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बोध ही जीवन है || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्न: सर, जैसा कि नाम कहता है ‘अद्वैत लाइफ-एजुकेशन’, तो मेरा सवाल यह है कि जीवन(लाइफ) क्या है| मैं ये भी पूछना चाहती हूँ की हमारी ज़िन्दगी में ऐसा क्या है जो हमारा अपना है| सब कुछ तो हमें समाज से मिलता है| समाज ने ही हमें ये बताया कि हमें ये करना चाहिए, वो करना चाहिए| तो इसमें हमारा क्या है?

वक्ता: सबसे पहले तो ये जान लेना कि सब कुछ बाहर से आता है, ये बड़ी बात है| सब कुछ पाया ही हुआ है| शरीर की जो पहली दो कोशिकाएं हैं, वो बाहर से आती हैं और उसके बाद वो सब कुछ जिसे तुम अपना बोलते हो, वो बाहर ही बाहर से आता रहता है| शरीर बना है खाने से, हवा से, पानी से, और ये सब बाहरी है| शुरुआत से लेकर अंत तक शरीर बाहर ही बाहर का है| उसका जो ढांचा है पूरा, उसका पदार्थ ही नहीं, उसका जो ढांचा है पूरा, वो बाहरी है| तुमने नहीं तय किया था कि हाथ में पांच ऊँगलियाँ ही हों, तुमने नहीं तय किया था कि दो आँखें ही हों| ये बात बाहरी ही है |

मन में जो विचार उठते हैं, वो भी सब बाहरी ही हैं| बाहर से कोई बात है जो अंदर आकर बैठती है, वही बात चित्त बनती जाती है और चित्त में फिर विचार उठते हैं| शरीर बाहरी, मन बाहरी और ये जो दुनिया दिखाई दे रही है आँखों से, ये तो बाहरी है ही| तो अच्छा सवाल है शुरू करने के लिए कि मेरा क्या है ?

क्या बाहरी खुद जान सकता है कि ‘मैं बाहरी हूँ’? कौन ये समझ रहा है कि ये सब कुछ बाहरी है? कौन समझ रहा है इस बात को ? जो समझने वाला है, क्या वो खुद भी बाहरी हो सकता है? ठीक है आँखें बाहर को देख रहीं हैं और आँखों को जो कुछ दिखाई देगा वो बाहर का ही होगा| पर आँखों ने जो कुछ देखा, उसको समझने वाला, उसको जान जाने वाला, उसका बोध कर लेने वाला वो बाहरी नहीं हो सकता| वो बाहरी नहीं हो सकता|

(हँसते हुए) पर वो तुम्हारा भी नहीं हो सकता| क्योंकि तुम जिस सब को अपना बोलते हो, वो क्या है ?

सभी श्रोतागण(एक स्वर में): बाहरी|

वक्ता: एक-एक चीज़ जिसको तुमने अपना बोला है जीवन में, वो बाहरी ही है| तो इस गणित को समझना, वो सब कुछ जिसको तुम अपना बोलते हो- शरीर, नाम- जो कुछ भी अर्जित किया जा सकता है, वो तो बाहरी ही है| जो वास्तव में तुम्हारा होगा, वो तुमको लगेगा ही नहीं कि तुम्हारा है| उसे तुम अपना कह ही नहीं सकते क्योंकि तुमने तो अपने आप को बाहरी के साथ ही जोड़ रखा है|

ज़िन्दगी में जो हो रहा होगा सदा बाहरी ही हो रहा होगा| हाँ, अगर उसको होश-पूर्वक जान लिया, समझ लिया, तो तुम हो| तुम्हारा काम है, तुम्हारा स्वाभाव है, समझना| जो कुछ घट रहा है उसको होश-पूर्वक जान जाना, देख लेना| पर जो कुछ घट रहा है उसको तुम होश-पूर्वक जान तब पाओगे, देख तब पाओगे, जब तुम उसके साथ जुड़ ही न जाओ जो घट रहा है |

पेट में भूख लग रही है| अब अगर मैं पेट ही हूँ, मैं शरीर ही हूँ तो फिर भूख मुझे ही लग रही है| लेकिन एक दूसरा भी आदमी हो सकता है जो कहे कि पेट को भूख लग रही है और मैं इस बात को थोड़ा अलग हट कर जान रहा हूँ| वो कहेगा कि मैं उस प्रक्रिया को ही देख पा रहा हूँ कि पेट में भूख लगती है, फिर उससे कुछ तरंगे आतीं हैं मन की ओर, फिर मन में विचार उठता है कि खाना कहाँ पर मिल जाएगा, फिर एक योजना सी बनती है कि खाने की तरफ कैसे जाना है और कितने बजे खा लेना है, और ये पूरा कार्यक्रम शुरू हो जाता है| वो इस पूरी चीज़ को देख पा रहा है| वह कह रहा है, ‘मैं इसका साक्षी हूँ’ |

एक आदमी ऐसा भी हो सकता है| और जो आदमी ऐसा है, वही वास्तव में ज़िन्दा है क्योंकि पेट नहीं ज़िन्दा होता| पेट में तुम्हें जो भूख लगती है, वो तो एक रासायनिक प्रक्रिया मात्र है, एक केमिकल रिएक्शन है| अच्छे से जानतो हो न?

सभी श्रोतागण(एक स्वर में): जी सर|

वक्ता: यहाँ पर कुछ रासायनिक प्रक्रिया(केमिकल रिएक्शन) हुई, उसके फलस्वरूप तुम्हारा ये जो स्नायु तंत्र है इसमें कुछ विद्युतीय संदेश(इलेक्ट्रिकल मेसेजेस) हैं, वो तुम्हारे मस्तिष्क की ओर गये और वहां पहले से ही कार्यक्रम निर्माण(प्रोग्रामिंग) है कि जब इस प्रकार का संदेश आए तो उसका नाम होगा भू–ख| ये तो पूरा पूरा यंत्रवत काम है, एक यंत्र कर रहा है| ये मुर्दा यंत्र है| यंत्र कितना भी बढ़िया काम करता हो, कितने भी उच्च स्तर का हो, लेकिन होता तो मुर्दा ही है न! क्योंकि कोई यंत्र जानता नहीं है कि वो क्या कर रहा है| कोई यंत्र खुद अपना ढांचा, अपना डिजाईन नहीं तैयार करता है और कोई यंत्र खुद अपनी मालिक नहीं होता है|

ये सारी बातें पेट पर लागू होती हैं| न पेट ने तय किया था कि उसका ढांचा क्या होगा, न पेट समझता है कि उसके साथ क्या हो रहा है और न पेट अपना मालिक होता है| तयशुदा-सी बात है कि इतना खाना खाया है, उसमें इतनी कैलोरीज होतीं हैं, उनके पचने में इतना समय लगता है, मेटाबोलिज्म का यह दर होता है| तुम भौतिक विज्ञान(फिजिक्स) में गणना कर सकते हो कि कितनी देर में एक लुढ़कती हुई गेंद, एक पंद्रह डिग्री के ढलान पर, जिसमें इतना फ्रिक्शन है, कितनी देर में नीचे पहुँच जाएगी? कर लेते हो न गणना?

सभी श्रोतागण(एक स्वर में): जी सर|

वक्ता: ठीक उसी तरीके से तुम ये भी गणना कर सकते हो कि इतना खाना खाया है, प्रति मिनट इतनी कैलोरी जला रहा हूँ, इतनी ऊर्जा पहले से ही संचित है शरीर में, तो कितनी देर बाद अब भूख का एहसास होगा| तुम इसकी ठीक-ठीक गणना कर सकते हो|

अगर तुम्हें सारे तथ्य उपलब्ध हों, तो बिल्कुल ठीक-ठीक बता पाओगे कि अगर अभी तुमने भोजन किया है, तो कितनी देर बाद तुम्हें भूख का पहला अहसास होगा| ऐसा इसलिए है क्योंकि यह एक यंत्रवत प्रक्रिया है और जहाँ कहीं भी कुछ यंत्रवत है, वहां सब पहले से ही तय है| गणना कर लो पता चल जाएगा| बात आ रही है समझ में?

तो तुम ज़िन्दा नहीं हो अगर तुमने अपने आप को पेट माना क्योंकि कोई यंत्र ज़िन्दा नहीं होता, वहां सब पहले से ही चल रहा होता है| उसमें समझने की कोई योग्यता नहीं होती| और जगत में लगातार-लगातार प्रक्रियाएं चल ही रहीं हैं| प्रक्रियाओं के अलावा कुछ नहीं है जो तुम्हारे आसपास चल रहा हो| ऐसा होता है, फिर उससे ऐसा होता है, ऐसा-ऐसा, कार्य-कारण(कॉज-इफ़ेक्ट)| पूरा एक तंत्र है, सब एक दूसरे से जुड़ा ही हुआ है और इसमें कुछ न कुछ लगातार घटनाएं घट ही रही हैं, और हर घटना एक दूसरे से जुड़ी हुई है| एक घटना से दूसरी घटना निकल पड़ती है|

एक बहुत बड़ा यंत्र है जो काम कर रहा है| हमने पेट का उदाहरण लिया, पेट एक छोटा यंत्र है| बाकि जो कुछ जो तुम्हारे चारों ओर हो रहा है, वो एक बड़ा यंत्र है| सच तो ये है कि पेट जैसा छोटा यंत्र भी, एक बड़े यंत्र का भाग है| उस बड़े यंत्र को जानने वालों ने प्रकृति कहा है, और उसमें जीवन नहीं है, उसमें बोध नहीं है| उसमें घटनाएं घटती हैं, उसमें गति है, पर बोध नहीं है|

जिसने अपने आप को उस यंत्र से अलग हटाया, बस एक कदम पीछे, और जानना शुरू किया कि ये सब होता क्या है, कि एक शब्द मेरे कान में पड़ता है तो मुझे क्रोध क्यों आ जाता है, नौकरी की या परीक्षा की बात होती है तो मेरे भीतर डर क्यों उठने लग जाता है, कोई व्यक्ति मेरे सामने से गुज़रता है तो ये मन में क्या हलचल मच जाती है, या बैठा हुआ हूँ तो स्थिर क्यों नहीं बैठ पा रहा हूँ, ये जो यंत्र है, ये किन तरीकों से काम करता है, जिसने ये जानना शुरू किया, उसने जीवन को पा लिया|

अब वो अलग खड़ा है, हल्का खड़ा है, उसके सिर पर बोझ नहीं है| वो कहेगा, ‘यंत्र को अपना काम करने दो, मैं मुक्त हूँ| मैं दृष्टा हूँ, मैं देख सकता हूँ| मेरे ऊपर ज़िम्मेदारी नहीं है यंत्र को चलाने की, वो अपने आप चल लेगा| इतना बड़ी व्यवस्था है, मेरे चलाए थोड़ी न चल रही है| वो तो चल रही है, वो अपनी परवाह खुद कर लेगी! मेरे ऊपर ये बोझ है ही नहीं कि मैं उसके बारे में कुछ करूँ| मुझे कुछ करना है ही नहीं | मैं तो बस मज़े में इस पूरी चीज़ को होते हुए देख रहा हूँ, और बड़ा मज़ा आ रहा है कि ये सब तमाशा चलता रहता है मेरे साथ चारों ओर’|

इसमें बड़ी मालकियत है| पूरी दुनिया तुम्हारे चारों ओर घूम रही है और उस दुनिया में तुम भी शामिल हो| ये नहीं कि तुम नहीं हो, तुम भी शामिल हो| सब कुछ तुम्हारे चारों ओर चल रहा है और तुम मज़े में बैठे हुए हो; स्थिर| तुम्हारा अपना शरीर भी खूब दौड़-धूप कर रहा है, पर तब भी तुम स्थिर बैठे हो| और वो जो स्थिर बैठना है, वो होश में स्थिर बैठना है| ‘मैं सब समझ रहा हूँ, मुझे सब समझ में आ रहा है’- ये जीवन है|

जानना ही जीवन है| बोध ही जीवन है| होश ही जीवन है |

फिर कहानी इससे ज़रा-सा आगे बढ़ती है| जो होश को पा लेता है, जो ये सब जानने लग जाता है, वो ऐसा मौजी, ऐसा मस्त हो जाता है कि फिर वो चारों तरफ अपनी मौज बांटता फिरता है| वो दबा-दबा सा, झुका-झुका सा नहीं रहता| उसके सर पर क्विंटलों बोझ नहीं पड़ा रहता, और इस घटना को, मौज के इस बंटने को प्रेम कहते हैं|

जहाँ होश है, जहाँ जागृति है, प्रेम उससे बहुत दूर नहीं हो सकता| होश का मतलब है– ‘मैंने पा लिया, मैंने जान लिया, मैं समझ गया, बड़ा मज़ा आया समझ कर| और प्रेम का मतलब है- ‘जो मैंने पाया, जो मैंने जाना, वो दूसरों में भी बंट रहा है| ज़ाहिर-सी बात है कि जो पाएगा, वही बांट पाएगा! ज़ाहिर सी बात है कि जो पाएगा, वो कितना भी बांटता फिरे, उसका कम नहीं होगा| इसलिए जिन्होंने भी जाना है, उन्होंने बांटा भी है| इस माध्यम से नहीं तो उस माध्यम से, पर बांटा ज़रूर है| उनके माध्यम से बंटना पक्का है| उन्हें कुछ करना ही नहीं पड़ा बांटने के लिए, उनका होना ही, बांटना है|

पर तुम बांटने की बात अभी छोड़ो क्योंकि बांटने के लिए पहले अनिवार्य है, जानना| तुम खुद जानो| जब तुम खुद जानोगे तो उस जानने से तुम ऐसा चमकोगे कि बाकियों को भी रोशनी मिलेगी| कुछ भी अपने होश के दायरे से बाहर मत रखो| किसी भी बात को ऐसा मत कह दो कि ये तो ऐसा होता ही है| सवाल करना सीखो| घटनाओं के, चीज़ों के नजदीक जाना सीखो| जल्दी से ये मत कह दिया करो कि अब ये क्या पूछें, ये कोई पूछने वाली बात है| सब कुछ पूछने वाली बात है| सब कुछ जाना जा सकता है| और जो नहीं जाना जा रहा, वहीं पर चूक हो रही है| जिस भी बात को तुमने बिना जाने स्वीकार कर लिया है, जिस भी बात को तुम समझते नहीं पर करते रहते हो, वहीं पर समझ लो कि तुम मुर्दा हो|

क्योंकि जानना ही जीना है |

-‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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