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आदिमानव ने तो खूब मज़े किये || पंचतंत्र पर (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
26 मिनट
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आचार्य प्रशांत: कल हम बात कर रहे थे कि प्रकृति से तो परमात्मा भी छेड़खानी नहीं करता, तुम्हारी छोटी-सी बुद्धि उससे क्या छेड़खानी कर लेगी! क्यों उसके साथ दाँव खेलते हो?

आपने शक्कर की बात करी है। दो बीमारियाँ, मधुमेह और ओबेसिटी (मोटापा) पिछले सौ साल की हैं, पहले भी होती थीं, लेकिन बहुत कम। ये दोनों कहाँ से आई हैं? दोनों ही शक्कर से आई हैं। आज से सौ साल पहले तक शक्कर पकवान की तरह होती थी। शक्कर नियमित रूप से इस्तेमाल ही नहीं होती थी: कोई ख़ास मौका है, कोई ख़ास बात है तो थोड़ी शक्कर डाली गई। फिर हुई दनादन गन्ने की खेती, और नतीजा अब सामने है।

हमारा जो मस्तिष्क ही है, वो और ज़्यादा, और ज़्यादा प्लेज़र सीकिंग (सुख अभिलाषी) होता जा रहा है। यहाँ तक कि अब मुश्किल है कि आप किसी को बिना शक्कर का खाना खिला दें, बड़ा मुश्किल है! और कामना बोध की दुश्मन होती है। प्लेज़र सीकिंग जिसका मन है, उसको कुछ समझ में नहीं आएगा, समझाया नहीं जा सकता। वो जानवर नहीं है, वो जानवर से बदतर है, क्योंकि जानवर में कामना होती है पर जानवर की कामना पर एक प्राकृतिक अंकुश लगा होता है। शरीर इच्छा करता है जानवर का और जानवर का शरीर ही उसकी इच्छा को एक लगाम भी देता है। आप जानवर को अनंत इच्छा करता नहीं पाएँगे। उसकी थोड़ी इच्छा होती है, उसके बाद नहीं।

शेर का पेट भरा है, आप नहीं पाएँगे कि वो व्यर्थ ही हिरणों को दौड़ा रहा है। शेर का पेट भरा है, उसके सामने से हिरणों का दल गुज़र जाएगा, वो हिलेगा भी नहीं। आदमी का मस्तिष्क एक बार कामनापूरित हो गया, कामनाकेन्द्रित हो गया, प्लेज़र सीकिंग हो गया, उसके बाद उसे कुछ भी समझा पाना बहुत मुश्किल है। तो ये है हमारी हालत।

आत्मा का अनुसंधान होना तो बहुत दूर रहा, हम जानवरों से भी नीचे गिर गए, हम प्रकृति से भी नीचे गिर गए। एक जानवर जिसे कोई चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं, एक जानवर जिसे कोई डायटीशियन (आहार विशेषज्ञ) उपलब्ध नहीं, एक जानवर जो कुछ नहीं जानता, प्रोटीन, विटामिन, मिनरल (खनिज), आपसे कहीं ज़्यादा स्वस्थ है। हाँ, बशर्ते वो आदमी का जानवर न हो। आदमी द्वारा पाला गया जानवर है तो फिर कुछ नहीं कह सकते।

हालत देख रहे हो, इसको पूरब में कहते हैं कि “चौबे जी छब्बे बनने चले थे, दूबे रह गए।” जानवर चला था बुद्धि के बल पर चैन की तलाश करने, आत्मा की तलाश करने, वो प्रकृति से भी नीचे गिर गया।

कौन-से जानवर को सोने के लिए नींद की गोली चाहिए? कौन-से जानवर को सिज़ेरियन डिलीवरी (शल्यक्रिया द्वारा प्रसव) चाहिए? ये बात आपको व्यग्र नहीं करती? इतनी मादाएँ हैं जंगल में और वहाँ बच्चे पैदा होते रहते हैं, कोई बड़ी बात नहीं। आदमी के यहाँ बच्चा पैदा होता है तो जैसे भूचाल, कितनी बड़ी बात!

और अगर आप आँकड़ों को देखेंगे तो प्राकृतिक प्रसव कम, और कम होते जा रहे हैं। “डॉक्टर साहिबा बेहतर बताएँगी।” बात-बात में डॉक्टर बोलते हैं कि “नहीं, ऑपरेशन (शल्यक्रिया) से होगा बच्चा।” न गाय को इसकी ज़रूरत पड़ती है, न भैंस को पड़ती, जबकि गाय-भैंस पर तो हमने बड़ा ज़ुल्म कर रखा है, तब भी वहाँ पर आराम से काम हो जाता है।

जानते हो, आदमी के बच्चों में आज भी जितना मोर्टेलिटी रेट (मृत्युदर) है, उतना जंगल में नहीं होता? ये कितनी अजीब बात है! अच्छे विकसित देशों में भी अगर हज़ार बच्चे पैदा होते हैं आदमी के तो उसमें से पाँच-दस तो बेचारे शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं और अगर तुम अविकसित और ग़रीब मुल्क़ों की बात करो, तो वहाँ तो बहुत ज़्यादा है – हज़ार में से पचास, सौ, कहीं-कहीं डेढ़ सौ बच्चे पैदा हुए और चल नहीं पाए।

जंगल में ऐसा कुछ नहीं। जंगल में जो चाइल्ड मोर्टेलिटी रेट है, शिशु मृत्यु दर है, न्यून, बहुत ही कम, होता ही नहीं। कोई आपातकालीन स्थिति आ गई हो तो अलग बात है, नहीं तो बहुत कम। हाँ, ये हो सकता है कि कोई दूसरा जानवर आए और छोटे बच्चों को खा जाए, वो दूसरी बात है, पर वो प्राकृतिक तौर पर तो नहीं मरेंगे, या मरेंगे भी तो संभावना कम है।

आदमी का बच्चा इतना कमज़ोर, इतना कमज़ोर, और आदमी का बच्चा कमज़ोर होता ही गया। आदमी की बुद्धि जितनी विकसित होती गई है, आदमी का बच्चा उतना कमज़ोर होता गया है। मैं ये बातें इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि सवाल शारीरिक स्वास्थ्य का है। भैंस का पड़वा पैदा होता है, कितनी देर में वो उठकर चल देता है?

श्रोतागण: एक-दो घंटे में।

आचार्य: और आदमी का बच्चा पैदा होता है तो कितनी देर में उठकर चल देता है?

श्रोता: डेढ़-दो साल में।

आचार्य: ये तो बात ही नहीं समझ में आई। उसको डेढ़ घंटा लगता है, यहाँ डेढ़ साल लगता है, ये कैसी बात है? पूरा एक आयोजन चाहिए उसको पालने के लिए, पूरी व्यवस्था चाहिए, पूरा परिवार चाहिए, कुनबा। तभी तो फिर शोर मचता है कि “अरे! बेचारी अकेली स्त्री कैसे उसे पालेगी?” “सिंगल मदर (एकल माँ) हूँ।”

ख़ूब सवाल आते हैं, "मैं सिंगल मदर हूँ, बच्चा पैदा हुआ है।" कभी किसी गाय ने शिकायत की है, “मैं सिंगल मदर हूँ, मेरा जो साँड़ है, वो आता नहीं है, परवरिश कराता नहीं है”? करी क्या? नहीं करी।

हम बहुत कमज़ोर हैं शारीरिक रूप से। आदमी का बच्चा पैदा होता है कि—जितना मुझे सीमित ज्ञान है, मैंने सुना है, बहुत सारे मामलों में उसको तुरंत पीलिया हो जाता है, तत्काल ही। वो जानलेवा नहीं होता आमतौर पर, पर हो जाता है पीलिया। ऐसा अन्य प्रजातियों में होता देखा है क्या कि चिड़िया का बच्चा पैदा हुआ और उसे पीलिया हो गया?

ये सब आप बुद्धि चलाने के तोहफ़ें पा रहे हैं। हमारी हड्डियाँ पहले से कमज़ोर हो चुकी हैं क्योंकि हमारा खानपान बहुत सीमित है। पुरानी खुदाइयाँ होती हैं, उनमें जो हड्डियाँ निकलती हैं, वो आज के आदमी की हड्डियों से ज़्यादा मज़बूत हैं। बलिहारी जाऊँ आदमी की अक़्ल के! हज़ार साल, दस हज़ार साल, पचास हज़ार साल पहले के आदमी की खुदाई में जो हड्डियाँ निकल रही हैं, वो हड्डियाँ आज के आदमी की हड्डियों से ज़्यादा मज़बूत हैं। जानवरों को चश्मा लगाए देखा? देखा? तो फिर खेल क्या है, भाई?

अच्छा, मुझे बताओ, कोई माँसाहारी पशु है, वो जीता कैसे होगा? हम मान लो एक चीते की, शेर की बात करें, वो बुढ़ा गया है, और अब उसकी तुलना अपने बुज़ुर्गों से करें, साठ के बाद के। शेर अगर बूढ़ा भी हो गया है, तो क्या करेगा? शिकार करेगा, नहीं तो एक दिन नहीं जी सकता। और यहाँ हम साठ पार करते नहीं हैं कि फैल जाते हैं, और एकदम लेट गए हैं, हड्डियाँ काँप रही हैं और अब ये पूरी धरती का कर्तव्य है कि वो हमें खिलाए-पिलाए, हमारी सेवा करे अगले तीस साल तक। चूँकि मेडिकल साइंस (चिकित्सा विज्ञान) तरक़्क़ी कर गई है, मरने तो हम दिए नहीं जाएँगे और तीस साल तक फैले रहेंगे।

शेर क्या करेगा? वो तो मौत के दिन भी शिकार करेगा और शिकार करते-करते ही मरेगा। बात अच्छे से समझना— शेर कभी भूखा नहीं मरता, भूखा भी है तो उसे कहाँ को निकलना पड़ेगा? शिकार को। पर अगर भूखा हो गया है, बहुत बूढ़ा होकर कमज़ोर हो गया है तो वो शिकार के दौरान ही मर जाएगा। ऐसे जीते हैं जानवर। सोचो, मौत सोचो, क्या राजसी मौत है! क्या ठाठ की मौत है कि बिस्तर पर, ख़ासतौर पर अस्पताल के बिस्तर पर नहीं मर रहे हैं। मरे तो कैसे मरे? शिकार करने गए थे, शिकार करने के दौरान वीरगति को प्राप्त हुए। और अपने बुजुर्गों को देखो, पाँच लोग चाहिए उन्हें सिर्फ़ ज़िंदा रखने के लिए। ये हमारी बुद्धि ने हमें दिया है।

शोधकों का मत है, हालाँकि बात अभी पूरी तरीक़े से सत्यापित नहीं है, कि आदमी ने अपनी लम्बाई, अपनी ऊँचाई भी खो दी है। हम शारीरिक रूप से उतने गठीले, उतने रौबीले, उतने सुंदर भी नहीं रह गए जैसे हम हुआ करते थे। और ये तो आम जानकारी का तथ्य है ही न कि हमारे खोपड़े बड़े होते जा रहे हैं। कल भी हमने बात करी थी। हमारे पूरे शरीर में सिर्फ़ एक चीज़ है जो बड़ी होती जा रही है, क्या? खोपड़े, बाक़ी सब सिकुड़ता जा रहा है। कंधे सिकुड़ते जा रहे हैं, हाथों की माँसपेशियाँ सिकुड़ती जा रही हैं, जाँघें सिकुड़ती जा रही हैं, कद छोटा होता जा रहा है, छाती का आकार संकुचित होता जा रहा है; ये (दिमाग़) बड़ा होता जा रहा है।

ये बड़ा होता जा रहा है, ये बात आपको सौ, दो सौ साल में पता नहीं चलती; ये पता लगने के लिए कई, कई, कई हज़ार साल चाहिए, पर हो यही रहा है। और भी ख़तरनाक तथ्य हैं। जानते हो हमारी सूँघने की क्षमता कमज़ोर पड़ गई है, क्योंकि जो आदमी जंगल में घूमता था, बहुत आवश्यक था कि उसकी घ्राण शक्ति प्रबल हो। इसी तरीक़े से बहुत आवश्यक था कि उसकी श्रवण शक्ति प्रबल हो। बताओ, क्यों? अरे, ज़रा-सा खटका हुआ, उसे पता होना चाहिए। हमारा सुन पाना कमज़ोर पड़ गया, हमारा सूँघ पाना कमज़ोर पड़ गया है।

और एक बात और समझना— मैं बार-बार बोलता हूँ, ध्यान स्वभाव है, ध्यान, एक तरह से कहूँ, तो तुम्हारी अंदरूनी प्रकृति है। शरीर क्या है तुम्हारी? बाहरी प्रकृति, और ध्यान है तुम्हारी? अंदरूनी प्रकृति। हालाँकि अब मैं जो बात बोल रहा हूँ, उसके पक्ष में कोई प्रमाण नहीं हैं और न ही किसी वैज्ञानिक ने वो बात कही है। पुराने आदमी को ध्यानी होना आवश्यक था, आवश्यक भी था और सहज भी था। आवश्यक क्यों था? क्योंकि वो ख़्यालों में खोया हुआ जी ही नहीं सकता था। तुम ख़्यालों में खोए जी रहे हो, एक अजगर ने लपेट लिया तुमको तो?

तो मौजूदगी, प्रेज़ेन्स , सजगता लगातार चाहिए ही थी, ध्यानी तुम्हें होना ही था। और ध्यानी होना सहज क्यों था? ध्यानी होना सहज इसलिए था क्योंकि तुम्हारे पास काम-धंधा क्या है? तुम्हें चिंता क्या है? अभी गा रहे थे न तुम –

चाह गई चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह। जिनको कुछ नहीं चाहिए, वे साहन के साह॥ — कबीर साहब

एक आदमी है जो लगातार घूम-फिर ही रहा है, तुम बताओ, उसके पास सम्पत्ति क्या है? अब वो सम्पत्ति रखना चाहेगा? क्यों नहीं रखना चाहेगा? बोझ है, भाई। घूम-फिर रहे हो, कौन लादे-लादे फिरेगा? कैसे? ख़ुद ही लादना पड़ेगा सम्पत्ति, तो मनवा बेपरवाह।

पहली बात तो संपत्ति नहीं है। दूसरी बात— अब बताओ दिन में काम कितना करता है? दिन भर तुम्हारे पास काम क्या है? काम, वर्क , जॉब क्या है? एक ही काम है उसके पास, क्या?

श्रोता: खाना।

आचार्य: पेट भरने के लिए उसे कितनी देर तक खाना खोजना है? कभी आधा घंटा, कभी बहुत हुआ तो तीन घंटा। और बाक़ी समय किस काम के लिए है? चुप, शांत, सहज बैठा है; कोई जोड़-तोड़ नहीं, कोई राजनीति नहीं, कोई समस्या नहीं।

अपनी हालत को देखो, तुम्हें ध्यान के लिए कितना समय मिलता है? तुम्हें ध्यान के लिए आंतरिक अवकाश, आंतरिक रिक्तता कितनी मिलती है? बताओ, वो भला था, कि तुम भले? तुम कल्पना भी कर पा रहे हो? हाँ, तुम्हारे पास एक ठसक है, "हम बुद्धिमान हैं! हमने अपनी बुद्धि से ये, ये और ये विकसित किया है जो उस गँवार ग़रीब के पास नहीं था।"

हाँ, उसके पास ये सब कुछ नहीं था, पर क्यों हो? तुम्हारे पास ये सब कुछ है, पर क्या ये सब कुछ होने से तुम उससे बेहतर हो, या उससे बदतर हो? तो ये सब पा करके तुमने कौन-सा अपने साथ भलाई कर ली है?

और अभी मैं, याद रखना, मात्र आध्यात्मिक बातें नहीं कर रहा हूँ। ध्यान की बात तो बस एक बात करी है मैंने, कि ध्यान पहले सहज था और अब ज़रा मुश्किल है क्योंकि पचास झंझट हैं, केंद्रीय बात हम शारीरिक स्वास्थ्य की कर रहे हैं।

चलो, तुम्हें ध्यान नहीं चाहिए, तुम तर्क दे सकते हो कि ध्यान वग़ैरा बेकार की बातें हैं, हमें चाहिए ही नहीं। स्वास्थ्य तो चाहिए? तो स्वास्थ्य की दृष्टि से ही देख लो कि जितनी तुमने अक़्ल लगाई है, उतनी तुमने सेहत गँवाई है। ये (ह्रदय की ओर इंगित करते हुए) तो खोया ही है, ये (त्वचा की ओर इंगित करते हुए) भी खोया है।

जो-जो चीज़ें हमें लगी हैं आज तक कि हमारी बड़ी उपलब्धियाँ हैं, उन्होंने हमारे शरीर को कितना परेशान किया है, हमें कुछ पता भी है? आदमी के शरीर में दो पदार्थ हैं जो अनावश्यक रूप से बहुत ज़्यादा दौड़ रहे हैं, पहला गेहूँ, दूसरा दूध। और इन्हीं को हम कहते हैं कि ये हमारी उपलब्धि है।

किसान और क्या करता है? गेहूँ और दूध। और इन दो चीज़ों ने हमारे शरीर को खोखला करके रख दिया है। हमारी कोशिकाओं में ज़हर घुल गया है। हमारी आतंरिक सामग्री ही वो नहीं रह गई जो हुआ करती थी, हम कुछ और हो गए हैं। और अब मज़ेदार बात सुनो, गेहूँ और दूध के बाद, जानते हो, तीसरी चीज़ कौन-सी है जो तुम्हारे शरीर में अब प्रवेश कर चुकी है?

श्रोता: शक्कर।

आचार्य: शक्कर की बात करी है, शक्कर से भी आगे आ जाइए। तो फिर चौथी चीज़ बताइए। गेहूँ, फिर दूध और आपने जोड़ा शक्कर, तो अब बताइए कि अगली चीज़ कौन-सी है जो शरीर में प्रवेश कर चुकी है। और अब वो हमारी व्यवस्था का, हमारे भोजन वृत्त का, फ़ूड साइकिल का हिस्सा बन चुकी है।

श्रोता: नमक।

आचार्य: प्लास्टिक। औसतन प्रत्येक व्यक्ति के दस ग्राम मल में, टेन ग्राम स्टूल में प्लास्टिक के बीस छोटे टुकड़े हैं, *ट्वेंटी माइक्रोपार्टिकल्स*। ये बात तुम्हारी नहीं है, ये बात हर औसत आदमी की है। हमारी बुद्धि ने हमारी प्रकृति ही भाड़ डाली। हमारे मस्तिष्क ही वो नहीं रह गए जो होते थे, क्योंकि मस्तिष्क क्या है? माँस ही तो है। तुमने अपनी होशियारी में अपना माँस ही बदल डाला। तुम्हारे खोपड़े में भैंस का दूध घुस गया। अब बुद्धि भी फिर भैंस ही जैसी चलती है।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी, पीढ़ी-दर-पीढ़ी, पीढ़ी-दर-पीढ़ी, ‘दूध-रोटी खाएँगे’, ‘दूध-रोटी खाएँगे’। लो, भैंस और गेहूँ, भैंस और गेहूँ, दूध-रोटी। और अब प्लास्टिक। जियो जैसे जीना है।

ये प्लास्टिक हड्डियों तक पहुँचेगा, पहुँच रहा है। हम तो बचेंगे नहीं, पर जब बाहर की कोई नस्ल कभी आ करके आदमी की हड्डियाँ देखेगी तो ये निष्कर्ष निकालेंगे कि आदमी की हड्डी प्लास्टिक की होती थी या प्लास्टिक उसमें एक प्रमुख तत्व होता था। वो ताज्जुब करेंगे कि ये हुआ कैसे! एक आर्गेनिक चैन (जैविक श्रृंखला) में प्लास्टिक कहाँ से पहुँच गया?

और अभी हम तमाम तरह के ज़हरीले रसायनों की तो बात ही नहीं कर रहे हैं जो शरीर में घुसे हुए हैं। वो तो बेचारे छोटी चीज़ें हैं, उनकी क्या बात करें! न तो हम अभी नाइट्रेट्स, सल्फेट्स, इनकी तो अभी बात ही नहीं करनी या जो तुम सोडा पीते हो, कार्बोनेट्स, उनकी क्या बात करनी है।

प्रश्नकर्ता: गेहूँ कैसे ख़राब है हमारे शरीर के लिए?

आचार्य: गेहूँ अपने-आपमें ख़राब नहीं है, गेहूँ ऐसे ख़राब है कि गेहूँ दूसरी चीज़ों को विस्थापित कर देता है, डिस्प्लेस कर देता है। बात समझ रहे हो न? अब बुद्धि तो यही बताएगी कि गेहूँ में तो कोई ख़राबी नहीं है। और बात बिलकुल ठीक है, गेहूँ में कोई ख़राबी नहीं है; ख़राबी बस ये है कि गेहूँ आ गया तो बाक़ी सब बाहर हो गया। तो ये बहुत बड़ी ख़राबी है।

रागी कब खाया था? और जौ? और बाजरा? थोड़ा बहुत चना और मक्का बचे हुए हैं बस। तुम जाओ किसी होटल में, रोटी माँगो बाजरे की, दे देंगे तुम्हें वो? हद-से-हद जाड़े के दिनों में वो तुम्हें 'मक्के दी रोटी ते सरसों दा साग', इतना कर देंगे, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। और ये तो दो-चार अनाज हैं जिनका नाम मैं जानता हूँ; मैं कोई वनस्पति शास्त्री तो हूँ नहीं। एक बार को सोचो कि कितनी और क़िस्में होंगी अन्न की जो हमारे ध्यान से, हमारे ज़ेहन से ही उतर चुकी हैं। ये तो हम चार-पाँच नाम अब कुल जानते हैं, उससे ज़्यादा तो अब नाम ही हम नहीं जानते।

जानते हो प्रतिरोधक शक्ति आदमी की कम, कम, और कम होती जा रही है? जब आदमी ने एंटीबायोटिक्स (प्रतिजैविक पदार्थ) का आविष्कार किया तो माना गया कि आदमी मज़बूती का प्रमाण दे रहा है। पुराने जितने चिकित्सा शास्त्र थे, उन सबके पास एक ये चीज़ नहीं थी, क्या? एंटीबायोटिक्स * । तो एक बार आपके शरीर में जीवाणु लग गए तो फिर आयुर्वेद इंतज़ार करता था, यूनानी दवाएँ इंतज़ार करती थीं, चीनी पद्धतियाँ इंतज़ार करती थीं कि हौले-हौले आपकी अपनी * इम्यूनिटी (प्रतिरक्षा तंत्र) उनको बाहर निकाले, और वो हमेशा हो भी नहीं पाता था।

अगर किसी तरीक़े से बैक्टीरिया (जीवाणु) ने या किसी फ़ंगस (फफूँद) ने आपको बिलकुल पकड़ ही लिया है, तो हमेशा नहीं हो पाता था कि आप उसे हरा पाएँ। एंटीबायोटिक्स ने खेल ही पूरा पलट दिया। अब पता ये चल रहा है कि हमारा जो पूरा प्रतिरक्षा तंत्र है, इम्यूनिटी है, वो दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होती जा रही है।

आदमी के शरीर के भीतर इतने तरह के बैक्टीरिया और फ़ंगस हैं कि जिनका हमें कुछ पता नहीं, और वो हमारे लिए बहुत तरीक़े के काम करते हैं। हमारी पूरी आँत उन्हीं से भरी हुई है। और अभी हमने ऐसी कोई एंटीबायोटिक नहीं निकाली है जो सिर्फ़ चुनिंदा जीवाणुओं को मारे। एक एंटीबायोटिक लेते हो तो उसका तो नाम ही है एंटी-बायोटिक , वो जहाँ कहीं भी बायोलॉजिकल ऑर्गेनिज़म (जैविक जीव) को पाती है, उसको साफ़ कर देती है।

एंटीबायोटिक्स का प्रयोग तुम्हें खोखला कर देता है। एंटीबायोटिक्स में कोई बुराई नहीं, बुराई जानते हो किसमें है? एक बात समझना, तुमने एंटीबायोटिक्स इस्तेमाल कर लिया जीवन में; तुम्हें कोई हानि नहीं होने वाली, कोई हानि नहीं होने वाली। दूसरी बार भी कर लिया तो चलो, कोई बात नहीं। दिक़्क़त बस ये है कि जो चीज़ हमारे काम की हो जाती है न, हम उसका ज़्यादा, और ज़्यादा, और ज़्यादा, और-और ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं।

तुमने ये देखा है कि नहीं देखा है कि कोई चीज़ आती है, ज़िंदगी में नई चीज़ आ गई, मान लो ये एयर कंडीशनर (वातानुकूलक) है, ये आज से बीस-तीस साल पहले क्या हुआ करते थे? ये एक लग्जरी (विलासिता) थे जिनका आप कभी-कभार इस्तेमाल कर लेते थे। आम घर में तो पाए ही नहीं जाते थे, और घरों में आये भी तो फिर एक कमरे में लगा दिए गए कि जब गर्मी बहुत बढ़ेगी, तब इनका इस्तेमाल कर लिया जाएगा, अन्यथा नहीं। अभी हम नवंबर में प्रवेश कर रहे हैं और यहाँ दो एसी चल रहे हैं, और एक एसी सोलह डिग्री पर चल रहा है, उधर वाला।

आपको नहीं पता चलता कि कौन-सी चीज़ कब लग्जरी से निकलकर नीड बन गई, अनिवार्यता बन गई। बात समझ रहे हो न? तो अगर आप ये तर्क करने जाओगे कि एंटीबायोटिक्स में बुराई क्या है; बिलकुल कोई बुराई नहीं है, ठीक वैसे जैसे एयर कंडीशनर में कोई बुराई नहीं है, ठीक वैसे जैसे तुमने पूछा कि “गेहूँ में बुराई क्या है?” गेहूँ में कोई बुराई नहीं है; बुराई इस चीज़ में है कि जिस चीज़ का तुम अविष्कार करते हो, वो चीज़ तुमको पकड़ लेती है, तुम उसके ग़ुलाम हो जाते हो। और इस चीज़ को तुम रोक नहीं सकते।

आज हर वो चीज़ जो तुम्हें लगता है कि तुम्हारे लिए एक नेसेसिटी है, एक अनिवार्यता है, वो कभी तुम्हारे पास सिर्फ़ एक सहूलियत की तरह आई थी, एक अतिरिक्त सुविधा की तरह आई थी; याद रखना, अतिरिक्त सुविधा, कि “लीजिए, ये भी ले लीजिए।” आज वो आपको अतिरिक्त सुविधा नहीं लगती, आज वो आपके लिए एक अनिवार्यता है।

सिर दर्द हटाने की गोली में क्या कोई बुराई है? नहीं, बिलकुल कोई बुराई नहीं है अगर उसका इस्तेमाल आपने साल में एक बार किया हो। लेकिन जिनको सिर दर्द रहता हो, वो भलीभाँति जानते हैं कि एक बार आपने इस सिरदर्द हटाने की गोली का इस्तेमाल कर लिया, फिर वो…?

श्रोता: आदत बन जाती है।

आचार्य: और आप नहीं रोक सकते, क्योंकि वो उपलब्ध है। वो उपलब्ध है और सिरदर्द सता रहा है, आप कैसे रोकोगे अपने-आपको?

और बुद्धि यही गणना नहीं कर पाती, यहीं पर बुद्धि का हिसाब मार खा जाता है। बुद्धि ये गणना नहीं कर पाती कि जो तुम नया उत्पाद, नया आविष्कार, नई टेक्नोलॉजी ला रहे हो, वो तुम्हारी मालिक बन जाएगी।

बुद्धि ये बात तुम्हें बता ही नहीं पाएगी, क्योंकि बुद्धि को तुम अपना ग़ुलाम समझते हो न। तुम कहते हो, 'मेरी बुद्धि, माय इंटेलेक्ट '। “मैंने फलानी चीज़ का अविष्कार किया, खोज की।” तो तुम्हें लगता है कि तुमने जिस चीज़ की खोज करी है, वो चीज़ तुम्हारी सेवा करेगी। तुम इस तथ्य को कभी हिसाब में ही नहीं ला पाते कि तुमने जिस चीज़ का अविष्कार किया है, वो चीज़ तुम्हारी सेवा नहीं करेगी, वो तुम पर राज करेगी, हावी हो जाएगी।

किसी भी नई चीज़ की ओर आकर्षित होने से पहले, चेता रहा हूँ तुम्हें, एक बात को बिलकुल ख़्याल में रख लेना − आज जिस चीज़ की ओर तुम आकर्षित हो रहे हो, आज जो चीज़ तुम्हें लग रहा है कि तुम्हें सुविधा देने वाली है, कल वो चीज़ तुम्हारे सिर पर बैठेगी, बिना किसी अपवाद के, *विदाउट इक्सेप्शन*।

और यही अर्थ करा है मैंने कबीर साहब की बात का, “एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोय।” “माटी कहे कुम्हार से।" माटी माने? प्रकृति, मिट्टी, संसार, पदार्थ। माटी माने मटेरियल , पदार्थ।

"माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय।" “तू अभी सोच रहा है कि तू मेरा इस्तेमाल कर रहा है; तू मुझे रौंद रहा है, तू मेरे ऊपर है।” रौंदना माने? किसी से ऊपर हो जाना। कुछ तुम्हारे पाँव के नीचे है, तुम उसे रौंद रहे हो। "एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोय।" अभी तो ऐसा लग रहा है कि कुम्हार के लिए घड़ा है, शीघ्र ही दिखाई देगा कि घड़े के लिए कुम्हार है। कुम्हार जान देने को तैयार है कि उसके घड़े बचे रहें।

"एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोय।" इसका आशय मृत्यु से नहीं है, इसका आशय कहीं ज़्यादा गहरा है। आमतौर पर यही कहा गया है कि मिट्टी कुम्हार को बता रही है कि “एक दिन, कुम्हार! तू मेरे नीचे गड़ा पाया जाएगा।” न, बात दूसरी है। मिट्टी कुम्हार से कह रही है, “तू मेरी ओर आ रहा है ये सोचकर कि तू मेरा उपयोग और उपभोग करेगा; तू आ। जब तक मैं मिट्टी मात्र हूँ, तब तक तेरा और मेरा स्वस्थ रिश्ता है।” पर जिस दिन मिट्टी घड़ा बन गई, जिस दिन प्रकृति आदमी के काम में आने वाली चीज़ बन गई, उस दिन आदमी ग़ुलाम हो जाता है।

तुम्हारा हर सेवक तुम्हारा मालिक बनकर रहेगा; तुम्हारी हर चतुराई तुम पर भारी पड़कर रहेगी। नो इक्सेप्शन्स (कोई अपवाद नहीं)।

पहले फल से काम चल जाता था, फिर तुमने कहा, ‘रोटी’। पहले छाया से काम चल जाता था, फिर तुमने कहा, ‘मकान’। बुरा था क्या कि अगर तुम निर्वस्त्र ही घूमते थे और रहते ही ऐसी जगहों पर थे जहाँ पर वातावरण तुम्हारे अनुकूल था? पर फिर तुमने कहीं भी रहना शुरू कर दिया, जहाँ रहने में कोई उपयोगिता नहीं, और तुमने कहा, ‘कपड़ा’। और अब तुम कहते हो, ‘रोटी-कपड़ा-मकान’, जैसे ये तुम्हारी अनिवार्यताएँ हों।

और कौन है जो आज रोटी, कपड़े और मकान से ही राज़ी है?

एक्स बॉक्स भी तो चाहिए, फ्लाइट (हवाई जहाज़) के टिकट भी तो चाहिए, आईफ़ोन भी तो चाहिए। और एक दिन ऐसा था जब न रोटी थी, न कपड़ा था और न मकान था, और तुम बहुत मग्न थे। यक़ीन मानो, तुम बहुत मग्न थे। आज रचकर दिखा दो न उपनिषद्, और उपनिषद् तुम्हारी गाढ़ी मग्नता का ही उत्पाद थे।

कभी ये विचार तुम्हें नहीं आता कि ऐसा कैसे हुआ कि ब्रह्मवचन सारे सुदूर अतीत में ही उतरे? आज क्यों नहीं उतरते? क्योंकि तब तुम मस्त थे और मग्न थे, और तब सम्भव था कि तुम्हें सहज ही ध्यान में कुछ बातें पता चल जाएँ। वही फिर ब्रह्मघोष कहलाया, वही फिर क़ुरान की आयतें कहलाईं, वही उपनिषद् के ब्रह्मवाक्य कहलाए।

आज कब उतरेंगे तुम पर उपनिषद्, मुझे बताओ। इल्हाम कब होगा तुमको, तुम तो ट्रैफ़िक (यातायात) में हो। तुम ट्रैफ़िक में हो, तुम पर देववाणी अवतरित होगी? और सुबह से शाम तक तुम ट्रैफ़िक में ही हो, डिवाइन रेवेलेशन (दिव्य रहस्योद्घाटन) तुम्हें होंगे कब, बताओ। और जब तुम ट्रैफ़िक में नहीं हो, तब तुम अपने आकाओं के लिए नोट गिन रहे हो।

आज तुम्हारे पास सब कुछ है, लेकिन ग़ौर से देखना और अगर ग़लत बोल रहा हूँ तो बता देना, महीने भर तुम पेट ही तो पालते हो। कोई तुमसे पूछे, “काम क्यों कर रहे हो?” तो ईमानदार जवाब तो यही होता है कि “पेट पालने के लिए।” तुम महीने भर सिर्फ़ पेट पालने के लिए श्रम करे जाते हो, करे जाते हो, करे जाते हो। और वो जंगली आदमी, जिसके पास कुछ नहीं था, वो बड़े मज़े में पेट पालता था, उसे कोई कमी नहीं।

जानते हो अकाल, दुर्भिक्ष, स्टार्वेशन डेथ्स (भुखमरी से मौत) पहले नहीं होती थीं? पुराने समय में ‘अकाल’ जैसा कोई शब्द ही नहीं था। अकाल शब्द ही प्रचलन में आया है खेती की परम्परा के बाद। पहले अकाल पड़ ही नहीं सकता था, क्यों नहीं पड़ सकता था? पानी की कमी है तो कहीं और चले जाओ, बेटा। ये पाँव किसलिए हैं? चलते रहो।

और पानी की कमी अनायास तो हो नहीं जाती कि सुबह सोकर उठे और पता चला कि “अरे! सारा पानी गायब हो गया।” पानी भी शनै: शनै: कम होता है। तो तुम्हें बहुत समय मिलता था। तुम्हें दिखाई दे रहा है कि पानी कम हो रहा है, वर्षा कम होती जा रही है; तुम चल दिए, तुम तो हो ही घुमक्क्ड। घुमंतू कबीला है, आगे बढ़ गया है। कोई नहीं मरता था अकाल से। न अकाल होते थे, न एपिडेमिक होते थे।

प्लेग फैला था यूरोप में, यूरोप की आधी आबादी को ले गया। और ये हम आदिकाल की बात नहीं कर रहे हैं, ये हम पाँच सौ साल पहले की बात कर रहे हैं, सिर्फ़ पाँच सौ साल पहले की। पुराने आदमी के साथ कभी ऐसा नहीं हुआ कि महामारी फैली, महाकाल फैला और आधी आबादी उठा ले गया। और तुम बड़ा गर्व करते हो इन सड़कों को देखकर, इन कम्प्यूटरों को देखकर, और तुम अपने-आपको बताते हो कि हम विकसित हैं, हम डेवेलप्ड हैं।

क्या पाया? एक अशांत मन और एक कमज़ोर जिस्म। दो ही तो हो न तुम? तन और मन। मन हो गया अशांत और जिस्म हो गया कमज़ोर, ये पाया तुमने। अब बताओ, भला हुआ, कि बुरा हुआ?

महीने भर रोटी के लिए मेहनत करते हो, कोई जानवर देखा है रोटी के लिए इतनी मेहनत करता हुआ? सड़क का कुत्ता भी रोटी के लिए इतनी मेहनत नहीं करता। तुम हो और तुम्हारा बड़ा बँगला है, और तुम्हारे बँगले के सामने सड़क पर दो-चार कुत्ते घूम रहे हैं। ग़ौर से देखना कि रोटी के लिए ज़्यादा मेहनत कौन करता है। और कुत्ते को कभी देखना जो अपना फैल करके बैठ जाता है सड़क पर। उतना आराम तुम्हें कभी मिला है? उतने चैन में तुम कभी होते हो? बोलो।

कभी कुत्ते को आराम करते देखा है? वो फैलकर बैठा है, थोड़ी देर में वहीं लेट भी गया, चारों पाँव फैला करके। तुम होते हो कभी इतने विश्राम में? तुम्हें तो विश्राम भी चाहिए तो तुम एम्सटर्डम का टिकट कटाओगे पहले, वहाँ जा करके आराम मिलेगा, “*लेट्स गो टू, यु नो, अनवाइंड अ लिटिल*।”

अभी भी सोचो, सारी बातें दिमाग़ से निकाल दो जो सुनी हैं, लिख-पढ़ ली हैं; सिर्फ़ वो याद रखो जो तथ्य है जीवन का। जीवन का तथ्य ये है कि तुम्हारे पास अब गिनती के कुछ साल हैं बहुत छोटे-से। तुम वाक़ई अपना कोई भी दिन वैसे ही गुज़ारना चाहते हो जैसे गुज़ार रहे हो? थम जाओ, रुक जाओ। ये बहुत गंभीर मुद्दा है, थोड़ी देर ध्यान दो।

तुम मरने वाले हो, तुम क्या कर रहे हो? तुम ऑफिस (दफ़्तर) की फ़ाइलें निपटा रहे हो। वो आ रहा है, वो दरवाज़े के बाहर ही खड़ा है। उसने बाहर भैंसा पार्क कर दिया है। भैंसा पार्क कर दिया है, गदा डिपॉज़िट (जमा) कर दी है काउंटर पर और अब बाहर खड़ा है। और तुम्हारे नाम का वारंट (अधिपत्र) है, और तुम क्या कर रहे हो? फ़ाइलें निपटा रहे हो। तुम कर क्या रहे हो? तुम्हें नहीं समझ आ रहा? तुम बात की गंभीरता देख ही नहीं पा रहे न?

और तुम इतना डरे हो इस कमरे के लोगों से कि तुम उनकी फ़ाइलें निपटाते ही जा रहे हो, निपटाते ही जा रहे हो; तुम समझ ही नहीं रहे कि तुम्हें इस कमरे में होना ही नहीं है। वो अभी ले जाएगा तुमको। तुम डरे किससे हुए हो? तुम उनसे डरे हुए हो जिनके साथ तुम्हें रहना ही नहीं है।

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