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AP Circle - तत्सत्यं स आत्मा
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच॥

‘वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है। और हे श्वेतकेतो! वही तू है। ऐसा कहे जाने पर श्वेतकेतु बोला – ‘भगवन्! आप मुझे फिर समझाइए’। तब आरुणि ने ‘अच्छा सोम्य!’ ऐसा कहा।‘

~ छान्दोग्योपनिषद्‌, षष्ठोऽध्यायः, अष्टमः खण्डः, श्लोक ७

आचार्य प्रशांत: ‘तत्सत्यं स आत्मा।‘ वेदान्त का जो बड़े-से-बड़ा योगदान रहा है मानवता को, वो ये बताने में है कि सत्य न तो संसार में है, न ही संसार के पार किसी ईश्वरीय ताक़त में है।

देखिए, दो तरह के लोग होते हैं आमतौर पर; एक जिनको हम कह देते हैं पदार्थवादी, भौतिकता से ग्रस्त, मटीरियलिस्ट (भौतिकवादी), उनका सत्य संसार में होता है। वो कहते हैं, ‘फ़लानी चीज़ सत्य है, ढिकानी चीज़ सत्य है, और इन चीज़ों को पा लेंगे तो ज़िंदगी बच जाएगी।‘ या कई बार वो कहते हैं कि दुनिया में ही कुछ चीज़ें हैं जो गड़बड़ हैं, उनसे अगर हम अपनी रक्षा कर लेंगे तो भी जीवन सफल हो जाएगा – ये सब भौतिकतावादी लोग हैं, मटीरियलिस्ट हैं। इन्होंने सत्य को संसार में बैठा रखा है।

सत्य किसको कहते हैं?

जिसमें तुम्हारा दृढ़-से-दृढ़ विश्वास हो कि वो बदल नहीं सकता, तुम्हें धोखा नहीं देगा, उसको सत्य बोलते हैं। शास्त्र कहते हैं कि जो नित्य है, वही सत्य है। सत्यता की पहचान ही नित्यता है। नित्यता माने क्या? जो आज है, वही कल रहेगा। समय की धारा जिसपर कोई प्रभाव नहीं डाल सकती। जो समय से परे है, वो सत्य है। तो माने जिस पर तुम्हारा पूरा निश्चय हो जाए, यकीन हो जाए, उसे सत्य बोलते हैं।

ज़्यादातर लोगों का तो पूरा यकीन दुनिया पर ही रहता है, संसार पर ही रहता है। तो ये पहली कोटि के लोग हुए जो संसार पर बड़ा दृढ़ निश्चय करे हैं।

फिर आता है तथाकथित धार्मिक आदमी – ये दूसरी कोटि का है। ये क्या करता है? ये कहता है, ‘ये दुनिया जो है, ये तो छलावा है। इसमें कुछ नहीं रखा। और दुनिया से बड़ी बात, दुनिया से बेहतर बात कोई ईश्वर है, जो कहीं आसमानों में, किसी और लोक पर बैठा है। और वहाँ बैठकर करके वो इस धरती का, पूरे जगत् का संचालन कर रहा है।‘ तो इस किस्म के लोगों ने किसी और लोक की कल्पना की और सत्य को वहाँ बैठा दिया, कि सत्य वहाँ बैठा है।

तो दो तरह के लोग हमको मिल गए फिर – सांसारिक और धार्मिक। जो सांसारिक आदमी है वो कहता है, ‘संसार में सत्य है।‘ जो धार्मिक आदमी है वो कहता है, ‘किसी और लोक में सत्य है, जहाँ पर भगवान या ईश्वर बैठा हुआ है।‘

वेदान्त बिलकुल अलग है। और वेदान्त जो बात कहता है वो साधारणतया कभी आपकी कल्पना में आती ही नहीं, इसलिए हमें ऋषियों के अनुगृहीत होना चाहिए।

वेदान्त कहता है – न तो इस दृश्य लोक में, न ही किसी और लोक में, सत्य सिर्फ़-और-सिर्फ़ तुम्हारे भीतर है।

वो जो आत्मा है, वही सत्य है। जोकि छांदोग्य उपनिषद् का ये श्लोक हमसे कह रहा है। जो आत्मा है, वही सत्य है। आत्मा के अलावा कोई सत्य नहीं। और ये बहुत बड़ी बात है, क्योंकि एक तो ये आपके भीतर से इस भ्रम को हटा देती है कि बाहर वाले आप किसी की पूजा कर लोगे, चाहे बाहर के किसी पदार्थ की, चाहे बाहर के किसी ईश्वर की, तो उससे आपको कुछ मिल जाएगा। ये बात आपको बार-बार आपके भीतर भेजती है। अपने मन को देखो, क्योंकि बाहर के संसार को जो देख रहा है वो भी तुम्हारा मन है, और किसी और लोक के ईश्वर की जो कल्पना कर रहा है, वो भी तुम्हारा मन ही है। तो तुम्हारा मन ही सबकुछ है। जो लोग संसार को पूजते हैं वो भी एक तरह से अपने मन को ही पूज रहे हैं, क्योंकि संसार क्या है? मन का प्रक्षेपण है।

और जो लोग किसी काल्पनिक ईश्वर को पूजते हैं, वो भी अपने ही मन को पूज रहे हैं, क्योंकि उस ईश्वर की कल्पना तुम्हारे ही मन ने करी है।

वेदान्त कहता है – जब मन ही सबकुछ है, तो मन की शुद्धता ही जीवन का आख़िरी औचित्य है। मन को साफ़ करो। साफ़ मन को ही आत्मा कहते हैं, और वही सत्य है। उसके अलावा कोई दूसरा सत्य होता नहीं।

वेदान्त ने सब झाड़-झंखाड़, घास-फूस काट डाला। कोई भ्रम नहीं छोड़ा। सफ़ाई कर दी बिलकुल। सारे बादल छाँट दिए। कुल मिलाकर ये एक बात बोल दी – न हमें दुनिया से कोई लेना-देना है, न किसी तथाकथित दुनिया बनाने वाले से कोई लेना-देना है। न नीचे वालों से हमारा कोई बड़ा मतलब है, न ही किसी काल्पनिक ऊपर वाले से हमारा बड़ा मतलब है।

न नीचे वाला, न ऊपर वाला; हमारा कौन है बस? अंदर वाला, भीतर वाला – ये वेदान्त है। सत्य तुम्हारे ही भीतर है, और अगर तुम उसको वहाँ नहीं पा सकते, अपने भीतर, तो तुम कहाँ पाओगे?

"मोको कहाँ ढूँढे बंदे, मैं तो तेरे पास में"

~ कबीर साहब

संतो ने बाद में यही बात हमको गा-गाकर समझाई। समझ हम तब भी नहीं पाए, वो अलग बात है।

तो अपनी शुद्धि करो। अपने मन की शुद्धि करो। मन तुम्हारा जैसा होगा, संसार तुम्हें वैसा ही दिखता है। यथा दृष्टि तथा सृष्टि। इसी तरीके से मन तुम्हारा जैसा होता है उसी के अनुसार तुम किसी परलोक की या पारलौकिक ईश्वर की कल्पना कर लेते हो। मन को साफ़ करो।

मन ही साफ़ हो करके जिस जगह पहुँच जाता है उसका नाम आत्मा है। और उस आत्मा के अतिरिक्त कोई दूसरा सत्य होता ही नहीं है।

मन को गंदा क्या करता है? यही सब जो आपके रोज़मर्रा के अनुभव में आपके गुण-दोष आते हैं, यही मन की गंदगी माने जाते हैं। आपका मोह, आपका भय, जो आपके भीतर भ्रम है, ईर्ष्या है, नशा है – यही सब मन के दोष हैं। इन्हीं की सफ़ाई करनी होती है।

यही असत्य हैं। इनको साफ़ कर दिया तो जो शेष रह जाता है वो सत्य है। उसी का नाम आत्मा है। वही वास्तविक 'मैं' है। और जब कहते हो – दुनिया में आपकी बड़ी निष्ठा है, तो यही तो कहते हो न, 'मेरी दुनिया'। आपने ही तो देखी है दुनिया, और किसकी दुनिया होती है? इसी तरह से आप बोलते हो – आपकी किसी ईश्वर में बड़ी निष्ठा थी। तो यही तो बोलते हो न, 'मेरा भगवान', आपका ही तो भगवान है।

तो जब दुनिया से भी पहले 'मैं' को ही आना है – ‘मेरी दुनिया’ – और ईश्वर से भी पहले 'मैं' को ही आना है, तो वेदान्त कहता है कि ‘भाई! बाकी बातें छोड़ो। पहले 'मैं' की सफ़ाई कर लो।‘ इस 'मैं' की जिसने सफ़ाई कर ली वो तर गया।

साफ़ 'मैं', शुद्ध 'मैं' को ही आत्मा कहते हैं।

ये हमको यहाँ पर उपनिषदों के ऋषि शिक्षा दे रहे हैं।

कहीं इधर-उधर मत पड़ो, कहीं मत भटको। पहले ख़ुद को साफ़ करो। जीवन तुम्हारा इसीलिए है कि स्वयं को अज्ञान के बंधन से मुक्ति दो। हमारा जन्म, हमारा जीवन तरह-तरह के बंधनों में है। और उन सब बंधनों में जो मूल बंधन है वो है अज्ञान, नासमझी, बेहोशी – हम जानते नहीं हैं। तुम जानो! जब जान जाओगे तो फिर ये भी जान जाओगे कि दुनिया में सही कर्म क्या करना है।

लेकिन तुम स्वयं को ही नहीं जानते – स्वयं को माने किसको? जो बंधनों में बंधा हुआ 'मैं' है – तुम उसको ही नहीं जानते; तुम दुनिया में कर्म क्या करोगे? जब तुम्हें यही नहीं पता तुम कौन हो, तो तुम्हें कैसे पता चलेगा कि तुम्हें करना क्या चाहिए? वेदान्त कहता है, ‘देखो तुम कौन हो, तुम एक बद्ध और पीड़ित चेतना हो।‘

अब जान लो कि तुम्हें जीवन में वो सारे कर्म चुनने हैं जो तुम्हें बंधन और पीड़ा से मुक्ति दिला दें। उसी मुक्ति का नाम सत्य है। उसी मुक्ति का नाम आत्मा भी है।

और ये बात प्रकृति के इतनी विपरीत जाती है, हमारी साधारण सोच के इतनी विपरीत जाती है कि मैं कह रहा था कि ऋषियों का हमें बहुत ज़्यादा कृतज्ञ होना चाहिए; बड़ा उन्होंने हमें उपकृत करा।

नहीं तो ख़ुद बैठकर के तो दस हज़ार साल में आदमी ये बात न सोच पाए कि बाहर कुछ नहीं है, बाहर को देखने वाला 'मैं' ही हूँ। तो सच्चाई भी अगर जाननी है तो पहले भीतर की सफ़ाई करनी पड़ेगी। जब देखने वाली आँखें ही साफ़ नहीं हैं, तो बाहर कैसे सच्चाई दिखेगी आपको? तो ये बात स्वयं तो आदमी कभी न सोच पाता।

भारत का ये बड़े-से-बड़ा उपहार रहा है पूरे विश्व को – आत्मा! 'सेल्फ़'। इतनी विश्व में धार्मिक परंपराएँ हुई हैं, धाराएँ हुई हैं; आत्मा लेकिन भारत की विशिष्ट देन है। आत्मा की बात आपको कहीं नहीं मिलेगी। बाहर आपको 'रूह' वगैरह की बात मिल जाती है। सोल वगैरह की बात कर लेते हैं, पर वो 'आत्मा' नहीं है, वो तो 'मन' ही है।

'आत्मा' बिलकुल एक अलग आयाम की बात है। और वो बात किसी ने नहीं करी। वो बात सिर्फ वेदान्त ने करी है, इसीलिए वेदान्त सभी प्रकार के दर्शन में सर्वोपरि है। और सभी प्रकार की धार्मिक धाराओं का आधार है वेदान्त। मैं कहता हूँ कि दुनिया का कोई भी आपको धर्म ग्रंथ यदि समझना है, तो पहले आपको वेदान्त समझना पड़ेगा। वेदान्त समझ लिजिए तो बाकी सब धर्मग्रंथ आपको समझ में आ जाएँगे।

दुनिया में धर्म के नाम पर जो इतना कलह, क्लेश, लड़ाई है, वो भी इसीलिए है क्योंकि लोग अपने धर्मग्रंथों को ही समझते नहीं। ज़्यादातर लोग तो ख़ैर पढ़ते भी नहीं हैं। पर जो पढ़ भी लेते हैं, वो समझते नहीं हैं। क्यों नहीं समझते? क्योंकि उन्हें वेदान्त की शिक्षा नहीं मिली है। दुनिया का कोई भी ग्रंथ आपको जानना है तो पहले आपको वेदान्त समझना पड़ेगा, क्योंकि बात सारी मन और आत्मा की है, बस।

बाकी तो जितने शब्द हैं, वो सब मन और आत्मा का किसी-न-किसी रूप में प्रतिनिधित्व बस करते हैं। तो मन, मन, मन, सबकुछ मन मात्र है। सब बंधन मन है, सब अनुभव मन है, जन्म मन है, मृत्यु मन है, और इस पूरे चक्र में जो पीड़ा पा रहा है, उसका नाम भी मन ही है। मन के अतिरिक्त तथ्य कुछ नहीं; आत्मा के अतिरिक्त सत्य कुछ नहीं। बस, इतनी-सी कुल वेदान्त की सीख है।

मन के सिवा कोई तथ्य नहीं होता – और यहाँ तथ्य और कल्पना एक में आ गए, मन ही है जो तथ्य देखता है, और मन ही है जो कल्पना करता है।

मन के अतिरिक्त कोई तथ्य नहीं होता, और आत्मा के अतिरिक्त कोई सत्य नहीं होता। आत्मा तक जाना ही जीवन का लक्ष्य है। वही एकमात्र सत्य है, बाकी सब कपोल कल्पना।

नमस्कार!

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