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अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं राजस्थान से हूँ। राजस्थान भारत के उन राज्यों में से है जो लिंगानुपात की दृष्टि से पिछड़े हुए राज्य हैं। मेरा प्रश्न ये है कि आज के समाज में भी जब परिवार में बिटिया का जन्म होता है तो एक असंतोष का माहौल बनता है, निराशा छा जाती है, बड़े दुःख का माहौल रहता है, और जब बेटे का जन्म होता है तो सोशल मीडिया पर डालते हैं और बधाईयाँ देते हैं। ऐसे कई तरह के आशीर्वाद भी चले आ रहे हैं, जैसे दूधो नहाओ, पूतो फलो। क्या परिवार में बेटे का होना ज़रूरी है? क्या बेटियाँ इसकी पूर्ति नहीं कर सकतीं? आप इस पर कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: देखो, इसका सम्बन्ध संस्कृति से है। भारत की विडंबना ये रही है कि यहाँ अध्यात्म और संस्कृति के बीच बहुत कम सम्बन्ध रहा है, ग़ौर से समझिएगा, बहुत–बहुत कम सम्बन्ध रहा है। जिसको आप भारतीय धर्म कहते हैं, वो भारतीय अध्यात्म से काफ़ी दूरी रखता है, और जिसको आप भारतीय संस्कृति कहते हो, वो भारतीय धर्म से काफ़ी दूरी रखता है। अध्यात्म का स्तर अगर बहुत ऊँचा है – वो अध्यात्म जो आपको वेदान्त, उपनिषदों में, गीता में, ब्रहसूत्र में, अष्टावक्र गीता में, कबीर साहब की वाणी में सुनने को मिलता है – अध्यात्म का स्तर बहुत अगर ऊँचा है (हाथ को ऊँचा उठाते हुए) तो ये (हाथ को पहले से नीचे लाकर) भारतीय धर्म है जिसका हम सक्रिय अभ्यास करते हैं, जिसको हम जीते हैं अपने दैनिक जीवन में। वो भारतीय धर्म अध्यात्म से बहुत निचले स्तर का है।

हम दिनों–दिन जिस चीज़ को धर्म बोल करके कार्यान्वित करते हैं, उसका अध्यात्म से बहुत कम ताल्लुक है, वो अध्यात्म से बहुत नीचे का है। और फिर हम जिसको अपनी संस्कृति कहते हैं, वो धर्म से भी नीचे की है। उसका तो धर्म से भी कोई सम्बन्ध नहीं है। तो फिर बताइए अध्यात्म और संस्कृति में कोई सम्बन्ध है? अरे! पूरब–पश्चिम वाली बात हो गई, ज़मीन–आसमान वाली बात हो गई।

लेकिन अगर आपने कभी इस मुद्दे पर विचार नहीं करा है तो आप इन तीनों को एक ही साँस में बोल जाते हैं। आप कभी कह देते हैं ‘भारतीय अध्यात्म’, कभी कह देते हैं ‘भारतीय धर्म’, कभी कह देते हैं ‘भारतीय दर्शन’, कभी कह देते हैं ‘भारतीय संस्कृति’, और आपको लगता है आप एक ही चीज़ की तो बात कर रहे हो। ये बहुत अलग-अलग हैं, बहुत-बहुत अलग-अलग हैं। हम भारतीय संस्कृति जिसको बोलते हैं, उसमें बहुत सारे तत्व बहुत ज़्यादा दूषित हैं। भारतीय अध्यात्म सर्वश्रेष्ठ है, सर्वोपरि है। शायद उससे ऊँचा कभी कुछ ना हुआ है ना हो सकता है, लेकिन भारतीय संस्कृति बिलकुल रसातल में है और उसके बहुत सारे तत्व एकदम दूषित हैं, एकदम पतित हैं।

कुछ उदाहरण देता हूँ – जैसे जातिप्रथा है, जाति-प्रथा का अध्यात्म से कोई सम्बन्ध नहीं, अध्यात्म जाति-प्रथा को पूरी तरह से वर्जित करता है, एकदम वर्जित है। धर्म में जाति-प्रथा को लेकर एक स्थान है, वहाँ वो वर्ण व्यवस्था की तरह मौजूद है। जाति की तरह नहीं, वर्ण की तरह मौजूद है। अध्यात्म वर्ण को भी मान्यता नहीं देता। अध्यात्म कहता है ‘वर्ण वगैरह कुछ नहीं, देह हमारी सच्चाई है ही नहीं तो हम देह की जाति या वर्ण की भी बात क्या करें। वर्ण भी कुछ नहीं होता।‘ तो अध्यात्म में कुछ नहीं होता, धर्म में वर्ण आ जाता है। और जब आम संस्कृति में आते हो तो वहाँ तो सौ प्रकार की जातियाँ, उपजातियाँ और ना जाने क्या-क्या आ जाता है; एक से बढ़कर एक गंदगियाँ – जिसमें हज़ार तरीके के शोषण हैं, बेवकूफ़ियाँ हैं।

उसमें ये तो हुआ ही है कि तथाकथित ऊँची जातियों ने तथाकथित निचली जातियों का शोषण किया है। अभी मैं पढ़ रहा था, एक-आध हफ्ते पहले, कि कुछ दलित लोगों ने अपने ही समुदाय की एक लड़की की हत्या कर दी क्योंकि वो एक ब्राह्मण लड़के से विवाह कर चुकी थी। इस हद तक ये जाति व्यवस्था गहरी बैठ चुकी है। इसने सबको जकड़ लिया है। और जकड़ लिया तो जकड़ लिया, ख़तरनाक बात ये है कि हम सोचते हैं कि इस जाति व्यवस्था का, माने इस संस्कृति का अध्यात्म से कोई ताल्लुक है।

देखिए, धर्म के केंद्र में अध्यात्म होता है। धर्म होता ही इसलिए है ताकि आप आध्यात्मिक हो जाएँ। धर्म इसलिए नहीं होता कि आप रीति-रिवाज़ चलाते रहें। धर्म इसलिए नहीं होता कि आप तमाम तरह की मान्यताओं और रवायतों में यकीन करते रहें। धर्म इसलिए होता है ताकि आप आध्यात्मिक हो सकें। और माहौल धार्मिक बना रहे, इसके लिए एक लोक-संस्कृति बनाई जाती है। ये बात समझ में आ रही है?

मानव चेतना जहाँ पहुँचना चाहती है, उसके लिए क्या चाहिए? अध्यात्म। चेतना को ऊपर उठाने को अध्यात्म कहते हैं, ठीक, ये स्पष्ट है? चेतना को ऊपर उठाने के लिए जिस व्यवस्था की ज़रूरत होती है, मन को जो ख़ुराक देनी पड़ती है, उस व्यवस्था को, उस आयोजित कार्यक्रम को धर्म कहते हैं। और सामाजिक स्तर पर एक व्यापक तौर पर धर्म को प्रतिष्ठित करने के लिए लोगों के मन को जो आकार देना होता है, उसको संस्कृति कहते हैं। मन को संस्कारित करना पड़ता है ताकि धर्म आगे बढ़े, जब धर्म आगे बढ़ेगा तब अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति होगी, जो है अध्यात्म। तो संस्कृति कितनी ठीक है और कितनी नहीं, इसका निर्णय बस एक बात से हो सकता है कि वो संस्कृति आपको आध्यात्मिक बनाती है या नहीं बनाती है। और वो जो संस्कृति है आपकी, वो आध्यात्मिक सिद्धांतों से मेल खाती है या नहीं खाती है।

मैं कह रहा हूँ भारत के साथ त्रासदी हो गई है। जिसको आप भारतीय संस्कृति या सनातन संस्कृति कहते हो, वो आध्यात्मिक सिद्धांतों से बिलकुल मेल नहीं खाती, लेकिन फिर भी हम उसी संस्कृति को धर्मसम्मत समझ करके उसको आगे बढ़ाते रहते हैं। इतना ही नहीं, हम बार–बार कहते हैं ‘सनातन संस्कृति, सनातन संस्कृति’। संस्कृति थोड़े ही सनातन होती है! संस्कृति नहीं सनातन होती। संस्कृतियाँ तो बनाई जाती हैं और संस्कृतियाँ हटाई भी जाती हैं। संस्कृति समय सापेक्ष होती है। समय के अनुसार उसको बदलना होता है।

जो चीज़ समय के साथ नहीं बदल सकती, वो बस एक है – मन की आत्मा से एक हो जाने की चाह।

जब तक समय रहेगा तब तक मन में वो चाह रहेगी। बस वो एक मात्र चीज़ है जो सनातन होती है। तो सनातन धर्म फिर क्या हुआ? सनातन धर्म वो है जो मन को उसके द्वारा लक्षित आत्मा तक पहुँचा दे, उसको सनातन धर्म बोलते हैं। बाकि ये सब जो हम कूड़ा-कचरा करते रहते हैं इधर-उधर का, ये रवायत, वो कांड, ये अंधविश्वास, वो फूहड़ता, उसे धर्म नहीं कहते।

मन को आत्मा तक ले जाना – ये धर्म है। और मन आत्मा तक जाए इसके लिए एक अच्छा माहौल बना रहे, उसको कहते हैं सामाजिक संस्कृति।

अब जिस संस्कृति में जाति-प्रथा चलती हो, और सिर्फ़ चलती ही ना हो, जहाँ लोग सोचते हों कि जाति-प्रथा तो धर्म का हिस्सा है, सोचिए वो संस्कृति कैसी होगी? उस संस्कृति में कोई आध्यात्मिक तत्व है ही नहीं, लेकिन फिर भी हम उस संस्कृति को बचाने पर तुले हुए हैं। इतना ही नहीं, आजकल राजनैतिक माहौल भी ऐसा बन गया है जिसमें संस्कृति को ही प्रधानता दी जा रही है। कह रहे हैं, 'सनातन संस्कृति को आगे बढ़ाना है, हिन्दू संस्कृति ज़िंदाबाद।' उस संस्कृति को बदलने की ज़रूरत है, बढ़ाने की नहीं।

अब समझिए ये जो बात इन्होंने कही कि लड़कों को प्रधानता दी जा रही है, लड़कियों की भ्रूण हत्या की जा रही है, वो सब क्या है? वो संस्कृति के दूषित और विकृत तत्व हैं, उनका धर्म से कोई ताल्लुक नहीं और उनका अगर आप ताल्लुक जानना चाहते हैं किससे है, तो वो है विवाह की प्रथा से। आम आदमी कोई बहुत आध्यात्मिक तो होता नहीं। तुमने एक प्रथा बना दी है जिसमें तुम्हें अपनी लड़की को अठारह साल, पच्चीस साल, तीस साल खिलाना है, पिलाना है, पैसे खर्च करने हैं, बड़ा करना है, और फिर उसे कहीं और जा करके अपना घर जमाना है। तो तुम कितने खुश हो जाओगे उसके जन्म लेने पर? बस बात इतनी-सी है। माँ-बाप को पता हो कि ये जो लड़की पैदा हुई है, ये हमारे काम आएगी तो कोई नहीं करेगा भ्रूण हत्या, ख़तम बात!

अस्पतालों में जो नर्स आपकी सेवा करती है, आप उसके प्रति रोष से और क्षोभ से भरे होते हो? या बार-बार कहते हो ‘सिस्टर ये, सिस्टर वो, सिस्टर ये दे देना, सिस्टर बहुत अच्छी हैं’? बोलो, जल्दी बोलो! जो महिला आपके काम आती है, उसका तो आप सम्मान ही करते हो न। स्कूल में आपकी शिक्षिका थीं, उनको आप हीन मानते थे क्या? ख़ासतौर पर प्राथमिक विद्यालयों में ज़्यादातर महिलाएँ ही शिक्षण कार्य करतीं हैं। उनको आपने किस दृष्टी से देखा था, अपनी टीचर को? कैसे देखा था? आपको पता था आपके काम आ रहीं हैं, आपको सिखा रहीं हैं, आपको सिखा रहीं हैं तो आप उनको सम्मान देते थे।

चिकित्सा के पेशे में डॉक्टर्स बहुत सारी महिलाएँ होती हैं, उनके सामने अदब से बैठते हो कि नहीं बैठते हो? आप एक लेडी डॉक्टर के केबिन में जा रहे हो, वहाँ जाकर ऐसे कहते हो कि ‘ये तो एक बस यूँही अदनी-सी नामाकूल महिला है’? वो बोलेगी ‘लेट जाओ’, तुरंत लेट जाओगे, अभी एकदम खट से लेटोगे और सर्जन है तो पेट फाड़ देगी और फड़वा भी लोगे। तब लिंग भेद कहाँ चला जाता है?

तो लिंग भेद कुछ नहीं होता; बात सारी स्वार्थ की है। ऐसा नहीं है कि हम एक लिंग को नीचे और दूसरे को ऊपर समझते हैं। जहाँ कोई लिंग काम आ रहा होता है वहाँ हम उसके सामने हाथ जोड़ लेते हैं। इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थीं, तुम उनके साथ बेअदबी कर सकते थे क्या? कर सकते थे? कांग्रेस में आज भी हाई कमान का चलता है, भले ही उनके पास कोई औपचारिक पद हो या ना हो। हाई कमान का चल रहा है तो चल रहा है, मजाल है किसी की! वहाँ पत्ता भी खड़क सकता है बिना उनकी मर्ज़ी के? वो महिला ही तो हैं।

तो बात इसकी नहीं है कि हमें ऐसा लगता है कि महिलाएँ नीची होतीं हैं, बात सारी आर्थिक है, बात स्वार्थों की है। जो बच्चा तुम्हारी प्रथा ने तय कर दिया है कि तुम्हारे घर से निकल जाएगा, तुम उस बच्चे पर ज़्यादा ध्यान क्यों दोगे, मुझे बता दो? बताओ न! उसको तो निकलना है, निकलना ही नहीं है उसे बहुत सारा पैसा लेकर निकलना है। एक तो पैदा हो गई निकलने के लिए, ऊपर से जितनी मेरी संचित जमापूँजी थी, लेकर निकलेगी, तुम्हें कितनी ख़ुशी हो जाएगी? साधु-संत तो होता नहीं आम-आदमी, आम-आदमी तो अपने स्वार्थ देखता है। एक तो लड़की पैदा हुई – वो भी हो सकता है घर की दूसरी-तीसरी लड़की हो – वो (बाप) माथा पकड़ लेता है, कहता है, ‘लुट गया’।

उसे लड़की से कोई समस्या नहीं है। समस्या तो छोड़ दो, प्राकृतिक तौर पर पिताओं का पुत्रियों के प्रति ज़्यादा स्नेह होता है। अगर आर्थिक अड़चन ना हो तो लड़की बाप को बहुत प्यारी होती है, लेकिन आर्थिक अड़चन बहुत बड़ी खड़ी कर दी है हमारी संस्कृति ने, बहुत बड़ी। पराया धन है, शादी करके इसको भेज देना है इत्यादि–इत्यादि। इतनी बड़ी अड़चन खड़ी कर दी कि फिर बाप अपना सारा स्नेह भूल जाता है, फिर कहता है, ‘गर्भपात’। माँ भी ये ही कहती है, ‘गर्भपात’। माँ का उसमें क्या कम योगदान होता है? समझ में आ रही है बात?

ये जो संस्कृति है न हमारी, इसको बहुत बदलाव की ज़रूरत है। बार-बार ये मत सोच लिया करो कि ‘अरे! ये तो धर्म से आ रही है’, नहीं आ रही। धर्म क्या है, धर्म का मर्म क्या है, वो उपनिषदों में मिलेगा। आप जिस संस्कृति का पालन कर रहे हो, उसको धर्म मत मान लिया करो। 'घूँघट तो डालना होता है न, हमारे धर्म की बात है' – घूँघट का धर्म से क्या सम्बन्ध है भाई! ये क्या है? मासिक-धर्म के समय में महिलाएँ खाना नहीं बनाएँगी, कमरे से नहीं निकलेंगी, मंदिर नहीं जा सकतीं, क्यों? 'ये तो हमारे धर्म की बात है न।' ये कौनसा धर्मशास्त्र है जो इन बातों में घुसता है? शास्त्र किसको बोलते हैं, अच्छे से समझ लीजिए – जो मन की, अहम् की, वृत्तियों की और आत्मा की बात करे बस उसको शास्त्र बोलते हैं। जो इधर-उधर की बातें करे, उसको शास्त्र नहीं बोलते। सिर्फ़ इसलिए कि कोई ग्रंथ संस्कृत में है, उसको शास्त्र मत कह दीजिएगा।

हिन्दुओं का इतना बड़ा अभाग है कि उन्हें आज तक ये ही नहीं पता कि शास्त्र बोलते किसको हैं। उन्हें कोई भी चीज़ थमा दी जाती है, उनको लगता है कि ये शास्त्र है। अरे! वो कोई किताब है, कोई पुस्तक है, वो शास्त्र नहीं हो गई।

शास्त्र किसको कहते हैं, परिभाषा क्या है, दोहराइए – जहाँ मन, अहम्, वृत्तियों, प्रकृति, पुरुष, आत्मा की बात हो बस उसको शास्त्र कहते हैं।

इधर-उधर की तमाम फ़िज़ूल मिसलेनियस (विविध प्रकार की) बातों को शास्त्र नहीं कहते, और जहाँ इधर-उधर की सौ बातें आपको पढ़ने को मिल जाएँ, कल्पनाएँ, कहानियाँ, फिर फ़लानी परी उतरी फिर फ़लाने फ़रिश्ते ने ऐसा कहा, फिर वो गंधर्व आ गया, फिर राजा ने ऐसा कर दिया तो ऋषि ने उसको श्राप दे दिया – ये सब शास्त्र नहीं होते बाबा! इनको आप रोचक कहानियों की तरह पढ़ सकते हो, इनको शास्त्र मत बोल देना, कहानियाँ हैं, ठीक, कहानियाँ हैं। उन कहानियों में हो सकता है कुछ रस भी हो, हो सकता है उन कहानियों से कुछ सीख भी ली जा सकती हो, बिलकुल हो सकता है। लेकिन फिर भी वो सब शास्त्र नहीं हो गए। वहाँ जो कुछ लिखा है, ये मत कहने लग जाना कि यही तो मेरा धर्म है। और घूँघट डाल कर घूमना है, ये तो किसी पुस्तक तक में नहीं लिखा है, शास्त्र छोड़ दो।

अपना घर छोड़ करके कहीं और जा करके रहना है, ये कौनसे उपनिषद् में कहाँ लिखा हुआ है, बताओ मुझे? ये परम्परा हो सकती है, तो परम्परा धर्म हो गई क्या? परम्परा का क्या मतलब है? परम्परा माने हमने करा, क्यों? क्योंकि हमारे पिताजी ने करा। उन्होंने क्यों करा? क्योंकि उनके पिताजी ने करा। उन्होंने क्यों करा? उनके पिताजी ने करा। आप सब मिलकर कुछ कर रहे हो तो वो धर्म हो गया? आप कुछ करे ही जा रहे हो हज़ारों सालों से, तो वो धर्म हो गया क्या? हाँ, वो लोक-संस्कृति हो गई। लोक-संस्कृति तो लोगों ने बनाई; जब बनाई थी तो बनाई थी अब दूसरी कर लो बाबा!

नित्य तत्व तो एक ही है न, उसको आत्मा बोलते हैं, उसी को परमात्मा बोलते हैं। नित्य माने जो बदला नहीं जा सकता। जो बदला नहीं जा सकता वो एक है, बाकि सब बदला जा सकता है, और बदला जाना चाहिए। तुमने उस एक नित्य सत्य के अलावा अगर किसी को बदलने से इंकार कर दिया तो तुमने उसको किसका स्थान दे दिया? – सत्य एक है, ठीक? और वही है जो अपरिवर्तनीय है, वो बदल नहीं सकता, ठीक? अब मैं कहूँ कि मैं इसको नहीं बदलूँगा (गिलास दिखाते हुए) तो मैंने इसको किसका दर्जा दे दिया?

श्रोतागण : सत्य का।

आचार्य: ग़लत कर दिया न। तो मुझे इसको बदलना चाहिए (गिलास हाथ में लेकर दिखाते हुए)। इसी तरीके से संस्कृति सत्य नहीं होती, उसे समय-समय पर बदलना चाहिए, और बदलती तो रहती है भाई, कौन कहता है नहीं बदलती?

आप ऐसी ही संस्कृति में चल रहे हो जैसी पचास साल पहले थी? जो आज संस्कृति के बड़े पुरोधा और पैरोकार बनकर घूम रहे हैं, और नारे लगाते है, वो भी क्या उसी संस्कृति का पालन कर रहे हैं जो पचास-सौ साल पहले चलती थी? जल्दी बोलो। तो संस्कृति तो बदल ही रही है। जब बदल ही रही है तो उसे ढंग से ही बदल डालो न। किसी समय पर तो सती-प्रथा भी आपकी संस्कृति का अंग होती थी, होती थी कि नहीं होती थी?

(व्यंग करते हुए) तो भई, संस्कृति तो बदलनी ही नहीं चाहिए, चलो सतीप्रथा भी रखते हैं, रखते हैं सतीप्रथा, हाउ एक्साइटिंग (कितना रोमांचक)! संस्कृति तो बदलनी ही नहीं चाहिए और संस्कृति में तो फिर सब कुछ आता है – खान-पान, पहनना-ओढ़ना इत्यादि। ये मोमोज़ और मंचूरियन कहाँ से आ गए? ये जितने संस्कृतिवादी हैं, मैं इनसे बात कर रहा हूँ। ये तुमने नाचोज़ मुँह में डाले कैसे, बाहर निकाल! चिप्स लेकर घूम रहा है, संस्कृति कहाँ गई तेरी? भारतीय संस्कृति में चिप्स कब थे बताइए? कौनसे ऋषि ने, देवता ने, गंधर्व ने, किन्नर ने, यक्ष ने चिप्स का पान करा था, बोलो? करा था किसी ने? तो तूने चिप्स कैसे खाए? इसका चिप्स छीनो अभी!

इनको चायनीज़ भी खाना है, इनको मेक्सिकन भी खाना है, लेकिन जहाँ मौका मिले नारा बहुत ज़ोर से लगाना है, ‘भारतीय संस्कृति!’ और ये क्या कॉलरधारी बनकर घूम रहे हो, जे क्या होता है (अपना कॉलर दिखाते हुए) और तुम कुर्ता-पजामा मत पहन लेना, कुर्ता-पजामा भी मुसलमान ले करके आए थे। तुमको तो वही करना है न जो आदिकाल से होता आ रहा है तो आदिकाल में क्या पहना जाता था? – लंगोट। भई संस्कृति पर चलना है! ये क्या तुम ये नीचे ट्रॉउज़र कस करके आ गए हो जी? हमारे देवता, अवतार, ये सब थोड़े ही धारण करते थे।

लेकिन जिन्हें धर्म नहीं पता वो संस्कृति को पकड़ कर बैठ जाते हैं, और जिन्हें अध्यात्म नहीं पता वो धर्म को पकड़ कर बैठ जाते हैं। अच्छे से समझना, असली चीज़ क्या है? – अध्यात्म। जिन्हें अध्यात्म नहीं पता वो किसको पकड़ लेंगे? धर्म को। और जिनको धर्म भी नहीं पता वो किसको पकड़ लेंगे? संस्कृति को – यही हुआ है। भारत गहराई से एक अधार्मिक और अनआध्यात्मिक देश है, ये बहुत झूठी बात है कि इंडिया इज़ ए रिलीजिएस कंट्री (भारत एक धार्मिक देश है)। भारत गहराई से अधार्मिक है। हाँ, सांस्कृतिक हम ज़रूर हैं। ये कल्चर है जिसको हम पकड़े बैठे हैं, अब वो भी हट रहा है, अच्छे से हट रहा है, ज़बरदस्त तरीके से हट रहा है। उसका भी हम ऊपर-ऊपर बस पाखंड ही कर रहे हैं, हट तो वो भी रहा है, तो ले देकर हमारे पास कल्चर भी नहीं है। लेकिन एक बात तो तय है कि स्प्रिचुएलिटी , अध्यात्म और प्योर रिलिजन , शुद्ध धर्म, ये तो बिलकुल ही नहीं हैं हमारे पास।

ये ही सब चीज़ें हैं – फ़लाना टीका लगा दो, चंदन लगा दो, सर घुटा दो। मुंडन करा रहे थे, मैंने कहा, ‘काहे को?’ बोले, 'आप समझते नहीं, हमारी संस्कृति में जो कुछ है उसके बड़े साईंटिफ़िक यूज़ेज़ (वैज्ञानिक उपयोग) हैं, अंग्रेजी वाले बाबा ने बताया।' मैंने पूछा, 'क्या?' बोले, 'देखो, सर घुटा दोगे तो बाल नहीं रहेंगे।' मैंने कहा, 'ये तो मैंने सोचा ही नहीं था, कितनी गूढ़ बात आपने बोल दी, "अहम् ब्रह्मास्मी" के समतुल्य बात बोली है आपने। सर घुटा दोगे तो बाल नहीं रहेंगे, गज़ब! तो फिर आगे बताइए थोड़ा।' बोले, 'बाल नहीं रहेंगे तो गर्मी लगेगी।' मैंने कहा, 'हाँ।' बोले, 'इससे धैर्य विकसित होता है, तितिक्षा। तितीक्षा का क्या मतलब होता है? सुख-दुःख, भूख-प्यास और धूप-छाँव में एक सा रहना, तो उसके बाल इसीलिए हटाए जाते हैं ताकि उसमें तितीक्षा विकसित हो।' मैंने कहा, 'धन्य हो महाराज! बताया किसने?' बोले, 'वो हैं, उन्होंने बताया।'

वाह रे! यूँही बाल मुंडाने है तो मुंडा लो, कोई दिक्क़त नहीं है – रखने में भी कोई बड़ी बात नहीं है, मुंडाने में भी कोई बड़ी बात नहीं है – लेकिन उसका सम्बन्ध धर्म से जोड़कर मत देखो भाई, क्योंकि धर्म का इन चीज़ों से कोई लेनादेना नहीं है। नाक छिदा रहे हैं, कान छिदा रहे हैं, मंगल सूत्र, पचास तरीके की अंगूठियाँ, वो वास्तुशास्त्र, न्यूमोरोलोजी , ये वो – ये सबके-सब और जितने ज्योतिष वाले हैं जो बताते हैं, माइंड रीडर (मन पढ़ लेने वाले) घूम रहे हैं, देख कर बता देंगे कि माइंड में क्या चल रहा है, इनमें से आधे अपने-आप को आचार्य बोल रहे हैं।

मुझे कुछ ऐसी चिढ़-सी हो रही है, हटा ही दूँगा आचार्य अपने नाम से, हटाओ ये, रखना ही नहीं है। अच्छा-भला नाम है ‘प्रशान्त’, इतना ही रखूँगा, ये हो जाएगा, आप देखिएगा। जिसको देखो वही! क्या हैं वो, दुकान खोलकर सड़क किनारे बैठ गए हैं, वो वहाँ पर तोता रखे हुए हैं, वो आचार्य जी हैं, उनको ही आचार्य जी रहने दो फिर, मुझे नहीं होना है। तोता क्या करता है जानते हो?

श्रोतागण: भविष्य बताता है।

आचार्य: वो आचार्य जी हैं, और आप उन्हें बोल भी रहे हो। आचार्य मतलब होता है एक सम्मानीय शिक्षक जिससे कुछ सीखो। जो ज़िंदगी जीना, ज़िंदगी आचरित करना सिखाए उसको आचार्य कहते हैं। वो जो तोते वाला है, वो आपको ज़िंदगी आचरित करना सिखा रहा है? आचार्य हो गया वो? आचार्य हुए थे शंकर, आचार्य रामानंद, इनके नाम के आगे आचार्य जुड़ता है तो कुछ बात है। पर हमें नहीं पता, हमें सब कुछ धार्मिक लगता है। सबकुछ धार्मिक लगता है, कोई बस धोती वाला आ जाए, तिलक लगा रखा हो, और थोड़ी बहुत संस्कृत बोल दे तो कहना ही क्या, सब धर्म हो गया।

बेटियों को पढ़ाओ-लिखाओ, तुम्हारे काम आएँगी। प्रेम नहीं है तो कम-से-कम स्वार्थ को ही विवेकपूर्ण रखो। बेटियों से प्रेम के नाते उनको पोषण नहीं दे सकते तो अपने स्वार्थ के नाते ही उनका ख़्याल कर लो। स्वार्थ की पूर्ति भी बेटियों से ज़्यादा अच्छे से हो जाएगी क्योंकि प्राकृतिक तौर पर महिलाओं में मोह थोड़ा ज़्यादा होता है। माता-पिता के प्रति भी मोह लड़की में थोड़ा ज़्यादा होता है। लड़का ऐसे ही होता है, वो उड़ जाएगा। तुमको लगता भर है कि घर में रहेगा, वंश का चिराग है, वगैरह-वगैरह, कुछ नहीं। वो घर में रहेगा खून पीएगा और तुम्हारी जायदाद लूटेगा। घर में रहता ही इसीलिए है, कहता है, ‘मेरा ही तो होने वाला है, बुढ़वा टरे जल्दी।’

लड़की सेवा कर देती है, वो ज़्यादा काम आती है। तो अपने स्वार्थ के लिए ही सही, लड़की की बेहतर देखभाल कर लो। समझ में आ रही है कुछ बात? लेकिन ये सब कुछ नहीं हो पाएगा जब तक लड़की क्या है? – पराया धन। अगर तय ही कर रखा है कि उसको घर से निकाल ही देना है, लात सी ही मारकर – लात ही तो मारते हो, और क्या करते हो? वो कितना भी कहती रहे कि ‘मुझे नहीं करनी शादी, मैं नहीं कहीं जाना चाहती’, उसको तो ज़बरदस्ती बाँधकर भगा देते हो घर से, 'निकल! अब तू कहीं और की गाय हो गई।' मत निकालो उसे घर से। और लड़कों से भी कह रहा हूँ, तुम्हें क्या शौक पड़ा है, घर छोटे-छोटे होते हैं, जगह होती नहीं, काहे को वहाँ पर एक लड़की लाकर रखनी है? बेकार में ठूसम-ठूस मचेगी। इससे अच्छा उसको उसके घर रहने दो, तुम अपने घर में रहो।

महीने में एक बार कहीं घूम आया करो, थोड़ा इन्द्रिय संयम भी बना रहेगा और प्रेम भी बचा रहेगा। रोज़-रोज़ एक दूसरे का मुँह देखते हो, फिर नोंचते हो, इससे कहीं बेहतर है वो अपने घर में रहे, तुम अपने घर में, कभी-कभार मिल लो शाम को। अच्छा लगेगा न, प्रेमियों की तरह मिलोगे, पति-पत्नी की तरह नहीं मिलोगे फिर। सोचो पति-पत्नी भी डेट पर जा रहे हैं, अच्छी बात है कि नहीं? पहले से तय कर लो, 'आज मिलें क्या? शाम को आ जाना, खाना-वाना खाते हैं।'

मज़ाक भर नहीं कर रहा हूँ, मज़ाक से थोड़ा आगे की बात है। और कुछ ऐसा भी नहीं है कि अलग-अलग शहरों में हैं तो कैसे मिलें। अब तो सुपर एक्सप्रेस वे है, तीन चार सौ किलो मीटर भी है तो भी दो चार घंटे में पहुँच जाओगे। ट्रेन ले लो, फ्लाइट ले लो, महीने में एक बार की बात है। नहीं तो दो महीने, थोड़ा ज़्यादा संयम बना रहेगा।

या कम-से-कम एक चक्रीय व्यवस्था रखो कि कुछ दिन तू मेरे यहाँ आकर रह ले, कुछ दिन मैं तेरे घर आकर रह लूँगा। तो कहेंगे, 'ऐसे थोड़े ही होता है, हमारी संस्कृति के खिलाफ़ है ये बात!' काहे भाई? उसके घर के पानी से टायफ़ाइड हो जाएगा तुमको, क्या समस्या है? 'घरजमाई थोड़े ही बनना होता है, अपमान की बात होती है, इज्ज़त कम हो जाती है।' इज्ज़त होगी अगर तुम्हारी तो कम नहीं होगी, इज्ज़त लायक नहीं हो तो फिर कम करने की ज़रूरत नहीं होगी।

बैंक अकाउंट अलग-अलग रखो ताकि लड़की को ये अधिकार रहे कि अपना पैसा अपने माँ-बाप के ऊपर भी खर्च कर सके, लेकिन उसके पहले कमाना पड़ेगा और लाला जी ये तय करके रखते हैं कि उनकी लड़की कमाने लायक कभी बने ही ना। जब उसको पढ़ाओगे नहीं, लिखाओगे नहीं तो वो कमाएगी कैसे? जब उसके दिमाग में बचपन से ठूस दोगे कि तुझे तो गाय बनना है, बछड़े जनने हैं, दूध देना है, तो काहे को कमाएगी? लड़की को इस लायक बनाओ कि वो कमाए, जब कमाएगी तो उसकी कमाई भई लाला जी तुम्हारे भी काम आएगी।

फिर भ्रूण हत्या की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, फिर लड़की के जन्म लेने पर शोक नहीं मनाओगे, और फिर लड़कियों का मानसिक स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। इसमें कोई शक नहीं है कि लड़कों की अपेक्षा आमतौर पर लड़कियों का मानसिक विकास भी ठीक से नहीं होता। उनमें असुरक्षा की भावना बहुत रहती है, जिस वजह से चिड़चिड़ी रहतीं हैं, हिंसक रहतीं हैं। जिसको आप मूड स्विंग बोलते हो, उनको अपने मन का कुछ पता ही नहीं होता, अंधविश्वासी ज़्यादा हो जातीं हैं, भावुक ज़्यादा हो जातीं हैं, उलटे-पुलटे निर्णय लेतीं हैं, और जब वो ऐसी हो जातीं हैं तो लोक-संस्कृति में ये मान्यता और पुख़्ता हो जाती कि लड़कियाँ तो होती ही बेकार हैं।

'देखो न कैसे कर रही है! फालतू में रो रही है, कभी हँसने लग जाती है, झींकती रहती है, बिना बात के लड़ती है, चिल्लाती है।' वो ऐसी इसलिए है क्योंकि तुमने उसे कभी सही शिक्षा और पोषण दिया ही नहीं। ना वो मन का कुछ जानती है, ना वो संसार का कुछ जानती है, तो फिर वो भावनाओं के आवेग में बहती रहती है। असुरक्षा की मारी हुई है, इसलिए उसमें ईर्ष्या इतनी ज़्यादा रहती है। ये सब देखते हो न, झगड़ालू होना, ईर्ष्यालू होना, बहुत ज़्यादा मोह और ममता के वशीभूत होना, ये सब आप पाते हो महिलाओं में।

जब आप देखते हो कि कोई महिला इस तरीके से निम्न कोटि का व्यवहार कर रही है तो आप कहते हो, ‘औरत है न, इसलिए ऐसा कर रही है।‘ वो औरत होने के नाते ऐसा नहीं कर रही है, वो इसलिए कर रही है क्योंकि तुमने उसे कभी ठीक से शिक्षित ही नहीं किया। और शिक्षा उतनी ही नहीं है जो स्कूल-कॉलेज में मिलती है, मानसिक शिक्षा दूसरी चीज़ होती है, वो माँ-बाप को देनी होती है गुरु बन करके।

गुरु हम लड़को को ही नहीं देते, लड़कियों को क्या देंगे! अभी हमने महिलाओं की ये हालत कर दी है कि पुरुषों का एक बड़ा पढ़ा-लिखा और लगभग समझदार वर्ग है जो इस निष्कर्ष पर पहुँचने लगा है कि किसी लड़की या महिला के सम्पर्क में आना माने ज़िंदगी ख़राब करना क्योंकि ये पज़ेसिव (मालिकाना) होतीं हैं, जेलस (ईर्ष्यालु) होतीं हैं, बात समझती नहीं, चीज़ों की गहराई में नहीं जातीं, सुपरफिशियली (सतही) जीती हैं, हर समय तुलना करती रहतीं हैं, असुरक्षित अनुभव करतीं हैं, इनसिक्योरिटी इनमें बहुत ज़्यादा होती हैं और उसकी वजह से फिर हिंसक हो जातीं हैं।

एक बहुत बड़ा तबका है पुरुषों का – " एम.जी.टाओ " का नाम सुना है, " एम.जी.टी.ओ.डब्ल्यू " सुना है? “मेन गोइंग देयर ओन वे”। एक छोटा-सा तबका है, पर ये मुहावरा प्रचलन में आ चुका है। वो कहते हैं, 'हमें इनसे कोई सम्बन्ध ही नहीं रखना, ये बहुत परेशान करतीं हैं, खोपड़ी खा जातीं हैं, ज़िंदगी नर्क कर देतीं हैं।' उसकी वजह क्या है? उसकी वजह हैं ये अभिभावक।

बार-बार बोलता हूँ मैं कि गर्भ से जन्म तो एक पशु का होता है, उस पशु को अगर तुम सही से परवरिश नहीं दोगे तो वो पशु ही रह जाएगा। परवरिश में श्रम लगता है, धन लगता है, ध्यान लगता है, प्रेम लगता है। ना तुम श्रम करना चाहते हो, ना धन खर्च करना चाहते हो, प्रेम तुम्हारे पास है नहीं, तो लड़की फिर सदा अर्धविकसित ही रह जाएगी और अर्धविकसित होने का मतलब होता है अर्धविक्षिप्त होना।

लड़की को पूरा विकास दे करके देखो। जिन्होंने जाना उन्होंने कहा है कि पुरुषों से विकास की श्रृंखला में थोड़ा-सा आगे ही होती है शायद स्त्री, पीछे नहीं होती। शायद ‘कर्मभूमि’ है जिसमें प्रेमचंद कहते हैं कि पुरुष जब आंतरिक विकास में आगे बढ़ने लगता है तब वो कुछ-कुछ स्त्री जैसा होने लगता है। तो स्त्री पीछे नहीं है पुरुष से, या तो बराबर की है या थोड़ा आगे की ही होगी।

लेकिन हमने उसको बहुत पीछे का कर डाला। ऐसा भी नहीं कि हम उसे बहुत पीछे का मानते हैं, हमने उसे वाकई बहुत पीछे का कर डाला है। और ये हमारी संस्कृति का कमाल है कि हमने बर्बाद ही कर दिया अपनी आधी जनसंख्या को। कहने को हम उसको देवी बोल करके पूजते हैं, ‘देवी है, माँ है’, ये सब पूजते रहते हैं, लेकिन उसको बर्बाद पूरा कर डाला है।

पूजने से नहीं होगा, पोषण दो। उसे पूजा नहीं पोषण चाहिए – शारीरिक, आर्थिक, मानसिक, आध्यात्मिक; उसे पोषण दो।

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