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ब्रह्म – एक या अनेक? || (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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दोषोऽपि विहित: श्रुत्या मृत्योर्मृत्युं स गच्छति। इह पश्यति नानात्वं मायया वन्चितो नर:।।

“‘मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है’, ऐसा कह कर श्रुति ने दोष भी बतलाया है। मनुष्य माया से ठगा जा कर ही संसार में नानात्व देखता है।” ~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ४८)

आचार्य प्रशांत: अड़तालीसवाँ श्लोक है अपरोक्षानुभूति का। श्लोक कहता है, “मनुष्य माया से ठगा जा कर ही संसार में नानात्व देखता है।”

(प्रश्न पढ़ते हुए) “आचार्य जी, मन तो टुकड़ों में जीता है, अलग-अलग ही देखता है, तभी डरता है। ये क्या है – अलग-अलग देखना? ये क्या है – नानात्व?”

आदिशंकर का वचन है कि मनुष्य माया से ठगा जा कर ही संसार में नानात्व देखता है। मौलिक अपूर्णता है मनुष्य, और वो मौलिक अपूर्णता जीवन की स्थितियों में अलग-अलग रूप से अपने-आप को दर्शाती है। अलग-अलग लोग, अलग-अलग समय, अलग-अलग कर्मों में और विचारों में उद्यत होते हैं, लेकिन ज़रा नीचे जा कर देखिए कि मूल-रूप से प्रेरणा क्या है सबकी। मूल-रूप से प्रेरणा सबकी एक है, और वो एक प्रेरणा है कि “किसी तरह से ‘पूरा’, ‘भरपूर’ महसूस करूँ। किसी तरीके से भीतर जो तड़प है, बेचैनी है, ज़रा कम होने का, ज़रा हीन होने का भाव है, उसका शमन हो, वो मिटे।”

बात अलग-अलग तरीके से प्रकट हो रही है लेकिन बात एक ही है। ठीक वैसे जैसे एक बाज़ार में लोग अलग-अलग चीज़ों के अभिलाषी और ग्राहक होते हैं, लेकिन एक बात सबमें पक्की है कि सबको कुछ-न-कुछ चाहिए। उसी तरीके से दुनिया हमारे लिए वस्तुओं का भंडार है और हर वस्तु अपने साथ एक आश्वासन लिए हुए है – “तुम्हारा मन भर दूँगी, तुम्हारा घर भर दूँगी, तुम्हें पूरा कर दूँगी।” और एक आदमी जो आज एक चीज़ चाह रहा है बाज़ार में, वो उस एक चीज़ पर रुक नहीं जाने वाला। एक दूकान में चाहे सफलता मिले, चाहे असफलता मिले, ये पक्का है कि वो आदमी जल्दी ही दूसरी दूकान में भी नज़र आएगा। कपड़ों की दूकान में गया था वो, जैसे कपड़े चाहिए थे मिल गए, भली बात! क्या यात्रा रुक गई उसकी? नहीं, यात्रा नहीं रुक गई। अब वो जाएगा और सब्ज़ियों और फलों की दूकानों पर नज़र आएगा, या अब वो जाएगा, मिठाई की दूकान पर नज़र आएगा। और कपड़ों की दूकान पर गया था वो, और उसे असफलता मिली तो भी बात वही रही, अभी भी वो नज़र दूकान पर ही आएगा, किस दूकान पर? दूसरे कपड़े की दूकान पर नज़र आएगा।

इच्छा पूरी न हो तो उद्यम होता है इच्छा को पूरा करने का, और इच्छा यदि पूरी हो जाए तो वो अपने पीछे अपने से सम्बन्धित इच्छाओं की कतार ले कर आती है।

घर चाहिए था, घर मिल गया, अब घर में बाग भी तो चाहिए! घर हो गया सुव्यवस्थित, बाग-बगीचा भी लग गया, अब पोर्च (बरामदे) में खड़ी कार भी तो चाहिए! घर भी आ गया, बाग भी आ गया, कार भी आ गई, अब कार को संभाल सके ऐसा व्यापार भी तो चाहिए! अब व्यापार के बाद पत्नी भी तो चाहिए, जिससे संसार है! और फिर उसके बाद इच्छाओं की कई अन्य श्रृंखलाएँ। जिसको नहीं मिला वो भी अतृप्त, जिसको मिला वो दूसरे तरीके से अतृप्त, मूल में लेकिन अतृप्ति बैठी ही है। ये मौलिक अतृप्ति अपने-आप को पचासों तरीके से अभिव्यक्त करती है, इसलिए दुनिया हमें अलग-अलग नज़र आती है। हर चीज़ पृथक है दूसरी चीज़ से, और हर चीज़ बिलकुल वैसी ही है जैसी कोई दूसरी चीज़। दोनों बातों को समझिएगा। एक चीज़ आपकी कमी की एक अभिव्यक्ति को पूरा करती प्रतीत होती है, दूसरी चीज़ आपकी कमी की दूसरी अभिव्यक्ति को पूरा करती प्रतीत होती है, इस तल पर दोनों चीज़ें कैसी हुईं? अलग-अलग हुईं। लेकिन दोनों ही चीज़ें आपके लिए अर्थपूर्ण सिर्फ़ इसलिए हैं क्योंकि दोनों ही किसी कमी को पूरी करती प्रतीत होती थीं।

जो आपकी कमी को पूरा करता न प्रतीत हो वो आपके लिए अर्थपूर्ण नहीं होने वाला। और इस दुनिया में कुछ भी नहीं है जो हमारे लिए अर्थपूर्ण नहीं होता। हाँ, कुछ कभी अर्थपूर्ण होता है, कुछ कभी और अर्थपूर्ण होता है। कुछ अर्थपूर्ण हो चुका, कुछ अर्थपूर्ण हो जाएगा। कुछ यहाँ अर्थपूर्ण है, कुछ वहाँ अर्थपूर्ण हो जाएगा। पर आप दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं खोज पाएँगे जो आपके लिए अनिवार्यतः अर्थहीन हो। भीतर कुछ है जिसमें एक छेद है, ज्यों हृदय में कोई पिंड हो और उसे बाहर से किसी पक्षी ने चोंच मार-मार कर खोखला कर दिया हो, या उसमें कोई कीट लग गया हो तो वो ज़रा खोखला हो गया हो। और ये जो खोखला पिंड है ये घूमता रहता है। (अलग-अलग दिशाओं में इशारा करते हुए) उसमें जो छेद है वो कभी उस दिशा में होता है, कभी उस दिशा में होता है, कभी उस दिशा में, कभी उस दिशा में। जितनी दिशाएँ संभव हैं, हर दिशा में वो छेद हो सकता है, पर किसी-न-किसी दिशा में होगा ज़रूर। जिस दिशा में होता है, उस दिशा से अपने लिए वो आपूर्ति माँगने लगता है। दिशाएँ अलग-अलग हैं, आपूर्तियाँ अलग-अलग हैं, पर एक बात सदा समान है कि भीतर कोई बैठा है जो बहुत भूखा है; कभी उसे ये चाहिए, कभी उसे वो चाहिए, पर एक बात पक्की है कि सदा उसे चाहिए-ही-चाहिए।

प्रश्न है कि “चीज़ें अलग-अलग क्यों दिखती हैं? क्यों आदिशंकर कह रहे हैं कि मनुष्य माया से ठगा जा कर ही संसार में नानात्व देखता है?”

नानात्व का अर्थ हुआ चीज़ों का वैविध्य, चीज़ों की पृथकता। नानात्व इसीलिए दिखता है क्योंकि हमें हर चीज़ अपने ही संदर्भ में दिखती है। जो भूखा होगा, अगर उसके सामने बढ़ई की, फर्नीचर की भी दूकान होगी तो वो यही अंदाज़ लगाएगा और यही उम्मीद करेगा कि क्या पता इसके यहाँ भी खाने का कुछ मिलता हो। जा कर पूछ भी आएगा, “आपके यहाँ खाने का भी कुछ है क्या?” वो कहेगा, “पागल हो गए हो! दिखता नहीं है यहाँ लकड़ी का काम होता है?” तो तर्क भी दे दोगे, कहोगे, “लकड़ी वृक्ष से, फल भी वृक्ष से, क्या पता तुम फल भी रखते हो!” वो लोहे की दूकान पर भी पूछ आएगा, “यहाँ कुछ खाने का भी मिलता है?” हमें चीज़ें दिखती ही अपने संदर्भ में हैं; और हम एक नहीं, हम जो हैं वो बदलता रहता है। हम जो हैं वो एक ऐसा बीमार है जिसकी बीमारी लगातार बदलती रहती है। अपने संदर्भ में वो दुनिया को देखता है, और उसका होना लगातार परिवर्तनशील है, और उसका होना लगातार एक भूख है, एक खोखलापन है, एक बीमारी है। तो कभी इधर देखेगा और कहेगा, “यहाँ से कुछ मिल जाए,” और पल-भर में बदल गया और अब उधर देखेगा, कहेगा, “ना! दूसरी चीज़ चाहिए, वो वहाँ से मिल जाए।” और फिर बदल गया, अब इधर देखेगा, कहेगा, “ना! तीसरी चीज़ चाहिए, क्या पता वहाँ से मिल जाए!” इस तरह से संसार हमारे लिए, पहली बात, अर्थपूर्ण हो जाता है, और दूसरी बात, वैविध्यपूर्ण हो जाता है। नहीं तो जो अपने-आप में पूरा है, उसके लिए चीज़ें मात्र चीज़ें हैं, दुनिया मात्र दुनिया है; अर्थ नहीं रखेगी, बस एक तथ्य की तरह सामने होगी।

“ये दीवार है। ये दीवार है, ये मुझे पूरा करने का साधन नहीं है, ये मुझे उठा या गिरा नहीं सकती। ये कपड़ा है, वो पर्दा है, वो पंखा है, ये कुर्सी है, ये कालीन है, ये लोग हैं, मन में विचार है, परित: दुनिया है; जो है सो है, जो है, मेरे संदर्भ में नहीं है, बस है। हम हमारी जगह, संसार संसार की जगह। संसार माध्यम नहीं, संसार साधन नहीं, न हममें कुछ जोड़ देगा, न हमसे कुछ छीन ले जाएगा।” अब सब चीज़ें अलग-अलग होते हुए भी एक हो गईं। आँखों से पूछोगे तो वो कहेगा, “हाँ, फ़र्क तो है। पीला पीला है और लाल लाल है, फ़र्क तो है।” इंद्रियों के तल पर फ़र्क है, मन के तल पर कोई फ़र्क नहीं है, क्योंकि न मेरे लिए पीले की महत्ता है, न मेरे लिए लाल की, तो दोनों मेरे लिए अब क्या हो गए? अब बराबर हो गए। आँखें बता देंगी अंतर है, आँखों का काम है अंतर बताना, आँखें संस्कारित हैं अंतर बताने के लिए, पर अंतस के तल पर कोई अंतर नहीं है। “हाँ ये चुपड़ी रोटी है, हाँ ये सूखी रोटी है। हाँ ये मीठा है, हाँ ये खट्टा है। हाँ गर्मी है, हाँ बरसात है। अंतर तो इनमें है ही, पर गर्मी हमें सुखा नहीं देने वाली, बरसात हमें गला नहीं देने वाली। तो सच पूछो तो कोई अंतर नहीं है। गर्मियाँ आती हैं, जाड़े आते हैं, बरसातें जाती हैं, हम हम हैं; हम हम हैं। तो गर्मी और जाड़ा अलग-अलग हो कर भी हमारे लिए एक हैं।”

समझ रहे हो?

जिसको ये एकरसता दिखने लगती है दुनिया में, वो फिर, न दुनिया का, न अपना ग़ुलाम रह जाता है। न अब उसके ऊपर दुनिया शासन कर सकती है, और न ही उसकी अपनी वृत्तियाँ। कुछ है ही नहीं जिसको वो अमूल्य समझता हो, मूल्य हर चीज़ का जानता है, पर ये भी जानता है कि मूल्य सदा सीमित है। अमूल्य वो किसी चीज़ को नहीं कहता, जानता सबको है, समझता सब-कुछ है, पर ग़ुलाम किसी का नहीं है। अंजान नहीं है, पर आज़ाद है। छोटे बच्चे की तरह नहीं है, कि उसको साँप का पता ही नहीं इसलिए साँप से खेल रहा है। देखा है छोटा बच्चा, बिजली का सॉकेट होता है, उसमें उँगली डाल रहा है? ये निर्भयता तो नहीं है न? ये क्या है? ये अज्ञानता है। उसे पता ही नहीं कि ख़तरा है, तो... हम जिस प्रज्ञावान की बात कर रहे हैं वो सब जानता है, उसे दुनिया के रंग-ढंग, तौर-तरीके पता हैं। वो साँप को साँप जानता है, आम को आम जानता है, लेकिन उसके बाद भी न उसे साँप से भय है, न आम का लालच है। इसका अर्थ ये नहीं कि वो जा कर साँप को गले में डाल लेगा, इसका अर्थ ये भी नहीं कि आम उसे मीठा नहीं लगता। वो साँप से बचेगा भी और आम का रस भी लेगा, लेकिन फिर भी उसके भीतर कुछ सदा ऐसा रहता है जिसे साँप डस नहीं सकता और जिसे आम का रस छू नहीं सकता। जो उस बिन्दु पर जी रहा है, सिर्फ़ उसी का जीवन मुक्त है, और जो उस बिन्दु पर नहीं जी रहा है वो यातना सहने और ग़ुलामी करने के लिए ही पैदा हुआ है।

ये गूढ़ प्रश्न है कि संसार में वैविध्य है कि नहीं है, उत्तर इसका ये है कि “प्रश्न पूछ कौन रहा है?” अगर आँखें पूछ रही हैं तो निश्चित रूप से है। अगर कान पूछ रहे हैं तो निश्चित रूप से है वैविध्य। अगर आँखों से एक हो कर के जीते हो, तो फिर सब अलग-ही-अलग दिखेगा। त्वचा से एक हो कर जीते हो, तो भी सब कुछ अलग-अलग है — गीला अलग है, सूखा अलग है, गर्म अलग है, ठंडा अलग है। पर अगर बहुत गहरे जीते हो, आत्मा में जीते हो, तो तुम देखोगे कि आँखों के लिए कितने भेद हैं, तो तुम देखोगे कि बुद्धि के लिए कितने भेद हैं, पर तुम्हारे अपने लिए कोई भेद नहीं होगा। तुम कहोगे, “जिन्हें चीज़ें अलग-अलग लगती हैं उन्हें लगती रहें। हम शांत हैं, हम स्थिर हैं। हम संतुलित हैं, हम स्थायी हैं। हम बदलते हों तो हम कहें न कि ‘कुछ है जो बदला-बदला सा है’? हम प्रभावित होते हों अलग-अलग चीज़ों से तो हम कहें न कि ‘इस अलगाव का कोई अर्थ है’? हाँ, होगा अलगाव, हमारे लिए अर्थहीन है।”

जिनके लिए अलग-अलग चीज़ें, अलग-अलग स्थितियाँ बहुत अर्थ रखती हैं, उनकी हालत को ज़रा समझना। काला तुम्हारे लिए अर्थपूर्ण हो गया, महत्वपूर्ण हो गया तो तुम सफ़ेद से बच कर भागोगे। जीवन में भय आ गया न? धन तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण हो गया तो गरीबी की आशंका तुम्हें खौफ़ में रखेगी। जीवन व्यर्थ कर लिया न? जब भी कुछ तुम्हारे लिए कीमती होगा, उसका द्वैत, विपरीत तुम्हारे लिए आशंका का कारण बन जाएगा। मोहग्रस्त हो गए तो जिससे मोहित हो उससे बिछुड़ने की आशंका तुम्हें सोने नहीं देगी। सम्मान पकड़ लिया, ज्ञान पकड़ लिया, तो इसी उधेड़-बुन में रहोगे कि “और बढ़ाएँ कैसे, और रक्षित कैसे रखें”, क्योंकि जिस चीज़ को तुमने पकड़ा है, तुम भली-भाँति जानते हो कि उसका विपरीत भी अस्तित्वमान है, और विपरीत अगर है, तुम पर भी कभी-भी आ सकता है। सारी दुनिया काली-ही-काली नहीं, सफ़ेद का भी अस्तित्व है, और है तो कभी-न-कभी तुम्हें छू जाएगा। तुम हैरान हो, परेशान हो, न-जाने कब वो खौफ़नाक घड़ी आ जाए! दुनिया तो ऐसी ही है न, यहाँ जो चीज़ है, उसका विपरीत भी है। जो नानात्व में यकीन रख रहा है वो द्वैत के किसी एक सिरे से जा कर जुड़ रहा होगा। एक सिरे से जुड़ना, माने दूसरे सिरे पर अपने लिए आफ़त खड़ी कर लेना। कौन जीना चाहता है आफ़त में!

ऐसे जियो कि बाहर सारे खेल चलते रहें, जिसको बदलना है वो बदलता रहे, जिसको आना है वो आता रहे, जो विदा हो सो विदा होता रहे, कुछ बढ़ता रहे, कुछ घटता रहे। प्रकृति तो सदा गतिशील है ही न! बाहर आँधी-तूफ़ान चलने हों चलते रहें, बाहर मंद बयार बहनी हो बहती रहे, और भीतर? भीतर का कुछ पता नहीं, वहाँ जैसे एक सुंदर सन्नाटा, वहाँ जैसे कुछ बड़ा अनछुआ-सा, ऐसा साफ़ कि उस पर वक़्त की धूल पड़ ही नहीं सकती। सब बाहर अलग-अलग खंडित रहे, और भीतर अखंड का राज रहे। जब भीतर कुछ होता है अखंड, अटूट, तो बाहर की टूट-फूट परेशान नहीं करती, फिर बाहर की टूट-फूट के मज़े लिए जा सकते हैं। फिर बाहर की टूट-फूट से?

प्रश्नकर्ता: मौज की जा सकती है।

आचार्य: “भीतर सब बढ़िया है भाई! जहाँ हमें रहना है वहाँ सब बढ़िया है, और बाकी सब खेल का मैदान है।”

घर में हमारे बिलकुल सब-कुछ सुंदर और सुव्यवस्थित है, अब खेल के मैदान पर अगर धूल उड़ती हो तो इसमें बुराई क्या है? खेल का मैदान है, वहाँ मिट्टी हो सकती है, वहाँ कपड़े गंदे हो सकते हैं, वहाँ ज़रा चोट भी लग सकती है, वहाँ धरातल थोड़ा उबड़-खाबड़ भी हो सकता है; कुछ भी हो सकता है। कूद लगाई जा रही है, कुश्तियाँ लड़ी जा रही हैं, खेल चल रहा है। और जब ये खेल चल रहा है तब हमें भली-भाँति पता है कि घर में सुव्यवस्था है, शांति है, बहुत महीन संगीत है। यहाँ उड़ती होगी धूल, घर में एक कण भी नहीं। और बाहर खेलते-घूमते, रमते-विचरते जब ज़रा-सा भी अंदेशा होगा कि ये बाहर हावी होने लगा है, कि दुनिया पकड़ने लगी है, तत्काल विकल्प उपलब्ध है – मुड़ जाएँगे, घर में प्रविष्ट हो जाएँगे। और घर कुछ ऐसा है कि वहाँ घुसे नहीं, कि वहाँ की याद की नहीं, कि आत्म-स्नान हो गया, सारी सफ़ाई हो गई। घर की स्मृति-मात्र ही पूरी तरह साफ़ कर देती है। सर पर घर का हाथ है, हृदय में घर की ऊर्जा है, इसीलिए इतनी निर्भयता है, इतना साहस है कि दुनिया में कहीं भी जा कर कुछ भी खेल लेंगे। और दुनिया में तो सब बदलता रहता है, ऊँच-नीच चलती ही रहती है, सारे बदलावों को झेल जाएँगे; न सिर्फ़ झेल जाएँगे, खेल जाएँगे, क्योंकि भली-भाँति जानते हैं कि घर पाक-साफ़ है। और घर के द्वार हमारे लिए हमेशा खुले हैं, और पहुँचना सरल, सुगम है; याद-भर करना है, पहुँच जाएँगे।

माया तब नहीं है जब तुम्हें पार्थक्य दिखता है, भेद दिखते हैं, माया तब है जब तुम्हें सिर्फ़ भेद दिखते हैं। जीव पैदा हुए हो तो इंद्रियाँ तो भेद का अनुभव करेंगी ही। पर मात्र जीव ही नहीं हो, जीव के हृदय में बसती आत्मा भी तो हो तुम न, और वही तुम्हारी पहली पहचान है। जीव तो आज है कल नहीं, अनित्य है। जीव से पहले भी तुम कुछ थे और जीव के बाद भी तुम रहोगे, वो तुम्हारी असली पहचान है। तो जीव भेद देखेगा, देखने दो, पर मात्र भेद ही न दिखें। भेदों के नीचे जो अभेद है, जो अविछिन्न है, जो अखंड है उसमें जियो, उसी को ब्रह्मलीनता भी कहते हैं, उसी को कैवल्य भी कहते हैं।

बड़ी अद्भुत होती है वो दशा जब तुम संसार के वैभिन्य से एक स्वस्थ संबंध बना लेते हो, तब कुछ भी ऐसा नहीं रह जाता जिसका घोर विरोध करने की ज़रूरत पड़े। समझना। किसी चीज़ का कड़ा विरोध तब करना पड़ता है जब तुम्हें पता होता है कि वो चीज़ तुम पर छा जाएगी, तुम्हें लुभा लेगी, तुम्हें पकड़ लेगी, तुम्हें ग़ुलाम बना लेगी। और अकसर तुम्हें जब एक चीज़ लुभा सकती है तो उसकी विपरीत चीज़ डरा भी सकती है, तब तुम दोनों तरफ़ से तनाव में जियोगे, एक तरफ़ का तनाव होगा लोभ का और दूसरी तरफ़ का तनाव होगा भय का। जो आदमी सही जगह स्थापित है वो जीवन की हर स्थिति का स्वागत करता है, क्योंकि कोई भी स्थिति उस पर छा तो सकती नहीं न, तो विरोध क्या करना भाई! “‘अ’ आए कि ‘ब’ आए, हमारे लिए दोनों बराबर हैं, क्योंकि दोनों में से कोई भी हम पर राज नहीं कर पाएगा। और अगर दोनों ही नहीं आए, क-ख-ग आ गए तो भी ठीक है, आओ, तुम लोग भी अपनी-अपनी छटा दिखाओ! संसार है, यहाँ तो ‘क’ से ले कर ‘ज्ञ’ तक, और उनके आगे भी न जाने क्या-क्या पसरा हुआ है। आओ भाई! सब आओ, सबका स्वागत है, दरवाज़े खुले हैं।” ये आदमी अब निर्विकल्प, निर्विरोध में जीने लग जाता है। इसके निर्विरोध जीवन को देख कर आपको ऐसा लग सकता है कि इसके पास अब शायद विवेक नहीं बचा, आपको ऐसा लग सकता है कि इसने तो अब दरवाज़ा खुला छोड़ दिया है, कुछ भी भीतर आ जाए। हाँ, उसने दरवाज़ा खुला छोड़ दिया है, क्योंकि उसे अब फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन भीतर आ रहा है। इसी स्थिति को जानने वालों ने कभी-कभार ऐसे कहा है कि “अब पूरा जगत ही हमारे लिए परमात्मा हुआ, अब कण-कण में नारायण हुआ।” कण-कण में नारायण से आशय ये नहीं है कि कण को देखा तो उसमें नारायण दिख गया, आशय ये है कि “कण ‘क’ हो या कण ‘ब’ हो, हम नारायण में स्थित हैं। ये नहीं होने वाला कि कणों का प्रकार और प्रारूप बदला तो भीतर से हमारा स्थान भी बदला, हमारा स्थान अब तय है। हमारा स्थान नीयत है और वहाँ अब हम अडिग हैं, और बाहर जो कुछ है वो हमारे लिए कण-स्वरूप ही है, धूल-बराबर ही है। ये आए, कि ये आए, कि ये आए, कि ये आए— सबका स्वागत है। सबका स्वागत है क्योंकि जो भी आए, हम हम हैं। आइए आप भी आइए, आइए आप भी आइए, आइए आप भी आइए। सब आइए!”

बीमार आदमी को देखा है न कैसे बचा कर रखा जाता है, सैनेटोरियम में? क्यों बचा कर रखा जाता है? बीमार है भाई! और बीमार का अर्थ ही होता है अस्वस्थ; ग़लत जगह स्थापित हो गया है, अ-स्वस्थ है वो; आत्मा में स्थापित नहीं है, कहीं और जा कर स्थान ले लिया उसने, अस्वस्थ हो गया। जो अस्वस्थ हो गया वो अब ‘अ’, ‘ब’, सबका स्वागत नहीं कर पाएगा, उसको तो अपने-आप को सुरक्षा देनी होगी, कवच देने होंगे, कहीं कुछ उल्टा-पुल्टा न आ जाए। और जो स्वस्थ है वो? बाहर ठंडी हवाएँ चल रही हैं, जवान आदमी कई बार यूँ ही बाहर निकल जाता है, कहता है, “बह रही होंगी हवाएँ ठंडी, ज़रा छाती पर भी तो लें, उसका अपना आनंद है।” और बुड्ढे? “अरे! राम का नाम लो। ये कोई बाहर जाने का वक़्त है बच्चा?” जो स्वस्थ है वो न सिर्फ़ डरता नहीं है, बल्कि अकसर पाया जाता है तूफ़ानों को आमंत्रित करता हुआ — “आओ! तुम आते हो तो हमारे भीतर की शक्ति और जगती है। तुम आते हो तो हमें अपनी ताक़त का और पता चलता है।” और कौन आए? वो नहीं कि जिसको हमने चुन रखा है, कि दुबला-पतला है, फटीचर है तो पटक ही देंगे, उसको बुला रहे हैं बार-बार, कि “तू आ! तुझसे लड़ेंगे कुश्ती।” ख़ुद अस्सी-किलो के हैं और पच्चीस-किलो वाले को बार-बार आमंत्रण दे रहे हैं, “बाहर निकल! आज कुश्ती है।” ना! ये नहीं, जो आता हो आए। चौराहे पर खड़े हो गए हैं, और आदिशंकर के शब्दों में कहें तो सम्पूर्ण नानात्व को चुनौती दे रहे हैं, “जो आता हो, जिधर से आता हो आए।” और इसमें कोई अहंकार नहीं, ये दर्प की ललकार नहीं, खेल है, मज़ा आएगा। न जाने कौन निकल आए, और जो भी निकल आएगा हम देखेंगे। कोई पक्का भरोसा नहीं है कि जीत ही जाएँगे, कभी-कभी हार भी लेना चाहिए। हार भी गए तो? देखेंगे।

अब बताओ नानात्व है कि नहीं है? नानात्व निश्चित रूप से है, लेकिन कैवल्य भी है साथ में, एकत्व भी है साथ में। कुछ है भीतर जो काँपने का नाम ही नहीं ले रहा, कुछ है भीतर जो डिगता ही नहीं। अब आया मज़ा! और आश्वस्ति कुछ नहीं है — फिर कहे दे रहा हूँ — कि ऐसे जियोगे तो एक विशिष्ट प्रकार का ही परिणाम, कि फल मिलेगा; ना, कुछ नहीं। ऐसा नहीं है कि मैच फ़िक्स है, पहले ही पता है कि जीतेंगे, तो सबको बुलाए ले रहे हैं कि “आओ-आओ, परिणाम तो तय है ही, आओ” ना! कुछ भी हो सकता है, पर जो भी होगा?

प्र: देखेंगे।

आचार्य: देखा जाएगा!

ये अंदाज़ है एक, और जिसको ये अंदाज़ उपलब्ध नहीं वो क्या जिया!

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