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आओ, डूबो, बाकी सब भूलो || आचार्य प्रशांत, श्रीकृष्ण पर (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।। -श्रीमद भगवद्गीता (अध्याय ६, श्लोक २२)

अनुवाद: परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्म प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता।

आचार्य प्रशांत: बड़े-से-बड़ा दुःख कब तुम्हें विचलित नहीं करेगा? जब वो बड़ा हो ही ना। बड़े-से-बड़ा दुःख, अरे तुम्हें लगता होगा, मेरे लिए वो बड़ा है ही नहीं। समझ में आई बात? दृष्टि को थोड़ा साफ़ करो। तुम बड़े-से-बड़े दुःख से ऐसे नहीं जीतोगे कि तुमने बड़ी ताकत इकट्ठी कर ली है, या तुमने कोई सुरक्षा कवच तैयार कर लिया है जो दुखों से तुम्हारी रक्षा करेगा, बड़े-से-बड़े दुःख से तब जीता जाता है जब वो…

श्रोतागण: बड़ा लगे ही ना।

आचार्य: इसमें है क्या? और वो कब छोटा लगने लगता है? जब तुम्हें वो मिल जाता है जो वास्तव में बड़ा है। जो वास्तव में बड़ा है जब वो मिल जाता है तो बाकि सबकुछ छोटा-ही-छोटा तो है। संत यदि कोई हो यहाँ पर तो कहेगा, "नहीं ये भी बात बनी नहीं, आप कहते हो कि जब वो बड़ा मिल जाता है, तो बाकि सब कुछ छोटा-छोटा हो जाता है, हम तो कुछ और कह रहे हैं, मैं पूछूँगा, "क्या?" तो कहेंगे, "हम कह रहे है कि जब वो मिल जाता है तो बाकि कुछ बचता ही नहीं, तो छोटा भी अब क्या रहा?"

"प्रभु दुःख रूप आए, हम ये नहीं कह रहे हैं कि दुःख छोटी बात है, हम कह रहे है कि दुःख भी तुम ही हो। हम यह नहीं कह रहे हैं कि इतना बड़ा मिल गया कि बाकि सब छोटा हो गया, हम कह रहे हैं कि तुम्हारे अलावा और कुछ है ही नहीं तो दुःख भी तुम ही हो। हमें तो दिख रहा है कि दुःख भी तुम ही हो, तो दुःख का स्वागत है, पूरा-पूरा स्वागत है।"

कौन गाएगा? हमें सुख दे या दुःख… कौन सुनाएगा?

श्रोतागण: चाहें ख़ुशी दे या गम, चाहें ख़ुशी दे या गम, हमको दोनों ही पसंद, हमको दोनों ही पसंद, दाता किसी भी दिशा में ले चल ज़िंदगी की नाव, दाता किसी भी दिशा में ले चल जिंदगी की नाव, तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काँटों से भी प्यार, तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काँटों से भी प्यार, दाता किसी भी दिशा में ले चल ज़िंदगी की नाव, दाता किसी भी दिशा में ले चल ज़िंदगी की नाव, चाहे खुशी भरा संसार, चाहे आँसुओं की धार, चाहे खुशी भरा संसार, चाहे आँसुओ की धार, दाता किसी भी दिशा में ले चल जिंदगी की नाव, किसी भी दिशा में ले चल जिंदगी की नाव, तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काँटों से भी प्यार, तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काँटों से भी प्यार, दाता किसी भी दिशा में ले चल ज़िंदगी कि नाव।

आचार्य: देख रहे हो न काँटें काँटें है ही नहीं, ये नहीं है कि हम कुछ खास हो गए हैं जो अब काँटों को भी बर्दाश्त कर लेते है। काँटें क्या है?

श्रोतागण: अनुकम्पा।

आचार्य: बहुत-बहुत धन्यवाद। तुम चुभे, धन्यवाद। काँटा जब तक काँटा है तब तक तो वो बुरा ही लगेगा। अब काँटा काँटा...

श्रोतागण: नहीं रहा।

प्र: और ना ही फूल-फूल रहा।

प्र२: कूल हो गया वो।

(श्रोतागण हँसते हैं)

प्र३: वो दिये वाला उदाहरण, मतलब सिर्फ़ इशारे की तरह इस्तेमाल करना है, ये नहीं कि…

आचार्य: दिये पर ध्यान दीजिए। हवाओं को छोड़िए। दिये पर ध्यान दीजिए।

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्। स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा।। -श्रीमद भगवत गीता (अध्याय ६, श्लोक २३)

अनुवाद: जो दुःख रूप संसार के संयोग से रहित है, तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग ना उकताए हुए, अर्थात धैर्य और उत्साह-युक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है।

आचार्य: पहले तो जो योग की परिभाषा दी है सिर्फ़ उतने को बोलो।

प्र: जो दुःख रूप संसार के संयोग से रहित है, तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए।

आचार्य: किसी ने इस बात को बड़ी खूबसूरती से रखते हुए कहा है कि जीवन में जो आकस्मिक है, संयोगिक है और जो आवश्यक है, उनको जिसने जान लिया, ये भेद जिसने समझ लिया उसने सब जान लिया। जीवन या तो संयोग पर चलेगा, या योग में रहेगा। योग है आवश्यक और संयोग हुआ आकस्मिक।

हमें देखना होगा हमारे जीवन में क्या है जो मात्र संयोगवश आया, और क्या है जो योग का फल है। और दोनों में अंतर करना आना चाहिए हमको। जी रहे हैं हम उसमें से कितना है जो बस संयोग से मिल गया, क्या-क्या है जो संयोग से मिल गया है?

प्र: जन्म।

आचार्य: ठीक है जन्म।

प्र२: नाम।

प्र३: परिवार।

प्र४: धर्म।

प्र५: जात।

आचार्य: ठीक है।

प्र६: रुपया पैसा।

आचार्य: ठीक रुपया पैसा, काफ़ी हद तक।

प्र७: शक्ल।

आचार्य: हाँ, बहुत बढ़िया रूप, लिंग और क्या है? जो संयोग नहीं है अपितु योग का फल है?

प्र१: ज्ञान।

प्र२: कि हम यहाँ पर बैठे है।

आचार्य: हो सकता है। और वही कीमती है। जो योग फलित है, वो असली जीवन है और जो बस संयोगवश जिए जा रहे हैं, वो पाएँगे कि उन्हें कुछ मिला नहीं।

प्र१: वह योग ना उकताए हुए, अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है।

आचार्य: पहले वाले में एक चीज़ छूट गई थी उसको ले लेता हूँ। जहाँ संयोग की बात करी थी वहाँ दुःख की भी बात करी थी। ठीक है न, दुःख रूप संसार।

संसार दुःख नहीं है, यदि आप योगी हैं। संसार योग का फल भी हो सकता है, संसार में कोई बुराई नहीं है, कोई सज़ा नहीं है संसार।

प्र२: यदि आप योगी हैं।

आचार्य: यदि आप योगी हैं। पर यदि योग की जगह जीवन संयोग में बीत रहा है, तो वही संसार क्या बन जाएगा?

प्र३: दुःख।

आचार्य: दुःख बन जाएगा।

प्र४: सज़ा।

आचार्य: सज़ा हो जाएगी।

प्र५: नर्क हो जाएगा, नर्क।

आचार्य: ये सीखिए। यही मूल्य कहलाता है। मूल्य देना जानिए, कि क्या है जो मूल्यवान है, जो योगजनित है। और क्या है जो बस यूँ ही है, आकस्मिक बस एक तरह की दुर्घटना, आकस्मिक है।

प्र२: सर, पर आपने एक बार यह भी बोला है कि जो कीमती है वो तुम्हें आकस्मिक ही मिलेगा।

आचार्य: वो घटनाएँ हमेशा हो ही रही हैं हर समय, पर क्या तुम योगी हो? तुम क्या सोचते हो संयोग कभी-कभी होता है? पर तुम उसे होने तब ही दोगे जब तुम खुद एक योगी हो, संयोग तो हमेशा होना ही चाहता है।

प्र१: वह योग ना उकताए हुए, अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है।

आचार्य: कर्तव्य शब्द के साथ बढ़िया खेल रहे हैं। कह रहे हैं बाकि सारे कर्तव्यों को छोड़ो, एकमात्र कर्तव्य है तुम्हारा — योग। एक दूसरे मौके पर अर्जुन से कहते है — सारे धर्मो को छोड़ो, एकमात्र धर्म है तुम्हारा, मेरे पास आ जाना। तो कर्तव्य भी दे रहे हैं, धर्म भी दे रहे हैं। कह रहे हैं, "बाकि कर्तव्यों का पालन ना करना ही तुम्हारा कर्तव्य है।" और धर्म क्या है? धर्मों का पालन ना करना ही असली धर्म है।

प्र२: वही है, योगी हो जाओ।

आचार्य: ‘सर्व धर्म परित्याज मामेंकम शरणम ब्रज।’ सारे धर्मों का परित्याग कर दो, धर्मों का परित्याग करो, धार्मिक हो जाओ। धर्मों को छोड़ो, धार्मिक हो जाओ। बात समझ में आ रही है? और धार्मिक वही हो सकता है, जिसने धर्मों को छोड़ दिया।

ठीक वही बात यहाँ पर कह रहे हैं, "कर्तव्यो को छोड़ो, और जो एकमात्र कर्तव्य है, जो तुम्हारा एकमात्र दायित्व है उसको पूरा करो। तुम्हारा एकमात्र दायित्व है? योग। मुझमें आकर मिल जाना। मुझमें लीन हो जाओ, इसके अलावा तुम्हारा कोई कर्तव्य ही नहीं है। भूल जाओ कि तुम पत्नी हो, बच्चो का ख्याल रखना है, कोई कर्तव्य नहीं है तुम्हारा, एक कर्तव्य है बस। मेरे पास आ जाओ।"

धर्मों को छोड़ो धार्मिक हो जाओ, कर्तव्यों को छोड़ो, कर्तव्य को पा लो।

धर्मों पर एक बड़ी मज़ेदार कहानी है, वही आप उसको कर्तव्यों पर भी ले सकते है। एक बार, झाँकियाँ निकल रही थी, धर्मों की। उसमें सबसे पहले जीसस की झाँकी निकली। दो अरब लोग नाच रहे हैं उनके आसपास। दो अरब लोग। दो अरब से ज़्यादा इसाई हैं अब दुनिया में, नाच रहे हैं, जीसस की झाँकी जा रही है। उसके बाद मोहम्मद की झाँकी निकली, डेढ़ अरब लोग नाच रहे हैं, मुसलमान हैं। समझ रहे हैं? राम की झाँकी निकली, वहाँ भी एक अरब से ज़्यादा लोग नाच रहे हैं, हिन्दू हैं। उसके बाद एक झाँकी और निकली छोटी सी, वहाँ कोई पूछने वाला नहीं है। पता चला वो परमात्मा की झाँकी है।

धर्मों से इतना जुड़ गए कि धर्म भूल गया। जीसस से, राम से, मोहम्मद से इतना जुड़ गए कि परमात्मा भूल गया। क्रिस्चीऐनिटी याद है, क्राइस्ट गया।

प्र१: बुद्धिज़्म याद है, बुद्ध गए।

आचार्य: हाँ। बौद्ध बहुत सारे हैं, बुद्ध कहाँ? गए! इस्लाम ही इस्लाम है, कोई अल्लाह के पास भी पहुँचेगा? इस्लाम तो ठीक, अल्लाह कहाँ है? वही है यहाँ पर।

प्र२: रास्ते पर ही अटक गए, अब जाना भूल गए, जहाँ जाना है।

आचार्य: हाँ अगला।

युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दू:खहा।। -श्रीमद भगवद्गीता (अध्याय ६, श्लोक १७)

अनुवाद: दुखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सब कुछ है।

आचार्य: इसको उल्टा पढ़ो सब समझ में आ जाएगा, जो योगी हो गया उसका सब कुछ वही होता है जो यथायोग्य है। ये ना सोचना कि तुम कोई ख़ास आहार-विहार करके योग को पा लोगे, ये ना सोचना कि, "दिन के इतने ही घण्टे सोऊँगा", ये करके तुम योग को पा लोगे।

प्र४: अब रात को जागूँगा।

आचार्य: ऐसा ही है, उसकी दुनिया में बिलकुल ऐसा ही है। ये मत सोचना कि, जो संतुलित जीवन जीते हैं उन्हें योग मिल गया। नहीं, योग का फल है एक प्यारा जीवन। योग का फल है।

देखो कृष्ण की दुनिया ऐसी ही है, वहाँ योग हमेशा पहले आता है, बाकि सब फल है। वहाँ साधना और विधि कभी है ही नहीं, तुमने सुना ही नहीं होगा कि कृष्ण साधना कर रहे हैं, तपस्वी कृष्ण, सुना है? कि कृष्ण ने इतने वर्ष एक पाँव पर खड़े होकर साधना करी।

कृष्ण की दुनिया में योग सबसे पहले है। कह रहे हैं, "सबसे पहले तो तुम मिल जाओ, पहले तो तुम ये रूठना बंद करो, पहले तुम जाकर के गले लग जाओ, उसके बाद जो होगा अच्छा ही होगा। जो होगा अच्छा होगा।"

तुम्हारा सोना-जागना ठीक हो जाएगा। तुम्हें कर्मों में चुनाव नहीं करना पड़ेगा। तुम्हारे कर्म ठीक हो जाएँगे, तुम्हारा खाना-पीना ठीक हो जाएगा, सब ठीक हो जाएगा, जाकर पहले गले मिलो, ऐसे हैं कृष्ण। वहा साधना के लिए कोई जगह ही नहीं है, वहाँ पर विधियों के लिए कोई जगह ही नहीं है।

कोई ज़रा विधि बता दो कि कृष्ण की ये विधि है, क्या विधि है? रासलीला विधि है? कृष्ण की कोई विधि है ही नहीं। वहाँ तो सहज योग है, सामने, अभी। जाओ और डूब जाओ। फिर सब ठीक हो जाएगा।

समस्त साधना का जो अंतिम परिणाम होता है, कृष्ण कहते हैं, "वो अंतिम नहीं है, मुझे बात अच्छी नहीं लग रही, कि इतना कुछ कर-करके, कर-करके, कर-करके फिर सिद्धि मिलनी है।" वो कहते हैं, "छोड़ो न, सिद्धि पहले है, अब उसके बाद खूब करेंगे और मज़े लेंगे।"

साधना तो कष्ट है, साधना का अर्थ ही है कि सिद्धि अभी मिली नहीं, अभी तो कोशिश जारी है। अभी तो दम लगा के हईशा चल रहा है। जैसे नाक में फँस गया हो और ज़ोर-ज़ोर से सुड़क रहे हो कि नाक बाहर आ जाए। साधना ऐसी ही होती है, कुछ फँसा सा हुआ है, बाहर नहीं आ रहा। कृष्ण को ये सब सुहाता नहीं है, कि, "ये क्या ज़ोर लगा रहे हो? अरे मैं तुम्हें मिला ही हुआ हूँ, आओ, सामने हूँ।"

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