं है कि आपको दावा करने के लिए सामग्री मिल गई कि, "मैंने ब्रह्म को जान लिया है, मैंने अभी-अभी ब्रह्म को जाना!" आप जियोगे ब्रह्म को।

प्र५: जब विचार वापस आते हैं तो समझ में आता है कि ओह!

आचार्य: तब भी यही समझ आता है कि कुछ गन्दा सा हो गया। खुला आसमान है वास्तव में तुम्हें दिखाई नहीं देता है। बादल आते हैं तो ये कह सकते हो, कि “कुछ चला गया।” क्या चला गया? ये नहीं कह सकते हो।

प्र५: तो जो कुछ चला गया, उसको ही नाम दे दिया इन्होंने ब्रह्म।

आचार्य: हाँ, और जो है ही और आच्छादित हो जाता है विचारों के पीछे।

प्र४: आचार्य जी, जब पता चल जाता है कि सारे विचार व्यर्थ हैं, क्या उस अवस्था को विचारशून्यता की अवस्था कह सकते हैं?

आचार्य: ये भी कोई विचार नहीं हो सकता। विचार की दुनिया से वही ज़रूरी लगेगा जिस विचार को ज़रूरी मानने की शिक्षा दी गई है। वास्तव में क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं, ये ध्यान में ही पता चलेगा।

विचार तुम्हें एक-दो कदम ले जाएगा, उसके बाद अब तुम पाओगे कि उसकी सीमा आ गई। और उसकी सीमा वही है जो तुम्हारे अतीत से मिली है। शुरुआत के लिए ठीक है कि विचार करो, पर दो कदम के बाद रुक जाओगे। फिर तो ध्यान चाहिए। गहरे ध्यान में उतरना पड़ेगा।

प्र४: सर, जैसे जब शरीर स्वस्थ है तो शरीर का ख्याल भी नहीं रहता है, पर जब बीमार पड़ते हैं तो शरीर का ध्यान आता है। इसी तरह जब मन स्वस्थ होता है तो वो अपने स्वस्थ होने का एहसास भी नहीं कराता।

आचार्य: बेशक, बात ही पूरी यही है। इसीलिए ब्रह्म अपने होने का एहसास कभी भी नहीं करवाएगा। इतनी देर से यही कह रहा हूँ, तुम उसे जान नहीं सकते क्योंकि वो अपने होने का एहसास नहीं कराएगा। आनंद में रहोगे, मस्त रहोगे पर उसे जान नहीं सकते, जानोगे तो तभी जब कुछ गड़बड़ हो जाए।

प्र६: उससे ये भी देख सकते हैं कि, “दोस्त वो जो तुम्हें तुम तक वापस लाए”। वो अपने होने का अहसास नहीं कराए।

आचार्य: सब जुड़ी हुई बातें हैं – ब्रह्म, दोस्त, प्रेम, स्वास्थ्य, प्रेम।

प्र६: जो कोई भी पूरा है वो अपने होने का एहसास नहीं कराएगा।

आचार्य: बहुत, बहुत बढ़िया बात। तुम्हारे जीवन में वही सब शुभ है जो अपने होने का एहसास नहीं कराता, जिसका तुम्हें पता नहीं चलता। जो भी कोई तुम्हारी ज़िंदगी में अपनी मौजूदगी का एहसास कराए वो घोर अशुभ है। “जो मन से न ऊतरे, माया कहिए सोय।”

तो परखना चाहते हो कि तुम्हारे जीवन में क्या क्या अशुभ है, तो बस ये देख लो कि कौन-कौन है ऐसा जो लगातार तुम्हारी ज़िंदगी में अपनी मौजूदगी प्रस्तुत करता रहता है, “मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ।”

दोस्त कौन? जो मौजूद से ज़्यादा मौजूद है पर जिसकी मौजूदगी अपना एहसास नहीं कराती हो।

जो भी कुछ मन को अपने होने का एहसास कराए वो बात छोटी हो गई। सत्य भी अपने होने का एहसास कराता है मन को पर सत्य ज्यों-ज्यों अपना एहसास कराएगा, त्यों-त्यों मन ग़ायब होता जाएगा। या ये कह लो सत्य का एहसास ही तब होगा जब मन विलुप्त होना शुरू होगा। तो जब तक वो एहसास करेगा तब तक वो ग़ायब हो जाएगा।

रामकृष्ण की कहानी है न कि नमक का पुतला सागर का एहसास करना चाहता था कि सागर कैसा है और जैसे-जैसे एहसास करता गया, घुलता रहा, ग़ायब हो गया। तो जैसे-जैसे मन सत्य का एहसास करेगा, एहसास तो कर लेगा पर ग़ायब हो जाएगा।

लेकिन मन क्या चाहता है? कि मैं बचा भी रहूँ और सत्य का एहसास कर लूँ। वो हो नहीं सकता।

प्र४: क्या मौज का पता चलता है?

आचार्य: मौज है पर पता नहीं है और ये तुम्हारे लिए बहुत अच्छी बात है, मन के लिए नहीं है। मन को मौज से कोई मतलब नहीं है, उसे पता होना चाहिए। जैसे कोई ‘गार्ड’ हो कॉलेज में, अन्दर ज्ञान की क्या बात चल रही है उससे उसे कोई मतलब नहीं। बस अंदर कौन-कौन है ये पता होना चाहिए। मन उसकी तरह है जो फ़ालतू चीज़ है वो उसे पता होनी चाहिए, जो दो कौड़ी की चीज़ है वो उसे पता होनी चाहिए। असली बात उसे ना भी पता हो तो भी कोई फर्क़ नहीं पड़ता।

बहुत सुन्दर नाच चल रहा है और वहाँ तुमने खड़ा कर रखा है एक चौकीदार और उसका काम क्या है? गिनना कि कितने लोग बैठे हैं, यही सब फालतू , कि बिना मूल्य की बाते हैं उन सब पर नज़र रखना। जैसे मन।अब उस बेचारे चौकीदार की बहुत बड़ी दुविधा है, नाच बहुत ख़ूबसूरत है, सत्य का नाच चल रहा है पर नाच में जैसे ही वो डूबा उधर भूलेगा, नाच में जैसे ही वो डूबा तो चौकीदार खत्म हो गया। नमक का पुतला घुल गया, नाच में डूबेगा तो व्यर्थ की बातें गिन नहीं पाएगा और जब तक व्यर्थ की बातें गिन रहा है तो नाच को नहीं देख पाएगा और दिशाएँ भी दो उलटी हैं। नाच देखेगा तो लोगों की तरफ पीठ करनी पड़ेगी और लोगों को देखेगा तो सत्य की तरफ नहीं।

प्र४: मन ने सत्य की तरफ पीठ कर रखी है।

आचार्य: मन की बड़ी दुविधा है; खुद को बचाए या सत्य को पाए। करे क्या बेचारा?

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