Acharya Prashant is dedicated to building a brighter future for you
Articles
आत्मा माने क्या? शुद्ध धर्म कैसा? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
38 मिनट
82 बार पढ़ा गया

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि भगवान महावीर आत्मा को मानते हैं और भगवान बुद्ध आत्मा को अस्वीकार करते हैं। एक आत्मा को सत्य बोलते हैं और एक असत्य बताते हैं तो इन दोनों के बीच में अंतर क्या है?

आचार्य: जब कोई बात हमको बताई जाती है तो बताने में शब्द लगते हैं, और जो बताया गया है वह एक सिद्धांत बन जाता है। 'आत्मा' शब्द का दुरुपयोग आज ही नहीं हो रहा है, वह उसी दिन से शुरु हो गया था जिस दिन कहा गया था- 'आत्मा'।

जैसे आज आप 'हृदय' शब्द का दुरुपयोग करते हो, 'ब्रह्म' का दुरुपयोग करते हो वैसे ही 'आत्मा' शब्द का दुरुपयोग उपनिषदों के तत्काल बाद शुरू हो गया था। लोगों ने अपने ही किसी विचार को 'आत्मा' कहना शुरू कर दिया, किसी ने मन को ही आत्मा कहना शुरू कर दिया। और झूठ याद रखिए हमेशा ज़्यादा तेजी से फैलता है क्योंकि ज़्यादा सुविधाजनक होता है। झूठ हमें उखाड़ नहीं फेंकना चाहता क्योंकि हम झूठ ही हैं, तो झूठ के साथ हमें ज़्यादा आराम से तालमेल बैठाने की सुविधा हो जाती है।

'आत्मा' जो वास्तव में है, वह बहुत असुविधाजनक है, कष्ट देती है, तोड़ देती है। और 'आत्मा' शब्द का जो विकृत अर्थ प्रचलित है, वह बहुत आरामदेह है। उसमें सुकून मिल जाता है और वह बिकता भी ज़्यादा आसानी से है। तो उसको बेचकर के, उसकी बात करके फ़ायदे भी खूब हो जाते हैं।

आदमी का मन जैसा आज है, वैसा ही पाँच हज़ार साल पहले भी था। तो जैसे आज 'आत्मा' को विकृत किया गया वैसे ही तब भी किया गया। वह सबकुछ जो आत्मा नहीं है, उसे कह दिया गया आत्मा-आत्मा-आत्मा। लोगों ने, विशेषकर जो पुरोहित वर्ग था, ब्राह्मण वर्ग था उसने अपने नियस्थ स्वार्थों की ख़ातिर तमाम तरह के अनर्गल अर्थ, अनर्थ खड़े कर दिए। वैदिक धर्म महात्मा बुद्ध के समय तक आते-आते—और बहुत अभी समय बीता नहीं था। जो बिलकुल प्राचीनतम उपनिषद् हैं, उनमें और महात्मा बुद्ध में मुश्किल से तीन-चार सौ साल का अंतर है। कई उपनिषद् तो बुद्ध के काल के बाद लिखे गए हैं। और बुद्ध और भगवान महावीर समकालीन थे, लगभग एकसाथ के ही थे, तीस-चालीस साल का उनमें अंतर था। महावीर, बुद्ध से लगभग तीस-चालीस वर्ष उम्र में बड़े थे। लेकिन उन तीन-चार सौ साल में ही—उपनिषदों का बिलकुल समझ लीजिए जैसे गुड़-गोबर कर दिया गया। क्या सिखा रहे थे वेद, उपनिषदों के माध्यम से और क्या व्यवहार में लाया जाने लगा। बलि दी जा रही है, कर्मकांड चल रहे हैं, जात-पात आगे बढ़ने लग गई, हिंसा फैल रही है, अनाचार हो रहा है। और यह सबकुछ क्या कहकर हो रहा है कि यह तो साहब वेदों में लिखा है।

उस काल में जो हो रहा था, उसमें आपको आज की गूँज सुनाई देती है कि नहीं? कि धर्म के नाम पर अधर्म हो और कहा जाए कि 'यह तो हमारे शास्त्रों में लिखा है।' यही काम तभी हो रहा था। क्यों? अभी हमने बात करी क्योंकि झूठ हमेशा ज़्यादा सुविधाजनक होता है। और उपनिषद् एक विद्रोह हैं हमारी प्राकृतिक वृत्तियों के खिलाफ़। हम तो जैसे रचे ही गए हैं प्रकृति द्वारा एक पशु समान जीवन जीने के लिए। उपनिषदों द्वारा एक कोशिश की गई है, आपको-आपकी पशुता से मुक्ति दिलाने की। वह कोशिश अक्सर हल्की पड़ जाती है, हार जाती है। कारण समझियेगा!

हर बच्चा जो जन्म लेता है, उसके साथ उपनिषदों को एक नया प्रयास करना पड़ता है उसको सिखाने का, श्रम करना पड़ता है ताकि वह सच्चाई में प्रवेश करे। लेकिन अंधेरे में उसको प्रविष्ट कराने के लिए कोई श्रम नहीं करता, अंधेरा वह अपने भीतर लेकर पैदा होता है। तो वेदांत की और अज्ञान की जो लड़ाई है, वह बड़े ज़बरदस्त तरीके से अज्ञान के पक्ष में झुकी हुई है। ऐसा लगता है एक बार को तो जैसे यह तय ही है कि यह लड़ाई लगातार अज्ञान ही जीतता रहेगा, बार-बार जीतता रहेगा। और इतिहास में ऐसा हुआ भी है। उपनिषद आए और उनको बिलकुल विकृत कर दिया गया, विकृत ही नहीं कर दिया गया उनको एकदम हाशिए पर डाल दिया गया। जो वैदिक कर्मकांड था उसको बना दिया गया धर्म की मुख्यधारा, कि यही तो धर्म है, यह सब करो। यह पूजा-पाठ, हवन, यज्ञ, बलि, यह देवता, वह देवता, ऐसी कल्पना, वैसी कल्पना, पचास तरह की बातें। वह सब बना दी गई धर्म की मुख्यधारा और उपनिषद् जो असली ज्ञान की बात करते हैं, उन्हें एक बिलकुल कोने पर रख दिया गया। लेकिन यह भी बात तय थी कि उनमें जो बात है, वह बहुत ऊँची है। तो उनको कोने पर रखकर के उनकी शब्दावली को, उनके सिद्धांतों को उठा लिया गया और तोड़-मरोड़ करके कह दिया गया कि 'देखो, हम तुमको जैसा धर्म बता रहे हैं, उसकी स्वीकृति तो उपनिषद् भी देते हैं।' आप कुछ बात समझ पा रहे हैं, क्या चल रहा था? समझ पा रहे हैं बात को?

और यह सब तीन-चार सौ साल के अंदर-अंदर हो गया। यह तो तब था जब अभी उपनिषद् रचे भी नहीं गए थे, मुख्य उपनिषदों को छोड़कर। बहुत सारे उपनिषद् बाद के हैं। तो 'आत्मा' उपनिषदों के केंद्र में है। उपनिषद् कहते हैं, 'ब्रह्मज्ञान हमारा लक्ष्य है।' और ब्रह्म माने आत्मा। अहंकार को जो चीज़ सबसे ज़्यादा लुभाती है वह है 'आत्मा' कहलाना। झूठ को जो चीज़ सबसे ज़्यादा लुभाती है, वह है सच कहलाना। झूठ और किसी चीज़ का प्यासा होता ही नहीं है। झूठ को चाहिए कि कोई बस यह बोल दे कि तुम सच हो। इसी तरह अहंकार बस यह चाहता है कि कोई बोल दे कि तुम आत्मा हो। अहंकार ने तरीके-तरीके से आत्मा शब्द को हड़प लिया, कब्ज़ा कर लिया उस पर। अब अहंकार आत्मा बनकर घूम रहा है। जो भी काम तुम अहंकार से कर रहे हो, उसको कह रहे हो, 'यह तो मेरी आत्मा से हो रहा है, यह तो मेरी आत्मा से हो रहा है।' इस तरह की बातें शुरू हो गईं कि 'आत्मा शरीर के भीतर रहती है, एक अच्छी आत्मा होती है एक बुरी आत्मा होती है, अगर अच्छे कर्म करोगे तो तुम्हारी आत्मा अच्छे कर्मों की भोक्ता बनेगी और वह अच्छे कर्म तुम्हें आगे काम आएँगे।'

माने जितनी भी मूर्खता और पाखंड की बातें होती थी, उनको जायज़ सिद्ध करने के लिए 'आत्मा' शब्द का दुरुपयोग करा जाने लगा। तो बुद्ध के पास कोई चारा नहीं था, उन्होंने कहा, 'जिसको तुम आत्मा बोलते हो वह झूठ है, बहुत झूठ है।' उन्होंने कहा, 'जिसको 'तुम' आत्मा बोलते हो, आत्मा नहीं। जिसको 'तुम' आत्मा बोलते हो। अंतर समझिए! जिसको 'तुम' आत्मा बोलते हो वह झूठ है, वह तो वास्तव में आनात्मा है। तो उन्होंने कहा, अनत्ता, अनात्मा। तुम नॉनसेल्फ को सेल्फ बोल रहे हो। एक-एक बात जिसको तुम कह देते हो कि यह मेरी है, अपनी है, सच्ची है, हार्दिक है, आत्मिक है; वह सच्ची है ही नहीं, वह झूठी है। तुम अपने विचारों को बोल देते हो, यह आत्मा से आए हैं। तुम अपने प्रेम को बोल देते हो, यह तो मेरी आत्मा से उठा है। सब झूठ! सब झूठ!

तो उन्होंने कहा, अनात्मा। अनात्मा नॉनसेल्फ। तुम्हारा प्रेम भी नॉनसेल्फ है, तुम्हारा विचार तुम्हारी भावनाएँ, तुम्हारे मत, तुम्हारी रूढ़ियाँ, तुम्हारे कर्मकांड सबकुछ तुम्हारा नॉनसेल्फ है, अनत्ता है, अनात्मा है। तो इस तरह बुद्ध को एक विद्रोह करना पड़ा। वह विद्रोह उपनिषदों के प्रति नहीं था, वह विद्रोह उपनिषदों के समर्थन में था।

बुद्ध ने कहा, मैं तुम्हें आत्मा शब्द दूँगा, तुम फिर से उसको ख़राब कर दोगे। तो मैं तुम्हारे हाथ से ख़राब करने का अधिकार ही छीने लेता हूँ। मैं बोलूँगा ही नहीं आत्मा; मैं बिलकुल उल्टा बोलूँगा, मैं बोलूँगा, 'अनात्मा'। बहुत बार वही बात मैं भी आपसे कहता हूँ जब आप कहते हो, ब्रह्म बताओ, मुक्ति बताओ? मैं कहता हूँ, 'मुक्ति छोड़ो, बंधनो की बात करो।' क्योंकि अगर मैंने तुमसे मुक्ति की बात करी तो तुम मुक्ति शब्द को ही तोड़-मरोड़ दोगे; बंधनों की बात करो।

बुद्ध भी यही कहते थे। कहते थे, 'स्वास्थ्य मुझे नहीं पता, मैं चिकित्सक हूँ, मुझसे बीमारी की बात करो। मुझे नहीं पता अंतिम चीज़ क्या होती है।' लगभग एक दर्जन प्रश्न थे जिन पर बुद्ध बिलकुल मौन रहते थे क्योंकि उन्हें पता था कि अगर उत्तर दिया तो आप उन उत्तरों का बहुत ख़राब इस्तेमाल करेंगे, तो चुप हो जाते थे बिलकुल। आप पूछिए उनसे, 'आत्मा है?' चुप। 'ईश्वर है?' चुप। 'हम हैं?' चुप। वह कहते थे, 'यह प्रश्न तुम्हारे काम के नहीं हैं क्योंकि इनका उत्तर तुम्हें भारी पड़ेगा। तो मुझसे तो तुम सिर्फ़ अपनी बीमारी की बात करो। मुझे बताओ क्या-क्या है जो झूठ है और तुम्हारे जीवन में मौजूद है, मुझे वह हटाना है। आत्मा की बात मैं करना ही नहीं चाहता तुमसे। क्योंकि तुम अहंकार हो और तुमसे मैंने आत्मा की बात कर दी तो तुम उस बात को लेकर के अहंकार में ही शामिल कर लोगे।'

आत्मा की बात अहंकार से नहीं की जानी चाहिए, अहंकार से तो अहंकार की ही बात की जानी चाहिए। माने उससे कहना चाहिए कि अहंकार! तुम मुड़ो और अपनेआप को देखो। तुम आत्मा के सपने मत लो, तुम अपने यथार्थ की बात करो। ऊँची-ऊँची बातें छोड़ो कि ब्रह्म कैसे मिलेगा, समाधि कैसे लगेगी; हटाओ यह सब। समझ में आ रही है बात?

इसीलिए मैं महात्मा बुद्ध को एक सच्चा वेदांती कहता हूँ। वेदांत जिस नेति-नेति की बात करता है, वह बुद्ध की अनत्ता में सबसे ज़्यादा निखरकर सामने आती है। वेदांत जब कहता है, 'नेति-नेति, नहीं-नहीं।' तो वह झूठ को ही तो कह रहा है न, नहीं-नहीं। वही बात बुद्ध कह रहे हैं जब कहते हैं, 'अनत्ता, नहीं आत्मा! नहीं आत्मा!' तुम ग़लत चीज़ को सही चीज़ माने बैठे हो, तुम झूठ को सच समझ रहे हो। नहीं आत्मा, अनत्ता, नहीं-नहीं। तुम जिसे आत्मा बोल रहे हो, वह बहुत हल्की चीज़ है। तुम जिस भी चीज़ को जो कुछ भी समझ रहे हो वह सब झूठ है; यही नेति-नेति है।

देखिए एक मामले में—पहले बोल चुका हूँ, दोहराना पड़ता है—एक मामले में सच बहुत ज़बरदस्त होता है, अति शक्तिशाली; एक मामले में बहुत कमज़ोर। अपने लिए सच से ज़्यादा ताक़तवर कुछ नहीं लेकिन आपकी ज़िंदगी में सच बहुत कमज़ोर रहता है। क्योंकि आपके जीवन में सच कितना मजबूत होगा, उसका निर्णय आप करते हैं। हम झूठ हैं इसीलिए झूठ के पक्षधर हैं। हमारे जीवन में सच बहुत कमज़ोर रहता है इसीलिए हमारे जीवन में उपनिषद् बहुत कमज़ोर रहते हैं। वह बार-बार हारते हैं। जो प्रयास बुद्ध ने करा, वही प्रयास बुद्ध के बाद सैकड़ों अन्य मनीषियों को भी करना पड़ा; उपनिषद् फिर भी कमजोर ही रहे। कहाँ? हमारे जीवन में। अपनेआप में उनसे ज़्यादा ताक़तवर कुछ नहीं, पर हमारी ज़िंदगी में उनसे ज़्यादा कमज़ोर कुछ नहीं क्योंकि हम उन्हें महत्व नहीं देते, हम झूठ को महत्व देते हैं।

कोई वजह है न कि सनातन धर्म को सुधारने के लिए हर सौ-दोसौ साल में इतनी कोशिशें करनी पड़ी, लेकिन फिर भी यह सुधरने का नाम नहीं लेता। भक्तिकाल के जितने संत थे, वह सब क्या कर रहे थे? वह हमें सुधारने की ही तो कोशिश कर रहे थे। और भारत से जो प्रमुख धार्मिक धाराएँ बही हैं, वह सब क्या हैं? वह सब उठी ही हैं विद्रोह के तौर पर। आसपास जो सनातन धर्म है, उसमें इतनी गंदगी और इतनी विकृति देखी कि सुधारको को क्रांति करनी पड़ी। विद्रोह के तौर पर उठ खड़े हुए कि यह ठीक नहीं हैं।

जो काम महात्मा बुद्ध, महात्मा महावीर ने करा ईसापूर्व, वही काम अभी हाल में बाबा नानक साहब को करना पड़ा। देखिए! कोई भी संत बहुत उत्सुक नहीं होता है कि अपने नाम पर एक नई धारा वगैरह चलाए, क्योंकि उसमें महत्वकांक्षाएँ नहीं होती है। उसको मज़बूर होकर के कहना पड़ता है कि यह जो तुम पुराना काम कर रहे हो, यह ठीक नहीं है, यह ग़लत है; जो सही है वो करो। तो फिर वहाँ से एक नई धार्मिक धारा का उदय होता है।

तो बार-बार, बार-बार सुधारक आकर के सनातन धर्म में जो विकृति और गंदगियाँ आ गई हैं, उनको साफ़ करने की कोशिश करते हैं। लेकिन हैं तो हम प्रकृति की ही औलाद न, कोई कितना भी समझा ले पर लोभ, मोह, काम, क्रोध, भय, यह हमें ज़्यादा प्रिय लगते हैं। फिर जो हमारा प्राकृतिक मसाला है, जेनेटिक सामग्री है, वह तो हम अपने बच्चों को दे देते हैं, उसमें तो कोई बहुत मेहनत लगती नहीं। लेकिन अगर किसी ने अपने जीवन में आध्यात्मिक प्रकाश पाया है, अर्जित किया है, तो वह चीज़ बच्चों को विरासत के तौर पर आसानी से नहीं सौंपी जा सकती। तो अंधेरा तो अपनेआप फैलता है।

हर नया बच्चा जो जन्म लेता है, अपने साथ अंधेरा लेकर आ जाता है, अपनेआप फैल जाता है अंधेरा। बच्चा जन्म लेगा और अंधेरा फैल गया पर रोशनी बड़ी मेहनत से फैलानी पड़ती है। अब उस बच्चे को लो और उसको दस-बीस साल तक शिक्षा दो, समझाओ, तब जाकर के कुछ संभावना है। तो रोशनी हारती है, बार-बार हारती है। इसीलिए कोई भी क्रांतिकारी आ जाएँ, समाज सुधारक आ जाएँ, गुरुओं की पूरी एक श्रंखला ही आ जाए, तो भी आप पाएँगे कि काम पूरा नहीं हुआ। हर दस-बीस-पचास साल, सौ साल, दो सौ साल में ज़रूरत पड़ेगी कि फिर कोई आए और कहे कि गंदगी बहुत हो गई है, झाड़ू लाओ, सफाई करनी पड़ेगी, करनी पड़ेगी। क्योंकि गंदगी अपनेआप बढ़ती है।

यह मेज़ है, इसको आप यहाँ छोड़ दीजिए और तीन दिन बाद आइए तो इस पर क्या पाएँगे? धूल। वह अपनेआप पड़ गई, किसी ने मेहनत नहीं करी; साफ़ करने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी। यहाँ तक तो फिर भी ठीक था कि मेहनत करनी पड़ेगी, सिर्फ़ मेहनत की बात होती तो कर भी लेते पर वह जो धूल पड़ती है न, उससे हमें प्यार हो जाता है। हम उसे कैसे हटाएँ? तो फिर जो हटाने वाला आता है, हम उसको बहुत परेशान करते हैं। हम कहते हैं, 'धूल ही तो असली चीज़ है, धूल ही तो आत्मा है, तुम इसे क्यों हटा रहे हो?'

दुनिया के किसी धर्म को साफ़ करने की इतने लंबे समय तक, इतनी ज़्यादा कोशिश नहीं की गई जितनी सनातन धर्म को साफ़ करने की की गई। यह कितनी विचित्र बात है न? कबीर साहब, दादू साहब, रैदास साहब, भक्तिकाल के और कितने ही संत, सिख गुरुओं की एक पूरी परंपरा ही, पूरी श्रंखला ही, और फिर गुरु ग्रंथ साहिब। कितनी कोशिश की गई कि सच्चाई इंसान तक पहुँचा ही जाए लेकिन हम अंधेरे को ही जिताना चाहते हैं। और यह सबकुछ भारत भूमि में हो रहा है। किसकी सफ़ाई की जा रही है? सनातन धर्म की। उसी में ही तो जब देखते हैं बुद्ध कि तमाम तरह की अशुद्धियाँ आ गई हैं, तो कोशिश करते हैं सफ़ाई की न? अशुद्धियाँ हटाने की इतनी कोशिश की जा रही है लेकिन हमें अशुद्धियों से ही प्यार है। हम कहते हैं, 'यही तो धर्म है हमारा।' हमने अशुद्धि को ही धर्म मान लिया है और जो असली धर्म है, उसको हम किनारे कर देते हैं बार-बार।

मैं कह रहा हूँ, 'विचित्र बात है!' क्योंकि जो सर्वश्रेष्ठ बात है, वह हमें उपलब्ध है पाँच हज़ार साल से, उसका नाम वेदांत है। हम उसको सम्मान नहीं देते, हम इधर-उधर की सौ चीज़ों को सम्मान देते हैं। और मैं बहुत ज़िम्मेदारी के साथ बोल रहा हूँ, 'वेदांत अंतिम बात है।' कभी-भी कोई सुधार कार्यक्रम चलेगा सनातन धर्म में, तो वह अंततः यही कह देगा कि वेदांत शुद्ध है; बाकी सब हटाओ। और यह बात भी मैं बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ कि बौद्ध धारा हो, जैन धारा हो, सिख धारा हो, सब वेदांत पर ही अवलंबित हैं। ऐसा नहीं कि उन्होंने उपनिषदों से कुछ उठाया है, बात यह है कि जब भी कोई व्यक्ति समझदारी से और ध्यान से जीवन का सत्य जानेगा तो वह वही बात कहेगा जो उपनिषदों में लिखी हुई है। आवश्यक नहीं है कि वो उपनिषदों को पढ़कर के कहे।

और आज पश्चिम में भी वही हो रहा है। मैं आपसे कल कह रहा था कि पश्चिम ने अद्वैत वेदांत को बड़े खुले हृदय से स्वीकार कर लिया है। अद्वैत वेदांत की पकड़ पश्चिम पर बढ़ती ही जा रही है, बढ़ती ही जा रही है। और भारत में क्या बढ़ रहा है? घर की मुर्गी दाल बराबर! हमारे मुहावरों में भी हिंसा है। क्या बोल दिया मैंने! आप देख रहे हैं किस तरीके से समाज हमारी कंडीशनिंग करता है, मुहावरे में डाल दिया है― मुर्गी खाओ। यह बात स्पष्ट है यहाँ तक? इस पर कुछ बोलना चाहते हैं?

प्र: प्रणाम आचार्य जी, धर्म के बारे में जो आपने यह बात बताई है, उस पर कुछ प्रश्न हैं। जैसे धर्म का नाम सुनते ही एक बात दिमाग में आती है कि हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, मुस्लिम धर्म। ओम लिखा हुआ है तो ओम देखते ही समझ में आता है कि हाँ, यह हिंदू धर्म है। आखिर शुद्ध धर्म क्या है? ऐसा धर्म जिसको अपनाकर सभी लोग, किसी भी जाति के हों, किसी भी धर्म के हों, किसी भी पंथ के हों, गोरे हों, काले हों, चिट्टे हों, सभी लोगों पर शुद्ध रूप से उतरे, ऐसा धर्म क्या है?

आचार्य: अपनाने वाली क्या बात है, अपनाना माने क्या अपनाना? जब आप कहें कि आपने कोई धर्म अपना लिया है, तो अपनाने का क्या मतलब? क्या अपनाया आपने? उदाहरण के लिए आप बोले कि आपने फ़लाना धर्म अपना लिया, तो आप क्या अपनाते हो?

प्र: जैसे हम जानना यह चाह रहे हैं कि किस रास्ते पर चला जाए?

आचार्य: उस रास्ते से मतलब क्या है आपका? जब आप कहते हो कि मैंने फ़लाना रास्ता अपना लिया, तो आप क्या अपनाते हो?

प्र: जैसे हम वेदांत की बात करते हैं।

आचार्य: हाँ, तो वेदांत में अपनाने को तो कुछ है नहीं। वेदांत क्या है? वेदांत में कोई परंपरा है? कोई रूढ़ि है? कुछ करने को बोलता है वेदांत? आप कहोगे कि आपने वेदांत अपना लिया, तो आपने क्या अपना लिया?

प्र: जो बातें हैं वेदांत की, उसको अगर अपना लिया जाए।

आचार्य: कैसे अपनाओगे?

प्र: उस पर चलकर, उस रास्ते, उस मार्ग पर?

आचार्य: वह कुछ बोलती ही नहीं कि ऐसे चलो। क्या अपनाओगे?

असल में आपके लिए धर्म का मतलब ही है कि यह करो, यह न करो। अपनाने से आशय ही आपका यह है कि तिलक लगा लो, जनेऊ पहन लो, फ़लानी परंपरा में आ जाओ, फ़लाने त्योहारों को मनाओ, फ़लानी विधि लो पूजा की, यही सब तो अपनाते हो; धर्म के नाम पर और क्या अपनाते हो, मुझे बताओ न? अपनाना माने किसी चीज़ में विश्वास करने लग जाना या किसी नियम-क़ायदे का पालन करने लग जाना, इसी को तो आप कहते हो कि मैंने अब यह चीज़ अपना ली पर वेदांत में तो ऐसा कुछ है ही नहीं, क्या अपनाओगे? और इसीलिए वेदांत बहुत प्रचलित नहीं हो पाता क्योंकि हम अपनाने के लिए बहुत व्याकुल रहते हैं। हम फ़िराक में रहते हैं कि कुछ मिल जाए, बता दो कि करना क्या है।

कभी हम चाहते हैं कि कोई बता दे कि आप जनेऊ धारण कर लीजिए, कोई बता दे कि आप दाढ़ी लंबी रखिये, कोई बता दे कि आप इस तरीके से तिलक करिए या कुछ भी, कुछ और इस तरीके का। विवाह में इस तरह की विधियाँ होनी चाहिए, फेरे इस तरीके से लीजिए, मरने के बाद दफ़नाना है या जलाना है; वेदांत को दो धेले का मतलब नहीं इन बातों से। तुम्हारा शरीर मर गया, उसे दफनाओ, जलाओ, फेंक आओ, चिड़ियों के लिए छोड़ दो, वेदांत को कोई मतलब ही नहीं इन बातों से। आप क्या अपनाओगे? वेदांत अपनाने जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं है।

सारे धर्म आपस में लड़ते ही इसीलिए हैं क्योंकि उन सब के पास अलग-अलग तौर-तरीके हैं और वह तरीके भिड़ जाते हैं आपस में। बोध तो दो होते नहीं, सत्य तो दो होते नहीं, बोध-और-बोध तो आपस में लड़ेंगे नहीं, हाँ, तरीके-और-तरीके आपस में भिड़ जाते हैं। एक कहता है, 'साहब! हम लिखते हैं, तो हम लिखते हैं बाएँ से दाएँ की ओर।' एक कहता है, 'नहीं, उल्टा कर रहे हो, ग़लत कर रहे हो। हमें लिखना चाहिए दाएँ से बाएँ की ओर।' एक कहता है, ‘हाथ ऐसे धोते हैं, यहाँ पानी डालो तो पानी नीचे गिरेगा (हाथों को नीचे की ओर करते हुए)। एक कहता है कि नहीं, हाथ ऐसे धोते हैं, यहाँ डालोगे तो पानी इधर गिरेगा (हाथ ऊपर की ओर करते हुए); और भिड़ गए आपस में, कैसे धोना है। एक कहता है कि पूजा तब करेंगे जब बिलकुल नगाड़े, घंटे, शंख बज रहे हों, वह हमारी पूजा का हिस्सा है। एक बोलता है कि नहीं, पूजा के समय एकदम मौन होना चाहिए, पूरी शांति; लो भिड़ गए आपस में।

वेदांत कुछ कहता ही नहीं, तुम अपनाओगे कैसे वेदांत को? यही उसकी ख़ासियत है न, वह आपकी जेब में नहीं आएगा, आप उसे अपना नहीं सकते। अपनाने का मतलब होता है, यह मैंने अब अपना लिया (कोई वस्तु को हाथ में लेते हुए)। आप वेदांत को अपना ही नहीं सकते इसीलिए वह आपको पसंद नहीं आता। वह नहीं पसंद आएगा आपको। आप पता हैं न, कौन हैं? आप कौन हैं? दोहराइए!

श्रोतागण: अतृप्त चेतना।

आचार्य: हाँ, आपने अगर किसी चीज़ को अपना लिया तो वह चीज़ क्या हो जाएगी? वह चीज़ आपके हत्थे चढ़ जाएगी, वह चीज़ आपसे भी छोटी हो जाएगी, वह चीज़ आपके दुरुपयोग की हो जाएगी। इसीलिए वेदांत को अपनाया नहीं जाता, समझा जाता है। उसके बाद जो होता है अपनेआप होता है। अपनेआप होता है। हिंसा छूटती है, पशुओं का शोषण छूटता है, संबंधों में क्रूरता छूटती है, स्वार्थ, डर, सब अपनेआप छूटते हैं समझने से, एक सरलता आती है जीवन में, और धीरे-धीरे फिर एक समर्पण पैदा होता है। फिर अगर कोई समझदार आदमी आपको देखेगा तो वह अंतर भी नहीं कर पाएगा कि आप ज्ञानी हो या भक्त हो। यह सब फिर धीरे-धीरे अपनेआप होने लगता है। अपनाने जैसी कोई बात नहीं। आप यहाँ से ही घोषणा करके नहीं जा सकते कि आज से आप वेदांत को अपनाते हैं। और फिर शोर मच जाए, अरे-अरे-अरे! कन्वर्जन हो गया; हो ही नहीं सकता। कुछ समझ में आ रही है बात?

दिल खोलकर बोलिए! साफ़-साफ़ बोलिए! जो अपनी गहरी-से-गहरी बातें हैं, सब बोलिए! आप यहाँ औपचारिकता पूरी करने नहीं आए हैं। इस पूरे समय में, जो आप चौबीस घंटे यहाँ बिताते हैं, उसमें न तो वह समय महत्वपूर्ण है जब आप उन कमरों में जाते हैं, बैठे होते हैं, सो रहे होते हैं। न तो वह समय महत्वपूर्ण है जब आप बाहर वहाँ कुर्सियों पर होते हैं। न अभी सुबह-सुबह जो हम वहाँ तट पर कर रहे थे, वह बहुत महत्वपूर्ण था। आप जानते हैं न, महत्व का क्या है? क्या है? यह समय। यह समय अगर आपने ठीक बीता लिया तो शिविर आपके लिए सफल हो गया। नहीं तो फिर ऋषिकेश घूमिये! बहुत यहाँ पर आकर्षण है। गोवा बीच! मिनी गोवा बीच! यहाँ पर आकर के, इस जगह मौजूद होकर के अगर आप-अपनी बात नहीं कह रहे—और बात से मेरा आशय है साफ़ बात, गहरी बात, वह बात जो आपके लिए व्यवहारिक महत्व रखती है—तो कोई लाभ नहीं।

और न यहाँ बैठकर के दर्शक-श्रोता बनिए कि दूसरे क्या पूछ रहे हैं वह सुनूँगा और भीतर-ही-भीतर कहता चलूँगा, 'इसका सवाल बेकार है, यह क्या है, साइको केस है, यहाँ क्यों पूछ रहा है सवाल?' बहुतों का यही चल रहा होगा, कोई और पूछ रहा है, उसके बारे में धारणा बना रहे हैं, 'अरे! यह क्या बेकार है, समय ख़राब कर रहा है सबका।' ऐसे नहीं करना। और मैं यह अपने स्वार्थ के लिए बोल रहा हूँ आप सबसे, मैं नहीं चाहता कि आप सब यहाँ से जाएँ और बोलें, 'हाँ, ठीक था। कुछ लोग सवाल पूछ रहे थे, सवालों में दम नहीं था।' तो आप पूछ लेते।

प्र: भगवान बुद्ध ने कहा कि मेरी शरण में आइए, मैं आपको मार्ग दिखाऊँगा, मैं आपको मार्ग बताऊँगा मुक्ति का, करना तो आपको अपनेआप से ही पड़ेगा।'

आचार्य: क्या है उनका मार्ग, बताइए?

प्र: जो उन्होंने कहा, तो मैं उसके बारे में जानना चाह रहा था?

आचार्य: अरे भई! तो उन्होंने बुलाया, मेरे पास आ जाओ। मैं भी तो बुलाता हूँ, मेरे पास आ जाओ। बुलाना तो पड़ता ही है लेकिन बुलाकर यह थोड़ी ही है कि कोई आपको विशेष मार्ग दिखाया जा रहा है कि इस मार्ग पर चलो। मार्ग वगैरहा तो फिर कालांतर में जो समुदाय निर्मित होता है, वह अपनेआप तय कर लेता है कि हम ऐसा करेंगे वैसा करेंगे, ऐसे माला फेरेंगे। बुद्ध ने तो एक दर्शन दिया है, वो दर्शन अगर आप समझ गए तो ठीक है, वो नहीं समझे और आप इधर-उधर घूम रहे हैं, सिर मुंडाकर अपनेआप को बौद्ध बोल रहे हैं, तो उससे कोई लाभ थोड़ी होगा आपको। इतने बौद्ध घूम रहे हैं, क्या लाभ हो गया? बौद्ध हिंसक भी खूब होने लग गए, और बुद्ध की बात उठी ही थी करुणा से।

बहुत चीज़ें थी जो महात्मा बुद्ध को पसंद नहीं थी। जैसा वर्तमान उस वक़्त सनातन धर्म हो गया था, उसमें बहुत चीज़ें थी जो उन्हें नहीं ठीक लगी। जिसमें से एक चीज़ यह थी कि यह जो पूजा-पाठ होता था, इसमें जानवर बहुत काटे जाते थे, और उनका हृदय बिलकुल द्रवित हो गया। वो व्यक्ति ऐसे थे कि—सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता है, 'माँ कहे एक कहानी' पढ़ी है? 'सुन उपवन में बड़े सवेरे तात भ्रमण करते थे तेरे' पढ़ी है? तो वह सुबह-सुबह जाते थे टहलने के लिए, तो किसी ने एक कबूतर को तीर मारा और कबूतर आकर के उनके सामने गिरा। और उन दिनों नियम यह था कि भई! अगर आप शिकार करते हैं तो यह एक जायज़ पेशा है। और शिकार पर शिकारी का हक़ होता है, आखेट पर आखेटक का अधिकार होता है। तो वह व्यक्ति आ गया और बोला, 'मैंने मारा है कबूतर, भई मुझे चाहिए, मैं खाऊँगा, बेचूँगा, कुछ भी करुँगा मेरी चीज़ है।' बुद्ध बोले, 'मैं नियम तोड़ता हूँ। होगा नियम, मैं नहीं मानता।'

बोले, 'न्याय दया का दानी, माँ कहे एक कहानी।' दया, न्याय से भी बड़ी होती है। मैं नहीं दूँगा तुम्हें यह कबूतर। वो ऐसे थे। अब वह देख रहे हैं कि तुम बकरे काट रहे हो, मुर्गे काट रहे हो, भैंसे काट रहे हो, और पूजा-पाठ के बाद तुम उनका माँस खा रहे हो। उन्होंने कहा, 'चाहिए ही नहीं ऐसा धर्म, मैं नई धारा स्थापित कर दूँगा, मुझे यह धर्म नहीं चाहिए जिसमें यह सब चलता है।' और उनके बौद्ध आज खूब हिंसक हुए पड़े हैं। म्यांमार में देखो, श्रीलंका में देखो, दुनियाभर में, कोई इन्हीं दो देशों की बात नहीं हैं।

हम महापुरुषों की बातों को, सिद्धांतों को और उद्देश्यों को बर्बाद करने में एकदम सिद्धहस्त हैं। हममें और कोई खूबी हो-न-हो, यह ज़रूर है कि कोई व्यक्ति हमारे लिए कितना भी ऊँचा काम करके चला जाए, हम उसको मटिया-मेट कर ही देते हैं। और मटिया-मेट भी यह कहकर नहीं करते कि मुझे उस आदमी का विरोध करना है; हम कहते हैं, मैं उस आदमी का अनुयायी हूँ। सोचो, यह कितनी भयानक बात है। आप बोलते हो कि मैं सनातन धर्म को मानने वाला हूँ और आप इस तरह से मानते हो कि सनातन धर्म बर्बाद हो जाए। आप बोलते हो कि मैं बुद्ध का अनुयायी हूँ और आप वह सारा काम करते हो जिससे बुद्ध की शिक्षा बर्बाद हो जाए।

चार आर्ष वचन हैं उनके, शुरुआत करते हैं―जीवन दुख है। फिर कहते हैं, दुख का सीधा संबंध कामनाओं से है। फिर कहते हैं कि अष्टांग मार्ग का अनुसरण करके दुख से मुक्ति पायी जा सकती है। और जो उनका अष्टांग मार्ग है, वह भी बहुत सीधा है―सम्यक दृष्टि, सम्यक श्रवण, सम्यक आजीविका, सम्यक विचार, सम्यक कर्म। कोई बहुत ख़तरनाक बातें नहीं कि आप कहें कि मुझे समझ में नहीं आया। इस आधार पर फिर आगे बौद्ध दर्शन ने बहुत-बहुत कुछ बोल दिया। और फिर ज़ेन, बौद्ध धर्म को और आगे ले गया। वास्तव में वेदांत का एक तरह से अंतिम प्रतिफलन 'ज़ेन' है।

'बुद्धम शरणम गच्छामि' माने आकर बुद्ध का चरण स्पर्श करना नहीं है भाई, उसको भी बुद्ध की तरह ही सुनो। जैसे बुद्ध की पूरी शिक्षा ही नकार की है, न कहने की है—वेदांत की तरह ही—वैसे ही। 'बुद्धम शरणम गच्छामि' का मतलब है, अहम् की शरण में नहीं रहूँगा। क्योंकि बुद्ध क्या हैं? कोई व्यक्ति हैं? कोई विचार हैं? नहीं। तो बुद्ध की शरण में कैसे चले जाओगे? अहम् की शरण में नहीं रहूँगा। और आगे जो बातें कही गई हैं, 'धम्मम शरणम, संघम शरणम' वह एक तरह से विधि है। संघ तो विधि ही है सीधे-सीधे। 'धम्मम शरणम' माने जो हीन धर्म है, जो नकली धर्म है, छोड़ो न उसको, कहाँ फँसे हुए हो?

सारा खेल झूठ को छोड़ने का है, इसीलिए महोत्सव की शुरुआत में ही मैंने कहा, 'डरो मत'। छोड़ने में डर ही तो बाधा है और क्या। वो अपना राजपाट छोड़ सकते थे, पत्नी, छोटा बच्चा; आपके पास ऐसा क्या है कि डर रहे हो? और याद रखिए, उन्होंने जो भी छोड़ा उससे कहीं बढ़कर पाया। पत्नी और बच्चा भी छूट नहीं गए, वह दोनों भी अंततः आ ही गए बौद्ध धारा में। पत्नी और बच्चे का भी कोई नुक़्सान नहीं हो गया यदि बुद्ध ने सही रहा पकड़ी तो। बड़े भाई को तो साथ ही लेकर गए थे, माने कुछ काल के बाद। आनंद उनके साथ बहुत समय तक रहे। और पत्नी का भी ऐसा नहीं हुआ कि वह विक्षिप्त हो गईं और बच्चा आवारा निकल गया। वह बेटा भी बौद्ध भिक्षु बना। पत्नी ने और पूरे परिवार ने अंततः धर्म को स्वीकार किया। यह उन्होंने ग़लत करा अपने परिवार के साथ? आप किस बात पर डर रहे हैं?

और राजा बनकर के बुद्ध को जो यश और कीर्ति मिलती, महात्मा बनकर, भगवान कहलाकर क्या उससे कम यश और कीर्ति मिली? बोलिए! मैं नहीं कह रहा हूँ कि यश और कीर्ति के लिए आप इधर-उधर भाग जाएँ। पता नहीं, हमेशा तो खटका रहता है कि क्या बोल रहा हूँ और क्या अर्थ हो जाए उसका। कह रहे हैं, 'घर में तो वैसे ही कोई घास नहीं डालता, भाग जाते हैं तो कुछ भाव बढ़ेगा।' यह नहीं करने को बोला—डिस्क्लेमर।

मैंने कहा, 'सही काम का कभी ग़लत अंजाम नहीं होता।' लेकिन सही काम किसी ऊँचे अंजाम की कामना से मत करना, सही काम हमेशा निष्काम होता है। यह तो ऊपरी अनुकंपा की बात है कि उसका अच्छा परिणाम आ ही जाता है अपनेआप लेकिन अच्छे परिणाम की इच्छा करके सही काम मत करने लग जाना। सही काम करो, बस इसलिए क्योंकि वह सही है। वो करना है, अंजाम जो भी होगा देखेंगे। हमें नहीं पता इसका अच्छा आएगा, बुरा आएगा अंजाम या कब आएगा हमें नहीं मालूम, पर यह करा जाना चाहिए तो हम करेंगे। समझ रहे हैं?

प्र: आचार्य जी प्रणाम, जब-जब धर्म के सुधार के लिए काम करते हैं महापुरुष, तो कालांतर में ऐसा दिखता है कि उनके द्वारा जो शुरू किया हुआ काम है वह किसी-न-किसी पंथ या फिर एक नए ही समाज में बदल जाता है। और फिर उनको मानने वाले लोग मुख्यधारा से ख़ुद को अलग समझने लगते हैं या अलग उसका पालन भी करते हैं। तो मेरा यह सवाल आ रहा है कि क्या इतना ही काफ़ी नहीं होना चाहिए कि सत्य की जहाँ बात हो रही है, उसी दिशा में हम बढ़ें? यह जो छोटे-छोटे पंथ बनते हैं, वह न बनें और मुख्यधारा से टूटें न?

आचार्य: नहीं, वो जो बनाते होंगे, बनाते होंगे। पूछना क्या चाह रहे हो?

प्र: जो जैसे बुद्धिष्ठ हैं या इस्लाम है, या क्रिश्चनटी है तो उनको मानने वाले या उनको पालन करने वाले ऐसा दिखता है कि यह जो मैं ग्रंथ पढ़ रहा हूँ, या जो दर्शन में जान रहा हूँ, वहीं अंतिम है, और वही सबकुछ है।

आचार्य: बेटा! यह सबको लगता है। बहुत साहस चाहिए यह मानने के लिए कि अभी मैं समझा नहीं, अभी मैं अंत पर पहुँचा नहीं, अभी और चीज़ें बाकी हैं। अहंकार जल्दी से यही बोल देना चाहता है कि मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, मेरी सोच सर्वश्रेष्ठ है, मैं अव्वल नंबर हूँ, तो मेरा धर्म भी अव्वल नंबर होगा।

आप ऐसे समझो! एक व्यक्ति है जो आज हिंदू है और वह बहुत ज़ोर-ज़ोर से नारे लगाता है कि मेरा धर्म एक नंबर। वह धर्म परिवर्तन कर लेता है, कल को कुछ और बन जाता है, ईसाई, मुसलमान कुछ भी। और वह ईसाई या मुसलमान बनकर बोलता है, 'मेरा धर्म एक नंबर।' धर्म बदल गया, पहले हिंदू था अब कुछ और हो गया, क्या नहीं बदला? क्या नहीं बदला? मेरा धर्म। तो यह जो तुम धार्मिक कट्टरवाद देखते हो या दंगे वगैरह भी अक्सर देखते हो, उसमें एक बड़ा कारण यही होता है। मेरी चीज़ है न, बुरी कैसे हो सकती है। मेरे भगवान जी हैं, बुरे कैसे हो सकते हैं। ऐसा नहीं कि तुम्हें भगवान से बहुत प्यार है अपने। ऐसा नहीं कि तुम्हें भगवान से, ईश्वर से या सत्य से बड़ा प्रेम हो गया है, तुम कह रहे हो, 'यह मेरी तरफ के हैं न, मेरे वाले हैं, मेरे वाले।'

यही बात फिर देश पर लागू होती है, मेरा देश है न, बुरा कैसे हो सकता है? ले-देकर के अपने व्यक्तिगत अहंकार की बात है। आपको देश से नहीं कोई मतलब है, न आपको धर्म से मतलब है, आपको मतलब बस इस बात से है कि 'मेरा है' और मैं फन्ने ख़ाँ हूँ, फन्ने ख़ाँ का देश बुरा कैसे हो सकता है। मैं उस्ताद आदमी हूँ, सब जानते हैं, पूरे मौहल्ले में मेरा नाम है, मेरी कोई भी चीज़ ख़राब कैसे हो सकती है। मेरे पास जिस ब्रेंड की बाइक है, वो ही ब्रेंड बेस्ट। मैं जिस धर्म का हूँ, वह धर्म बेस्ट; होना पड़ेगा क्योंकि वह मेरा है, और अपुन क्या? एक नंबर।

हम जिसको धर्म या धार्मिकता बोलते हैं, वह ज़्यादातर सिर्फ़ वही पुराना सड़ा-गला प्राचीन अहंकार है, उसका सच्चाई से कोई संबंध नहीं है। अंधकार की यह तुम चाल देखो! दाद देनी पड़ेगी अहंकार की, वह धर्म बनकर आ गया। तभी तो कहते हैं, 'माया महा ठगनी हम जानी।' वो यह बोलती थोड़ी है कि 'मैं माया हूँ।' वह बोलती है, 'मैं सत्य हूँ, मैं ही धर्म हूँ, मेरा पालन करो।'

प्र आचार्य जी प्रणाम, मेरा प्रश्न है कि यह इतना मुश्किल क्यों है क्योंकि आप बोले कि वेदांत हाथ नहीं आ सकता और समझना ज़रूरी है। तो मेरा प्रश्न फिर से उसी के ऊपर केंद्रित है कि जैसे मैंने लल्लेश्वरी देवी के बारे में पढ़ा, वहाँ पर भी देह अभिमान से मुक्त होने की बात कही गई है। मैंने आपसे बहुत बार सुना है, सर्वसार उपनिषद में भी उसके बारे में ज़िक्र हुआ है― देहभाव से मुक्त होना, चेतना। और यह इतना मुश्किल क्यों है? मतलब वास्तविक जीवन में अगर देखा जाए तो पूरी दुनिया भरी हुई है प्रलोभन से, मन हमेशा विचलित रहता है शरीर की ज़रूरतों को पूरा करने में, इच्छाओं के पीछे दौड़ने में, तो इसके लिए यह क्या साधना है या कुछ करना पड़ता है? मतलब अभी आप बोले, 'करना नहीं है, समझना है।' तो मैं इसी चीज़ को जानना चाहता हूँ कि यह क्या है? तो विधि क्यों नहीं चाहिए, वही मैं जानना चाहता हूँ?

आचार्य: नहीं, ऐसा नहीं कि विधि नहीं चाहिए, बहुत सारी विधियाँ चाहिए अलग-अलग समय पर। अभी मुझसे बात कर रहे हो, यह विधि नहीं है क्या? यह विधि नहीं है? यह जो संवाद है, यह विधि नहीं है? तो विधि है तो। मैं तुम्हें कोई पत्थर पर उकेर कर विधि नहीं देना चाहता कि तुम उसी का पालन करते रह जाओ। तुम्हारा बोध तुम्हें बताएगा किस समय कौन-सी विधि लगानी है।

विधियाँ तो हैं ही। तुम भी विधि का उपयोग कर रहे हो पूछकर, मैं भी विधि का उपयोग कर रहा हूँ बोलकर। आप में से इतने लोगों ने अभी बात करी है तीन दिनों में, क्या मैंने सबसे एक ही तरीके से बात करी? सबको अलग-अलग उत्तर दिया न? और अलग-अलग तरीके से उत्तर दिया, कहीं हँस भी दिया होऊँगा, कहीं यह भी लगा होगा कुपित हैं। किसी को बहुत लंबा उत्तर दिया आधे घंटे का, किसी को दो ही मिनट का, यह विधि ही तो है। नियम होता कि सबको पंद्रह मिनट बोलो, तो? किसी नियम का पालन हो रहा है क्या? होश होना चाहिए, वह बता देगा कि क्या करना है आगे।

अभी पूछना विधि है, सुबह आप चाहे अपना टेस्ट करा रहे हों एंटीजन या चाहे गंगा तट पर हों। वहाँ कहते हैं कि किताब साथ रखिए, जो भी समय मिले पढ़ लीजिए। तो वहाँ क्या विधि हुई? क्या विधि हुई? पढ़ना। सुबह-सुबह क्या विधि हुई, पढ़ना। दोपहर आते-आते विधि बदल गई, अब क्या विधि है?

श्रोतागण: सुनना।

आचार्य: पहले पूछना। सुनना, तो पूछेगा कौन (हँसते हुए)? और शाम होते-होते क्या विधि हो जाएगी? गाना। वहाँ भी गाना होता है। एक ही दिन में तीन विधियाँ लग गईं। और यहाँ इतनी सारी किताबें हैं, फिर जब आप वापस जाएँगे अपने कमरे में तो वहाँ क्या विधि हो जाएगी? फिर पढ़ो। तो जीवन में हर समय अलग-अलग विधि चाहिए होती है। कोई एक विधि सब अवस्थाओं में काम नहीं करती।

हम क्यों माँगते हैं कि एक-दो चीज़ें बता दीजिए बस? ताकि बेहोश होने का सुख ले सकें। बेहोशी में सुख है कि नहीं है, बोलो? वही जो सोते समय आता है, सोते में आता है न? कोई उस वक़्त न बोध होता है, न होश, न ज्ञान लेकिन सुख कितना होता है, चाहा पड़े हुए हैं। शराब पीकर धुत्त हो गए, सुख आता है कि नहीं? कुछ नहीं पड़े हैं तो उसमें एक सुख होता है।

जिस आदमी को बेहोशी के सुख की आदत, लत लग गई होती है, उसके लिए बोध एक तनाव जैसे होता है। अटेंशन, टेंशन जैसा लगता है। और वह होता भी है, मैं सहमत हूँ। अगर बेहोशी की आदत है और आपको कहा जाए कि जीवन ध्यान में जियो और मैं तो कहता हूँ कि चौबीस घंटे ध्यान में रहो तो बड़ी तकलीफ़ हो जाती है। तो फिर कहते हैं, 'आधे घंटे वाला कुछ बता दो विधि वगैरह, वो ठीक लगता है।' आधे घंटे ध्यान में रह लो, फिर? (हाथों की सहायता से आराम की स्थिति का अभिनय करते हुए)

चौबीस घंटे वाले में दिक़्क़त हो जाती है, एक-एक कदम का ध्यान रखना पड़ता है, क्या कर रहा हूँ, क्यों कर रहा हूँ, क्या बनकर कर रहा हूँ, पहले भी तो यही करा था। फिर दोहरा रहा हूँ, 'निरंतर होश में रहना पड़ता है।' क्रोध आता है, खुंदक आती है (मुँह की सहायता से खुंदक का अभिनय करते हुए)। 'नहीं रहना होश में, बेहोशी चाहिए। हटाओ भजन, डीजे लगाओ!' और उसका सुख है, उसमें सुख होता है कि नहीं होता है?

डांस फ्लोर पर सभी गए हैं, आप भी गए हैं, मैं भी गया हूँ, उसका भी एक अपना सुख है। उसका सुख ही यही है कि कुछ सोचना नहीं, कुछ जानना नहीं, अपनेआप को छोड़ दिया है। और डांस फ्लोर से पहले अगर दो पैग मिल गए हैं तो फिर तो। इसलिए होता है यह क्योंकि प्रकृति नहीं चाहती कि आप होश में आओ। यह मैच फिक्सड है, यह गेम रिगड है। अब समझ में आ रहा है आप कितनी ख़राब हालत में हो? आप, मैं, हम सब?

आप जब पैदा होते हो, क्यों पहला ही वचन बुद्ध का है कि जीवन दुख है? क्योंकि मैच फिक्सड है, आप पैदा ही होते हो दुख झेलने के लिए। क्यों कहना पड़ा था अभी ओम शांति शांति शांति? क्यों कहना पड़ा था? क्योंकि एक नहीं तीन तरह की अशांतियाँ हैं। इसीलिए ज़रूरी होता है कि पाँच-दस बार दोहराओ शांति पाठ को। ऋषि बेचारे भोले लोग थे, उन्हें लगा तीन तरह की हैं, मैं तो तीन सौ तरह की देखता हूँ। तीन सौ हैं न यहाँ सामने (श्रोताओं की गिनती की ओर इशारा करते हैं)।

मैंने कहा, दोहराओ, दोहराओ और दोहराओ। सोते समय भी दोहराया करो, दिन में कई बार दोहराया करो, 'ओम शांति शांति शांति।' मामला गड़बड़ है, पहली बात। दूसरी बात, हार नहीं माननी है। इसी अंधेरे में से रोशनी फूटेगी, बस तुम अंधेरे को ही रोशनी मत मान लेना। पहले मानो अंधेरा घना है, उसके बाद इसी अंधेरे में हम रोशनी लेकर आएँगे। समझ रहे हैं बात को?

आज मेरी आपसे इस शिविर की आख़िरी चर्चा होगी। और जब आप यहाँ से जा रहे होंगे—हर बार होता है—मैं जब वापस जाता हूँ, मैं बड़ा व्याकुल-सा हो जाता हूँ कुछ देर के लिए कम-से-कम। आख़िरी दिन ही नहीं, कल भी मैं शाम को यहाँ से से लौट रहा था जानकी सेतु की तरफ तो उदित ने रिकॉर्डिंग शुरू कर दी और पूछने लग गया कि कैसा लग रहा है? उसको अच्छे से पता था कैसा लग रहा है इसलिए पूछ रहा था।

मुझे ऐसा लगता है, 'मैंने कुछ खड़ा करा है और अब मैं जा रहा हूँ, वो नष्ट हो जाएगा।' मेरा बस चले तो मैं आपको जाने ही न दूँ, पर वह हो नहीं सकता। और मुझे पता होता है कि मैं आपको छोडूँगा और आप फिसलोगे। मैं ख़ुद फिसल जाता हूँ, मैं भली-भाँति जानता हूँ कि कितनी ज़्यादा फिसलन है। और फिसलन ही नहीं है, फिसलन वाली ढलान है कि अगर फिसलोगे तो और ज़्यादा फिसलोगे। थोड़ा-सा अगर कदम डगमगाए कि लुढ़कना चालू और फिर लुढ़कते जाते हो। तो इसीलिए मैं फिर कोशिश करता हूँ कि सत्र को लंबे-से-लंबा खीचूँ, लंबे-से-लंबा खीचूँ। वैसे तो हम कहते हैं कि दो घंटे का सत्र होगा, निश्चित यही होता है कि पूरी बातचीत दो घंटे चलेगी पर दो घंटे पर तो कभी रूकती ही नहीं।

हमारा हाल ठीक नहीं है। इसीलिए जब मैं लोगों को खुशी वगैरहा मनाते देखता हूँ तो भीतर से एकदम प्रतिक्रिया उठती है। जैसे कोई मरीज अपनी दवाई कराने की जगह पार्टी मना रहा हो।

क्या आपको आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं से लाभ हुआ है?
आपके योगदान से ही यह मिशन आगे बढ़ेगा।
योगदान दें
सभी लेख देखें