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अंधेरा क्यों लुभाता है?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: एक पिछले सत्र में, मैंने गुफ़ाओं और दर्पणों की बात करी थी। मैंने कहा था कि "सत्य के साधक का कर्तव्य होता है कि वो अपने जीवन को दर्पणों से भर ले, वो अपने-आपको अपने हक़ीक़त के इतने साक्ष्य दे कि उसके लिए न बदलना असंभव हो जाए। वो जहाँ जाए उसे अपनी कुरूपता, अपनी विडंबना, अपना ह्रास, अपनी दुर्गति निरंतर दिखाई दे। कहीं भी बचने छुपने का अवसर न मिले।" जब इतनी निरंतरता से तुम्हारे सामने सुबूत लाए जाएँगे तो तुम्हें मानना ही पड़ेगा कि अब तुम्हें जरूरत है बदलाव की।

और जो छद्म साधक होता है या जो अपनी दृष्टि में सत्य का विरोधी होता है, वो कुछ गुफ़ाएँ ढूंढ लेता है - अंधेरी सीलन भरी गुफ़ाएँ, जहाँ न प्रकाश है, न दर्पण। वहाँ उसे हक़ीक़त दिखाने वाला कोई नहीं होता। वहाँ जितने होते हैं वो सब अंधेरे होते हैं, अंधेरे में होते हैं। वो ख़ुद अंधे हैं, उन्हें ख़ुद अपनी शक्ल नहीं देखनी, वो तुम्हें तुम्हारी शक्ल क्यों दिखाएँगे? तो मन के दो तल होते हैं इस प्रकार के। तो प्रश्नकर्ता ने उस संदर्भ में कहा है कि-

प्रश्नकर्ता: कठोपनिषद सत्रों से पहले दर्पणों से बचने के लिए मैं आसानी से गुफ़ाओं में प्रवेश कर पा रही थी लेकिन अब गुफ़ा के अंदर भी बड़ी बेचैनी है इस स्थिति में कुछ शांति कैसे प्राप्त करें?

आचार्य: ऐसा होगा नहीं। गुफ़ा में बेचैनी होगी तो गुफ़ा क्यों होगी? हम सब तो चैन के दीवाने होते हैं, गुफ़ा में कुछ चैन मिल रहा होगा इसीलिए गुफ़ा में हो। उस चैन की गुणवत्ता क्या है? ये देख लो। गुफ़ा में कोई भी अनायास नहीं होता। आदमी कहीं भी अनायास नहीं होता। हम जहाँ भी होते हैं, जैसे भी होते हैं, किसी कारण से होते हैं। वो कारण होता है- हमारा अपना चयन, हमने चुना होता है, यूँ ही कुछ नहीं होता हमारे साथ। और हम क्यों चुनते हैं? आदमी जब भी चुनता है अपनी दृष्टि में शांति को ही चुनता है, चैन को ही चुनता है। उसका चुनाव गलत हो सकता है पर चुनाव का लक्ष्य तो हमेशा सही होता है।

लक्ष्य क्या होता है? शांति, चैन।

तो गुफ़ा के भीतर भी कोई क्यों पाया जाएगा? गुफ़ा में उसे कुछ मिल रहा है, कुछ ऐसा मिल रहा है जिसे उसने चैन समझ रखा है। कुछ ऐसा मिल रहा है जिसे लेकर के उसे संस्कार या सीख या शिक्षा दे दी गयी है कि ये चैन है, शांति है, सत्य है, ये बढ़िया चीज़ है। वहाँ कुछ मिल रहा होगा, इसीलिए वहाँ मौजूद हो।

अभी ये न कहो कि गुफ़ा के अंदर बेचैनी है, उस बात को हटाओ। अभी ये देखो कि गुफ़ा में आकर्षण क्या है? ठीक है? अभी ये नहीं देखना है हमें कि गुफ़ा में बेचैनी है, अभी हमें ये देखना है कि गुफ़ा में हमें चैन क्यों मिल रहा है? और चैन मिल रहा है ये बात निर्विवाद है क्योंकि तुम गुफ़ा में हो, अन्यथा तुम वहाँ होती नहीं। पता करो कि गुफ़ा में क्या है जो तुमको रोके हुए है? क्या है जो तुम्हें बाँधता है? क्या है जो तुम्हें प्यारा है? पता करो साफ-साफ।

कुछ तो है, हो सकता है बहुत कुछ हो। देखो कि कहाँ मोह की डोर है? कहाँ ममता का धागा है? देखो कि कहाँ धारणाओं की और परिभाषाओं की भूल है? देखो साथ ही कि कहाँ कष्ट का डर और सुविधाओं का लोभ है?

ये सब देखो।

गुफ़ाएँ छोड़नी नहीं होती। हर गुफ़ा प्रकाशित होना चाहती है तुम्हारे ही मन की तरह। गुफ़ा अंधेरी है और तुम उस अंधेरी गुफ़ा में मौजूद हो तो एक बात याद रखना कि तुमने भी उस अंधेरे के साथ स्वार्थ जोड़ लिया है; तुम स्वयं उस अंधेरे को बचाए रखने की हिमायती हो। तुम बदलोगी, तुम गुफ़ा पर भी कृपा करोगी। गुफ़ा को भी आजाद होना है, गुफ़ा को भी प्रकाशित होना है, आलोकित होना है। गुफ़ा प्रकाशित नहीं हो पा रही है तो आंशिक रूप से ज़िम्मेदारी तुम्हारी भी है।

बात को समझो!

तुम गुफ़ा में चैन पा रही हो न? इसीलिए मौजूद हो। और अगर तुम गुफ़ा में चैन पा रही हो, तो क्या तुम अपना चैन खोना चाहोगी? नहीं खोना चाहोगी। चैन तुम्हें कहाँ मिल रहा है? गुफ़ा के अंधेरे में। चैन यदि तुम्हारा गुफ़ा के अंधेरे से जुड़ा हुआ है तो क्या तुम गुफ़ा के अंधेरे को मिटने देना चाहोगी? नहीं मिटने देना चाहोगी। तो गुफ़ा के अंधेरे के लिए ज़िम्मेदारी तुम्हारी भी हुई न? हुई न? गुफ़ा को दोष मत देना।

कौन जाने, तुम्हारे माध्यम से गुफ़ा को आलोकित होना हो? पर आलोक आए उसके लिए पहले तुम को अंधेरे की हक़ीक़त समझनी पड़ेगी। इस हक़ीक़त समझने को ही तो कहते हैं- आलोक का पदार्पण। जाना कि बदला! प्रकटा कि प्रकाशित हुआ!

ठीक है?

हम वहीं होते हैं जहाँ होना हमने चुना होता है , ये बात दूसरी बार बोल रहा हूँ। तो गुफ़ा अंधेरी है, तो गुफ़ा को अंधेरा भी मानो कि हम ही ने रखा है।

प्र: भँवर जी हैं (शिविर प्रतिभागी), मौजूद हमेशा रहते हैं, बोलते कभी-कभी हैं। कह रहे हैं- आचार्य जी, प्रणाम! मन में विचार तो कई हैं, ख़्याल भी हैं, प्रश्न भी हैं पर गुरु से प्रश्न करने कौन-से चाहिए? या चुपचाप समर्पण? वही ठीक है?

आचार्य: भोलेपन की इन्तेहाँ है! पूछ रहे हैं कि तुम ही बता दो कि सवाल क्या करें? ये तो बता दिया होता कि सवाल हैं कौन-से? पाँच विकल्प हैं तुम्हारे सामने, मुझसे कहते हो निर्णय कर दो। विकल्प तो बता देते। मुझसे कहोगे कि निर्णय कर दो, बिना विकल्प बताए तो जानते हो मेरा निर्णय क्या होगा? निर्विकल्प रहो! मेरा तो निर्णय साफ है, तात्कालिक। निर्विकल्प रहो! पर तुम्हारे पास तो विकल्प हैं न? तभी कह रहे हो कि विचार हैं, ख़्याल हैं, प्रश्न हैं उनको सामने रखो।

जब मैं कहूँ - निर्विकल्प हो जाओ! तो उसका अर्थ जानते हो क्या होगा? कि सारे प्रश्न मिथ्या हैं, इनका कोई अर्थ नहीं। पर यदि मिथ्या होते तो तुमने पहले ही छोड़ दिए होते। तुम्हारे लिए तो वो अभी सार्थक हैं, तो मैं कह भी दूँगा कि निर्विकल्प हो जाओ, सारे विकल्प व्यर्थ हैं तो तुम्हें लाभ नहीं होगा। तुम तो अभी विकल्पों में ही डूब-उतरा रहे हो। जो कुछ भी चल रहा हो सामने रख दो। हद से हद क्या होगा? कह दूँगा कि "इनकी कोई प्रासंगिकता नहीं, हटा दो।" उससे तुम्हें भी और स्पष्ट हो जाएगा कि ये बातें व्यर्थ की हैं, इस लायक नहीं हैं कि मन में चले।

अधिकांश प्रश्न वास्तव में ऐसे नहीं होते, गुरु जिनका उत्तर दे। गुरु की उपस्थिति में वो प्रश्न वैसे भी उड़ ही जाते हैं और तुम पूछ लो तो आँख का एक कड़ा इशारा काफी होता है तुम्हें बताने के लिए कि- बकवास मत करो! एकाध-दो प्रश्न होते हैं, जो जिज्ञासा जैसे होते हैं। गुरु उनको लेता है, उनकी बात करता है। और फिर होती है निर्विकल्पता, प्रश्नों से मुक्ति। वो बहुत आगे की बात है।

तो सवाल रखा करो। कम से कम उससे सार-असार का भेद जान जाओगे। इतना तो जान जाओगे कि कौन-सा सवाल विचारणीय है और कौन-सा सवाल (हाथ से नीचे गिरा देने का इशारा करते हुए)... ठीक है?

सवालों में भेद करना जान गए तो ये भेद जान गए कि जीवन का कौन-सा पक्ष विचारणीय है, अनुकरणीय है और कौन-सा पक्ष बस व्यर्थ है। किसको महत्व देना है? किसको समय देना है? किसको उठा करके देखना-परखना-समझना है? और किसको बस हाथ हिलाकर दफ़ा कर देना है कि हटो! झटक दिया तुम्हें अलग।

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