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और हम चीन से आगे निकल गए || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। सर, मेरी एक कज़न हैं जो पहले से ही एक बच्चे की माँ हैं। और अभी हाल में ही उनसे बात हुई थी तो वो दूसरा बच्चा भी प्लान कर रही हैं। इस बारे में जब बात की कि इंडिया की जनसंख्या चाइना से ज़्यादा हो रही है, तो आप क्यों कर रहे हो? तो उनका बस यह कहना था कि 'मैं अभी तीस की होनेवाली हूँ, तो दो बच्चें तो चाहिए; उसके बाद मैं कर नहीं पाऊँगी।' फिर यह बोला कि गोद ले लो। उसका उत्तर यही मिला कि अपना बच्चा तो अपना ही होता है। सर, हम किस दिशा में जा रहे है?

आचार्य प्रशांत: मैटर्निटी वार्ड (प्रसूति कक्ष) की दिशा में। (सब हँसते हुए) मैं क्या बोलूँ इसमें? कुछ नहीं है करने को ज़िंदगी में तो यही करो। और क्या है? देखिए, यह मुझ पर बहुत बार इल्ज़ाम लग जाता है, कहते हैं, 'आप महिला हो क्या? जब महिला नहीं हो, तो हमारे मुद्दों पर क्यों बोलते हो? और वो भी हमें अनाब-शनाब क्यों बोलते हो?' महिलाओं को बड़ी दिक़्क़त होती है।

देखिए, महिला नहीं हूँ लेकिन इंसान हूँ। महिलाएँ भी इंसान ही होती है। एकदम से मैं महिला के चित्त में प्रवेश नहीं कर सकता। लेकिन एक इंसान होने के नाते दूसरे इंसान की क्या संवेदनाएँ होती हैं, ज़िंदगी कैसी होती है इसको थोड़ा-बहुत तो मैं अनुभव कर सकता हूँ न? अनुभव करने के नाते कहा करता हूँ। यह आपको बड़े भ्रम में डाल दिया गया है, बड़े जाल में बाँध दिया गया है, आपको बार-बार बोल करके कि बच्चा बड़ी महत्वपूर्ण चीज़ होती है।

देश की आबादी चीन से ज़्यादा हो गई है, ठीक है, चलो वो तो एक एग्रीगेटेड फ़िगर (कुल आँकड़ा) है, है न? एक बड़ा आँकड़ा है। कहते हो एक सौ बयालीस करोड़, वो एक सौ बयालीस करोड़ में से सत्तर करोड़ महिलाएँ होंगी। और हर महिला एक चेहरा होती है। हर महिला अपनेआप में एक समूची सत्ता होती है, एक अलग व्यक्ति होती है। मैं उस व्यक्ति से बात करता हूँ।

उस व्यक्ति से अगर सही बात कर ली तो वो जो एक सौ बयालीस करोड़ का आँकड़ा है, वो शायद अपनेआप ठीक होने लग जाए। बात यह है कि उस इंसान से नहीं बात हो पा रही है ठीक से। तो उस इंसान से पूछा करता हूँ, ‘तुम्हें क्या मिल जाएगा यह सब करके? तुम अपनी बुद्धि से भी तो सोच सकती हो न? या तुम्हें बस जो समाज ने, संस्कृति ने बता दिया उस पर ही चलना है? या पतिदेव ने जो पढ़ा दिया या सास ने, वही सुनना है?’

जिस दिन तुम प्रेग्नेंट (गर्भवती) हो जाती हो, तुम्हारी जो साधारण गतिविधियाँ हैं वो रुकने लगती हैं। गर्भ के कुछ महीने बाद तुम दफ़्तर जाना बंद कर देती हो, अगर जाती थी तो; बहुत सारी तो जाती ही नहीं। पतिदेव का क्या जाता है, उनको तो सुख का पल मिला था। और उसके बाद भी उनकी गतिविधियाँ जैसी थी जीवन की, लगभग वैसी ही चलती रहती हैं। ठीक? अनुभव नहीं करा मैंने, लेकिन देख तो रहा हूँ चारों ओर। या अभी भी यह इल्ज़ाम लगाओगे कि 'आप तो महिला नहीं है, आपने अनुभव तो करा नहीं है।' दिख तो रहा है न क्या हो रहा है?

पतिदेव तो अपना बाहर जा रहे हैं, कमा रहे हैं, करियर (व्यावसाय) में भी तरक्की ले रहे हैं, ले रहे हैं न? दुनिया का भ्रमण कर रहे हैं, उनको भेजा है कंपनी ने फ़लानी टूर (व्यापार यात्रा) पर जाओ, वहाँ भी जा रहे हैं। जो भी करना है कर रहे हैं। ज्ञान भी बढ़ रहा है उनका।

और आपने क्या करा? आपके पर (पंख) कुतर दिए, अब आप घर में बैठी हैं। और घर में भी बैठ कर अब आपको ध्यान किस चीज़ पर देना है? सिर्फ़ देह पर। यह जो बॉडी सेंट्रिसिटी (शरीर की केन्द्रीयता) होती है, देहभाव; यह वैसे ही किसी भी जीव का नर्क होता है। और जिस दिन आप गर्भवती हो गई उस दिन सिर्फ़ और सिर्फ़ आपको देह बनकर जीना है। लगातार अपनी देह पर ध्यान दो, जैसे एक बीमार आदमी को देना होता है अपनी देह पर ध्यान।

एक आदमी बीमार हो जाए, उसको बड़ी दिक़्क़त रहती है। उसको लगातार यही सोचते रहना होता है, कौन-सी दवाई खाए, कौन-सी चीज़ नापे?

अभी थोड़ी देर पहले बात चली थी, मुझे इसलिए नहीं पसंद है बार-बार डॉक्टरों के पास जाना, अपनी जाँच करना। कुछ-न-कुछ गड़बड़ निकल ही आती है। वो कहते हैं, इतनी-इतनी दवाई नियमित रूप से लो। फिर कहते हैं कि इतने दिनों बाद यह-यह टेस्ट रिपोर्ट लेकर के मेरे पास आओ। और उससे पहले भी यह टेस्ट , वो *टेस्ट*। मेरा चित्त मुक्त रहने दो, मुझे काम करना है। मैं नहीं सोचना चाहता, मैं ध्यान नहीं रखना चाहता कि मुझे कितने बजे कौनसी दवाई खानी है। और मेरे पास ऐसा कोई सिस्टम नहीं है कि दवाई वग़ैरह मुझे रिमाइंड (स्मरण) करा दिया जाए, या बना करके दवाई दे दी। मैं इसलिए प्रिस्क्रिप्शन (दवा का पर्चा) लेना ही नहीं पसंद करता। मुझे मत दो।

इस नाते मैं बोल रहा था और नहीं कोई बात है। और फिर वो बोलेंगे, 'यह कराओ, वो कराओ।' सीटी स्कैन की मशीन में घुसना, दम घुटता है वहाँ पर और वो गोल-गोल घूमता रहता है; तो इसलिए। अब मुझे इतनी कोफ़्त होती है इस बात से कि कोई मेरे ऊपर बार-बार यह एहसास डाले कि मैं एक देह हूँ। अच्छा, कम-से-कम सत्तर तरीक़े के वेरिएबल्स होते हैं जब चेकअप कराते हो। लिवर के ही आते हैं कम-से-कम दस-पंद्रह तरीक़े के। फिर ब्लड के आ जाते हैं, हार्ट के आ जाते हैं, सबके आ जाते हैं। आपको अब लगातार देखते रहना है, बच्चा है तो बार-बार जाकर चेकअप कराइए।

मन पूरे तरीक़े से देहभाव से आच्छादित हो जाएगा, हो जाएगा कि नहीं हो जाएगा? 'मैं देह ही तो हूँ।' और इंसान हैं आप, कोई हरफ़नमौला, कोई सुपरमैन तो हैं नहीं? जब दिमाग़ पर बार-बार देह का ही स्मरण आता रहेगा, तो दिमाग़ और कोई ऊँची बात तो सोच नहीं पाएगा? दर्शन, साहित्य, कला, विज्ञान कहाँ से सोच पाओगे? छोटा सा ही तो दिमाग़ होता है न? और उस छोटे से दिमाग़ में बॉडी ही भर गई, वह भी अपनी ही बॉडी नहीं, बच्चे की भी, तो कहाँ से जगह बचेगी कि आप दुनिया की ऊँचाइयों के बारे में सोचो, ज़िंदगी को आगे बढ़ाने के बारे में सोचो?

किसी का कुछ नहीं जाता। जिन्होंने आपको बना दिया है कि आपको ही तो दुनिया की लाज रखनी है, आपको ही तो संस्कृति का बोझ अपने कंधों पर ढोना है, उनका क्या जाता है?आप देखिए न आपके साथ क्या हो रहा है।

उसके बाद वो पैदा हो जाता है। और आपको बताया जाता है, 'इससे बड़ा सुख नहीं हो सकता, मातृत्व, मातृत्व।' एकदम हटाइए, यह सब जो नोशन्स (मत) हैं, कॉन्सेप्ट्स (अवधारणाएँ) हैं, उनको हटाइए।

आप लगातार-लगातार एक जीव के साथ हो जो हर समय रोता रहता है। आप सो भी रही हैं तो वो रो रहा है। और टट्टी-पेशाब, टट्टी-पेशाब यही उसको लगातार करना है। और उसको आपकी देह से चिपकना है, उसको ज़िंदगी आपकी देह से मिलती है, उसको स्तनपान करना है हर समय। वो आपको खुला नहीं छोड़ सकता। वो आपको घंटे भर के लिए भी आज़ाद नहीं छोड़ेगा। कुछ अतिशयोक्ति कर रहा हूँ तो बताइए।

आपको बच्चा हुआ है, आप घंटेभर के लिए उससे मन हटा सकती हैं क्या? एक घंटा बहुत ज़्यादा होता है, आप पंद्रह मिनट के लिए नहीं हटा सकतीं। ऐसे मन का क्या होगा, जिसमें अपनी देह तो घुसी ही हुई थी, अब एक देह और घुस गई है?

और आप कोई बहुत बड़ी समस्या से नहीं उलझ रही हैं। जीवन में कष्टों का मुकाबला निसंदेह करना चाहिए, चुनौतियों से जूझना चाहिए। पर आप यह भी तो देखो कि आप किस स्तर की चुनौती से जूझ रहे हो? वो किस स्तर की चुनौती है?

बार-बार वो अपना डायपर गन्दा कर रहा है, यह है आपकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी चुनौती! यह किस स्तर की चुनौती है? यह मुस्कुराने की बात है? यह ख़ौफ़ की बात है! द बिग्गेस्ट कंसर्न ऑफ़ लाइफ इस द डायपर। व्हाट काइंड ऑफ़ लाइफ इस दिस? (यह कैसा जीवन है जिसका सबसे बड़ा मुद्दा डायपर है) नहीं, कुछ ऐसा है जो बस मुझे ही दिख रहा है, आपको कुछ फ़र्क ही नहीं पड़ रहा है उससे। ठीक है!

किसी महिला की गोद में दो-तीन महीने का बच्चा हो, मेरी हिम्मत ही नहीं पड़ती कि मैं उससे कोई तात्विक बात कर पाऊँ। क्या बात करूँ? मेरी बात के बीच में वो कु-कु करेगा, रो पड़ेगा, तो उसे हटना पड़ेगा। आप हँस कैसे रहे हो? (श्रोता को संबोधित करते हुए) आप पैदा हुए थे, आपकी माँ का भी यही हुआ होगा।

माँओं को किस बात से, किस दमन से गुजरना पड़ता है इस पर तो हम कभी ध्यान ही नहीं देते। और उस दमन की क्षतिपूर्ति कर देते हैं हम उसको देवी बना करके। हम कहते हैं माँ का इतना दमन हुआ है, चलो हम उसे सम्मान दे देते हैं, माँ देवी है। देवी बोल देने से उसकी क्षतिपूर्ति थोड़े ही हो गई, उसकी ज़िंदगी तो ख़राब कर ही दी न?

और पतिदेव इतने में अपना बाहर घूम रहे हैं, और इतना ही नहीं, उनको एक अतिरिक्त दर्प का, गर्व का बिंदु भी मिल गया है। क्या? 'तुम तो कमाती भी नहीं हो, तुम्हारी और बेबी इन दोनों की तो मुझको ही परवरिश करनी पड़ती है। तुम तो घर पर बैठी हो। मैं बाहर जाता हूँ, मैं ब्रेड विनर (कमानेवाला) हूँ। आई ऍम द प्रोटेक्टर ऑफ़ द फॅमिली। (मैं परिवार का रक्षक हूँ)'

और यह घर में बैठ गई हैं चार दीवारों के बीच में। मन भी संकुचित हो रहा है, ज्ञान भी संकुचित हो रहा है, सरोकार भी बस देह तक ही सीमित रह जा रहे हैं। यह क्या, क्या कर रहे हो अपने साथ? अधिकांश महिलाएँ तो फिर वापस लौटकर काम पर जाती भी नहीं हैं। तीन-चार साल का एक बार ऐसा अंतराल आ गया, तो उस गैप (अंतराल) के बाद वर्कप्लेस (कार्यस्थल) पर वापस लौटना आसान नहीं होता। और बहाना भी मिल जाता है नुन्नू छोटा है। और पतिदेव कमा तो रहे हैं, मैं क्या करूँ कमा के?

इसमें क्या ऐसा ख़ास है कि… इसमें महिला क्या पुरुष के लिए भी कुछ ख़ास नहीं है। इसमें किसी के लिए कुछ ख़ास नहीं है; पर पुरुष इसका ख़ामियाज़ा दस प्रतिशत ही भुगतता है, नब्बे प्रतिशत महिला भुगतती है। और वो भुगतती रहे, इसके लिए हमारे पास बड़ी गरिमापूर्ण मान्यताएँ हैं। तुरंत उसको विभूषित कर देते हैं, अब यह माँ बन गई। साधारण-सी लड़की जिस दिन माँ बन जाती है, समाज में उसका सम्मान बढ़ जाता है, देखा है?

बल्कि अगर वो लड़की चाहती हो — उसमें कोई काबिलियत न हो, गुण न हो, कोई उसने चेष्टा नहीं करी, कोई उसने प्रतिभा नहीं दर्शाई पर इन सब के बावजूद वो चाहती हो — कि उसे सम्मान मिले, उसके लिए बहुत आसान है, 'तू माँ बन जा, सब तुझे इज़्ज़त देना शुरू कर देंगे। लोग तेरी बात को गंभीरता से लेने लगेंगे।'

यह जो महिलाएँ दुनिया में हर क्षेत्र में पिछड़ी हुई हैं, मैं जहाँ से देख रहा हूँ — और हो सकता है मैं बिलकुल ग़लत हूँ। साधारण आदमी हूँ बिलकुल शत प्रतिशत ग़लत हो सकती है मेरी बात — पर मैं जहाँ से देख रहा हूँ महिलाओं की दुर्दशा में सबसे बड़ा योगदान वही छोटे से जीव, बच्चे का ही है।

यह जो चाइल्ड बर्थ (प्रसव) की पूरी बात है, इसको बड़ी चुनौती की तरह लेना चाहिए कि भाई अब क्या करें प्रकृति ने शरीर ऐसा दिया है कि गर्भ हमको ही धारण करना है, पुरुष नहीं करेगा। तो उसको बड़ी चुनौती की तरह लेना चाहिए। किसी तरीक़े से इसमें काँटे से काँटा निकाल दिया जाए। सूक्ष्मता से बस सुई में धागा निकाल कर काम चला लो, इतना। हल्के में नहीं ले सकते इसको।

और हल्के में लेने का यह मतलब होता है कि एक के बाद एक, दो बच्चे, तीन बच्चे कर लिए, या जो बच्चा आया भी वो बिना किसी तैयारी के, योजना के आ गया, तो उसके कारण हर तरह की तकलीफ़ से गुजरना पड़ रहा है, नौकरी छोड़नी पड़ रही है, पचास काम हैं।

जिस दिन महिलाओं को यह समझ में आ गया कि यह बच्चा पैदा करना उनके लिए बड़ी दुर्दशा का काम है, उस दिन आबादी की समस्या बचेगी कहाँ? कहाँ से बचेगी?

इसके हर तरीक़े के पहलू हैं। आप देखते नहीं हो, बच्चा पैदा करते ही आप आर्थिक रूप से अनुपयोगी संसाधन बन जाते हो, नहीं बन जाते? अब कोई और है जो आपका ख़र्चा उठाता है। आप उसका सम्बन्ध दहेज़ प्रथा से नहीं देख पा रहे? बोलो। आप उसका सम्बन्ध फ़ीमेल फ़िटीसाइड (नारी भ्रूण हत्या), फ़ीमेल इन्फैंटीसाइड (नारी शिशु हत्या) से नहीं देख पा रहे हैं? भाई यह कमाने-धमाने वाली चीज़ तो है नहीं, यह क्या करेगी? यह घर में पड़ी रहती है।

पहले पिता के घर में पड़ी थी, अब पति के घर में पड़ी रहती है। पिता के घर में पड़ी थी तो उसका ख़र्चा कौन उठा रहा था? पिता। जिस तरीक़े से सामाजिक हिसाब-किताब चलता है, मैं सामाजिक हिसाब-किताब बता रहा हूँ आपको। पहले पिता के घर में पड़ी थी, तो ख़र्चा कौन उठाता था? पिता। अब जाकर पति के घर में पड़ी रहेगी, बच्चे पैदा करती रहेगी, तो वहाँ ख़र्चा कौन उठाएगा? पति। तो अब पिता का ख़र्चा रुक गया, पति का शुरू हो गया। तो इसलिए अब पिता दहेज़ देगा।

आप देख रहे हो, यह जो लगातार घर में पड़ी रहनेवाली बात है, जिसका बहुत बड़ा सम्बन्ध चाइल्ड बर्थ से है, वो दहेज़ प्रथा के मूल में है चीज़। और जब दहेज़ देना ही है तो मैं लड़की पैदा ही क्यों करूँ? दो लड़कियाँ पहले से ही हैं, तीसरी आ रही है उसको गर्भ में ही मार दो। अब समझ में आ रहा है लड़कियाँ गर्भ में क्यों मरती हैं? क्योंकि लड़कियाँ ही गर्भ धारण करती हैं।

पर यह हमे समझ में नहीं आता। हमे बता दिया गया है कि स्त्री जीवन का सबसे बड़ा सुख है प्रजनन और सबसे बड़ी उपलब्धि भी। कैसे? आप क्या बोल रहे हो? कैसी बातें कर रहे हो? अब तो पढ़े-लिखे हो भाई! तुम टेनिस खेलने जाते थे, तुम तीन साल तक नहीं खेलोगे या कम-से-कम आठ-दस महीनें नहीं खेलोगे या सालभर। क्या होगा तुम्हारे सर्विस का, तुम्हारे बैकहैंड का, बताओ तो सही? साफ़? और जब लौटोगे कोर्ट पर तो पाँच-दस किलो बढ़ा कर लौटोगे। कोच भी कहेगा कि मैं दूसरों पर ज़्यादा ध्यान देता हूँ, यह तो मम्मी बन चुकी हैं, इन पर क्या ध्यान देना है। मम्मी वहाँ टेनिस खेल रही हैं और वो — क्या करोगे, उसको लेकर जाओगे, बंडल ऑफ़ जॉय (ख़ुशी का पिटारा) को? जैसे एक बॉल बॉय होता है, एक बंडल बॉय भी होगा, वो बच्चा लेकर घूमेगा टेनिस कोर्ट पर? क्या करोगे?

हाईकिंग, ट्रेकिंग (पैदल यात्रा) का शौक़ था, कर लो! अच्छी स्वीमर (तैराक) बन गई थीं, स्कूल में चौथी क्लास से ही स्विमिंग सीखनी शुरू कर दी थी। अब कर लो स्विमिंग ! और यह तो मैं एक बच्चे की बात कर रहा हूँ, यहाँ तो दो-दो, तीन-तीन रख के बैठती हैं, एक छः साल का, फिर एक तीन साल का, फिर एक तीन महीने का। समेट लो तीनों को, दुर्दशा देखो।

मैं प्लेन वगैरह में जा रहा होता था या सिनेमा हॉल में होता था, वहाँ पहले कोई बच्चा रोने लग जाए, मुझे क्रोध आता था। अब उम्र का तक़ाज़ा होगा, अब मुझे दया आती है। कहता हूँ, मैं इतनी दूर हूँ तो मुझे इतना गुस्सा आ रहा है, तीन सीट छोड़कर हूँ मैं, तो मुझे इतना बुरा लग रहा है। वो जो गोद में लिये हुए है उसको कैसा लग रहा होगा? उसकी तो ज़िंदगी नर्क हो गई।

मैं इसको एक राष्ट्रीय आपदा नहीं मान रहा कि एक सौ बयालीस करोड़ भारतीय हो गएँ और दुनिया में सबसे पॉप्युलेटेड यह देश है और जनसंख्या विस्फ़ोट हो रहा है। राष्ट्र क्या है? मुझे इंसानों से सरोकार है। इंसान अगर ठीक हो जाए तो राष्ट्र अपनेआप ठीक हो जाता है न? तो मैं इंसानों से बात कर रहा हूँ, और इंसानों में भी मैं उन इंसानों से बात कर रहा हूँ जो गर्भ धारण करते हैं, उन इंसानों को महिलाएँ कहते हैं। महिलाएँ कई बार भूल जाती हैं कि वो महिलाएँ नहीं हैं, इंसान हैं।

मुझे कोई बोले कि पेट से बाँध के कोई चीज़ नौ महीने चलनी है? मैं ऐसे-ऐसे (दाएँ-बाएँ) दो-चार बार देखूँगा और टेबल के नीचे घुस जाऊँगा। फिर कहीं से कोई सुराख़ बना कर के, कुछ तोड़-ताड़ कर इतनी तेजी से भागूँगा कि पकड़ में न आऊँ। नौ महीने? तुम मुझसे बोल दो नौ दिन कोई चीज़ बाँधनी है, मुझसे न बाँधी जाए।

और मैं बड़ा सम्मान रखता हूँ, बड़ा आभार है महिला मात्र के प्रति जो जन्म देती है। नौ महीने का धीरज बहुत-बहुत बड़ी बात होती है भाई। इंसान ही तो हो, मेरी तरह ही तो हो। मैं सोच नहीं सकता। मेरे पेट में गैस भर जाए, पेट फूलने लगे, फूलता है कभी-कभी, बड़ी अड़चन हो जाती है। कैसा हो रहा है, ब्लोटिंग हो रही है, भागो, दौड़ो, कुछ करो। और वहाँ पेट इतना बड़ा फूल जाता है, कैसे लेकर चल लेते हो? तो सचमुच नमस्कार है! यह कोई मैं इसमें व्यंग नहीं कर रहा हूँ।

पर हो गया, बहुत धीरज दिखा लिया, आठ सौ करोड़ बार धीरज दिखा लिया। एक-एक इंसान जो आपको आज जीवित दिखाई दे रहा है, वो किसी महिला के धीरज का प्रमाण है। अब और चीज़ों में धीरज दिखाइए, चुनौतियाँ उठाइए। ज़िंदगी ऊँचे और बड़े कामों के लिए है। यही सब थोड़े ही कि खून बह रहा है, उसकी टट्टी पोछ रहे हैं, पोतड़े बदल रहे हैं। ठीक है, ज़िंदगी में एक बार कर लिया पर्याप्त है, बार-बार नहीं करना है न। और अगर हो सके तो एक बार भी मत करिए, क्या रखा है?

एक छोटे बच्चे को लेकर एक महिला खड़ी हुई है और वो भी जाड़े के दिनों में; परी चौक की तरफ़ से निकलिए तो वहाँ बस का इंतजार कर रही होती हैं महिलाएँ। जाड़े के दिन हैं, वहाँ खड़ी हुई हैं और गोद में छौने होते हैं। इतनी बेबसी की वो मूर्ति होती है, कोई उसके साथ कुछ भी कर सकता है, उसके गोद में बच्चा है। कोई उसका पर्स छीन कर भाग जाए, क्या कर लेगी? कोई उसे दो बातें बोल दे, क्या कर लेगी? वो कुछ भी नहीं कर सकती है? आपको क्यों बेबसी को आमंत्रण देना है बार-बार? कुछ अधिक बोल दिया हो तो क्षमा कर देना। सद्भावना में ही बोल रहा हूँ, कोई टॉन्ट (ताना) नहीं मार रहा हूँ। ग़लत बोल दिया?

ठीक है छोटे बच्चे क्यूट होते हैं पर ठीक है, हो गया। क्यूटनेस वैगरह घंटे, दो घंटे अच्छी लगती है। और वो क्यूट भी न दूसरों के लिए होते हैं, बाहर वालों के लिए। जब माँ उनको नहला के, धुला के, बाल में तेल लगाकर कंघी-वंगी करके, टोपा डालकर तैयार कर देती है, तो बाहर वाले आते हैं, ऐसे ही होता है न? बाहर वाले आते हैं, ऐसे गोद में ले लेंगे, बोलेंगे, ‘कितना क्यूट बेबी , कितना *क्यूट बेबी।*’ अभी बेबी हग दे तो तुम साफ़ करोगे? तब क्यूटनेस धरी रह जाएगी सारी? सही बोल रहा हूँ कि नहीं? तो क्यूटनेस वग़ैरह बाहर वालों के लिए होती है। वो बेबी वाक़ई क्या चीज़ है वो माँ से पूछो। बाप को भी कम पता होता है, ज़्यादा पता माँ को होता है वो कितना क्यूट है।

छोटा बच्चा क्या है? हम सब छोटे थे, देखिए हम सब जानते हैं, हैं न? छोटा बच्चा जानवर जैसा होता है। आगे चलकर उसमें बुद्धि वग़ैरह विकसित हो जाती है; पर उस वक़्त उसमें न बुद्धि है, न कुछ है, बिना बात के रोता है, फ़िज़ूल ज़िद करता है, कुछ उसे समझ में आता नहीं। और यह उसकी दशा कोई दो-चार दिन नहीं चलती, कई-कई साल तक चलती है। कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य की इस दशा को क्यों झेले कई सालों तक? मैं पूछ रहा हूँ। और माँ बच्चे के लिए जितनी मेहनत करती है, वो ज़्यादातर मेहनत करती है — जो एकदम जान उड़ेल देने वाली मेहनत लगती है — बच्चे के आरम्भिक वर्षो में। ठीक?

और प्रकृति ने महिला के साथ इतना भद्दा मज़ाक़ करा है कि बच्चे को अपने आरम्भिक तीन-चार सालों की कोई स्मृति ही नहीं रहती। माँ ने जान उड़ेल दी बच्चे के लिए, और प्रकृति ने व्यवस्था यह कर रखी है कि बच्चे को याद ही नहीं रहेगा। आपमें से किसी को याद है आप जब डेढ़ साल के थे तब आपकी माँ आपके किए क्या करती थी? किसी को याद है? आप जब डेढ़-दो साल के थे, तब आपको सबसे ज़्यादा ज़रूरत पड़ती थी अपनी माँ की सेवाओं की, किसी को याद है? या छः महीने के थे आप तो आपकी माँ किस-किस प्रकार की सेवा करती थी, कुछ याद है? देखिए प्रकृति ने कितना क्रूर मज़ाक़ करा है स्त्री के साथ। बच्चे को याद ही नहीं रह जाएगा कि उसकी माँ ने उसके लिए क्या-क्या करा है! और यही बच्चा, माँ ने अपनी ज़िंदगी ख़राब कर दी, कैरियर ख़राब कर दिया, ज्ञान ख़राब कर दिया, अध्यात्म ख़राब कर दिया, मुक्ति से चूक गई! माँ ने सबकुछ अपने बच्चे के लिए कर डाला। और बच्चा आठ-दस साल का होगा और वो अपनी अलग दुनिया देखनी शुरू कर देता है, हाँ या ना?

यही बच्चा जो बात-बात में 'मम्मी-मम्मी' (छोटे बच्चे की मिमियाती नक़ल करते हुए) करता था, छः-आठ साल का होते ही माँ से चीज़ें छुपानी शुरू कर देता है, छुपाता है कि नहीं? वो नहीं बताएगा आपको कि स्कूल में आज क्या कांड कर के आया है; और है वो अभी तीसरी क्लास में या पहली में। पहली कक्षा में है, छः साल का है और वो माँ से झूठ बोलना भी शुरू कर देगा, चीज़ें छुपानी भी शुरू कर देगा। किसके लिए अपनी ज़िंदगी ख़राब कर रही हो?

पतिदेव बिलकुल छोकरे के छोकरे लगते हैं, वो तो बैचलर (कुंवारा) ही लग रहे हैं। और जब घर में स्त्री गर्भवती होती है तो पतिदेव की बैचलर लाइफ और परवान चढ़ती है। क्योंकि वो तो अब बाहर निकल नहीं सकती। पतिदेव अपना बाहर हैं, अपना देख रहे हैं; वह अपना बिज़ी (व्यस्त) हो गई है, गर्भ को देख रही है, बच्चे को देख रही है। वो अभी भी छोकरे जैसे लग रहे हैं। और वो जो लड़की थी कल तक, वो यकायक शारीरिक रूप से बदलकर के प्रौढ़ महिला जैसी लगने लग जाती है। फिर लड़की को ताज्जुब भी होता है कि पतिदेव ने एक्स्ट्रा मैरिटल (विवाह के अतिरिक्त संबंध) क्यों शुरू कर दिया। तुम बच्चा लेकर बैठो, वो बाहर बैठेंगे अब!

किताबों की दुकानों पर एक अलग सेक्शन (अनुभाग) होता है, जहाँ सब मम्मियाँ खड़ी होती हैं। फ़िलॉसफ़ी का सेक्शन होगा, वहाँ अधिकांशतः आपको पुरुष नज़र आएँगे। लिटरेचर , पुरुष नज़र आएँगे, साइंस पुरुष नज़र आएंगे, या बिज़नेस, मैनेजमेंट पुरुष नज़र आएँगे। और एक सेक्शन होगा, वहाँ पूरी मम्मियाँ नज़र आएँगी। कौन सा सेक्शन होता है? बेबी केयर। तो कुल मिलाकर इतना साहित्य बचता है महिलाओं के जीवन में, बेबी केयर।

या वो वहाँ पर बच्चे के लिए किताबें देख रही हैं, वो हो गया है अब ढाई साल का तो, उसमें इतना बड़ा 'A' लिखा हुआ है। तुमने ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन, डॉक्टरेट, पोस्ट डॉक्टरेट इसलिए करी थी कि अंत में इतना बड़ा 'A' देखो? यह इतना बड़ा 'A' क्यों देख रही हो? मैं पूछना चाहता हूँ। तुम्हारी सारी शिक्षा कुल मिलाकर के इतना बड़ा 'A' बन गई है। और जो गोद में है उससे वो भी नहीं बन रहा, 'A' का 'B' बना रहा है वो! उन्होंने स्पेक्ट्रोमेट्री में पीएचडी करी है, माताजी ने, और सारी स्पेक्ट्रोमेट्री क्या काम आ रही है? ‘क’ से कमल।

फिर घर में भी कलह शुरू होती है — यह सब जनसंख्या से सम्बंधित मुद्दे बता रहा हूँ। आप तो मैक्रो फ़िगर (स्थूल आँकड़ा) देख रहे हो एक सौ बयालीस करोड़। वो मैक्रो फ़िगर जिस घर से निकल कर आ रहा है, उसकी बता रहा हूँ। जब महिला का दमन होगा मानसिक रूप से, उसकी उड़ान रोक दी जाएगी, कतर दिया जाएगा उसको, तो फिर वो पति का भी गला पकड़ती है। उसको दिखता है न कि यह काम इसका और मस्त बाहर मौज मार रहा है। और मैं क्या कर रही हूँ यहाँ पर! फिर घर में और पकपक-पकपक शुरू होती है।

और पति इतना मासूम, बेचारे को समझ में नहीं आता, 'मैंने क्या कर दिया?' तुमने क्या कर दिया? ऐसे ही कहते है न,'यह कैसे कर रही है? मूड स्विंग्स है, मूड स्विंग्स। बच्चा जब से हुआ है तब से हार्मोनल इम्बैलेंस हो गया है। कुछ भी बोलती, कुछ भी करती, बिना बात के ही गला पकड़ती है।' वो बिना बात के नहीं गला पकड़ रही, तुमने उसकी ज़िंदगी ख़राब कर दी इसलिए गला पकड़ रही है।

साइंस एक एहसान और कर दे हमपर। यह जो पूरा जन्म देने का प्रोसेस (प्रक्रिया) है उसको शरीर से बाहर निकाल दे। इसमें यूटेरस (गर्भाशय) की कोई ज़रूरत बचनी नहीं चाहिए। यह पूरी प्रक्रिया शरीर से बाहर हो। यह एक मनुष्य के शरीर का शोषण है कि उसका इस्तेमाल किया जाए जन्म देने के लिए। हमें यह देह मुक्ति के लिए मिली है, इसलिए नहीं मिली है कि इसमें से दो-चार-दस और देहों को जन्म देते रहें।

हम बार-बार बोलते हैं न नारी सशक्तिकरण। तो विमेंस इमेंसिपेशन में जो बड़ी चीज़ अभी बाक़ी है वो यही है — उनको जन्म देने के बोझ से मुक्त करो। जैसे भी करना है करो। आर्टिफिशियल वुंब (कृत्रिम गर्भ) में करो, बाहर करो, प्रयोगशाला में करो, फैक्ट्री में करो, टेस्ट ट्यूब में करो, जहाँ करना है करो। उसको बख़्श दो, उसकी देह को बख़्श दो।

प्र२: नमस्कार आचार्य जी, मैं न्यूजीलैंड से आयी हूँ। जैसे की अभी चर्चा हो रही थी कि महिलाओं के लिए प्रेगनेंसी बहुत बड़ा विषय है, भारत में ख़ासतौर पर। मुझे याद आता है जब मेरी छोटी बेटी चार महीने की थी, तो हमारे वहाँ पर एक वेलकम पार्टी हुई, तो हमारे पड़ोसियों ने हमें आमंत्रित किया। और मेरी एक पड़ोसी है वहाँ पर, उसको मैंने पूछ लिया, ऐसे ही जैसे कि मानसिकता बनी हुई है, कि आपके कितने बच्चें हैं?

वो महिला बोलती हैं, ‘मेरे बच्चें नहीं हैं। लेकिन आप ऐसा सोचने की हिमाकत मत करना कि मैं बच्चा पैदा कर ही नहीं सकती, मैं बस बच्चा पैदा करना ही नहीं चाहती। पर मैं भारतीय लोगों की मानसिकता को समझ नहीं पाती, वो मुझसे यह सवाल क्यों पूछते रहते हैं। यह पहली बार नहीं है जब किसी ने मुझसे यह सवाल पूछा है, कई बार लोगों ने पूछा है। हाँ, मेरे बच्चें हैं, पर मेरे बच्चें हैं एक बिल्ली और एक कुत्ता। मेरी शादी की शर्त ही यही थी कि मैं बच्चे नहीं पैदा करुँगी।

पर अगर भारत में हम करें इस तरह से, तो मेरे ख़्याल से जो रिश्तों की बुनियाद होती है हमारे, जो रिश्ता किया जाता है शादी के लिए, तो सबसे पहले यही पूछते हैं कि अभी लड़की प्रजननक्षम है या नहीं है, क्योंकि उनका प्रमुख प्रश्न यहीं पर जाकर के टिकता है।

और इसकी वज़ह से हम लड़कियों की जो आज़ादी छिनती है, वो तो मैंने बहुत अच्छे से महसूस किया है। कैरियर में मैं पीछे गई हूँ।अपने घर में जो क्लेश हुआ, वो मैं जानती हूँ, और इसका सबसे बड़ा कारण प्रेगनेंसी रहा है।

इसके लिए अवेयरनेस आ रही है, फिर भी बहुत कम है, क्योंकि मैं अपने आसपास देखती हूँ, जिस तरह से उस बहन ने बताया कि हमारी कज़िन हैं, या मेरी सिस्टर्स हैं, मैं उनको समझा रही हूँ कि और बच्चें नहीं करने हैं तो सबसे बड़ा विरोध मेरी तरफ़ आता है। वो कहते हैं, ‘तुम्हारी जैसी महिला तो समाज में अयोग्य है, तुम जैसे लोगों को तो भारतीय समाज में होना ही नहीं चाहिए।’ तो मैं सोचती हूँ कि क्या और किया जा सकता है इस दिशा में? कि इनको और समझाया जाए, तुम यह जो बोझ ढो रही हो अपने शरीर में, यह तुम्हारे ही नर्क का कारण बनता है।

आचार्य: क्या किया जाए। है तो बहुत ही आसान। लड़कियाँ हैं सब और चैतन्य जीव हैं सब। सब के पास दिमाग़ है न, चेतना है न, सोच-समझ सकती हैं। छोड़िए की बेबी कितना ज़रूरी है, वो जो बेबी का बेबा है वो भी क्यों ज़रूरी है?

अगर वो यह ही शर्त रख रहा है कि नहीं करूँगा शादी अगर बच्चे नहीं करोगी, तो मत कर। तेरे जैसे सौ हैं। नहीं करनी है न, क्या ज़रूरत है जीवन में एक पुरुष को अनिवार्य रूप से रखने की? करना क्या है? बड़ा यह डर रहता है लड़कियों में, बड़ी मैंने इसमें चेष्टा भी करी है, लेकिन समझ में नहीं आता यह कितना ज़्यादा गहरा है। अकेलेपन का, लोनलीनेस (अकेलापन) का, इनसिक्योरिटी (असुरक्षा) का, कि कोई तो होना चाहिए न!

हटेगा, हटेगा, बिलकुल हटेगा; लेकिन पता नहीं कितने अभी साल या दशक लग जाएँगे। हट जाएगा। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं होती कि जब हटता है तो सबमें हटता है। इसमें हमेशा एक तबक़ा होता है महिलाओं का ही, जो समय से आगे चलता है; और फिर बाक़ी जो होती हैं वो उनका अनुगमन करती हैं।

तो वो जो समय से आगे चलने वाली महिलाओं का तबक़ा है, वो भारत में भी पैदा हो चुका है। और मैं समझता हूँ सैंकड़ों नहीं, कई-कई हज़ार ऐसी लड़कियाँ हैं, जिनको मेरी बातें बड़ी स्वाभाविक लग रही होंगी। जो बल्कि अगर जो मैं बोल रहा हूँ अभी, वो सुनेंगी कभी, तो कहेंगी कि, यह सब बातें बोलने की भी क्या ज़रूरत है, यह सब बातें तो ऑब्वियस (स्पष्ट) हैं। लेकिन मेरी यह बातें मुश्किल से कुछ हज़ार लड़कियाँ होंगी जिनको बिलकुल सहज और ऑब्वियस लग रही होंगी।

ज़्यादातर लड़कियों को, महिलाओं को, निन्यानवे प्रतिशत को, मेरी यह बातें एकदम ऐसी लगेंगी कि यह क्या बोल दिया, क्यों बोल दिया? इतनी कड़वी, गन्दी, ग़लीज़ बात, क्या कह रहे हैं? लेकिन यही बात जो आज आपको असामान्य लग रही है या कटु लग रही है, यही पाओगे कि आज से कुछ दशक बाद आपको बिलकुल सामान्य लगेगी। और आप कहोगे यह बात तो, ऐसा तो होना ही चाहिए, यह बात तो बिलकुल ठीक है। बस आज आपको मेरी बात समझ में नहीं आ रही है।

मैं कह रहा हूँ, आपको पुरुष चाहिए ही क्यों? अध्यात्म में पुरुषों के लिए तो ब्रह्मचर्य रख दिया गया, महिलाओं को यह बात समझ में नहीं आती। पुरुषों को कम-से-कम एक विकल्प तो बता दिया गया कि स्त्री के बिना भी जीवन है और उच्चतर जीवन है। ब्रह्मचर्य का क्या मतलब है? कामना में नहीं फँसना है, ख़ासतौर पर देह की कामनाओं में नहीं फँसना है, उसको ब्रह्मचर्य बोलते है। ठीक है?

तो पुरुषों को तो यह बात बहुत पहले से समझ में आ गई थी कि इन चक्करों में न फँसना ही बेहतर है। हमने फिर ब्रह्मचारियों को बहुत सम्मान दिया, उनको फिर ऊँचा माना, आदर दिया। इससे क्या पता चलता है? कि जिस पुरुष के बात समझ में आ गई, कि यह बच्चा और यह कामना और यह स्त्री, यह सब चीज़ें ऐसे ही हैं, बेकार, फ़िज़ूल, हम समझ गए कि इसने कोई बेहतरीन बात पकड़ ली है, हमने उसको सम्मान देना भी शरू कर दिया। आप कहते हो न ब्रह्मचारी आ रहे है तो उनको नमन करो।

महिलाओं को यह बात हमने कभी समझाई ही नहीं कि ब्रह्मचर्य उसके लिए भी ऊँची बात है और तुम्हारे लिए भी ऊँची बात है। जैसे पुरुष ज़्यादा सम्मान का अधिकारी हो जाता है, जब वो कहता है कुछ नहीं रखा है स्त्री वगैरह में, इन सब घरेलू चपड़ो में, मुझे फँसना ही नहीं है। तो पुरुष ज़्यादा सम्माननीय हो जाता है न? आप बोलते हो संन्यासी, ब्रह्मचारी। वैसे ही स्त्री भी ज़्यादा सम्माननीय हो जाती है, जब वो कहती है, नहीं चाहिए न बेबी , न बेबा।

यह बात महिलाओं के दिमाग़ में उतरनी ज़रूरी है कि इट्स अ हाइयर लाइफ़ एंड बेट्टर लाइफ़ दैट यू विल बी लीडिंग, इफ़ यू कैन अवॉइड द मैन एंड द इंस्टीट्यूशन ऑफ मैरिज एंड द कंपल्सन ऑफ़ चाइल्ड बर्थ। (आप एक उच्चतर और बेहतर ज़िंदगी जिओगी, अगर आप पुरुष की, विवाह के संस्था की और बच्चें पैदा करने की बाध्यता की उपेक्षा कर सको)

इन चीज़ों से आप जितना बच सको, आप अपने लिए ही नहीं, आप वास्तव में समाज के लिए भी उतनी उत्पादक हो जाओगी, उपयोगी हो जाओगी, सम्माननीय हो जाओगी। यह बात महिलाओं के दिमाग़ में उतरनी ज़रूरी है। धीरे-धीरे उतर रही है। और उनको यह सम्मान जानते हैं — मेरे अनुभव में, जितना मैंने पाया है — कौन दे रहा है वो सम्मान? उनको वो सम्मान महिलाओं से ही आ रहा है।

उदाहरण के लिए, भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तान थीं, मिताली राज। वो रिटायर हुई हैं, अभी लगभग चालीस साल की उनकी उम्र थी। तो अब उनको सब एडमायर (प्रशंसा) करते हैं। कप्तान भी थीं और बतौर क्रिकेटर उनके आँकड़ें भी बुलंद हैं। वो बोल रही हैं, ‘मैं पच्चीस की थी तो मुझे लगता भी था कि मेरे दोस्तों की शादियाँ हुई जा रही हैं तो मेरा क्या होना है? अब मैं बहुत-बहुत ज़्यादा सौभाग्यशाली अनुभव करती हूँ, कि मैं इन चक्करों में फँसी नहीं।’ और अब उनको देख कर इंस्पायर (प्रेरित) भी कौन हो रही हैं? वो महिलाएँ जो उन चक्करों में फँसीं, क्योंकि वही समझ पा रही हैं अपना दर्द। और वही देख पा रही हैं कि अगर हम नहीं फँसे होते तो हम भी मिताली जैसे होते। हम नहीं फँसे होते तो हम भी उसके जैसे होते; पर हम फँस गए।

अध्यात्म इसलिए ज़रूरी है न, अध्यात्म जब नहीं होता तो यह दो आप पर हावी हो जाते हैं: एक देह और एक सामाजिक संस्कृति। और यह दोनों ही एकदम कचरा चीज़ें हैं, देह और संस्कृति।

देह भी जो स्त्री की होती है वो लगातार उससे क्या बोलती है? हर मासिक धर्म के साथ आपको एक रिमाइंडर (याद दिलाने वाला) भेजा जा रहा है, 'गर्भ है, गर्भ है, इसका कुछ करना है, देखो यह है शरीर में, इसका कुछ करना है,’ है न? आपको कभी पता चलता है, किडनी है? आपको पता चलता है लिवर है? यह सब अपना काम कर रहे हैं, भीतर न जाने और कितनी चीज़ें अपना काम कर रही हैं। पर प्रकृति ने ऐसा खेल रचा है कि आपके पास एक गर्भाशय है, यह आपको हर महीने याद दिलाया जाता है।

तो एक तो देह चाहती है कि आप गर्भ धारण करें और दूसरे यह संस्कृति चाहती है। संस्कृति में मातृत्व का इतना यशोगान किया गया है, कि माँ है तो ऐसी है, माँ है तो ऐसी है। यह दोनों मिलकर के महिला को पकड़ लेते हैं, देह और समाज। समाज माने संस्कृति। देह और समाज। उसको लगातार यही रहता है कि चलो मैं भी यह सब कर लेती हूँ।

दुनिया की चेतना के तल पर जो प्रगति होनी है इस बिंदु से आगे, उसमें महिलाओं को इंसान मान करके, देह से उनकी मुक्ति, बड़ा निर्णायक कदम होगा। और उसके लिए महिलाओं की पुरुषों पर आश्रयता, यह सारी बात कि लड़की पराया धन है, विदा करके उसको पति के घर भेज दो, पति के घर जाकर घोसला बसाएगी, वहाँ पर बच्चें देगी, यह सब जो कॉन्सेप्ट्स (अवधारणा) हैं, उनको हटाना बहुत ज़रूरी है, सिर्फ़ महिला के लिए नहीं पुरुषों के लिए भी। पूरी पृथ्वी के लिए बहुत ज़रूरी है। एक-एक जो पृथ्वी पर प्रजाति है उसको भी अगर बचाना है, तो बहुत ज़रूरी है कि यह जो महिला के मन में तमाम तरीक़े के जाल बैठा दिए गए हैं, इनको अब हटा दिया जाए।

देखिए भूलिएगा नहीं, हम बार-बार बोलते हैं न फैमिली इज द यूनिट ऑफ़ सोसाइटी (परिवार समाज की इकाई है), वो छुपाने वाली बात है। द फॅमिली इस द यूनिट ऑफ़ कंसम्पशन (परिवार भोग की इकाई है)। आप अपनी ज़िंदगियों में थोडा सा वापस जाइए और देखिए आप जब बैचलर थे तब आप कितना कंसम्पशन करते थे, किसी भी चीज़ का? और जिस दिन आपने घर बसा लिया उस दिन आपका कंसम्पशन लेवल क्या हो गया? देखिए जऱा , देखिए न? बोलो?

श्रोतागण: चार गुना।

आचार्य: यहाँ बोधस्थल में बारह-चौदह जने रहते हैं, ठीक? अभी इनका पर कैपिटा कंसम्पशन (प्रति व्यक्ति उपभोग) कितना होगा, एक बार सोच लीजिए। या कोई होस्टल ले लीजिए। और जब यह जा-जाकर अपना घर बसाएँगे, तब इनका पर कैपिटा कंसम्पशन कितना हो जाएगा, यह सोच लीजिए। सोचिए तो! अच्छा एक बात बताइए, शादी-ब्याह न हो तो रियल इस्टेट इंडस्ट्री ( घर, जमीन, ऑफिस, फ्लेट आदि के खरीदने बेचने का व्यवसाय) का क्या होगा? और अगर हाउसिंग लोन (गृह ऋण) न हो तो बैंकों का क्या होगा? जब आप एक घर ख़रीदते हो तो आप सोचते हो पैसा है वो सेलर (विक्रेता) को या डेवलपर (विकासक) को दे रहे हो। वो पैसा आप जानते हो किसको दे रहे होते हो, वो आप बैंक को दे रहे होते हो। यह घरों की जो विक्री होती है उसमें ज़्यादा लाभ बैंकों का होता है।

तो जो फ़ैमिली है वो ‘कंसम्पशन बेस्ड कैपिटलिज्म’ (उपभोग आधारित पूंजीवाद) की इकाई है। और वो जो ‘कंसम्पशन बेस्ड कैपिटलिज्म’ है वही पृथ्वी को खा गया। क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) और कहाँ से आ रहा है?

लेकिन यह बात हमारे समझ में नहीं आती कि अगर पृथ्वी को भी बचाना है तो महिला को अकेले रहना सिखाना होगा।

आप जब अपने घर में होते हो या होस्टल में होते हो, या होस्टल में नहीं हो, घर में भी नहीं हो और कहीं काम कर रहे हो; तो किसी डॉम में रह रहे हो, या पीजी में रह रहे हो, तब आपके पास एक कमरा होता है। लेकिन जिस दिन आप ब्याह जाते हो तब आपको पूरा घर चाहिए। और घर है तो फर्निशिंग (साज-सज्जा) भी होगी। फिर अब आपको अपना फ्रीज चाहिए, फिर यह थोड़ी होगा कि — हमारे यहाँ तो बारह लोगों के लिए दो फ्रीज है, जिसमें से एक काम नहीं करता। चौदह लोग और छः खरगोश, एक फ्रीज में काम चल रहा है। और घरो में? 'यह बड़ा!'

यकीन ही नहीं होता न यह सब बात सुनकर? 'अच्छा, एक नयी ऐसी ज़िंदगी हो सकती है?' हाँ हो सकती है। बिलकुल हो सकती है और बहुत सुन्दर और सार्थक हो सकती है। वही सुन्दर है, वही सार्थक है। यह जो आप ज़िंदगियाँ जैसी देख रहे हैं, यह ज़िंदगियाँ नहीं हैं, यह बरबादियाँ हैं।

प्र३: सर, यह सब चीज़ मैं अपनी भी फ़ैमिली में देखती हूँ और अपने फ्रेंड सर्किल में भी अब देखने लग गई हूँ। तो इसमें क्लाइमेट चेंज यह सब का तर्क नहीं समझ में आता उनको, लेकिन जहाँ तक यह बात है कि उनको परेशानी होगी, यह भी तर्क मैं नहीं दे पाती हूँ क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि दो ऑब्जरवेशन है पहले तो। ऐसा लगता है पूरा सिस्टम ही इस चीज़ को फ़ैसिलिटेट (सुगम) कर देता है कि दादा-दादी हैं, नाना-नानी हैं यह रख लेंगे। और जो वर्किंग कपल्स (कामकाजी युगल) हैं वो अफोर्ड (खर्चा उठा सकते हैं) कर सकते है…

आचार्य: नहीं पर, दादा-दादी बच्चे को रख पाए, इससे पहले आपको दादा-दादी को रखना पड़ेगा? यह कैसा समीकरण है?

प्र३: यही हो रहा है। उन्हें पता ही नहीं चल रहा है कि वो परेशान हैं। और फिर मैटर्निटी लीव्स (प्रसूति अवकाश) भी हैं, अब तो पैटर्निटी लीव्स (पितृत्व अवकाश) भी हो जाता है कॉर्पोरेट्स में तो।

आचार्य: आप कैसा काम करते हो कि आपको लीव (अवकाश) शब्द प्यारा लग सकता है? बार-बार कहा है न कि काम ऐसा होना चाहिए कि कोई लीव दे, तो भी आप न लो।

तो ठीक है सरकार ने कानून बना कर या कंपनियों ने व्यवस्था कर दी है कि आपको इतने दिन की मैटर्निटी-पैटर्निटी लीव मिलेगी। यह आपके लिए ख़ुशी की बात है कि आपको अपने काम से इतने दिनों के लिए दूर रहना पड़ेगा? यह आनंद की बात है? इसमें क्या है? और आप काम से दूर हो, चलो ठीक है तनख़्वाह मिल रही है। काम का अनुभव भी मिल रहा है? सरकार में तो चलो सेनिओरिटी प्रिजर्व हो जाती है। कॉर्पोरेट में हो जाएगी? वहाँ सेनिओरिटी पर चलता है क्या काम, वहाँ तो परफॉर्मेंस पर चलता है। ठीक है आपने ले ली लीव , आप घर पर पड़े हो; दैट इज एज गुड एज ए डिमोशन (यह एक तरह से पदावनति है)। प्रॅक्टिकली यही तो होगा न कि आपके साथ वाले आपसे आगे निकलेंगे।

मैं प्रतिस्पर्धा की नहीं बात कर रहा, मैं योग्यता की बात कर रहा हूँ। आप जब काम नहीं कर रहे हो, घर पर बैठ कर बच्चा पाल रहे हो, तो आपकी योग्यता में उन्नति हो रही है क्या? फिर?

प्र३: लेकिन कॉर्पोरेट में जो भी है, वो यही कहते हैं, ‘ठीक है पैसा आ जाता है लेकिन इससे इनर फ़ुलफ़िलमेंट (आंतरिक तृप्ति) तो नहीं आती है।’ तो एक तरह से अपना मिसप्लेस्ड पर्पस (अनुचित उद्देश्य) इस चीज़ में…

आचार्य: तो वही है न, आपको पता ही नहीं है कि इनर फ़ुलफ़िलमेंट किस चीज़ से आएगी। तो आप फिर यह सब करते हो नाटक। इससे थोड़ी आती है इनर फ़ुलफ़िलमेंट? या लिटरल (शाब्दिक) ले लिया इसको, कि फिलिंग ऑफ द वुम्ब इज इनर फ़ुलफ़िलमेंट? (सब हँसते हैं)यह क्या है? यह कुछ नहीं है। इससे इनर फ़ुलफ़िलमेंट नहीं आ जाती है।

ऐसे तो फिर जितने पशु हैं अस्तित्व में, इन सबको तो फिर इंटरनली बड़ा फ़ुलफ़िल्ड होना चाहिए था न? यह हर समय बच्चे ही पैदा करते रहते हैं, नहीं करते? खरगोश चार-छः महीने का हो जाता है, वो बच्चे पैदा करना शुरू कर देता है। सब फ़ुलफ़िल्ड बनीज (तृप्त ख़रगोश) घूम रहे हैं ऐसे, 'अहम् ब्रह्मस्मि।'

'इतने सारे बच्चे पैदा कर लिए, हम फ़ुलफ़िल्ड हैं ।' ऐसे थोड़ी फ़ुलफ़िलमेंट मिल जाएगी? इतनी सस्ती चीज है फ़ुलफ़िलमेंट कि सेक्स करोगे और फ़ुलफ़िल हो जाओगे? ऐसे नहीं होता। वो तो उन्हें भी पता है जिन्होंने कर लिये। यहाँ माँ-बाप कितने बैठे है भाई? आप फ़ुलफ़िल हो गए?

श्रोतागण: नहीं, एम्पटी।

प्र३: उनके लिए एक माइलस्टोन है यह, अब यह है आगे बढ़ता जाएगा।

आचार्य: बच्चे को अच्छा नहीं लगेगा, जब आप उसको बताओगे कि बेटा तू माइलस्टोन था। (सब हँसते हुए) और वो जो दादा-दादी वाली बात थी, न ही सुनो तो बेहतर है। 'तुम बस पैदा कर लो आगे का हम देख लेंगे।' अच्छा! अपनेआप को तो देख नहीं पा रहे होते हैं, बीमार पड़े होते हैं। नहीं तो उनको क्यों इतनी ज़रूरत रहती कि जाकर के बेटा-बेटी के साथ ही उन्हें चिपकना है? उनका अपना भी अजेंडा (कार्यसूची) तो ज़्यादा यही रहता है, हेल्थ केयर। वो तो शुरू से ही रहता है, कोई छुपी बात नहीं है। बेटा बुढ़ापे की लाठी होता है। वो ख़ुद वहाँ इसलिए मौजूद हैं कि तुम मेरी देखभाल करना। और उसको और फँसा रहे हैं, 'तुम बस पैदा कर लो हम देख लेंगे।' ठीक है ब्रेस्टफीडिंग (स्तनपान) भी तुम करा देना, दादी।

शादी में भी ऐसा ही बोलते हैं, 'बेटी तू शादी कर ले, आगे का हम देख लेंगे।' माँ एक्सेक्टली क्या देखोगी तुम? लेट्स बी स्पेसिफिक। जो देखूँगी मैं देखूँगी। और बता भी नहीं सकती। 'भाई हम देख लेंगे।' क्या देख लोगे? क्यों ऐसी चीज़ की ज़िम्मेदारी की घोषणा कर रहे हो, जो ज़िम्मेदारी तुम ले नहीं पाओगे? यह बड़ी गैर-ज़िम्मेदाराना बात हो गई न कि मैं किसी ऐसी चीज की पेशकश करूँ जिसकी ज़िम्मेदारी मैं वास्तव में नहीं उठा सकता? लेकिन कह यह रहा हूँ कि तू बस कर दे आगे का मैं संभाल लूँगा। कैसे संभाल लोगे?

आप विचार करोगे न कि हम वैसे क्यों जी रहे हैं जैसे जी रहे हैं, आपको कोई ठोस कारण मिलेगा ही नहीं। और मेरी आपसे विनती है कि कोई ठोस कारण न मिले, तो मत करिए न वो सब जो आपको करने के लिए कहा जाता है। कारण मिल जाए तो अवश्य करिए। कोई कारण नहीं है लेकिन वही सबकुछ करना है जो होता आया है, तो यह तो जँची नहीं बात।

एक हॉरर (दहशत) होता है कि किसी की लाश गिरा दी और लगभग बराबर का भयानक दृश्य होता है कि कुछ पता नहीं, कुछ जानते नहीं और बेहोशी में किसी को पैदा कर दिया। वो बिलकुल बराबर की हॉरिबल (भयानक) बात होती है।

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