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बकरीद: कुछ आँकड़े, और एक आग्रह || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
79 मिनट
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प्रश्नकर्ता१: नमस्ते सर। सर, बकरीद आने वाली है तो कल ही मेरे दोस्तों से मेरी बात हो रही थी व्हाट्सएप पर। तो उन्हें मैंने बोला कि भई इस बकरीद पर आप बकरा मत काटना — वो हर बकरीद पर काटते हैं।

तो उन्होंने मुझे सीधा ये बोला कि भाई, हम तो एक ही दिन काटते हैं, जो हर दिन कट रहे हैं उनका क्या!

तो मुझे उनकी बात ठीक लगी। मैंने सर्च (तलाश) किया जाकर कि हर दिन हम कितने जानवर काटते हैं, तो कुछ आँकड़े हैं वो मैं आपके सामने रखना चाहूँगा।

भारत में हम हर दिन तीन करोड़ जानवर काटते हैं लैंड एनिमल्स (थलचर)।

आचार्य प्रशांत: हाँ।

प्र और बाईस करोड़ मछलियाँ।

आचार्य: हाँ, तीन करोड़ जिसमें लैंड एनिमल्स हैं। जिसमें कैटल (मवेशी) और पोल्ट्री (मुर्गी, बत्तख आदि) दोनों आएँगे। तीन करोड़ लैंड एनिमल्स हैं न?

प्र जी।

आचार्य: बकरे, मुर्गे, और फिर जो भेड़, भैंस और वो सब। तो तीन करोड़ तो लैंड एनिमल्स प्रतिदिन भारत में कट रहे हैं। एक-सौ-चालीस करोड़ की आबादी और तीन करोड़ सिर्फ़ जानवर काट रहे हैं। और मछलियाँ कितनी मार रहे हैं?

प्र बाईस करोड़।

आचार्य: बाईस करोड़ मछलियाँ भारत में हम प्रतिदिन मार रहे हैं।

प्र और भारत मछलियों के मामले में तीसरे नंबर पर है।

आचार्य: और जो लैंड एनिमल्स हैं, उनके मामले में?

प्र उनके मामले में वो, कैटल के मामले में पहला है। भेड़ और बकरियों के मामले में तीसरा है। और चिकन (मुर्गों) के मामले में पाँचवाँ है।

आचार्य: कैटल के मामले में पहला है, माने उसमें जो भैंस वग़ैरह आ गई।

प्र: हाँ, गाय-भैंस आ गई।

आचार्य: उनके मामले में दुनिया में पहला है?

प्र जी, पहला है।

आचार्य: हाँ, तभी हम दुनिया के बीफ एक्सपोर्टर हैं नंबर एक के। तो भारत प्रतिदिन कैटल को मारने के मामले में दुनिया का नंबर एक देश है। और क्या बताया, तीसरा पर जो है?

प्र: वो कैटल दोनों तरह से — डेरी (दुग्धोत्पादक) के अन्दर जो इस्तेमाल होती हैं, वो हम सीधे तौर पर न भी काटें, तो भी अल्टीमेटली (आगे जाकर) वो कटती ही हैं।

आचार्य: आगे कटती हैं? पर वही संख्या में बताओ जो कटती हैं। जो कटती हैं प्रतिदिन, उसके आधार पर हम पहले नंबर पर हैं?

प्र जी, भारत पहले पर है।

आचार्य: और तुमने क्या बताया था कि रोज़ कितने जानवर काटते हैं? लैंड एनिमल्स तीन करोड़?

प्र जी, हम तीन करोड़ हर दिन भारत में काट रहे हैं।

आचार्य: तीन करोड़ लैंड एनिमल्स और बाईस करोड़ मछलियाँ।

प्र जी, और ये तीन करोड़ हम भारत में काटते हैं और पूरे विश्व में हम एक दिन में तेईस करोड़। तो पूरे विश्व में तेईस करोड़, तीन करोड़ भारत से।

आचार्य: पूरे विश्व में तेईस करोड़ और भारत में तीन करोड़। तो मतलब हमारी जो आबादी है, वो दुनिया की सोलह-सत्रह प्रतिशत है। भारत की जो आबादी है वो दुनिया की कुल आबादी का सोलह-सत्रह प्रतिशत है और लगभग उतने ही अनुपात में हम दुनिया के जानवर भी काट रहे हैं, थोड़ा-सा कम होगा, बस थोड़ा-सा कम।

प्र तो हम उतने ही माँसाहारी हैं जितना...।

आचार्य: हम उतने ही मांसाहारी हैं जितना शेष विश्व है। बस इतना है कि भारत में जो कटता है वो ज़्यादातर भारत में नहीं खाया जाता, वो एक्सपोर्ट (निर्यात) हो जाता है।

प्र जी, निर्यात हो जाता है।

आचार्य: क्योंकि भारत में शाकाहारियों की जो तादाद है, वो अभी भी बीस-तीस प्रतिशत की बची हुई है।

प्र जी।

आचार्य: लेकिन जहाँ तक जानवरों को काटने का मामला है, भारत में भी उसी अनुपात में जानवर कटते हैं जिस अनुपात में किसी भी और देश में कटते हों; चाहे वो विकसित देश हों, चाहे वो मिडल ईस्ट (मध्य-पूर्वी देश) हो, चाहे यूरोप हो, चीन हो, कोई भी। तो जिस हिसाब से वहाँ जानवर कटते हैं, उसी हिसाब से भारत में भी कटते हैं।

प्र जी।

आचार्य: तो कम-से-कम इस आधार पर तो हम ये नहीं कह सकते कि भारत एक अहिंसक देश है। है न? काटते हैं, भले ही खाया उतना न जाता हो। मेरे ख़्याल से अगर पर कैपिटा फ्लेश कंजम्पशन (प्रति व्यक्ति माँसाहार) लोगे तो वो भारत में कम आएगा बाक़ी देशों से, काफ़ी कम आएगा।

तो हम कर क्या रहे हैं, हम ख़ुद नहीं कंज्यूम कर रहे हैं, हम काट-काटकर के पूरी दुनिया को खिला रहे हैं। हम अपने जानवरों को काटते हैं और पूरी दुनिया को खिलाते हैं।

ठीक है।

प्र इसी से अभी शायद हाल ही में, कुछ ज़िंदा पशु निर्यात का मैं पढ़ रहा था कि भारत से…।

आचार्य: हाँ, उस पर अलग से बात करेंगे कि अब हम कुत्ते-बिल्ली भी ज़िंदा ही दूसरे देशों को एक्सपोर्ट करना चाहते हैं, ख़ासकर ऐसे देशों को जो उनका माँस फिर आगे खाएँगे। तो भारत ये काम कर रहा है अपनी अहिंसा, अपनी संस्कृति के नाम पर कि सबसे ज़्यादा जानवर यहाँ कट रहे हैं और जो ज़िंदा जानवर हैं उनका भी एक्सपोर्ट करने को अब हम बिलकुल आतुर हुए जा रहे हैं।

प्र जी।

आचार्य: और जो हमारे सबसे धर्मपरायण क्षेत्र हैं, वहाँ ये काम सबसे ज़्यादा होता है। मेरे ख़्याल से सबसे ज़्यादा जो बीफ़ प्रोडक्शन या फ्लेश प्रोडक्शन है, वो उत्तर प्रदेश में ही होता है।

प्र जी, उत्तर प्रदेश में। और उसमें एक और चीज़ है कि उत्तर प्रदेश में कानपुर प्रसिद्ध है चमड़े के उद्योग के लिए।

आचार्य: वो तो ख़ैर बहुत ज़माने से है। सौ साल से ऊपर से कानपुर फेमस है। पर जो माँस का एक्सपोर्टर है, और विशेषकर भैंसों के माँस का, उसमें उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश अभी ताज़ा-ताज़ा एकदम उभर कर सामने आया है।

प्र जी।

आचार्य: हम इसको पिंक रेवोल्यूशन (गुलाबी क्रांति) का नाम दे रहे हैं। हम कह रहे हैं, ‘अब भारत की तरक़्क़ी ऐसे होगी कि — गुलाबी माने वो गुलाबी नहीं है, वो लाल है। लाल माने ख़ून — कि जानवरों के ख़ून से अब भारत की तरक़्क़ी होगी। वो पिंक रेवोल्यूशन कहला रहा है।

चलो हाँ, तो ये तो ठीक है।

ये महत्वपूर्ण तथ्य हैं, अच्छा है सामने ला रहे हो। ठीक है।

फिर क्या बात थी?

प्र तीन रेवोल्यूशन हैं — पिंक रेवोल्यूशन , जैसा कि आपने बोला वैसे ही वाइट रेवोल्यूशन (श्वेत क्रांति) भारत में चलता है। और एक है ब्लू रेवोल्यूशन (नीली क्रांति), जिसमें कि आप सरकार से धनराशि प्राप्त करते हैं एक्वेटिक एनिमल्स को और मछलियों को व्यवसायिक रूप से पालने के लिए। सरकार इसमें पूरा-पूरा समर्थन करती है।

आचार्य: हाँ, ब्लू रेवोल्यूशन। पूरा गवर्नमेंट सपोर्ट करती है और उसको हम नाम देते हैं— मत्स्य पालन।

प्र हाँ, मत्स्य पालन।

आचार्य: जैसे बच्चे पाल रहे हों, पाला तो बच्चों को जाता है। पाला तो किसी ऐसे को जाता है जो प्यारा हो। तो मुर्गी पालन, मत्स्य पालन— ये कितने झूठे और कितने फ़रेब के शब्द हैं!

आप किसी का ख़ून पीने की इच्छा रखते हो और आप नाम दे रहे हो उसे पालन का! और सरकार इसे प्रोत्साहन खूब देती आयी है।

ठीक है।

प्र तो अब इस में आज बकरीद वाली चीज़ पर ही जब ये आँकड़ा मैंने निकाला तो ये निकल कर आया कि बकरीद पर कितने जानवर कटते हैं वो मैंने निकाला। तो इसका पूरा सटीक डेटा (आंकड़ा) नहीं मिला। हमें ऐसा मिला कि पाकिस्तान के अन्दर और बांग्लादेश में कितने कटते हैं। तो उसी के हिसाब से…

आचार्य: एक डेटा अभी मिसिंग (गायब) है। तुमने कहा, भारत में तीन करोड़ लैंड एनिमल्स कटते हैं प्रतिदिन और विश्व में तेईस करोड़ कटते हैं। और तुमने कहा भारत में प्रतिदिन बाईस करोड़ मछलियाँ मारी जाती हैं। विश्व में कितनी मारी जाती हैं?

प्र जी, विश्व में प्रतिदिन दो-सौ-तिहत्तर करोड़। आठ प्रतिशत।

आचार्य: दो-सौ-तिहत्तर करोड़ मछलियाँ मारी जाती हैं। माने जितनी दुनिया की आबादी है, अगर आठ-सौ करोड़ दुनिया की आबादी है तो लगभग उसके आधे जानवर हम प्रतिदिन मार देते हैं।

प्र जी, बिलकुल।

आचार्य: मतलब हर दो इंसान जो ज़िंदा हैं, अपने पीछे एक जानवर प्रतिदिन मार रहे हैं।

प्र जी।

आचार्य: (हँसते हुए) ये हमारे ज़िंदा होने की क़ीमत है प्रकृति के ऊपर। प्रकृति बड़ी भारी क़ीमत अदा कर रही है इंसानों को ज़िंदा रख कर। हम में अगर कोई भी दो इंसान ज़िंदा हैं औसतन, तो उनके पीछे प्रतिदिन एक जानवर कट रहा है। इस शर्त पर, इस क़ीमत पर वो ज़िंदा हैं। बड़ी भारी क़ीमत है।

प्र और जैसे मान लो, कोई कैटल है या चिकन है तो आप एक को किसी एक दिन काट पाओ, उसके पीछे कितने पाल कर रखने पड़ते होंगे! तो उतना वो कष्ट झेल रहे हैं।

आचार्य: हाँ, बिलकुल। ये तो अभी सिर्फ़ हमने उनकी बात करी जो कट गया उस दिन। वो उसके पीछे पीड़ा कितनों को दी जा रही है और रक्त कितनों का चूसा जा रहा है, ज़बरदस्ती दूध कितने का दुहा जा रहा है, ज़बरदस्ती गर्भाधान कितनों का किया जा रहा है, फर (छाल) कितनों के नोंचे जा रहे हैं, उसकी तो कोई इंतेहां ही नहीं है।

अंडे कितनों के वसूले जा रहे हैं, उसकी तो कोई अभी हमने गिनती करी ही नहीं है। अभी तो बस हमने उसकी बात करी जो कट गया। उस कटने वाले के पीछे पीड़ा जो झेल रहे हैं, उनकी कोई अभी गिनती नहीं करी।

प्र आपने अंडों की बात की, तो भारत का एक आँकड़ा है कि भारत अंडों के मामले में विश्व का तीसरे नंबर का सबसे बड़ा उत्पादक है।

आचार्य: हाँ, तो भारत और किसी चीज़ में आगे निकल रहा हो, न निकल रहा हो, इस चीज़ में तो अब भारत एकदम चमक कर सामने आ रहा है।

प्र फर्स्ट सेकंड थर्ड, फर्स्ट सेकंड थर्ड।

आचार्य: फर्स्ट सेकंड थर्ड, फर्स्ट सेकंड थर्ड। ओलंपिक में पदक भले ही अभी दो-चार, दो-चार आते हों लेकिन इस चीज़ में हम स्वर्ण, रजत, कांस्य सब लेकर के बैठे हुए हैं कि हत्याएँ कितनी करनी हैं। जानवरों की हत्याओं के मामले में अब हम दुनिया में सबसे आगे हो चुके हैं।

ये धरती है अहिंसा की। ये धरती है महावीर की, गौतम की। और इस धरती पर ये चल रहा है।

प्र जी। ये तो मैंने निकाला कि हर दिन जानवर कितने कटते हैं। फिर मैंने देखा कि साल का जो एक दिन आता है बकरीद का, उस दिन हम कितने काटते हैं, कितने अधिक कितने अतिरिक्त काट लेते हैं क्योंकि वही उनका तर्क था। तो ये आँकड़ा निकलकर आया कि हर दिन हम— उसका पूरा सटीक डेटा नहीं मिला था कि भारत में कितना, विश्व में कितना— लेकिन हाँ, पाकिस्तान, बांग्लादेश ऐसे कुछ हमें देश का डेटा मिला।

आचार्य: हाँ।

प्र तो उसके हिसाब से हमने जो उसको एक्स्ट्रापोलेट (अतिरिक्त सूचना) करके निकाला तो ये निकल कर आया कि पाँच से छह करोड़ हम बकरीद के दिन जानवर अतिरिक्त काटते हैं, अधिक काट देते हैं।

आचार्य: हाँ, माने बकरीद के दिन इतने जानवर काटे जाते हैं अतिरिक्त।

प्र जी।

आचार्य: जो प्रतिदिन कटते थे सामान्य लोगों के लिए, वो तो कटते ही थे, बकरीद के दिन ये तुमने भारत के लिए एक्सट्रापोलेट करा है?

प्र पूरे विश्व का बोल रहा हूँ।

आचार्य: पूरे विश्व में कितने हैं?

प्र पाँच से छह करोड़ आया।

आचार्य: पूरे विश्व में पाँच से छह करोड़ जानवर बकरीद के दिन काटे जाते हैं।

प्र जी, सर। डेढ़ सौ करोड़ की मुस्लिम आबादी है तो उसमें।

आचार्य: दुनिया की?

प्र हाँ, तो उसमें अगर हम मानें कि परिवार कितने हैं तो पच्चीस करोड़ के आसपास परिवार हैं। उनमें पाँच-छह करोड़ ये आँकड़ा निकलकर आया।

आचार्य: अच्छा, तो बकरीद के दिन पाँच-छह करोड़ जानवर — बड़े जानवर, लैंड एनिमल्स काटे जाते हैं। ठीक है।

प्र तो वो बोले कि भाई ये तो पाँच-छह करोड़ हैं, ये जो आपका प्रतिदिन बाईस करोड़ आप काट रहे हो, ये तो उसका कुछ भी नहीं है। इसका अगर हम निकालेंगे प्रतिशत, तो उसकी तुलना में ये कुछ भी नहीं है। तो फिर आप हमें क्यों इतना बोल रहे हैं? ये देखो न, जो हर दिन कट रहे हैं।

आचार्य: क्या तर्क है फिर से समझाओ हमको।

प्र तर्क उनका ये कि हम पूरे साल में एक दिन काटते हैं और पाँच करोड़ काट रहे हैं। आप प्रतिदिन बाईस करोड़ काट रहे हो और साल के अन्दर तो आप तिरासी सौ करोड़ काट रहे हो।

आचार्य: ठीक है। वो कह रहे हैं कि आप साल में तिरासी सौ करोड़ काट देते हो और हम एक दिन काट रहे हैं और पाँच-छह करोड़ ही काट रहे हैं, तो इसमें हमने बुरा क्या कर दिया!

प्र बुरा क्या कर दिया! और एक और बात वो ये बोलते हैं, ख़ासकर एक दोस्त ने मछली को लेकर भेजा कि पूरे विश्व में आप हर दिन एक लाख करोड़ मछलियाँ काटते हैं, तो उसमें तो हमारा कोई योगदान होता ही नहीं है। तो आप फिर…।

आचार्य: प्रतिवर्ष?

प्र हाँ, प्रतिवर्ष।

आचार्य: एक लाख करोड़ मछलियाँ प्रतिवर्ष आप काट रहे हो।

नहीं, उसमें तो योगदान सभी का है। उसमें तो सभी हैं— इसाई हैं, मुसलिम हैं, हिंदु हैं; जितने भी लोग हैं दुनिया के सभी हैं।

ठीक है।

तो उनका कुल-मिलाकर के जो इसमें तर्क है वो ये है कि प्रतिदिन बाईस करोड़ जानवर तो आप काटते ही हो।

प्र जी।

आचार्य: और उस हिसाब से आप प्रतिवर्ष कितने काट देते हो?

प्र तिरासी-सौ-करोड़।

आचार्य: ‘तिरासी-सौ करोड़ काट देते हो। तो अगर हमने बकरीद के दिन पाँच करोड़ जानवर काट दिए तो इसमें हमने कौनसा ऐसा गुनाह कर दिया?’

प्र हाँ, ‘कौनसा गुनाह कर दिया?’ और अगर आपको इतना ही जानवरों से प्रेम है तो आप…

आचार्य: 'और जानवरों से प्रेम है तो आप पाँच करोड़ जानवरों की बात करोगे या तिरासी-सौ करोड़ की बात करोगे!' हाँ, इस तर्क में बिलकुल दम है और इस तर्क में बहुत बड़ी खामी भी है।

आपके मुस्लिम बंधुओं ने ये जो तर्क दिया है, इस तर्क में कहीं पर वज़न भी है लेकिन साथ-ही-साथ ये तर्क कहीं पर बहुत खोखला भी है। वज़न तो ये निश्चित रूप से रखता ही है। आँकड़े गवाह हैं कि इस तर्क में वज़न है कि भाई, आप अगर तीन सौ पैंसठ गुना बाईस माने ये कितना? आठ हज़ार?

प्र आठ-हज़ार-तीन-सौ-करोड़।

आचार्य: आठ-हज़ार-तीन-सौ-करोड़ जानवर साल में काट रहे हो। पहले तो ये जो संख्या है इसको सीने में की खंजर की तरह उतर जाने दो। हम इतने निर्दयी लोग हैं! हम आदमी हैं? हम क्या हैं? हमें कैसे इंसान कहा जाएगा?

तिरासी-सौ करोड़ जानवर मानवता हर साल खाने के लिए काट रही है। और अभी उसमें रिसर्च (खोज) के लिए और दूसरे सामानों के लिए कितनों को हम मार-काट देते हैं, उसकी तो अभी कोई गिनती नहीं है। और इसमें मछलियाँ नहीं गिनी हैं, तिरासी-सौ करोड़ लैंड एनिमल्स हैं। ये बड़े जानवर हैं ये, जिनको हम — तिरासी-सौ करोड़! आठ-सौ करोड़ की इंसान की आबादी और तिरासी-सौ करोड़!

हम क्या हैं! राक्षस और किसको बोलते हैं? ये कैसे लोग हैं हम? और मानव इतिहास में इतने जानवर कभी नहीं काटे गए। इसका कोई छोटा-सा अंश भी कभी नहीं काटा गया जितना हम काट रहे हैं, प्रतिदिन काट रहे हैं। और मछलियाँ इसमें जोड़ दो, तिरासी-सौ करोड़ में, तो लाखों करोड़ हो जाता है। लाखों करोड़।

प्र१ एक-लाख करोड़।

आचार्य: एक-लाख करोड़ मछलियाँ। ये हम इतने वहशी लोग हैं! और वहशियत का ये नंगा नाच जो है, ये पूरे साल चलता है। लेकिन वही है कि जब एक दिन वो चीज़ कॉन्सट्रेट हो जाती है तो ज़्यादा नज़र में आती है, ज़्यादा बुरा लगता है।

तो उसके बचाव में अगर कोई कहे कि ये काम तो आप सालभर ही कर रहे हो, तो उसने अपनी ओर से बात तो देखो, ठीक ही बोली है। और जो लोग ख़ुद ही सालभर माँस खाते हों, उनको न जाने हक़ कैसे है कि वो फिर कहें कि बकरीद के दिन कुर्बानी ग़लत है। आप ऐसे आदमी हो जिसने अपने स्वाद के लिए साल में बीस बकरे, पचास मुर्गे और एक हज़ार मछलियाँ कटवा दीं, तो आपको क्या हक़ है बकरीद पर आपत्ति करने का?

कुछ आपत्तियाँ सिर्फ़ तभी करी जा सकती हैं जब पहले आपका अपना दामन साफ़ हो। आपका अपना चरित्र थोड़ा स्वच्छ हो तब तो आप जाकर के कहेंगे कि भाई, आप जो कर रहे हैं वो ग़लत काम है।

तो ये दुनिया क्या बोलने चली आ रही है, जब ये दुनिया ख़ुद इतनी निर्मम है और ख़ुद जानवरों के साथ इतना राक्षसी बर्ताव कर रही है, तो ये दुनिया क्या बोलेगी।

तो यहाँ तक तो मैं आपके वो जो मुस्लिम दोस्त हैं, उनकी बात से सहमत हूँ कि हाँ, अगर आपको माँसाहार के ख़िलाफ़ बात करनी है तो वो बात आपको साल के तीन-सौ-पैंसठ दिन करनी चाहिए। माँसाहार के ख़िलाफ़ बिलकुल बात होनी चाहिए। और उसके जो कारण हैं, वो इस चर्चा में अगर आपके पास समय होगा तो आप उस पर बात कर लेना, उठा लेना मुद्दे को। उस पर करेंगे बात।

तीन-सौ-पैंसठ दिन बात होनी चाहिए- पहली बात तो ये। तो ये मैं मानता हूँ कि ये चीज़ ग़लत है और जानवरों के साथ हम जो कर रहे हैं, उसका असर, वीभत्स असर, घातक असर जानवरों पर, प्रकृति पर तो पड़ ही रहा है और हम पर जिस तरीक़े से पड़ रहा है उसकी चर्चा भी होनी चाहिए आज। वो भी आप बात कर लीजिएगा।

लेकिन ये मुद्दा यहाँ तक तो बिलकुल ठीक है कि दुनिया जब इतने जानवर काटती है तो फिर शोर सिर्फ़ बकरीद के दिन ही क्यों मच रहा है। तो इसका लेकिन उत्तर ये नहीं है कि जब सारे तीन-सौ-पैंसठ दिन कट रहा है तो हम आज भी काटेंगे। आज ईद है, हम आज भी काटेंगे।

एक गुनाह दूसरे गुनाह को जायज़ नहीं ठहरा सकता। बड़ा गुनाह भी छोटे गुनाह को जायज़ नहीं ठहरा सकता। हर गुनाह जो रोका जा सकता है उसे रोका जाना चाहिए। और ये पहले तो स्वीकार किया जाना चाहिए कि हाँ, ये बात ग़लत है। तभी हम उसे गुनाह कह रहे हैं। और उस पर साफ़-साफ़ चर्चा होनी चाहिए, बहस होनी चाहिए। जिज्ञासा के साथ समझना पड़ेगा कि वो चीज़ ग़लत है। हाँ, ग़लत है।

और ये जो दुनिया है, जो इतनी क़ातिलाना है, इसको ये देखना पड़ेगा कि साहब, हम क्या हैं ये! हम किस तरीक़े से अपनेआप को इंसान बोलते हैं! तो उस बात से मैं सहमत हूँ लेकिन साथ-ही-साथ मैंने कहा था कि जहाँ इस तर्क में दम है, वहीं ये तर्क खोखला भी है।

खोखला कैसे है?

धर्म वो होता है जो आपको हिंसा से अहिंसा की ओर ले जाए। धर्म वो होता है जो आपको जानवर से इंसान बनाए। यही धर्म की परिभाषा है न कि आदमी पैदा तो जानवर ही होता है। आदमी जानवर ही पैदा होता है और जानवरों वाली सारी वृत्तियाँ उसमें होती हैं। और जानवरों से अलग उसमें एक चीज़ और होती है— बुद्धि।

वृत्तियाँ माने टेंडेंसीज़। इंटरनल टेंडेंसीज़ उसकी सारी-की-सारी जानवरों जैसी होती हैं। गुस्सा जानवर में होता है, गुस्सा आदमी में होता है। लालच जानवर में होता है, आदमी में होता है। डर जानवर में होता है, डर आदमी में होता है। कामवासना जानवर में होती है, आदमी में होती है। इर्ष्या जानवर में होती है, इर्ष्या आदमी में होती है। इन सबके साथ-साथ लेकिन आदमी के पास एक अतिरिक्त चीज़ होती है— अक्ल, बुद्धि।

लेकिन इन सब टेंडेंसीज़ के साथ जब बुद्धि भी होती है तो बात और ख़तरनाक हो जाती है। जैसे एक लालची आदमी के पास बुद्धि हो तो वो क्या करता है बुद्धि से? या एक हिंसक आदमी के पास बुद्धि हो तो वो क्या करेगा? ईर्ष्यालु आदमी, झगड़ालू आदमी के पास बुद्धि हो तो वो क्या करेगा?

तो आदमी जानवर ही नहीं है, आदमी बहुत ख़तरनाक जानवर है। इस ख़तरनाक जानवर को जो चीज़ इंसान, मानव बनाती है, उसको धर्म बोलते हैं। तो धर्म हमारे आचरण के बाक़ी क्षेत्रों से एकदम भिन्न और दूसरे आयाम की बात है।

आप अपने मनोरंजन के लिए कुछ करें, आप अपने लालच में कुछ करें, आप अपनी हवस में कुछ करें, आप अपने अज्ञान में कुछ करें, वो एक चीज़ है। और आप वही काम धर्म के नाम पर करने लगें, तो बात दस गुनी ज़्यादा ख़तरनाक हो जाती है। क्योंकि एक आदमी ने कुछ ग़लत खा लिया हो, वो एक बात है। और वो आदमी अपना इलाज़ कराने जाए और उसको दवाई के नाम पर ज़हर दे दिया जाए, ये बिलकुल दूसरी बात है।

धर्म इंसान की दवाई है। और इंसान है तो फूहड़ ही जीव, वो कुछ-न-कुछ उल्टा-पुल्टा खाता रहता है — खाने को मैं प्रतीक की तरह इस्तेमाल कर रहा हूँ। समझ रहे हैं न? दिनभर जो हम हरकतें करते हैं, उसको मैं खाने का ही प्रतीक ले रहा हूँ — और धर्म उसकी दवाई होती है। आपने अपने साथ जो भी गड़बड़ कर ली है, धर्म इसलिए होता है कि आप अपनेआप को स्वस्थ कर सकें, ठीक कर सकें मानसिक रूप से। अब अगर दवा भी ज़हर हो गयी तो इंसान को बचाएगा कौन?

आपने अपनी हवस और अपने मनोरंजन, अपने स्वाद के लिए एक जानवर को काट दिया; वो बिलकुल ग़लत बात है। लेकिन अगर आपने धर्म के नाम पर जानवर को काट दिया, तो वो दस गुनी ज़्यादा ग़लत बात है।

ये तो ग़लत है ही बिलकुल कि आप जा करके बाज़ार में कह रहे हैं कि लाओ भाई, स्वादिष्ट मुझे चिकन टिक्का खिलाओ। आपके पास पैसा है और आपके पास तमाम तरह के खाने की चीज़ों के विकल्प हैं, आप कुछ भी खा सकते थे लेकिन आपने कहा, ‘मुझे चिकन टिक्का खाना है क्योंकि मेरी लार वो चीज़ माँग रही है, मेरी ज़बान उस चीज़ का‌ आग्रह कर रही है, मुझे बस चिकन टिक्का दो।’ वो तो निश्चित रूप से गुनाह की बात है ही।

आप कुछ भी खा सकते थे, आप हट्टे-कट्टे आदमी हो। कुछ ऐसा नहीं है कि मेडिकल रीज़न से आए हो कोई दवाई खाने के लिए। और आपने कहा, ‘मुझे बकरा चबाना है’, वो बिलकुल ग़लत बात है। लेकिन वही बकरा अगर आप धर्म का नाम लेकर चबाने लग गए या काटने लग गए, तो मैं कह रहा हूँ, दस गुना ज़्यादा ग़लत बात है। क्योंकि धर्म इंसान की दवाई है।

आपको साधारण खाने में फ़ूड पॉयजनिंग हो जाए, वो तो अपनेआप में एक बुरी घटना होती ही है, पर दोहरा रहा हूँ, आप फ़ूड पॉयजनिंग के इलाज़ के लिए दवाई लें और वो दवाई ही पॉयजन (जहर) हो, ये दस गुना, सौ गुना ज़्यादा ख़तरनाक बात है न!

तो धर्म के नाम पर जब हिंसा होती है, तो उसका तो समझिए कोई ओर-छोर ही नहीं होता, वो इतनी ग़लत चीज़ होती है।

तो आपके जिन दोस्तों ने आपसे कहा कि इतने जब जानवर रोज़ कटते हैं और प्रतिवर्ष कटते हैं तो फिर ईद पर ही शोर क्यों होता है। उनकी बात यहाँ तक बिलकुल ठीक है कि जानवर किसी भी दिन नहीं कटने चाहिए, तीन-सौ-पैंसठ दिन विरोध होना चाहिए। और सिर्फ़ मुस्लिमों का नहीं, जो भी व्यक्ति माँस खा रहा है, उसको समझाना चाहिए और उसकी नादानी का विरोध होना चाहिए। बड़ी हिंसक और बड़ी रक्त-रंजित, बड़ी ख़ूनी नादानी है ये, इसका विरोध होना चाहिए।

तो यहाँ तक तो बात ठीक है। तीन-सौ-पैंसठ दिन विरोध करो और हर उस इंसान का विरोध करो जो किसी भी तरह से जानवरों पर अत्याचार करता है। ये बात मैं मान रहा हूँ, लेकिन ये भी बात माननी पड़ेगी कि जब धर्म के नाम पर बलि या क़ुर्बानी दी जाती है, तो वो बात दस गुना, सौ गुना ज़्यादा ग़लत होती है। क्योंकि धर्म का काम है हमें अहिंसा की ओर ले जाना, और धर्म ही हिंसा अगर करवाने लग गया तो इंसान को अब कौन बचाएगा!

मनुष्य तो पैदा ही हिंसक होता है। आप एक छोटे बच्चे को देखो, उसकी सारी जो टेंडेंसीज़ (प्रवृत्तियाँ) हैं, वो हिंसक होती हैं। वो अपने स्वार्थ के लिए चलता है, उसे कोई कीड़ा मिलेगा वो बिलकुल मार सकता है। छोटा बच्चा कोई परमार्थी थोड़े ही होता है कि उसको दूसरों का भला देखना है। वो तो अपना देखता है कि मुझे क्या चाहिए। उसको अगर अपना दूध चाहिए तो रात के दो बजे वो माँ को पकड़-पकड़ कर, कचोट कर जगाएगा कि नहीं मेरी भूख शांत करो।

तो हम तो पैदा ही होते हैं स्वार्थी, और धर्म का काम है हमें उस स्वार्थ से मुक्त कराना। उसकी जगह धर्म ही अगर हमें स्वार्थ का पाठ पढ़ाने लग गया कि तुम अपनी धारणाओं के लिए किसी की गर्दन काट सकते हो; अगर धर्म भी ये काम कराने लग गया तो हमें कौन बचाएगा फिर?

प्र सर, पर मैंने इसमें देखा है कि इसमें एक तर्क ये भी दिया जाता है कि हम स्वार्थ के लिए नहीं काटते। हम तो मानते हैं कि ये जो माँस हम काटते हैं, बकरीद के दिन जो क़ुर्बानी दी जाती है, उस माँस के तीन हिस्से किए जाते हैं। एक अपने लिए, एक अपने रिश्तेदारों के लिए और एक ग़रीबों के लिए।

तो ईद के दिन जो क़ुर्बानी दी जाती है उससे ग़रीबों में माँस बँटता है। तो ऐसे बहुत से लोग हैं, परिवार हैं जिनको पैसे की कमी है।

आचार्य: अरे भाई! ग़रीबों में माँस क्यों बाँटना है? इसका तुक क्या है? ग़रीबों में माँस क्यों बाँटना है? ग़रीब को माँस क्यों चाहिए?

भाई, ग़रीब को आहार चाहिए। ग़रीब को शिक्षा चाहिए। ग़रीब को रोटी चाहिए। ग़रीब को माँस क्यों खिला रहे हो, वो क्या करेगा माँस का? तुक क्या है कि ग़रीब को माँस देना है? क्यों देना है ग़रीब को माँस? मैं कह रहा हूँ, अमीर को भी माँस नहीं चाहिए, तुम्हें ग़रीब को माँस क्यों देना है?

माँस की ज़रूरत तो वैज्ञानिक बात ये है कि किसी अमीर को भी नहीं है। माँस एक बेतुकी चीज़ है जो सेहत के लिए भी अच्छी नहीं होती। ग़रीब को माँस क्यों दे रहे हो? ग़रीब की आवश्यकताएँ क्या हैं? ग़रीब से कभी पूछा है कि तुझे क्या चाहिए?

और ग़रीब के शरीर में अगर कुछ मान लो मिनरल्स की, विटामिन्स की कमी भी है, तो वो कमी माँस से पूरी होगी या जितने पैसे में माँस आता है उतने पैसे से अन्य आहार बहुत सारे आप उसको दे सकते हो।

उदाहरण के लिए मान लो, मैं एक भिखारी हूँ और मैं बहुत कमज़ोर हो गया हूँ। मैं तीस किलो का हो गया हूँ बिलकुल। मैं एक भिखारी हूँ और मेरे शरीर में हर चीज़ की कमी हो गई है— विटामिन ए, बी, सी, डी सब लाइन से। और जितने मिनरल्स हैं, वो भी सब कम हैं। सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम, मैंग्निशियम सब मेरे शरीर में कम हो गया है। और मैं तुम्हारे सामने पड़ता हूँ तो तुम क्या करोगे? तुम मुझे एक हज़ार रुपए का केक खिलाओगे?

प्र नहीं।

आचार्य: और कहोगे कि देखो, मैंने कितनी भलाई करी है, पूरे एक हज़ार का केक खिलाया है इसको। ये मैंने दान करा है।

या अगर तुम्हारे पास एक हज़ार रुपए हैं ही मेरे ऊपर ख़र्च करने को तो तुम उन एक हज़ार रुपयों से मुझे वो चीज़ें दोगे जिनसे मेरे शरीर में जिस चीज़ की कमी है वो कमी पूरी हो?

माँस से कौनसी कमी पूरी हो रही है ग़रीब की? ग़रीब को तो कुछ और चाहिए ज़िंदगी में। और जितने पैसे का तुमने माँस दे दिया उतने पैसे में न जाने कितनी और चीज़ें तुम उसको दे सकते थे। खाने-पीने की भी, पहनने की भी, शिक्षा की भी, ज्ञान की भी, और न जाने क्या-क्या।

हम बहुत अच्छे से जानते हैं कि अगर आप प्रोटीन की बात करो, चाहे विटामिन बी, सी, डी, किसी विटामिन की भी बात कर लो, माँस इन चीज़ों को पाने का बड़ा महँगा स्रोत होता है। माँस बहुत महँगा स्रोत है जैसे केक, कि आप किसी ग़रीब को केक खिला रहे हो। काहे को केक खिला रहे हो भाई? केक उसके किसी काम का नहीं है। तो ये तर्क बहुत बेकार है कि माँस हम ग़रीबों को देते हैं, इससे ग़रीबों का भला होता है।

ग़रीबों का भला सोचना निश्चितरूप से बहुत अच्छी बात है। मैं इस बात की तारीफ़ करता हूँ कि हम ग़रीबों का भला सोच रहे हैं, बहुत प्रशंसा की बात है ये। पर ग़रीबों का भला वैसे करो न जैसे उनका भला होता हो।

वो एक नंगा ग़रीब खड़ा हुआ है, आप उसको जाकर केक खिला रहे हो। भाई! उसको एक कम्बल दे दो, उसके बच्चे को स्कूल में दाखिला दिला दो। और जितने में तुमने उसको माँस दिया है इतने में बहुत सारी दाल दे दो, उसको प्रोटीन मिल जाएगा और उसको बहुत सारे और तत्वों की ज़रूरत है जो माँस में पाए भी नहीं जाते हैं, वो सब तत्व जिन चीज़ों में मिलते हैं उसको वो दो; माँस देने का तुक क्या बनता है?

ये तो एक तरह से अपनेआप को, समझिए कि जैसे, ख़ून के कर्ज़ से मुक्त करने वाली बात है। अपने दामन पर जो ख़ून के छींटें पड़े हैं, वो छींटें पोंछने वाली बात है कि हमने सारा ख़ुद थोड़े ही खा लिया, हमने एक तिहाई ग़रीब को भी खिला दिया। ग़रीब ने कब कहा था उसको चाहिए? और उन देशों में क्या करोगे जहाँ कोई इतना ग़रीब होता ही नहीं है कि उसको माँस किसी से माँगकर खाना पड़े?

बहुत सारे विकसित देश हैं, वहाँ भी मुस्लिम लोग हैं, वो इतने गरीब हैं ही नहीं। पर हम कहते हैं, ‘हम ऐसे लोगों को कुर्बानी का माँस देते हैं जो बेचारे साल में एक बार भी माँस नहीं खा पाते थे।’ अमेरिका के मुसलमानों में ऐसे कितने हैं, जो साल में एक बार भी ख़ुद खरीदकर माँस नहीं खा सकते?

तो ये तर्क तो बेकार हो गया न कि हम उनको देते हैं तब बेचारे खा पाते हैं। वहाँ तो सब अपने ही पैसे से खा रहे थे तो आपने कुर्बानी करके उनको क्या दे दिया?

यही बात फिर मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्वी देशों) पर भी लागू होती है।

प्र जी।

आचार्य: सऊदी अरब, जहाँ पर जो प्रति व्यक्ति आय है, वो ऊँची है काफ़ी।

प्र२ यूएई, कतर।

आचार्य: यूएई है या कतर है, इनमें तो जो औसत आय है वो बहुत ऊँचे स्तर की है। वहाँ कौनसा ग़रीब घूम रहा है जिसको आप माँस देते हो तब बेचारा पाता है? उसको तो माँस चाहिए होगा, वो अपने पैसे से खरीद लेगा। वहाँ इतना ग़रीब कोई है ही नहीं।

प्र जी।

आचार्य: तो ये बेकार का तर्क है कि हम तो माँस दूसरों को देते हैं। ये तर्क तो देखिए वाजिब नहीं है। और अब मैं जब ये सब बातें बोल रहा हूँ तो बहुत आसान होगा मेरी बातों को ये कहकर ख़ारिज़ कर देना, मेरा विरोध कर देना या मेरे ख़िलाफ़ हिंसक हो जाना ये कहकर कि जब आप मुसलमान नहीं हैं तो मुसलमानों के मामले में आप क्यों दखल दे रहे हैं?

प्र जी।

आचार्य: और ये पहला तर्क होगा जो बहुत सारे मुस्लिम भाइयों के मन में आएगा कि ये आदमी हिंदू है, तो ये इसलिए आज मुसलमानों के ख़िलाफ़ बोल रहा है।

देखिए, हिंदू-मुसलमान वाली बात को अगर आप थोड़ा सा किनारे रख करके मुझे एक इंसान की तरह सुन पाएँ, तो शायद आपको लगे कि मेरी बात में कुछ वज़न है। पर आप अगर मुझे हिंदू-मुस्लिम के लेंस से ही देखेंगे, तो मुझे लगता है यहाँ पहुँचते-पहुँचते आप बस मेरे ख़िलाफ़ हो चुके होंगे। और आपको यही लग रहा होगा कि मैं एक धर्म को नीचा दिखाने के लिए और दूसरे धर्मों को ऊँचा दिखाने के लिए कोई बातें कर रहा हूँ।

मैं देखिए, बेचारे जानवर के लिए बात कर रहा हूँ। मैं धर्म की वास्तविक परिभाषा के लिए बात कर रहा हूँ। ठीक है? मैं आपके हितैषी, आपके मित्र, आपके दोस्त की तरह बात कर रहा हूँ। मेरा इरादा किसी को भी धोखा देने का नहीं है, मेरा इरादा किसी को भी नीचा दिखाने का नहीं है।

तो यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते अगर आपको ये लगने लगा हो कि मेरी बात आपको अपमानित कर रही है, और मैं किसी एजेंडा के चलते बोल रहा हूँ, तो आप यही करेंगे कि मेरी बात इसके आगे सुनेंगे ही नहीं। अभी ये रिकार्ड हो रहा है सब, आप वीडियो यहीं पर बंद कर देंगे। आप वीडियो बंद करके ये भी कर सकते हैं कि आप ये वीडियो किसी ग्रुप में फॉरवर्ड कर दें और कहें कि देखो, ये कितना ग़लत बात बोल रहा है आदमी! इसको मार दो।

आप ये भी कर सकते हैं कि आप नीचे आ करके कोई भद्दा सा कमेंट लिख दें, आप गालीबाजी कर दें। आप ये सबकुछ कर सकते हैं, ठीक उसी तरह जैसे तीन-सौ-पैंसठ दिन हम न जाने लाखों जानवरों का क़त्ल करते आये हैं, ये बेहोशी की बात है। बेहोशी में जैसे हम इतना ख़ून बहाते हैं, वैसे ही इस वीडियो में मैं जो बातें बोल रहा हूँ, आप बेहोशी में उन बातों पर कोई प्रतिक्रिया दे सकते हैं।

मेरी आपसे विनती है, हाथ जोड़कर मैं आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ, मेरे पास कोई एजेंडा नहीं है, मेरे पास दुख है। जो चारों ओर हमने बर्बादी, कहर बरपा रखा है, उसके कारण मेरे पास बस पीड़ा है। और मैं उस दुख के कारण आपसे बात कर रहा हूँ।

तो मैं आपके पास अपना दुख बाँटने आया हूँ। मैं नीचा वग़ैरह दिखाने की नीयत से आपके सामने नहीं बैठा हुआ हूँ। तो उम्मीद करता हूँ कि आप मेरी बात अंत तक सुनेंगे और थोड़ा निरपेक्ष होकर उसे समझने की कोशिश करेंगे।

हाँ, बोलिए आगे।

प्र जी सर। सर, इसमें एक और बात निकल कर आती है कि भाई, हम तो बकरा काटते हैं लेकिन आप भी तो अपने मंदिरों के अंदर बलि चढ़ाते हो।

आचार्य: हाँ, तो वो बात बिलकुल ठीक है। मैं इस तर्क से पूर्णतया सहमत हूँ। बात इसमें ये है ही नहीं कि जानवर को मुस्लिम काट रहा है, कि जानवर को हिंदू काट रहा है। बात ये है कि बेचारा जानवर बिना बात के अपनी जान से गया।

और हिंदुओं के मंदिरों में अगर बलि होती है तो हमने उसका पुरज़ोर विरोध किया है, और वो बात बिलकुल ग़लत है। और न जाने कितनी बार, कितनी जगहों पर मंदिरों में या धर्म के नाम पर या तंत्र के नाम पर जो बलि दी जाती है, उसको अच्छे तरीक़े से उघेड़ा है। और उसको स्पष्ट किया है कि वो बात कितनी ग़लत है। और इस तरह के जो प्रयास रहे हैं, वो रंग भी लाए हैं।

आप जानते हैं, बहुत सारे ऐसे मंदिर हैं जहाँ पहले पशुबलि दी जाती थी, पर वहाँ पर बरसों तक समझाने-बुझाने का ये प्रभाव पड़ा है कि वहाँ पर अब वो पशुओं की जगह — जैसे पहले था कि अब वहाँ पर भैंस काट रहे हैं, या बकरा काट रहे हैं — तो उसकी जगह वो गन्ना काट देते हैं। वो कहते हैं, ‘चलो, काटना ही है तो सांकेतिक रूप से हम किसी और चीज़ को काट देंगे। संकेत हो गया।' और ईश्वर नहीं कह रहा है कि मुझे किसी बेगुनाह जीव के रक्त में स्नान करना है।

तो जितने भी धर्मों में हिंसा है और जानवरों के साथ अत्याचार है। हमने सभी का विरोध किया है।

तो वो ठीक है।

ठीक वैसे, जैसे बकरीद पर कुर्बानी की बात जायज़ नहीं है, वैसे ही अगर मंदिरों में बलि हो रही है तो वो बात भी जायज़ नहीं है। और हमने उसका भी विरोध करा है। बिलकुल!

ये, देखिए, जो भी आपके मित्र हैं, या जो भी वाइडर ऑडियंस है मुस्लिम, उनको यही समझाइए कि यहाँ बात हिंदू-मुस्लिम की नहीं है। वो जो सामने आपके एक जीव है उसकी आँखों में देखो। उसको क्या फ़र्क पड़ता है कि उसका झटका हुआ कि हलाल हुआ; वो तो जान से गया न?

और उसने कुछ ऐसा गुनाह नहीं कर दिया था कि आपने उसको मार दिया। और उसको मार करके आपको कोई पुण्य कहीं से नहीं मिल गया। आप एक खरीदा हुआ जानवर ले आते हो, आप उसकी जान ले लेते हो; थोड़ा तो विचार करो, इससे आपको कौन सा पुण्य मिल जाएगा?

और वो भी जानवर आप ऊँचे दामों में लेकर आते हो क्योंकि बकरीद के आसपास जानवरों के दाम और बढ़ जाते हैं। इससे आपको कौनसा पुण्य मिल जाएगा? कैसे? हो सकता है क्या?

मैं कहीं बाज़ार में गया, मैं एक जानवर लेकर आ गया। मैंने उसको दस दिन रखा, मैंने उसकी गर्दन काट दी। मैंने उसका गोश्त खा लिया; इससे मुझे पुण्य कैसे मिल सकता है? ये काम चाहे हिंदू करे, चाहे मुस्लिम करे, कोई करे; बताओ, इससे कैसे कोई लाभ, कोई पूण्य हो सकता है? ये तो पाप का काम है सीधे-सीधे, कि नहीं है?

प्र जी।

आचार्य: मतलब धर्म इसलिए थोड़े ही होता है कि हमारे विवेक को, हमारी बुद्धि को पूरी तरह खा जाए। तो धार्मिक लोग इतनी उल्टी-पुल्टी बातें क्यों करते हैं? धर्म का काम होता है— बुद्धि को निर्मल करना, विवेक को जागृत करना। उसकी जगह होता ये है कि धार्मिक लोग एकदम ही उटपटांग बातें करते हैं।

प्र सर, इस मामले में मैं उदित जी से बात कर रहा था। तो यही था कि हमारे शास्त्रों के अंदर भी अगर ये लिखा हुआ है तो कुछ तो सोच-समझकर लिखा होगा कि भाई, पशुओं की बलि और क़ुर्बानी जो है।

आचार्य: देखिए, अगर किसी भी किताब में — धार्मिक किताब में, धर्मशास्त्र में — कुछ बातें लिखी हुई हैं, मैं बहुत बार समझा चुका हूँ, इस मौके पर फिर बताए देता हूँ, वो बातें हमेशा दो तरह की होती हैं। कोई भी रिलिजियस बुक (धार्मिक ग्रंथ) हो, उसमें हमेशा जो बातें होती हैं, उनको दो हिस्सों में बाँटकर देखना चाहिए। एक बातें होती हैं टाइम डिपेंडेंट और दूसरी बातें होती हैं टाइम लेस। समय सापेक्ष और समय निरपेक्ष। काल आश्रित और कालातीत।

काल आश्रित बात मतलब जो किसी समय पर प्रासंगिकता रखती है, पर उसके बाद वो प्रासंगिक नहीं है। और जो कालातीत बात होती है, वो बात होती है जो इटरनल (शाश्वत) है, टाइम लेस है। वो हर समय रेलेवेंट (प्रासंगिक) रहेगी।

और ये जो मैंने बात बोली, ये हर रिलीजियस बुक पर लागू होती है, विदआउट एक्सेप्शन (बिना अपवाद के)‌। कि उसमें कुछ बातें ऐसी ज़रूर होंगी जो सिर्फ़ उस समय प्रासंगिक थीं जब वो बातें कही गई हैं। और उसमें बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो दस हज़ार साल बीत जाएँ, वो बातें तब भी सही रहेंगी, काम की रहेंगी, प्रासंगिक रहेंगी, उपयोगी रहेंगी और हमें रोशनी दिखाएँगी, दिशा दिखाएँगी।

तो जो बात एकदम दुनिया की चीज़ों की हो, जैसे अब मान लीजिए कि कहीं पर, किसी भी धार्मिक ग्रंथ में, किसी रथ का उल्लेख आता है। अब रथ तो एक टाइम डिपेंडेंट चीज़ होती है न, उसको हम एक इटरनल बात नहीं मान सकते। या मानोगे? कि कहीं किसी रथ की बात आ गयी तो कहेंगे, ‘ये तो टाइम डिपेंडेंट (समय सापेक्ष) बात है, इसको छोड़ो!’

हाँ, उस रथ के माध्यम से कोई मैसेज (सीख) दिया गया हो, वो टाइम लेस हो सकता है। पर अब आप ये थोड़े ही करोगे कि आज से मान लीजिए तीन हज़ार साल पहले कोई किताब लिखी गयी या एक हज़ार साल पहले की कोई बात है, और आपने कह दिया उसमें रथ की बात है तो हमें आज भी रथ पर चलना है। आप ये तो नहीं करोगे न?

जो बातें मन से सम्बन्धित हों, वो बातें हमेशा के लिए होती हैं, वो टाइम लेस बातें होती हैं, कालातीत बातें होती हैं। वो इटरनल बात है, वो हमेशा काम आएगी। क्योंकि मन आदमी का आज भी वैसा है, जैसा?

प्र हज़ार साल पहले था।

आचार्य: पहले था। सबकुछ बदल गया है दुनिया में, इंसान का मन तो नहीं बदला है न ये बिलकुल फंडामेंटल्स (मूल बातें) हैं, जो लोग इस बात को समझ जाएँगे वो मुझसे थोड़ी कुछ सहानुभूति रख पाएँगे। जो इस बात को नहीं समझेंगे, उनको यही लगेगा कि मैं यहाँ पर आकर कोई भड़काऊ बात कर रहा हूँ या किसी को मैं हार्ट (आहत) करना चाहता हूँ।

भाई, हर्ट-वर्ट डिग्री करने की कोई बात नहीं है। कोई बात है जो आपको समझाना चाहता हूँ, और आपसे आग्रह है कि कृपा करके थोड़ा समझें उस बात को।

तो आदमी का मन नहीं बदला, बाक़ी सब बदल गया। अपनेआप आसपास देखिए, आपको कोई चीज़ ऐसी नहीं दिखाई देगी जो आज से चंद हज़ार साल पहले भी होती थी। दीवारें ऐसी होती थीं कई हज़ार साल पहले? नहीं होती थीं।

ये आपने कोट पहन रखा है, ये आपने हाथ में माइक ले रखा है, आपने घड़ी पहन रखी है, मोबाइल रखा हुआ है, ये फ़र्श इस तरीक़े का है, यहाँ पंखे हैं, ये लाइटें हैं, ये कैमरे हैं, ये सब चीज़ें कई हज़ार साल पहले नहीं होती थीं। सब बदल गया इंसान का।

क्या है जो नहीं बदला है?

इंसान का खोपड़ा नहीं बदला है। पहले भी हम लड़ते थे, हम आज भी लड़ते हैं। हम पहले भी पगले थे, हम आज भी पगले हैं। हम पहले भी भ्रम में रहते थे, हम आज भी भ्रम में रहते हैं। हम पहले भी वासना के खेल खेलते थे, हम आज भी खेलते हैं। हम पहले भी लालची और ईर्ष्यालु थे, हम आज भी लालची और ईर्ष्यालु हैं। पहले भी लड़ाइयाँ जिन मुद्दों पर होती थीं, मूल रूप से आज भी लड़ाइयाँ उन्हीं मुद्दों पर होती हैं। तो मन नहीं बदला है न!

माने इंसान का मन है जो लगातार एक जैसा ही बना रहता है।

प्र हाँ।

आचार्य: तो फिर शास्त्रों में या जो भी धार्मिक किताबें हैं मज़हबी, उनमें जो बातें इंसान के मन से सम्बन्धित हैं — क्योंकि ये जो ईगो (अहंकार) है, ये मुक्ति के लिए तड़पती है और वही चीज़ है जो धर्म का विषय है। द इगो एंड इट्स क्वेस्ट फ़ॉर फुलफिलमेंट ऑर लिबरेशन (अहम् और इसकी पूर्णता या मुक्ति की प्यास) — बस धर्म इतना ही होता है।

धर्म का बाक़ी चीज़ों से नहीं ताल्लुक़ है। आप कहें कि धर्म का ताल्लुक़ आपके मकान से है, आपकी सड़क से है और आप क्या खाते हो, क्या पीते हो, क्या पहनते हो इन चीज़ों से है; इन चीज़ों से धर्म का क्या लेना-देना?

धर्म का सम्बन्ध सीधे-सीधे सिर्फ़ ईगो से होता है, ईगो से। क्योंकि वही चीज़ है जो लगातार बनी रहती है। और वही चीज़ है जो आदमी को बहुत परेशान करती है। और वो चीज़ साइंस (विज्ञान) के दायरे में आती नहीं है। साइंस एक्सटर्नल ऑब्जेक्ट्स (बाह्य वस्तुओं) को देखता है, ये जो इंटरनल सब्जेक्ट (आंतरिक कर्ता) बैठा है, साइंस इसको देखता ही नहीं है।

धर्म उसको देखता है, वो जो इंटरनल सब्जेक्ट है। और जो इंटरनल सब्जेक्ट है, वो बहुत परेशान रहता है। तो धर्म का काम होता है उस इंटरनल सब्जेक्ट माने ईगो (अहम्) को समझना और उसको शांति, संतुष्टि और मुक्ति देने का प्रयास करना।

ये धर्म की परिभाषा है- अहम् को समझना और देखना कि अहम् को कैसे शांति, संतुष्टि, मुक्ति दी जा सकती है। बस ये धर्म का काम है। और बाक़ी चीज़ों से धर्म का कोई लेना-देना नहीं है। बाक़ी सब कल्पनाएँ हैं, कहानियाँ हैं या बेकार की चीज़ें हैं जो धर्म में डाल दी गई हैं। वो धर्म का कचड़ा हैं। उस कचड़े को हटाना चाहिए।

तो मानव मन की तड़प निरंतर बनी हुई है। तो धर्मशास्त्रों में से भी सिर्फ़ वही बातें लेने लायक़ हैं जो मानव मन की तड़प को सम्बोधित करती हैं, जो मानव मन को शांति देने के लिए ही लिखी गई हैं।

उनके अलावा भी बहुत सारी बातें हैं तमाम तरह की धार्मिक किताबों में। उनको ये मानना चाहिए कि ये बस उस समय के लिए रेलेवेंट (प्रासंगिक) थीं जब ये बातें कही गई थीं। आज उनकी कोई रेलेवेन्स (प्रासंगिकता) नहीं है। तो उन बातों को दूर से नमस्कार करना चाहिए और कहना चाहिए कि भाई, आप एक समय की बात थे। आज आपका कोई उपयोग नहीं है। हमने आपको सम्मान के साथ देखा और हमने कहा आप यहाँ विराजें, हमें हमारी ज़िंदगी जीने दें। और हमारी ज़िंदगी जीने में जो बातें हैं, चाहे वो श्लोक हों, दोहे हों, आयतें हों, वो जो हमारे काम आते हैं, हम उनको आज महत्व देंगे। जो चीज़ें कालातीत हैं धर्मग्रंथों में, हम उनको महत्व देंगे।

अब एक बात बताओ, आप अगर इस तरीक़े का तर्क करोगे कि साहब, हमारे तो ग्रंथ में लिखा हुआ है कि भेड़ और बकरी काटनी है। ठीक है?

अब ठीक वैसे, जैसे रथ एक समय सापेक्ष वस्तु होता है, वैसे ही कोई भी प्रजाति भी तो समय सापेक्ष होती है न?

जब ग्रंथ लिखा गया था, उस समय से आज के बीच में लाखों-करोड़ों प्रजातियाँ विलुप्त हो गईं न? और उसमें सिर्फ़ यही नहीं है कि पेड़-पौधे विलुप्त होते हैं, जानवर कितने विलुप्त हो गए हम‌ बहुत अच्छे तरीक़े से जानते हैं। साँपों की प्रजातियों से लेकर के पशु-पक्षियों की प्रजातियों तक न जाने क्या-क्या तो विलुप्त हो चुका है। कितने तो कीट-पतंगे विलुप्त हो गए, और कितने से मेरा आशय पाँच-दस नहीं है, हज़ारों।

प्र जी।

आचार्य: एक जानवर हुआ करता था—डोडो। वो भेड़-बकरी जैसे ही दिखता था। वो विलुप्त हो गया न?

अच्छा। अब मान लीजिए भेड़-बकरी भी विलुप्त हो जाएँ तो? इतने सब जानवर विलुप्त हुए, भेड़-बकरी भी विलुप्त हो गए। आप कहेंगे कि हमारे यहाँ तो लिखा हुआ है कि भेड़-बकरी काटनी है, अब भेड़-बकरी है ही नहीं, एक्सटिंक्ट हो गई, विलुप्त हो गई, अब क्या काटोगे?

अब बताओ?

तो समय सापेक्ष चीज़ें धर्म में बहुत महत्व नहीं रखती हैं। जहाँ कहीं भी ऐसी चीज़ देखो जो समय के साथ आती है, समय के साथ चली जाती है, जान लो कि वो बात बस धर्म की सरकम्फेरेंस पर है, पेरिफेरी (परिधि) पर है; वो धर्म के कोर में नहीं है। धर्म के कोर में तो वही बात है जो सीधे-सीधे ईगो को एड्रेस करती हो।

जो सीधे-सीधे?

प्र: ईगो को एड्रेस करती हो।

आचार्य: ईगो को एड्रेस करती हो बस वही बात। बाक़ी सब बातों को कहना चाहिए कि ये ठीक है, ये बात कभी कही गयी थी, आज इसका महत्व नहीं है। आज हम इसको बहुत महत्व के साथ नहीं रख सकते हैं।

प्र जी।

आचार्य: आप कह रहे हो कि आप चले जाओगे, आप किसी दूसरे ग्रह पर बसोगे। बिलकुल ऐसा हो सकता है। आज से सौ, दो-सौ साल बाद मानवता किसी दूसरे ग्रह पर चली गई है। और वहाँ जानवर दूसरे होंगे या पृथ्वी के सारे जानवर वहाँ लेकर जाओगे?

और तुम कहो कि साहब, हमारे ग्रंथ में तो लिखा हुआ कि फ़लाना जानवर तो काटना है। वो जानवर वहाँ कहाँ से लाओगे?

तो ये सब बातें तो समय की बातें हैं, "आवत-जावत हैं" — आती-जाती रहती हैं। इन बातों को बहुत महत्व नहीं देते। इन बातों को आधार बनाकर तर्क नहीं करते। इन बातों को आधार बनाकर तर्क करोगे तो वो कुतर्क हो जाएगा।

प्र जी, लेकिन मैंने इसमें कई लोगों को ये बोलते हुए सुना है कि आचार्य जी जिस तरह से धर्म को परिभाषित कर रहे हैं वो बहुत अच्छा है, वो बहुत आदर्शवादी है। लेकिन जिस तरह से आज चीज़ें चल रही हैं, जो हम व्यवहारिकता को देखते हैं, वहाँ तो चीज़ें बहुत अलग हैं। उसको फिर हम कैसे सुधारें?

आचार्य: भाई, आप आज कुछ उल्टा-पुल्टा कर लो, तो वो चीज़ असली हो गई? और जो असली चीज़ थी फिर आप उसको बोलोगे, ये तो काल्पनिक और आदर्श है। ऐसा थोड़े ही होता है!

आप इसको (गिलास का पानी) बोलने लग जाओ कि ये एचटूएसओफोर है, सल्फ्यूरिक एसिड है। और बोलो कि ये तो असली बात है न, सब लोग इसको एचटूएसओफोर बोलते हैं। तो वो बात कोई असली नहीं है, वो बात पागल है। वो विक्षिप्तता की बात है।

आप धर्म के एक बहुत ही कचरा रूप को पकड़ कर बैठ गए हो, आपने धर्म को बर्बाद कर दिया है। और मैं पूरी दुनिया के लिए बोल रहा हूँ, मैं जितने धर्म हैं उन सबके अनुयायियों के लिए बोल रहा हूँ ये बात — आपने धर्म को, रिलीज़न को, मज़हब को एकदम तबाह कर दिया, कहीं का नहीं छोड़ा। और उसके बाद आप बोलते हो कि आपने जो तबाही करके धर्म का एडिशन चला रखा है, संस्करण चला रखा है, जो रूप चला रखा है, वो असली है।

और जो असली है, उसको आप बोल देते हो – वो तो आदर्श है, वो तो काल्पनिक है। और मैं जब उसकी बात करता हूँ, तो आप मुझे बोल देते हो कि ये आदमी यूटोपियन (काल्पनिक) है। ये आदमी तो आदर्शवादी और काल्पनिक बात कर रहा है।

मैं काल्पनिक बात नही कर रहा; मैं ही असली बात कर रहा हूँ। फ़ालतू की कल्पनाओं में साहब आप जी रहे हैं। आप अपनेआप को कहते हो- धार्मिक आदमी, और आपको धर्म का कुछ पता है नहीं। उसकी जगह आप धर्म के नाम पर कोई कहानी चला रहे हो। तो कल्पना में कौन जी रहा है, आप या मैं?

प्र जी।

आचार्य: और धर्म, मैंने कहा– इंसान की दवाई होती है। दवाई बहुत साफ़ होनी चाहिए, नहीं तो दवाई ज़हर बन जाती है। बीमार को दवाई का आसरा होता है, बीमार बड़ी श्रद्धा के साथ दवाई लेता है। उसको दवाई के नाम पर आपने कुछ भी ऊटपटांग दे दिया, तो ये पाप है।

धर्म का जो सबसे साफ़ रूप है, वही पकड़ना चाहिए। ये मत करिए कि धर्म का एक गन्दा रूप पकड़ दिया और कह दिया — 'यही तो असली है'। और जो साफ़ रूप है, उसको कह दिया — 'वो तो आदर्श है।' ऐसे नहीं करते।

प्र मैं साथ में इसमें एक चीज़ को और समझना चाहता हूँ कि जहाँ बात हम इस चीज़ की कर रहे हैं कि हमें बकरे को काटना चाहिए या नहीं काटना चाहिए, वहाँ बहुत कम लोग ऐसे हैं जो करुणा वाला एक जो तर्क है, वो देते हैं। वो कहते हैं कि उसको मत काटो करुणा की वजह से।

पर मैं समझना चाहता हूँ कि इंसान का जानवरों के साथ सम्बन्ध कैसा होना चाहिए? वो कैसे समझें? जानवर किसलिए है मतलब?

आचार्य: इंसान का अपने साथ क्या सम्बन्ध होना चाहिए, पहले ये समझें। इंसान अकेला जीव है पृथ्वी में जो बहुत तड़पता है। इंसान से ज़्यादा आत्महत्या कोई नहीं करता, इंसान से ज़्यादा डिप्रेशन (अवसाद) में कोई नहीं जाता और इंसान से ज़्यादा अपराध कोई नहीं करता। इंसान से ज़्यादा आँसू कोई नहीं बहाता। आप दुनिया में किसी भी जीव को, प्रजाति को उतना दुखी नहीं पाओगे जितना इंसान है।

वजह क्या है?

इंसान अकेला है जिसे स्वयं को समझना पड़ेगा, नहीं तो बहुत दुख झेलेगा। घोड़े के ऊपर ऐसी कोई बंदिश नहीं है। घोड़ा ख़ुद को समझे चाहे न समझे, वो घोड़ा बना रहकर अपनी ज़िंदगी गुज़ार सकता है। यही बात कौए और कुत्ते पर लागू होती है। उन्हें ख़ुद को समझने जैसी कोई बाध्यता, कोई ओबलीगेशन नहीं है। वो जैसे हैं, उनका चलता रहता है। इंसान अकेला है, जो ख़ुद को नहीं जानता तो बहुत तड़पता है, पागल हो जाता है।

कुत्ता पागल होगा तभी जब उसको कोई वायरस लग जाएगा। और इंसान को पागल होने के लिए किसी वायरस की ज़रूरत नहीं पड़ती। इंसान को पागल होने के लिए सिर्फ़ सेल्फ़ इग्नोरेंस की ज़रूरत पड़ती है। आत्मज्ञान का अभाव— ‘मैं ख़ुद को जानता नहीं, मैं पागल हो गया।’

और इंसान जितना पागल होता है उतना और प्रजाति पागल नहीं होती। इंसान जितना एंटी डिप्रेसेंट्स (अवसादरोधी दवाओं) पर जीता है, उतना कोई प्रजाति नहीं जीती। वजह समझिए न!

इंसान अकेला है जिसे ख़ुद को जानना पड़ेगा, अगर उसको तड़प से बचना है तो। और जब आप ख़ुद को जानते हो तो आपको पता चलता है कि आपमें एक ख़्वाहिश है आंतरिक तृप्ति की। वो ख़्वाहिश और किसी भी प्रजाति में नहीं होती। अगर आप नहीं समझते अपनी उस ख़्वाहिश को, तो आप वही तृप्ति पाना चाहते हो दुनिया का शोषण करके, जो कि हर आदमी कर रहा है।

हम सब भीतर से खालीपन, अधूरापन, अपूर्ण अनुभव करते हैं न? हर किसी को लगता है न कि कमी है, कमी है? ज़िंदगी में कमी है, ये मिल जाए, वो मिल जाए? और वो कमी आप कैसे पूरा करना चाहते हो? कुछ ला करके सामान घर में रख लें, कुछ खाने को मिल जाए। है न? कोई पदवी मिल जाए, पैसा मिल जाए, यही सब तो आप चाहते हो।

आप हर वो चीज़ अपनेआप को देना चाहते हो जिससे आपको सुख मिलेगा। इसी प्रक्रिया में आप जानवर के ऊपर ज़ुल्म करते हो। आप कहते हो— इसके माँस से सुख मिलेगा, इसके फर से सुख मिलेगा, इसका इस्तेमाल कर लूँ, इसके ऊपर चढ़ बैठूँ, उसमें सुख मिलेगा।

ये जो आप उस जानवर के साथ करते हो, ये आप दूसरे इंसानों के साथ भी करते हो। बस जानवर बेचारा मजबूर है, तो आपका विरोध नहीं कर पाता। दूसरे इंसानों के साथ करोगे ज़्यादा, तो वो आपका विरोध करेंगे, आपको मार भी सकते हैं, आपको जेल में डलवा सकते हैं। जानवर ये सब कर नहीं पाता, वो मजबूर है, तो उसके ऊपर आप ज़्यादा ज़ुल्म कर ले जाते हो।

ये बस यही बात है — ये जो आप जानवर काट रहे हो न — बस यही बात है कि मैं ताक़तवर हूँ तो मैं तुम्हें काट दूँगा। इसके अलावा आपके पास जानवर को सताने का कोई तर्क नहीं है। बस यही है— मैं मजबूत हूँ, मैं तुम्हें काट दूँगा। लेकिन इस तर्क से आपको भी कुछ नहीं मिल रहा है। आपकी बस हैवानियत बढ़ रही है, और साथ-साथ भीतर-ही-भीतर आपका पागलपन बढ़ रहा है। आपका अपना दुख भी तो बढ़ता जा रहा है।

तो इंसान का जानवरों से स्वस्थ रिश्ता तभी होगा जब इंसान का अपने पूरे वातावरण से, अपनी पूरी इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) से, अपने सारे सम्बन्धों में कुछ स्वास्थ्य होगा। जो इंसान सही है, वो अपने सब रिश्तों में सही होगा और वो जानवरों का भी शोषण नहीं करेगा। जो इंसान ग़लत है, वो अपने सब रिश्तों में ग़लत होगा और वो चिकन भी रोज़ चबाएगा।

ये बिलकुल नहीं हो सकता — मैंने सौ बार बोला है — कि आप मुर्गे की गर्दन मरोड़ने में सबसे आगे हैं, लेकिन अपने बच्चे के प्रति करुणा रखते हों।

मेरी बात बहुत लोगों को समझ में नहीं आती, वो कहते है, 'ऐसे थोड़े ही होता है। चिकन तो हम रोज़ चबाते हैं लेकिन अपने बच्चे से तो प्यार करते हैं।'

मैं कहता हूँ, तुम्हारा प्यार धोखा है। तुम प्यार अभी जानते ही नहीं। अगर तुम प्यार जानते होते तो तुम सेलेक्टिव (चयनात्मक) प्यार नहीं कर पाते। तुम कंडीशनल (सशर्त) प्यार नहीं कर पाते। तुम ये नहीं कह पाते कि मैं अपने बच्चे से तो प्यार करता हूँ और चिकन के बच्चे की गर्दन चबाता हूँ; ये तुम नहीं कर पाते। जब आप ठीक होते हो न, तो आपका रिश्ता सबसे ठीक हो जाता है।

तो ये सवाल बहुत अधूरा है कि इंसान का जानवरों से कैसा रिश्ता होना चाहिए। जब इंसान का सबसे रिश्ता ठीक होता है तो जानवर से भी ठीक होता है।

हम जानवरों के ऊपर जो ज़ुल्म कर रहे हैं इतना, भयानक ज़ुल्म, रूह कँपा देने वाला ज़ुल्म, दिल दहला देने वाला ज़ुल्म, ये बस इस बात का प्रतिबिम्ब है, सूचक है कि हम भीतर से कितने विक्षिप्त हैं, कितने दुखी हैं। और हम अपने सब सगे-सम्बन्धियों, दोस्तों इन सबके ऊपर भी कितना ज़ुल्म करते हैं। भले ही वो ज़ुल्म दिखाई नहीं देता क्योंकि हम उसको अच्छे आचरण का लिबास पहना देते हैं। भीतर-भीतर ज़ुल्म रहता है और ऊपर-ऊपर सद्भावना रहती है। तो इसलिए पता नहीं चलता कि हम कितने ज़ुल्मी, कितने अत्याचारी लोग हैं; नहीं तो हम बहुत पागल आदमी हैं।

प्र सर, इसमें मतलब वैसा ही लगा जैसे आपने शुरू में ही कहा था कि हम बोलते हैं – मतस्य-पालन और हम पीछे कर रहे हैं ज़ुल्म।

आचार्य: बिलकुल वैसी ही बात है, जैसे कि आई लव चिकन एंड आई लव माय किड (मुझे मुर्गों से प्यार है और मुझे अपने बच्चों से प्यार है)। जिस ज़बान से तुमने बोला, 'आई लव चिकन', उसी ज़बान से तुमने बोला आई लव माय बेबी। तो फिर चिकन से जब प्यार का जो रिश्ता बताया तुमने, वही तुमने अपनी बेबी को भी कर दिया न!

चिकन को तुमने कहा, 'आई लव चिकन' और तुम उसको चबा गए। अपने बेबी को भी बोलोगे, 'आई लव बेबी' और बेबी को भी चबाओगे ही चबाओगे। बस ये हो सकता है कि चिकन को दाँतों से चबाओ और बेबी को दिमाग़ से चबा लो। ये हो सकता है।

मत्स्य पालन — हम बहुत-बहुत क्रूर लोग हैं, हम विक्षिप्त लोग हैं, और हम इसीलिए आज विलुप्ति की कगार पर आ गए हैं। ये जो पृथ्वी है, ये अब छठे मास एक्सटिंशन (सामूहिक विनाश) के दौर में प्रवेश कर चुकी है। और इस बार उस विनाश का कारण सिर्फ़ और सिर्फ़ इंसान की विक्षिप्तता है।

अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे लोगों को भी पता नहीं है कि मास एक्सटिंशन पहले से ही चल रहा है। और उसका कारण मानवीय गतिविधि है इस बार। आज से पहले भी पाँच सामूहिक विनाश हो चुके हैं, पर वो कभी भी मानवीय गतिविधि की वजह से नहीं थे। इस बार मानवीय गतिविधि की वजह से सामूहिक विनाश चल रहा है।

लेकिन ये बात न आपको मीडिया में सुनाई देती है, न लोग बात करते हैं इस बारे में। लोगों को ये सारी बातें जो मैं कर रहा हूँ, उनको ऐसा लगता है कि ऐसा तो कुछ हो ही नहीं रहा। ये आदमी ये सब बातें कहाँ से लेकर आ गया!

प्र सर, उनको तो ये तक लगता है कि जो हम जानवर खा रहे हैं, वो तो हम जंगलों से लेकर आ रहे हैं।

आचार्य: (हँसते हुए) ये पागलपन की इंतहा हो गई। लेकिन एक बात बताओ, पागलपन भी नहीं है न! लोगों को तो ये भी नहीं पता है कि आम के पेड़ और अमरूद के पेड़ में अंतर क्या होता है।

किसी ने पूछा था एक बार कि ये लाल मिर्च कौनसे पौधे से आती है और हरी मिर्च कौनसे पौधे से आती है। लोगो को नहीं पता। उनसे पूछो, ‘गेहूँ और चावल कहाँ से आ रहे हैं, अंतर बता दो। और किस मौसम में होता है, अंतर बता दो।’ वो नहीं बता पाएँगे। तो वैसे ही उनको लगता है कि जानवर तो हम जंगल से पकड़ कर ला रहे हैं।

प्र हाँ।

आचार्य: और इस बात का डेटा तो आप लोगो के पास मुझसे बेहतर है। रिसर्च आप करते हो कि जानवर कहाँ से आ रहे हैं। और जहाँ से वो आ रहे हैं, उसका अंज़ाम क्या हो रहा है।

प्र: जी, निन्यानवे प्रतिशत — जो हमारा तिरासी-सौ करोड़ का आँकड़ा है, उसका निन्यानवे प्रतिशत फेक्ट्री फार्म से आता है।

आचार्य: निन्यानवे प्रतिशत जानवर जो आप खाते हो, वो न जंगल से आता है, न प्राकृतिक तौर पर पैदा हुआ है। उसे ज़बरदस्ती पैदा किया जाता है ताकि आपके खाने की हवस पूरी हो सके। वो जानवर ज़बरदस्ती पैदा किया गया है। और लोग कहते हैं कि अगर मुर्गा नहीं खाएँगे तो पूरी दुनिया में मुर्गे-ही-मुर्गे हो जाएँगे, मुर्गे राज करेंगे।

भाई, वो जो मुर्गा है, तुम्हारे खाने के लिए वो ज़बरदस्ती पैदा किया जाता है। तुम्हें कहाँ से लग रहा है कि तुम मुर्गे नहीं खाओगे तो मुर्गे राज करेंगे! तुम कौवे नहीं खाते तो कौवे राज करते हैं? कौवे तो नहीं खाते होंगे, तो दुनिया में कौवे ही कौवे हो गए क्या?

ये क्या तुक है? भारत में साँप नहीं खाते, तो भारत में हर घर में साँप लोट रहे हैं? ये क्या तुक है!

प्र बल्कि तथ्य यदि देखा जाए तो इसका बिलकुल विपरीत है। जिन जानवरों को इंसान खाता नहीं है, वो तो विलुप्त होते जा रहे हैं।

आचार्य: वो विलुप्त होते जा रहे हैं।

प्र और जिनको खाता है…।

आचार्य: बिलकुल, वो बढ़ते जा रहे हैं। वो कृत्रिम रूप से बढ़ाए जा रहे हैं। बिलकुल सही बात है।

प्र जी।

आचार्य: इंसान इतना वहशी जानवर है कि जो-जो जानवर हम खा नहीं रहे हैं, हम उनको ख़त्म करते जा रहे हैं। ख़त्म माने एक्सटिंक्ट , प्रजाति ही ख़त्म।

इस वक़्त दुनिया में जो जानवर सबसे ज़्यादा हैं, वो वही हैं जिन्हें इंसान खाता है– बकरे, मुर्गे, भैंसें, गायें। इंसान ने इनकी तादाद ज़बरदस्त रूप से, कृत्रिम रूप से बढ़ा दी है। और बाक़ी जितने जीव थे, वो हमने ख़त्म कर डाले, एकदम विलुप्त कर दिए।

प्र जी सर, एक आँकड़ा निकलकर आया था कि किस तरह से जो हम खा रहे हैं, उससे हम दूसरों को विलुप्त कर रहे हैं। तो एक ऐमज़ॉन रेन्फोरेस्ट है ब्राज़ील में।

आचार्य: 'लंग्स ऑफ द वर्ल्ड' बोलते हैं उसको।

प्र जी, 'लंग्स ऑफ द वर्ल्ड'। उसका इक्यानवे प्रतिशत जो डीफोरेस्टेशन (वनों की कटाई) है, वो हुआ है सिर्फ़ इसलिए कि हमने उसका इस्तेमाल किया चारागाह के लिए और पशुओं के प्रजनन करने में।

आचार्य: और पिछले आधी शताब्दी में, वो जो रेनफोरेस्ट है वो चालीस प्रतिशत सिकुड़ चुका है। और क्यों सिकुड़ चुका है, वो बात ज़्यादातर लोगों को समझ में ही नहीं आएगी।

जो लोग ध्यान से नहीं सुन रहे हैं, या जो लोग मुझे बस अब नफ़रत से ही और नापसंदगी से सुन रहे हैं, उनको तो जो बात हम बोलने जा रहे हैं, समझ में ही नहीं आएगी। क्योंकि वो बात आँकड़ों की है, बात बुद्धि की है और जब आप नफ़रत से सुन रहे होते हैं तो बुद्धि तो नीचे बैठ जाती है, ख़त्म हो जाती है। पर सुन सकते हैं तो मेरी बात कृपा करके सुनें, मैं प्रार्थना कर रहा हूँ!

निन्यानबे प्रतिशत — जैसा भाई ने कहा, जो जानवर हैं, जिनको आप खाते हो, वो कृत्रिम रूप से पैदा किए जाते हैं। बड़े-बड़े फार्म्स होते हैं, जहाँ ये जानवर पैदा किए जाते हैं। ये मत सोचिएगा कि ये जानवर प्राकृतिक रूप से जंगल में मिल गए, या बकरा तो सड़क पर चला जा रहा था तो वहाँ से उठा करके आपने खा लिया है। नहीं-नहीं-नहीं-नहीं!

और दुनिया में सत्तर-अस्सी प्रतिशत जो अन्न का उत्पादन होता है, वो इन जानवरों को खिलाने के लिए होता है, ये बात लोगों को पता ही नहीं है।

लोगों को ये बात बड़े अचरज की लगती है, लोगों को ये बात असंभव लगती है। वो कहते हैं, ‘आप झूठ बोल रहे हैं, ऐसा हो नहीं सकता है।’

दुनिया में जितना अन्न पैदा करा जाता है, वो दो-तिहाई से ज़्यादा, लगभग तीन-चौथाई सिर्फ़ जानवरों को खिलाने के लिए होता है। कौन-से जानवर? जिनको आप अब काटकर खाओगे।

तो दुनिया में जो ग़रीबी और भुखमरी है कि लोगों को खाने को रोटी नहीं मिल रही, उसका बहुत बड़ा कारण ये है।

ग़रीब को रोटी कैसे मिलेगी, जो अन्न पैदा किया गया था, वो तो जा करके भैंसों को और सुअरों और बकरों को खिला दिया गया। ग़रीब के हाथ में गेहूँ नहीं आ रहा, या आ रहा है तो बहुत महँगा है, क्यों? क्योंकि वो सारा गेहूँ जाता है बकरों को और भैंसों को और सुअरों को खिलाने के लिए, ताकि आप उन्हें काट करके उनके माँस की हवस पूरी कर सको।

प्र जी।

आचार्य: अब आपकी जो माँस की हवस है वो बढ़ती जा रही है, बढ़ती जा रही है। हर आदमी जिसके पास पैसा आता है, वो कहता है कि अब मैं बड़ा आदमी हो गया हूँ तो मुझे तो मटन खाना है। भई! रोटी-दाल तो ग़रीबों का खाना है। मैं बड़ा आदमी हो गया हूँ, तो मैं तो मटन खाऊँगा।

तो जो बकरों की संख्या है, वो भी बढ़नी चाहिए। अब आपको मटन चाहिए, तो और बकरे चाहिए। और बकरे चाहिए, तो उन बकरों को खिलाने के लिए फिर अन्न चाहिए। क्योंकि एक किलो मटन के लिए कितने किलो अन्न लगता है? बीस किलो, सौ किलो, और ज़्यादा।

एक किलो आपके पास मटन आ सके इसके लिए पहले उस बकरे को, चाहे गेहूँ हो, जौ हो, ज्वार हो, वो सब बीस किलो, पचास किलो खिलाना पड़ता है। तब जाकर कहीं से एक किलो माँस पैदा होता है। अब वो जो इतना सारा गेहूँ था, जो बकरे को खिलाना पड़ा, उतने से न जाने कितने ग़रीबों का पेट भर जाता!

बात होती है न, कि मैं तो माँस खिलाता हूँ ग़रीबों को!

अरे! ग़रीबों का तो पता नहीं कितना पेट भर जाता! एक किलो माँस के पीछे पता नहीं कितना पानी लगता है, कितनी जगह लगती है — और अभी हम क्लाइमेट चेंज की तो बात ही नहीं कर रहे — और कितना सारा उसमें अन्न लगता है। तो वो जो अन्न लगता है, वो अन्न कहाँ से आएगा? उसके लिए आपको ज़मीन चाहिए। और पृथ्वी पर इतनी ज़मीन है नहीं कि इन सब जानवरों को खिलाने के लिए आप इतना अन्न पैदा कर सको।

ये सारे जानवर आपको क्यों चाहिए? क्योंकि आप माँसाहारी आदमी हो। आप माँस के हवसी आदमी हो, तो आप कह रहे हैं, ‘मुझे तो माँस खाना है।’

आपको माँस खाना है तो उसके लिए जानवर पैदा किए जाएँगे कृत्रिम रूप से। अब उन जानवरों के लिए क्या चाहिए? अन्न चाहिए या कि घास चाहिए। उस घास या अन्न के लिए क्या चाहिए? ज़मीन चाहिए। वो ज़मीन कहाँ से आ रही है? वो ज़मीन आ रही है जंगल साफ़ करके; वहाँ से ये अमेज़न रेनफोरेस्ट साफ़ हुआ है।

जंगल-के-जंगल साफ़ करे जा रहे हैं ताकि उनमें घास या अन्न पैदा करा जा सके, जिससे माँसाहारी लोग माँस खा सकें। अब जब आप वो जंगल साफ़ करते हो तो उस जंगल में रहने वाली स्पीशीज-की-स्पीशीज साफ़ हो जाती हैं। एक माँसाहारी आदमी सिर्फ़ उस माँस को नहीं खा रहा जो उसकी प्लेट पर रखा हुआ है, उसने न जाने कितनी और स्पीशीज़ ख़त्म कर डाली। इतना वो अज्ञानी है और निर्दयी है, उसे कुछ नहीं पता उसने क्या करा।

पृथ्वी पर जंगलों के साफ़ होने की सबसे बड़ी वजह ही यही है—माँहाहार। और किसी माँसाहारी आदमी को अभी ये लगता नहीं होगा कि 'मैं' हूँ, जिसकी वजह से पृथ्वी का जंगल, पृथ्वी का पूरा फारेस्ट कवर (वन आच्छादन) साफ़ हुआ जा रहा है।

पृथ्वी पर फारेस्ट कवर के हटने की सबसे बड़ी वजह फ्लेश कंसम्पशन है, ब्लड कंसम्पशन , माँसाहार।

प्र सर, तो ये तो मुझे भी लगता था कि ये जो जंगल साफ़ हो रहे हैं, वो इसलिए कि वो इंडस्ट्रीज बन रही हैं, घर बन रहे हैं।

आचार्य: हाँ, लोगों को लगता है कि जंगल साफ़ हो रहे हैं, इंडस्ट्री या घर के कारण।

नहीं साहब, जंगल साफ़ हो रहे हैं क्योंकि आपको चिकन और मटन खाना है। इसलिए साफ़ हो रहे हैं जंगल। ये रिश्ता सीधे नहीं है न, तो लोगों को दिखाई नहीं पड़ता। और सोचने का काम हम बहुत पीछे छोड़ आए। विचार जैसी कोई चीज़ हमारे जीवन में बची नहीं है।

प्र जी। मैं एक जगह पर इस चीज़ को भी पढ़ रहा था कि अभी जिस तरह का हमारा ईटिंग पैटर्न है, जिस तरह का हम आहार लेते हैं, उसकी वजह से दुनिया को चार बिलियन (चार सौ करोड़) हेक्टेयर की ज़मीन चाहिए, जिस पर वो खेती वग़ैरह कर सकें, माँस खिलाने के लिए।

पर यदि सभी लोग प्लांट बेस्ड डाइट को अपना लें, शाकाहार अपना लें…।

आचार्य: तो वन बिलियन हेक्टेयर (एक सौ करोड़ हेक्टेयर) में हो जाएगा।

प्र जी, वन बिलियन हेक्टेयर।

आचार्य: जितनी ज़मीन आपको जंगल काट करके निकालनी पड़ी खेती के लिए, उससे एक चौथाई ज़मीन में काम चल जाएगा। और वनों को फैलने के लिए तीन गुनी अधिक ज़मीन मिल जाएगी, अगर बस आप माँस खाना बंद कर दें। आज चार बिलियन हेक्टेयर भी कम पड़ रहा है। एक बिलियन हेक्टेयर में काम चल जाएगा अगर सब लोग प्लांट बेस्ड डाइट पर आ जाएँ।

प्र और अगर ये जंगल वापस आए तो…।

आचार्य: ये जंगल वापस आ जाएँ तो जो मास एक्सटिंशन होने जा रहा है, वो मास एक्सटिंशन रुक जाएगा।

मास एक्सटिंशन कार्बन डाईऑक्साइड के स्तरों की वजह से ही तो हो रहा है। और जंगल सबसे बड़ा सिंक होते हैं। वो कार्बन डाई‌ऑक्साइड सोख लेते हैं, उसको पत्ती बना देते हैं, उसको लकड़ी बना देते हैं।

तो वनों से ज़्यादा अच्छा तरीक़ा क्लाइमेट चेंज को रोकने का कोई होता ही नहीं है। पर दो-चार पेड़ लगाने से नहीं होगा। लोग सोचते हैं कि हम बकरा रोज़ खाते हैं, और हमने दो पेड़ लगा दिए तो हो गया। दो पेड़ नहीं चाहिए हमें, एक बकरे के पीछे आपको दो हज़ार पेड़ चाहिए और वो आप कभी नहीं लगा पाओगे।

प्र जंगलों की बात कर रहे हैं।

आचार्य: हम जंगलों की बात कर रहे हैं। दो-चार पड़ों की बात नहीं कर रहे।

प्र एक इसी से सम्बन्धित आँकड़ा अभी देख रहा था मैं। आचार्य जी, इसमें ये था कि एक माँस का बर्गर जो आप खाते हैं, उसके लिए पचपन स्क्वायर फीट जंगल काटना पड़ता है

प्र हैमबर्गर जो होता है।

आचार्य: हैमबर्गर न! एक हैमबर्गर बराबर पचपन स्क्वायर फीट जंगल का।

प्र हाँ।

आचार्य: ये जब आप वो केएफसी का बर्गर ले रहे होते हो, तो आपके दिमाग़ में बिलकुल नहीं आती ये बात कि ये मैंने अभी-अभी क्या किया। ये मैंने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया। ये बात दिमाग़ में आती ही नहीं है कि ये जानवर का माँस नहीं है, ये पृथ्वी का अंत है। ये हमें नहीं समझ में आती बात।

प्र इसमें मैं एक चीज़ और देखता हूँ कि लोग एक भुलावा देते हैं अपनेआप को कि माँस हमारी मदद करता है प्रोटीन खाने में।

पर मैं इससे जुड़ा भी एक तथ्य देख रहा था कि जो माँस पूरी पृथ्वी में बनता है, वो हमें सिर्फ़ सैंतीस प्रतिशत प्रोटीन देता है। बाक़ी जो हमारा तिरेसठ प्रतिशत प्रोटीन है, वो आज भी शाकाहार से ही मिल रहा है पूरी दुनिया को। इसी में कैलोरी का भी एक डेटा है।

आचार्य: नहीं, नहीं। प्रोटीन सैंतीस प्रतिशत ही आता है माँस से और तिरेसठ प्रतिशत आता है शाकाहार से। लेकिन जो पैसा जाता है माँस में शाकाहार की अपेक्षा, वो कितना होगा?

प्र जी, मैं इसमें लैंड के इस्तेमाल को देख रहा था, सतहत्तर प्रतिशत।‌

आचार्य: सतहत्तर प्रतिशत। माने अगर आपके पास सौ यूनिट लैंड है, तो उसमें से लगभग अस्सी यूनिट लगा करके आपने माँस पैदा करा। और उससे प्रोटीन मिला बस सैंतीस प्रतिशत। और वो जो बीस प्रतिशत छोटी-सी जगह से आपने शाकाहारी आदमी के लिए गेहूँ-चावल पैदा करा, तिरेसठ प्रतिशत प्रोटीन वहाँ से आ रहा है।

प्र जी।

आचार्य: तिरेसठ प्रतिशत। तो ये क्या पागलपन है, और क्यों बेकार में अपनेआप को बुद्धू बनाने के लिए ये तर्क गढ़ते हो कि प्रोटीन मिलेगा माँस से, प्रोटीन मिलेगा माँस से। क्या बेकार की बात है!

यहाँ आप इतने लोग बैठे हुए हैं, ये बताओ कि किस-किस को प्रोटीन की कमी हुई है ज़िंदगी में आजतक? प्रोटीन कितनी बड़ी चीज़ है, भाई? आपमें से किस-किसको जा करके वर्ल्ड बॉडी बिल्डिंग चैम्पियन बनना है? प्रोटीन कितनी बड़ी चीज़ है ज़िंदगी में?

आप अगर सौ लोगों को जानते हो, उनमें से कितने लोगों को आजतक कभी भी प्रोटीन की कमी हुई है? कितने लोग कभी भी डॉक्टर के पास गए हैं और डॉक्टर ने बोला है कि आपको प्रोटीन की कमी है? आपको कमी दूसरी चीज़ों की होती है, तो प्रोटीन का क्यों बहाना बना रहे हो?

जितना प्रोटीन की आप बात करते हो कि मेरे को माँस से मिलता है, पहली बात — उतने पैसे में उतना प्रोटीन आपको बहुत ज़्यादा आसानी से दालों से, राजमा से और अन्य कई स्रोतों से मिल जाएगा। और दूसरी बात — उतना प्रोटीन आपको चाहिए नहीं, ये सबसे बड़ी बात है।

वो उतना प्रोटीन आपको चाहिए ही नहीं है। प्रोटीन की किसी को नहीं कमी हो गई है।

प्र जी।

आचार्य: आप भाई, साधारण लोग हो, जैसे दुनिया के सब साधारण, मध्यम वर्गीय लोग होते हैं। आप कुछ काम करते हो, आपको एक हृष्ट-पुष्ट शरीर चाहिए। आपको इतने बड़े डोले थोड़े ही बनाने हैं, आप करोगे क्या उतने प्रोटीन का?

प्र जी।

आचार्य: लेकिन प्रोटीन का बहाना बना करके आप रोज़ बकरा कटवाते हो, रोज़ मुर्गा चबाते हो। ये कितनी धूर्तता, कनिंगनेस और बेईमानी की बात है न!

प्र ये भी मैंने देखा है, लोग कहते हैं कि जो शुद्ध शाकाहार है, वेगेनिज़्म , ये एलिटिस्ट (अभिजात्यवादी) है। जबकि मैं तथ्य देख रहा था तो मुझे उल्टी बात समझ में आ रही थी कि जो लोग माँसाहारी हैं, वो एलिटिस्ट हैं।

आचार्य: बिलकुल एलिटिस्ट हैं।

प्र वो सतहत्तर प्रतिशत ज़मीन का इस्तेमाल करके मात्र इतना-सा प्रोटीन ले रहे हैं।

आचार्य: बिलकुल। बिलकुल।

प्र१ सर, इसमें एक तर्क होता है कि लेकिन क्या पेड़-पौधे जो आप खाते हो, जब आप उगाते हो तो उसमें हिंसा नहीं होती?

आचार्य: मैं बिलकुल मानता हूँ पेड़-पौधों को भी खाने में हिंसा है। मैं जब एक किलो अन्न खाता हूँ, तो वो एक किलो अन्न है। मैंने उतनी हिंसा करी है, बिलकुल मानता हूँ। लेकिन जब मैं एक किलो माँस खाता हूँ तो मैंने कितने किलो पौधे कटवा दिए?

वो जो मैंने मटन रखा अपने सामने एक किलो — एक किलो मटन रखा है मैंने अपने सामने और एक किलो चावल रखा है। एक किलो चावल माने एक किलो चावल। और एक किलो मटन माने बीस किलो चावल या पचास किलो चावल। तो बताओ अगर मुझे पौधे भी बचाने हैं, तो मुझे क्या होना चाहिए? अगर मुझे पौधे भी बचाने हैं तो मुझे शाकाहारी होना पड़ेगा न।

जो माँसाहारी है, वो तो मुझसे पचास गुना ज़्यादा हानि कर रहा है पौधों की। क्योंकि मटन माने पौधा गया-गया-गया!

और इतने पागल हैं, न जाने गणित में ये बोर्ड में भी पास हुए थे कि नहीं हुए थे; गणना करना, बेसिक अरिथमेटिक (आधारभूत अंकगणित) नहीं आती है। कहते हैं, 'अगर हर आदमी शाकाहारी हो गया तो इतने पौधे कहाँ से आएँगे? इतना पेड़, इतना अन्न कहाँ से आएगा?'

पागल! माँसाहार में सब पेड़ कटते हैं, पौधे कटते हैं। तुमको लगता है कि बकरा तो बस ऐसे ही हवा खाकर के मोटा हो गया है। तुमको लगता है वो जो तुमने भैंस कटवाई है इतनी बड़ी, तुम्हें लगता है वो तो ऐसे ही अपना चर रही थी और बड़ी हो गई है।

वो जो उसके माँस के पीछे जितने पौधे लगते हैं वो तुम देख नहीं पा रहे हो क्या? एकदम अंधे हो?

तो पौधे भी बचाने हैं तो शाकाहारी हो जाओ।

और अभी मैं, ये बात तो देखो इसमें ला ही नहीं रहा हूँ कि हिंसा सिर्फ़ तब मानी जाती है जब चुनाव हो।

अगर मुझे अपने बचे रहने के लिए आवश्यक है कि सेब, मूली, कोई फल, चना, बैंगन कुछ खाऊँ, तो वो हिंसा की श्रेणी में नहीं आएगा, क्योंकि उतना भी नहीं खाऊँगा तो एकदम अभी मर जाऊँगा।

और बहुत सारा तो जो एक शाकाहारी आदमी का भोजन होता है, उसके लिए पेड़-पौधे को मारना भी नहीं पड़ता है। सेब के लिए भी नहीं मारना पड़ता है, चने के लिए नहीं मारना पड़ता है। हाँ, मूली के लिए मारना पड़ता है, गाजर के लिए मारना पड़ता है। कुछ के लिए मारना पड़ता है, कुछ के लिए नहीं मारना पड़ता। बैंगन और मिर्च के लिए नहीं मारना पड़ता, अमरूद के लिए नहीं मारना पड़ता।

और जो फसलें होती हैं, अगर तुम उनको नहीं भी काटोगे तुम अच्छे तरीक़े से जानते हो कि उनका जीवन चक्र कितने दिनों का होता है, कितने महीनों का होता है।

मैं जस्टिफाई नहीं कर रहा हूँ। मैं बिलकुल नहीं कह रहा हूँ कि बकरा काटना ग़लत है और पेड़ काटना उचित है। जो पेड़ काट रहे हैं, मैं उनको भी पकड़ता हूँ कि तुम क्या कर रहे हो, पेड़ क्यों काट रहे हो?

लेकिन मैं कह रहा हूँ कि एक हिंसा होती है जो न्यूनतम है, मिनिमम है कि इससे नीचे की मैं कर ही नहीं सकता। अगर शरीर मिला है तो इतना तो मुझे करना ही पड़ेगा कि मैं गेहूँ, चावल और सेब खाऊँ।

और एक हिंसा होती है जो ज़बरदस्ती की है कि खा सकते थे वेज बर्गर , पर उसको बोल रहे हो, ‘मेरे को मटन बर्गर चाहिए।’ तुम्हें मटन बर्गर क्यों चाहिए, किसलिए चाहिए? ज़बान की हवस है बस, और किसलिए चाहिए!

तो मैं ये बिलकुल नहीं कह रहा हूँ कि शाकाहारी आदमी बिलकुल हिंसा नहीं करता। पर मैं कह रह हूँ, न्यूनतम हिंसा है। और उसको भी और कम करना चाहिए। दूध पीने वाला भी हिंसा करता है, मैं उसके ख़िलाफ़ भी बोलता हूँ। समझ में आ रही है बात?

हिंसा जहाँ-जहाँ है, हम उसके ख़िलाफ़ बोलते हैं। लेकिन ये जो माँस वाली हिंसा है, ये तो हिंसा का बहुत ऊँचा वाला स्तर है। तो माँस वाली हिंसा को सेब वाली हिंसा से बराबर नहीं रखा जा सकता, कोई तुलना नहीं है।

आप कहो कि किसी ने भैंस काट दी और किसी ने सेब खा लिया, वो एक ही बात है; तो आप पागल आदमी हो।

प्र ये वही बात हुई जो आपने शुरुआत में कहा था कि अगर तिरासी-सौ करोड़ जानवर काट रहे हैं तो उसकी तुलना में पाँच करोड़ क्या हो गया।

आचार्य: हाँ, ये तर्क तो — ये ऐसी सी बात है कि आप जाएँ आपके सामने प्रश्न पत्र रखा हुआ है, जिसमें आपको एक पाँच नंबर का प्रश्न नहीं आता, तो आप कहें, ‘मैं बाक़ी पिच्चानवे भी नहीं करूँगा क्योंकि पाँच नंबर छोड़ा या पिच्चानबे नंबर छोड़ा, एक ही तो बात है।’

भाई, डिग्री भी कोई चीज़ होती है न? क्वांटिटी भी कोई चीज़ होती है न? तो वो देखना पड़ता है न? एक गुटखा खाने वाला भी एक ग़लत काम कर रहा है और बलात्कार करने वाला भी ग़लत काम कर रहा है। पर आप ये थड़े ही कहोगे कि गुटखा खाओ या रेप (बलात्कार) करो, एक ही तो बात है!

डिग्री में अंतर है। क्वांटिटी में, स्तर में अंतर है, स्केल में अंतर है।

प्र मुझे इसमें एक चीज़ अभी और याद आ रही है तथ्य के तौर पर, हम अक्सर जब ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज की बात करते हैं, तो हम सीओटू की बहुत बात करते हैं कि किस तरह से कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है। हम उसमें एक दूसरी गैस को भूल जाते हैं, जो कि हम अभी पढ़ रहे थे कि पिच्चासी प्रतिशत ज़्यादा ख़तरनाक होती है।

आचार्य: मीथेन।

प्र मीथेन।‌ और उसका जो सबसे बड़ा कारण है, पच्चीस प्रतिशत मीथेन जो पर्यावरण में आती है वो एग्रीकल्चर की वजह से आती है।

आचार्य: बिलकुल, बिलकुल। जब हम बोलते हैं— कार्बन एमिशन्स , तो कार्बन से हम सोचते हैं सीओटू। भाई, सीओटू से कहीं-कहीं ज़्यादा, कई गुना घातक है सीएचफोर (मीथेन)। और जो सीएचफोर है, वो सबसे ज़्यादा आती है ये एनिमल एग्रीकल्चर से।

जब आप — जो नहीं जानते हों, उनको ये तथ्य बताते हैं — जब आप कैटल प्रोड्यूस करते हो अपने खाने के लिए या किसी और वजह के लिए, आपको सक्रिफाइस (बलि देना) करना है या जो भी करना है; ले-देकर खाना ही है या दूध के लिए, किसी भी वजह से। जब आप कैटल प्रोड्यूस करते हो तो उनके शरीर से ज़बरदस्त मात्रा में मीथेन निकलती है। और ये मीथेन जो है, ये सब ग्रीन हाउस गैसेस में नंबर एक है।

ग्रीन हाउस में अपना जो ये इफेक्ट (प्रभाव) का पोटेंशियल (संभावना) रखती है, ये नंबर एक है। कार्बनडाईऑक्साइड से कई गुना ज़्यादा है इसका जो ग्रीन हाउस कोशियंट (भागफल) है। वाटर वेपर (वाष्प) से जो और बाक़ी गैसेस हैं, उनसे सबसे ज़्यादा हारिकारक मीथेन होती है। और ये मीथेन आ रही है आपकी माँस से। और ये पृथ्वी को पूरा-का-पूरा ख़त्म कर रही है। और हम बर्बादी की कगार पर बिलकुल खड़े हुए हैं।

और बस हम उसकी बात नहीं करते हैं क्योंकि अगर हम उसकी बात करते हैं तो असुविधा होगी। जो हमारा कंजम्प्शन सेंट्रिक माइंड (भोग-केंद्रित मन) है, उसको बुरा लगेगा अगर हम बात करेंगे क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) की। तो हम क्लाइमेट चेंज की बात को दबाकर रखते हैं।

मीडिया में भी आप ज़्यादा नहीं सुनते हो। संमिट्स (सम्मेलन) वग़ैरह होती हैं, उसमें राष्ट्राध्यक्ष वग़ैरह मिलते हैं और वो एक-दूसरे के साथ चाय-वाय पीकर के काम ख़त्म कर देते हैं। कुछ वहाँ पर वो संकल्प, रेजोल्यूशन कर लेते हैं जो कि कभी पूरा नहीं किया जाता। और हम बस ऐसे ही आँख बंद करके शतुरमुर्ग की तरह सिर को मिट्टी में दिए हुए हैं कि ख़तरा तो कोई है ही नहीं।

लेकिन ख़तरा सामने है, मौसम बदल चुका है। और पृथ्वी के जितने इकोसिस्टमस (पारिस्थितिकी तंत्र) हैं, सब बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुके हैं। और वो सब हम अभी ही होते हुए देख रहे हैं। आगे तो कोई दस-बीस साल की बात नहीं है। और अगले दस-बीस साल में जिस स्तर की तबाही आएगी उसको आप प्रलय भी मान सकते हैं।

प्र सर, इसमें न, मैं एक कुचक्र देखता हूँ हमेशा। जैसे आपने कहा कि मीडिया भी या जो राजनेता हैं वो भी क्लाइमेट चेंज वग़ैरह की बात करते नहीं हैं। पर मैं देख रहा हूँ कि जो हमारी आम ज़िंदगी है, जैसे इस साल का यदि मैं उदाहरण लूँ तो उत्तर भारत में पहली बार शायद ऐसा हो रहा है कि हर महीने में बारिश हुई है।

आचार्य: हाँ।

प्र अभी जनवरी से लेकर हम जून में आ गए हैं। हर महीने बारिश हुई है, पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। तो जो भी वेदर एक्सट्रीमस हैं वो बढ़ते जा रहे हैं।

आचार्य: हाँ, उत्तर भारत में हर महीने में बारिश हुई है, गर्मी की लहर की भविष्यवाणी थी, वो गर्मी की लहर आयी ही नहीं।

प्र जी।

आचार्य: और यहाँ हम गोवा में आए हुए हैं तो यहाँ जहाँ मॉनसून मई के आख़िरी दिनों में आ जाना चाहिए था, या जुलाई या जून के पहले हफ़्ते में आ जाना चाहिए था; तो जून के महीने में सामान्य से कहीं कम वर्षा हुई है। अभी पिछले कुछ दिनों में जा करके बारिश होनी यहाँ शुरू हुई है।

तो हर जगह मौसम बदल रहा है। और मौसम ही बदलने की बात नहीं है, सबकुछ ख़त्म होना है। पेड़-पौधों की प्रजातियाँ ख़त्म होनी हैं। तापमान पता नहीं कितने पहुँच जाने हैं, सड़कें पिघल जानी हैं। और इन सब चीज़ों का सबसे ज़्यादा असर किन पर पड़ना है? ग़रीबों पर।

उन ग़रीबों पर जिन बिचारों का बहुत ज़्यादा योगदान भी नहीं है क्लाइमेट क्राइसिस (जलवायु संकट) में। वो ग़रीब सबसे ज़्यादा मारे जाएँगे। मारे तो सभी जाएँगे अंतत:, पर पहला असर और सबसे ज़्यादा बड़ा असर ग़रीबों पर होगा।

प्र जी। लेकिन क्योंकि उनको इस विषय की जानकारी नहीं है, वो इस बात को शायद तार्किक तौर पर भी समझ नहीं पाते हैं कि उनकी थाली और जो ऊपर का आसमान है, उन दोनों में एक सीधा सम्बन्ध है।

आचार्य: हाँ।

प्र तो वो कभी राजनेता से ऐसी माँग भी नहीं करेंगे कि तुम पहले क्लाइमेट चेंज का निवारण करो।

आचार्य: बिलकुल, बिलकुल।

प्र तो ये जो कुचक्र सा बैठा है, ये टूटेगा कैसे फिर?

आचार्य: ये टूटेगा ऐसे ही कि जो समझ रहे हैं उस बात को, वो आवाज़ उठाएँ और जितने लोगों को समझा सकते हैं, समझाएँ। जैसे आप कोशिश कर रहे हो, वैसे ही और बहुत लोगों को बहुत ज़ोर-ज़ोर से कोशिश करनी पड़ेगी।

हम बहुत नाज़ुक दौर से गुज़र रहे हैं। जब मैंने प्रलय कहा तो पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कहा। मैं यूँही कोई सकेयरमोंगरिंग (डराना) नहीं कर रहा हूँ। हम वास्तव में सर्वनाश के बहुत निकट आ चुके हैं।

प्र सर, आपने गोवा की बात की, तो जैसे समुद्र को लेकर एक तथ्य है कि बहुत बड़ा एक समुद्र में डेड ज़ोन बन चुका है, जहाँ पर अभी हाल ही में ये हुआ था कि एक समुद्र के तट पर बहुत सारी मछलियाँ बहकर एकदम तट तक आ गई थीं, एकदम मरकर।

तो जब देखा गया कि ऐसा क्यों हुआ तो समुद्र के अंदर डेड जोन्स रहते हैं, जहाँ पर ऑक्सीजन एकदम डिप्लीट हो गई है। और वो डिप्लीट इसलिए हुई है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र के अंदर का पूरा जो सिस्टम है, वही ऐसा हो गया कि वहाँ पर जो पेड़-पौधे होते थे, वो नहीं हैं। लेकिन ये बात हमारे सामने कभी नहीं आती है। हमारे सामने नहीं आ पाती है ये बात।

आचार्य: देखिए, मीडिया भी आपके सामने वही चीज़ रखेगा न जो चीज़ आप कंज्यूम (उपभोग) करना चाहते हो। मीडिया भी तो एक बाज़ार है। वो आपके सामने कुछ चीज़ें रख रहा है, वो वही चीज़ें आपको दिखाएगा जिन चीज़ों के ग्राहक हैं। जिस चीज़ का कोई ग्राहक नहीं, मीडिया भी वो चीज़ आपको परोसेगा ही नहीं।

और ये बहुत ख़तरनाक बात है। इसका मतलब आपको वही दिखाया जा रहा है जो आप देखना चाहते हैं। इसका मतलब जो चीज़ ज़रूरी है, वो आपको कभी दिखाई जाएगी ही नहीं। इसका मतलब आप अपनी बर्बादी की तरफ़ एक्सलेरेटेड रेट (त्वरित दर) से बढ़ते रहोगे।

प्र यदि वीडियो के इस पड़ाव तक, अगर कुछ मुसलमान भाई आपको सुन रहे हों अभी, तो आप उनसे कोई आख़िरी बात कहना चाहेंगे?

आचार्य: अब देखिए, धर्म का काम होता है आपको पहचान से मुक्त करना। धर्म होता है अंततः मुक्ति, लिबरेशन के लिए। कुछ बनकर‌ मुझे मत सुनो, जो भी पहचान है, उसको ज़रा अलग रखो। मुझे सुनने के लिए भी तुम्हें अपनी पहचान से थोड़ा मुक्त होना पड़ेगा तब तुम्हें मेरी बात समझ में आएगी।

मैं भी कोई पहचान लेकर आपसे बात नहीं कर रहा हूँ। मैं एक समझ से आपसे बात कर रहा हूँ। इट्स अ कॉन्शियसनेस सेंस आइडेंटिटी (यह बिना किसी पहचान की चेतना है)। पहचान तो जब भी बोलेगी, तो कोई रटी-रटाई बात बोलेगी, कोई सेकटेरियन बात बोलेगी, कोई सांप्रदायिक बात बोलेगी, कोई सीमित, कोई लिमिटेड बात बोलेगी।

'पहचान' कभी सत्य नहीं बोल सकती क्योंकि उसको तो अपनी ही रक्षा करनी है। पहचान को तो अपनी रक्षा करनी है तो वो सच की बात कभी नहीं कर सकती।

आप अपनेआप को कुछ बना करके कभी सच्चे आदमी नहीं हो सकते। अगर आपने अपनेआप को कुछ बना रखा है तो फिर आपकी सारी ऊर्जा बस उसको बचाने में ही लग जाएगी, जो आपने अपनेआप को बना रखा है।

प्र जी।

आचार्य: तो मुझे सुनना है तो खुले मन के साथ और थोड़ी निष्पक्ष चेतना के साथ सुनिए। यही मेरा आग्रह है आपसे। बाकी मैं अपनी ओर से आपको यही भरोसा दिला सकता हूँ कि मैं आपके हितैषी की तरह बात कर रहा हूँ। मेरा इरादा साफ़ है।

प्र सर, लेकिन ऐसा सम्भव है कि आपका ऐसा कहने के बाद भी कई लोग आपके दुश्मन फिर भी बन जाएँ।

आचार्य: नहीं, दुश्मन मेरे बन जाएँ; बिलकुल हो सकता है। ये भी हो सकता है कि दुश्मन बनकर वो मेरा कुछ नुक़्सान भी कर डालें। मैं अभी ये नहीं देख रहा हूँ कि मेरे दुश्मन कितने बनेंगे, या वो मेरा क्या नुक़्सान कर देंगे; मैं अभी ये देख रहा हूँ — तुम्हें बात बच्चों जैसी लगेगी — मैं अभी ये देख रहा हूँ कि ये करके अगर पाँच-दस हज़ार बेचारे जीवों की जान बच जाती है, तो ये हमारी बातचीत, मेहनत सफ़ल हुई।

नहीं भी पाँच-दस हज़ार की बचती है, अगर पाँच-सात सौ जीवों की भी जान बच जाती है तो उसके लिए मैं ख़तरा झेलने को तैयार हूँ।

एक बेगुनाह की जान बचे, बड़ी बात होती है। उसके लिए अगर कोई भाई मुझसे दुश्मनी करना चाहे तो उसका स्वागत है।

मैं और क्या कहूँ! (हँसते हुए)

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