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ऐसी भी क्या भूख यारों || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: अचार्य जी, नमस्कार! आपने हमें समय दिया सर, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!

मेरा आपसे पहला सवाल निजी है। मैं वीगन सेमिनार (शुद्ध शाकाहार पर संगोष्ठी) करता हूँ, जहाँ मैं लोगों को पूरे दिन बताता हूँ कि वीगनिज़्म (शुद्ध शाकाहर) क्यों और उसके फ़ायदें क्या हैं। एनवायरमेंट इम्पैक्ट, क्रुएलिटी इम्पैक्ट, हेल्थ एस्पैक्ट (पर्यावरण प्रभाव, क्रूरता प्रभाव, स्वास्थ्य पक्ष) ये सब बताता हूँ।

तो ऐसे एक सेमिनार (संगोष्ठी) में मेरे बच्चे भी आये थे, जो बीस-इक्कीस साल के हैं। वो नॉनवेज (माँसाहारी) थे, तो सेमिनार के बाद वो वेज (शाकाहारी, जो माँस के अतिरिक्त अन्य पशु उत्पादों का सेवन करे) हो गए। और आज भी अभी उस बात को दो साल हो गए, वो वेज पर ही अटके हैं।

तो मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि शुड आई पुश देम? (क्या मुझे उन्हें धकेलना चाहिए?) क्या मैं उनको बोलूँ कि नहीं, वीगनिज़्म की ओर शिफ़्ट (स्थानान्तरण) करो? क्या मुझे प्रेशर (दबाव) डालना चाहिए? और मेरा एक हिस्सा कहता है कि ये जो है, ये दिल की बात है। जब उनका दिल तैयार होगा, जब वो मानेंगे, तब वो शिफ़्ट होंगे और वो परमानेंट (स्थायी) होगा। आज मैं एक पैरेन्ट (अभिभावक) के तौर पर प्रेशर डालूँगा, तो वो कहीं रिबेल (विद्रोह) न कर जाएँ। तो क्या करना चाहिए मुझे?

आचार्य प्रशांत: देखिए, सुनने में ये बात बिलकुल सही लगती है कि हर इंसान को अपने दिल पर ही चलना चाहिए, दबाव पर नहीं। लेकिन ये दिल चीज़ क्या है? मन तो दो चीज़ों पर चलता है। एक जो उसकी मूल वृत्ति होती है, डीप अंडरलाइंग टेंडेंसी (भीतर गहराई में पड़ी वृत्ति) और एक जो उसमें सूचनाएँ आती हैं जिसको हम ज्ञान भी बोल सकते हैं। इन्हीं दो चीज़ों को अगर मिला दो, तो हम कहेंगे मन बन गया। ठीक है?

जो हमारी जो मूल वृत्तियाँ होती हैं, सब में होती हैं, बच्चा हो, बड़ा हो, कोई हो; भारत का हो, यूरोप का हो, कोई भी हो। मूल वृत्ति होती है, लालच की, सुविधा की, आराम की, है न? मौज मुझे मिल जाए। फिर उसी से सम्बन्धित ये सब भी आ जाता है कि कभी गुस्सा आ गया, कभी डर लग गया। ये सब मूल वृत्तियाँ होती हैं हमारी।

और इन्हीं मूल वृत्तियों के ऊपर मन में डाला जाता है—जैसे समझ लीजिए कि ये है (गिलास को हाथ में लेते हुए), इसको आप मन कहेंगे। तो ये क्या है? ये मूलवृत्ति का ढाँचा है। ठीक है न? ये मन का इन्फ़्रास्ट्रक्चर (मूल संरचना) है, ये मूलवृत्ति है। और इसमें क्या भरा जाता है? जो हमें दुनिया भर से सूचनाएँ मिल रही हैं। वो जो दुनिया भर से मिल रहा है, अगर वो सही है तो उसको हम बोल देते हैं वो ज्ञान है। हम उसे बोलते हैं वो ज्ञान है, अगर सही चीज़ मिली है तो। और ये कुल मिला-जुला कर मन है। तो मन में ये जो चीज़ है (गिलास का ढाँचा), ये तो होती है हार्ड , ठोस। ये तो आसानी से बदलती नहीं, वृत्ति।

ये जो चीज़ है भीतर, तरल, ये आसानी से बदल सकती है। ये क्या है भीतर?

प्र: पानी है, सर!

आचार्य: हाँ, पानी है‌। इसको हम कह रहे हैं किसका प्रतीक? ज्ञान का; जो हमें बताया गया है। जो हमें बताया गया है, वो मन में भरा रहता है। ये बदल सकता है। ये डाला जा सकता है, ये उड़ेला जा सकता है। और एक अभिभावक, पिता होने के नाते यही फ़र्ज़ भी है आपका कि सही चीज़ उनके भीतर डालें।

अगर आप ये प्रतीक्षा करते रहेंगे कि उनके दिल में आएगी, दिल में आएगी; तो दिल में कैसे आएगी? आप डालोगे, तब आएगी न! और आप नहीं डालोगे, तो खाली रहेगा क्या यह? ये प्याला है, इसको अगर हम यहाँ छोड़ दें ऐसे, तो भरता तो रहेगा ही न? आप साल भर बाद आएँगे तो इसमें यहाँ चारों तरफ़ गंदगी भरी होगी, कुछ और भरा होगा। दुनिया तो नहीं बख़्श देती। दुनिया तो इसमें तमाम तरह के प्रभाव डालती ही रहेगी; वही मन बन जाते हैं।

तो ये एक तरह से बिलकुल सद्भावना की बात है आपकी कि आप प्रेशर नहीं डालना चाहते। सुन्दर बात है कि आप कह रहे हैं बच्चे स्वयं सीखें, अपने दिल पर चलें। लेकिन दिल जैसी चीज़ क्या है, ये समझना बहुत ज़रूरी है। नहीं तो दिल-दिल करते-करते या फ़्रीडम, आज़ादी की बातें करते-करते, हम समझ ही नहीं पाएँगे कि ग़ुलामी तो हमारे ढाँचे में ही जैसे इन्बिल्ट (अंग के रूप में) है। जो हमारा ढाँचा ही है न, उसमें भीतर एक ग़ुलामी की व्यवस्था पूर्व निर्मित है, रेडिमेड है, इनबिल्ट है। उसको हटाने के लिए उसमें ज्ञान डालना पड़ता है। आप ज्ञान नहीं डालोगे, तो मन कैसे बनेगा? मन फिर वही कुप्रभावों का एक बस पिंड जैसा हो जाएगा, मन।

तो उनको आपको बताना पड़ेगा, सिखाना पडेगा। बच्चों को सही सूचना देनी पड़ेगी ताकि वो निर्णय कर पाएँ।

यह जो मैंने कुल इतनी लंबी-चौड़ी बात बोल दी, मुझे लग रहा है ज़्यादा गंभीर शुरुआत हो गयी चर्चा की। ये जो कुल बात है, उसका आशय ये है कि दिल कोई आंतरिक चीज़ नहीं होती है। दिल का भी निर्माण करना पड़ता है और माँ-बाप का ये फ़र्ज़ है कि वो बच्चों के दिल का निर्माण करें।

हम अगर सोचें कि दिल यहाँ है (सीने में), नहीं, दिल यहाँ नहीं होता हमारा। हमारा जो दिल होता है, जिसको आप मन कहेंगे, मन; वो कुछ भीतर नहीं होता। वो बाहर से भीतर जाता है। ठीक जैसे इसमें (गिलास में) ये जो पदार्थ है, मसाला है; ये बाहर से भीतर आता है।

तो बनाना पड़ेगा उनका मन आपको। वही आपका फ़र्ज़ है, उनका मन आप बनाएँ। उसके लिए आपको ज्ञान देना पड़ेगा।

तो क्या ज्ञान देना पड़ेगा? आपने कहा शाकाहारी वो पहले ही हो गए हैं। जो व्यक्ति शाकाहारी हो गया है, वो अब पशुओं के प्रति मैत्री रखता है न। वो ये नहीं चाहेगा कि जानवरों को नुक़सान पहुँचे और ये सब हो। आप जब उनसे कहोगे कि बेटा बहुत अच्छी बात है आपको गाय से, गाय के बछड़े से, बछिया से; आपको इनसे लगाव हो गया। आप नहीं चाहते चिकन कटे। आप मुर्गे की जान या बकरे को कटते हुए नहीं देखना चाहते हो। ये बहुत अच्छी बात है। लेकिन क्या आपको पता है कि आप जो दूध पी रहे हो या ये सब कर रहे हो, उसमें और जानवरों के वध में, एनिमल स्लॉटर में सीधा-सीधा रिश्ता है? तो अब बताओ, क्या करोगे फिर?

अब उनको ये ज्ञान अभी है ही नहीं शायद। हममें से बहुत लोग शाकाहारी हैं और भारत में शाकाहार का मतलब ही होता है—दुग्ध शाकाहार। हम सब लैक्टो-वेजिटेरियन होते हैं कि शाकाहारी भी हैं और साथ में लैक्टोज़ माने दूध का भोग भी चल रहा है लगातार।

मैं भी था, दस साल पहले तक, क्योंकि ये किसी ने संवेदना जाग्रत ही नहीं करी थी कि भाई, दूध और माँस का रिश्ता बहुत निकट का है। चोली-दामन का साथ है इनका। जहाँ दूध है, वहाँ माँस है। वो बस दिखाई नहीं देता, क्योंकि आपके सामने ऐसा होता है कि गाय का दूध दुह दिया, आपके सामने ला दिया गया। और इतना आप विचार करना नहीं चाहते हो कि वो जो गाय है, जो दूध दे रही है, वो दूध किस प्रक्रिया से आ रहा है? और गाय जब दूध नहीं देती, उसके बाद उसका क्या होता है? इतनी गायें हैं, भारत में सभी दूध पीते हैं; वो गाय-भैंस जाती कहाँ हैं? इतना हम विचार करना नहीं चाहते। सब अपने-अपने जीवन में व्यस्त हैं, कौन इतना सोचे!

तो ये आपको उनको ज्ञान देना पड़ेगा और जब आप ये ज्ञान दोगे तब उनका दिल इस क़ाबिल हो पाएगा कि दिल सही चुनाव कर पाए। नहीं तो बस एक फ़िल्मी गानों वाला जैसा दिल हो जाता है कि दिल-दिल-दिल कर रहे हैं और वो दिल अपना है ही नहीं। वो दिल जो है, वो पूरे तरीक़े से बाहरी प्रभावों से निर्मित है।

प्र: मैं समझ रहा हूँ। एक्च्युअली आई एग्री (असल में मैं सहमत हूँ) कि मेरे बच्चें भी मेरे ख़्याल से वहाँ आकर खड़े हो गए हैं जहाँ बहुत सारे शाकाहारी खड़े हैं, ये कहते हुए कि हमने इतना तो कर दिया न और ये बहुत बड़ी बात है। और ये भी मुझे आपसे पूछना ही था कि बहुत सारे लोग जो यहाँ खड़े हो जाते हैं कि चलो, हम शाकाहारी हैं, ये बहुत बड़ी बात है, यही नाइन्टी पर्सेन्ट (नब्बे प्रतिशत) अच्छा है और अगर बदलना भी है तो पहले उनको बदल लो। पहले उनको कर लो, फिर वो हो जाए, तो फिर हम पर आ जाना।

तो मेरे ख़्याल से मेरे बच्चे भी आज वहीं खड़े हो गए हैं।

आचार्य: देखिए, मैं पहली बात तो ये कहूँगा कि ऐसे लोगों को सर्वप्रथम तो बिना किसी भी तरह के द्वेष के, दुर्भावना के बधाई दी जानी चाहिए। ठीक है?

देखिए, हमें मानना पड़ेगा कि अगर कोई माँस ही खाता रहता था और वहाँ से उठ करके वो शाक-तरकारी पर आ गया है, तो है तो ये प्रगति ही, प्रोग्रेस ही है यह। कई बार ऐसा होता है कि जो वीगन समुदाय है, उसमें ये भावना आ जाती है कि अगर आप माँसाहारी हो और अगर आप शाकाहारी हो, तो आप एक ही बराबर हो; अगर आप वीगन नहीं हो है। है न? रहती है न यह? वीगन कम्युनिटी (शुद्ध शाकाहारी समुदाय) के लोग बहुत मिलते रहते हैं, उनका ऐसा सा ही रहता है कि माँस खाने वाले में और शाकाहारी में कोई ज़्यादा अंतर नहीं है।

मैं इस बात को नहीं मानता। भारत जैसे देश में सिर्फ़ दिवास्वप्न लेने से, विशफ़ुल थिंकिंग (आशापूर्ण विचार) से काम नहीं चल जाएगा कि हम कह दें कि साहब आप कल तक तो मटन-बिरयानी खाते थे और आज आप वीगन बन जाइए। नहीं, जो प्रगति होगी इसमें तुलनात्मक तौर से ही होगी। सीढ़ियाँ एक-एक करके ही चढ़नी पड़ेंगी। तो मैं समझता हूँ, जो ये सीढ़ी चढ़ रहा हो कि उसने माँस छोड़ा है और फूल-पत्ती-शाक पर आ गया है, पर अभी दूध-खीर खाता रहता है, उसको हतोत्साहित करने की जगह उसको प्रेरित करा जाना चाहिए। और कुछ समय तक, देखिए, वो वहाँ पर रहेगा। अभी उसको एकाध साल का मौका देना पड़ेगा, जहाँ पर वो सबसे पहले तो शाकाहार के साथ ही समायोजित हो सके, क्योंकि माँसाहारी को भी तलब उठती है। वो भी एक नशे जैसा होता है। जैसे सिगरेट वग़ैरह का होता है न, उसको भी लगता है कि चबाने को मिले। वो जो एक एनिमल इन्स्टिन्क्ट (पशु वृत्ति) है हमारी, वो चाहती है कि उसे माँस चबाने को मिले।

तो एकाध साल, दो साल पहले फूल-पत्ती, सब्जी, फल इनके साथ अपना ज़रा समीकरण बैठा ले। फिर उससे कुछ सवाल करने पड़ेंगे, जो उसको ले जाएँगे, कह लीजिए उत्कृष्टता, एक्सेलेंस की ओर। उससे कहना पड़ेगा कि अभी तक तुमने सिर्फ़ पासिंग मार्क्स (उत्तीर्ण अंक) अर्जित करे हैं, जो कि बुरी बात नहीं है, क्योंकि साहब, पहले तो आप फेल (अनुत्तीर्ण) हो रहे थे। फेल होता इंसान अगर पासिंग मार्क्स अर्जित करने लग जाए, पचास-साठ प्रतिशत उसके आने लग गए; तो मैं नहीं समझता कि हमें उसे ताने मारने चाहिए। है न?

तो पहले तो उसको थोड़ा प्रेरित करें, फिर कहें, "देखो, तुम्हारे पचास-साठ प्रतिशत तो आ गये हैं, क्या हम अस्सी-नब्बे प्रतिशत की कोशिश कर सकते हैं?" और वहाँ पर फिर ज्ञान ज़रूरी है। वहाँ पर उसको प्रोत्साहित करना ज़रूरी है और वहाँ पर, मैं समझता हूँ, उसको वो हक़ीक़त दिखाना ज़रूरी है, जो हमारे क़त्लघरों, स्लॉटर हाउसेस में चल रही है; जो पशुओं के साथ बर्ताव हो रहा है।

लोगों को तो मूलभूत बातें नहीं पता। लोग कहते हैं, "मुर्गा नहीं खाएँगे तो दुनिया भर में मुर्गे-ही-मुर्गे हो जाएँगे।" उनको ये पता ही नहीं है कि ये सब कुछ इन्डस्ट्रियल (औद्योगिक) है। उनको पता ही नहीं है कि निन्यानवे प्रतिशत माँस जो आप खा रहे हैं, भारत तक में, वो कोई प्राकृतिक रूप से पैदा हुआ पशु नहीं है, उसको ज़बरदस्ती पैदा किया गया है, एक फैक्ट्री (उद्योगशाला) में पैदा करा गया है उसको। ये इतनी सी बात नहीं पता है लोगों को।

कोई आ करके ज्ञान देने लगता है कि देखो साहब, फ़ूड चेन (खाद्य श्रंखला) भी कोई चीज़ होती है, कोई कुछ बता रहा है, कोई कुछ बता रहा है। लोग इतने ज़्यादा इग्नोरेन्ट हैं, इतने अज्ञानी हैं, उनको अपने भोजन के बारे में ही मूल तथ्य नहीं पता हैं।

तो ये सब जो बातें बतानी होंगी। इन्फ़ॉर्मेशन डेस्सेमिनेशन (सूचना प्रसार), पब्लिसिटी (जन प्रचार) का इसमें बड़ा योगदान है। और वो चीज़ जब तक लोगों के सामने नहीं आएगी, उनको कैसे एक इन्सेन्टिव (प्रोत्साहन) मिलेगा, एक प्रेरणा मिलेगी कि अब आपको दूध भी त्यागना चाहिए!

हमारी ज़बान पर रच बस गया है न दूध? हमारी संस्कृति में शामिल है, हमारे मिथकों का हिस्सा है वह। हमारे त्योहारों का हिस्सा है, हमारे रिश्तों का हिस्सा है। तो दूध का त्याग इतना आसान नहीं होगा, जब तक आप लोगों के सामने सारे तथ्य, सारी हक़ीक़त नहीं रखेंगे।

और साथ ही मैं कहूँगा कि कृपा करके—जितने भी वीगन लोग इसको सुन रहे हैं—कृपा करके शाकाहारियों और माँसाहारियों को एक ही श्रेणी में रखना छोड़ें, क्योंकि वो एक ही श्रेणी के नहीं हैं। मैं बिलकुल अच्छे से जानता हूँ, जो शाकाहारी है, लेकिन दूध ले रहा है; वो पशुओं की हत्या में सहभागी हो रहा है। ये मैं जानता हूँ, लेकिन ये जानते हुए भी कह रहा हूँ कि जिसने थोड़ी भी प्रगति करी है, उसको आपके व्यंग और ताने नहीं चाहिए, उसको आपका सहयोग चाहिए। उसको थोड़ा सा आप प्रेरित करें, उसकी थोड़ी प्रशंसा भी करें और कहें कि अब और भी आगे का कुछ करके दिखाओ।

प्र: टोटली एग्री (पूर्णतः सहमत)। तो मेरा अगला सवाल— वैसे मैं नास्तिक हूँ, पर मुझे इण्डियन माइथोलॉजी, हिन्दू माइथोलॉजी (भारतीयबीपौराणिक कथाएँ और हिन्दू पौराणिक कथाएँ) काफ़ी अच्छे से पता है। तो मैं यहाँ से बहुत सारी बातें लाता हूँ; लोगों को पूछने के लिए, बताने के लिए कि देखो, हमारी सभ्यता में, हमारे ग्रंथों में कितने अच्छे से अहिंसा के बारे में लिखा है, कितने अच्छे से कम्पैशन (करुणा) के बारे में लिखा है। तो जब हम लोगों को ये सब बताते हैं, तो सामने से कभी-कभार ये आता है कि हमारे उन्हीं पुराणों में तो पशुबलि भी है, अश्वमेध यज्ञ भी है। तो वहाँ मैं थोड़ा अटक जाता हूँ, क्योंकि लोग सेलेक्टिवली चूज़ करते हैं (कुछ विशेष बातों को चुनते हैं)।

आचार्य: देखिए, पहली बात तो ये कि अगर आप अहिंसा का नाम भी लेते हैं, तो आप नास्तिक नहीं रह गए, आप आस्तिक हैं। ठीक है? आप नास्तिक हैं नहीं।

जो व्यक्ति अहिंसा शब्द का वज़न जानता हो, महत्व जानता हो, वो नास्तिक कैसे रह गया! आस्तिक माने वो थोड़ी है जो किसी भगवान या ईश्वर में विश्वास करता है। जो अहिंसक है, वो आस्तिक है। जो अहिंसक है वो आस्तिक है और जो भगवान, ईश्वर, देवी, देवता किसी में भी विश्वास करता हो, लेकिन हिंसक है; वो नास्तिक है। ठीक है?

तो शास्त्रीय दृष्टि से भी देखिएगा तो आस्तिक मालूम है किसको कहा गया है?

प्र: जो किसी में आस्था रखता हो।

आचार्य: किसमें?

प्र: कुछ अच्छाई में ही।

आचार्य: कौनसी अच्छाई में?

प्र: जनरली (सामान्यतया) लोगों का ऐसा मानना है कि जो भगवान की बात करते हैं।

आचार्य: नहीं। भगवान से कोई अर्थ नहीं है। ये भी बस एक भ्रांति है।

आस्तिक वो है जो वेद में आस्था रखता हो और वेद शब्द का अर्थ है—बोध, जानना। जानना माने चेतना। जो चेतना की ऊँचाई में विश्वास रखता हो, वो आस्तिक है। किसी देवी, देवता, भगवान, आदि को मानने की ज़रूरत नहीं है आस्तिक होने के लिए।

और आप देवी, देवता, मंदिर, भगवान में ख़ूब पूजा, आस्था, अर्चना करते हैं; लेकिन चेतना की शुद्धता से आपका कोई लेना-देना नहीं, मन को आप उठाना नहीं चाहते, जीवन को ऊँचाई नहीं देना चाहते हैं; तो आप घोर नास्तिक हैं।

सारी समस्या ये है कि हम जानते नहीं धर्म क्या है और नतीजा ये होता है कि बहुत सारे अच्छे लोग चूँकि धर्म का सिर्फ़ विकृत रूप जानते हैं, तो कह देते हैं, "साहब, ऐसा धर्म हमको चाहिए नहीं। हमें नास्तिक होना ज़्यादा पसंद है।"

भारत में और दुनिया भर में बहुत सारे ऐसे नास्तिक हैं, जो वास्तव में आस्तिक हैं। लेकिन चूँकि उनको पता ही नहीं है कि वो आस्तिक हैं, तो अपनेआप को बोलते हैं कि हम तो नास्तिक हैं। और बराबर की बात ये है कि अधिकांश लोग जो अपनेआप को आस्तिक बोलते हैं, वो कहीं से आस्तिक नहीं हैं; मैं कह रहा हूँ, घोर नास्तिक हैं वो।

तो आप अगर वाक़ई अहिंसा को महत्व और सम्मान देते है तो आप आस्तिक ही हैं।

'अस्ति' से आता है, 'अस्ति'। किसको कहा जा रहा है कि 'अस्ति'? अस्ति माने 'है'। 'नास्तिकता', 'आस्तिकता' इनके केंद्र में 'अस्ति' शब्द है। किसको कहा जा रहा है कि 'है'?

जो कहे कि सत्य है। माने हम जहाँ हैं, उससे ऊपर भी कुछ होता है। मेरा जैसा मन है, मेरा जैसा जीवन है, इससे बेहतर भी कोई संभावना है; वो आस्तिक है। 'है'!

मैं आपसे पूछूँ, "क्या आप बेहतर हो सकते हैं? कुछ संभावना है?"

प्र: बहुत।

आचार्य: आपने कहा—अस्ति (है)। है न? आपने कहा, 'बहुत है।' आप ने अभी-अभी क्या कहा? अस्ति, है; तो आप आस्तिक हैं। और मुझसे पूछे आप, "भाई, तुम जैसे हो, तुम्हें ज़िंदग़ी ऐसे ही बितानी है या बेहतर होना है?" मैं कहूँ, "बेहतर होना ही नहीं। मैं जैसा हूँ, इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता।" 'न अस्ति,' कोई सम्भावना 'न अस्ति,' नहीं है। तो मैं क्या हुआ? तो मैं नास्तिक। ये है आस्तिक-नास्तिक की परिभाषा। ठीक है?

अब मैं इसीलिए बोला करता हूँ कि ये जो वीगनिज़्म है, जिसको मैं शुद्ध शाकाहार बोलता हूँ। जिसके लिए और भी हिंदी में शब्द अभी-अभी आविष्कृत किये गए हैं। ये वास्तव में गहराई पकड़ेगा और गति पकड़ेगा अध्यात्म के ही बल से, क्योंकि इतना प्रेम, इतनी करुणा, इतनी मैत्री, इतनी अहिंसा, देखिए साहब, सिर्फ़ अध्यात्म से ही आ सकती है। किसी विचारधारा से नहीं आ सकती।

आप कहें कि नहीं-नहीं, मुझे शास्त्रों से कोई मतलब नहीं; मैं कुछ समझना नहीं चाहता; बोध से, चेतना से, ध्यान से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं; लेकिन मुझे तो जानवर अच्छे लगते हैं, मुझे तो पप्पी (पिल्ला) क्यूट (प्यारा) लगता है; मैं इसलिए वीगन हूँ, मैं क्यों वीगन हूँ? क्योंकि मुझे पप्पी क्यूट लगता है। ये वीगनिज़्म बहुत दूर तक नहीं जाएगा। इसमें कोई गहराई नहीं है। इसमें बात बनने नहीं वाली।

और अगली बात, कोई वीगनिज़्म अपनेआप में आख़िरी चीज़ थोड़ी होती है। बिलकुल हो सकता है कि आप चमड़े की बेल्ट न पहनते हों, चमड़े के जूते न पहनते हों, आप पशुओं का माँस न खाते हों, लेकिन फिर भी आप ऐसा जीवन बिलकुल जी सकते हैं जो पशुओं के लिए, सबके लिए, इंसानों के लिए, सब प्रजातियों के लिए बेहद घातक हो। तो वीगन होना कोई आख़िरी बात हो गई?

एक वीगन व्यक्ति भी महादुर्गुणी हो सकता है, महापतित हो सकता है। "भाई, मैं वीगन हूँ, लेकिन मुझे इस तरह का टूरिज़म (पर्यटन) करना बहुत पसंद है जिसमें जंगल काटे जाते हैं, जिसमें पहाड़ों पर चढ़ करके, जो वर्जिन माउंटेन्स और वर्जिन फ़ॉरेस्ट्स (अनछुए पहाड़ व वन) हैं, वहाँ भीतर घुस-घुसकर ऐसा किया जाता है।" अब जहाँ तुम घुस रहे हो, वहाँ पर जानवरों का बसेरा हुआ करता था और वहाँ पर जा करके तुमने क्या करा? तुमने उनका घर काट दिया। घर काट दिया, उनकी पूरी प्रजाति विलुप्त हो जाएगी। और तुम्हें अभी ये गर्व, घमंड भी रह गया कि मैं तो वीगन हूँ। तो ये कौनसा वीगनिज़्म है? तो वीगनिज़्म अपनेआप में कोई आख़िरी बात नहीं होती है।

अहिंसा फिर भी हम कह सकते हैं कि आख़िरी बात है या आख़िरी बात के बहुत निकट है अहिंसा। जो आख़िरी बात है, वो मुक्ति है और मुक्ति के बहुत निकट है अहिंसा। वीगनिज़्म तो बीच का एक पड़ाव जैसा है, एक माइलस्टोन (मील का पत्थर) जैसा है। तो जो उस आख़िरी चीज़ की ओर चल गया, वो इस पड़ाव से गुज़र जाएगा ज़रूर। समझ रहे हैं?

तो लोगों को अध्यात्म की ओर लाना है, वीगन वो अपनेआप हो जाएँगे। वीगन तो वो अपनेआप हो जाएँगे।

प्र: तो जो व्यक्ति अहिंसा को ही पकड़ ले, वीगनिज़्म उसके लिए..

आचार्य: उसे शब्द भी मत बताइए आप! मैं कह रहा हूँ, न उसको ये बताइए कि तुमको आस्तिक होना है, न उसको ये बताइए कि तुम्हारे भीतर मैत्री और प्रेम होना चाहिए, न उसको ये बताइए कि वीगनिज़्म जैसा कुछ होता है; कुछ मत बताइए। उसे बस अहिंसा समझा दीजिए। बाक़ी सबकुछ अपनेआप हो जाएगा। जैसे पेड़ की जड़ें अगर गहरी हैं, तो एक-एक फूल आपको थोड़ी पॉलिश (साफ़) करना पड़ेगा? सुन्दर खिलेगा, चमकता हुआ, अपनेआप खिलेगा। ये सब सुन्दर-सुन्दर फूल हैं, अध्यात्म वृक्ष के—अहिंसा, मैत्री, प्रेम, बोध।

प्र: आचार्य जी, बहुत-बहुत अच्छा लगा सुनकर आपको। थैंक यू (धन्यवाद)।

यह आपने जो बताया न, इसी के आसपास मिनिमलिज़्म (न्यूनतमवाद), ये भी एक फिलोसॉफ़ी (दर्शन), एक थ्योरी (सिद्धांत) है। एंटिनेटलिज़्म (प्रसवपूर्ववाद), ये भी एक थ्योरी है। और ये एन्वायरमेंटलिज्म (पर्यावरणवाद) और क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन)। तो ये चारों फिलोसॉफ़ी मेरे ख़याल से बहुत क़रीब एक-दूसरे के आ जाते हैं।

आचार्य: इनको हम कह सकते हैं, ये वही फूलों जैसी चीज़ें हैं, एक ही वृक्ष की। लेकिन अगर ये सब आइडियोलॉजी ही रह गए, ये विचारधारा के ही तल पर रह गए; तो बात बननी नहीं है, बिलकुल बात नहीं बनेगी। फिर तो ये भी हो सकता है कि जो एंटीनेटेलिस्ट है, वो वीगन न हो; जो वीगन है, वो धार्मिक कट्टरपंथी हो। वो कह रहा है, फ़लाने देश पर हमला करके उसकी न्यूकिंग (परमाणु हमला) कर दो, उसको ख़त्म कर दो। ये साहब वीगन हैं और ये चाहते हैं कि कहीं पर आप न्यूक्लियर बॉम्ब (नाभिकीय विस्फोटक) गिरा दो। अब न्यूक्लियर बॉम्ब गिराने से इंसानों का जो होगा, वो छोड़ो। जहाँ पर तुम न्यूक्लियर बॉम्ब गिराओगे, वहाँ पेड़-पौधों, पक्षियों का क्या होगा? लेकिन आपको बहुत सारे ऐसे वीगन मिल जाएँगे, जो युद्धोन्मादी राष्ट्रवादी हैं, मिलिटेंट नेशनलिज़्म (युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद) है उनमें। वो वीगन हो भी गए, तो क्या हो जाएगा?

तो जड़ पर जाना पड़ेगा। वो जड़ ठीक है, तो सही तरीक़े का उसमें से वीगनिज़्म भी निकलेगा, एन्वायरमेन्टलिज़्म भी निकलेगा। जितनी बातें आपने कहीं, सब अपनेआप उसमें से फिर प्रकट हो जाएँगी।

प्र: एक सवाल थोड़ा सा स्पेसिफ़िक (विशिष्ट) पूछ रहा हूँ मैं आपसे कि कुछ लोग जो ये एन्वायरमेंटलिस्ट (पर्यावरण संरक्षणवादी) होते हैं, जो ये क्लाइमेट (जलवायु) के लिए लड़ना चाहते हैं। ऐसा क्यों होता है कि ये वीगनिज़्म या ये जो पशु खेती हो रही है, जिसकी वजह से जो एन्वायरमेन्ट (पर्यावरण) पर नुक़सान हो रहा है, उसकी ओर क्यों नहीं भागना चाहते हैं ये? यानि इतना डिफ़िकल्ट क्यों हो जाता है, उनके लिए? कि वो सिर्फ़ सुपरफ़िशियली (सतही तौर से) करना चाहते हैं और उस सुपरफ़िशियल (सतही) में उनको बड़ा अच्छा लगता है, स्वयं का कुछ त्याग करना नहीं पड़ा।

आचार्य: वही तो मैं सोच रहा हूँ कि मैं किस तल पर आपको उत्तर दूँ, क्योंकि मैं जहाँ से देखता हूँ, तो मैं तो हर चीज़ की जड़ देखता हूँ। मैं तो कहूँगा, अज्ञान हर चीज़ का कारण है, माया है। मूर्खता है; और क्या बोलूँ मैं इसमें?

आप कह रहे हो आप पर्यावरण प्रेमी हो। पर्यावरण आपको बहुत देखना है, हवा में अभी एसपीएम (निलंबित कण) कितना है और गैसें कितनी हैं और ये सब देखना है आपको। आप नॉइस पॉल्यूशन (ध्वनि प्रदूषण), लाइट पॉलूशन (प्रकाश प्रदूषण) तक की बात करने को तैयार हो, आप फ़ोरेस्ट कवर (वन अच्छादन) की बात करने को तैयार हो। आप ये सारी बातें कर रहे हो। लेकिन आप ये नहीं बात करना चाहते कि इन सबके केंद्र में जो इस प्रजाति की (मनुष्य की) बाक़ी सब प्रजातियों के प्रति हिंसा बैठी है, वो चीज़ है। उसका आप नाम नहीं लेना चाहते।

अब नाम न लेने के पीछे बहुत छोटा सा कारण भी हो सकता है। आपको शायद इसमें हँसी आ जाए। ये तक हो सकता है कि मैं वैसा एक्टिविस्ट हूँ और मेरे पिताजी या मेरी प्रेमिका जी, वो ख़ुद घोर माँसाहारी हैं। और मैं अगर बाहर निकल करके कैंपेन (मुहीम) करूँ कि पशुओं के प्रति क्रूरता नहीं होनी चाहिए, ये नहीं होना चाहिए; तो मेरे घर में भूचाल आ जाएगा। तो इतनी छोटी सी बात भी हो सकती है।

और ये जो बात है, छोटी सी ऊपर से है; नीचे से छोटी क्यों नहीं है? क्योंकि घर में ग़लत सम्बन्धों के पीछे जो कारण है, वही कारण बाहर विकृत विचारधाराओं के पीछे है।

ग़लत सम्बन्ध आप तब बनाते हैं जब आपका मन साफ़ नहीं होता। चेतना में स्पष्टता नहीं होती तो आप ग़लत सम्बन्धों में पड़ जाते हो।

इसी तरीक़े से जब चेतना में सफ़ाई नहीं होती, बोध, अंडरस्टैंडिंग (समझ) नहीं होती, तो आप किसी भी तरह की आइडियोलॉजी (विचारधारा) को पकड़ लेते हो, जो फैशनेबल (चलन में) होती है या जो आपको थोड़ा सा प्रभावित करती है, आकर्षित करती है; पकड़ लेते हो।

दोनों में ही कौनसी चीज़ का अभाव है? अध्यात्म की गहराई का, साफ़ दृष्टि का। जब साफ़ दृष्टि नहीं होती, तो आदमी इसी तरीक़े से बँटा-बँटा जीवन जीता है कि एक ओर तो वो एक एन्वायरमेंटल वॉरियर (पर्यावरण योद्धा) हो सकता है और दूसरी ओर वो कुछ भी हो सकता है, वो एक रिलीजियस फैनेटिक (धार्मिक कट्टर) हो सकता है। कितने तरीक़े के तो दुनिया में दुर्गुण संभव हैं, वो कुछ भी हो सकते हैं।

प्र: जो आपने बताया सही है कि अगर अध्यात्म करें आप, अगर आप रिसर्च करें, सोचें गहरा, तो सब कुछ साफ़ ही हो जाता है।

आचार्य: और ये चीज़ इतनी सरल, इतनी सीधी है कि मानने का मन नहीं करता। इसी चीज़ को अगर हम किसी तरीक़े से थोड़ा जटिल कर सकें, घुमावदार, टीला-टपरा बना सकें, तो ये बुद्धिजीवियों को आकर्षित करेगी, क्योंकि उनको जटिलता चाहिए होती है। अगर हम इसके मॉडल (प्रतिदर्श) बनाए, ये बनाए, वो बनाए, ऐसा-वैसा; उसके अराउण्ड (परितः) एक फिलोसॉफ़ी, एक थ्योरी निर्मित करें; ये सब करें, तो ये आकर्षित लगेगी।

पर जैसे ही आप बोल दो कि दुनिया की सारी समस्याओं की वजह है तुम्हारा कलुषित मन, तुम्हारा कंडीशन्ड माइंड (संस्कारित मन) और जब तक उसको ठीक नहीं करोगे, तो कैंपेन (अभियान) चला करके, आइडियोलॉजी वग़ैरह दिखा करके कुछ होने का नहीं। तो ये चीज़ इतनी सच्ची और इतनी सीधी है कि लगता है कि इसमें तो कोई बात ही नहीं; कुछ मसाला, कुछ ज़ायका तो आया ही नहीं। एकदम सीधी बात बोल दी बिलकुल।

सच के साथ समस्या यही है न! वो एकदम सरल, साफ़, सीधा और नंगा होता है। उसके पास कुछ ऐसा नहीं है कि वो अपनेआप को बेच सके। उसमें ग्लैमरस (मोहक) जैसा कुछ नहीं है।

प्र: एक सवाल पूछूँगा, हमारे जो दर्शक होते हैं, हमारे चैनल पर जो वीडियोज़ देखते हैं, उनकी ओर से। बहुत सारों का ऐसा सवाल आता है कि हमारे घरवाले हमारी नहीं सुनते, बाहर हम कर लेते हैं काम, लोग सुन लेते हैं; लेकिन हमारे अपने घरवाले हमारी बात नहीं सुनते हैं। शायद, हमें वो कहावत 'घर की मुर्गी दाल बराबर' समझ लेते हैं। तो हम क्या करें घरवालों के लिए?

और ये बहुत इम्पोर्टेन्ट (महत्वपूर्ण) इसलिए हो जाता है, क्योंकि ये जो एक्टिविस्ट हैं, ये जो वीगन हैं; इनको घर से ही इतने शायद ताने मिल जाते हैं या बातें सुन जाते हैं कि ये डीमोटिवेट (निराश) हो जाते हैं।

आचार्य: तो समस्या क्या है? आप दूसरों के घरवालों को समझाओ, दूसरे आपके घरवालों को समझा देंगे।

भाई, आप अपने ही घरवालों को समझाते रहोगे, तो दूसरों के घरवालों को कौन समझाएगा? और दूसरों के घरवाले क्या अपने ही घरवालों को समझाते रहेंगे? आपके घरवालों की परवाह करने के लिए बहुत लोग हैं। आप क्यों इतना परेशान हो कि मेरे घरवालों का क्या होगा, मेरे घर वालों को क्या होगा? अपने घरवालों को कोई नहीं समझा सकता। कोई नहीं समझा सकता। ठीक है?

आप बाहर काम करो, बाहर वाले आपके घर में काम कर देंगे।

प्र: तो आचार्य जी, आपको वीगनवाद या ये अहिंसा का जो प्रिन्सिपल (सिद्धान्त) है, इसका फ़्यूचर (भविष्य) क्या नज़र आता है इंडिया में दो हज़ार पच्चीस में, दो हज़ार तीस में?

क्योंकि रिसर्च (शोध) बताता है कि आज शायद भारत में पचास लाख लोग वीगन हैं, जो कि बहुत छोटा नंबर (संख्या) है। दुनिया भर में शायद डेढ़ करोड़ लोग वीगन हैं।

आचार्य: देखिए, फ़्यूचर तो इंसान का होता है न? हम फ़्यूचर कहते हैं, तो सवाल ये है न— किसका फ़्यूचर ? हमारा फ़्यूचर। हम कहें दुनिया का भी फ़्यूचर , तो हमारी दुनिया। दुनिया, जिसे हम देख पा रहे हैं।

अध्यात्म नहीं है अगर, समझदारी नहीं है, अहिंसा नहीं है; तो इंसान ही नहीं है। जब इंसान ही नहीं है, तो किसका फ़्यूचर ? फ़्यूचर होने के लिए पहले इंसान का होना तो ज़रूरी है न। इंसान ही नहीं होगा, तो फ़्यूचर किसका होगा?

तो मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि भविष्य ख़राब होगा। मैं कह रहा हूँ, "भविष्य नहीं होगा।"

प्र: अगर इंसान, इंसान ही नहीं रहा।

आचार्य: "इंसान, इंसान नहीं रहा" नहीं; अगर इंसान ही नहीं रहा। इंसान कैसे रह लेगा, आप तो इस क्षेत्र में हैं, आप तो जानते हैं, आपको लग रहा है कि तीस-चालीस साल बाद इंसान बचेगा, हम जिस राह जा रहे हैं?

प्र: नहीं।

आचार्य: तो फिर किसका भविष्य?

हम शायद या तो आख़िरी पीढ़ी हैं या अधिक-से-अधिक हमसे बाद की एक पीढ़ी और होगी, जो आराम से किसी खुली जगह में बैठ करके साँस ले पाएगी, धूप ले पाएगी। ये बात तो हम जानते हैं न भलीभाँति!

प्र: ये जैसे साइकोलॉजी (मनोविज्ञान) में कहते हैं कि इंसानों में सेल्फ़ डिस्ट्रक्शन (आत्मनाश), ये अपना एक स्क्रिप्ट (विधान) है, जो हमेशा रन होती है (चलती है)। ये वही है।

आचार्य: बिलकुल होती है। बिलकुल है। वो स्क्रिप्ट नहीं है। वो वही मूलभूत ढाँचा है, मैंने जिसकी बात करी थी, ये (गिलास का ढाँचा)।

इसमें न पोषण है, न जीवन है। पोषण और जीवन उसमें है जो इसमें डाला जाता है। इसीलिए ज्ञान का सबसे ज़्यादा महत्व है। कोई इसको (गिलास को) खा करके नहीं जी सकता। ये हम हैं। हम ऐसे पैदा होते हैं, ये हमारा ढाँचा है। ये हमारा एक तरह का स्ट्रक्चर (ढाँचा) है, अंदरूनी ढाँचा। मूल ढाँचा है ये हमारा; इसके भरोसे कौन जिएगा? आप इसको किसी के सामने रख दीजिए, तो मर जाएगा भूख से। इसमें जो डाला जाता है न, जीवन उसमें होता है। और अगर हम ये नहीं डाल पा रहे अपने मन में, तो कौनसा जीवन? मौत ही मौत है। कैसा भविष्य?

एक तरह से मौत जन्म लेती है। मौत जन्म लेती है, जीवन उसमें डालना पड़ता है। ये (शरीर) जन्म लेता है न? ये तो मौत है। ये तो चलती-फिरती मौत है, इसमें थोड़े ही जान है। जीवन इसमें डालना पड़ता है। मौत जन्म लेती है।

प्र: तो ये मेरा सवाल नहीं था; पर आपने जो बोला, वो अभी समझ आ रहा है। तो जैसे दूसरे सारे जानवरों में इन्स्टिन्क्ट (वृत्तियाँ) होते हैं, इंसान के पास भी इन्स्टिन्क्ट होता होगा। तो इंसान भी उन इन्स्टिन्क्ट से बंध गया होगा।

तो आप कहते हैं कि ज्ञान और अध्ययन से ही उनको कंट्रोल (नियंत्रित) करें?

आचार्य: हम अकेले हैं, जिनके पास ये संभावना है कि इसमें (गिलास का उदाहरण देते हुए) कुछ भरा जा सकता है। जानवर भी बिलकुल ऐसे हैं, पर जानवरों का ये (गिलास) जो है, वो ऐसा है (गिलास के मुँह पर हाथ रखते हुए), मतलब बंद है। उनको आप ज्ञान नहीं दे सकते। उनका ढाँचा ही ऐसा नहीं है कि वो ज्ञान ग्रहण कर पाये। आदमी अकेला है, जिसके पास ये संभावना है कि उसमें ज्ञान डाला जा सकता है, उसे इंसान बनाया जा सकता है। जानवरों को आप इंसान नहीं बना सकते। जानवरों के पास ये रेसेप्टिविटी , ये ग्रहणशीलता है ही नहीं।

बराबर की बात ये है कि चूँकि इंसान में ये खुला हुआ है मामला, तो अंदर जीवन भी डाला जा सकता है और गहरी-से-गहरी मौत भी डाली जा सकती है। इसमें पानी भी डाला जा सकता है, इसमें फलों का रस भी डाला जा सकता है और इसमें ज़हर भी डाला जा सकता है। जानवर में आप ज़हर भी नहीं डाल सकते। जानवर में इसमें (गिलास का उदाहरण) आप भीतर रस नहीं डाल सकते, तो उसमें फिर आप ज़हर भी नहीं डाल सकते। इंसान में ज़हर भी डाल सकते हो।

खेद की बात ये है कि हमारा जैसा समाज है, जैसे परिवार, जैसी शिक्षा है और जिस चेतना के स्तर के लोग हैं; हम अपने बच्चों में और हम सब एक-दूसरे में ज़हर-ही-ज़हर डाल रहे हैं। तो ये सब जो हमको चलते-फिरते लोग दिखाई देते हैं, ये बड़े दुख की बात है कि हम सब ज़्यादातर बस ज़हर के पुतले हैं।

उस ज़हर का प्रमाण बताए देता हूँ न आपको। ज़हर क्या चीज़ होती है? ज़हर की परिभाषा क्या है?

प्र: जो आपको ख़त्म करे।

आचार्य: जो आपको ख़त्म कर दे। जो अपने संपर्क में आने वाले जीवन को ख़त्म करता चले, उसको क्या बोलते हैं?

प्र: ज़हर ही हुआ।

आचार्य: ज़हर की बिलकुल ठीक परिभाषा है। जो अपने संपर्क में आने वाले जीवन को ख़त्म करता चले, उसको बोलते हैं ज़हर। और मैंने कहा, हम सब इंसान नहीं हैं, हम ज़हर के चलते-फिरते पुतले हैं। हमारे संपर्क में जो भी जीवन आता है, हम उसका क्या करते हैं?

प्र: नष्ट ही करते हैं।

आचार्य: आपने लोगों को देखा है, लोग चलते रहते हैं, ऐसे चल रहे होंगे, बगल में उनके पेड़-पौधे लगे होंगे, उसकी पत्तियाँ नोचते हुए चलते हैं; देखा है?

छोटा बच्चा होगा। उसको घर में ही ये ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) दे देते हैं कि फूल तोड़ दो, पत्ती तोड़ दो, कीड़ा कुचल दो, छिपकली मार दो।

जो अपने संपर्क में आने वाले जीवन को लगातार नष्ट करता चले या हानि पहुँचाता चले, उसको ज़हर नहीं बोलेंगे, तो क्या बोलेंगे! आपका आपके माहौल पर क्या असर पड़ता है, उसी से तो निर्धारित होगा न कि आप अमृत हैं या आपको विष बोलें। आप अगर जीवनदाता हैं, तो अमृत हैं आप। आप अगर जीवनहर्ता हैं, तो ज़हर हैं आप।

और जीवन किसी का बर्बाद करने का अर्थ ये नहीं होता कि उसकी जान ले ली। जानवरों को तो हम ऐसे ख़त्म करते हैं कि उनकी जान ले लेते हैं। इंसानों को हम ऐसे ख़त्म करते हैं कि उनमें अपना ज़हर स्थानांतरित कर देते हैं। मेरे पास जो ज़हर है, वही मैं तेरे ऊपर डाल दूँगा। लो, तुझे भी ख़त्म कर दिया।

अगर हमारे पास ये सुविधा होती है कि आदमियों की भी हत्या कर दें, तो हमने कर भी दी होती। हम लोग ऐसे ही हैं। पर नियम-कानून बन गया है। हम कहते हैं, हम सभ्य लोग हैं। तो सीधे-सीधे किसी की हत्या तो कर नहीं सकते। तो फिर हम उसकी परोक्ष हत्या करते हैं। उसका हम इन्डायरेक्ट स्लॉटर करते हैं, कैसे? उसका दिमाग ख़राब करके। किसी का दिमाग ख़राब करो, तुमने उसको मार दिया। जानवर को मारने के लिए आपको क्या चाहिए? चाकू।

प्र: हथियार।

आचार्य: हथियार। और इंसान को ख़त्म करने के लिए आपको बस एक ज़बान चाहिए और कई बार ज़बान भी नहीं चाहिए, आपकी मौजूदगी इतनी घातक होती है कि सामने वाला आपकी मौजूदगी में ही तड़प कर मर जाता है, मानसिक रूप से।

प्र: हमारे सारे बिहेवियर्स (व्यवहार), बॉडी लैन्गुएज, बातें; सारे वायलेंट (हिंसक) हैं। वायलेंट कम्यूनिकेशन (हिंसक संचार) है।

आचार्य: हमारा पूरा जो निर्माण है, वो कैसा है? आप अपने घरों को देखिए, दीवारों को देखिए, अपने स्कूलों को देखिए। वायलेंस (हिंसा) हमेशा शब्दों या या उसी समय हो रहे तात्कालिक कर्मों में थोड़े ही होता है। हम कोई ऐसी मूवी बना दें जो किसी का दिमाग भ्रष्ट कर रही है; वो ज़हर है या नहीं है? हम ऐसा साहित्य लिख रहे हैं जो लोगों को भ्रष्ट कर रहा है; वो ज़हर है या नहीं है? हम ऐसे कपड़े ही पहन रहे हैं, जान-बूझ करके, जो दूसरे की चेतना ख़राब करेंगे; ये ज़हर है या नहीं है? तो हम ज़हर के पिंड हैं।

हम वीगन समुदाय में बात करते हैं कि हम जानवरों के साथ क्या व्यवहार कर रहे हैं। हमें ये समझ में नहीं आता कि ज़हर जिस पर गिरेगा, उसी को मौत देगा। बात जानवर की या इंसान की नहीं है। जो इंसान जानवर के लिए ज़हर है, वो इंसान अपने बच्चे के लिए भी ज़हर होगा।

तो जो मूलभूत समस्या है, हम उसको सम्बोधित ही नहीं करते कभी कि हम हैं कौन। अगर मैं ज़हर हूँ, तो मैं जानवरों को मार रहा हूँ; मैं ज़हर हूँ, तो मैं सबको मार रहा हूँ। और अगर मैं ज़हर हूँ, तो सबसे पहले किसको मार रहा हूँ?

प्र: अपनेआप को।

आचार्य: उसकी हम बात नहीं करते। हम कहते हैं, 'जी, वीगन बन जाओ, वीगन बन जाओ।' कोई कहता है, 'पर्यावरणविद बन जाओ।' कोई और कुछ बनना चाहता है, कोई और कुछ बनना चाहता है।

कोई ये प्रश्न नहीं पूछना चाहता — 'मैं हूँ कौन?' मैं ज़हर हूँ, ये बात ही बड़ी गंधाती सी लगती है न! लाज आती है ये मानते हुए।

प्र: और मेरे ख़याल से, हिस्ट्री (इतिहास) अगर हम देख लें, तो ये बात टोटली एविडेंट (पूर्णतः प्रत्यक्ष) है।

आचार्य: कोई पहली बार थोड़ी हो रहा है कि हम जानवरों के प्रति हिंसक हैं। बात बस इतनी है कि आज हमारे पास हिंसा के बड़े ज़बरदस्त औजार हैं। आदमी हिंसक तो हमेशा रहा है। पहले लेकिन मास टर्मिनेशन (बड़ी संख्या में नाश) के उसको इतने उपकरण उपलब्ध नहीं थे। पहले उसके पास ये सुविधा नहीं थी न कि एक झटके में मशीन (यंत्र) लगाकर के एक हज़ार पेड़ साफ़। पहले वो धीरे-धीरे कुल्हाड़ी से मार रहा है।

तो था तो तब भी इतना हिंसक। पर इतनी हिंसा वो कर नहीं पाता था। मजबूरी थी कि अरे चाह तो रहा हूँ मैं सबकुछ मार दूँ, पर मार नहीं पा रहा हूँ। आज आपको टेक्नोलॉजी (तकनीक) ने और इंडस्ट्री (उद्योग) ने और जो एनर्जी (ऊर्जा) है, जो मैकेनाइज़्ड एनर्जी (यंत्रीकृत ऊर्जा) है; उसने आपको इतनी ताक़त दे दी है कि आप कहर बरपा सकते हैं। तो आप कहर ढा रहे हैं।

मैं गया था। आपने बात करी, हम इतिहास की बात कर रहे हैं, ये जो यहाँ पर हैं।

श्रोता: जर्मनी?

आचार्य: अरे नहीं! हमारे देवेश जी कहाँ के हैं? भरतपुर। भरतपुर पक्षी उद्यान जो है, बर्ड सेन्क्चुरी है न?

तो वहाँ बहुत बड़ी एक दीवार है। बहुत बड़ी दीवार है और उसमें सिर्फ़ ये लिखा हुआ है, क़रीब बीस-चालीस-पचास उदाहरण दे करके कि किन-किन लोगों ने यहाँ पर आकर कितने-कितने हज़ार पक्षी मारे और बड़े गौरव से उन दीवारों पर अंकित है कि फ़लाना अंग्रेज़ वायसराय यहाँ आया था और उसने इतने पक्षी मारे। और उनको वो पक्षी नहीं बोलते, उन्हें बोलते हैं 'बैग्स'। जो शब्द इस्तेमाल करते हैं, वो है 'बैग्स'। उसने यहाँ पर साढ़े छः हज़ार बैग्स मारे। फ़लाने राजा आये थे—कोई छोटा-मोटा राजा, कोई इधर-उधर का—उसने यहाँ पर आकर डेढ़ हज़ार बैग्स मारे।

तो हम हमेशा से ही ऐसे रहे हैं। बल्कि अब तो हो सकता है, हम कुछ कम हिंसक हो गए हों।

प्र: पर बर्ड सेन्क्चुरी में उनलोगों ने वो दिवार क्यों लगवायी?

आचार्य: बर्ड सेन्क्चुरी में वो दिवार है, बड़ा-बड़ा है। उसका आप गूगल करेंगे, तो शायद मिल भी जाए आपको। ये चीज़ बर्ड सेन्क्चुरी में अंकित है। भाई, इतिहास की बात है, वो उसको रखना चाहते हैं।

प्र: तो आपसे मैं ये पूछना चाहता हूँ कि जो सनातनी है, जो सनातन दर्शनों को मानता है; क्या ये उसका धर्म बनता है, क्या ये उसका फ़र्ज़ बनता है कि वो आज की हक़ीक़त देखे और जो आज लागू हो उसको फ़ॉलो (अनुसरण) करे?

आचार्य: देखिए, 'फ़र्ज़ बनता है,' ये बात ही सनातनी नहीं है। जिसको आप सनातन दर्शन कहेंगे, मुख्यतः वेदांत, वो कोई कर्तव्य वग़ैरह निर्धारित नहीं करता। वो आपसे कहता है कि तुम जान लो तुम कौन हो, तो तुम समझ जाओगे तुम्हें करना क्या है।

मैं बेहोश हूँ, मुझे पता ही नहीं कि मैं बहुत प्यासा हूँ। मेरा हलक सूख रहा है। वो कहता है, थोड़ा जगो और जगते ही तुम्हें पता चल जाएगा कि तुम प्यासे हो।

मुझे पता ही नहीं है मैं प्यासा हूँ। मैंने क्या पी है? शराब। शराब पीने से क्या हुआ है?

प्र: डीहाइ्ड्रेशन (पानी की कमी), गला ख़राब।

आचार्य: गला सूख गया है। लेकिन शराब पीने से ये भी हुआ कि मैं बेहोश हो गया हूँ। और मेरा गला सूखा है, किसकी वजह से?

प्र: शराब।

आचार्य: और मैं बेहोश भी हुआ हूँ। किसकी वजह से?

प्र: शराब।

आचार्य: तो मैं बहुत प्यासा हूँ, मुझे पता ही नहीं, क्योंकि मैं नशे में हूँ। शराब ने दो काम करे। मुझे उसने यहाँ से (गले से) प्यासा करा है और यहाँ से (दिमाग से) बेहोश करा है। वेदांत कहता है, 'तुम जगो तो सही। तुम जगो; तुम जान जाओगे तुम कौन हो।'

'तुम कौन हो?' में उत्तर ये नहीं आता कि 'मैं आत्मा हूँ।' 'तुम कौन हो?' में उत्तर आता है? मैं?

प्र: प्यासा हूँ।

आचार्य: 'मैं प्यासा हूँ।' मैं प्यासा हूँ, तो मैं समझ गया न, मेरा कर्तव्य क्या है। क्या है मेरा कर्तव्य?

प्र: पानी पीना। प्यास बुझाना।

आचार्य: पानी ढूँढो। तो वेदांत इस चीज़ में नहीं चलता कि डूज़, डोन्ट्स, कमान्डमेम्ट्स (करणीय, अकरणीय, आज्ञाएँ); कुछ नही।

प्र: सेल्फ़ अवेयर (आत्म जागरूक)।

आचार्य: सीधी सी बात है। मुझे नहीं पता होगा, तो किसको पता होगा, मेरी हालत क्या है? मेरे अलावा किसको पता हो सकता है, मेरी हालत क्या है? जान तो लो, तुम्हारी हालत क्या है। ईमानदारी से स्वीकारो तो, तुम्हारी हालत क्या है। उसके बाद हम देखते हैं, तुम कैसे किसी जानवर को मार पाते हो।

प्र: एक्च्युअली सारे सवालों के आप जो मूल बता देते हो, वो आ-जाकर वहीं आ जाता है कि सेल्फ अवेयर रहें, अध्ययन करें। और उसी में सब कुछ है।

आचार्य: अध्ययन भी देखिए, काफ़ी लोग होते हैं, जो कर चुके होते हैं, कर रहे होते हैं। अध्ययन भी काम नहीं आता, अगर कोई मुँह पर ये बोलने वाला नहीं है कि तुम बेईमान हो। बेईमानी हमारी इतनी बड़ी चीज़ होती है, सुरसा समान उसका मुँह होता है, वो सारे ग्रन्थों को भी लील लेती है।

बहुत लोग हैं, जिन्होंने ग्रन्थ पढ़ रखे हैं और ग्रन्थ पढ़ने के बाद भी वो महाबेईमान हैं। तो अपने आसपास, अपने निकटता में कोई ऐसा चाहिए होता है, जो एकदम ऐसे बोले, "तुम बेईमान हो!"

अब लेकिन फिर उसके लिए कई स्थितियाँ अनुकूल होनी चाहिए, कई संयोग बनने चाहिए। रिश्ता ऐसा होना चाहिए कि वो आपको मुँह पर बोल भी दे कि तुम बेईमान हो और आप उसे भगा भी न दें। रिश्ता ऐसा होना चाहिए कि आप उसको अधिकार दे दें कि ज़रूरत पड़े तो मुझे चाँटा भी मार देना। तब जाकर के बात बनती है।

नहीं तो देखिए, ग्रन्थ तो, मुझे कई बार लगता है, बड़े बेसहारा से होते हैं। आप उनको उठाते हो, पढ़ते हो; यहाँ रख दिया, वहाँ फेंक दिया; जो आपको मन करा, वो बात पढ़ी; जो बात नहीं मन करी, उसको अस्वीकृत कर दिया। ग्रन्थ बेचारे क्या करेंगे?

लेकिन शायद ग्रन्थों के अतिरिक्त कोई उपाय भी नहीं है। तो मैं भी ग्रन्थों की ही वक़ालत करता हूँ। सबसे कहता हूँ, 'ग्रन्थ पढ़ो।' अभी हम सबके घरों में उपनिषद् भेज रहे हैं। 'घर-घर उपनिषद' उस अभियान का नाम है।

लेकिन हमारी बेईमानी ग्रन्थों पर भारी पड़ जाती है, अफ़सोस की बात है। और फिर हम दोष ग्रन्थ को दे देते हैं, कह देते हैं दम नहीं था‌। पढ़ रखा है, दम नहीं था। इतना भी नहीं, कह देते हैं कि हम जो कर रहे हैं, वो बात ग्रन्थ से ही निकल रही है। अपनी बेईमानी को हम ग्रन्थ का समर्थन भी दिलवा देते हैं। हम कहते हैं कि ग्रन्थ में ही तो ये बात लिखी है कि ऐसी बेईमानी करो।

प्र: वेरी राईट (बहुत सही)। हम इतने होशियार हो गए हैं!

आचार्य: आदमी की होशियारी!

प्र: तो आप बता रहे हैं कि हमें अपनेआप से झूठ बोलना बंद करना होगा और हो सके तो ऐसा माहौल बनाए अपने आसपास, जहाँ लोग हमें झूठ न बोलें, जो हमें सुनना अच्छा लगता है; पर सच बोलें। मिरर (दर्पण) जैसा काम करें।

आचार्य: ख़ासतौर पर शिक्षकों और अभिभावकों को मैं बार-बार कहता हूँ, कुछ भी हो जाए, कैसा भी हो बच्चा, उसमें बहुत प्रतिभा न हो, बहुत मेहनती न हो, किसी भी तरीक़े से वो विलक्षण न हो; तो भी उसमें एक बात ज़रूर डाल देना— असली रहो, खरे रहो, बी रियल। मुखौटा पहनना, आडंबर करना, ये, वो कुछ नहीं है। ठसक लाइफ़।

प्र: पर सारे लोग इतने बहादुर या इतने..

आचार्य: बहादुरी नहीं चाहिए, सहजता चाहिए।

प्र: डर जाते हैं न कि लोग अपनाएँगे कि नहीं। अब मैं चाहता हूँ कि लोग अपनाए, तो मैं वैसे करने लग जाता हूँ।

आचार्य: तो यही तो, फिर इसीलिए तो अभिभावक ऐसे चाहिए जो ये धमकी न दें कि हम तुमको छोड़ ही देंगे। ये धमकी नहीं होनी चाहिए कि तुमको छोड़ ही देंगे। और कुछ हो जाएगा, ये हमारी ओर से एक आश्वस्ति, गारन्टी है, क्या? रिश्ता नहीं तोड़ेंगे। रिश्ता नहीं तोड़ेंगे। बाक़ी तुम अगर बेईमानी का काम करोगे, तो सज़ा भी दे सकते हैं, मुँह पर बोल भी देंगे, कुछ भी कर देंगे; लेकिन तुम्हें इतना भरोसा निश्चित दिला रहे हैं कि साथ नहीं छोड़ने वाले।

यह मेरे ख़याल से एक स्वस्थ रिश्ते की बुनियाद होनी चाहिए कि एक-दूसरे से झूठ तो बिलकुल नहीं बोलना है, ये डरना-वरना नहीं है कि अरे! कहीं हर्ट (व्यथित) न हो जाए, बुरा न माने, चोट न लग जाए। ये सब कुछ नहीं।

साथ-ही-साथ बात ये भी है कि हमें पता है इंसान कैसा होता है। तुम कोई दुर्गुण, कोई दोष दिखा दोगे, कोई बात नहीं; हम छोड़ेंगे तो नहीं, लेकिन साथ-ही-साथ हम तुम्हें छोड़ेंगे भी नहीं। तुम गड़बड़ करोगे, तो छोड़ेंगे नहीं (थप्पड़ का इशारा करते हुए); लेकिन कितनी भी गड़बड़ कर लो, तुम्हें छोड़ेंगे नहीं।

बिल्ली पड़ी थी एक यहाँ पर, अभी गये थे, एक जगह बैठे हुए थे—जेम्स। तो वहाँ पर अपना सब चल रहा था, खाना-पीना, हुक्का-पानी। तो वो बिल्ली आ गयी। वो बिल्ली थी, अपना बैठी है। तो उसको मैं सहला-वहला रहा हूँ, कुछ खिलाया। तो उसको उठा लिया। तो अपना जब तक सहला रहे थे, उतना मस्त-मगन नीचे बैठी हुई थी और अपना इसके साथ फोटोशूट (चित्र खींचना) हो रहा है। बिल्ली को भी मज़े आ रहे हैं। एकदम मस्त होकर ऐसे बैठ गयी, पाँव फैला करके। फिर मैंने उसको उठा लिया। जब मैंने उठा लिया, पास लाया, तो पटाक से चाँटा मारा मेरे मुँह पर। चाँटा मारा, भाग गयी।

प्र: बिल्लियों की अपनी पर्सनैलिटी (व्यक्तित्व) होती है।

आचार्य: अच्छा है न, ऐसा रिश्ता? क्या बुराई है?

प्र: वो सही थी। जैसी थी वैसी थी।

आचार्य: बच्चों से भी क्यों नहीं हो सकता? क्या ज़रूरत है कि बच्चे आपसे आडम्बर करें, आप बच्चों से आडम्बर करें? क्यों नहीं बातचीत हो सकती? क्यों नहीं खुली चर्चाएँ हो सकतीं? ओपेननेस (खुलापन) बड़ा सुन्दर शब्द है, उसका अर्थ क्या होता है?

प्र: सब कुछ जैसे है, वैसे।

आचार्य: सीमाओं के बाहर जाना। क्लोज़ड (बंद) माने जहाँ सीमा है। सीमाओं के भीतर आप किसी से बात करोगे, क्या मज़ा आना है? ओपननेस का मतलब होता है कि हम सब में एक बहुत बड़ी संभावना होती है। हम सबके भीतर एक आसमान जैसा है। उसको कहते हैं ओपन (खुला)। आत्मा, वही ओपन है, वही खुली है, वही मुक्त है।

क्यों नहीं आत्मिक रिश्ते हो सकते? क्यों इतना हम डरते हैं? वो सब होने लग जाए न, तो फिर हमें सोचना नहीं पड़ेगा कि वीगन हो या नहीं, प्रदूषण कर रहे हो या नहीं। ये सब बातें बहुत छोटी हो जाएँगी।

प्र: एक्च्युअली, सवाल तो बहुत हैं, लेकिन जैसे आप ने बताया कि बेस (मूल) ये है, ये पकड़ लो, सब अपनेआप से शॉट (सुलझ) होकर गिर जाता है। दैट इज़ द ट्रुथ (वह सत्य है), वैसा ही होता है। ये बाक़ी सब सिर्फ़ छोटी-छोटी बातें हैं, उसके आसपास।

आचार्य: इसीलिए मैं वीगन हूँ, लेकिन मैं सिर्फ़ वीगन नहीं हूँ। आप बात समझ रहे हैं न? मैं किसी वजह से वीगन हूँ। वीगनिज़्म से आगे की कोई चीज़ है, वीगन से ज़्यादा मूलभूत कोई चीज़ है; उसके कारण मैं वीगन हूँ। कोई वीगन होना मेरा लक्ष्य नहीं है। वीगनिज़्म मेरी कोई आइडियोलॉजी नहीं है। चूँकि एक सच्ची ज़िंदग़ी जीनी है, चूँकि मैं आध्यात्मिक हूँ, मैं इसलिए इस वीगनवाद का समर्थक हूँ।

ये अंतर समझना बहुत ज़रूरी है।

प्र: हन्ड्रेड पर्सेन्ट (शत प्रतिशत) सही है। वीगनवाद के जो सिद्धान्त हैं, वो आपके सही ज़िंदगी का छोटा सा हिस्सा हैं।

आचार्य: छोटा सा हिस्सा हैं और वो उसमें से नैसर्गिक, आर्गेनिक रूप से निकल रहे हैं। जिस सच्चाई को मैं अपनी ज़िंदगी का आधार बनाना चाहता हूँ और सबकी ज़िंदगी का आधार बनाना चाहता हूँ, वीगनिज़्म उसका एक ऑर्गेनिक प्रोडक्ट (नैसर्गिक, सहज उत्पाद) है।

प्र: तो थोड़ा एक सवाल है। ये जो आपने कहा, परफ़ेक्ट है, एकदम बिलकुल सही। पर ये दूसरे जो ज्ञानी हैं, दूसरे जो गुरु हैं, जो दूसरे जितने भी प्रतिभाशाली लोग हैं; ये क्यों नहीं पकड़ रहे इस बात को कि आज की सच्चाई में दूध जो है, वो तकलीफ़ देता है। तो वो क्यों नहीं पकड़ रहे वो?

आचार्य: ज्ञानी होंगे नहीं वो, और क्या? अब ये तो आप कह नहीं सकते कि देखिए, मैं पानी पी रहा हूँ, फिर भी मेरी प्यास क्यों नहीं बुझ रही। पानी होगा नहीं!

आप ये थोड़ी कह सकते हैं कि मैं ऊपर को देख रहा हूँ, पर आकाश नहीं दिख रहा। अगर दो बातें ऐसी आप बोल रहे हैं, जो परस्पर विरोधाभासी हैं, तो दोनों में से एक बात तो झूठ होगी न? आप दो बातें ऐसी बोलें, जो परस्पर विरोधाभाषी हैं, तो दोनों में से एक बात झूठ होगी।

एक ओर तो आप कह रहे हो, वो ज्ञानी हैं और दूसरी, आप कह रहे हैं कि वो हिंसा का विरोध भी नहीं कर रहे हैं। तो इन दोनों में से एक बात तो झूठ होगी। नहीं होंगे ज्ञानी!

कौनसा ज्ञान है, जो आज के युग में हिंसा के विरुद्ध सीधे-सीधे खड़ा नहीं हो रहा? ये ज्ञान होगा ही नहीं न! ये कुछ छल है, कपट है, आडम्बर है, मुखौटा है, धूर्तता है। सामाजिक शोशेबाज़ी, कुछ ऐसा बोल दो जो सामाजिक तौर पर स्वीकार्य भी हो और ज्ञानी होने का ठप्पा भी लग जाए।

प्र: कुछ धर्मों में ऐसे बताया गया है कि जो दूसरे जीव हैं, वो इंसानों के लिए ही बनाये गए हैं। आप इसका इस्तेमाल कर सकते हो, ये आप ही के लिए है। तो बहुत सारे लोग इसको एकदम फ़र्म फिलोसॉफ़ी (दृढ दर्शन) पकड़कर चलते हैं। हमारे तो धर्मों में कहा गया है कि ये सारे हमारे लिए हैं, इसलिए हम इस्तेमाल करते हैं, इसमें ग़लत क्या है!

आचार्य: नहीं, बिलकुल ठीक कहा गया है। सारे जीव इंसान के लिए हैं, ये बिलकुल ठीक कहा गया है। मैं भी मानता हूँ। मैं भी मानता हूँ, ये घास मेरे लिए है। मैं भी मानता हूँ, ये केले का पेड़ मेरे लिए है, ये बरगद का पेड़ मेरे लिए है। मैं मानता हूँ, ये पूरा विश्व, पूरी कायनात मेरे लिए है। पर किस तरह मेरे लिए है? मैं उसको खा जाऊँ, इसलिए मेरे लिए है?

आप मुझे उपनिषदों की एक प्रति लाकर दें और कहें कि ये मेरे लिए है। तो मैं उसे खा जाऊँ? अगर धर्मग्रन्थ ने आपको ऐसा बता भी दिया कि फ़लाने जीव या फ़लानी चीज़ आपके लिए है। तो 'लिए है' का अर्थ क्या हुआ?

मैं आपको फुटबॉल लाकर दूँगा, ये आपके लिए है; आप खा जाएँगे या फाड़ देंगे?

आपके लिए है; किसलिए है? आपकी चेतना के उत्थान के लिए है। वो बिल्ली मुझे कुछ सिखा गयी, वो बिल्ली मेरे लिए है। किसलिए है मेरे लिए? मैं उससे कुछ सीखूँ। उसके साथ रहने से मैं इंसान बन पाता हूँ। वो जानवर होगा, पर वो मुझे इंसान बना जाता है। वो इस तरह मेरे लिए है। चीर-फाड़ कर खाने के लिए नहीं है वह।

और ऐसे आदमी को आप क्या कहेंगे, जिसे आप कुछ भी दें, उसे खा जाए? आपने उसे मोबाइल फ़ोन दिया, वो खा गया। आप उसे कुछ भी दे रहे हो, वो खाने लग जाता है। ग्रन्थ में लिखा हुआ है फ़लानी चीज़ तुम्हारे लिए है। उसने समझा मेरे खाने के लिए है। अरे! तुम्हारे लिए है, तुम्हारे खाने के लिए नहीं है।

है तो सब कुछ अपने लिए। वेदांत भी यही कहता है, तुम ही तो विश्व के केंद्र हो, सबकुछ तुम्हारे लिए है। 'फ़ॉर हूम' ? 'किसके लिए?' ये तो वेदांत का मूलभूत प्रश्न है और उत्तर हमेशा एक आता है—'मेरे लिए'। सुख है, दुख है; किसके लिए? मेरे लिए। ये दीवार है, किसके लिए? मेरे लिए।

मेरे अतिरिक्त कौन है, जो इसको प्रमाणित कर रहा है? मैं ही हूँ अपनी चेतना के केंद्र में। समस्त विश्व का आधार मैं हूँ। ये तो वेदांत भी बोलता है।

पर वो थोड़ी बोलता है कि जो कुछ तुम्हारे लिए है, तुम उसको खा जाओ। ये किसने अर्थ निकाल दिया कि हाथी तुम्हारे लिए है, माने तुम हाथी को खा जाओ? ये कौनसा विकृत अर्थ है?

प्र: उल्टा, वो मेरे लिए है, तो उस वजह से मेरी ज़िम्मेदारी और बढ़ती है।

आचार्य: क्या बात कही है आपने! बहुत बढ़िया! सुन्दर बात। बहुत अच्छी बात। आप अपने बेटे को ले जा करके एक मोबाइल फ़ोन दे देंगे, कहेंगे, 'तुम्हारे लिए है।' तो दो तरफ़ा ज़िम्मेदारी आ गयी। पहली बात तो वो चीज़ अपनेआप में कुछ मूल्य रखती है। दूसरी बात, प्रेमपूर्वक पिता ने दी है, तो मुझे उसको और अच्छे से रखना है।

अगर क़ुरान कहती है कि वो ऊपर जो हमारा बाप बैठा है, उसने ये सब आपके लिए दिया है। तब तो आप उसके कस्टोडियन (धारक) और गार्जियन (संरक्षक) हो गएँ न? आपको उसका ख़याल रखना है, या खा जाओगे? खाने के लिए थोड़े ही है।

प्र: तो मैंने सुना है आपके विडियोज़ में, लेकिन मैं स्पेसिफ़िकली (विशिष्टतया) पूछना चाहता हूँ। आपका संदेश, जो वीगन एक्टिविस्ट (शुद्ध शाकाहारी कार्यकर्ता) हैं इण्डिया में, जो वीगन का प्रचार करना चाहते हैं; उनको आपका एक स्पेसिफ़िक (विशेष) संदेश कि इण्डिया में कैसे करना चाहिए, उनको एक्टिविज़्म (सक्रियतावाद)? वो फॉरेन (विदेश) को कॉपी (नकल) करेंगे, तो नहीं चलेगा।

आचार्य: एकदम नहीं चलेगा। मुझे ही पसंद नहीं आते।

प्र: बहुत से लोग बस बाहर वालों की ही सुनते हैं। पर उनके मेरे ख़याल से कल्चर (संस्कृति) अलग है।

आचार्य: देखिए, कोई वजह रही है न! आपसे पूछ रहा हूँ कि दुनिया भर में कुल मिला करके जितने लोग शाकाहारी नहीं हैं, उससे ज़्यादा शाकाहारी आज भी भारत में हैं। वीगनिज़्म हटाइए, अगर शाकाहारियों की भी गिनती करें तो दुनिया भर में कुल जितने शाकाहारी हैं, सिर्फ़ भारत में उससे ज़्यादा शाकाहारी हैं।

ऐसा क्यों हुआ है? वजह? यहाँ पर कोई वेजिटेरियन मूवमेंट (शाकाहारी आंदोलन) चला था?

प्र: नहीं।

आचार्य: यहाँ क्या था? भारत में लोग शाकाहारी क्यों हैं?

प्र: क्योंकि यहाँ पर अलग-अलग मान्यताएँ हैं, अहिंसा के।

आचार्य: भारत के बाहर भी हैं मान्यताएँ।

प्र: मेरे ख़याल से भारतवर्ष में ही ऐसा एक अलग विचार है कि हर चीज़ में ऊपरवाले का प्राण है।

आचार्य: प्राण है। ठीक है? तो वही दर्शन जिसने भारत को इतनी शताब्दियों तक शाकाहारी रखा और पशुओं के प्रति ज़रा प्रेमपूर्ण रखा; वही आगे भी भारत को पशुओं के साथ सही सम्बन्ध में रखेगा।

अगर हम ये नहीं समझ पा रहे कि भारत वेजिटेरियन क्यों रहा, तो फिर हम ये कभी नहीं कर पाएँगे कि भारत वीगन हो जाए। जिस वजह से भारत शाकाहारी रहा, उसी वजह से भारत शुद्ध शाकाहारी भी बनेगा। और वजह है अध्यात्म। वो वजह अध्यात्म है।

तो जब तक अध्यात्म में गहराई नहीं आती, तब तक आप ये तो छोड़िए कि लोग वीगन होंगे, वेजिटेरियनिज़्म भी सिकुड़ रहा है भारत में बहुत तेज़ी से। और वेजिटेरियनिज़्म का सिकुड़ना और धर्म का पतन बिलकुल साथ-साथ चल रहे हैं, क्योंकि भारत में शाकाहार था ही धर्म की बदौलत। धर्म ने ही भारत को शाकाहारी रखा था। जैसे-जैसे धार्मिक चेतना का पतन हो रहा है, वैसे-वैसे शाकाहार भी गिर रहा है।

भारत में अब शाकाहारी तीस प्रतिशत से भी कम बचे हैं। आज़ादी के समय शाकाहारियों का अनुपात पचास प्रतिशत से ज़्यादा हुआ करता था और ये जो गिरावट आयी है, ख़ास तौर पर पिछले बीस-तीस सालों में आयी है। ये जो नयी पीढ़ी है, इसमें अनुमान है कि शाकाहारियों का प्रतिशत पंद्रह से भी कम है और जो शाकाहारी हैं भी इस नयी पीढ़ी में, उसमें अधिकांश धार्मिक और पारंपरिक कारणों से हैं, समझते कुछ नहीं।

तो जैसे-जैसे धार्मिक चेतना गिरेगी, द स्प्रिचुअल कॉन्सियसनेस (आध्यात्मिक चेतना), वैसे-वैसे शाकाहार भी गिरता जाएगा। वीगनिज़्म की तो कोई बात ही नहीं है। वीगनिज़्म किस गिनती में आता है! वीगनिज़्म की कोई बात ही नहीं है। आपने ख़ुद कहा कि भारत में वीगनिज़्म को कोई विशेष सफ़लता नहीं मिली है। दुनिया भर में नहीं मिल रही है। उसकी वजह वही है कि आप वीगनिज़्म को कैपिटलिज़्म (पूँजीवाद), कम्युनिज़्म (साम्यवाद) की तरह ही एक आइडियोलॉजी बना रहे हो, एक विचारधारा बना रहे हो; वो नहीं चलेगा। आपको उसको जीवनदर्शन बनाना होगा। आइडियोलॉजी नहीं, फिलोसॉफ़ी।

जब तक अहिंसा और सच्चाई और प्रेम आपके जीवन का आधार ही नहीं बनते, तब तक वीगनिज़्म के लिए कोई भविष्य नहीं है।

मुझे मालूम है, हमें सुनने वाले बहुत से लोग कहेंगे, "यह तो बड़ा लंबा-चौड़ा काम बता दिया आपने। अब क्या हम रिलीजियस क्रुसेडर्स (धार्मिक योद्धा) बन जाए? अब हम क्या धार्मिक मिशनरी (प्रचारक) बन जाए?" साहब, बनना पड़ेगा। नहीं तो 'वीगन-वीगन' नारा लगाते रहो, कुछ होगा नहीं। बस ये होगा कि फैंसी कैफ़े (मनमोहक जलपानगृह) खुल जाएँगे, जिसमें सात सौ रुपये का पिज़्ज़ा मिलेगा, वीगन पिज़्ज़ा।

वीगनिज़्म का भारत में अधिकांशत: यही उपयोग हो रहा है कि वीगन होना भी एक कल्ट (संप्रदाय) की बात हो गयी है। बहुत महँगा कल्ट। वो चलता रहेगा। आप अपनेआप को बहुत फ़क्र के साथ कह पाओगे, 'मैं वीगन हूँ, मैं ये हूँ, वो हूँ।' कुछ टीशर्ट-वीशर्ट पहन लोगे, कुछ कैंडललाइट विजल (मोमबत्ती जलाकर प्रदर्शन यात्रा) कर दोगे और ये सब चलता रहेगा। उससे कुछ होना-हवाना है नहीं।

तो आपको वास्तव में अगर वीगनिज़्म आगे बढ़ाना है, तो आपको उसी चेतना को मज़बूती देनी होगी, जिसने भारत को शाकाहारी रखा। लेकिन बहुत अजीब बात है कि भारत के अधिकांश जो वीगन हैं, उन्हें धर्म से नफ़रत है। और अगर आपको धर्म से नफ़रत है तो आप लोगों को कैसे वीगन बना लोगे? कर ही नहीं पाओगे, कर लो! वीगन होना ही धर्म की बात है।

प्र: बहुत सही। अगर आप धर्म का अर्थ सच में जानते हो, तो आप वीगन अपनेआप से बन जाओगे। क्योंकि वो धर्म है।

आचार्य: वो अभी आप-हम बात कर रहे हैं, आप समझ रहे हो इस बात को। लेकिन जो लोग इस बात को ठीक से नहीं सुन रहे होंगे, वो कह रहे होंगे, " सो, कान्ट बी आई एन एथीस्ट एण्ड स्टिल बी वीगन? (तो क्या मैं नास्तिक होते हुए भी शुद्ध शाकाहारी नहीं हो सकता?)" और इस तरह की बातें अभी उठ रही होंगी।

उनको मैं यही बोलूँगा—बेटा, दोबारा सुन लो वीडियो।

प्र: तो जो लोग चाहते हैं कि पशुओं पर क्रूरता न हो, शोषण न हो, इण्डिया में; उनको जो यहाँ की सोच है, जो यहाँ की सभ्यता है, जिसमें धर्म बहुत बड़ा हिस्सा है, उसके साथ ही चलना होगा। उसके साथ जुड़ना होगा।

आचार्य: मैं ये नहीं कह रहा हूँ; उसके साथ चलना होगा। मैं नहीं कह रहा हूँ, आप अपनेआप को किसी धार्मिक परंपरा के साथ अलाइन (पंक्तिबद्ध) करें। आप नहीं समझ रहे हैं बात को। मैं कह रहा हूँ, उस धार्मिकता का आपमें प्रस्फुटन होना चाहिए।

मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि आप भी मानना शुरू कर दें कि मैं हिन्दुइज़्म (हिन्दुत्व) को अब और ज़्यादा मानता हूँ, क्योंकि इससे वीगनिज़्म आगे बढ़ेगा। रिलीजन इज़ नॉट अ मीन्स टू सम अदर एन्ड, रिलीजन इस द एन्ड (धर्म किसी अन्य लक्ष्य तक पहुँचने का साधन नहीं है, धर्म ही लक्ष्य है)। तो धार्मिकता यदि है, तो वीगनिज़्म अपनेआप होगा। मैं उसको एक उपकरण की तरह इस्तेमाल करने की बात नहीं कर रहा हूँ, माध्यम की तरह नहीं है।

प्र: और धार्मिकता को इंग्लिश में क्या कहेंगे?

आचार्य: मैं जिस धार्मिकता की बात कर रहा हूँ, वो अध्यात्म है। मैं ऑर्गेनाइज्ड रिलीजन (संगठित धर्म) की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं उस धार्मिकता की बात नहीं कर रहा हूँ, जिसमें जा करके दूध चढ़ाते हैं और बाल घुटाते हैं और पहाड़ों के चक्कर काटते हैं या कि कुर्बानियाँ देते हैं जानवरों की; मैं उस धार्मिकता की बात नहीं कर रहा हूँ।

वीगन वालों को ये भी बड़ा रहता है कि देखो धर्म में तो जानवरों पर अत्याचार होता है। वो धर्म है ही नहीं। वो आपकी अपनी पारंपरिक प्रथाएँ हैं। सोशल कस्टम्स (सामाजिक परंपराओं) को धर्म नहीं बोलते। ठीक है?

जिसको आप सनातन धर्म कहते हैं, उसका केंद्र वेदांत है। मुझे बताइए, वेदांत कोई और बात करता है क्या, मन और मन की शुद्धि के अलावा? वेदांत को मतलब ही नहीं इन सब चीज़ों से कि तुम कौनसी प्रथा-परंपरा चला रहे हो, कहीं दूध खिला रहे हो, कहीं खीर चटा रहे हो, कहीं बलि दे रहे हो, कहीं कुछ कर रहे हो। वेदांत को इन सब से क्या मतलब! और वेदांत ही वास्तविक सनातन धर्म है।

तो मैं जब धार्मिकता कह रहा हूँ, तो कोई ग़लत न समझ ले। धार्मिकता से मेरा मतलब बिलकुल भी ये नहीं है कि हिन्दू-मुस्लिम दंगे और ये सब जो धर्मों के नाम पर होता है। मैं उसकी बात नहीं कर रहा हूँ कि फ़लाने दिन व्रत रखना है, फ़लाना उपवास, फ़लानी माला पहननी है। मैं उस धार्मिकता की बात नहीं कर रहा हूँ। कि करवा-चौथ में चाँद देखना है। मैं वो वाली धार्मिकता की नहीं बात कर रहा हूँ।

प्र: नहीं, मैं समझा। आई वान्टेड क्लैरिटी। (मैं स्पष्टता चाहता था)

आचार्य: नहीं, बिलकुल ठीक। बिलकुल ठीक किया आपने। क्योंकि जैसे ही धर्म बोलो, तो लोगों के कान खड़े हो जाते हैं। उनको लगता है, ये उस वाले धर्म की बात हो रही है जिसमें महिलाओं का दमन होता है, जिसमें जातिप्रथा आती है, जिसमें दलितों पर अत्याचार होता है।

वेदांत आपको शरीर ही नहीं मानता, वो आपको 'जात' ही नहीं मानता, आपकी जाति कहाँ से आ जाएगी? 'जात' माने जिसने जन्म लिया हो। कहता है, आपकी सच्चाई कुछ और है। जो जन्म से आपको मिला है, ये तो अभी ख़त्म हो जाता है। तो जाति कहाँ से आ गयी?

उपनिषद् हैं, पूरे-के-पूरे उपनिषद्। जो पूरा उपनिषद् सिर्फ़ इसलिए है ताकि वो बता सके कि जाति कितना बड़ा झूठ है। तो मैं उस धर्म की बात कर रहा हूँ।

मैं ये सामाजिक कुप्रथाओं वाले धर्म की बात नहीं कर रहा।

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