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भीष्म का धर्म || महाभारत पर (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रतिज्ञा क्या है? अधर्म का साथ क्यों दे दिया? क्या प्रतिज्ञा पर आबद्ध होना अहंकार है? इच्छामृत्यु क्या है?

आचार्य प्रशांत: अपनी दृष्टि में अधार्मिक कोई नहीं होता। अपनी दृष्टि में धार्मिक सब होते हैं, बस लोगों का धर्म व्यक्तिगत होता है, पूर्ण नहीं होता, निरपेक्ष नहीं होता, निर्वैयक्तिक नहीं होता।

भीष्म से पूछोगे तो वो यही कहेंगे कि “साहब, हम तो धर्म का पालन कर रहे थे।” लेकिन भीष्म का धर्म वह धर्म है जिसे बुद्ध ने कहा था हीन धर्म, और बुद्ध की शिक्षा है कि हीन धर्म का सेवन मत करो। उन्होंने यह नहीं कहा कि अधर्म का सेवन मत करो, क्योंकि अधर्मी तो कोई होता ही नहीं, अपनी-अपनी नज़र में सब धर्मी-ही-धर्मी हैं। तो बुद्ध ने कहा, “हटाओ! मैं तुम्हें अधर्मी बोलूँगा, तुम्हारे अहंकार को चोट लगेगी, तुम मुझे सुनोगे ही नहीं। मैं कहता हूँ कि दो धर्म होते हैं – हीन धर्म और महत धर्म।” बुद्ध ने कहा कि तुम महत धर्म का सेवन करो, हीन धर्म का नहीं।

हीन धर्म माने व्यक्तिगत धर्म, हीन धर्म माने शपथ, क़सम, प्रतिज्ञा, प्रण, कर्तव्य इत्यादि। क़सम, वादा, कर्तव्य, प्रतिज्ञा, ये सब क्या हैं? हीन धर्म। कुछ तो है जिसका तुम पालन कर रहे हो, पर तुम किसका पालन कर रहे हो? तुम अपना ही पालन कर रहे हो। तुम कह रहे हो कि, "मेरा संकल्प है, तो मैं पालन कर रहा हूँ।" इस अनुपालन में भी अनुशासन तो है ही, क्योंकि सब ऐसे नहीं होते जो अपने ही द्वारा लिये गए संकल्प का पालन कर पाएँ, सब ऐसे नहीं होते जो स्वयं द्वारा दिया गया वादा और ली गई प्रतिज्ञा भी रख पाएँ, इतना अनुशासन भी सबमें नहीं होता।

तो कुछ तो तुम कर ही रहे हो जब तुम कह रहे होते हो कि, "हम अपनी बात का अनुसरण कर रहे हैं, हम अपने विचार पर अटल रहेंगे", पर तुम गड़बड़ कर रहे हो; तुम अटल तो रहना चाह रहे हो, पर ग़लत जगह पर। तुम यह तो कह रहे हो कि, "मेरी प्रतिज्ञा अब नहीं टूट सकती"—तुम ग़लत चीज़ को टूटने से बचा रहे हो, तुम किसी व्यक्तिगत चीज़ को टूटने से बचा रहे हो। तुम उसको टूटने से बचा रहे हो जिसको कबका टूट जाना चाहिए था, टूटना जिसकी प्रकृति है और जो पल-प्रतिपल टूट ही रहा है, और जिसको तुम जितना टूटने से बचाओगे, उतना ज़्यादा नुकसान होगा।

तो तीन कोटियाँ हो गई लोगों की। एक वो जो सत्य को तो नहीं ही जानते, जो सत्य पर तो नहीं ही अटल रह सकते, अपितु वो इतने दुर्बल हैं कि वो अपने व्यक्तिगत वचन पर भी अटल नहीं रह सकते; वो किसी भी चीज़ पर अटल नहीं रह सकते। सत्य पर इसलिए अटल नहीं रह सकते क्योंकि सत्य से दूर-दूर तक उनको कोई लेना-देना नहीं और अपनी बात पर इसलिए अटल नहीं रह सकते क्योंकि ख़ुद संवेगों के, वृत्तियों के ग़ुलाम हैं – एक लहर आयी, एक बात बोल दी, दूसरी लहर आएगी, दूसरी बात बोल देंगे, यह अटलता क्या होती है? उनके जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं, शाश्वत नहीं, स्थिर नहीं। ये निम्नतम कोटि के लोग हैं।

इनसे ऊपर आते हैं भीष्म जैसे लोग, जो कहते हैं, "अब बोल दिया है तो बोल दिया, अब निभाएँगे। अब बीड़ा उठाया है, अब संकल्प किया है, अब प्रण धरा है। अब कुछ तो है जो नहीं बदलेगा।" ये धर्म का पालन कर रहे हैं अपनी दृष्टि में। इनसे पूछो, “तुम कैसे हो?” तो ये कहेंगे, “बड़े धार्मिक।”

वास्तव में समाज भी इनकी बड़ी पूजा करता है और इनको धार्मिक ही कहकर इनकी पूजा करता है। इनका उदाहरण दिया जाता है, इनको आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लोग कहते हैं कि प्रण कोई निभाए तो भीष्म जैसा। किसी की अटल प्रतिज्ञा को नाम दिया जाता है 'भीष्म प्रतिज्ञा'। जिसकी प्रतिज्ञा का भरोसा हो, उसकी प्रतिज्ञा को तुम कहते हो 'भीष्म प्रतिज्ञा'। ये मध्यम कोटि के लोग हैं। ये निभा तो रहे हैं, पर ग़लत चीज़ निभा रहे हैं। ये अपनी ही बात निभाए जा रहे हैं।

कभी किसी को बोल आए थे कि उम्र भर तुम्हारा साथ देंगे, तो अब निभाए जा रहे हैं, और देख नहीं रहे हैं कि इस निभाने में कोई निःस्वार्थता नहीं, बड़ा अहंकार है। हाँ, तुमको लग यह रहा है कि “देखो, साहब, हमारा रोज़ नुकसान हो रहा है फलाने का साथ देने में, लेकिन हम निभा रहे हैं न। हम देखो कितने निःस्वार्थ भाव से निभाते हैं।”

नहीं, नहीं, नहीं, यह तुम अपना ही अहंकार निभा रहे हो, तुम कह रहे हो, "हमारा दिया हुआ वचन है, तोड़ कैसे देंगे? वरना झूठा कौन कहलाएगा? हम। और हमारे नाम पर बट्टा कैसे लग सकता है?" ये भीष्म हैं। तुमने जो वचन दिया, तुमने जो प्रतिज्ञा करी, वो तुमने कोई धर्म के लिए थोड़े ही की, वो तुमने कोई सत्य के लिए थोड़े ही की!

धृतराष्ट्र को यदि पुत्र मोह था और उस कारण विपदा टूटी, तो भीष्म को पितृ मोह था। पुत्र मोह की तो हम खूब भर्त्सना कर देते हैं कि पुत्र मोह में धृतराष्ट्र और अंधे हो गए, और अगर किसी को पितृ मोह हो तो उसकी भर्त्सना क्यों न की जाए? धृतराष्ट्र का मोह तो बहुत बाद में आया, धृतराष्ट्र से बहुत पहले अगर कोई अतिशय मोहग्रस्त है, तो वो भीष्म हैं।

घटना क्या घट रही है, देखो तो ज़रा। पिता शादीशुदा हैं, पहली पत्नी अब छोड़कर जा चुकी है। आयु खूब हो चुकी है पिता की। गंगादत्त अर्थात् भीष्म जवान लड़का है, विवाह योग्य। अगर लड़का जवान है, विवाह योग्य है, तो पिता की क्या उम्र होगी? सन्यास योग्य। और ये पिता जाते हैं गंगा किनारे जिनको मछुआरिन दिख जाती है, जिसके शरीर से कहते हैं कि ख़ुशबू की लपटें उठती थी, और ये आसक्त हो जाते हैं, जैसे कोई छोटा बच्चा झुनझुना माँगे। और फिर वह स्त्री और उसका पिता शर्तें रखते हैं। वो देखते हैं कि राजा पकड़ में आ गया है, चंगुल में आ गया है, इसकी लार चू रही है, अब इससे कुछ भी ऐंठा जा सकता है। और वो जमकर ऐंठते हैं दोनों, बाप और बेटी।

यह तुम देख रहे हो कि खेल क्या चल रहा है? और भीष्म इस खेल में साझीदार हो रहे हैं। और वो बाप-बेटी कह रहे हैं, "देखिए, साहब, बेटी का विवाह तो मैं आपके साथ कर दूँगा, लेकिन यह खड़ा हुआ है आपका मुश्टण्डा लड़का, राज्य का अधिकारी तो यह बनेगा न?"

तो अब भीष्म पितृ मोह में यह क़सम उठाते हैं, कहते हैं कि "भाई, मैं नहीं लूँगा राज्य। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं कभी स्वयं सिंहासनारूढ़ नहीं होऊँगा।"

चलो, ठीक है। उस लड़की का बाप अभी भी काहे को माने? वह कहता है कि "देखिए, आप नहीं होंगे तो आपकी संतानें होंगी। वैसे भी आप भी अब बच्चा पैदा करने की उम्र में हैं। कौन जाने पिता से पहले आप ही पिता बन जाएँ?" भाई, पिता सत्यवती को घर ले जा रहे हैं, अब उनकी भी संतानें होंगी और भीष्म भी संतान पैदा करने की उम्र में हैं, कौन जाने कि किसको संतान पहले हो जाए। तो यह भी तो संभव है कि भीष्म ने तो सिंहासन का त्याग कर रखा है, पर भीष्म का जो लड़का है, वह सत्यवती के लड़के से ज़्यादा उम्र का है, तो फिर तो संभावना बनेगी न कि सिंहासन अभी भी भीष्म को नहीं मिला तो भीष्म के लड़के को मिल गया।

बाप महा-चतुर था वो। बोलता है कि, "इतने से नहीं चलेगा, यह लड़के वाली बात तो अभी भी अटक रही है।" भीष्म अपने विकल बाप की शक्ल देखते हैं। उन्होंने लार चुआ-चुआकर ज़मीन गीली कर दी है। जो हुआ था, वह तुमको साक्षात बता रहा हूँ। और क्या घटना घट रही है? एक जवान आदमी काहे को प्रतिज्ञा करेगा कि, "मैं अब विवाह नहीं करूँगा"? बाप की ज़रूर बड़ी दयनीय हालत हो रखी होगी। कहा न, जैसे छोटा बच्चा ज़मीन पर गिर करके लोटे और ज़मीन पर मुट्ठियाँ पटके कि, "मुझे तो झुनझुना चाहिए!" वैसे ही वो सत्यवती को निहारते जा रहे हैं, देखते जा रहे हैं और ज़मीन पर लोटते जा रहे हैं वहीं गंगा तट पर, और मुट्ठियाँ भींचकर पटकते जा रहे हैं कि "मुझे तो जे चाहिए।"

अब ऐसे बाप के लिए भीष्म अब एक और प्रतिज्ञा करते हैं कि, "मैं अब आजन्म कुँवारा रहूँगा।" काहे को कर रहे हो प्रतिज्ञा? यह बाप सठिआया हुआ है, पागल है। इसे कामुकता नहीं है, इसे काम का रोग लग गया है, यह विक्षिप्त है। और यह कोई हल्का-फुल्का कामुक आदमी नहीं है, गंगा के साथ इसने आठ पुत्र पैदा किए थे। आठ बच्चे पैदा करने के बाद भी इसकी यह हालत है कि अभी भी गंगा किनारे खड़ा हुआ है और कह रहा है, “एक और चाहिए, एक और चाहिए।”

देख रहा है कि योग्य और जवान बेटा अपने जीवन में आग लगाए दे रहा है और तब भी वह थम नहीं रहा, रो नहीं पड़ रहा, बेटे के सामने झुक नहीं रहा, बेटे का बाज़ू पकड़कर उसे दूर नहीं ले जा रहा कि “ना, ना, बेटा, अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए मैं तुम्हारा जीवन नहीं बर्बाद होने दूँगा।” वह यह सब कुछ नहीं कर रहा। भीष्म प्रतिज्ञा लिये जा रहे हैं और राजा शांतनु प्रसन्न ही हो रहे होंगे कि, "अच्छा है, अब तो मिलेगी मछुआरिन, बड़ी ख़ुशबू आती है!"

कुछ बात रही होगी सत्यवती में। शांतनु पहले नहीं थे, उनसे पहले एक दूसरे भी ऋषि थे, वो भी ऐसे ही आसक्त हो चुके थे, लोलुप हो चुके थे – ऋषि पराशर। तो दूसरे नंबर के ये। और कौन जाने दूसरे, चौथे, पाँचवे, आठवें, कौन-से नंबर के थे!

बात इसकी है कि विषय ऐसा था कि लोलुपता संभव थी। तुम बाप की ख़ातिर ऐसे-ऐसे प्रण उठा रहे हो, तुम्हें राज्य का ज़रा भी ख़्याल नहीं आया? अगर दूसरों को आँकना जानते हो, तो अपनी भी सामर्थ्य जानते हो न? जानते हो भलीभाँति कि पूरे भारत में यश है तुम्हारा, सब तुम्हारे शौर्य की और विद्वत्ता की तारीफ़ें करते हैं। तुम भलीभाँति जानते हो कि राज्य संभालने के लिए तुम सुयोग्य हो, तो तुमने क्यों अपने क़दम पीछे खींचे? किस ख़ातिर, कि पिता की कामवासना पूरी हो सके?

बाप यही काम बेटे के लिए करे तो तुम कहोगे कि बाप बड़ा विधर्मी था, और बेटा यही काम बाप कि लिए करे तो बेटा सुयोग्य हो गया? और भीष्म ने सदा दूसरों की वासनाएँ पूरी करने का अभिशाप भुगता। एक तरफ़ पिता, उसके बाद फिर गए, अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका को उठा लाए। जानते हो न कहानी?

उन तीन बहनों को उठा लाए कि इनकी शादी करा दूँगा। तुम्हें क्या पड़ी है दूसरों की शादियाँ कराने की? उनमें से एक बोली कि "मुझे तो किसी और से प्रेम है। आप मुझे यूँ ही जबरन लिये चले जा रहे हैं। यह अपहरण है।" तो बोले, "अच्छा, ठीक है। तुझे छोड़ता हूँ, तू जा।"

जब वो लौटकर गई तो जिस राजा से उसको प्रेम था, उसने अस्वीकार कर दिया। वो बोला, "तुझे तो अब कोई हर ले गया। मैं नहीं छूऊँगा तुझे।" अब उसने आत्महत्या ही कर ली। अब आत्महत्या करते हुए बोली कि, "इस भीष्म की वजह से कर रही हूँ, इसको छोड़ूँगी नहीं।" फिर कहानी कहती है कि वो अगले जन्म में शिखंडी बनकर आयी और बदला उसने अपना निकाला।

कर्तव्य यूँ ही है, व्यावहारिक, काम चलाऊ। धर्मों का स्थान नहीं ले सकते, धर्म का विकल्प नहीं है कर्तव्य। और हम कर्तव्यों पर ही चलते जाते हैं, चलते ही जाते हैं; परिवार के प्रति यह कर्तव्य है, बाप के प्रति यह है, बेटे के प्रति यह है, पति के प्रति यह है, पत्नी के प्रति यह है, और नतीजे में फिर महाभारत पाते हैं, महाविनाश!

और मैं तुमसे साफ़ कहे दे रहा हूँ, जो भी कोई धर्म से ज़्यादा कीमत देगा कर्तव्य को, उसे महाभारत झेलनी ही पड़ेगी। और महाभारत का मतलब यह नहीं कि लाखों-करोड़ों मर रहे हों तो ही महाभारत है। तुम्हारे भीतर जो मार-काट मची हुई है, जो प्रतिपल द्वंद मचा हुआ है, उसी का नाम महाभारत है। कृष्ण तो होते ही हैं भीतर, कृष्ण के ख़िलाफ़ जो तुमने इतनी बड़ी सेना खड़ी कर रखी है अपने भीतर, उसी का नाम महाभारत है।

झूठे कर्तव्यों से ही पैदा होती है महाभारत। महाभारत के जितने पात्र हैं, सब अपनी-अपनी दृष्टि में अपने व्यक्तिगत धर्म अर्थात् हीन धर्म, अर्थात् कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। और उन्हें इस बात से ज़रा मतलब नहीं कि सत्य क्या है, वास्तविक धर्म क्या है।

कोई कह रहा है कि, "मैं क्षत्रिय हूँ तो मैं क्षत्रिय धर्म का पालन करूँगा।" अरे भाई, क्षत्रिय धर्म क्या होता है! क्षत्रिय संस्कार हो सकते हैं, क्षत्रिय धर्म तो नहीं हो सकता। धर्म तो एक होता है – सत्य की ओर अनवरत बढ़ते रहना ही धर्म है। पर शब्दों का बड़ा दुरुपयोग होता है। कोई कहता है कि, "मुझे अपने पति धर्म का पालन करना है, पुत्र धर्म का पालन करना है।" पुत्रधर्म क्या होता है? पुत्र के कर्तव्य होते हैं, और वो सब कर्तव्य समाज ने सिखाए हैं। पुत्र होने का धर्म से कोई लेना-देना ही नहीं होता। धर्म की दृष्टि में तुम जीव भर हो, पुत्र इत्यादि कुछ नहीं होते।

धर्म की दृष्टि में सब जीव हैं, जीव। हाँ, समाज की दृष्टि में तुम कभी पुत्र हो, कभी पिता हो, कभी राजा हो, कभी क्षत्रिय हो, कभी विद्वान हो, कभी अमीर हो, कभी गरीब हो, ये सारी तुम्हारी पहचानें तुम्हें समाज ने दी हैं। अध्यात्म की दृष्टि में तुम जीवमात्र हो और तुम्हारा एक ही धर्म है – मुक्ति, मुक्ति, मुक्ति, मुक्ति।

अंतर समझ लेना — अध्यात्म सिखाता है मुक्ति, और समाज कर्तव्य देकर लगातार और बाँधे रहता है तुमको। वह तुमसे कहता है कि, "तुम पति हो, अब इन कर्तव्यों का पालन करते जाओ, करते जाओ, करते जाओ।" और अगर बुरा लगे कि, "क्यों मैं कर्तव्यों की चक्की में पिसे जा रहा हूँ!" तो अपने-आपको समझा लो कि, "यही तो धर्म है मेरा।"

न पति हो तुम, न पत्नी हो; जीव हो तुम, इंसान हो। न पिता हो तुम, न पुत्री हो। जीव होना ही अपने-आपमें बहुत बड़ा बंधन है, तुम और बंधन क्यों लादना चाहते हो अपने ऊपर? जब मैं कह रहा हूँ कि जीव हो तुम और अध्यात्म तुम्हें ले जाता है मुक्ति की ओर, तो अध्यात्म तुम्हें किससे मुक्त करता है? जीव भाव से, जीव वृत्ति से।

जीव हो, यह पहचान तो तुम लेकर पैदा ही हुए थे, अब तुमने उसके ऊपर दस पहचानें और डाल दीं — बेटे बन गए, बीवी बन गए, बाप बन गए, पड़ोसी बन गए, भाई बन गए, राजा बन गए, ब्राह्मण, क्षत्रिय, कुछ बन गए। जैसे कोई एक हथकड़ी लेकर पैदा हुआ हो और उसको वह एक नाकाफ़ी लगती हो, और वह दस हथकड़ियाँ और पहन ले। फिर उन हथकड़ियों को बजा-बजाकर गाए कि, "मैं अपने धर्म का पालन कर रहा हूँ", और आस-पास के लोग उसको तारीफ़ें दें कि “वाह! क्या मधुर संगीत उठता है जब तू अपनी हथकड़ियाँ बजाता है!”

अध्यात्म तुमसे कहता है कि सर्वप्रथम तो तुम अपनी सामाजिक पहचानों से बाज आओ। जो अपनी सामाजिक पहचान छोड़ने को तैयार हो, जो अपने-आपको जीवमात्र देखता हो, वो अध्यात्म की ओर आए। और फिर अध्यात्म उसको जीवभाव से भी मुक्ति प्रदान करता है।

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