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एलोपैथी दवाइयाँ, हिंसा और अध्यात्म
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या चिकित्सा के क्षेत्र को अपवाद मानकर जीव-हत्या करना ठीक है? क्या मानव की जान, किसी और जीव से ऊपर है? और अगर नहीं है तो क्या स्वयं को एलोपैथिक के इलाज से दूर रखना स्वयं पर हिंसा नहीं है? कृपया स्पष्टता प्रदान करें।

आचार्य प्रशांत: टेढ़ी जिज्ञासा कर दी! कुछ ऐसी बातें बोलनी पड़ेंगी जो तर्क से आगे की हैं। श्रद्धालु होगे तो समझोगे, नहीं तो कोई बात नहीं।

देखो, सर्वप्रथम तो तुम्हारी यह मान्यता है कि एक जीव के साथ हिंसा करके, किसी दूसरे जीव का लाभ किया जा सकता है, यह गलत है। अस्तित्व ऐसे काम नहीं करता। प्रकृति में ऐसा होता है, चेतना में ऐसा नहीं होता। प्रकृति में बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है और छोटी मछली की मौत से बड़ी मछली को पोषण मिल जाता है। पदार्थ के क्षेत्र में ऐसा होता है कि एक परमाणु हो, उसको एक इलेक्ट्रॉन की आवश्यकता हो, अपने कंफिगरेशन को, अपनी कक्षा को पूरा करने के लिए, तो उसमें एक प्यास उठती है, उसका एक फील्ड जगता है, एक क्षेत्र जगता है और वह अपने आसपास से एक इलेक्ट्रॉन सोख लेगा, खींच लेगा। यह पदार्थगत घटना है। उस इलेक्ट्रॉन को सोख लेने की घटना को तुम परमाणु की भूख कह सकते हो। वह भूखा था और उसने इलेक्ट्रॉन को खींच लिया। पदार्थ भूखा था, उसने अपनी भूख मिटाने के लिए एक छोटे पदार्थ को खींच लिया। और छोटा पदार्थ आया, बड़े का हिस्सा बन गया। बड़ी मछली जब छोटी मछली को खाती है, तब भी यही घटना घटती है। यह घटना प्रकृति के क्षेत्र में बिलकुल ठीक है। बल्कि ऐसे कह लो — न ठीक है, न गलत है, क्योंकि प्रकृति पर तो न नैतिकता चलती है, न धर्म चलता है, वहाँ पर जो है, सो है।

जानवर नंगा घूम रहा है, यह सही है या गलत है? ऐसा ही है! तुम्हारे पाँच उंगलियाँ हैं, यह सही है या गलत है? ऐसा ही है! कई बार मादा बिच्छू, नर बिच्छू को खा जाती है, मेल के बाद, क्या यह पाप है? किन्हीं वस्थाओं में साँप की कुछ प्रजातियों में मादा साँप, अपने सपोलों को खा जाती हैं, क्या यह अधर्म है? नहीं बिलकुल भी नहीं। मैं पानी में शक्कर घोल दूँ और शक्कर पानी में विलुप्त हो जाए तो क्या यह शक्कर के साथ अत्याचार हो गया? — कि पहले शक्कर भी था, पानी भी था, अब सिर्फ दिख रहा है पानी। अरे, शक्कर बेचारी कहाँ गई? यह तो अन्याय हो गया। कुछ नहीं है यह। यह सब प्रकृति के क्षेत्र की घटनाएँ हैं। वहाँ पर न कुछ सही है, न कुछ गलत है, वहाँ तो बस नियम हैं। प्रत्येक जीव, प्रत्येक पदार्थ अपने गुण के प्रभाव तले गति करता रहता है।

प्रकृति के तीन गुण होते हैं। उन्हीं तीनों गुणों के अलग-अलग आयोजन अलग-अलग जीवों में और वस्तुओं में दिखाई देते हैं। जीवों की तो प्रकृति होती ही है। यह भी तुम जानते हो कि वस्तुओं की भी प्रकृति होती है। इसीलिए तो पुराने लोग तुमसे कहा करते थे प्याज़ की तासीर ऐसी होती है और पानी की तासीर ऐसी होती है। तुमसे कहा जाता था कि खाद्य पदार्थों के भी गुण होते हैं। तो यह जितना भी दृश्यमान जगत है, वह कुछ और नहीं प्रकृति है और हर चीज़ के अपने-अपने गुण हैं। और यह जो तीन गुण होते हैं — सत्-रज-तम — यह अलग-अलग तरीके से, अलग-अलग अनुपात में, अलग-अलग संरचना में मिलकर के इस जगत का निर्माण कर देते हैं। वहाँ जो हो रहा है, बस हो रहा है।

सूरज गोल है, चौकोर क्यों नहीं? है तो है। चलो उसके लिए तो तुम कोई वैज्ञानिक तर्क दे देते कि यदि वह चौकोर होता और गोल-गोल घूमता अपनी धुरी पर तो उसके कोने झड़ जाते। उसका गोल होना आवश्यक है। चलो, ठीक है! पृथ्वी बृहस्पति ग्रह से छोटी क्यों है, बड़ी क्यों नहीं? यह तो गलती हो गई न, बराबर नहीं बाँटा। एक को छोटा, एक को बड़ा बना दिया। नहीं! ऐसा है तो है। तो प्रकृति के क्षेत्र में यह सब चीज़ें चलती रहती हैं। तो प्रकृति से उदाहरण मत उठा लेना।

जीवों की हिंसा का जब मुद्दा आता है तो अक्सर आदमी प्रकृति को ही दृष्टांत बना लेता है। आदमी कहता है कि — “देखो जंगल में शेर हिरण को खा रहा है न? खा गया न? तो हम भी मुर्गे को खा जाएंगे, हमने क्या बुरा किया है? परमात्मा की ही दुनिया में जब शेर हिरण को खा सकता है तो हम मुर्गे को क्यों नहीं खा सकते?” तुम्हें समझ क्यों नहीं आ रहा है कि तुम शेर नहीं हो! तुम में और शेर में रूप- काया-आकार का ही अंतर नहीं है, और यह भी मत कह देना कि तुम में और शेर में अंतर यह है कि हम में बुद्धि है! न, बिलकुल नहीं! तुम अगर यह कह रहे हो कि आदमी और जानवर में ‘बुद्धि’ का अंतर होता है तो तुम बड़े निर्बुद्धि हो।

आदमी और जानवर में मूलभूत अंतर होता है, केंद्रीय अंतर होता है, इसे समझो — जानवर का केंद्र प्रकृति होती है। जानवर को किसी धर्म का पालन नहीं करना है, या यह कह लो कि जानवर को एक ही धर्म का पालन करना है और उस धर्म का नाम है ‘प्रकृति’। और जानवर अपने धर्म पर बड़ा अडिग रहता है। साँझ होते ही देखा है न पक्षी कैसे नीड़ की ओर भागते हैं, यह धर्म है उनका। उन्हें प्रकृति का पालन करना है। तुम किसी पक्षी को रात भर जगा दो, उसको बड़ा कष्ट हो जाएगा क्योंकि उसकी काया जानती है, उसका रोम- रोम जानता है, उसकी प्रत्येक कोशिका जानती है कि साँझ ढली नहीं और मुझे सो जाना है। तुम उसे नहीं जगा सकते। और तुम उल्लू को दिन की रोशनी में बाहर निकाल दो, वह भी बड़ा कष्ट मानेगा क्योंकि उसकी प्रकृति जानती है कि मुझे तो रात में ही जगना है और दिन में सोना है। जानवर का केंद्र है ‘प्रकृति’।

तुम्हारा केंद्र प्रकृति नहीं है! तुम्हारे पास आत्मा है। आत्मा! तुम्हारा केंद्र बिलकुल दूसरा है। तुम्हें बिलकुल एक अलग आयाम से जीवन को देखना पड़ेगा। तुम्हें बहुत बातें समझनी पड़ेंगी। और सबसे महत्वपूर्ण बात तुम में ‘करुणा’ होनी चाहिए। यह भेद है मनुष्य और पशु में। यह न बता देना कि बुद्धि का भेद है।

अभी हम यहाँ पर चर्चा कर रहे हैं, नीचे से ज़ोर की आवाज़ आये, पता चले सड़क पर दुर्घटना हो गयी है, दो लोग घायल पड़े हैं। यहाँ पर कुछ मच्छर हैं, सड़क पर कुछ कुत्ते हैं, पेड़ों पर कुछ पक्षी भी सो रहे होंगे, पानी होगा आसपास, बरसात चल रही है तो कुछ मेंढक भी होंगे। तुम मेंढक को दोष दोगे क्या कि दो घायल लोग पड़े हुए थे, तू मदद करने क्यों नहीं आया? क्यों नहीं दोष दोगे, बताओ? क्योंकि मेंढक का धर्म ही नहीं है करुणा। हाँ! तुम अगर बैठे हो और तुम्हारे सामने दो घायल लोग हैं, और आधी रात है और वो बेहोश सड़क पर पड़े हुए हैं, तुम जाकर उन्हें उठाओ नहीं तो तुमने पाप कर दिया।

न मच्छर को पाप लगेगा, न कुत्ते को लगेगा, न मेंढक को लगेगा — हाँ, तुमने पाप किया है अगर तुमने मदद नहीं की तो, क्योंकि तुम्हारा और कुत्ते का ‘केंद्र’ अलग है; ‘काया’ ही अलग नहीं है, ‘केंद्र’ ही अलग है। शेर और कुत्ते की सिर्फ काया अलग है, तुम्हारा और कुत्ते का केंद्र ही अलग है। तुम्हारे पास करुणा होनी चाहिए और तुम्हारे पास बोध होना चाहिए। तुम कुत्ते से अपेक्षा नहीं करोगे कि बोध हो। वहाँ नहीं है तो कोई बात नहीं।

दो घायल लोग पड़े हों और उनके बगल में गाय घास चर रही हो तो गाय को दोष दोगे? गाय का तो काम है — प्रकृति का पालन करना। और प्रकृति उससे क्या कह रही है? तू घास चर। और गाय घास चर रही है, बगल में दो लोग पड़े हैं, खून बह रहा है। तुम गाय को दोष नहीं दे सकते। हाँ, मनुष्य को दोष दोगे। मनुष्य चीज़ दूसरी है। पर जब तक तुम शेष जगत से अपने पृथकता को नहीं समझोगे, तब तक तुम शंकित ही रहोगे। तब तक तुम्हें यही लगता रहेगा कि मैं भी तो पदार्थ ही हूँ, मैं भी तो देह मात्र हूँ। पशुओं का उदाहरण देते-देते पशुओं जैसे ही जिओगे तुम।

अब तुम्हारे प्रश्न पर दोबारा आते हैं। तुम कह रहे हो कि — “क्या चिकित्सा के क्षेत्र को अपवाद मानकर जीव हत्या करना ठीक है? क्या मानव की जान किसी और जीव से ऊपर है? और अगर नहीं है तो क्या स्वयं को एलोपैथी के इलाज से दूर रखना, स्वयं पर हिंसा नहीं है?”

बोध तुम्हें बताएगा कि तुम्हारा और शेष जगत का हित, अलग-अलग नहीं हो सकता। पशु होते तुम तो प्रकृति तुम्हें सिर्फ यह सिखाती कि अपना व्यक्तिगत हित देख लो भाई! अगर तुम बड़ी मछली हो तो तुम छोटी मछली को खा लो, पर पशु नहीं हो तुम, आदमी हो! तो ‘बोध’ तुम्हें बताएगा कि तुम्हारा व्यक्तिगत हित समष्टि के हित से अलग नहीं हो सकता।

पहली बात तो यह कि तुम जो कह रहे हो कि अगर किसी जानवर को मारकर, किसी इंसान का भला होता है, तो क्या जानवर को न मार दें? ऐसा हो ही नहीं सकता। लो बात ख़त्म!

किसी को मारकर, किसी दूसरे का भला नहीं हो सकता। ख़ास तौर पर, किसी पशु को मारकर के किसी का भला नहीं हो सकता। कोई आक्रांता हो, उसको मारना अलग बात है, कोई अन्यायी हो, उसको मारना अलग बात है। और याद रखना ‘अन्याय’ शब्द प्रकृति के देश में होता ही नहीं है।

कुछ होता है ‘अन्याय’ जैसा प्रकृति में? नहीं। तुम समझ सको कि न्याय-अन्याय है क्या, इसके लिए भी तुम्हें पहले इंसान होना होगा। हाँ, अन्याय हो रहा होगा तो कृष्ण अर्जुन से कहेंगे कि तू दुर्योधन को मार दे! पर वह जो नन्हा हिरण है, खरगोश है, या जो भी जीव है, जिसपर भी तुम दवाइयों का प्रयोग कर रहे हो, मुझे बताओ, उसने अन्याय किया क्या है? तुम कैसे उसको मार सकते हो? और तुम मारते ही नहीं हो, तुम उसको तड़पा-तड़पा कर मारते हो। जो बीमारी उसे होती नहीं, तुम उसपर वह बीमारी लगाते हो। जिस दवा का तुम्हें कुछ पता नहीं, उस दवा का तुम उसपर परीक्षण करते हो। दिनों-हफ्तों-महीनों तक वह भयानक वेदना में जीता है। तुम्हें क्या लग रहा है, तुम यह सब कुछ करके चैन पाओगे?

अगर तुम शरीर मात्र होते, कोई जानवर इत्यादि होते, तो फर्क नहीं पड़ता। लेकिन तुम जानवर हो नहीं, तुम सर्वप्रथम एक व्याकुल चेतना हो और यह व्याकुल चेतना और ज़्यादा व्याकुल हो जाएगी जब इसकी परिधि में अन्याय चल रहा होगा, अत्याचार और हिंसा हो रही होगी।

‘पशु’ का एक ही उद्देश्य होता है, सुरक्षित रहकर जीवन काट दो। खाओ-पियो, मौज करो, और अपने पीछे कुछ संताने छोड़ जाओ, पशु का यही उद्देश्य है। तुम पशु नहीं हो न? तुम चेतना हो! तुम्हारा क्या उद्देश्य है? तुम्हारा उद्देश्य है मुक्ति, तुम्हारा उद्देश्य है शांति।

तुम मुझे बताओ कि तुम्हें शांति मिल जाएगी जब तुम्हारे आसपास लाखों, करोड़ों बेगुनाह जीव कट रहे होंगे? वह अपनी मौत मर जाएँ तो कोई बात नहीं। उनकी ‘मृत्यु’ में कोई बड़ी बात नहीं। मृत्यु तो सबको आनी है। तुमने एक मुर्गा काट दिया, क्या हो गया? तुम नहीं काटते तो दो महीने बाद खुद मर जाता। दो महीने बाद नहीं तो दो साल बाद मर जाता, दो साल बाद नहीं तो छः साल बाद मर जाता। अमर तो नहीं है मुर्गा; मुर्गा तो मरेगा ही। बात यह है कि ‘तुमने’ मारा! तुमने मारा तो अब तुम्हारी चेतना का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। तुम्हारी चेतना का उद्देश्य है — ‘मुक्ति’ और ‘शांति’। तुम्हारी चेतना का उद्देश्य ‘प्रकृति-बद्ध’ नहीं है। तुम्हारी चेतना का यही उद्देश्य नहीं है कि खाऊँ-पियूँ, मौज करूँ, बच्चे पैदा करूँ, और मर जाऊँ। तुम्हारी चेतना का उद्देश्य है — मरने के पहले काश आज़ाद हो जाऊँ। और आज़ाद नहीं हो पाओगे तुम अगर ऐसा काम कर रहे हो, जिसमें तुम जानते हो कि चेतना का ह्रास है।

चेतना चाहे तुम्हारी हो या एक बकरे की हो, या किसी और जीव की हो, चेतना तो चेतना है न? जब तुम किसी और जीव को मार देते हो, तो मूलतः तुम यही कह रहे हो कि तुम्हें चेतना के प्रति कोई आदर है नहीं। बिलकुल आदर नहीं है।

चिकित्सा का, औषधि के क्षेत्र का, हमें ऐसा विज्ञान चाहिए जो बुनियादी तौर पर एक समग्र दृष्टि रखता हो, विश्व के प्रति। काट-काट कर न देखता हो, यह न कहता हो कि यह इंसान है, यह जानवर है — इंसान को ठीक करना है इसलिए जानवर का उपयोग करना है।

पुरानी चिकित्सा पद्धतियाँ इसलिए बहुत सक्षम थीं, बहुत उपयोगी थीं। चाहे आयुर्वेदिक हो, यूनानी हो — वह रोगों के प्रति एक समग्र दृष्टि रखती थीं। तुम अगर जाकर बताओ कि तुम्हारे चेहरे पर मुहाँसा है, तो वह बस त्वचा का इलाज नहीं करते थे, और अगर त्वचा का इलाज करें तो साथ-ही- साथ वह तुम्हारे पूरे तंत्र का इलाज करेंगे। कहेंगे कि रक्त का शोधन करो!

बस दो बातों से पुराना चिकित्सा विज्ञान मार खा गया। पहली चीज़ थी ‘सर्जरी’, शल्य क्रिया, और दूसरी चीज़ थी ‘एंटीबायोटिक’। यह दो चीज़ें आयुर्वेद के पास नहीं थीं। और नहीं भी थीं तो लाई जा सकती थीं। नहीं थी तो आयुर्वेद कोई ठहरा हुआ विज्ञान थोड़े ही था। सब विज्ञान आगे बढ़ते हैं, आयुर्वेद को भी आगे बढ़ाना चाहिए था, पर हमने तो आयुर्वेद की करीब-करीब बलि ही चढ़ा दी। हमने कहा — चलो एलोपैथिक के ही क्षेत्र में चलते हैं। और दो ही विशेषताएं हैं एलोपैथी के पास मूलतः — सर्जरी और एंटीबायोटिक।

जहाँ तक रोग के निदान की बात है, डाइगनोसिस की बात है, उसका तो एलोपैथी से कोई संबंध ही नहीं है। तुम्हारा हाथ टूटा है और तुम एक्सरे के द्वारा पता लगाते हो कि कितनी जगह टूटा है, तो यह कोई एलोपैथिक बात थोड़े ही है, यह तो वैज्ञानिक बात है। आयुर्वेद भी वैज्ञानिक है। तुम आयुर्वेदिक चिकित्सकों के पास जाओ, वह भी अब कह देते हैं कि जाओ अपना थायरॉइड चेक करा कर आओ। फिर हम तुम्हें आयुर्वेदिक औषधि देंगे। तो डाइगनोसिस तो वैज्ञानिक होता है — वो न आयुर्वेदिक होता है, न एलोपैथिक होता है, न होम्योपैथिक होता है। कुछ भी नहीं होता। चिकित्सा की ‘दृष्टि’ आयुर्वेदिक या एलोपैथिक होती है।

जब तुम समग्रता से देखते हो जीव को, संपूर्ण ब्रह्मांड को, तो तुम्हारी दृष्टि आयुर्वेदिक है। और जब तुम्हें बताया जाए कि मेरे मुँह पर मुहाँसा है, और बस तुम्हारी खाल का इलाज कर दिया जाए, तो तुम्हारी दृष्टि एलोपैथिक है। या जब तुम्हें बताया जाए तुम्हारी त्वचा में समस्या है और इलाज तुमको ऐसा दे दिया जाए जो त्वचा को तो ठीक कर देगा लेकिन तुम्हारे जिगर (लिवर) को खराब कर देगा, तो यह दृष्टि एलोपैथिक है। आयुर्वेद ये कभी नहीं करने वाला। आयुर्वेद के पास तुम जाओगे तो जिस रोग का इलाज कराने गए हो, तो उसके साथ-साथ पाँच अन्य छुपे हुए रोग भी ठीक हो जाएंगे।

लेकिन साथ-ही-साथ मैं यह भी जानता हूँ कि एलोपैथिक, अंग्रेजी दवा, इतनी प्रचलित क्यों है। क्योंकि बहुत शोध हुआ है वहाँ, बहुत मेहनत की गई है। वैज्ञानिकों की पीढ़ियाँ-दर- पीढ़ियाँ कतारबद्ध होकर के, कई शताब्दियों तक, कई देशों के शोधकर्ताओं ने इस पूरे विज्ञान को एक उन्नति दी है। तो आज यह वहाँ खड़ा हुआ है कि इसके पास कई ऐसी विधियाँ हैं, इसके पास कई ऐसे नुस्ख़े हैं जिनका तोड़ और किसी चिकित्सा पद्धति में नहीं है। मैंने स्वयं एलोपैथिक दवाइयाँ काफी ली हैं और आयुर्वेदिक भी खूब ली हैं, मैं दोनों के प्रभाव को जानता हूँ। और आयुर्वेद कहाँ पर मात खाता है, मैं यह भी जानता हूँ। देखिए, आयुर्वेद की तमाम कमज़ोरियों के बाद भी मैं कहूँगा — जहाँ तक हो सके, व्यक्ति को एलोपैथी से दूर रहना चाहिए। उस दवाई, उस गोली, उस इंजेक्शन की बात बाद में करेंगे। जिस मानसिकता से, जिस फिलॉसफी, जिस दर्शन से वह गोली निकलकर आई है, वही गलत है। तो वो गोली ठीक कैसे हो सकती है? हो सकता है उस गोली के दुष्परिणाम तत्काल न दिखाई दें, पर आएँगे ज़रूर।

एलोपैथी चिकित्सा का एक शास्त्र या विधि भर नहीं है, एक फिलॉसफी है, एक जीवन दृष्टि है। इसी तरह से आयुर्वेद भी सर्वप्रथम एक फिलॉसफी है, और आपको देखना होगा कि इन दोनों में से कौन-सा दर्शन सत्य के ज़्यादा निकट है।

अब मैं तुम्हें सबूत देकर नहीं समझा पाऊँगा कि अगर एक आदमी को ठीक करने के लिए दस पशुओं की बलि दे दी गई, तो इसमें गलत क्या हुआ। इसीलिए मैंने शुरुआत में ही कहा था कि इस उत्तर को सुनने के लिए तुम्हें बहुत श्रद्धा चाहिए। तुम शायद नाप नहीं पाओगे कि गलत क्या हुआ है, पर गलत तो हुआ है। बहुत गलत हुआ है। पूरे संसार को उसकी सज़ा मिलेगी। कहीं भी, किसी के साथ भी, जब कुछ ऐसा होता है, जो नहीं होना चाहिए, तो कर्मफल सबको भुगतना पड़ता है। चलो, थोड़ा-सा समझाय देता हूँ। तीन अपराधी मिलकर शराब के नशे में एक लड़की का बलात्कार कर देते हैं, बड़ी निर्ममता से। उसे प्राणघातक चोट भी पहुँचा देते हैं। यह वास्तविक घटना है, मैं पात्रों के नाम नहीं ले रहा हूँ, आप समझ ही जाओगे। पता यह भी चलता है कि वह तीनों अपराधी में से शायद तीनों ही, या फिर कोई एक कोई फिल्म देखकर आ रहे थे। वो जो तीनों पुरुष थे, उन्होंने उस लड़की के साथ जो किया, वह कैसे किया? वह तीनों पुरुष कहाँ से आए? वह अचानक किसी नाले में से बुलबुले की तरह उठे थे? वो अचानक आकाश से, किसी पक्षी की बीट की तरह गिरे थे? वह तीनों व्यक्ति जिन्होंने उस लड़की के साथ अनाचार किया, वो आए कहाँ से? इसी समाज से आए न? और क्या यह संभव है कि इस समाज में तीन व्यक्ति ही ऐसे हों, और बाकी सब संत-महंत हों? अगर तीन ऐसे हैं, तो बाकी भी ऐसे ही होंगे। बस इन तीनों का अपराध खुल गया और बाकियों का खुलना बाकी है। हो सकता है उनके जीवन पर्यंत कभी न खुले, पर अपराध तो होगा।

इनमें से एक किसी फिल्म में आइटम नंबर देखकर आ रहा था, उसकी कामोत्तेजना बिलकुल भड़की हुई थी। पर थिएटर में वो अकेला था क्या? कितने लोगों ने वही उत्तेजक गीत देखा, बोलो? और अगर निर्माता-निर्देशक ने पिक्चर में वैसा गीत रखा है तो इसका मतलब वे जानते हैं कि उस गीत को पसंद करने वाले कितनी तादात में है। बहुत तादात में हैं; अधिकांश वैसे ही हैं। वो पसंद करेंगे, तभी तो पिक्चर चलेगी, तो उन्होंने तो खूब गणना करके रखा है। पूरी आबादी ही कुत्सित है न। पूरी आबादी ही पतित है। तभी तो ये तीन ऐसे निकले।

अब यह बात मैंने तुम्हें ज़रा तर्क के तरीके से समझा दी। इसी बात को सीधे-सीधे ऐसे कहा जाता है — इन तीनों ने जो करा, उसकी सज़ा पूरे संसार को मिलेगी। पर तुमसे जब कहा जाता है कि इन तीनों ने जो करा, उसकी सज़ा पूरे संसार को मिलेगी, तो तुम कहते हो कि “क्यों मिलेगी साहब? गलती तो इन तीनों की ही है।” अदालत भी जब सज़ा देगी, तो इन तीनों को ही देगी, सबको थोड़े ही देगी। चूँकि ये तीन एक समग्रता से उठकर आए हैं। हम सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए अगर ये तीन गिरे हुए हैं, तो बाकी सब भी गिरे हुए हैं।

सज़ा मिल चुकी है, और क्या है सज़ा? कि सब गिरे ही हुए हैं। सब गिरे ही हुए हैं, तभी तो ये तीन ऐसे थे — यही सज़ा है। कोई पाप बिना सज़ा पाए नहीं जाता। सज़ा तो मिलेगी, भले ही दिखाई न दे। हम सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक व्यक्ति, इसी तरह से कह रहा हूँ, अपनी प्रयोगशाला में जानवरों पर गुनाह-पर-गुनाह कर रहा है, और बड़े आयोजित तरीके से गाड़ियों में लद-लद कर जानवर आते हैं, और उन पर घोर अत्याचार किए जाते हैं। वह व्यक्ति क्या अकेला है? उस व्यक्ति के समर्थन में कितने व्यक्ति हैं? बहुत सारे। उस प्रयोगशाला को फ़ंडिंग कहाँ से मिलती है? हो सकता है देश की सरकार से मिलती हो। वह सरकार जो देश के सभी लोगों द्वारा चुनी गई है। यानी कि यह एक व्यक्ति जो अत्याचार कर रहा है किसी खरगोश पर, इस व्यक्ति के साथ कौन-कौन खड़ा हुआ है? पूरा देश खड़ा हुआ है। अब यह व्यक्ति अगर पतित है, नारकीय है, हिंसक है, तो इसका मतलब कौन-कौन हिंसक है? पूरा देश ही हिंसक है न? और अगर पूरा देश हीं हिंसक है, तो सज़ा मिल गई न? मिल गई कि नहीं मिल गई? हिंसा अपनेआप में सज़ा है या नहीं है?

अगर देश पूरा सुधर जाए, तो क्या यह हो पाएगा कि ऐसी सिर्फ़ एक प्रयोगशाला बची रह जाए? न प्रयोगशाला बचेगी, और प्रयोगशाला तुम चलाना भी चाहो तो उसमें काम करने के लिए कौन राज़ी होगा?

हम सब बुने हुए हैं एक ही ताने-बाने में। ऐसा नहीं हो सकता कि कपड़े में एक तरफ से खिंचाव आए और कुछ धागों को उसका पता ही न चले। ऐसा नहीं होने वाला।

इंसान हो, इंसान का धर्म है करुणा, उसका पालन करो! बात हानि-लाभ की नहीं है। बात सीधे-सीधे चैन की है।

मुझे नहीं मालूम क्या फ़ायदा क्या नुकसान, पर दिल को अगर सुकून नहीं मिल रहा, तो कोई काम कर कैसे डालोगे? आज शाम को स्टेडियम जा रहा था। मेरे सामने कुल इतना बड़ा (अपनी हथेली की तरफ इशारा करते हुए), इतना बड़ा गिलहरी का बच्चा आकर गिरा और वह बेहोश और उसे कुछ देर देखा, वह हिले ही न। फिर वह हिलने-डुलने लग गया थोड़ा। उसको पकड़ने की कोशिश की तो वो भागे इधर- उधर। फिर उसको पकड़ा। पकड़ा, तो वह इतना-सा तो था, शोर मचाए, पंजा मारे, फिर उसको लाकर कमरे में रखा, दाना-पानी दिया। क्या हानि? क्या लाभ? पर यह पता है कि उसको छोड़कर स्टेडियम निकल जाता तो मन बहुत ख़राब रहता।

तो यह तर्क भी बहुत काम का नहीं है कि जिसकी चेतना ज़्यादा ऊँची हो, उसको बचा लो। अरे हटाओ! तुम्हारे इस तर्क से तो वो ही नहीं सहमत हुए जो चेतना के शिखर पर बैठे थे। किस तर्क की बात कर रहा हूँ, समझ रहे हो न? कि अगर दो लोगों की जान बचानी हो, और उनमें से किसी एक की ही बच सकती हो, तो उसकी बचा दो जिसकी चेतना ज़्यादा उन्नत है। यह तर्क भी दिया जाता है और यह तर्क ऐसा लगता है कि — बढ़िया! गणित सध गया!

मैं कह रहा हूँ कि इस तर्क से वही सहमत नहीं हुए जिनकी चेतना सर्वाधिक उन्नत थी। बुद्ध जाते थे और कसाई उनके सामने एक बकरे को लिए चला जाता था, अभी कट ही जाता बकरा।

बुद्ध ने कहा, “छोड़ दो!” कसाई ने कहा, ‘न! माँस बेचूँगा, पैसा है।’ “छोड़ दो! विनती करता हूँ।” ‘पैसा दे दो तो ले लो।’ “पैसा तो है नहीं मेरे पास।” ‘फिर कटेगा ये।’ “काट कर माँस पाओगे, अच्छा चलो, जितना इसका माँस हो, उतना तुम मेरा काटकर ले जाओ। दो जाँघे हैं, इनमें माँस है, जितना इस बकरे से माँस मिलता हो, उतना तुम मेरा काट ले जाओ।”

क्या बुद्ध ने यह कहा कि जिसकी चेतना ऊँची हो उसको बचाओ? बोलो? अगर यह तर्क तुम चलाने लग गए, तो फिर तो गुरु-शिष्य की कोई बात ही नहीं रह जाएगी।

शिष्य — वह जिसकी चेतना नीचे; गुरु — वह जिसकी चेतना ऊपर है।

ठीक? फिर गुरु क्यों कष्ट सहेगा छोटी चेतना वाले के लिए? फिर तो कहा जाएगा कि छोटी चेतना की बलि दे दो, बड़ी चेतना को बचा ले जाओ। और होता तो उल्टा है — जिसकी चेतना जितनी ऊँची होती है, वह अपनी बलि देने को उतना तैयार रहता है। और जिसकी चेतना जितनी नीची होती है, वह अपनी बलि देने से उतना डरता है।

ऊँची चेतना वालों का तो रिवाज़ ही यही रहा है, कि हँसते- हँसते उन्होंने सर कटाया अपना। और ओछे लोगों की परंपरा ही यही रही है कि मौत से घबराते भागे। तो बात चेतना की भी नहीं है। बात तुम्हारे ‘केंद्र’ की, बात तुम्हारे ‘केंद्रीय धर्म’ की है। स्वभाव है तुम्हारा करुणा, स्वभाव विमुख होकर चैन नहीं पाओगे। कुछ ऐसा मत करो जो करुणा के विपरीत जाता हो।

और कोई हिसाब लगाना ही मत। ये कहना ही मत कि छोटा पशु मरा, बड़ा पशु बचा तो ठीक हुआ न! हमने शुरू में ही कहा था — यह हिसाब पशुओं के लिए है, प्रकृति के लिए है, मनुष्यों के लिए नहीं है। मनुष्य का एक ही हिसाब है — ‘करुणा’, क्योंकि मनुष्य का केंद्र है — ‘आत्मा’।

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