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आत्मा को प्रकट न होने देना आत्महत्या है || आचार्य प्रशांत (2016)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आत्मा क्या है? आत्मा को कैसे अभिव्यक्त करें?

आचार्य प्रशांत: फूल खिलकर झड़ जाए, कोई बात नहीं, सुंदर घटना है। पर कली को ही मसल दिया जाए तो? और उसमें कली का ही सहयोग हो, कली की हामी हो तो, कि —"हाँ, मसल दो मुझे।" उसे पता है अच्छे से कि जैसा जीवन वह जी रही है, जो क़दम वह उठा रही है, उसमें मसल दी जाएगी, पर फिर भी वह क़दम उठाए तो? इसको भ्रूण हत्या नहीं कहेंगे आप? किसी अजन्मे शिशु की गर्भ में हत्या की जाए तो उसे बुरा मानते हैं, पाप कहते हैं, अपराध कहते हैं। और जो हम अपनी ही हत्या करे हुए हैं, उसको क्या कहेंगे?

आत्मा को प्रकट ना होने देना ही असली आत्महत्या है। आप जो हैं, आत्मा, उसको अभिव्यक्त ना होने देना ही तो आत्महत्या है।

तो हम सब नहीं हुए आत्महत्या के अपराधी? बोलिए। यह नहीं कहलाएगी ' सुसाइडल लाइफ़ '? आपको पक्का है, पूर्ण विश्वास कि जैसे आप हैं, ऐसा ही होने को पैदा हुए थे? यही नियति है आपकी? भरोसा है? सही में लगता है? जब आप पाँच के थे या पंद्रह के थे या पच्चीस के थे, तब इसी रूप में देखा था अपने आप को कि ऐसे हो जाएँगे?

उस भिखारी की कहानी सुनी है न, एक ही जगह पर बैठा रहता था हमेशा, और भीख माँगे। दशकों तक एक ही जगह पर बैठे-बैठे भीख माँगी उसने। वह जगह ही उसकी बन गई थी। सुनी है आपने? मैं भी कई बार कह चुका हूँ। बड़ी दर्दनाक है इसीलिए भूलती नहीं। जब वह मर गया और वहाँ से उसका टाट, पत्थर, चीथड़े हटाए गए, तो वहाँ गड्ढा-सा मिला। वह उसी पर बैठा हुआ था, और उसमें रूपये-ही-रूपये, सोना भी, चाँदी भी, सब कुछ है। इतना जोड़े बैठा था वह। इतना जोड़े बैठा था वह, और उसके ऊपर कैसा? भिखारी।

होगा तुम्हारे पास बहुत कुछ, जीवन तो भिखारियों-सा ही बीता न। होगी अकूत संपदा, जिए तो चीथड़ों में ही न।

मत बताओ कि तुम में पोटेंशियल (संभावना) कितना है, तुम्हारी संभावना से कुछ नहीं होता; दिखाओ कि जीवन कैसा है। यह मत बताओ कि तुम क्या कर सकते थे, तुम में कितना दम है; यह बताओ कि कर क्या रहे हो, जी कैसे रहे हो!

शिविर के ये चार दिन उपलब्ध हुए हैं, आज दूसरा दिन है, वापस आप अपने ढर्रों में लौट जाएँ, इससे पहले किसी दूसरी तरह के जीवन का स्वाद चख लें।

प्र: स्वतंत्रता का क्या अर्थ है?

आचार्य:

एक ही स्वतंत्रता होती है—असली होने की। और कोई स्वतंत्रता नहीं है। बाकी सब बंधन हैं, ग़ुलामी है। जो हो वैसे जिओ, यही स्वतंत्रता है; बाकी सब फ़रेब, झूठ, आवरण।

प्र: आचार्य जी, जब हम अकेले होते हैं तब ऐसा कर सकते हैं, लेकिन परिवार में सबके साथ ऐसा नहीं कर सकता न। सबके लिए समर्पण और हर चीज़ सोचकर ही की जाती है न।

आचार्य: वो हैं जो उड़ना भूल गए हैं, और आप बता रहे हैं कि उनको समर्पित होकर आप भी नहीं उड़ रहे हैं। इससे ज़्यादा बुरा आप और क्या करेंगे अपनों के साथ? जिन्हें हम 'अपना' कहते हैं और दावा करते हैं कि उनके प्रति हममें समर्पण का भाव है, हमसे ज़्यादा उन्हें कष्ट और चोट किसी ने नहीं पहुँचाया होता।

अरे, कोई रोगी पड़ा है, तो तुम भी उसके बगल में बिस्तर डालकर रोगी हो जाओगे? यह तुम्हारा समर्पण है? कोई पागल हो गया है, तुम भी उसके साथ पागल हो जाओगे? यह समर्पण है तुम्हारा? कोई बहक गया है, तुम भी उसके साथ बहकोगे? यह समर्पण है? तुम्हारा स्वास्थ्य ही उसे याद दिलाएगा कि स्वास्थ्य क्या होता है।

जो चलना भूल गया हो, तुम्हारी चाल उसे याद दिलाएगी कि उसे भी चलना है। और शारीरिक रोगों में तो फिर भी एक तथ्यात्मकता होती है, मानसिक तौर पर तो जितने रोग होते हैं, वो सब मात्र विस्मृति के रोग होते हैं; आप भूल जाते हो, या ऐसे कह लो कि आप कुछ और व्यर्थ याद कर लेते हो। तो उन रोगों का तो वास्तव में कोई इलाज भी नहीं करना है। बस दिखा देना है, ज़ाहिर कर देना है कि—"तुम कुछ भूले हुए हो, दोस्त।"

"क्या भूला हुआ हूँ मैं?"

"यह देखो, और फैलाओ पँख, और उड़ जाओ।"

उसे याद आ जाएगा कि उसे भी उड़ना है। बारिश हो रही हो, बस हो रही हो, आप सूखे-सूखे घर के भीतर से खिड़की से बाहर देखोगे, कहोगे, "आह! बारिश हो रही है। बारिश! कितनी घनी बारिश है? कितने मिलीमीटर बरसा? कब से बरसा? कब तक बरसेगा? पानी शुद्ध है कि नहीं? अम्लवर्षा तो नहीं?" आप यह सब विचार करोगे। और दो-चार बच्चे बाहर लोट-पोट करना शुरू कर दें पानी में, कीचड़ में, और कूदना शुरू कर दें, आपको कुछ और याद आ जाएगा। आप कहोगे कि, "यह क्या पढ़े-लिखे विचारों में उलझ गया था, चलो बाहर!"

प्र: आपने कहा है कि जो योजना से नहीं मिला है उसे बचाने की योजना मत बनाओ।

आचार्य: सवाल है कि — "'जो योजना से नहीं मिला उसे बचाने की योजना मत बनाओ', ऐसा आपने कहा है, क्या अर्थ है?”

हम जिस परिधान की बात कर रहे है न कि बहुत सुंदर है, हम जिसको आत्मा का प्रतीक बनाकर बात कर रहे हैं, वही है वह जो तुमको योजना से नहीं मिला। वह उपहार है। और अक़्सर आप उसके ऊपर दस तरीक़े के अन्य आवरण डालते ही इसीलिए हो कि उसको बचाना है। चेहरा बहुत सुंदर मिला तो उसको बचाने के लिए उसपर दस तरीक़े के नक़ाब डाल लिए कि कहीं खरोंच ना आ जाए। इसीलिए कहा गया है कि जो योजना से नहीं मिला, उसे बचाने की योजना मत बनाओ। वह तुम्हारा है नहीं। तो उसे कोई दरकार भी नहीं है कि तुम रक्षा करो उसकी; वह सुरक्षित है।

जो तुम्हारा नहीं है, उसको बचाने की ज़िम्मेदारी भी तुम्हारी नहीं है। तुम्हारी उड़ान तुम्हारी नहीं है, तुम नहीं परवाह करो उसकी कि इसको बचाना है। तुम तो उसे खुलने दो, बहने दो, अभिव्यक्त होने दो। डरो मत।

तुमने पकड़ रखा है बहुत कुछ और उसमें पूरा-पूरा योगदान है तुम्हारा। वह योगदान छोड़ो। और छोड़ना कोई नया कर्म नहीं होता। छोड़ने का अर्थ ही होता है: अपने कर्म की मूर्खता और विफलता, दोनों को देख लेना—"फ़ालतू ही करे जा रहा हूँ, छोड़ो न।"

आपके भीतर कुछ ऐसा है जो पाबंदियाँ नहीं मानने वाला। आप क्यों उसे पाबंदियों में जकड़ते हो? आप कर लो जितनी कोशिश करनी है, आपके भीतर कुछ ऐसा है जो अनंत के अतिरिक्त किसी और से तृप्त नहीं होने वाला। आप उसे चाहे अपना बचपना बोल लो, चाहे अपनी नासमझी बोल लो, चाहे उसे अपना पागलपन बोल लो। आप उसको जितना दबा सकते हो, जितना उसका दमन करना है कर लो, वह मानेगा नहीं; जैसे घर में कोई बच्चा हो छोटा, वह हाथ-पाँव पटकता ही रहेगा और चीखेगा और चिल्लाएगा। दे दो आप उसे नींद की गोलियाँ, दे दो आप उसे झुन-झुने, थोड़ी देर बहला लोगे, वह फिर पाँव पटकेगा, वह फिर मुठ्ठी मारेगा दीवारों पर।

कुछ ने कह दिया है उसे कि — "नासमझ बच्चा है— बुद्धिहीन।" और दूसरे, जिन्होंने जाना है, उन्होंने कहा: "ना, बुद्धिहीन नहीं है; बुद्धि से आगे का है; मनातीत है। उसकी बातें बुद्धि के पल्ले नहीं पड़ेंगी, इसीलिए ऐसा लगता है जैसे निर्बुद्धि हो। निर्बुद्धि नहीं है, सामान्य बुद्धि भी नहीं है; पराबुद्धि है।"

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