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भगवान और भगवान में अंतर होता है || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: भगवान हैं या नहीं हैं?

आचार्य प्रशान्त: मन को ही सुलझा लेने का नाम भगवान है। फ़िल्म आयी थी न, उसमें बोलता है, 'अपुनिच(मैं ही) भगवान है। कभी-कभी अपुन को लगता है, अपुनिच भगवान है।' तो भगवान अगर तुम्हारी कहानी का एक किरदार है तो फिर तुम ही भगवान हो भैया! क्योंकि वो कहानी तुम्हीं ने रची है। या चलो तुमने नहीं रची है तो उस कहानी में भरोसा करने वाले तो तुम्हीं तो फिर अपुनिच भगवान है। नास्तिक वो नहीं है जो भगवान को नहीं मानता। नास्तिक वो है जो नकली भगवान को मानता है। और आस्तिक कौन है? जो असली भगवान को जानता है।

प्र: बचपन से ही हम भी जब मन्दिर जाते थे, तो बचपन से यही बताया जाता था कि भगवान जी से जो माँगना है अच्छा सा, वो जाकर के आप माँग लो।

आचार्य: इससे ग़लत कोई धर्म का और मन्दिर का दुरुपयोग हो नहीं सकता। बहुत बहुत बुरा दुरुपयोग है, बहुत बुरा दुरूपयोग है। मनोकामनाओं की पूर्ति नहीं, मनोकामनाओं से मुक्ति; ये धर्म होता है। मैं दो रूपया छोड़ने को तैयार नहीं हूँ ज़िन्दगी में। और ये सामने खड़े हुए हैं। इन्होंने एक अयोध्या का राज्य और लंका का सोना, दोनो छोड़ दिया। ये याद आना चाहिए न मूर्ति के सामने! मूर्ति का उद्देश्य ये होता है कि आपको आपकी हीनता याद दिलाए और साथ ही साथ ये भी याद दिलाए कि हीन रहे आना आपकी अनिवार्य नियति नहीं है।

प्र: आचार्य जी, आजकल भूत प्रेतों का बहुत ज़ोर है। धर्म का जैसे मतलब ही बन गया है भूत-प्रेत। और जो भूत-प्रेत विशेषज्ञ बाबा लोग है या यू ट्यूबर्स हैं, वो सुपर पॉपुलर हो रहे हैं। तो ऐसे में लोगों के सामने या लोगों को जब हम समझाते हैं कि भूत-प्रेत अन्धविश्वास है तो हमारे सामने एक बड़ा ख़ास तर्क आता है कि अगर भूत नहीं है तो फिर भगवान भी नहीं है और अगर भगवान है तो भूत भी है। तो लोगों ने भूतों और भगवान का सम्बन्ध आपस में जोड़ दिया है। तो हम आज आपसे इसी बारे में चर्चा करना चाहते हैं।

प्र२: आचार्य जी, पहले तो हम ये समझना चाहते हैं कि भगवान है क्या? फिर इसके बाद हम आपसे ये सवाल रखेंगे कि भगवान और भूतों में क्या रिश्ता है?

आचार्य: बहुत लंबा-चौड़ा टॉपिक उठा लिया है चर्चा के लिए। तो बात अगर पूरी समझनी हो तो ध्यान और धीरज दोनों होना चाहिए। पूरी दुनिया की हमें यात्रा करनी पड़ेगी अगर हमें समझना है कि भगवान क्या है। फिर भूत की बात तुम बाद में कर लेना, तुम्हारा मन होगा तो।

तो हमारी शुरुआत होती है हमसे ही। है न? हम माने ‘मन’। इंसान का जो मन होता है न, वो अपनेआप को लेकर के सन्तुष्ट नहीं होता, तो मैं आपको, दुनिया में आपको कोई बिरला ही आदमी मिलेगा, जो अपनेआप से ख़ुश होगा पूरी तरह। जो कहेगा पूर्ण हूँ, सन्तुष्ट हूँ, तृप्त हूँ, ऐसा मिलेगा नहीं। तो कोई कमी लगती रहती है। ऐसा लगता है, कोई ऐसी चीज़ है जो अभी पता नहीं है। और मन को किसी बहुत बड़ी वस्तु की तलाश रहती है, तो वो खोजता रहता है कि सबसे बड़ी चीज़ क्या है दुनिया में कि सबसे बड़ा क्या होता है? जो सबसे बड़ी चीज़ मिल जाए, मैं उसको ही पा लूँ। उसके साथ बिलकुल एक हो जाऊँ और उस चीज़ को अपने घर ले आऊँ।

तो ये इंसान के मन की हालत होती है और धर्म की, भगवान की शुरुआत यहीं से होती है। कहाँ से होती है? मन की हमारी जो हालत है। इंसान के मन की हालत कुछ ठीक होती नहीं है जन्म से ही। तो हमारा मन है, वो ख़ुद से — हमने कहा — सन्तुष्ट नहीं है और वो कुछ खोज रहा है। भगवान तक पहुँचना चाहते हो तो मन से शुरुआत करनी पड़ेगी, वो हमने कराया। तुम्हारा मन है, वो कुछ खोज रहा है, सन्तुष्ट हैं नहीं, तो अब वो क्या करे? अब उसके पास दो विकल्प होते हैं — दो रास्ते। और ये दो रास्ते नहीं होते है, ये दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। ये दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। इनको अच्छे से समझना क्योंकि ये जो दो तरह के लोग होते हैं, इससे हमें पता चलेगा कि दो तरह के भगवान होते हैं। आगे दो तरह के भगवान आने वाले हैं।

तो एक तरह के लोग वो होते हैं जो कहते हैं कि अरे, ये रही इतनी बड़ी दुनिया! हम पैदा होते है तो हमें अपनी आँखों से दुनिया ही दिखाई देती है न? इतनी बड़ी दुनिया ये रही! तो हम कहते हैं, मन को जो भी समस्या है, जो भी बेचैनी है, जो भी उसको चाहिए, वो इस दुनिया में ही कहीं-न-कहीं मिल जाएगा। इतनी बड़ी दुनिया है, इसमें भी नहीं मिलेगा क्या? मन जो कुछ माँग रहा होगा वो यहीं मिल जाता है और बच्चे को छोटा होता है उसका अनुभव भी ऐसा ही रहता है उसको बिस्कुट चाहिए, कहाँ मिल जाता है? घर में मिल जाता है। घर में नहीं मिलता तो दुकान में मिल जाता है। तो दुनिया में ही मिल जाती है उसको चीज़, जो चाहिए।

उसको माँ नहीं दिखाई दे रही है तो माँ को खोजता है, माँ कहाँ मिलेगी? घर में एक कमरे में होगी, नहीं तो दूसरे कमरे में होगी, नहीं पड़ोस के घर में होगी, नहीं तो रिश्तेदारी में कहीं गयी होगी, दूसरे शहर चली गयी होगी। बहुत हो गया तो कुछ दिनों के लिए किसी दूसरे देश चली गयी होगी। लेकिन जो चीज़ उस बच्चे को चाहिए वो है तो इसी दुनिया में ही न! है न? माँ कहाँ है? इसी दुनिया में। बिस्कुट भी कहाँ है? इस दुनिया में। तो ये पहले तरीक़े के लोग होते हैं। और यही लोग ज़्यादा होते हैं। इन्हें लगता है कि इनके मन को जो चीज़ चाहिए वो निश्चित रूप से इसी दुनिया में ही कहीं-न-कहीं है और वो ऐसा सोच रहे होते है तो उनके पास इसका कुछ कारण भी है क्योंकि उनके अनुभव ने उनको बार-बार बताया है कि जो भी कुछ किसी भी इन्सान को कभी भी मिला है वो कहाँ मिला है?

प्र: दुनिया में।

आचार्य: दुनिया में ही मिला है तो कहते है, भाई दुनिया में ही होगा। तुम्हारी कोई चीज़ खोई है कभी जो दुनिया माने संसार, माने जगत, माने ब्रह्मांड के अलावा भी कहीं मिली हो? कुछ हुआ है? कभी कुछ खोया तुम्हारा? ये कोट खो जाए तुम्हारा, तुम कहाँ खोजने जाओगे? एक कमरे में खोजोगे, अलमारी के नीचे खोजोगे, जाकर देखोगे उन्होंने अपने सूटकेस में तो नहीं छुपा लिया। माने कहीं-न-कहीं इसी दुनिया में ही कहीं होगा। तुम्हारा भी कुछ खो जाए दुनिया में। तो उनके पास कारण है कि वो कहते हैं कि हमारा जो कुछ भी खोया हुआ है या जो हमें चीज़ चाहिए। जिस ऊँची-से-ऊँची चीज़ की मन को तलाश है, वो इस दुनिया में ही होगी।

ये एक तरह के लोग होते हैं और उन्होंने कहा यही तादाद में बहुत ज़्यादा हैं। ऐसे समझ लो ये निन्यानबे-प्रतिशत लोग हैं दुनिया के। जिनको जो चाहिए, उनको लगता है कि दुनिया में ही मिलेगा। तो उनकोअगर भगवान भी चाहिएऔर भगवान माने क्या? वो आख़िरी चीज़ जो हमें चाहिए। वो जो सबसे ऊँचा है। वो जो सारी इच्छाओं की पूर्ति कर देता है, उसको बोलते हैं भगवान। तो हमें अगर भगवान भी अपना चाहिए तो हमें लगता है भगवान का भी नाता इस दुनिया से ही है। ये भगवान भी कहीं-न-कहीं दुनिया में ही होगा। समझ में आ रही है बात?

हमें जैसे सारी चीज़े, लगता है कि दुनिया में ही होती है तो हमें लगता है कि वो जो आख़िरी चीज़ हम सबको चाहिए, वो जो मन जिसको माँगता है, कहता है कि वो जो सब चीज़ों से ऊँची चीज़ है उसको बोलते है भगवान। है न! भगवान की यही परिभाषा है न? वो जो सबसे ऊँचा है। वो जो सारी कामनाओं की पूर्ति कर देता है। माने सब कामनाओं से भी ऊँची जो कामना है उसका नाम भगवान। माने वो कामना पूरी हो जाए जिस कामना का नाम भगवान है, वो कामना अगर पूरी हो गयी तो बाक़ीसारी कामनाएँ पूरी हो जाती है। तो हम कहते हैं सब कामनाएँ छोटी मोटी कहाँ पूरी हुई? संसार में। तो भगवान नाम की भी जो कामना है वो कहाँ पूरी होगी?

प्र: संसार में।

आचार्य: संसार में। तो ज़्यादातर लोगों ने, हमने कहा, निन्यानबे-प्रतिशत लोगों ने भगवान को दुनिया में कहीं बैठा दिया है। ये एक तरह के लोग होते हैं। ठीक है? अब बाक़ी सब चीज़ें तो दिखाई पड़ती है; कोई चीज़ हो दुनिया में तो कभी-न-कभी तो दिखेगी। खोयी भी पड़ी है तो खोजने पर कहीं-न-कहीं तो दिख ही जाती है। आप उसको हाथ से पकड़ लेते हो। पर्वत की कोई चोटी, उस तक आज तक कोई नहीं पहुँचा था लेकिन फिर भी कोई-न-कोई ,कभी-न-कभी पहुँच ही जाएगा। कोई भी चीज़ दुनिया में खोयी हुई कभी-न-कभी तो मिल जाती है। आज नहीं मिली तो सात सौ साल बाद मिल जाती है।

अब भगवान तो दुनिया में हैं लेकिन कहीं दिखाई पड़ते नहीं । लेकिन मेरा कहना ये है कि भगवान है तो दुनिया में ही कहीं और दुनिया में दिखाई पड़ते नहीं तो फिर मैं कह देता हूँ इस दुनिया के पार भी एक दुनिया है, भगवान वहाँ रहते हैं इसलिए दिखाई नहीं पड़ते। तो दुनिया के सब धर्मों ने क्या करा? कि उन्होंने एक परलोक बना दिया या इस लोक से पार कोई और लोक बना दिया और कह दिया, भगवान वहाँ रहते हैं । कुल मिलाकर के उनका आग्रह यही था कि भगवान हैं तो कोई ऐसी चीज़ जो हैं तो किसी-न-किसी दुनिया में। इस दुनिया में नहीं तो किसी और दुनिया में। तो ये पहले तरह के लोग हैं और इनका पहली तरह का भगवान हो गया। ये कौन-से तरीक़े के लोग हैं? जिन्हें जो चाहिए, इनको लगता है कहाँ मिलेगा?

प्र: दुनिया में।

आचार्य: दुनिया में ही मिलेगा। तो फिर इनका जो भगवान भी है वो कहाँ पाया जाता है? दुनिया में ही कहीं पाया जाता है। तो दुनिया में आज तक जितने भी धर्म हुए हैं, मान्यताएँ हुई हैं, विश्वास हुए हैं, समुदाय, संप्रदाय हुए हैं, पन्थ हुए हैं उनमें भी निन्यानबे-प्रतिशत सब ऐसे रहे हैं जिन्होंने अपना भगवान कहीं-न-कहीं बाहर बैठा दिया। भारत में, अफ्रीका में, अमेरिका में, यूरोप में, जापान में, जहाँ-जहाँ मनुष्य की चेतना ने थोड़ी आँखें खोलीं, चाहे वो मसोपोटामिया हो,चाहे वो मिस्त्र हो, चाहे वो चीन हो, भारत हो, वहाँ-वहाँ आप पाते हो कि शुरुआत ऐसे ही हुई कि भगवान को क्या किया गया? बाहर कहीं बैठा दिया गया। यही माना गया। तो निन्यानबे-प्रतिशत जो पन्थ और धाराएँ और धार्मिक मान्यताएँ शुरू हुई, उनमें भगवान को यही माना गया कि भगवान इस दुनिया से ही सम्बन्धित कुछ है और इस दुनिया में ही कहीं इधर-उधर बैठे हुए हैं, बाहर कहीं पर हैं और हम कह रहे हैं कि निन्यानबे-प्रतिशत लोग भी ऐसे ही होते हैं। तो जैसे हम होते हैं वैसे ही हमारे?

प्र: भगवान होते हैं।

आचार्य: भगवान होते हैं। बात समझ में आ रही है? हम जैसे होते हैं हमारे भगवान भी वैसे ही होते है। अगर हमें ये लगता है कि दुनिया ही आख़िरी है और दुनिया ही सच है तो हमारे भगवान भी फिर दुनिया में ही कहीं-न-कहीं बैठे होते हैं। दुनिया से ही रिलेटेड (सम्बन्धित ) कुछ काम कर रहे होते हैं। तो आप पाओगे कि धार्मिक किताब है उसमें लिखा है कि वो भगवान थे, दुनिया में फ़लानी जगह पर उतरे और फिर उस जगह को बड़ा पूजनीय मान लिया जाता है। ठीक है? अब वो जगह अरब में भी कहीं पर हो सकती है, वो जगह ग्रीस में कहीं पर हो सकती है। समझ रही हैं बात? वो जगह जेरुसलम हो सकती है, नज़रत हो सकती है, वो जगह कोई भी हो सकती है। वो जगह भारत में भी कोई जगह हो सकती है। लेकिन कुल मिलाकर के है वो कोई जगह ही और सब जगह कहाँ होती है?

प्र: दुनिया में।

आचार्य: दुनिया में। तो चूँकि भगवान दुनिया में हैं तो भगवान का सम्बन्ध भी हम दुनिया से जोड़ देते हैं। हम कहते हैं वो भगवान हैं और वो दुनिया से उसका सम्बन्ध है तो फ़लानी जगह है। वो खास जगह हो गयी। उसको हम तीर्थ बोल देते हैं। वो जो तीर्थ है वो कुछ भी हो सकता है। वो कोई जंगल हो सकता है, वो कोई रेगिस्तान भी हो सकता है। वो किसी पहाड़ की चोटी हो सकती है। वो समुंदर की कोई जगह हो सकती है। वो कोई एकदम बंजर स्थल हो सकता है और वो कोई नदी भी हो सकती है। लेकिन इन सब में साझी बात क्या है? चाहे वो समुंदर हो, चाहे पहाड़ की चोटी हो, चाहे नदी हो, चाहे जंगल हो, गुफा हो, इन सब में साझी बात क्या है? ये सब क्या हैं? दुनिया की जगहें हैं तो इन दुनिया की जगहों से हम किसका रिश्ता जोड़ रहे हैं? भगवान का। तो ले देके हम यही कह रहे हैं कि भगवान कोई ऐसी चीज़ है जिसका बाहर कहीं कोई अस्तित्व है। ये दुनिया में पहले तरीक़े के लोग हैं। ये बहिर्गामी लोग है और इनकी कोई ग़लती नहीं क्योंकि हमें प्रकृति ने बनाया ही कैसा है?

प्र: बाहर देखने वाला

आचार्य: बाहर देखने वाला। बच्चा पैदा होता है उसकी आँख खुलती है। वो ऐसे देखता है, दुनिया दुनिया दुनिया। प्रकृति ने हमें बनाया ही बहिर्गामी है तो मजबूर हो के हम अपने भगवान की कल्पना भी कहीं बाहर ही कर लेते हैं। और ये दुनिया में, मैंने कहा निन्यानबे-प्रतिशत लोग भी ऐसे हैं और दुनिया में निन्यानबे-प्रतिशत धर्म और मान्यताएँ भी ऐसी ही हैं, जहाँ भगवान को बाहर की कोई चीज़ माना जाता है। और बाहर जब भगवान दिखाई नहीं देता तो क्या कल्पना करी जाती है, हमने कहा?

प्र: किसी औरलोक में।

आचार्य: कि है तो बाहर ही, बस हमें दिखाई नहीं दे रहा तो किसी और लोक में है। या कि बाहर है, इसी लोक में है पर अदृश्य है। तुम कहते हो, है और अदृश्य है। है तो इधर ही इधर, इधर ही है। घर के अन्दर उधर कहीं घूम रहा है, वहाँ बैठा है लेकिन अदृश्य है। समझ में आ रही है बात? तो ये पहले तरीक़े के लोग हुए और ये उनका पहले तरीक़े का भगवान हुआ। फिर दूसरे तरीक़े के लोग होते हैं, वो बहुत कम पाये जाते हैं। वो एक प्रतिशत क्या वो शून्य दशमलव शून्य एक प्रतिशत होते हैं वास्तव में। वो कहते हैं, ‘भाई साहब ये बताइए, तक़लीफ़ क्या है आपको?’ शुरुआत जरा तक़लीफ़ से करें, दवाई बाद में ढूँढ लेंगे। तक़लीफ़ ही नहीं पता तो कौन-सी दवाई ढूँढ लेंगे।

तो तक़लीफ़ का क्या नाम था? एकदम शुरू में हमने आज बात करी थी पाँच मिनट पहले? ‘मन’। तक़लीफ़ का क्या नाम था?

प्र: मन।

आचार्य: यही आदमी की तक़लीफ़ है जिसका नाम है — मन। तो कहते हैं कि मन की तक़लीफ़ है न और मन कह रहा है मुझे कोई ऐसी चीज़ दो जो सबसे बढ़िया, सबसे ऊँची हो। जिससे सब कामनाओं की पूर्ति हो जाती हो। जिसको पाना जीवन का सर्वोत्तम, सर्वोच्च लक्ष्य हो। मन यही तो कह रहा है। अरे, मन ही तक़लीफ़ में हैं तो फिर सबसे ऊँची चीज़ मन के लिए क्या हो सकती है? 'मन की तक़लीफ़ का दूर हो जाना।' ये तो एकदम सीधी बात हो गयी। कि अरे हाँ! ये बात तो सीधी है। सीधी है लेकिन ज़्यादातर लोगों को सूझती नहीं है ये बात। कहते हैं कि मन जब तक़लीफ़ में है तो मन के लिए सर्वोत्तम, सर्वोच्च, परम क्या हो सकता है? यही कि मन ही ठीक हो जाए।

मन ही ठीक हो जाए। तो ये लोग फिर बाहर दौड़ नहीं लगाते। ये कहते है कि तक़लीफ़ तो मन में है न, तो बाहर दौड़ लगा के क्या मिलेगा? तक़लीफ़ भीतर है, मैं बाहर क्या ढूँढने जा रहा हूँ। जैसे संतो ने कहा न, 'मोको कहाँ ढूँढ़े रे बंदे मैं तो …' वही बात है वो, ‘मैं तो तेरे पास’ माने क्या? जो इलाज है, जो समाधान है वो तक़लीफ़ के बिलकुल पास ही है। तुम कहाँ इधर-उधर ढूँढ रहे दुनिया भर में जाकर। तो कहते हैं मन की तक़लीफ़ ये है कि मन बेचैन है तो जो ऊँची-से-ऊँची चीज़ है उसका नाम ही हमने भगवान रखा है न! तो जो ऊँची-से-ऊँची चीज़ है, इस बेचैन मन केलिए वो तो चैन हुआ। बात कुछ है ठीक कि नहीं? अगर मन बेचैन है तो मन के लिए ऊँची-से-ऊँची चीज़ क्या हो गयी? चैन। और जो उच्चतम है उसी का हम क्या नाम देते हैं? भगवान। तो मन की शान्ति का नाम ही भगवान है फिर। लेकिन ये समझने वाले लोग दुनिया में बहुत बिरले हुए, बहुत कम हुए। जिन्हें ये बात समझ में आयी भगवान कहीं बाहर नहीं घूम रहे है किसी लोक में। भगवान किसी जगह पर नहीं बैठे है। भगवान का किसी भी समय से, जगह से कोई रिश्ता नहीं है।

भगवान तो मन की शान्ति का नाम है। तो मन की उस शान्ति को एक विशेष नाम दिया गया। जिन्होंने जाना, उन्होंने नाम दिया। बाक़ीलोगों को तो कोई मतलब ही नहीं। जिन्होंने जाना उन्होंने नाम दिया। उन्होंने कहा आत्मा है मन की शान्ति का नाम। आत्मा का क्या मतलब होता है? निर्मल मन को आत्मा बोलते हैं। शान्त मन को आत्मा बोलते हैं। समझदार मन को आत्मा बोलते हैं। आत्मा क्या है? तुम भीतर से ठीक हो गये बिलकुल, इस तुम्हारी स्थिति को आत्मा बोलते हैं। तो ये दूसरे क़िस्म का भगवान हुआ। उसका क्या नाम है? आत्मा। ये दूसरे तरह के लोग हुए और ये दूसरे तरह का भगवान हुआ। इस भगवान का नाम है — आत्मा। ठीक है?

अब ये जो दो तरह के लोग हैं, इनके दो अलग-अलग तरीक़े के भगवान हैं। इसमें भगवान और भगवान में बड़ा अन्तर होता है। ये बात सुनने में बड़ी अजीब लगेगी लेकिन समझना। भगवान और भगवान में बड़ा अन्तर होता है। एक भगवान वो है जो तुम्हारी चेतना की निपट ऊँचाई का नाम है। जो तुम्हारी चेतना के आकाश के बिलकुल साफ़ हो जाने का नाम है। जो तुम्हारे भीतर से बिलकुल बोधवान, बुद्ध-शुद्ध हो जाने का नाम है। एक भगवान वो है। और एक भगवान वो है जिसको तुम बाहर इधर-उधर जाकर के खोजते फिरते हो। कोई बोलता है, अरे वो मिट्टी के नीचे रहता है, कोई बोलता है, फ़लानी गुफा में रहता है, कोई बोलता है, वो फ़लाने आसमान में रहता है; कोई बोलता है, ‘फ़लाने वन में पाया जाता है कभी कभार’। ये सब चलता है। तो ये दो तरह के लोग हैं और इनके दो अलग-अलग तरीक़े के भगवान होते हैं। अब ये तुम जानो कि इसमें से असली भगवान किसको मानना है। समझ में आ रही है बात?

अगर भगवान तुमसे बाहर की कोई चीज़ है तो भगवान माने, तुम्हारी कल्पना और तुम्हारी कल्पना माने तुम्हारे भीतर किसकी कल्पना? तुम्हारे मन की। और ये सारी आज की बातचीत शुरू ही किससे हुई है कि मन बीमार है। अब मन बीमार है और यही मन अपनी बीमारी में एक बीमार कल्पना करता है और उस बीमार कल्पना में तमाम तरीक़े की चीज़ें हैं दुनिया में और उस कल्पना में एक चरित्र और है जिसका क्या नाम है? ‘भगवान’। तो उस भगवान से कोई लाभ होगा क्या? तो जो भगवान हमने बाहर बैठा दिया, समझाने वालों ने, ज्ञानियों ने, ऋषियों ने हमें ख़ूब समझाया — ये जो भगवान की तुम बाहर कल्पना करते रहते हो न, कि भगवान कोई व्यक्ति है जगत में। भगवान का भी अपना कोई व्यक्तित्व है। या भगवान कोई भी ऐसी चीज़ है जिसके बारे में सोचा जा सकता है या कोई कहानी कही जा सकती है। ये पागलपन है ऐसे कहना। दुनिया में तो यही सब पाये जाते हैं न? लोग पाये जाते हैं, जगहें पायी जाती हैं, चीज़ें पायी जाती हैं। कह रहे हैं, भगवान का नाता लोगो से क्यों जोड़े? भगवान को भी तुम क्यों एक व्यक्तित्वधारी बना रहे हो? भगवान को भी क्यों देहधारी बना रहे हो? भगवान का नाता तुम तमाम उन सब चीज़ों से क्यों जोड़ रहे हो जो सांसारिक है? भगवान को, तुम कह रहे हो कि एक देह है। कपड़े पहना रहे हो। भगवान को भी कह रहे हो, फिर भगवान ने ऐसा कहा। फिर भगवान यहाँ गये, ये क्यों कर रहे हो? ये सब करके तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा।

समझाने वालों ने ख़ूब समझाया, हज़ारों साल समझाया है, पर हमें समझ में नहीं आया है क्योंकि निन्यानबे-प्रतिशत लोगों की वृत्ति क्या होती है? किधर को देखने की? बाहर को। जब उन्हें सब कुछ बाहर ही बाहर देखना है तो उनको लगता है भगवान भी कहीं बाहर ही है, भगवान भी कहीं बाहर ही है और दूसरा भगवान होता है जो अपने भीतर होता है उस भगवान का क्या नाम होता है? आत्मा। ये जो भीतर वाला भगवान होता है जिसको हम कहते है, ‘आत्मा’।इस भगवान को जो जान लेता है, उसके मन को चैन मिल जाता है।समझ में आ रही हैं बातें?

तो भगवान वाला मुद्दा स्पष्ट है? इतनी आसानी से कैसे स्पष्ट हो गया है? किसी को स्पष्ट नहीं होता। हम कह रहे हैं, हज़ारों सालों से समझाने वालों ने समझाया है। लोगों को नहीं बात समझ में आयी है, आप लोग तो बहुत अपूर्व हो गये झट से समझ गये। बताइए क्या नहीं समझ में आया?

प्र: इसमें आचार्य जी, एक तो ये है कि अभी आपने कहा कि भगवान जो है, पहले जो निन्यानबे-प्रतिशत लोग जिन्हें भगवान मानते हैं, वो कल्पना है। तो मेरा एक सीधा सवाल है कि भगवान हैं या नहीं हैं?

आचार्य: मन है? मन न होता तो आप ये सवाल न पूछते। मन था और मन में कुछ खलबली मची, कुछ खुजली, कुछ बेचैनी हुई तभी तो आपने ये सवाल पूछा। तो मन है न? और मन बेचैन है तभी आपने ये सवाल पूछा। तो मन अगर बेचैन है तो मन को चैन चाहिए न? तो वो जो मन को चाहिए उसको होना पड़ेगा न? तो भगवान तो हैं और भगवान का फिर जो नाम है वो क्या है? मन का चैन। भगवान का नाम है, मन की शान्ति। मन की शान्ति। मन की शान्ति में मन की जो दौड़भाग होती है, जो उठा पटक होती है मन की, वो मिट जाती है। मन एकदम विश्राम में चला जाता है, ऐसे जैसे हो ही न। मन ऐसा हो जाता है जैसे अब हो ही न। तो उसको ऐसे भी फिर कहते हैं कि मन की विलुप्ति का नाम ही भगवान है। जिसके सामने मन नहीं रह जाता। जब मन की ऐसी स्थिति आ जाती है कि वो बिलकुल सुलझ गया, शान्त हो गया, मौन हो गया, चुप हो गया, मस्त हो गया बिलकुल। उसको कहते हैं ,भगवत्ता की स्थिति। आत्मस्थ हो गया मन। वही भगवत्ता की स्थिति है।

तो भगवान तो निश्चित रूप से हैं। हम हैं और हमारी बीमारियाँ हैं, हमारी बेचैनी है, हमारी कुलबुलाहट है, हमारा रोज़-रोज़ का शोक और कलह और क्लेश है तो भगवान को तो होना पड़ेगा न? क्योंकि अगर भगवान नहीं है तो बेचैनी है और चैन नहीं है। अगर भगवान नहीं है तो अशान्ति है और शान्ति नहीं है। अगर भगवान नहीं है तो उलझाव है और समाधान नहीं है। मन उलझा हुआ है। मन के समाधान का नाम ही भगवान है। मन अपनेआप में जैसे एक समस्या है। इस समस्या के समाधान का नाम ही भगवान है, तो भगवान तो हैं ही हैं निश्चित रूप से हैं। समझ में आ रही बात? लेकिन तुम इसी बीमार मन से कोई कल्पना करो, कोई कहानी बताओ, उसका नाम भगवान नहीं हो सकता। मन को ही सुलझा लेने का नाम भगवान है। मन को ही सुलझा लेने का नाम भगवान है। ये बात समझ में आ रही है सबको?

प्र: तो क्या आचार्य जी, हर व्यक्ति के लिए भगवान अलग-अलग होगा? जैसे हम देखते हैं समाज में, कोई शिव को पूज रहा है कोई कृष्ण को पूज रहा है या आप अगर पन्थों की बात करें तो जीजस को पूजा जा रहा है कहीं पर, कहीं पर महावीर जैन को पूजा जा रहा है। तो फिर ये अलग-अलग क्यों है?

आचार्य: क्योंकि सबकी समस्याएँ अलग-अलग हैं। समझ में आ रही हैं बात? तुम्हारी एक क़िस्म की समस्या है, इन की एक क़िस्म की समस्या है, उनकी एक क़िस्म की समस्या है क्योकि सब लोग अपनेआप को अलग-अलग मानते हो न? तो सबकी फिर समस्याएँ भी ऊपरी तौर पर अलग-अलग होती हैं। आप ये तो नहीं बोलते है कि आपका नाम रोहित है तो फिर जो रोहित की समस्या है वो आपकी समस्या नहीं होती है। आपकी अपनी समस्या है, उनकी अपनी समस्या है। ठीक है? तो समस्याएँ अलग अलग होती हैं लेकिन समाधान के बिंदु पर एक चीज़ साझी होती है न! तुम्हारी समस्याएँ थीं,वो समस्याएँ तुम्हारी थीं । उनकी समस्याएँ थीं, उनकी थीं। आपकी समस्याएँ थीं वो आपकी थीं लेकिन जब समाधान हो गया तो एक चीज़ तीनों में साझी आ गयी, क्या? अब समस्या?

प्र: नहीं रही।

आचार्य: नहीं है। अब समस्या नहीं है। तो समस्याएँ अलग-अलग होती हैं, समाधान तो एक ही होता है न। समस्या की स्थिति अलग-अलग होती है मन की, लेकिन समाधान की स्थिति में तो एक ही होता है। एक ही क्या? समाधान की स्थिति क्या है? कि अब कोई समस्या नहीं है, कोई समस्या नहीं है, तो इसीलिए वो जो आंतरिक भगवान है वो एक ही होता है। उसको आत्मा बोला गया है, वो अलग-अलग नहीं होती। सौ प्रकार की अलग-अलग आत्माएँ नहीं होती। आत्मा माने मन की शुद्धि। अशुद्धियाँ पचास तरह की होती हैं। शुद्धि तो एक ही तरह की होती है न! मान लो आसमान है, आप आसमान देख रहे हो, यहाँ बादल छाये हुए हैं। आप से पूछा जाए आपको क्या दिख रहा है तो आप कहोगे, गोभी के पकौड़े दिख रहे हैं और बादलों में ऐसा ही आकार आता है कई बार। आपसे पूछा जाए आपको क्या दिख रहा है? (दूसरे प्रश्नकर्ता की ओर संकेत करते हुए) तो आप कहोगे कि मुझे वहाँ चुड़ैल का चेहरा दिख रहा है। आपसे पूछा जाय, आपको वहाँ पर क्या दिखाई दे रहा है। तो आप कहोगे मुझे वहाँ पर जन्नत और हूर दिखाई दे रही है। ये सब आप तभी तक कह सकते हो न जब तक कि बादल हैं। जब बादल छंट गये तो क्या सबको कुछ अलग अलग दिखाई देगा? तब तो बस आकाश है, निरभ्र, साफ़। तो समाधान एक होता है। समस्याएँ अलग अलग तरीक़े की होती हैं। समाधान की स्थिति में तो सब एक हो जाते हैं। तो जो भगवान है वो एक ही है। वो जो आंतरिक भगवान है वो एक ही है। हाँ, लेकिन सबकी समस्याएँ अलग अलग हैं तो सब अलग अलग रास्तों से उस समाधान तक जाते हैं। लेकिन समाधान की स्थिति में सब कुछ एक है। तो वो एक ही भगवान है और वो भीतर बैठता है।

प्र: आचार्य जी, अभी आपने कहा कि भगवान बाहर नहीं है भीतर है। पर जब हम कहते हैं कि भगवान बाहर है तो तब कम-से-कम ये रहता है कि हमसे बड़ा कुछ है जो हमसे बाहर का है, हमारे भीतर नहीं है। लेकिन जब हम कहते है कि भगवान हमारे भीतर है तो हमने ख़ुद को ही, एक सम्भावना बन जाती है कि ख़ुद को ही सबसे बड़ा बता दिया और वहाँ पर फिर अहंकार को बहुत सहूलियत हो जाती है।

आचार्य: आपने जब कहा कि भगवान आप से बाहर है तो ये किसने कहा, आप ने कहा कि भगवान ने कहा? आपने कहा न? आप अगर बीमार हो, आप अगर बेहोश हो जो हमारी स्थिति होती है मानवता की पूरी। तो आप जो भी कुछ अपने से बाहर देख रहे हो वो कितना बड़ा हो सकता है? एक बेहोश आदमी, एक आदमी नशे में है वो आपसे आ के कहे कि मुझे अभी एक बहुत विशाल पहाड़ दिखाई दे रहा है। तो कितना विशाल है वो पहाड़? जितना गहरा उसका नशा है, तो जब आपकी ही हालत ख़राब है तो आप बाहर की किसी अपनी ही बात का कैसे भरोसा कर सकते हो? भूलिएगा नहीं कि बाहर भगवान है ये बात आपने ही कही है, किसी और ने नहीं कही है। और आपकी हालत ठीक नहीं है तो आपकी कही किसी भी बात का क्या भरोसा करना है आपको? उससे अच्छा ये है न कि अपनी हालत ठीक करो। हमारी ही जो बिलकुल साफ़ हालत है उसका नाम होता है भगवान। इंसान की ही जो सर्वोच्च सम्भावना है उसका नाम होता है भगवान।

प्र: तो आचार्य जी, जैसे भक्ति होती है तो भक्ति तो हमेशा दो लोगों के बीच ही होती है कि एक भक्त है और एक वो हैं जिनकी भक्ति हो रही है। और वो अक्सर आपसे बाहर ही होते हैं।

आचार्य: आपसे ‘अलग’ होने चाहिए। ‘बाहर’ मत बोलिए। ‘अलग।‘ हाँ, तो अलग तो होना ही चाहिए भक्ति के लिए। और भक्ति बहुत प्यारी, बहुत मीठी चीज़ है। भक्ति होती है, आपकी जो वर्तमान स्थिति है और जो आपकी सर्वोच्च सम्भावना है इन दोनों के बीच। निचली चीज़ कौन-सी है? जो मेरी वर्तमान स्थिति है वो बहुत ऐसी बेकार की स्थिति है। उसको बोलते हैं — भक्त। मैं जैसा हूँ, मैं ठीक नहीं हूँ। मैं जैसा हूँ मेरी उस हालत को बोलते हैं — भक्त। और मैं जैसा हो सकता हूँ अच्छे-से-अच्छा, ऊँचे-से-ऊँचा, शुद्ध-से-शुद्ध, उसको बोलते हैं — भगवान।

प्र: तो आचार्य जी, भक्ति में भगवान की कोई अहमियत है, कि भगवान किसी को मानेगा भक्त, उसके बाद आगे को बढ़ेगा?

आचार्य: ये भाव तो रखना ही पड़ेगा न कि मैं जैसा हूँ ऐसा ही रहे आना मेरी नियति नहीं है, मैं इससे बेहतर हो सकता हूँ और वो जो तुम बेहतर से बेहतर हो सकते हो, वही भगवान है। तो भक्ति का मतलब ये नहीं होता कि बाहर वाले किसी को पूजने लग गये। भक्ति का मतलब होता है, कहना कि मैं इस बात के प्रति समर्पित हूँ, भक्ति में समर्पण का बड़ा महत्व होता है न! भक्त माने जो समर्पण कर पाया। मैं इस बात के प्रति समर्पित हूँ, कि मैं अपनी सर्वश्रेष्ठ सम्भावना साकार कर सकता हूँ। इसको भक्ति बोलते हैं।

प्र: जिस तरीक़े से भगवान को देखा जाता है, आम जनमानस की अगर मैं बात करूँ तो, तो अगर उस तरीक़े से भगवान नहीं है और मात्र वो सिर्फ कल्पना है तो फिर, फिर ये संसार बनाया किसने?

आचार्य: आपकी मूल समस्या क्या है? आप बेचैन हो ये, या कि आप जानते नहीं हो कि संसार बनाया किसने, ये? थोड़ा सा इस बात पर ध्यान देना। संसार है, ये भी किसको दिख रहा है, अनुभव हो रहा है? आपको। ठीक है न? तो ‘संसार किसने बनाया’, ये प्रश्न पूछते हुए आप जिसके विषय में जिज्ञासा कर रहे हो वो चीज़ क्या है ये भी आपको कैसे पता? वो चीज़ है भी कि नहीं है आपको कैसे पता?

प्र: पर जैसे आपको दिखता है कि आपके सामने एक ग्लास है या आपके सामने एक माइक है, उसको किसी ने बनाया है तो उसी तरीक़े से फिर ये तर्क भी आता है कि ये जो कुछ भी है…

आचार्य: किसी ने बनाया होगा। आपने अभी थोड़ी देर पहले दो घंटे पहले एक माइक देखा था, चलिए आपने नहीं देखा था, मैंने देखा था। आपने एक माइक देखा था जिसमें ऐसे तीन हेड लगे हुए थे। बताइए वो किसने बनाया?

प्र: जो भी माइक बनाने वाले लोग होते हैं उन्ही में से किसी ने।

आचार्य: मैंने अभी दो घंटे पहले एक माइक देखा था जिसमें ऐसे तीन हेड थे बताओ वो किसने बनाया? आप बताओ किसने बनाया? (दूसरे प्रश्नकर्ता की ओर इशारा करते हुए)

प्र२: आपने बनाया।

आचार्य: मैंने कैसे बनाया यार, मुझे नहीं आता। आपने कहा जो माइक बनाने वाली कंपनी होती है, उन्होंने ही बनाया होगा। आप बताइए (एक और प्रश्नकर्ता से पूछते हुए )

प्र३: सामने अपनी कल्पना हो रही होगी

आचार्य: नहीं, मैंने देखा था, कल्पना की कोई बात ही नहीं, मैंने देखा था। जब मैं देख रहा था तो मुझे पूरा भरोसा था कि ये तो है। तीन घंटे पहले मैं सो रहा था। (सभी प्रश्नकर्ता हँसते हैं) बताइए वो माइक किसने बनाया? तीन घंटे पहले मैं सो रहा था और उसमें मैंने एक ऐसा माइक देखा जिसमें ऐसे तीन हेड लगे हुए थे; एक नहीं तीन। अद्भुत माइक! बताइए वो किसने बनाया? उसे मेरी नींद ने बनाया और जब मैं जग जाता हूँ तो मुझे पता चलता है कि वो वैसी कोई चीज़ है नहीं। तो अगर मुझे ये माइक दिखाई दे रहा है जिसमें एक हेड है या तीन हेड हैं या तेरह हेड हैं तो मेरा ज़ोर किस पर होना चाहिए? ये पूछने पर कि इसका मैनुफेक्चरर (निर्माता) कौन है या इस पर कि मैं जग जाऊँ? जल्दी बोलो।

प्र: कि मैं जग जाऊँ।

आचार्य: अब मैं ये भी कर सकता हूँ कि मैं सोता रहूँ और मैं ढूँढ़ने लग जाऊँ। मैं सपने में गूगल करूँ कि इसका ये तीन हेड वाला माइक किसने बनाया, बताओ इसका मैनुफेक्चरर कौन है? कौन है रचयिता और उस रचयिता को मैं क्या नाम दे दूँ? भगवान।और मैं उस भगवान को एक ऐसे जगत के रचयिता के रूप में परिभाषित कर रहा हूँ जो जगत भी, हो सकता है कि, हो ही नहीं। जो माइक है ही नहीं उसका मैनुफेक्चरर अगर मैंने खोज भी लिया तो मैंने क्या खोज लिया? मेरा काम ये नहीं है कि मैं इसका मैनुफेक्चरर खोजूँ, मेरा काम ये है कि पहले मैं जग जाऊँ। आपको कैसे पता है कि आप जगे हुए हो? आप जब कहते हो कि ये दुनिया है, किसी ने बनाई होगी। आपको कैसे पता कि आप जगे हुए हो? आपको कैसे पता कि आपका सपना ही नहीं चल रहा।

आपको कैसे पता कि इस दुनिया जैसी कोई चीज़ होती भी है। क्या आप पूरे भरोसे के साथ कह सकते हो? बोलो। और जिस चीज़ का कोई पक्का प्रमाण नहीं उसके स्रोत की खोज क्या करें? पहले उस चीज़ का प्रमाण तो खोज लें। तो समझदार लोगों ने हमें क्या समझाया है? उन्होंने कहा 'बेटा, ये दुनिया, जिसके स्रोत या रचयिता के बारे में तुम जिज्ञासा करते हो और कहते हो कि निश्चित रूप से ही अगर दुनिया है तो उसे किसी ने बनाया भी होगा। तुम पहले ये तो देख लो कि इस दुनिया के होने का एकमात्र प्रमाण तुम्हीं हो बस। तुम को ही लग रहा है कि ये दुनिया है।' दुनिया अपनी ओर से तो कभी बोलने आती नहीं कि मैं हूँ।

प्र: तो वो जो मैं हूँ, जो मैं हूँ, वो तो किसी ने बनाया है न?

आचार्य: हाँ, वो जो मैं है, वो क्या है, ये पता कर लें न, तो सच्चाई तक पहुँच जाएँगे। बनाया है कि नहीं बनाया है ये सारी बातें तो दुनिया पर लागू होती हैं और दुनिया का अनुभव करने वाला मैं ही हूँ। तो दुनिया के कॉन्सेप्ट अपने ऊपर लगाने की जगह पहले मैं ये देख लूँ न कि मैं कौन हूँ। मुझे जो दुनिया दिखाई देती है उसमें ऐसा होता है कि जो भी चीज़ होती है उसे किसी-न-किसी ने बनाया होता है। लेकिन दुनिया की हर चीज़ बनाई गयी चीज़ है इसका अनुभव भी किसको होता है? मुझे होता है। सिर्फ़ मेरे अनुभव से ही प्रमाणित कैसे हो जाता है कि जिस चीज़ का अनुभव हो रहा है वो चीज़ है ही? अनुभव तो हमें किसी भी चीज़ का हो जाता है। दुनिया का आपके पास एक ही प्रमाण होता है। क्या? कि दुनिया है क्योंकि उसका अनुभव होता है। आप कहते हो ये दीवाल है क्योंकि दिखाई देती है और मारो ऐसे तो पता चलती है। यही तो कहते हो कि दुनिया है क्योंकि मुझे दुनिया का अनुभव होता है। माने दुनिया को प्रमाणित करने वाला, दुनिया को सच्चा प्रमाणित करने वाला कौन है? मैं हूँ। लेकिन आपके अनुभवों का क्या भरोसा? आपको कितने ही अनुभव हो चुके हैं जो ग़लत भी थे। और जो अनुभव आपको लगता है कि सही हैं, वो किसी भी दिन ग़लत साबित हो सकते है।

प्र: इसमें आचार्य जी, जैसे अगर अनुभवों को देखा जाए तो जो मानसिक अनुभव होते हैं उनमें बिलकुल ऐसा रहता है कि आपको कुछ अनुभव हुआ लेकिन बात बिलकुल ही कुछ और हो सकती है। पर जो हमारे फ़िज़िकल (भौतिक) अनुभव हैं, वहाँ पर बात जाकर के फ़िर थोड़ा सा अटक जाती है कि वो तो हमें महसूस हो ही रहा है। ये लैपटॉप तो आज भी मुझे ऐसे ही महसूस होगा, पचास साल बाद भी ऐसा ही महसूस होगा।

आचार्य: बिलकुल नहीं होगा। ये लैपटॉप पचास साल बाद अगर यहाँ रखा भी होगा तो आपको दिखाई नहीं देगा। कोई चीज़ आपको महसूस हो, इसके लिए सबसे पहले आपका मन उसकी तरफ़ जाना चाहिए। आप इस लैपटॉप की अभी इसी क्षण बात ही इसीलिए कर पायीं क्योंकि ये महंगा है और आप से सम्बन्ध रखता है। आज से पचास साल बाद ये लैपटॉप ऐसे रखा भी होगा, आप इसकी बात नहीं करोगे। आप बताओ आपने इस लैपटॉप की ही बात क्यों करी, इस गमले की क्यों नहीं की ? क्योकि इसका महत्व आपके लिए है तो लैपटॉप का भी सम्बन्ध आपसे है तो मैं पहले लैपटॉप की बात करूँ या अपनी बात करूँ? मैं पहले लैपटॉप की बात करूँ या अपनी बात करूँ? मुझे कुछ भी नहीं पता। मैं गारंटी के साथ, भरोसे के साथ दुनिया के बारे में कुछ भी नहीं कह सकता। और मैंने दुनिया के बारे में भरोसे से जब भी कहा है तो मैंने धोखा ही खाया है। कुछ धोखे मैं खा चुका हूँ और बाक़ी धोखे खाने की मेरी तैयारी है। भरोसे के साथ आप ये तो बोल सकते हो क़ि आपने कहाँ पर धोखा खाया। लेकिन भरोसे के साथ आप ये एक भी चीज़ के लिए नहीं बोल सकते कि वो चीज़ सच्ची ही है।

कोई चीज़ है जिसने आपको दस साल से धोखा नहीं दिया क्या आप बोल सकते हो वो चीज़ सच्ची ही है? क्यों नहीं बोल सकते? क्या पता अभी कल दे दे! तो कोई चीज़ धोखा दे गयी है तो ये तो पता है कि धोखा दे गयी लेकिन एक भी चीज़ दुनिया में ऐसी नहीं है जिसके बारे में आप यक़ीन के साथ कह सको कि ये तो सच्ची है ही क्योंकि जिसने आज धोखा नहीं दिया वो चीज़ भविष्य में धोखा दे सकती है, तो कैसे कह दोगे कुछ भी? तो दुनिया के बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता। ये तक नहीं कहा जा सकता कि दुनिया उस तरीक़े से है ही जैसी हमें दिखाई देती है। और जिन्होंने थोड़ा ज़्यादा ख़तरा उठाया उन्होंने ये तक कह दिया कि दुनिया के बारे में ये भी नहीं कहा जा सकता कि दुनिया है ही। बोले कि दुनिया जब है कि नहीं है कि कैसी है इसका ही कोई भरोसा नहीं है तो दुनिया बनाई किसने इस बारे में क्या व्यर्थ चर्चा करें। ये पागलों की चर्चा है कि दुनिया की रचना किसने करी। जब हमें यही नहीं पता कि दुनिया का स्वरूप क्या है दुनिया क्या चीज़ है।

दुनिया आज मुझे एक तरह की दिखाई देती है, दुनिया कल मुझे दूसरी तरह की दिखाई देती है। जैसी मेरी स्थिति होती है उस हिसाब से मेरे लिए दुनिया बदल जाती है। एक आदमी मुझे आज तक दोस्त दिखाई देता था, अगले दिन कुछ सूचना मिल जाती है, वही आदमी मुझे दुश्मन दिखाई देता है। एक चीज़ जिसको मैं बहुत महत्व के साथ और बड़े प्रेम के साथ अपने पास लेकर के घूमती थी; कल पता चला वो चीज़ नकली है। मन करता है इस चीज़ को फेंक आओ बाहर कहीं। तो दुनिया की क्या बात करनी है तो फिर हम किस की बात करेंगे? उसकी बात करेंगे जो दुनिया को एक्सपीरियंस (अनुभव) करता है, ठीक है? क्योंकि हमारी समस्या तो उससे है जो दुनिया को एक्सपीरियंस करता है। वो हम है। तो जिन्हें सचमुच अपनी तक़लीफ़ दूर करनी थी, उन्होंने दुनिया और दुनिया के रचनाकार की बात करनी बिलकुल बंद करी। उन्होंने बात करनी शुरू करी मन की।

उन्होंने कहा ये मन क्या है हम मन के भीतर जाएँगे। मन को खोजेंगे। और मन की ही साफ़ स्थिति को, मन की ही उच्चतम स्थिति को उन्होंने नाम दिया भगवान का। समझ में आ रही है बात? तो दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। हम इस बात को दोहरा रहे हैं। एक, जो ऐसे बिलकुल हाथ फैलाकर के और आँखें चौड़ी करके दुनिया में इधर-उधर भागते रहते हैं उनको यही लगता है कि दुनिया में कहीं इधर-उधर भगवान हैं। इस लोक में नहीं है तो किसी और लोक में बैठा है पर भगवान का सम्बन्ध है इस दुनिया से ही। दुनिया में भगवान भगवान करते इधर-उधर भागते रहते हैं। एक वो लोग हैं और हम ये कह रहे हैं ऐसे ही लोग दुनिया में निन्यानबे दशमलव नौ प्रतिशत है। और फिर हमने कहा लेकिन कुछ लोग होते हैं जो समझ जाते हैं कि दुनिया में भागने का खेल है नहीं। कोई समस्या भीतर है और उसी समस्या के समाधान का नाम ही भगवान है। उस समाधान को आत्मा कहा गया है। उसी समाधान को आत्मा कहा गया है। तो वही, वही असली भगवान है। अब इसमें मैं फिर तुम लोगों से अब एक सवाल पूछता हूँ। तुम्हें जवाब देना है। बताओ, आस्तिक कौन है और नास्तिक कौन है? आस्तिकता नास्तिकता की फिर सही परिभाषा क्या हुई?

प्र: जो मन को जानने का प्रयास करे वो…

आचार्य: नास्तिक वो नहीं है जो भगवान को नहीं मानता। नास्तिक वो है जो नकली भगवान को मानता है। और आस्तिक कौन है? जो असली भगवान को जानता है। जो असली भगवान की खोज में है उसका नाम है आस्तिक। और जो दुनिया में इधर-उधर भगवान के पीछे दौड़ रहा है उसी को नास्तिक बोलते हैं। तो माने कि ज़्यादातर लोग बल्कि सभी लोग जो अपनेआप को आस्तिक बोलते हैं। वही नास्तिक हैं।

प्र: आचार्य जी, इसी से एक सवाल मेरे उठ रहा है अभी; क्या भगवान भी श्रेष्ठ और नीच होते हैं? हर व्यक्ति यहाँ अपने भगवान को ऊँचा दिखाने के लिए प्रयास कर रहा है कि भाई मेरे ये भगवान हैं तो ये श्रेष्ठ हैं। और आप देख रहे हैं, देश में इसी कारण से बहुत सारे जगह अलग-अलग चीज़ें हो भी रही है अभी।

आचार्य: तो जब तुम अपनी पसंद के भगवान बनाओगे तो तुम्हें अपनी पसंद की चीज़ ही दूसरे की पसंद की चीज़ से बेहतर लगेगी। कोई माँ बोलती है कि मेरा बच्चा पड़ोस के बच्चे से नीचे का है? क्यों नहीं बोलती? वो एकदम ही सड़ेला थकेला बच्चा होगा तो भी माँ को क्या लगता है? मेरा चिंटू बेस्ट है। यही लगता है न? वैसे ही है। आपकी प्रियतमा होती है आप यही तो बोलते हो, तुम से सुन्दर कौन है? तुझसे ख़ूबसूरत पूरी दुनिया में कोई नहीं है। तो उसी तरीक़े से तुमने जब अपना भगवान पकड़ा है; तुमने ‘दी ट्रुथ’ (सत्य) तो पकड़ा नहीं है। तुमने ‘माइ गॉड’ पकड़ा है।

ये दो बहुत अलग-अलग चीज़ें हैं। द ट्रुथ। वो जो द ट्रुथ है वो सब्जेक्टिव ( व्यक्तिगत) नहीं होता। और जो माई गॉड है वो सब्जेक्टिव होता है। जो दी ट्रुथ है वो सत्य है। वो व्यक्तिगत नहीं होता। और जो है कि मेरा भगवान वो तो फिर आपका है तो आपकी चीज़ है, आपने बनाया, आपकी अपनी, भई तो आपका वो व्यक्तिगत चीज़ है। उसके साथ आपका अहंकार जुड़ा होता है। सत्य के साथ आपका अहंकार नहीं जुड़ सकता। भगवान के साथ आपका अहंकार ख़ूब जुड़ा होता है। इसीलिए भगवान को लेकर इतनी लड़ाइयाँ होती हैं। मेरा भगवान तेरे भगवान से बेहतर है। विज्ञापन आता था टीवी में, 'उसकी साड़ी मेरी साड़ी से सफ़ेद कैसे', तो वैसे ही है कि तेरे मन्दिर का गुम्बद मेरे मन्दिर से ज़्यादा ऊँचा कैसे या मेरी मस्जिद से या मेरे चर्च से।

तो सत्य को मानना एक बात है और भगवान को मानना बिलकुल दूसरी बात है। सत्य को मानने का मतलब होता है, भीतर वाले भगवान का अनुयायी होना। जब आप भीतर वाले भगवान के भक्त होते हो तो फिर आप होते हो सत्य के खोजी। सत्य के आग्रही। और जब आप बाहर वाले भगवान के पीछे भागते हो तो फिर आपकी पूरी ज़िन्दगी यही करते बीतती है कि मेरा भगवान तेरे भगवान से बेहतर है। ठीक वैसे, जैसे मेरी गाड़ी तेरी गाड़ी से बेहतर है, मेरी शर्ट तेरी शर्ट से बेहतर है, मेरा तर्क तेरे तर्क से बेहतर है। दो लोगों में बहस हो रही हो, कोई पीछे हटने को तैयार होता है क्या? मेरा तर्क तेरे तर्क से बेहतर है तो ऐसे ही मेरा भगवान तेरे भगवान से…? इसमें बात इसकी है ही नहीं कि भगवान बेहतर है कि नहीं है; इसमें तो बात मेरे तेरे की है, अहंकार की है। तो इसलिए लोग लड़ते हैं एक दूसरे से।

जब तक भगवान को हम बाहर की किसी शय के रूप में देखते रहेंगे तब तक धर्म के नाम पर लड़ाइयाँ होती ही रहेंगी। ये बात अच्छे समझ लो। बहुत सारे लोग यही बोलकर के अपनेआप को धर्म से अलग कर लेते हैं: वो बोलते हैं 'रिलीजन इज़ द बिगेस्ट कॉज़ ऑफ स्ट्राइफ एंड वायलेंस एंड मिज़री इन द वर्ल्ड।‘ (धर्म इस दुनिया में संघर्ष, हिंसा,और दुःख का सबसे बड़ा कारण है ) बोलते हैं, धर्म के नाम पर जितनी लड़ाइयाँ होती हैं और किसी नाम पर होती ही नहीं तो हमें धर्म से कोई लेना देना नहीं।

जब तक भगवान बाहर की कोई चीज़ है, तब तक धर्म के नाम पर रोज़ लड़ाइयाँ होंगी। इसीलिए मानवता को सच्चा भगवान चाहिए जो बाहर नहीं होता, जो यहाँ होता है, (अपने ह्रदय की ओर संकेत करते हुए) यहाँ होता है। जिसका बाहर के किसी रूप, रंग, आकार से कोई लेना देना नहीं होता। क्योंकि अगर रूप, रंग, आकार बनाओगे तो तुमने एक रूप रंग, आकार बना लिया। अब तुमने बना लिया अपना रूप रंग आकार। आपने अलग अपना रूप, रंग, आकार बना लिया। इन्होने अलग बना लिया। इन्होंने बनाया अपनी पसंद का। आपने बनाया अपनी पसंद का। और मेरी पसंद तेरी पसंद से तो बेहतर होगी ही होगी। फिर लड़ाई हो जाएगी तुरन्त। तो जब तक भगवान निर्गुण, निराकार नहीं होगा तब तक धर्म के नाम पर लड़ाइयाँ चलती रहेंगी क्योंकि आप जो सगुण भगवान बनाओगे, उसके गुण हैं, उसका रूप है, आकार है और उसकी कहानियाँ हैं। और आपने अपना एक अलग सगुण भगवान बना लिया। उसके भी अपने कुछ कहानियाँ हैं। उसको लेकर मान्यताएँ हैं। हो सकता है रूप रंग हो उसका न हो,पर कहानियाँ तो हैं ही उसको लेकर के मान्यताएँ तो है ही उसको लेकरके। और अब इन दोनों में लड़ाइयाँ होंगी ज़बर्दस्त तरीक़े से। तो धर्म के नाम पर लड़ाइयाँ सिर्फ तब रुक सकती हैं जब हम भीतर वाले भगवान को पहचाने। फिर किसी से कोई लड़ाई नहीं हो सकती किसी की।

प्र: तो इसमें, आचार्य जी फिर मन्दिरों का कोई महत्व है या नहीं?

आचार्य: बिलकुल महत्व है। मन्दिर वो जगह है जहाँ पर जाकर के आपको मन के उपद्रव की व्यर्थता दिखाई दे। हमने क्या कहा; भगवान माने वो जो मन की शान्ति का नाम है। मन के चैन को ही हमने कहा भगवान है। मन्दिर वो जगह जहाँ मन को चैन आ जाए। और ऐसे भी कह सकते है कि जहाँ कहीं भी मन को चैन आ जाए उसको मन्दिर कह सकते हैं। और अगर कोई ऐसी जगह है जो मन्दिर कहलाती है पर वहाँ मन को चैन नहीं आता तो वो जगह मन्दिर कहलाने योग्य नहीं है। और दुनिया के सब धर्मस्थल ऐसे ही हैं जहाँ जाकर के कोई चैन-वैन, आता नहीं है। वहाँ जाकर के मन को अन्धविश्वास और मिल जाते हैं। उल्टी-पुल्टी धारणाएँ, मान्यताएँ और मिल जाती है। दुनिया के सब धर्मस्थल चाहे वो मस्जिद हो, मन्दिर हो, चर्च हो, गुरुद्वारा हो वो सब स्तूप हो, कुछ हो, वो सब ऐसे ही है। वहाँ जाओ तो कम ही होगा कि मन शान्त या शुद्ध हो जाए। वहाँ जाकर मन और विचलित हो जाता है। लेकिन वास्तविक मन्दिर की परिभाषा यही होगी कि वहाँ जाकर के मन को चैन मिल जाए। और मन के चैन को ही भगवान बोलते हैं।

प्र: आचार्य जी, जैसे एक आम व्यक्ति होता है तो उसकी, उसकी जब सुबह ही होती है। तो सबसे पहले कहीं-न-कहीं उस दिनचर्या में एक पार्ट रहता है पूजा का। जहाँ पर आप पूजा करते हैं तो फिर उस पूजा का कुछ महत्व है या नहीं?

आचार्य: इतना सुन्दर भारत में रहा है, हमारे पास एक उपनिषद ही है, उसका नाम है — 'आत्म पूजा' उपनिषद। इतना सा उपनिषद है, छोटा सा एकदम। एक-डेढ़ पन्ने में पूरा उपनिषद आ जाए, इतना छोटा उपनिषद। और वो आपको यही बोल रहा है कि पूजा आत्मा के अलावा माने उस सच्चे भगवान के अलावा किसी की नहीं करी जा सकती, जो आपके अन्तःस्थल में ही बैठता है। 'आत्म पूजा उपनिषद।' कह रहे हैं, कहाँ तुम इधर-उधर दौड़-भाग कर रहे हो और खून-खच्चर कर रहे हो, परेशान हो रहे हो। ‘पूजना’, माने नमन करना, माने झुकना, सिर्फ़ जो उच्चतम हैं उसके सामने। और जो उच्चतम है वो निम्नतम की कल्पना का किरदार तो नहीं हो सकता ना बाबा! मैं कौन हूँ? मैं निम्नतम हूँ। इसी विनम्रता से सारे अध्यात्म की शुरुआत होती है, भैया मैं तो गड़बड़ हालत में हूँ। मैं बेचैन हूँ, मैं तो नीचे का हूँ। मैं नीचे का हूँ और उच्चतम वो होगा मैं जिसकी कल्पना करूँगा! तो गजब बात हो गयी! मैं तो हूँ नीचे का और ऊँचा वो होगा मैं जिसकी कहानी बताऊँगा! वो मेरी कहानी का किरदार होगा! ऐसे कैसे, ये क्या हो रहा है तो फिर मैं कहाँ नीचे हुआ? फिर तो मैंने ख़ुद ही को बोल दिया, सबसे पहले मैं ही भगवान हूँ। वो एक फ़िल्म आयी थी न! कहता है, 'अपुनिच भगवान है। कभी-कभी अपन को लगता है अपुनिच भगवान है'; तो भगवान अगर तुम्हारी कहानी का एक किरदार है तो फिर तुम ही भगवान हो भैया क्योंकि वो कहानी तो तुम्हीं ने रची है। या चलो तुमने नहीं रची है तो उस कहानी में भरोसा करने तो तुम ही हो, तो फिर अपुनिच भगवान है। तो आत्म पूजा का उपनिषद में मतलब होता है, मन जाने कि वो कितनी गिरी हुई हालत में है और कहे कि मेरी उच्चतम स्थिति की ही मैं बस पूजा कर सकता हूँ। और वो उच्चतम स्थिति मुझसे इतनी दूर की है कि मैं उसे देख नहीं सकता, मैं उसके बारे में कोई कहानी नहीं कह सकता, मैं उसके बारे में कोई कल्पना नहीं कर सकता। उस स्थिति के समक्ष मैं बस मौन हो सकता हूँ। तो फिर मौन एक रास्ता बनता है। मन के मौन हो जाने को ही आत्मा कहते हैं। मन के मौन हो जाने को ही भगवत्ता कहते हैं।

प्र: आचार्य जी, पूजा की अभी बात हुई। पूजा में भगवान के प्रतीकों का कितना महत्व है और कहाँ तक महत्व है?

आचार्य: वो सारे प्रतीक आपको आपकी हालत की याद दिलाएँ तो तो ठीक है।

प्र: आप टीका लगाते हैं…

आचार्य: उदाहरण बता रहा हूँ; आपको पीलिया हो गया है — जॉन्डिस, पीलिया में क्या आपको खाने को मना किया जाता है? कहते हैं, तेल मत खाना, अचार मत खाना। ये सब जितना तला-भुना है, ये सब मत खाना। ठीक है न! और आप हो पेटू आदमी, आपकी वृत्ति है कि जहाँ मिला वहीं पर झाड़ दिया एकदम। तो आपको पीले रंग का धागा बांध दिया गया। यहाँ भी, यहाँ भी। और आपके दोनों हाथ पीले कर दिये गए। और आपको यहाँ भी पीला पीला लगा दिया गया।(माथे पर) ये क्या किया गया है? ये किया गया कि आप ख़ुद को देखें तो आपको अपनी हालत याद आए; मुझे पीलिया है भाई। मैं किसी उलटी-पुलटी दिशा में न चला जाऊँ, मर जाऊँगा। बहुत दुख मिलेगा।

और आपको यहाँ भी दिखा दिया गया है (अपने चेहरे की तरफ़ संकेत करते हुए) ताकि दूसरा भी कोई आपको देखे तो उसको भी याद आ जाएगी कि आपको पीलिया है, तो वो भी कहीं आपको अचार लेकर न आ जाए कि लो बेटा, बढ़िया वाला है आज। नींबू का डाला है नया। समझ में आ रही है बात? तो प्रतीकों का बहुत महत्व है। प्रतीकों का बहुत महत्व है लेकिन कोई भी प्रतीक भगवान का प्रतीक नहीं होता। सब प्रतीक मन के ही होने चाहिए अगर उन प्रतीकों को आपकी सहायता करनी है तो। नहीं तो फिर आप बहुत ऊँचे-ऊँचे प्रतीक बना सकते हैं। उनसे आपका मनोरंजन हो जाएगा। मुझे ये भूलना नहीं है कि मेरी समस्या है मेरी ही स्थिति। मेरी समस्या ये नहीं है कि दुनिया में ऐसा वैसा कुछ है, जो मुझे दिख नहीं रहा है, मिल नहीं रहा है। मेरी समस्या है मेरी ही अपनी आंतरिक स्थिति और वो आंतरिक स्थिति ऐसी है कि दुनिया की कोई भी चीज़ मुझे लाकर दे दो, मेरी परेशानी और मेरी बेचैनी मिटती नहीं है। तो मुझे ये बात भूलनी नहीं है कि मेरी परेशानी का सम्बन्ध दुनिया से नहीं है, मेरी परेशानी का सम्बन्ध मुझसे है। तो जो सारे धार्मिक प्रतीक हैं उनका भी सम्बन्ध किससे होना चाहिए फिर? मुझसे ही होना चाहिए।

प्र: फिर आचार्य जी, मूर्तियों का क्या महत्व है?

आचार्य: मूर्तियाँ इसलिए होती हैं कि आपको याद दिलाएँ कि आप जैसे जी रहे हो वो कितना छोटा और क्षुद्र काम है। मूर्ति इसलिए होती है कि आप मूर्ति को देखो और आपको दिखाई दे कि मैं ऐसा क्यों नहीं हो सकता? तभी तो मूर्ति के सामने सर झुकता है न! मूर्ति इसलिए होती है कि आप उसके सामने अवाक, अचंभित खड़े रह जाओ। मूर्ति आपके सामने आपकी ही क्षुद्रता का उद्घाटन करने के लिए होती है। आप वहाँ देखते हो कि सामने जो मूर्ति में है उसके चेहरे पर क्या शान्ति है, क्या सौम्यता है! और आपके चेहरे पर हमेशा क्या रहती है? अशान्ति। तो फिर आप जब उसके चेहरे की शान्ति देखते हो तो आपको कुछ याद आता है। आपको एक सम्भावना याद आती है। आप कहते हो मैं भी तो शान्त हो सकता हूँ।

आप वहाँ देखते हो कि कोई खड़ा हुआ है। अब उसके पास अस्त्र हैं, मान लो। अब वो अस्त्र आपको क्या याद दिलाता है? कि बहुत बड़ा रावण था लेकिन फिर भी डरना नहीं है। इतना बड़ा रावण था! और वो धनुष है, आप देख रहे हो उस धनुष को। उस धनुष से आपको याद आना चाहिए कि आप बात-बात में डरते हो और वो रावण से भी नहीं डरे। तो मूर्ति इसलिए नहीं होती कि वहाँ पर जाकर के जल्दी से फूल डाल दिया और पत्र, पुष्प और ये सब वहाँ जल…, ये सब कर-करके आ गये और घंटी बजा दी। उसको देखकर के अपनी स्थिति याद आनी चाहिए कि एक ये हैं कि अयोध्या का राज्य छोड़ दिया और फिर लंका का सोना भी छोड़ दिया। एक तरफ़ से चले तो अयोध्या का सिंहासन और राज्य सब छोड़कर चले। और दूसरी तरफ़ गये तो वहाँ पर लंका का पूरा राज्य मिल रहा था और लंका का पूरा सोना मिल रहा था, वो भी छोड़ दिया। और एक मैं हूँ कि मैं दो रूपया न छोडूँ ।

मैं अभी यहाँ मन्दिर आया और बाहर ऑटो वाला था। तो देखा, उसके मीटर में अट्ठानवे रुपया बना था। अट्ठानवे रुपया आया था मीटर में। और मैं मन्दिर आया हूँ। ऑटो से उतरा उसमें अट्ठानवे रुपए दिखा रहा है। मैंने उसको सौ का पत्ता दिया और वो बोल रहा है, दो का सिक्का है नहीं। मैंने कहा, ख़बरदार, जा और जहाँ कहीं से दो रूपए लेकर आता है आ, नहीं तो तेरा ऑटो नहीं छोड़ूँगा मैं। या तो तू दो रूपया लेकर आ, नहीं तो तेरा ऑटो लेकर जा रहा हूँ मैं। और फिर बेचारे इधर से उधर से जाकर एक नींबू पानी बेच रहा था। उसके हाथ पाँव जोड़कर के वहाँ उससे नींबू पानी लिया तीन रुपए का। उसको पाँच का सिक्का दिया तो उसने दो रुपया जब लौटाया तो दो रूपए ला के उसने मुझे दिया। फालतू में उसने नींबू पानी पिया। ये सारा कांड में अभी ठीक मन्दिर के आगे करके आया हूँ। मैं दो रुपया छोड़ने को तैयार नहीं हूँ ज़िन्दगी में। और ये सामने खड़े हुए हैं। इन्होंने अयोध्या का राज्य और लंका का सोना दोनों छोड़ दिया। ये याद आना चाहिए न मूर्ति के सामने! मूर्ति का उद्देश्य ये होता है कि आपको आपकी हीनता याद दिलाये। और साथ ही साथ ये भी याद दिलाए कि हीन रहे आना आपकी अनिवार्य नियति नहीं है। आप भी ऊँचे उठ सकते हो। और ये दोनों चीज़ें जब एक साथ याद आ जाती हैं न कि मैं गिरा हुआ हूँ लेकिन मैं उठ सकता हूँ, तो फिर उठने की यात्रा शुरू हो जाती है।

प्र: अभी जो मूर्तियाँ होती हैं उनका ज़्यादातर प्रयोग जो एक आम व्यक्ति करता है, वो अपनी कामनाओं को पूरी करने के लिए करता है। बचपन में हम भी जब मन्दिर जाते थे, तो बचपन से यही बताया जाता था कि भगवान जी से जो माँगना है अच्छा सा, वो जाकर के आप माँग लो।

आचार्य: इससे ग़लत कोई धर्म का और मन्दिर का दुरुपयोग हो नहीं सकता। बहुत बुरा दुरुपयोग है यह। बहुत बुरा दुरूपयोग है यह।

प्र: आप व्रत रखते हैं।

आचार्य: बहुत बहुत गन्दा दुरूपयोग है ये। और ये तमाम तरह के बाबा लोग होते हैं और धर्म गुरु होते हैं और जगहों की इस तरह की मान्यता प्रचारित कर दी जाती है कि यहाँ आकर सब मनोकामनाएँ पूरी हो जाती है।

प्र: मनोकामना मन्दिर।

आचार्य: मन्दिर ही मनोकामना से जुड़ गया है। लोग किसी त्यौहार पर होगा तो ट्वीट करेंगे कि ये आज ये फ़लाना त्यौहार है और भगवान आपकी सब मनोकामनाएँ पूरी करें। तुम्हारी मनोकामनाएँ ही तुम्हारा नर्क है। अभी तुम्हें और पूरी करनी है? और लोगों की कैसी मनोकामनाएँ होती है, आप जानते नहीं है क्या? किसी की मनोकामना ये होती है क्या कि मुक्ति मिले? सबकी मनोकामना। यही होती है मेरा घर भरे और दुनिया भर का पैसा मेरे ही घर में आ जाए। यही तो मनोकामना होती है। और आप चाहते हो दुनिया का पैसा आपके घर में आ जाए। पड़ोसी की भी यही मनोकामना है। दोनों की मनोकामना एक साथ कैसे पूरी हो जाएगी? लेकिन ये मूर्खता धर्म के नाम पर ख़ूब चलती रही है कि धर्म माने मनोकामना की पूर्ति।

धर्म का अर्थ है, मन को उसकी छोटी कामनाओं से मुक्ति दिलाना। मन की कामना-पूर्ति नहीं करना, मनोकामनाओं की ‘पूर्ति’ नहीं। मनोकामनाओं से ‘मुक्ति।‘ ये धर्म होता है। मनोकामनाओं की जहाँ पूर्ति हो रही हो, उसको कहते हैं बाज़ार। वहाँ होती है मनोकामना पूरी। बाज़ार में। किसी को टिक्की चाहिए, चाट चाहिए, जूता चाहिए, शर्ट चाहिए; बताओ क्या चाहिए? ‘चेहरा चमकाना है।‘ ‘मिलेगा। और क्या चाहिए, बताओ।‘ ‘लाल रंग का सैंडल माँगता।‘ ‘मिलेगा।‘ ये काम तो बाज़ार का है न! जो माँगता भाई, सब कुछ मिलेगा। दाम चुकाने का, मिलेगा। मन्दिर में भी फिर वही करने लग जाते हो। दाम चुकाते हो, जाकर बोलते हो, बस फ़लानी चीज़ मिल जाए। नौकरी मिल जाए। पुत्र की प्राप्ति हो जाए। मैं फ़लानी चीज़ दे दूँगा। और बहुत सारे बाबा घूम रहे हैं जो मनोकामना पूरी कर रहे हैं। 'दाम चुका बच्चा, जो चाहता सब मिलेगा।' मन्दिर को बाज़ार क्यों बना रहे हो?

मन्दिर माने मनोकामना से मुक्ति। जहाँ जाकर के कामना याद ही न आए, जहाँ जा कर कामना याद ही न आये। याद आ गया मुझे कुछ और। तो राम कृष्ण थे, विवेकानंद थे। तो विवेकानंद के बड़े बुरे दिन चल रहे थे उन दिनों। पिता की मृत्यु हो गयी थी। घर में अचानक आर्थिक विपन्नता आ गयी थी। ये कुछ काम-धाम अभी करते नहीं थे। पढ़ते थे। पढ़ने में उनका बड़ा ज़ोर था। बड़े मेधावी थे। तो कई तरह की तकलीफें घर में आ गयी थी। तो ये रामकृष्ण के पास गये। और जाते थे बताते कुछ नहीं थे। लगता था इनको कि ये बात क्या बताए उनको। पर रामकृष्ण समझ गये बोले, बात कुछ है तो है ही। तो इनको बुलाया एक दिन, बोले, 'जो चाहते हो, अन्दर चले जाओ माँ के पास। माँग लो, मिलेगा।' तो कहते हैं कि उनको भेजा, वो अन्दर गये। थोड़ी देर में बाहर आ गये, तो पूछा, ‘माँग लिया जो माँ से माँगना था?’ बोले, 'नहीं।' फिर भेजा, 'अन्दर जाओ।' फिर वो बाहर आ गये। पूछा, ' माँग लिया माँ से, जो माँगना था?' तो बोले, 'नहीं।' तीसरी बार भेजा, बोले, 'माँग के आओ।' तो इस बार बड़ी देर तक अन्दर रहे। फिर बाहर आये। पूछे, ' माँग लिया?' तो रोने लगे। बोले वहाँ पहुँच जाता हूँ तो मनोकामना भूल जाता हूँ वहाँ पहुँच जाता हूँ तो माँगने में लाज आती है कि इतनी छोटी चीज़ माँगूँगा क्या? माँ के सामने खड़ा हूँ और इतनी क्षुद्र चीज़ माँगूँगा उनसे?

तो मन्दिर वो जगह है जहाँ मनोकामना भूल जाओ। अगर मन्दिर जाकर भी मनोकामना याद है तो आप मन्दिर नहीं पहुँचे हो, बाज़ार पहुँचे हो। मन की कामना ही मन का रोग है। जो बाहर वाला भगवान होता है, वो मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए होता है और जो भीतर वाला भगवान होता है वो मनोकामनाओं से मुक्ति के लिए होता है। अब आप समझ रहे होंगे क्यों दुनिया के निन्यानबे-प्रतिशत लोग बाहर वाले भगवान को ही पूजते है। क्योंकि उसमें लालच रहता है कि कामनाएँ पूरी होंगी। वो मनोकामना की पूर्ति के लिए होता है न बाहर वाला भगवान। तो इसलिए पूरी दुनिया किस को पूज रही है? कोई बाहर का भगवान रच लिया, उसको पूज रही है। लेकिन जिनको सचमुच कामना से ही मुक्ति चाहिए वो भीतर वाले भगवान को पूजते हैं। और भीतर वाला भगवान आपको कामना से मुक्ति देकर आपकी सबसे ऊँची कामना पूरी कर देता है। इस बात को अच्छे से समझ लो सब लोग। आख़िरी कामना होती है — कामना से मुक्ति। आप कामना जब करते हो तो यही तो चाहते हो न कि कामना मिट जाए। भई मुझे प्यास लगी थी तो मैंने ये पिया तो मैं यही चाहता हूँ न कि इसको पीने के बाद प्यास…?

प्र: बुझ जाए।

आचार्य: तो कामना इसीलिए उठती है कि कामना मिट जाए। प्यास इसीलिए उठती है कि प्यास मिट जाए। तो उच्चतम कामना यही है कि कामना मिट जाए। आख़िरी कामना यही है कि कामना मिट जाए। तो जो भीतर वाला भगवान होता है वो आपकी उच्चतम कामना पूरी कर देता है। वो कामना ही मिटा देता है। और जो बाहर वाला भगवान होता है उसके पीछे-पीछे आप भागते रहते हो कि छोटी मोटी कामना पूरी कर दो, वो भी पूरी नहीं होती। भीतर वाले भगवान और बाहर वाले भगवान में ये अन्तर है। सत्य को पूजना, आत्मा को पूजना; वो भीतर वाले भगवान की बात है। भीतर वाले भगवान को पूजना माने? सत्य निष्ठ होना। आत्मा का प्रेमी होना। वो हुआ, भीतर वाले भगवान को पूजना। और बाहर वाले भगवान को पूजना माने वो तो फिर दंद-फंद हज़ार तरीक़े का दुनिया भर में देख ही रहे हो। हर देश में देख रहे हो।

प्र: इसी में आचार्य जी कुछ लोगों के लिए, एक तो भगवान, जो है, कामना-पूर्ति का ज़रिया रहते हैं। बहुत लोग ऐसे भी होते हैं जिनके लिए वो बस चाहते हैं एक प्रेजेंस ( उपस्थिति) जैसे गार्जियन की प्रेजेंस होती है, जैसे अपने पिता की प्रेजेंस होती है। उस तरीक़े से वो भगवान को भी देखते हैं और अगर वो वहाँ से वो पूरी चीज़ शायद इसलिए क्योंकि मन में डर बैठा होता है।

आचार्य: आपको डर बाद में है, नशा पहले है। आपको गार्जियन तो चाहिए पर आपको ये पता है, गार्जियन है कौन? मैं कह रहा हूँ भगवान मेरा गार्जियन है और मैं ख़ुद को ही नहीं जानता तो मैं अपना गार्जियन किसको मान रहा हूँ? तो ऐसे लिखा जाता था जैसे पुराने ज़माने में किसी का नाम होता था या अदालत में बुलाते थे – 'नुन्नुलाल वल्द झुन्नूलाल।' अब आप अगर नुन्नुलाल हो तभी तो झुन्नूलाल आपके गार्जियन हैं! जब आप ख़ुद को ही नहीं जानते तो अपने गार्जियन को कैसे जानते हो? आप भूल गये आपका नाम क्या है तो आपको अपने बाप का नाम कैसे याद रहेगा? जब मैं स्वयं को नहीं जानता तो अपने पिता को कैसे जानूँगा? पर दुनिया घूम रही है, ‘हे परमपिता, हे परमपिता!’ अरे तुम जब ख़ुद को नहीं जानते तो अपने बाप को कैसे जानोगे? समझ में आ रही है बात?

तो जो समझदार लोग होते हैं वो कहते हैं ख़ुद को जान लूँ, बाप का पता अपनेआप चल जाएगा। जो नासमझ लोग होते हैं वो ख़ुद को जानने का कभी कोई प्रयत्न नहीं करते। वो बस बाहर इधर-उधर घूमते रहते हैं और करके कि हे परमपिता! परम पिता! ओ माई फादर! ओ माई लॉर्ड! ओ माई गॉड! ओ मेरे परम पिता! वो बाहर अपना घूमते रहते हैं। तुम बना तो रहे हो किसी को अपना गार्जियन किसको बना रहे हो? और किसी को भी बना लोगे तो उससे तुम्हें सुविधा या सुरक्षा या संरक्षण मिल जाएगा क्या? आप कह रहे हो कि उसे एक भरोसा आ जाता है कि मुझे कोई मिल रहा है। किसी का हाथ है मेरे सर पर।

प्र: एक होप (आशा) मिलती है।

आचार्य: अरे भैया, मैं मेले में गया। मेरा नाम नुन्नुलाल। पिता जी से तो मैं बिछड़ गया। अब कोई भी यूँही रैंडम आदमी चला जा रहा है, पीछे जाके उसकी अँगुली पकड़ ली तो उससे मुझे क्या मिलेगा? होप तो मिल जाएगी और कुछ नहीं मिलेगा। मैं नुन्नूलाल, और नुन्नूलाल ऐसा ही जैसे नन्नुलाल होते हैं। पूरी दुनिया में कौन है सब? नुन्नूलाल। नुन्नूलाल अपनेआप को ही नहीं जानते तो अपने पिताजी को क्या जानेंगे तो पिताजी तो मेले में…? तो कोई भी चल रहा है जा जाकर बार-बार नुन्नूलाल पीछे से उसकी अँगुली पकड़ लेते हैं, कहीं पैंट पकड़ लेते हैं। तो उससे नुन्लुलाल को एक होप तो मिल जाती है कि मुझे कोई मिल गया; पर कौन मिल गया? और जो मिल गया वो तुम्हारे किसी काम आएगा क्या? उससे तुम्हारा कोई रिश्ता ही नहीं है। यूँही तुमने किसी को पकड़ लिया है बस, बेकार, अकारण।

प्र: आपको होप मिल जाती है पर असली पिता नहीं मिल पाता।

आचार्य: होप मिल जाती है असली पिता नहीं मिलता। असली पिता इधर बैठा है। (अपने ह्रदय की ओर इशारा करते हुए)

प्र: शायद यही कारण है जिस कारण से भारत में बहुत सारे लोग अकर्मण्य हो जाते है कि मैं कुछ नहीं करूँगा। मैं छोड़ दूँगा सब कुछ। बाक़ीजो करेगा वो भगवान करेगा।

आचार्य: अब ऐसा भी नहीं होता कि भगवान करता है। वो जाकर के समाज पर लद जाते हैं। काहे कि अगर तुम सब कुछ छोड़ दोगे तो तुम्हारा खाना-पीना कोई तो कर ही रहा है न! और तुम में इतनी कृतज्ञता भी नहीं है कि साफ़-साफ़ बोलो कि कौन कर रहा है। नुन्नूलाल बड़े हुए थोड़े, संन्यासी हो गये और बैठ गये हैं। कह रहे हैं कि हम कुछ नहीं करते। तो बेटा, ये कपड़े कहाँ से आये? ये खाना-पीना कौन दे रहा है? वो उनके बड़े भाई दे रहे हैं। पर मन में इतनी भी कृतज्ञता नहीं है कि यही बोल दो कि बड़े भाई दे रहे हैं। तो क्या बोल रहे हो कि मेरा खाना-पीना तो भगवान से चल रहा है। भगवान से कहाँ चल रहा है?

प्र: देने वाला तो वो है।

आचार्य: हाँ, देने वाला तो वो है। बड़ा भाई अगर अभी हट जाए तो भूखे मर जाओगे?

प्र: उसमें फिर ये तर्क रहता है कि बड़े भाई नहीं होंगे तो कोई और होगा। कोई और माध्यम होगा जिसके…

आचार्य: हाँ, जो भी कोई होगा तुम जाकर उस पर फ्री राइडिंग करोगे। कुल मिला के ये है कि भाई, नहीं होगा तो किसी और ही कंधे पर चढ़ जाएँगे। रहना तो हमें पैरासाइट (परजीवी ) ही है और और जिसपे भी चढ़ेंगे, कभी उसको दो बोल कृतज्ञता के, अनुग्रह के, ग्रैटिच्यूड के भी नहीं बोलेंगे। हम बोलेंगे 'ये तूने थोड़े ही दिया है।'

प्र: तुझे भी तो उसने दिया है।

आचार्य: हाँ, तूने थोड़े ही दिया है तुझे भी भगवान ने दिया है तो तेरे माध्यम से भगवान ने हमें दिया है। ये क्या है यह? इनग्रैटिच्यूड , कृतघ्नता।

प्र: सर, इसी विषय में एक बात पूछनी थी। आप कह रहे हैं कि एक आम आदमी को न ही आराम मिलता है, न ही चैन मिलता है, न ही उसकी मनोकामना पूरी.. फिर ये जो भ्रम है उसका, वो टूटता क्यों नहीं? वो बार-बार वो तीरथ पर जाएगा, मन्दिर भी जाएगा। जाता जाएगा।

आचार्य: इन्होंने वो शब्द इस्तेमाल करा था न! होप। होप । क्या पता आगे मिल जाए और साथ ही साथ कहानियाँ बना दी गयी हैं कि बेटा अगर तुम्हें नहीं मिला है तो तुम्हारे कर्म ख़राब है। तुमने ठीक से फ़लाने फ़लाने कर्मकांड नहीं करे थे, इसलिए तुमको नहीं मिला। अब एक काम करो। और तुम तल्लीन होकर के कर्मकांड करो। पिछली बार तुमने पाँच दिन का व्रत करा था। इस बार दस दिन का व्रत करो। जब दस दिन का व्रत करोगे तो मनोकामना ज़रूर पूरी हो जाएगी। पिछली बार तुम छोटे पर्वत पर चढ़ के मुराद माँगने गये थे। इस बार और ऊँचे पर्वत की यात्रा करो। इस बार ज़रूर तुम्हारी कामना पूरी होगी। तो 'होप' माने 'आशा' बची रह जाती है। और जानने वालों ने फिर क्या कहा है? आशा ही परमम् दुखम। आशा से बड़ा दुःख दूसरा नहीं है और आशा से बड़ा भ्रम दूसरा नहीं है।

प्र: इसी विषय में मैंने पढ़ा था कि कार्ल मार्क्स ने लिखा था कि रिलीजन इज दी ओपीयम ऑफ द मासेज। (धर्म बहुतों के लिए अफ़ीम है)

आचार्य: तो वो जिस रिलीजन की बात कर रहे थे मार्क्स, वो वही रिलीजन है जिसमें भगवान कहीं बाहर बैठा होता है। अगर भगवान कहीं बाहर बैठा है तो धर्म नशे से ज़्यादा कुछ नहीं है और धर्म से बड़ा होश कुछ नहीं है अगर भगवान यहाँ है। (अपने हृदय की ओर इशारा करते हुए)

प्र: नशा के संदर्भ में उन्होंने बताया था।

आचार्य: न जानना, कुछ का कुछ समझना। नशे का यही अर्थ होता है न कि सामने बिल्ली है उसको कुत्ता समझ रहे हो। सामने छाया है उसको भूत समझ रहे हो। इससे याद आया, अभी भूत तो आया ही नहीं। आज की चर्चा तो भगवान और भूत पर थी। मामला सारा भगवान पर ही रह गया। भूत तो रह ही गये। चलो, भूत अब ले आना। तो छाया है उसको भूत समझ रहे हो या जैसे वेदान्त में होता है, कि रज्जु सर्प। रस्सी है उसको सर्प समझ रहे हो। तो यही सब हैं नशे के लक्षण।

नशे में कुछ एक तरह से प्लेज़र (मज़ा) तो मिलता है वो प्लेज़र कहाँ है उसमें? वो प्लेज़र है यथार्थ के दुख से थोड़ी देर के लिए बेखबर हो जाने का प्लेज़र। हम जैसे जी रहे है, हम मूर्ख लोग हैं तो जब मूर्खता करोगे तो उसमे दुःख भी मिलता है। बेहोशी में थोड़ी देर के लिए उस दुख से राहत मिल जाती है। आप बहुत दर्द में हो, आप बेहोश हो जाओ तो क्या होगा? दर्द से थोड़ी सी राहत मिल जाएगी न! आप बहुत दुख में हो, आप नशा कर लो तो क्या होगा? थोड़ी देर के लिए अपना दुख भूल जाते हो न! तो इसीलिए आम आदमी जान-बूझकर के होश से बचता है। उससे आप ज्ञान की बात करो, एकदम छिटक के दूर भागेगा क्योंकि होश जैसे ही आएगा, दर्द वापस आएगा। आप बेहोश थे, आप नशे में थे तो आपको दर्द का अनुभव तो नहीं हो रहा था और ज्ञान आपको होश में लाता है तो जैसे ही ज्ञान आता है तो दर्द की अनुभूति दोबारा शुरू हो जाती है। तो इसीलिए आम आदमी कहानियों में ख़ूब रस लेता है। इधर-उधर की मान्यताएँ अन्धविश्वास इनमें ख़ूब चलता है लेकिन जैसे ही उसके सामने ज्ञान लेकर के आओ, वो बिदक के भागता है।

प्र: तो अगर हमें उसको उससे हटाना है तो वो जो प्लेज़र है उसी चीज़ का…

आचार्य: उसको बताना होगा कि तुम जिस चीज़ के पीछे भाग रहे हो तुम्हें बाहर नहीं मिलेगी। तुम्हारी जो समस्या है उसका समाधान इधर-उधर दौड़-धूप करके और पचास तरीक़े के विश्वास और कल्पना और मान्यता, इनसे तुम्हें कुछ नहीं मिलने वाला। ये यहाँ आत्मा आत्मा, मैं। आत्मा माने मैं, जो मेरी शुद्धतम अवस्था है उसको आत्मा बोलते हैं। सब अवस्थाओं के पार जो मैं हूँ, उसको आत्मा बोलते हैं।

प्र: भगवान से ही जुड़ी एक और चीज़ रहती है, आपकी क़िस्मत। कि भगवान ने जो है, मेरी क़िस्मत में ये नहीं था या मेरी क़िस्मत में जो है ये रहा। तो फिर क़िस्मत क्या है? उसको किस तरीक़े से देखा जाए?

आचार्य: देखिए, आप जैसे पैदा होते हो तो बहुत सारी चीज़ें आपके हाथ में नहीं होती हैं न! वो एक तरीक़े से विज्ञान की या गणित की भाषा में बोलो तो वो एक्स्टरनल वेरिएबल्स (वाह्य कारक) हैं। जो आपके सिस्टम, जो आपका एक क्लोज्ड सिस्टम है उसके बाहर से ऑपरेट करते हैं वो अनकंट्रोल्ड है, अनियंत्रित हैं। आपके हक़ में, आपके नियन्त्रण में नहीं हैं वो। उदाहरण के लिए आप किस लिंग में पैदा हुए हो, अब आप क्या करोगी? आप महिला पैदा हुई हैं, पुरुष पैदा हुए हैं। आपको क़द क्या मिला है? आप किस देश में पैदा हुए हैं? आपकी जाति, आपकी आर्थिक स्थिति, ये सब चीज़ें आपके नियन्त्रण में तो होती नहीं हैं न! तो ये सब चीज़ें जो है, फिर प्रारब्ध कहलाती है। आप इसे कुछ कर नहीं सकते।

इसी तरीक़े से फिर आप जब जीवन में आगे बढ़ते हो तो सौ चीज़ें होती रहती हैं। आपके पिताजी की लॉटरी लग गयी या आपके घर में किसी की अकाल, असमय मृत्यु हो गयी। आपको किसी वजह से बहुत अच्छे स्कूल में पढ़ने को मिल गया। आपका किसी परीक्षा में एक नम्बर से चयन होते होते रह गया। आप जहाँ गये वहाँ आपको कुसंगति ही कुसंगति मिल गयी। किसी संयोग के चलते किसी ग़लत व्यक्ति से आपका प्रेम प्रसंग जुड़ गया। तो ये सब चीज़ें हैं जो आपके पूरे नियन्त्रण में नहीं होती। आपको क्या पता कि आपके जीवन में कौन आ जाएगा।

प्र: एक रैंडमनस है।

आचार्य: ये रैंडमनस है सीधी सीधी न! यादृक्छिक है मामला। रैंडम है, अकारण है, कुछ इसमें कह नही सकते है। संयोग मात्र है। बस में मेरे बगल में कौन बैठ जाएगा, मुझे क्या पता? बस में जो मेरे बगल में बैठ गया, उससे मेरी प्रीत जुड़ गयी। ऐसा होता ही है। पड़ोस में मेरे कौन रह रहा है, मुझे क्या पता? अब पड़ोस में जो रह रहा था उससे फिर मेरी प्रीत जुड़ गयी या मेरी लड़ाई हो गयी। वो पडोसी था ही ऐसा, लड़ाई हो गयी मैंने उसका सर फोड़ दिया। मैं जेल चला गया। अब चौदह साल जेल में काट के आए; क्यों? क्योंकि संयोगवश ऐसा पड़ोसी मिल गया था कि लड़ाई हो गयी। पचासों चीज़ें ऐसी होती हैं। किसी दिन जा रहे थे, जा रहे थे, ऊपर से बिजली गिर गयी। आपकी गाड़ी में आग लग गयी और आपका हाथ ख़राब हो गया एक। अब ये सब बातें, इस पर आपका कोई नियन्त्रण नहीं होता है न! कोविड हो गया। कोविड हो गया। क्या करोगे? अच्छे खासे आदमी थे। आपने माँगा नहीं था, संयोग की बात है, सो हो गया। कॉलेज में आपके साथ जो बगल में लड़का बैठता था उसको सीट दे दी गयी थी। वो बगल में ही बैठता था। वैसे दूर रहता या कहीं और किसी दूसरी क्लास में बैठता होता तो उससे आपका रिश्ता नहीं बनता। वो बगल में ही बैठता था और बगल में बैठते-बैठते दोनों में रिश्ता बन गया। क्या करूँ?

तो समझदार लोगों ने कहा कि इन सब चीज़ों पर हम बहुत ध्यान नहीं देते। जिस चीज़ पर मेरा नियन्त्रण नहीं उसको बहुत महत्व नहीं। नियन्त्रण नहीं तो महत्व नहीं। महत्व का मेरा पैमाना ही यही होगा कि क्या मेरा इस पर कुछ नियन्त्रण या अधिकार है? और जिस चीज़ पर मेरा अधिकार नहीं, उसको कोई महत्व नहीं। तो इसी फार्मूले, इसी सूत्र पर चलते हुए कृष्ण भी अर्जुन को याद दिलाते हैं कि बेटा, बस ये याद रखना कि अधिकार किस चीज़ पर है। जिस चीज़ पर अधिकार नहीं उसको क्या नहीं देना है? महत्व नहीं। सूत्र क्या है? ‘अधिकार नहीं तो महत्व नहीं।‘ तो बोलते हैं — 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।' जब फल पर अधिकार नहीं है तो फिर फल का? बोलो। महत्व नहीं है। अधिकार नहीं तो? तो फल पर अधिकार तो है नहीं तो फिर फल का महत्व भी नहीं है। हाँ, लेकिन एक चीज़ है, इस पर अधिकार है। किस पर? अपने चुनाव पर। मैं क्या सोचूँगा, मैं क्या बनूँगा, मैं क्या करूँगा, उसमें मेरा पूरा अधिकार है तो उसका फिर पूरा महत्व भी होगा। समझ में आ रही हैं बात? तो महत्व बस उस चीज़ का है जहाँ मेरा चुनाव है। जहाँ मेरे चुनाव की कोई बात ही नहीं, उस चीज़ को मैं कोई महत्व नहीं देता। मेरा रंग काला है। क्या मैंने चुना क्या? और नहीं चुना तो मैं क्या करूँ इसमें? इस बात पर न मैं अपमानित अनुभव करूँगा, न लज्जित अनुभव करूँगा; हाँ जो चीज़ें मेरे चुनाव की थी और वहाँ मैं कोई ग़लती कर दूँ तो मेरी खोट। और मैं अपनेआप को दंड भी दूँगा। तो ये मत देखो कि कौन-सी चीज़ तुमको मिल गयी है। काला गोरा इसमें कुछ नहीं रखा। क़द छोटा रह गया, क़द ऊँचा रह गया, इसमें कुछ नहीं रखा। स्त्री पैदा हो गये, पुरुष पैदा हो गये, इसमें कुछ नहीं रखा। अमीर पैदा हुए, गरीब पैदा हुए, इसमें कुछ नहीं रखा। बात इसकी हैं कि जो कुछ भी मिला तुमने उसका किया क्या? ये सब चीज़ें हैं, जो बस तुमको मिल गयी हैं ‘दीज़ आर गिवेन वेरिएबल्स।‘ अब प्रश्न ये है कि ये जो तुमको मिला, तुमने उसका किया क्या? समझ में आ रही है बात? बेसन भी हो सकता है गेहूँ का आटा भी हो सकता है। जौ और बाजरा, रागी पचास तरह की होती है चीज़ें। ये सब तुम्हें क्या है जो तुम्हें चीज़ें मिली हैं। अलग-अलग रंग की चीज़ें मिली हैं। रंग से क्या होता है? देखना क्या है? जो कुछ भी मिला था, तुमने उससे पकाया क्या? कहते हैं, मुझे तो सब सड़ा ही सड़ा मिला था। तो ऐसी रसोई छोड़ने का अधिकार भी मिला था न जिसमे सब सड़ा ही सड़ा था। जाओ, कहीं और अपनी नयी रसोई बनाओ। वो अधिकार तो है न! नया निर्माण करो। देखो कि तुम क्या कर सकते हो। ये मत रोओ कि तुम्हारे साथ हुआ क्या। ये जो भाग्यवाद है, ये बहुत बुरा होता है। 'फेटलिस्म।' हाय, मैं क्या करूँ, मेरे साथ तो ऐसा हो गया। क़िस्मत ने ऐसा कर दिया। अजी क़िस्मत पर किसका नियन्त्रण है तो क़िस्मत की फिर बात क्या करनी है। “कर्मण्येवाधिकारस्ते।” कर्म की बात करो।

प्र: आचार्य जी, आपने अभी बताया कि सारी चीज़ें, जो प्रारब्ध है वो बेसिकली वेरिएबल्स हैं जिनको हमको दे दिये गए हैं और कहा गया हैं कि उनके साथ आप कैसा सदुपयोग करते हैं। मगर उसी धर्म ने हमें कुछ चीटकोड्स दिये हैं। जैसे जिनको कहते है एस्ट्रोलॉजी (ज्योतिष विज्ञान)। वैसे ही आता है वास्तुशास्त्र। और कहते हैं कि अगर आपके साथ कुछ गड़बड़ हो रहा है तो काल सर्प दोष है या ऐसा कुछ है और उन चीटकोड्स से आप उन वेरिएबल्स को, जो आपको लगता है कि मिला हुआ है उसके साथ एडजस्ट करना चाहिए...

आचार्य: ऐसे नहीं होता। प्रकृति किसी का कहना नहीं मानती। उसके अपने नियम होते हैं। तुम्हारे शूं शा से उसके नियम नहीं बदल जाते। विज्ञान भी प्रकृति के नियमों को तोड़ने का प्रयास भी नहीं करता। बस वो उनको जानने का प्रयास करता है। तो न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण न तोड़ दिया, न बना दिया। उन्होंने बस गुरुत्वाकर्षण को जान लिया और एक सूत्र में, गणित के एक फार्मूले में अभिव्यक्त कर दिया। कि फोर्स बराबर जी एम वन एम टू बाई आर स्क्वायर।' (F=Gm1m2/r2) और उसको कोई नहीं बदल सकता। कोई नहीं बदल सकता तो कोई चीटकोड नहीं होता। न्यूटन ने भी बस आपको बताया है कि ऐसा होता है। न्यूटन भी ये नहीं कर सकते कि वो जो चीज़ है उसको बदल दें। बदलने का किसी के पास हक़ नहीं है। प्रकृति के संयोगों को कोई नहीं बदल सकता। उसके अपने तरीक़े हैं। और इसी तरीक़े से मन है। मन के भी अपने नियम हैं। उसमें ये वो करना, उससे नहीं चलता।

प्र: किसी में आचार्य जी, एक और काफ़ी महत्वपूर्ण मुद्दा है कि भगवान के नाम पर मन्दिरों के बाहर पशु बलि दी जाती है तो अपनी कामना कुछ होती है आपकी और आपको बताया जाता है कि आपको अगर अपनी ये कामना की पूर्ति चाहिए तो आप उसके लिए इन पशुओं की बलि दे दें। तो इसी पर सवाल था।

आचार्य: नहीं, देखो जब भगवान ही तुम्हारी कामना का ही दूसरा नाम है कि भगवान माने कामना। भगवान माने कामना-पूर्ति। तो आपको अगर पशु के माँस की कामना है तो आप भगवान के नाम पर उसको पूरा करोगे क्योंकि भगवान को तो आपने सीधे-सीधे कामना से जोड़ दिया न! तो भगवान के नाम पर आप वो सब कुछ करोगे जिससे आपकी कामनाएँ तृप्त होती हैं। भगवान के नाम पर बढ़िया लज़्ज़तदार खाना चलेगा, भोजन चलेगा। त्यौहारों पर क्या चलता है? बढ़िया खाना बन रहा है, खाओ। अब धर्म का स्वादिष्ट और ज़ायकेदार खाने से क्या सम्बन्ध है? कहेंगे, ‘वाह! क्या स्वाद है! क्या लज़्ज़त है!’ कभी सोचा नहीं कि धर्म का सम्बन्ध ज़बान के स्वाद से क्या होगा? है, बहुत गहरा सम्बन्ध है। गहरा सम्बन्ध ये है कि जो हमने धर्म बना रखे हैं, वो सब-के-सब धर्म बस हमारी कामनाओं के रूप हैं। तो जब धर्म ही कामना का रूप है तो धर्म के नाम पर बढ़िया-बढ़िया कपड़े चलते हैं। धर्म में देखा सोना कितना चलता है आभूषण कितना चलते हैं? धर्म का सम्बन्ध सोने से कैसे जुड़ गया? स्वर्ण ही स्वर्ण धर्म के नाम पर। भोजन ही भोजन धर्म के नाम पर। स्वाद ही स्वाद, रंग-ही-रंग, पैसा ही पैसा धर्म के नाम पर। दूध-ही-दूध धर्म के नाम पर। दुग्धाभिषेक चल रहा है, क्यों? धर्म का दूध से क्या लेना देना? कभी नहीं सोचा? मन के चैन का किसी पशु के दूध से क्या लेना देना होगा? लेकिन कामनाएँ है, बस कामनाएँ है। तो पैसा लाओ, सोना लाओ, दूध लाओ, भोजन लाओ, अच्छे-अच्छे कपड़े लाओ। ये दुनिया भर में रहा है कि जो पुरोहित लोग रहे हैं, चाहे किसी भी धर्म के पुरोहित हों, उनको कपड़े देने की प्रथा रही है। ये कपड़े क्यों? धर्म तो आवरण उतारने के लिए है। धर्म तो इसलिए है कि अपने ऊपर तुमने जो कुछ भी लाद रखा है, सब उतार दो। सारे अपने छिलके उतार दो, धर्म तो इसलिए होता है। तो धर्म में ये फिर इतने वस्त्रों का महत्व कहाँ से आ गया? आम आदमी भी हो सकता है कि ये सीधा-सादा जीवन जी रहा हो, लेकिन अगर वो धार्मिक हो जाए तो उसको बहुत चक्कर लगाने पड़ेंगे बाज़ार के। आम आदमी तो फिर भी हो सकता है कि लगभग एक संन्यासी का जीवन जी रहा हो अपनी शान्त, अपनी ज़िन्दगी उसके छोटे से घर में। लेकिन अगर वो धार्मिक हो गया तो अब उसके चक्कर लगेंगे बाजार के। इस तरीक़े का वस्त्र चाहिए। इस तरीक़े का आटा चाहिए। और पता नही क्या क्या चीज़ें होती हैं जो धर्म के नाम पर चलती हैं। इस तरीक़े का बड़ा कलश चाहिए।

प्र: धूप, अगरबत्ती।

आचार्य: इस तरह की अगरबत्ती, इस तरह की सुगन्ध चाहिए। इस तरीक़े का रंग कराओ। अब ये सब धर्म के नाम पर होने लग जाता है। तो धर्म क्या है? धर्म तो हमने कामना से जोड़ दिया हैं इसीलिए हमारा धर्म बाज़ार से बिलकुल जुड़ा हुआ है। भीतर वाला धर्म बाज़ार से नहीं जुड़ा होता। जो यहाँ वाला धर्म होता है न, आत्मा वाला धर्म, असली भगवान वाला धर्म, भीतरी भगवान वाला धर्म; उसका बाज़ार से कोई रिश्ता नहीं होता। वही सच्ची आस्तिकता होती है। जो ये बाहर का धर्म है ये नास्तिकता है।

प्र: आचार्य जी, भारतीय समाज में भजनों को सुनने का बहुत महत्व रहा है। मैंने बचपन से ही अपने घर में या अगल-बगल में ये देखा है कि लोग सुबह-शाम भजन सुनते थे। बहुत लोगों को भजनों के अर्थ भी समझ में नहीं आते थे। लेकिन सही भजन क्या है क्योंकि जो भी भजन हमने सुने हैं या तो वो किसी ईश्वर की महिमा, महिमा-मंडित कर रहे हैं। उसमें से जो सीख ली जा सकती है वो क्या चीज़ होनी चाहिए?

आचार्य: देखो, पहली बात तो जो सही भजन है वो सही व्यक्ति द्वारा आना चाहिए। भजन सही हो इसके लिए भगत सही होना चाहिए न। तभी तो वो…, नहीं तो फिर आप भज तो किसी को भी सकते हो। आप अपनी कामनाओं को भजना शुरू कर दो, उसका नाम भी भजन हो सकता है। इस समय इतना सारा जो भक्ति-संगीत चल रहा है बाज़ार में, वो और क्या है। वो कामनाओं को ही तो भजा जा रहा है उसमें। तो पहली बात तो स्रोत उसका सही हो। दूसरी बात, देखो कि तुम उसका अर्थ समझ रहे हो कि नहीं समझ रहे हो? क्योंकि अच्छे आदमी — और ऊँचे आदमी ने भी कोई बात बोली है, वो बात इसलिए बस थोड़े ही बोली है कि तुम उसे गाये जाओ, गाये जाओ, गाये जाओ, बिना समझे गाये जाओ। उसका मतलब भी तो समझो कि क्या बोला गया है।

जैसे हमारा ‘संत-सरिता’ होता है, अब वो उसमें पाँच घंटे सत्र चलता है। और पाँच घंटे में गाने का कार्यक्रम कुल कितनी देर होता है। पाँच घंटे में गाने वाली बात कुल कितनी देर की होती है कुल मिला के बीस मिनट होगा, आधा घंटा होगा और बाक़ीसाढ़े-चार-घंटे हम क्या करते हैं? समझते हैं। हम कहते हैं, समझने में साढ़े-चार-घंटा लगाओ। फिर आधा घंटा गाओ। बिना समझे अगर गा दिया तो अनर्थ हो जाएगा। और समझना इतनी आसान बात नहीं है। साढ़े-चार-घंटा लगता है तब एक छोटे से भजन का अर्थ स्पष्ट होता है। फिर गाओ उसको। ये लोग जो बिना समझे ही गाते रहते हैं वो बस, भजन के नाम पर अपना संगीतमय मनोरंजन कर रहे हैं। अब भगवान स्पष्ट हो गये हैं? भगवान स्पष्ट हो गये हैं? बात समझ में आयी ये भगवान? तो लगाओ फिर छलांग भूतों पर! भूत इंतज़ार कर रहे हैं बहुत देर से सब!

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