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आत्मा: दस सवाल, अंतिम जवाब || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: मेरे पिताजी का देहांत हुआ अगस्त में, तो प्रथानुसार तेरह दिन का कार्यक्रम हुआ, गरुड़ पुराण का पाठ हुआ ताकि पापा की आत्मा को मुक्ति मिल सके। गरुड़ पुराण में बोला है कि हमारे कई कर्म करने से आत्मा कहीं-कहीं तो जाती है, पंडितों को दान और भोज देने पर बहुत ज़ोर दिया जाता है, कपड़े, सोना-चांदी, गाय, यहाँ तक कि पलंग और चद्दर भी देना होता है। ना देने पर पाप लगने की बात है, कहीं पर तो यहाँ तक बोला है कि गर्म तेल में उबाला जाएगा।

मेरे भाई ने यह सब देखने के बाद कहा कि ज़रूर ये वाला पुराण किसी ने इसलिए लिखा है ताकि उसके वंशजों की आजीविका का परमानेंट इंतज़ाम हो जाए।

आचार्य जी, इन तेरह दिनों के कार्यक्रम का क्या महत्व है, कैसे कोई और किसी की आत्मा को मुक्ति दिला सकता है?

आचार्य प्रशांत: आप जानती ही हैं मेरा इस विषय में क्या कहना है, मुझसे बुलवा कर परेशानी में डालेंगी।

(श्रोतागण हँसते हैं)

प्र: मम्मी ने पूछा है।

आचार्य: उन्हें भी पता है।

(श्रोतागण हँसते हैं)

वैसे ही बदनाम हूँ कि ये ख़राब किए दे रहा है हमारे धर्म को!

देखिए, फिर, मूलभूत बात जो बहुत सीधी है, साफ़ है, एकदम सरल; सच दो नहीं होते न? – एक-एक कदम पर चलेंगे – सच दो तो नहीं होते, सत्य एक होता है, ठीक।

वैदिक धर्म है आपका, वैदिक धर्म है न? वैदिक सत्य वेदान्त में है। उसे वेदान्त नाम मैंने नहीं दिया है। स्वयं वेद उसे वेदान्त बोलता है। स्वयं वेद कहते हैं कि हमारा शिखर वेदान्त है। उपनिषद् वेद ही हैं, वेदों से भिन्न नहीं हैं। वेदों में ही जो उच्चतम ज्ञान की बाते हैं, उन्हें उपनिषद् कहा जाता है। मोटे तौर पर समझाने के लिए कह रहा हूँ।

हम अगर कहते हैं कि वेदों में सत्य है तो माने उपनिषदों में सत्य है, ठीक? क्योंकि वेद स्वयं कहते हैं कि उपनिषदों से ऊँचा कुछ नहीं। उपनिषदों में सत्य है, और सत्य दो होते नहीं।

एक-एक कदम साथ चल रहे हैं?

उपनिषदों में सत्य है, सत्य दो होते नहीं, तो आपको अगर कोई धार्मिक बात ऐसी मिलती है जो उपनिषदों के विरुद्ध जाती है तो तत्काल उसको क्या मान लेना है? असत्य ही है न? या ये कहेंगे कि ‘ये बात भी ठीक है, लेकिन यह बात भी तो ठीक है!‘ – ऐसे चलेगा क्या? यह कोई बात नहीं है, सत्य कोई बात नहीं होती।

आत्मा के भटकने और आत्मा के इधर-उधर डोलने का अर्थ क्या है जब आत्मा अनंत है, अचल है? ना उसका जन्म है, ना मृत्यु है, तो वो कैसे यहाँ आ जाएगी, वहाँ चली जाएगी? जो चीज़ अनंत है वो कहीं प्रवेश कैसे कर जाएगी? जिसके ना अंदर कुछ है ना बाहर कुछ है, वो किसी शरीर के अंदर कैसे पायी जाएगी? जिसकी कोई सीमा ही नहीं, वो संसार की सीमाओं में कैसे आ जाएगी? उसकी आप बात कैसे कर लेंगे, वो चीज़ मन की सीमाओं में कैसे आ जाएगी? आत्मा के बारे में आपने इतनी कहानियाँ उड़ा कैसे दीं जब वो असीम-अनंत है तो?

भारत के पतन का कारण अगर मुझसे कोई पूछे कि एक बताइए तो मैं कहूँगा ‘आत्मा’ शब्द का दुरुपयोग। अगर हम एक जागृत समाज होते तो आत्मा शब्द के दुरुपयोग पर दंड निर्धारित होना चाहिए था। और आत्मा को लेकर जो किस्से-कहानियाँ बनाए उन्हें सीधे-सीधे अपराधी घोषित किया जाना चाहिए था। क्योंकि आत्मा ही आपकी आख़िरी संभावना है, आत्मा ही आपको बचा सकती है। उसी के लिए आप जी रहे हो, और अगर किसी ने उसे ही दूषित और भ्रष्ट कर दिया तो फिर अब आपके लिए बचा क्या? सब नष्ट हो गया न? अगर आपके मन में आत्मा को ही ले करके भ्रामक सिद्धांत डाल दिए गए हैं तो आप जियोगे कैसे?

ये तो ऐसी सी बात हो गई कि जो मरीज़ के लिए आख़िरी और सबसे ऊँची दवाई हो सकती थी, बिलकुल रामबाण, वो भी बेअसर कर दी गई।

आत्मा सोल नहीं होती। जहाँ कहीं भी आप आत्मा के साथ सोल , रूह आदि पढ़ें, जान लीजिएगा कि मामला बहुत बहका हुआ है। जहाँ कहीं भी आप इस तरह की कोई बात पढ़ें कि आत्मा का गमन-आवागमन हो रहा है, वहाँ भी जान लीजिएगा कि या तो समझे नहीं हैं या भटका रहे हैं।

सबकुछ ही तो आवत-जावत है इस दुनिया में, आपने आत्मा को भी वैसा ही बना डाला? सबकुछ ही तो परिवर्तनशील है इस दुनिया में, आपने आत्मा को भी वैसा ही बना डाला? तो अब आत्मा आपके किस काम की बची अगर वो चीज़ भी सांसारिक हो गयी तो? ले-देकर के यह मटीरिअलिस्म (भौतिकवाद) ही है कि आप आत्मा को भी मटिरीअल (सामग्री) के गुणों से आरोपित कर दें।

जो काम पदार्थ करता है, जो काम भौतिक होता है वो सारे काम अगर आप आत्मा से भी करवाने लग जाएँ तो यह आपने क्या करा है? ये आपने आत्मा को भी मटिरीअल ही बना दिया न? क्यों बना दिया? क्योंकि हम ऐसे लोग हैं जिन्हें मटिरीअल की, पदार्थ की बड़ी लिप्सा रहती है। और हम ऐसे अहंकारी हैं जो मानने को तैयार ही नहीं होते हैं कि पदार्थ से हटकर कुछ हो सकता है।

तो हमने आत्मा के आयाम को भी भौतिक बना डाला, हमने आत्मा को भी खींचकर इस दुनिया में ही डाल दिया कि आत्मा ऐसी होती है, पेड़ पर चढ़ जाती है, पेट में घुस जाती है, फ़लाने लोक में चली जाती है, ऐसा करती है, वैसा करती है – यह सब काम कहाँ होते हैं? यह सब काम लौकिक हैं, ये सब काम मटिरीअल हैं। आपने आत्मा को ही मटिरीअल बना दिया! भूलिए नहीं कि जो भौतिक है, मटिरीअल है वही तो आपका दुःख है। आत्मा, जो आनंददायिनी होती, आपने उसको भी दुखदायिनी बना लिया अपने लिए? आत्मा को मटिरीअलाइज़ करके आप आत्मा को भी अपने लिए दुःख का स्रोत बना रहे हो न?

आत्मा कोई चीज़ नहीं है। चीज़ें आती-जाती हैं।

आत्मा अचिंत्य है। ये तो भूल जाओ कि वो कोई चीज़ नहीं है, वो इतनी दूसरी बात है कि उसके विषय में तुम कल्पना नहीं कर सकते, कुछ कह नहीं सकते, सुन नहीं सकते, बोल नहीं सकते – यही उपनिषदों का कथन है। और तुम एक-के-बाद-एक कहानियाँ सुना रहे हो – आत्मा अब ऐसे निकलेगी, यह करेगी, फ़लाने दिन निकलेगी, फ़लाना करेगी, अब चावल डाल दो आत्मा में, ये करो, वो करो – जो कुछ भी होता है।

आत्मा आत्मा है। अंग्रेज़ी में उसके लिए कोई शब्द नहीं तो उसको कह देते हैं सेल्फ़ ; सोल नहीं है।

और बहुत भ्रम फैलाया गया है, कितने ही अनुवाद हैं जिसमें जहाँ आत्मा लिखा होता है तो नीचे लिख देते हैं सोल। और फिर कहने लग जाते हैं, ‘ ट्रांस-माइग्रेशन ऑफ द सोल’ (आत्मा का स्थान-परिवर्तन) वगैरह-वगैरह, अब सौ तरह की...

रही बात पुराणों की, तो समझिएगा थोड़ा, पुराणों का यदि कोई युक्तिसंगत अर्थ हो सकता है वेदान्त के प्रकाश में तो उस वेदान्त-सम्मत अर्थ को ग्रहण किया जाना चाहिए। और यदि कोई पौराणिक बात है जो वेदान्त विरुद्ध जाती है तो उसको तत्काल त्याग देना चाहिए। पुराण केंद्रीय नहीं हैं। आप ये थोड़े ही बोलते हो कि आपका धर्म पौराणिक है। सामान्य ज्ञान की बात है कि आप वैदिक लोग हैं। और भारत का बहुत नुकसान हुआ है पुराणवादी बनकर। मुझे पुराणों से कोई समस्या नहीं है, भागवत पुराण पर तो मैंने पूरा एक कोर्स (पाठ्यक्रम) पढ़ाया है। पर पुराणों की भी सम्यक व्याख्या करने के लिए पहले आपको वेदान्त का ज्ञान होना चाहिए, तब आपको समझ में आएगा कि उन कहानियों का असली अर्थ क्या है। और सब कहानियों का अर्थ हो ऐसा भी ज़रूरी नहीं है, बहुत सारी कहानियाँ हैं जो बिलकुल अर्थहीन हैं; उनको हटाइए।

क्या तय करेगा, कैसे निर्धारित करें कि कहाँ अर्थ है कहा नहीं, क्या रखें, क्या हटाएँ? वेदान्त पैमाना है। श्रुति का अर्थ पुराण नहीं होता। जो कुछ श्रुति-सम्मत हो वो रखा जाएगा, बाकि सब त्याज्य है।

कितना बलहीन कर दिया हमने सनातन धर्म को यही सब कर्मकांड कर-करके! हम से ज़्यादा गुण ग्राहक तो पश्चिम के लोग निकले। उन्होंने भारत से वेदान्त ले लिया है, और वो भी विशुद्ध अद्वैत वेदान्त। नॉन डूऐलिटी (अद्वैत) पश्चिम में बहुत सम्माननीय और बहुत गंभीर चीज़ है, और भारत की बाकि चीज़ों की ओर वो देखते नहीं। वो कहते हैं, ‘मक्खन-मक्खन हमने ले लिया, बाकि तुम रखे रहो। तुम्हारे पूरे धर्म में जो एक काम की चीज़ है वेदान्त, जो अमर है, जो उच्चतम है वो हमने ले ली। बाकि तुम रखे रहो, अपने कर्मकांड, अपनी परंपराएँ, अपने खोखले विश्वास, तुम रखे रहो इनको।‘ और हम वो सब रखे हुए हैं।

जैसे आसाम के चाय के बागानों की जो उत्कृष्टतम पत्तियाँ हैं वो निर्यात कर दी जाती हैं और जो कुछ जला हुआ माल है वो हमारे पास आ जाता है चाय बनकर, ठीक वैसा ही धर्म में भी हो रहा है। जो उच्चतम है उसे विश्व ने ग्रहण कर लिया, और बाकि ये सब कि दूध कैसे चढ़ाना है, चावल कैसे लगाना है, यह हम रखकर बैठे हुए हैं।

और बहुत सम्मान देता है पूरा विश्व वेदान्त को, विशेषकर अद्वैत को। आप ये सब बताएँगे कि ब्राह्मण को कैसे दान देना चाहिए और कितने बोरे अनाज देना चाहिए, और साइकल भी देनी चाहिए और चारपाई भी देनी चाहिए तो दुनिया बहुत हँसेगी। और सही है कि हँसेगी, क्योंकि यह कोई धर्म की बात है? यह कोई धर्म विषयक चर्चा हुई? लकड़ी कितनी रखें, नारियल का मुँह किस दिशा होना चाहिए, केला कितना पका हो, कितना कच्चा हो – इन बातों का धर्म से क्या सम्बन्ध?

लेकिन हम डरे हुए लोग हैं – ये चीज़ें जिंदा क्यों हैं समझिए – हम डरे हुए लोग हैं। जब आप डरे हुए होते हो न तो आप कोई स्पष्ट निर्णय नहीं ले सकते।

मेरे सामने ये रखा है (मग दिखाते हुए) और ये रखा है (गिलास दिखाते हुए), ठीक? एक में अमृत है, एक में पानी है, मैं जानता नहीं क्योंकि मैं बोधहीन हूँ, मुझे कुछ पता नहीं। मुझे नहीं मालूम कहाँ अमृत है, कहाँ साधारण पानी है; मैं नहीं जानता। हाँ, मुझे इतना दिख रहा है कि इन दोनों में जो है वो अलग-अलग है। इसमें (गिलास में) जो है वो पारदर्शी है, इसमें (मग में) जो है मान लीजिए वो पीले रंग का है, लेकिन मैं कुछ नहीं जानता कि किसमें क्या है – मैं नहीं जानता ये जो पारदर्शी चीज़ है ये क्या है; मैं नहीं जानता इसमें पीला पदार्थ क्या है। मैं कुछ नहीं जानता।

कोई आकर कहता है कि ‘देखो भाई, अमृत तो दोनों में से कोई एक ही हो सकता है, और यह दोनों ही अमृत नहीं हैं क्योंकि दोनों अलग-अलग हैं – तो दोनों में से कोई एक है। एक काम करो, एक को फेंक दो।‘ मैं कुछ नहीं जानता, मैं क्या करूँगा? मैं कुछ नहीं फेंकूँगा, में दोनों को रखे रहूँगा – यह भारत ने करा है।

चूँकि हम जानते ही नहीं, इसीलिए हम कुछ भी त्याग नहीं पा रहे हैं। हम पुराने सड़े-गले, रूढ़ि-रिवाज़ और कर्मकांड नहीं त्याग पा रहे क्योंकि हम जानते ही नहीं हैं कि सच क्या है। हम सच जान जाएँ तो तुरंत अमृत को कंठ से लगा लेंगे और जो साधारण है, त्याज्य है उसको छोड़ देंगे।

पर जब कुछ नहीं पता होता तो इंसान जानते हो क्या बोलता है? – ‘ रिस्क (जोखिम) कौन ले? अगर मैंने ये चीज़ छोड़ दी और यही अमृत निकली तो? मैंने पौराणिक कर्मकांड छोड़ दिया और वही अगर अमृत निकला तो? रिस्क कौन ले?’ तो हम सबकुछ पकड़कर बैठे रहते हैं।

हम कहते हैं, ‘कर लो न! सब करते हैं, तुम भी कर लो – बाल मुंडा लो। क्या पता बाल ना मुंडाने से कुछ श्राप लग ही जाता हो। रिस्क कौन ले?’

जो जान जाएगा कि इन दोनों (गिलास और मग) में भेद है, और अमृत इनमें से एक में है वो एक को रखेगा, दूसरे को छोड़ेगा। और मैं दूसरे को छोड़ने के लिए कुछ बलात् नहीं कह रहा हूँ आपसे। पुराणों में भी बहुत हीरे-मोती हैं, और उनकी कथाओं का अर्थ इतना सुंदर और इतना गहरा जाता है कई बार कि मन आनंदित हो जाता है एकदम। लेकिन देखिए, उन कथाओं का भी अर्थ वह नहीं होता जो आपके सब कथा-वाचक वगैरह सुना रहे होते हैं। भागवत पुराण का भी हमने बड़ा शोषण किया है, बड़ा अन्याय किया है उसके साथ। यही काम हमने शिव पुराण के साथ किया है।

तो उपनिषदों को लेकर के मेरी सलाह स्पष्ट है – उपनिषदों की जो कथाएँ वेदान्त सम्मत हैं, उनको रखो, उनका बड़ा मूल्य है, और वो मीठी हैं क्योंकि कथाओं के माध्यम से बात ज़्यादा आसानी से समझ में आती है। तो वेदान्त के सिद्धांतों को यदि कथा रूप में समझाया जा रहा हो तो ये बहुत अच्छी बात है। लेकिन साथ ही मैं यह भी कह रहा हूँ कि पुराणों में और दूसरे अन्य जो ग्रंथ हैं हिन्दुओं के, उनमें बहुत कुछ ऐसा है जिसकी कोई उपयोगिता नहीं। उसको आज छोड़ दो क्योंकि वो बात आपको भटकाएगी उससे जो वेदों का अमृत है।

अमृत और विष को एक साथ नहीं पिया जा सकता। वेदों के मूल ज्ञान को और इधर-उधर के छोटे-मोटे ग्रंथों को एक साथ नहीं लिया जा सकता, खासतौर पर तब जबकि वो जो दूसरे ग्रंथ हैं वह वेदों के विरोध में ही खड़े हों।

उपनिषदों ने सिखाया – आपका एक धर्म है, उसका नाम है आत्मा; जात है आपकी अजात, धर्म है आपका आत्म। कोई आपको मिल गई है किताब जिसको आप कहते हो ‘यह हम हिंदुओं की किताब है’ और वो आपको जात-पात, ऊँच-नीच, भेदभाव सिखा रही है तो वो सीधे-सीधे उपनिषदों का खंडन कर रही है न? उस किताब को आप स्वीकार करोगे?

वेदों का अपमान करना हो तो इधर-उधर की व्यर्थ किताबों को स्वीकार करो।

और इतना पुराना आपका धर्म है, विषद उसका वांगमय है। अफ़गानिस्तान से लेकर के मलेशिया तक फैला हुआ था – और आगे तक बल्कि। इतने काल तक और इतने भौगोलिक विस्तार में लोगों ने अपनी-अपनी बातें कहीं, किताबें लिखीं। ज़ाहिर-सी बात है वो सारी बातें एक ही स्तर की नहीं हो सकतीं, और वो सारी बातें केंद्रीय नहीं हो सकतीं। कोई परंपरा जो इतनी पुरानी है, उसमें तो हज़ारों ग्रंथ लिखे गए होंगे। वो सारे ही ग्रंथ मार्मिक नहीं हो सकते, सत्यनिष्ठ नहीं हो सकते, केंद्रीय नहीं हो सकते।

यह बहुत घातक किस्म का उदारवाद है कि मैं या तो कुछ पढ़ूँगा ही नहीं या पढ़ूँगा तो अपने पसंद की किताब पढ़ूँगा। हम इसको अध्यात्म में भी लगा रहे हैं। मैं या तो पढ़ूँगा ही नहीं या अपने हिसाब से मुझे कुछ मिल गया, मैं वो पढ़ लूँगा, और कह दूँगा यही तो धर्म है – ये हम हिंदुओं के शास्त्र हैं। हर पुस्तक को शास्त्र नहीं बोल देते।

एक और चीज़ है इसमें, उसका उल्लेख आवश्यक है – संस्कृत भाषा भारत में कभी जन सामान्य की भाषा नहीं बनी, वो ब्राह्मणों के वर्चस्व में रही। और वो धर्म की भाषा थी, अध्यात्म की भाषा थी, और आम भारतीय धर्म-भीरू था, वह धर्म को लेकर के डरता था और संस्कृत जानता नहीं था। तो नतीजा यह हुआ कि कोई भी बात अगर संस्कृत में उससे बोल दी गयी तो उसको यही लगा कि ये बड़ी बात है, धार्मिक बात है, इसका सम्मान किया जाना चाहिए; उसने तुरंत हाथ जोड़ दिया।

आज भी ये आप प्रयोग करके देख लीजिए – आप कहीं गाँव-गँवाई में चले जाइए, बहुत साधारण-सी बात अब संस्कृत में बोल दीजिए, लोग ऐसे (हाथ जोड़कर) नमस्कार कर देंगे। यहाँ तक कि आप संस्कृत में कोई अपशब्द भी बोल दीजिए, लोग तो भी कहेंगे – ‘जी, जी, जय राम जी।‘ तो संस्कृत में जो भी किताब लिखी गई, लोगों को लगा वो सब किताबें एक बराबर हैं क्योंकि संस्कृत में हैं।

अरे भाई, संस्कृत एक भाषा है। उसमें आप कुछ भी लिख सकते हो। सिर्फ़ इसलिए कि कोई किताब संस्कृत में लिखी है, ऊँची नहीं हो जाती। संस्कृत में तो नाटक भी बहुत सारे लिखे गए हैं, क्या वो वेदों का स्थान ले लेंगे? बोलो!

संस्कृत में हर तरह का साहित्य लिखा गया है, वो उपनिषदों के बराबर हो जाएगा क्या? लेकिन चूँकि हम संस्कृत को जानते नहीं तो हमारे सामने संस्कृत में कुछ भी आ जाता है, हम उसे बोल देते हैं शास्त्र है। और फिर हम बोल देते हैं, ‘हम तो देखिए बहुत उदारवादी लोग हैं न, सनातन मार्गी। हमारे हज़ारों शास्त्र हैं, हमारे करोड़ों देवी-देवता हैं।‘

यह जो हज़ारों-करोड़ों वाली बात है, इसी ने हमें निस्तेज और बलहीन कर दिया, हमें कहीं का नहीं छोड़ा। सत्य जब एक है तो ये हज़ारों-करोड़ों की क्या बात है?

हज़ारों-करोड़ों तरह के झूठ हो सकते हैं, सच तो एक होता है न?

हाँ, उस एक की निकटता पा लो फिर ये हज़ारों-करोड़ों आपके लिए अर्थवान और जीवंत हो जाते हैं। लेकिन तब जब पहले उस एक की निकटता पाओ। एक की निकटता पाने के लिए वेदान्त चाहिए। वेदान्त को पा लो, फिर पुराण भी आपके लिए अर्थवान हो जाएँगे। वेदान्त कुंजी है जिससे बहुत सारी दूसरी किताबों के ताले भी खुल जाएँगे। कुंजी के बिना तालों पर सर फोड़ रहे हो, कौनसी बुद्धिमानी है?

मुझे इतना अफ़सोस होता है कि आम भारतीय के लिए धर्म का मतलब ही बस यही है – कितने दिये जलाने हैं, घी के जलाने हैं, तेल के जलाने हैं, वही कुट्टू का आटा और करवाचौथ, किस दिशा में मुँह करके सोना है, कौनसा दिन कौनसी देवी का, कौनसे देवता का होता है – बस यही है, उनसे आगे कुछ पूछो तो नहीं पता। बाहर जा रहे हो, दही चाटो। ये धर्म है? दही चाटने का धर्म से क्या लेना-देना? तो मेरा तो धर्म डूब ही गया, मैं तो वीगन (शुद्ध शाकाहारी) हो गया; ख़त्म।

फ़लाने सरोवर से जल लेकर के फ़लानी प्रतिमा पर चढ़ा दो, सारी कामनाएँ पूरी हो जाएँगी – ये धर्म है? और बिलकुल ठीक कहा आपने, किसी से पूछो, ‘ये कैसे है?’ तो बोलते हैं, ‘ये हाइअर एनर्जीज़ होती हैं, अलग डाइमेंशन्स (आयाम) होते हैं जो आप नहीं समझ सकते।‘ जो कह रहे हैं ‘आप नहीं समझ सकते’ तो आप बताइए, आपने समझे हैं? आपने समझे हों तो समझाने की कोशिश तो करिए! आप कोशिश करके देखिए, शायद हम समझ जाएँ। या हम आपको इतने मूर्ख लगते हैं कि आपके समझाने पर भी नहीं समझेंगे?

‘नहीं, समझाया नहीं जा सकता, अनुभव किया जा सकता है – एक्सपिरियंस एक्सपिरियंस !‘

आपने अनुभव किया है?

‘हाँ, मैंने किया है।‘

कोई प्रमाण आपने अनुभव किया है?

‘नहीं, प्रमाण कुछ नहीं; मैंने किया है, मेरी बात मानो।’ क्यों? ‘क्योंकि मैं महागुरु हूँ। मैंने किया है!’

और तुम मेरी बात मानो इसके लिए मैं तुम्हें तरह-तरह से इंप्रेस (प्रभावित) करूँगा ताकि तुम्हें लगे कि ये इतने इम्प्रेस्सिव (प्रभावशाली) आदमी हैं तो इनकी बात सही ही होगी। तो आप घर के बड़े-बूढों से भी ये सब बातें पूछेंगे तो वो आपको बहुत गुरु-गंभीर आवाज़ में जवाब देंगे।

‘देखो बेटा, होता है, समझोगे। हमने अनुभव किया है।‘

अनुभव तो आप कुछ भी कर सकते हैं। और जो कुछ अनुभव में आए, उसी को वेदान्त बताता है कि मिथ्या है।

जब अनुभोक्ता ही मिथ्या है तो अनुभव सत्य कैसे हो गए?

हो सकता है आपने अनुभव किया भी हो लेकिन आपके अनुभव करने से ही यह सिद्ध हो जाता है कि आपका अनुभव झूठा है क्योंकि सब अनुभव मिथ्या होते हैं। व्यावहारिक हो सकते हैं वो, पारमार्थिक नहीं हो सकते। कोई भी अनुभव सत्य नहीं होता। तो जो चीज़ आपके अनुभव में आ गई, वो तो अनुभव में आने मात्र से ही मिथ्या साबित हो गई।

धर्म जीवन में सबसे ऊँची चीज़ होना चाहिए न? कि बाकि जीवन एक तरफ़ और जो चीज़ जीवन में चेतना को खींच रही है ऊपर की तरफ़, एक आरोहण दे रही है उसको, एक पुल, एक ट्रैक्शन (कर्षण) उसे धर्म कहते हैं।

बृहस्पतिवार को उस्तरा नहीं चलेगा – ये धर्म है?

मासिक धर्म में देवता नाराज़ हो जाएँगे, मंदिर मत जाना – ये धर्म है?

उन दिनों में अचार में हाथ मत डाल देना – यह धर्म है?

नज़र लग गई है, भूत चढ़ गया है, माता चढ़ गईं हैं – यह धर्म है?

बलि देनी है – ये धर्म है?

ये अच्छे से समझिए, संस्कृति का धर्म से सम्बन्ध हो यह बिलकुल आवश्यक नहीं है क्योंकि संस्कृति में परंपराओं की बड़ी केन्द्रीय जगह होती है। हम चूक कर जाते हैं, हम संस्कृति को ही धर्म समझने लगते हैं, माने हम परंपराओं को ही धर्म समझने लगते हैं। परंपराओं का धर्म से कुछ सम्बन्ध हो भी सकता है, नहीं भी। जहाँ तक हमारी बात है, हमारी ९९% परंपराओं का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है और जिन १% परंपराओं का धर्म से कुछ सम्बन्ध है भी, उस सम्बन्ध को हम जानते नहीं। तो कुल मिलाकर हम परंपराओं के विषय में बिलकुल अंधे हैं। ९९% परम्पराएँ तो अभी त्याग दी जानी चाहिए। जो १% सम्माननीय हैं, पूजनीय हैं, जिन्हें सुरक्षित रखा जाना चाहिए उनका हम अर्थ नहीं जानते, उनका हम अंधानुकरण करते हैं।

बल्कि समय आ गया है जब नयी परम्पराएँ विकसित की जाएँ क्योंकि परम्पराएँ समय-सापेक्ष होती हैं। सत्य कालातीत होता है, काल निरपेक्ष। परंपरा, विश्वास, ये सब तो संस्कृति के साथ बदलते रहते हैं, कालबद्ध होते हैं। चार-हज़ार साल पुरानी या चार-सौ साल पुरानी परंपरा का आज क्या स्थान? आज तो यदि आपको धार्मिक जीवन जीना है, जो कि बहुत आवश्यक है धार्मिक जीवन जीना, तो आपको नयी परम्पराएँ विकसित करनी चाहिए।

बस हो गया न जो आप चाहती थीं? (मुस्कुराते हुए)

अब बुरा मैं बनूँगा।

प्र: प्रणाम, आचार्य जी। आपने जैसा अभी बताया कि आत्मा का आवागमन नहीं होता और जैसा एक ब्राह्मण परिवार से आती हूँ तो ये चीज़ें – ‘आत्मा अंदर है, वो चली जाएगी तो मृत्यु हो जाएगी’ ये सब सुना हुआ है। तो अगर आत्मा का आवागमन नहीं होता तो वह क्या चीज़ है जो एक व्यक्ति को जीवित बनाती है और उसमें से या तो निकल जाती है या हट जाती है तो वही व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो जाता है? क्या वो चेतना है? वो क्या है?

आचार्य: वो शरीर है।

शरीर ही जीता है, शरीर ही मरता है। शरीर की ही एक अवस्था को चैतन्य और जीवित अवस्था कहते हो, शरीर की ही दूसरी अवस्था को धूल कह देते हो।

वास्तव में जड़ और चेतन में, जीवित और मृत में कोई आयामगत भेद नहीं है। आप भूल ये करते हो कि सोचते हो कि जड़ एक चीज़ है, उसमें कुछ मिल जाएगा तो वो जीवित हो जाएगा। नहीं, जड़ ही जीवित है, जड़ ही चैतन्य है। ये जो धूल है, ये जीवित है।

आप जिसको मृत्यु कहते हो वो बस जीवन की एक दूसरी अवस्था मात्र है। हाँ, वो वैसी अवस्था नहीं है जैसी आप आमतौर पर देखते हो, वह वैसी अवस्था नहीं है जो अब आपके किसी उपयोग की रह गई है तो आप कह देते हो, ‘ये तो मृत है’, उसको जला देते हो। जो ज़िंदा है वो मरा हुआ है, जो मरा है वो ज़िंदा है, कुछ अलग कभी नहीं होता।

ऐसा नहीं होता कि भ्रूण में किसी विशेष पल प्राण आ जाते हैं। अन्न वीर्य बनता है, अन्न ही अंड बनता है और अन्न को आप क्या बोलते हो? कि ‘ये तो जड़ है।’ गेहूँ का दाना आप चैतन्य तो नहीं मानते। उसी से वीर्य बना, उसी से भ्रूण बना, उसी से जीव बना – वह सदा ही जीवित था। वो सूक्ष्मरूप से जीवित था। पर हमारी आँखें स्थूल को देख पाती हैं, तो हम कहते हैं ‘जीव तब आया जब गर्भ ठहरा।‘ नहीं, वह जीवित सदा से था। यूँही थोड़े ही उपनिषद् कहते हैं, “अन्नम ब्रह्म”। अन्न से चेतना है और चेतना को ही ब्रह्मगामी होना है, तो अन्न ही ब्रह्म है।

समझ में आ रही है बात?

तो कुछ ऐसा नहीं है जो शरीर में घुस जाता है तो ज़िंदा हो जाओगे और शरीर से निकल जाएगा तो मर जाओगे। शरीर शरीर है। जैसे छोटा शरीर होता है, बड़ा शरीर होता है, वैसे ही ज़िंदा शरीर होता है, मुर्दा शरीर होता है। शरीर ही है, बस जिसको तुम मुर्दा बोलते हो वो बदबू मारेगा, चल-फिर नहीं सकता। भई, ये उसके गुण हैं। शरीर की हर अवस्था के अपने-अपने गुण होते हैं। शरीर की भ्रूण अवस्था के अपने गुण होते हैं, शरीर की बाल्यावस्था के अपने गुण होते हैं, किशोरावस्था के अपने गुण होते हैं, वृद्धावस्था के अपने गुण होते हैं, और शरीर की ही मृत अवस्था के अपने गुण होते हैं। हाँ, मृत अवस्था के गुण परिवार और समाज के लिए उपयोगी नहीं रह जाते हैं तो परिवार और समाज उस मृत शरीर को जला देता है।

अन्यथा शरीर शरीर है। वो पहले भी शरीर था, वो अभी भी शरीर है। पहले वह चेतना की एक स्थिति में था, अब वह चेतना की दूसरी स्थिति में है। मृत्यु चेतना का विपरीत नहीं है। जिसको तुम मृत्यु बोलते हो वो भी चेतना की एक स्थिति मात्र है। हम कहते हैं न कि चेतना की तीन स्थितियाँ होती हैं? एक दफ़े मैंने कहा था ‘नहीं-नहीं-नहीं, ऐसे मत बोलो कि तीन ही स्थितियाँ होती हैं। इसको ऐसे बोलो कि एक घर है, घर में तीन कमरे हैं। तीन कमरों के बाहर वहाँ एक बगीचा है और घर की चारदीवारी के बाहर पूरा एक संसार है। तो ये जो तीन कमरे हैं ये जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति हैं। इन तीन कमरों से बाहर लेकिन घर के ही अंदर जो बगीचा है उसको मृत्यु मानो। वो भी घर के अंदर ही है, और इन चारों से जो बाहर है उसको तुरीय मानो। वो वास्तव में पंचम हुआ, तुरीय नहीं, चौथा नहीं, पाँचवा हुआ।‘

चेतना की तीन नहीं, चार अवस्थाएँ मानो – जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, और मृत, वो भी एक अवस्था ही है। उसे अचेतन मत कहो या ऐसे कह दो कि अचेतन होना भी चेतना की एक अवस्था है। इसीलिए श्रीमद्भगवद्गीता में कृष्ण इस भेद को ही समाप्त कर देते हैं। वह कहते हैं, ‘तुम पुरुष को चैतन्य मानते हो।‘ वो कहते हैं, ‘पुरुष अलग है ही नहीं प्रकृति से।‘ वह पुरुष को कहते हैं, ‘वह पराप्रकृति है’ और जिसको तुम साधारण प्रकृति कहते हो जिसमें धूल, नदी, पहाड़ सबकुछ आ जाता है, उसको कहते हैं, ‘इसको तुम कह दो, ये अपराप्रकृति है।‘

वह जड़ और चेतन का अंतर ही मिटा देते हैं। वह कहते हैं, ‘एक ही आयाम है, उस आयाम पर तुम थोड़ा-सा पीछे हो तो कह दिया जाता है कि अचेतन हो या मृत हो या जड़ हो और उसी आयाम पर तुम थोड़ा आगे हो तो कह दिया जाता है कि तुम जीवित हो या चैतन्य हो।‘ कुछ बदल नहीं गया, ये अहंकार की बात है सोचना कि जो जीवित है वो मृत से वास्तव में आयामगत तरीके से भिन्न है। जीवित और मृत एक ही हैं। दीवारों के भी कान होते हैं, कण-कण में नारायण इसीलिए कहा गया है। चेतना हर जगह है, सबमें है। कहीं वो अपने पूर्ण प्रस्फुटन में है और कहीं वो प्रसुप्ति में है।

मृत्यु का अर्थ यही होता है कि चेतना जो पूर्णतया अभिव्यक्त हो रही थी वो एक दूसरी अवस्था में चली गई। जैसे स्वप्न और सुषुप्ति चेतना की ही सोई हुई अवस्थाएँ होती हैं, ऐसे ही समझ लो और गहरी नींद को मृत्यु कहते हैं, वो भी एक अवस्था मात्र है।

तो कुछ निकलता या आता नहीं है भीतर कि तुम ज़िंदा हो जाओगे या मर जाओगे; शरीर ही ज़िंदा है, शरीर ही मुर्दा है। कुछ आया गया नहीं।

शरीर प्रकृति है, प्रकृति माँ है, चेतना उसका शिशु है। इसीलिए तंत्र में महामाया की पूजा होती है क्योंकि वो चेतना की माताजी हैं। माँ और बच्चे को भिन्न कैसे बोलोगे जबकि वो दोनों एक साथ रहते हों? क्या शरीर के बिना चेतना हो सकती है?

चेतना और शरीर एक ही हैं।

यह स्पष्ट हो रहा है? क्या नहीं हो रहा है?

जब आप सो जाते हैं तो कुछ पृथक होता है क्या? बस वैसे ही। रही शरीर के बदलने की बात, आप कहेंगे, 'मरने पर तो शरीर दूसरा हो जाता है’, तो बुढ़ापे और जवानी में भी तो शरीर दूसरा हो जाता है। शरीर तो है ही निरंतर परिवर्तनशील, बस आमतौर पर उसका जो परिवर्तन होता है वह शनैः-शनैः होता है। मृत्युपरांत जब हम उसको जला देते हैं तो वह परिवर्तन यकायक हो जाता है। हमें दिखाई देता है कि खाल राख बन गई। पर खाल तो प्रतिदिन राख बनती है। कभी अपने हाथ घिसकर देखो, वो खाल ही है जो बाहर आती है। खाल तो लगातार राख बन ही रही है। मृत्यु तो लगातार हो ही रही है, क्योंकि मृत्यु और जीवन अलग-अलग नहीं हैं। वही जो आपकी राख है वो अन्न बनेगी न? आपकी राख ही तो अन्न बनेगी न? और अन्न बनकर वो फिर चैतन्य हो जाएगी। यही तो पुनर्जन्म है कि प्रकृति में यही चक्र चलता रहता है। आप शरीर थे, आप राख हुए, राख बनकर अन्न हुए, अन्न बनकर फिर चैतन्य हो गए।

प्र१: जितना भी पढ़ा-सुना है आत्मतत्व के बारे में, आत्मा के बारे में, वो पूरा कॉन्सेप्ट ही इस बात से उलट जाता है मेरा कि शरीर ही सबकुछ है, मृत अवस्था में भी वो चेतना ही है और अभी मैं यहाँ बैठकर बात कर रहा हूँ, सुन रहा हूँ, तो अभी भी मैं वैसा ही हूँ जैसा मरने के बाद रहूँगा।

आचार्य: क्या आप सोते समय वैसे ही होते हैं जैसे अभी हो? तो मरने के बाद वैसे कैसे रह जाओगे जैसे अभी हो? ये क्या कुतर्क है? ये तो छोड़ दो कि सोते समय तुम वैसे ही रहोगे जैसे अभी हो, यहाँ से बाहर निकलोगे, दूसरे हो जाओगे, शोर मचाओगे। तो अभी खड़े-खड़े वैसे कैसे रहोगे जैसा मरने के बाद होते हो? प्रतिपल तो बदल रहे हो।

प्र१: आचार्य जी, आप सही कह रहे हैं; मतलब मैं समझ नहीं पा रहा हूँ वो चीज़...

आचार्य: मुझे लग भी नहीं रहा है कि तुम मुझे ग़लत कह रहे हो। (मुस्कुराते हुए)

प्र१: मेरा ये कहना का मतलब है कि देखिए, जन्म और मृत्यु यहाँ बैठे हुए सभी लोगों को ये होगा कि ये दोनों चीज़ें अपने हाथ में नहीं होतीं। जन्म हुआ और वो चेतना – समझ में नहीं आता…

आचार्य: समझ में इसलिए नहीं आता क्योंकि आप अपनेआप को मिट्टी मानना नहीं चाहते। अहंकार की बात है, बुरा लगता है।

‘हममें और मिट्टी में कोई अंतर ही नहीं?’ नहीं है अंतर! यह मान लो, मुक्त हो जाओगे। और मृत्यु के भय से भी दूर हो जाओगे। समझ जाओगे कि क्यों मृत्यु को मिथ्या कहा जाता है। क्योंकि मृत्यु का आपने अर्थ लगाया है मिटना, जबकि मृत्यु का अर्थ है केवल बदलना।

प्र२: प्रणाम, आचार्य जी। मैं उसी के कॉन्टिनुएशन में पूछ रही हूँ कि आप कह रहे हो कि जन्म और मृत्यु शरीर की अवस्था हैं। जब जीवित होते हैं तो शरीर की एक अवस्था है, सुषुप्ति में जाते हैं तो दूसरी अवस्था है और मृत हो जाते हैं तो एक और अवस्था। हम लोग ये समझते हैं कि जबतक हम जीवित हैं, हम लोगों के शरीर में आत्मा है और जब हम लोग जीवित नहीं हैं तो... ये आत्मा-जीवन-मरण, इन सब का खेल समझ में नहीं आ रहा है सर।

आचार्य: शरीर ‘में’ आत्मा हो सकती है? शरीर में तो वही सबकुछ होगा न जो चेतना का विषय है! चेतना का विषय माने क्या? जो कुछ आप सोच सकते हो, चेतना का विषय कहलाता है। मैं जिस चीज़ के बारे में सोच रहा हूँ वो चेतना का विषय है। अगर आपने आत्मा के बारे में सोच लिया तो वह चेतना का विषय हो गई।

आप कह रहे हो – आत्मा इतनी छोटी-सी चीज़ है और इतनी भौतिक चीज़ है और एकदम त्रिआयामी चीज़ है कि वो शरीर में घुस जाएगी। और मन में भी घुसी हुई है क्योंकि मैं उसके बारे में कहानी बता रहा हूँ, सिद्धांत बता रहा हूँ।

आत्मा क्या है? यह जो शरीर है न मदर , माँ, मम्मी, इसका छोटा-सा बच्चा है चेतना। उसको बहुत-बहुत बड़ा होना होता है, उसको अनंत होना होता है, यही उसकी माँ की आकांक्षा है। चेतना की अनंतता को आत्मा कहते हैं। एक तरह से शरीर को ही आत्मस्थ होना होता है अपने बच्चे के माध्यम से। कौनसा बच्चा? चेतना। यह शरीर ही मुक्ति चाहता है; शरीर और चेतना अलग-अलग नहीं हैं। शरीर और चेतना अलग-अलग होते तो सर पर कोई हथौड़ा भी मार देता तो आपकी चेतना हिलनी नहीं चाहिए थी। शराब पीते ही – शराब शरीर पीता है न? – शराब पीते ही चेतना क्यों हिलने-डुलने लग जाती है? क्योंकि शरीर और चेतना अलग-अलग नहीं हैं।

और हम कुछ इस तरीके से हैं, बस हैं, कोई वजह नहीं है उसकी, यथार्थ है बस, कि इस शरीर में जो चेतना है, जो इस शरीर से अभिन्न है, उसे बड़ा होना है, बड़े हुए बिना उसे चैन नहीं मिलता। उसी बड़ी सम्भावना को, चेतना का ही जो उच्चतम लक्ष्य है, उसको आत्मा बोलते हैं।

तो आत्मा कोई चीज़ नहीं जो इधर-उधर डोल रही है, आत्मा अंतिम लक्ष्य है और पहला आधार है। इसीलिए उसे आकाश भी बोलते हैं – सबकुछ उसके भीतर है, वो किसी के भीतर नहीं हो सकता। कोई बोले कि आकाश फ़लानी चीज़ के अंदर रखा हुआ है, तो तुरंत क्या पूछोगे? ‘वो चीज़ कहाँ रखी है फिर?’ आत्मा आकाश है, सबकुछ उसमें है, कुछ भी इतना बड़ा नहीं होता कि उसमें आकाश समा जाए।

और यह भी सिर्फ़ एक रूपक है। क्यों? क्योंकि आकाश को भी आप कह सकते हैं कि मन के आयाम में तो आ गया न, हम बात कर लेते हैं वगैरह-वगैरह। आकाश की तो फिर भी बात हो सकती है; आत्मा ऐसा आकाश है जिसकी बात भी नहीं हो सकती। कोई शब्द उच्चारित करोगे उसके बारे में तो कोई सीमा दे दोगे आत्मा को, कोई प्रतीक बना लोगे, कोई छवि खड़ी करोगे। और मन छटपटाता है, मन कहता है, ‘आत्मा जो भी चीज़ है, उसको पकड़ क्यों न लूँ? कुछ तो सिद्धांत बता दो, क्या होती है, कैसी होती है, रंग क्या होता है? नाम क्या होता है? तरीका क्या है उसको छू लेने का?’

जानते हो मन ये क्यों पूछ रहा है? क्योंकि मन बड़ा नहीं होना चाहता। अहंकार कहता है, ‘आत्मा को पाने का जो सही तरीका है, वो नहीं अपनाऊँगा।‘ सही तरीका क्या है? बहुत बड़े हो जाओ, आकाशवत हो जाओ। ‘मैं छोटा तरीका अपनाऊँगा।‘ छोटा तरीका क्या है? ‘मैं जैसा हूँ, मैं वैसा ही रहूँगा, मैं आत्मा के बारे में जानूँगा, मैं आत्मा का ज्ञान हासिल करूँगा। मैं आत्मा बनना नहीं चाहता, मैं आत्मस्थ हो विलीन और लुप्त नहीं हो जाना चाहता, मैं छोटू ही रह करके आत्मा का ज्ञान पा लेना चाहता हूँ’ – यह अहंकार की चाल होती है।

प्र३: प्रणाम, आचार्य जी। इस विषय पर आपने जो बात कही, मैंने पूरी कोशिश की समझने की, पर ज़्यादा समझ नहीं पायी। मैं एक संस्था के पास गयी थी और वहाँ एक दीदी हैं जो कहती हैं कि आत्मा उनके अंदर आती है और बात करती है।

आचार्य: मत बुलवाइए।

(श्रोतागण हँसते हैं)

प्र४: प्रणाम आचार्य जी, मैं एक जैन परिवार से हूँ और जब धर्म की बातें होती हैं तब बोला जाता है कि भगवान महावीर तीर्थंकर जो थे, उनका जीव – ‘जीव’ शब्द का प्रयोग होता है – कि उनका जीव तीर्थंकर बनने से पहले इतने भवों में गया था, ये किया था, वो किया था; उसके बाद उनका जीव तीर्थंकर के पर्याय में आया। तो यहाँ पर आत्मा की बात मैं थोड़ा-थोड़ा समझा, पूरा नहीं समझा लेकिन फिर यह जीव क्या है?

आचार्य: हम जीव हैं। चेतना, छोटू बेबी, उसको अपनी माँ से चिपकना ज़्यादा प्रिय होता है अपनी विशालता की अपेक्षा – इस भाव को जीव कहते हैं।

समझ रहे हो?

चेतना अपनेआप को अपनी माँ से, माने देह से ही जोड़कर देख ले तो जीव कहलाती है। चेतना जो देहाभिमानी हो जाती है, जीव कहलाती है। छोटे बच्चे होते हैं न? मम्मी के पास ही रहेंगे, स्कूल नहीं जाएँगे। जबकि स्कूल में उसकी तरक्की है, बेहतरी है, पर वो बच्चा क्या कर रहा है? वो मम्मी से चिपका हुआ है। इस मम्मी से चिपकने को जीवभाव कहते हैं।

प्र४: तो क्या आचार्य जी हम अपनी वृत्तियों को भी जीव बोल सकते हैं?

आचार्य: जिसको आप वृत्ति कहते हैं उन्हें सांख्य में, वास्तव में वेदान्त में भी, प्रकृति के गुण कहा जाता है। वो प्रकृति में होते हैं, तो जो प्रकृति का बच्चा है, चेतना, उसमें भी होते हैं।

प्र५: आचार्य जी, सादर नमस्कार। जैसा आपने बताया कि हर शरीर के साथ एक चेतना होती है। तो यहाँ पर हमारे कई अलग-अलग शरीर हैं, तो क्या हमारी कई चेतनाएँ हैं?

आचार्य: हाँ अलग चेतनाएँ हैं।

प्र४: और दूसरे जो चौरासी-लाख योनियों की बात आती है कि चौरासी-लाख योनियों में भटकने के बाद ये शरीर प्राप्त हुआ है और इसका हमें उद्धार करना है – तो ये क्या है? और ये चेतना अलग-अलग कैसे हैं? ये शरीर मरता है तो चेतना का क्या होता है?

आचार्य: शरीर ही चेतना है। चेतना का कुछ नहीं होता; वो धूल में बैठ जाती है।

प्र४: तो क्या सर हमारी कई चेतना हैं?

आचार्य: बिलकुल! जितने लोग यहाँ बैठे हैं, उतनी ही चेतनाएँ नहीं है यहाँ पर, आपकी जो चेतना थी प्रश्न पूछने से पहले, वो अब बदल चुकी है। तो चेतनाएँ अनंत हैं, चौरासी-लाख का जो आँकड़ा है वह प्रतीक है अनंतता का। कि जैसे आप बोलते हो न फ़लाना हज़ार बहाने बनाता है। इसका क्या मतलब है? ठीक १००० बहाने बनाता है? ९९८ नहीं बना सकता, १००२ नहीं बना सकता? हज़ार बहाने का क्या अर्थ है? अनंत, बहुत ही सारे! यही कहा जाता है। चौरासी-लाख योनियाँ माने चेतना के अनंत रंगरूप हैं। "मन के बहुतक रंग हैं छिन-छिन बदले सोय", यही है चौरासी-लाख योनियाँ।

इसका ये मतलब नहीं है कि आप खरगोश बन जाओगे, खरगोश आपके भीतर ही बैठा हुआ है। जिस धूल से आप मनुष्य बन गए, उसी धूल से तो खरगोश भी आता है न? तो आपमें भी धूल है, खरगोश में भी धूल है। खरगोश में आप हैं, आपके भीतर खरगोश है। खरगोश की मूलवृत्ति है डर और सतर्कता। आप डरे हुए नहीं रहते? आप भी खरगोश हो। खरगोश आप में ही मौजूद है।

जब आप बहुत डर जाओ तो आप कह सकते हो अभी आप खरगोश योनि में हो। जब आप बहुत चालाकी दिखाओ तो आप कह सकते हो अभी आप सियार योनि में हो। जब आप एकदम डरपोक, बल्कि कायर हो जाओ तो आप कह सकते हो आप गीदड़ योनि में हो। तो अभी ही यहाँ अनंत योनियाँ हैं जो लगातार परिवर्तित भी हो रहीं हैं। मरकर योनि परिवर्तन नहीं होगा, योनि परिवर्तन प्रतिपल हो रहा है। आप किसी एक ही योनि में नहीं हैं, आप मनुष्य होते हुए भी लगातार योनि परिवर्तन में हैं।

सारी बातें मन को संबोधित करके कही गईं हैं। सब योनियाँ मन के लिए हैं, क्योंकि मुक्ति भी किसको चाहिए? मन को चाहिए। योनियाँ सब मन के लिए हैं। जिन लोगों ने ये बातें कही थीं, उन्हें बड़ा अचरज होता होगा कि उनकी बातों का किस तरीके से बेढंगा अर्थ किया गया। वो बहुत ऊँचे लोग थे, वो मन की मुक्ति के साधक थे। उन्होंने जो कहा मन मात्र को कहा, माने चेतना मात्र को संबोधित करके कहा, पर हमने उस बात का बिलकुल स्थूल अर्थ कर लिया। हमने कहना शुरू कर दिया कि तुम शक्कर ज़्यादा खाते हो, मरकर चींटी बन जाओगे – ये बेढंगी बात है, एकदम बचकानी, दो साल के बच्चों को शोभा देती हैं ऐसी बातें, प्रौढ़ों को नहीं।

अगर आप शक्कर की ओर बार-बार भाग रहे हो तो आप अभी ही चींटी हो। और शक्कर की ओर भागने से ही आप चींटी नहीं हो गए। जो भी कोई अपने लालच की वस्तु की ओर भाग रहा है उसे चींटी बोल सकते हो। जो भी कोई मिठास पर मरता है, किसी भी तरह की मिठास, शब्दों की मिठास, रूप की मिठास, उसे आप चींटी बोल सकते हो; मरने की प्रतीक्षा मत करो, आप पशु योनियों में अभी ही हो। इसीलिए कहा जाता है कि निचली योनियों में गिरने से बचो और ऊँची योनि की तरफ़ प्रस्थान करो। निचली योनियों में गिरने से बचने का क्या अर्थ है? कि जानवरों जैसी वृतियों से बचो, जानवरों जैसी वृत्तियाँ प्रदर्शित करना ही निचली योनियों में प्रवेश है।

प्र५: जब कृष्ण बात करते हैं कि जो व्यक्ति मृत्यु के समय मुझे याद रखता है वो ऊँची गति को प्राप्त होता है तो कृष्ण किस मृत्यु की बात कर रहे हैं? वो कौनसी स्थिति है?

आचार्य: प्रतिपल की मृत्यु की। इसका उत्तर मैंने दिया है। आप कहाँ थे? कल ठीक इसी प्रश्न का उत्तर दिया है। कल ही दिया न? इसी को मृत्यु बोलते हैं।

(श्रोतागण हँसते हैं)

आप कौनसी योनि में विचरण कर रहे थे? आधे घंटे तक मैं इसी का उत्तर दे रहा था।

मृत्यु प्रतिपल हो रही है। कृष्ण का स्मरण भी इसीलिए प्रतिपल करना है। मृत्यु क्या है? किसी ऐसी चीज़ से संबद्ध हो जाना – मन की मृत्यु – किसी ऐसी चीज़ से जुड़ जाना जो परिवर्तित हो जाती है, उसको मृत्यु बोलते हैं। और आप जुड़ गए थे यह सोचकर कि यह चीज़ परिवर्तित होगी नहीं। आप चाहते थे आप जिससे जुड़े हो वो नित्य रहे, अमर रहे, शाश्वत रहे, पर वो बदल जाता है – ये मौत है, मौत लगातार होती है। और मृत्यु लगातार दुःख देती जाती है क्योंकि आपकी आशा खंडित हो रही है। आपकी आशा थी नहीं बदलेगा, वो बदल गया, चोट लगी।

इसीलिए कृष्ण का नाम चाहिए ताकि चोट ना लगे, वह मृत्यु से बचाते हैं। मृत्यु से कैसे बचाते हैं? कृष्ण हैं तो किसी और से चिपटोगे ही नहीं। कृष्ण हैं तो किसी ऐसी चीज़ से सम्बन्ध बैठाओगे ही नहीं जो नाशवान है। कृष्ण माने ब्रह्म, कृष्ण माने वो जो बदल नहीं सकता क्योंकि वह मन में है ही नहीं, वो मन में समाएगा ही नहीं; मन में जो कुछ है बदल जाएगा। कृष्ण कोई पुरुष, कोई व्यक्तित्व, या अवतार भर नहीं हैं। ब्रह्म को कृष्ण कहते हैं। गीता में कृष्ण ब्रह्म हैं सीधे। तो जो कृष्ण के साथ है वो नाशवान चीज़ों से सम्बद्ध नहीं है, अतः उसे मृत्यु का सामना नहीं करना पड़ेगा; बस ये है।

प्र६: आचार्य जी, प्रणाम। अभी आप ने बताया कि शरीर और चेतना अलग-अलग नहीं हैं। इससे पहले मैंने आपसे समझा है कि ख़ुद को चेतना जानो, आप शरीर नहीं हो। तो फिर इसमें द्वन्द पैदा हो रहा है मेरे अंदर।

आचार्य: बेटा, तुम हो तो शरीर ही क्योंकि शरीर ना हो तो चेतना नहीं हो सकती, लेकिन तुम्हें बढ़ करके आकाश हो जाना है। हो तो तुम मिट्टी ही क्योंकि मिट्टी ना हो तो पौधा नहीं हो सकता, लेकिन उस पौधे को बड़ा वटवृक्ष हो जाना है। वटवृक्ष होने के लिए ज़रूरी है कि मैं तुम्हें यही सीख दूँ कि तुम मिट्टी के ही आलिंगन में मत पड़े रहो।

क्योंकि जैसे-जैसे पेड़ उठता है, ऐसा लग सकता है कि उसकी पृथ्वी से दूरी बढ़ती जा रही है। तो इसलिए ये सीख देनी पड़ती है कि पृथ्वी के ही आलिंगन में, आगोश में मत पड़े रहो, तुम उठो।

वही जो माँ वाला रूपक है न, वो बिलकुल सटीक है यहाँ पर। बच्चा है छोटा, माँ से आया है और माँ से ही उसे सबकुछ मिलता है तो वो माँ से बिलकुल चिपका रहना चाहता है। लेकिन इसमें उसका कल्याण नहीं होगा। उसका कल्याण इसमें है कि एक अवस्था के बाद वो धीरे-धीरे संसार में बाहर निकले, और अपनी जो संभावना है उसको साकार करके दिखाए। यह काम है चेतना का।

तो तात्विक रूप से यह बात बिलकुल सही है कि तुम शरीर ही हो, लेकिन सीख देने के लिए यह कहना पड़ेगा कि तुम प्रकृति से परे हो, तुम देह नहीं हो, देहभाव का त्याग करो। समझ में आ रही है बात ये? ये दो हैं विरोधाभासी बातें, लेकिन इनको साथ लेकर चलना पड़ेगा। यथार्थ यही है कि तुम शरीर ही हो लेकिन शरीर तुम्हारी संभावना नहीं है, नियति नहीं है।

शरीर तुम्हारा यथार्थ है, हो शरीर ही, लेकिन सीख यही दूँगा कि तुम शरीर नहीं हो ताकि तुम शरीर से बंध कर ना रह जाओ। शरीर से बंधे रह गए तो वो हो नहीं पाओगे जो होने के लिए शरीर ने ही तुम्हें पैदा किया है। जैसे तुम्हारे माध्यम से, तुम्हारी चेतना के माध्यम से स्वयं शरीर ही मुक्ति पाना चाहता हो! जैसे पृथ्वी का प्रेम हो आकाश से तो वह पेड़ को उपजाती है कि जाओ, आकाश को चूम लो – ऐसे समझो। और पेड़ अगर आकाश की ओर नहीं बढ़ रहा है तो पृथ्वी को भी अच्छा नहीं लगेगा।

प्र७: मैं यह पूछना चाह रही हूँ कि जैसे चेतना बड़ी होकर आत्मा हो जाना चाहती है। तो मतलब चेतना विस्तार करना चाहती है? विस्तार करने का मतलब कि हमारे विचार ऊँचे हो जाना चाहते हैं क्या? और इसमें अहम् का क्या रोल है?

आचार्य: चेतना के विस्तार का अर्थ होता है अपने देहभाव से मुक्ति।

प्र७: और फिर इसमें अहम् का क्या रोल है?

आचार्य: अहम् ही चैतन्य होता है। चेतना के लिए दो चाहिए। जब आप कहते हैं, 'मैं चैतन्य हूँ' तो उसमें दो चाहिए होते हैं, एक दृष्टा और एक दृश्य। अहम् नहीं है तो संसार नहीं होगा, संसार नहीं है तो चेतना नहीं हो सकती, क्योंकि जो हमारी सामान्य चेतना होती है वह द्वैतात्मक होती है, उसमें दो चाहिए होते हैं – एक मैं और एक संसार, एक दृष्टा और एक दृश्य। तो चेतना के लिए आवश्यक है कि चेतना के केंद्र में 'मैं' बैठा हो, 'मैं'।

कृष्ण कहते हैं गीता में कि अहंकार प्रकृति का एक तत्व मात्र है। वो भी शरीर – शरीर जो कि मिट्टी है, जो कि प्रकृति है – वो भी शरीर से ही उठता है। वो शरीर से उठता है लेकिन उसके पास एक बड़ी अद्भुत शक्ति होती है। वो शक्ति होती है 'चुनाव' की। चुनाव की शक्ति ना होती तो कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश ना दिया होता। अगर सबकुछ पहले से ही तय होता तो अर्जुन को समझाने की कोई ज़रूरत ना होती क्योंकि अर्जुन को जब कृष्ण समझा रहे हैं तो अर्जुन के पास ना समझने का भी अधिकार है। यदि सबकुछ पहले से तय होता तो ये भी तय कर दिया जाता कि अर्जुन समझेगा-ही-समझेगा। ऐसा नहीं होता है।

तो अहंकार के पास चयन की शक्ति होती है, उसे चुनना होता है अपनी बढ़ोतरी को। मैं चुनता हूँ कि अपनी माताजी को ससम्मान, सप्रेम कहूँगा कि मुझे अब आगे जाने दो, ऊपर बढ़ने दो। ठीक वैसे ही जैसे आचार्य शंकर ने अपनी माताजी को कहा था।

प्र८: तो आचार्य जी, यह जो अलग-अलग शरीर मिले हुए हैं, कोई जानवर के शरीर में आ गया, कोई मनुष्य के शरीर में है, तो यह एक संयोग है?

आचार्य: और आपको क्या लगता है? आप श्रेय लेना चाहते हैं कि ये जो आपको शरीर मिला है वो एक पदक की तरह मिला है कि आपने अतीत में, माने पिछले जन्मों में बड़ी उम्दा करतूतें करीं थीं इसीलिए अब आपको पुरस्कार स्वरूप यह मनुष्य शरीर भेंट किया गया है?

प्र८: सुना तो यही था आचार्य जी।

आचार्य: ये जो पूरा मेरा वक्तव्य था कि मैंने अतीत में बड़ी ज़बरदस्त करतूतें करी थीं इसीलिए मुझे अब पुरस्कार स्वरूप ये पदक प्रदान किया गया है, इसमें से आपको किसकी दुर्गंध आ रही है? अहंकार की। ये अहंकार मात्र है, कहना कि 'मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, इसलिए देखो मुझे मनुष्य योनि मिली है।‘ आप सर्वश्रेष्ठ हैं अपनी दृष्टि में। एक छोटा-सा अमीबा भी है न, उसकी दृष्टि में वही सबकुछ है। आप कहेंगे आप सर्वश्रेष्ठ हैं इसीलिए आपको जानवरों का माँस खाने का अधिकार है। शेर कहेगा, ‘मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, मुझे मनुष्य को खाने का अधिकार है।‘ अगर आप वास्तव में सर्वश्रेष्ठ होते तो शेर कभी आपको मार ही नहीं पाता। पर आप हत्थे चढ़ जाइए उसके और उसको बोलिए, ‘मैं तो सर्वश्रेष्ठ हूँ, मनुष्य योनि में हूँ।‘ वो कहेगा, ‘ये सब बातें आध्यात्मिक लोगों को बताना, हम इतने बेवकूफ़ नहीं हैं।‘

अच्छे काम इसलिए नहीं करिए कि उससे आगे अच्छा जन्म मिलेगा। अच्छे काम इसलिए नहीं करने हैं कि अगले जन्म में अमीर परिवार में पैदा हो जाएँगे। अच्छे काम इसलिए करने हैं क्योंकि आप अभी बेचैन हैं, तड़प रहे हैं। आपको अपनी वर्तमान स्थिति को ठीक करना है इसलिए शुभ कर्म करिए। शुभ कर्म भविष्य को और अगले-पिछले जन्म को ध्यान में रखकर मत करिए। शुभ कर्म अपनी वर्तमान हालत को ध्यान में रखकर करिए। लोग पूछते हैं, कहते हैं, ‘अगर अगला जन्म नहीं होता तो फिर कुछ भी अच्छा करने की ज़रूरत क्या है? खाओ, पीओ, मौज करो!’ मैं पूछता हूँ, तुम मौज कर रहे हो क्या? खाने-पीने से अगर मौज हो सकती है तो कर लो।

तुम वह मरीज़ हो जो ऐसा मरीज़ है, इतनी बुरी हालत में रोगी है कि कहता है, 'मैं तो मौज कर रहा हूँ'। कल्पना करिए आप अस्पताल जाएँ, वहाँ एक मरीज़ पड़ा हुआ है, उसकी आँतें बाहर आयी हुईं हैं, हाथ में किडनी है, उसका अचार बना हुआ है, बोलता है तो दाँत उछल-उछलकर बाहर आते हैं, खोपड़ा आधा उसका बैक्टीरिया खा गए हैं, और वो बोल क्या रहा है? 'मैं तो मौज कर रहा हूँ!' हममें से ज़्यादातर लोग ऐसे ही होते हैं।

अध्यात्म इसलिए नहीं है कि इस व्यक्ति का अगला जन्म अच्छा हो जाएगा। अध्यात्म इसलिए है ताकि यह अपने वर्तमान कष्ट से मुक्ति पा सके। मुक्ति का अर्थ यही होता है, मुक्ति का अर्थ और कुछ नहीं है। आपको वर्तमान में जो कष्ट है उससे मुक्ति पा जाइए, यही मुक्ति है। इसीलिए भारत में जो उच्चतम आदर्श है वो अगले जन्म की मुक्ति को नहीं माना गया, जीवनमुक्त को माना गया। जीवनमुक्त माने अभी चाहिए मुक्ति, अभी। अभी तरकर दिखाओ, आगे के लिए लंबित मत करो कि आगे मुक्ति मिलेगी। अभी मुक्त जीवन जी कर दिखाओ, यह हुई सूरमाओं वाली बात। पुण्य इकट्ठा नहीं करने हैं, तत्काल अपनी बेड़ियाँ काटनी हैं।

आपको दिखता नहीं है – आप गीता का हवाला देते हैं, कृष्ण निष्काम कर्म की बात कर रहे हैं। निष्काम कर्म का अर्थ ही यही है कि आगे की बात पर ध्यान नहीं देना है, जो अभी सही है, जो अभी कृष्णधर्मा है, तुम वो करो। तो आप अभी कर्म कैसे कर सकते हैं अगले जन्म को ध्यान में रखकर? फिर निष्काम कर्म का क्या हुआ? समस्या अभी है, समाधान अभी करना होगा।

(श्रोताओं को संबोधित करते हुए) किसी का सरदर्द हो रहा है? हाथ उठा दीजिए, मैं चाहता हूँ उठाएँ। अरे भाई! किसी को शौचालय जाना है? उठा दो हाथ, उठा दो, उठा दो। (कुछ श्रोतागण हाथ उठाते हैं) हाँ! अगले जन्म में भेजूँगा।

(सब श्रोतागण हँसते हैं)

दबाव अभी है तो राहत अभी चाहिए न? या अगले जन्म में चाहिए। अध्यात्म इसीलिए है ताकि आपको आपके कष्टों से अभी राहत मिल सके। दो-सौ साल बाद राहत पाकर क्या करोगे? रो तो अभी रहे हो।

मैं बताता हूँ हम क्यों तत्काल नहीं राहत पाना चाहते हैं, क्योंकि तत्काल राहत चाहिए तो तत्काल कीमत भी चुकानी पड़ती है। इतना बड़ा हमारा कलेजा नहीं है, तो हम बातें टाल देते हैं अगले जन्म में। कितनी गहरी साज़िश है न ये? तत्काल राहत चाहिए तो तत्काल विद्रोह करना होगा, क्रांति करनी होगी। इतना हममें साहस नहीं तो हम कहते हैं, ‘हम धीरे-धीरे पुण्य वगैरह इकट्ठा कर रहे हैं। अगले जन्म में कुछ बेहतर होगा मामला।‘

प्र९: मैं माफ़ी चाहूँगा आचार्य जी, दोबारा से वो धृष्टता कर रहा हूँ...

आचार्य: नहीं नहीं, बिलकुल पूछिए।

प्र९: बड़ा बचकाना सवाल है, कई बार समाचार पत्रों में, न्यूस पेपर्स में ऐसी घटनाएँ देखी गईं हैं कि एक...

आचार्य: झूठ है, झूठ है, झूठ है। एकदम झूठ है। (बाकि श्रोताओं से) आप भी जानते हैं कौनसी घटनाओं के बारे में बता रहे हैं।

जिन्हें पता नहीं होता न कि पुनर्जन्म जैसी कोई चीज़ होती है उनके साथ ये घटनाएँ घटती भी नहीं हैं। जिन्हें पता नहीं होता न कि ऐसी घटनाएँ घट जाएँ तो तुरंत अख़बार में छपेगा तुम्हारा नाम, उनके साथ ऐसी घटना नहीं घटती।

अब समझ लो कि ऐसी घटनाएँ क्यों घटती हैं – आपको पता है कि ऐसा एक सिद्धांत है जो समाज में प्रचलित है वो चीज़ आपके साथ भी होने लगती है। कई बार यह आपकी खुली साज़िश होती है, खुला झूठ होता है, कई बार ये आपके साथ अचेतन तरीके से होता है। आपको सही में लगने लगता है कि आपके साथ ऐसा हो रहा है जबकि वह सिर्फ़ एक सुनी हुई चीज़ है, जिसको आप अपने जीवन में अभिनीत कर रहे हैं। और फिर उसके साथ जो टी.आर.पी मिलती है उसका तो कहना ही क्या!

आप यहाँ से बाहर निकलिए, कहिए, ‘आचार्य जी बड़े गज़ब के आध्यात्मिक आदमी हैं, उनके सामने बैठा तो मुझे अपने पिछले अट्ठारह जन्म याद आ गए।‘ चार दिन तक देश भर के नैश्नल टीवी पर आप-ही-आप चलेंगे। और आप बिलकुल उसमें सजीव चित्रण करिए, बताइए, ‘देखिए, मैं न पहले ऐसा था, वैसा था, मैं ऐसा करता था, वैसा करा करता था।‘ और आप ये नहीं भी कर रहे हो तो आपके आसपास वाले कर देंगे। कोई छोटा बच्चा, दो-चार ऐसी बातें बोल दे उसके माँ-बाप तुरंत ढिंढोरा पीटते हैं कि देखो हमारे घर ऋषि ने जन्म लिया है। इन सब चीज़ों से बड़े फ़ायदे होते हैं। अभी एक वहाँ पर बछड़ा पैदा हो गया, उसके दो सर थे। वो बेचारा गरीब आदमी उसके यहाँ पर बछड़ा पैदा हुआ था, उसको लोगों ने इकट्ठा करके तीन-चार लाख रूपए दे दिए। उसकी कुल उपलब्धि क्या है? उसने तो कुछ किया भी नहीं। पर उसे तीन-चार लाख मिल गए तुरंत।

पिछले सब जन्मों का सांकेतिक अर्थ है। क्या अर्थ है? वो धूल जो आज तुम्हारे रूप में है, वही धूल कभी राजा थी, कभी मंत्री थी, कभी ऋषि थी, कभी घोड़ा थी, कभी गाय थी, कभी नदी थी, कभी पहाड़ थी, वो सब तुम्हारे एक अर्थ में पिछले जन्म थे। हम इतने पुराने हैं कि आज तक जो कुछ हुआ है इस पृथ्वी पर हम सबमें भागीदार रहे हैं, तो एक अर्थ में हमने बहुत सारे जन्म ले लिए हैं अब तक – वो सांकेतिक बात है।

पुनर्जन्म तो निश्चित रूप से होता है, और मैं उससे पूर्णतया सहमत हूँ। पर हम यह नहीं समझ पाते हैं कि पुनर्जन्म वास्तव में किसका होता है। हम ये सोचते हैं कि ये जो हमारा व्यक्तिगत अहंकार है, यही जन्म लेगा। जैसा मैं कहता हूँ कि हम सोचते हैं अभी महेश मरेगा, रमेश बन जाएगा और रमेश को ये याद होगा कि मैं पिछले जन्म में महेश था – नहीं ये सब नहीं है। आपके निश्चित रूप से अनंत जन्म हो चुके हैं, ठीक उसी तरह जैसे सागर की एक-एक बूंद अनंत बार अलग-अलग लहरों का रूप ले चुकी है। उसी तरह आप भी अनंत बार अलग-अलग रूप ले चुके हैं। धूल ही तो है न जो सबकुछ बनाती है? डायनासोर ख़त्म हो गए क्या? ना, धूल बने, वो धूल आज आपके शरीर में है।

एवोगैड्रो नंबर में (६.०२२×१०२३) १०२३ आता है, इसका मतलब समझ रहे हो? कितनी सारी यूनिट्स हो गईं हैं। एक मोल ऑक्सीजन का जो अभी मेरी नाक से निकल रहा है, वो आप तक ज़रूर पहुँच रहा है क्योंकि उसमें इतनी सारी यूनिट्स मौजूद हैं। मेरा जीवन आपका जीवन बनता जा रहा है। बल्कि आप ये समझिए, एक के आगे आपको २३ शून्य लगाने हैं, इस दुनिया में आज तक जो भी व्यक्ति जीवित रहा है, जो भी, उसके शरीर का कुछ-न-कुछ अंश आपके शरीर में मौजूद है – ये है पुनर्जन्म का अर्थ।

लेकिन जहाँ तक आपकी बात है, मैं जिससे अभी बात कर रहा हूँ, जिस विशिष्ट चेतना से मैं अभी बात कर रहा हूँ, उसका यह एकमात्र जन्म है और उसको यदि कष्ट है तो उसे अपने कष्टों का तत्काल उपचार करना चाहिए। अपने कष्टों के उपचार के लिए अगले-पिछले जन्म पर निर्भर मत रहो। सही कर्म अभी करो।

प्र१०: प्रणाम आचार्य जी, सही कर्म के विरुद्ध एक जो तर्क दिया जाता है – बूढ़ों से लेकर बच्चों तक जो सभी कहते हैं – वो महाभारत की एक कथा से आता है कि मरने के बाद मोक्ष मतलब स्वर्ग दुर्योधन को भी प्राप्त हुआ था। मुझे स्वर्ग या नर्क में ज़्यादा रुचि नहीं है, लेकिन कहानी में ऐसा अंत लाने की लेखक को क्या ज़रूरत थी?

आचार्य: कि अगर विरोध करना भी है तो कृष्ण का करो। पानवाले, चायवाले, रिक्शेवाले को क्यों परेशान करते हो? दम है तो जाओ भिड़ जाओ कृष्णा से। मिल जाएगा स्वर्ग, तुरंत स्वर्गवासी करेंगे वो। क्षुद्रता के विरुद्ध यह बात कही जाती है कि अगर विरोध ही करना है तो कम-से-कम विरोध में तो थोड़ी ऊँचाई दिखाओ, थोड़ा दम दिखाओ।

एक वीडियो है मेरा, उसमें मैंने शायद शीर्षक ही यही दिया था कि भिड़ जाओ ऋषियों से। बहुत होशियार बनते हो, बहुत तर्क चलाते हो, तो जाओ और उपनिषदों के ऋषियों के विरुद्ध तर्क चलाओ और दिखाओ कि तुम्हारे तर्क कैसे सफल होते हैं। छोटे-मोटे बच्चों को पकड़ना, उनपर अपने तर्क चला देना, ये बात ठीक नहीं है न? तो इसीलिए यह कहा जाता है कि रावण को भी मुक्ति मिल गई। दुर्योधन को बता रहे हो स्वर्ग मिल गया, जो भी बात है। कहीं तो ऊँचाई दिखाओ। अगर खलनायक ही बनना है तो सुपरविलन बनो।

क्षुद्रता मत दिखाओ, पेटिनेस मत दिखाओ, उससे कुछ नहीं मिलता।

अब बन मत जाना तुम। यह तर्क दुर्योधन बनने के लिए नहीं दिया गया है। ये तर्क क्षुद्रता के विरोध में दिया गया है। आशय यह नहीं है कि तुम दुर्योधन ही बन जाओ। आशय यह है कि किसी भी तरह की क्षुद्रता ना दिखाओ।

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